डायबिटीज (मधुमेह) आज दुनिया भर में तेजी से बढ़ रही स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है। यह किसी भी उम्र के व्यक्ति को प्रभावित कर सकती है। अक्सर लोग मानते हैं कि केवल मीठा खाने से ही ब्लड शुगर बढ़ता है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार कई ऐसी दैनिक आदतें भी हैं जो शुगर लेवल को असंतुलित कर सकती हैं और बीमारी को नियंत्रित करना मुश्किल बना सकती हैं। डायबिटीज को बेहतर तरीके से नियंत्रित रखने के लिए दवाओं के साथ-साथ संतुलित खान-पान, नियमित शारीरिक गतिविधि और स्वस्थ जीवनशैली अपनाना भी बेहद जरूरी है। सिर्फ चीनी नहीं, फास्ट फूड भी बढ़ा सकता है परेशानी डायबिटीज में केवल मिठाइयों से दूरी बनाना पर्याप्त नहीं होता। कई फास्ट फूड और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ भी ब्लड शुगर पर नकारात्मक असर डाल सकते हैं। इनमें शामिल हैं: बर्गर और पिज्जा फ्रेंच फ्राइज पैकेज्ड स्नैक्स प्रोसेस्ड और रिफाइंड फूड इन खाद्य पदार्थों में रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट, अस्वास्थ्यकर वसा और अतिरिक्त शर्करा अधिक हो सकती है। इनके नियमित सेवन से वजन बढ़ने, इंसुलिन की कार्यक्षमता प्रभावित होने और ब्लड शुगर नियंत्रण में कठिनाई आ सकती है। लंबे समय तक बैठे रहना भी हो सकता है नुकसानदायक शारीरिक निष्क्रियता डायबिटीज के प्रमुख जोखिम कारकों में से एक मानी जाती है। जब शरीर सक्रिय रहता है, तो मांसपेशियां ग्लूकोज का बेहतर उपयोग करती हैं और इंसुलिन संवेदनशीलता (Insulin Sensitivity) में सुधार होता है। वहीं लंबे समय तक बैठे रहने से ब्लड शुगर नियंत्रित रखना कठिन हो सकता है। विशेषज्ञ आमतौर पर रोज कम से कम 30 मिनट की शारीरिक गतिविधि या व्यायाम करने की सलाह देते हैं। अनियमित दिनचर्या बढ़ा सकती है जोखिम समय पर भोजन न करना, देर रात तक जागना और अनियमित दिनचर्या अपनाना भी ब्लड शुगर के स्तर को प्रभावित कर सकता है। इन आदतों से शरीर की प्राकृतिक जैविक घड़ी (Body Clock) प्रभावित होती है, जिससे ग्लूकोज नियंत्रण पर असर पड़ सकता है। तनाव को नजरअंदाज न करें लगातार तनाव रहने पर शरीर में ऐसे हार्मोन निकलते हैं जो ब्लड शुगर बढ़ाने का कारण बन सकते हैं। तनाव कम करने के लिए: पर्याप्त नींद लें। योग और ध्यान करें। नियमित व्यायाम करें। परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताएं। डायबिटीज में अपनाएं ये अच्छी आदतें संतुलित और पौष्टिक भोजन करें। नियमित समय पर खाना खाएं। रोजाना शारीरिक गतिविधि करें। पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं। डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवाएं और जांच समय पर कराएं। ब्लड शुगर की नियमित मॉनिटरिंग करें। ध्यान रखें डायबिटीज को नियंत्रित रखने के लिए केवल मीठे से दूरी बनाना काफी नहीं है। स्वस्थ खान-पान, नियमित व्यायाम, तनाव नियंत्रण और अनुशासित जीवनशैली अपनाकर ब्लड शुगर को बेहतर तरीके से नियंत्रित रखा जा सकता है। यदि ब्लड शुगर बार-बार बढ़ रहा हो या कोई असामान्य लक्षण दिखाई दें, तो डॉक्टर से परामर्श लेना जरूरी है।
नई दिल्ली: अभिनेता अनिल कपूर की भाभी और बिजनेसमैन संजय कपूर की पत्नी महीप कपूर ने पहली बार खुलकर बताया कि कैसे टाइप 1 डायबिटीज की वजह से उनका वजन अचानक 15 किलोग्राम तक कम हो गया और शुरुआत में उन्होंने इसे कोविड-19 का असर समझ लिया। अभिनेत्री सोहा अली खान के पॉडकास्ट में बातचीत के दौरान महीप ने अपनी बीमारी, गलतफहमी और समय पर इलाज न मिलने से जुड़ी पूरी कहानी साझा की। उन्होंने बताया कि बीमारी का पता चलने से पहले उनका शरीर लगातार संकेत दे रहा था, लेकिन कोविड महामारी के दौरान डॉक्टर के पास जाने से बचने और लक्षणों को वायरस का प्रभाव मान लेने के कारण सही समय पर बीमारी की पहचान नहीं हो सकी। हालात इतने गंभीर हो गए कि एक यात्रा के दौरान दिल्ली पहुंचते ही वह अचानक गिर पड़ीं और उन्हें तुरंत अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराना पड़ा। कोविड का असर समझती रहीं, लेकिन वजह थी डायबिटीज महीप कपूर ने बताया कि डायबिटीज का पता चलने से पहले उन्हें टाइफाइड भी हुआ था। इसके साथ ही उनके पीरियड्स अनियमित होने लगे, वजन तेजी से घटने लगा और उन्हें महसूस हो रहा था कि शरीर पहले जैसा नहीं रहा। उस समय वह पेरीमेनोपॉज के दौर से भी गुजर रही थीं, इसलिए कई बदलाव सामान्य हार्मोनल परिवर्तन जैसे लगे। कोविड-19 संक्रमण के बाद उनका वजन लगभग 15 किलोग्राम कम हो गया। उन्होंने इसे कोविड का साइड इफेक्ट समझ लिया और करीब तीन महीने तक लगातार काम और यात्रा करती रहीं। इस दौरान उनकी वास्तविक बीमारी लगातार बढ़ती रही। दिल्ली पहुंचते ही बिगड़ी तबीयत महीप ने बताया कि लगातार यात्रा के बाद जैसे ही वह दिल्ली पहुंचीं, उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई और वह गिर पड़ीं। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाकर आईसीयू में भर्ती किया गया। जांच के बाद डॉक्टरों ने टाइप 1 डायबिटीज की पुष्टि की और इंसुलिन थेरेपी शुरू की। उन्होंने कहा कि अब वह अपनी सेहत को लेकर बेहद सतर्क रहती हैं और नियमित रूप से ब्लड शुगर की जांच करती हैं ताकि किसी भी तरह की जटिलता से बचा जा सके। उन्हें वर्ष 2022 में टाइप 1 डायबिटीज का निदान हुआ था। टाइप 1 डायबिटीज में वजन तेजी से क्यों घटता है? टाइप 1 डायबिटीज में शरीर पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन नहीं बना पाता। इंसुलिन का काम रक्त में मौजूद ग्लूकोज को कोशिकाओं तक पहुंचाकर उसे ऊर्जा में बदलना होता है। जब इंसुलिन की कमी होती है, तो शरीर ग्लूकोज का उपयोग नहीं कर पाता। ऐसे में शरीर ऊर्जा की जरूरत पूरी करने के लिए फैट और मांसपेशियों को तोड़ना शुरू कर देता है। यही वजह है कि मरीज का वजन तेजी से कम होने लगता है। इसके अलावा, रक्त में बढ़ी हुई शुगर को बाहर निकालने के लिए किडनी अधिक मेहनत करती है, जिससे शरीर की ऊर्जा और तेजी से खर्च होती है। परिणामस्वरूप व्यक्ति में कमजोरी, थकान और तेजी से वजन घटने जैसी समस्याएं दिखाई देने लगती हैं। क्या है टाइप 1 डायबिटीज? टाइप 1 डायबिटीज एक ऑटोइम्यून बीमारी है। इसमें शरीर का इम्यून सिस्टम गलती से अग्न्याशय (Pancreas) की उन बीटा कोशिकाओं पर हमला कर देता है जो इंसुलिन बनाती हैं। जब ये कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं, तो शरीर में इंसुलिन का उत्पादन लगभग बंद हो जाता है और मरीज को जीवनभर इंसुलिन पर निर्भर रहना पड़ सकता है। क्या केवल बच्चों को होती है टाइप 1 डायबिटीज? आम धारणा है कि टाइप 1 डायबिटीज केवल बच्चों या किशोरों में होती है, लेकिन ऐसा पूरी तरह सही नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस बीमारी के कई मामले वयस्कों में भी सामने आते हैं। कई बार डॉक्टर भी शुरुआती लक्षणों को टाइप 2 डायबिटीज समझ लेते हैं, जिससे सही इलाज में देरी हो सकती है। कुछ मामलों में 70–80 वर्ष की उम्र में भी टाइप 1 डायबिटीज का पता चलता है। किन लक्षणों को नजरअंदाज न करें? बिना किसी स्पष्ट कारण के तेजी से वजन कम होना बार-बार प्यास लगना बार-बार पेशाब आना अत्यधिक थकान और कमजोरी धुंधला दिखाई देना लगातार भूख लगना यदि ये लक्षण लंबे समय तक बने रहें, तो तुरंत डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।
नई दिल्ली,एजेंसियां। चावल भारतीय भोजन का एक अहम हिस्सा है, लेकिन वजन घटाने और फिट रहने की कोशिश में कई लोग इसे अपनी डाइट से हटा देते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, चावल पूरी तरह छोड़ने का असर हर व्यक्ति पर अलग-अलग हो सकता है और यह उसकी उम्र, स्वास्थ्य और जीवनशैली पर निर्भर करता है। चावल कार्बोहाइड्रेट का प्रमुख स्रोत है, जो शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है। इसलिए इसे अचानक बंद करने से शरीर में कई बदलाव देखने को मिल सकते हैं। चावल छोड़ने के संभावित फायदे विशेषज्ञों के मुताबिक, चावल की मात्रा कम करने से कुल कैलोरी इनटेक घटता है, जिससे कुछ लोगों का वजन कम हो सकता है। इसके अलावा, कुछ मामलों में ब्लड शुगर नियंत्रण में भी मदद मिल सकती है, खासकर जब पूरी डाइट संतुलित हो। नुकसान भी हो सकते हैं नजरअंदाज नहीं चावल छोड़ने से शरीर में ऊर्जा की कमी, थकान और कमजोरी महसूस हो सकती है, क्योंकि कार्बोहाइड्रेट ऊर्जा का मुख्य स्रोत हैं। अगर इसकी जगह पर्याप्त फाइबर युक्त भोजन नहीं लिया जाए तो पाचन संबंधी समस्याएं भी हो सकती हैं। ऐसे में ब्राउन राइस या रेड राइस बेहतर विकल्प माने जाते हैं। किन लोगों को सावधानी रखनी चाहिए डायबिटीज के मरीज, एथलीट, बच्चे, किशोर और गर्भवती महिलाओं को बिना विशेषज्ञ की सलाह के अपनी डाइट में बड़ा बदलाव नहीं करना चाहिए। इन लोगों के लिए संतुलित कार्बोहाइड्रेट जरूरी होता है। विशेषज्ञों की राय स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि चावल को पूरी तरह छोड़ने की बजाय उसकी मात्रा और प्रकार पर ध्यान देना ज्यादा बेहतर है। संतुलित आहार में चावल को सीमित मात्रा में शामिल किया जा सकता है। कुल मिलाकर, चावल छोड़ना हर किसी के लिए जरूरी या फायदेमंद नहीं है, बल्कि सही डाइट बैलेंस बनाए रखना ही सबसे सुरक्षित तरीका माना जाता है।
आजकल बदलती जीवनशैली, घंटों बैठकर काम करने की आदत और असंतुलित खानपान के कारण डायबिटीज और हाई ब्लड शुगर की समस्या तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, रोजमर्रा की कुछ छोटी आदतें ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। इन्हीं में से एक है खाना खाने के बाद हल्की सैर करना। कानपुर के अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल के कंसल्टेंट क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ डॉ. आशीष मेहरोत्रा के अनुसार, भोजन के बाद 10 से 20 मिनट तक टहलना ब्लड शुगर को नियंत्रित करने और पाचन तंत्र को बेहतर बनाने में मददगार साबित हो सकता है। खाना खाने के बाद शरीर में क्या होता है? भोजन करने के बाद शरीर कार्बोहाइड्रेट को ग्लूकोज में बदलता है, जो खून में पहुंचता है। यदि भोजन में कार्बोहाइड्रेट या मीठी चीजें अधिक हों तो ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकती है। ऐसे में हल्की वॉक करने से शरीर की मांसपेशियां सक्रिय हो जाती हैं और वे ग्लूकोज का उपयोग ऊर्जा के रूप में करने लगती हैं। इससे खून में मौजूद अतिरिक्त शुगर कम होने लगती है और ब्लड शुगर का स्तर संतुलित रहता है। खाना खाने के बाद टहलने के फायदे 1. ब्लड शुगर में अचानक बढ़ोतरी को रोकता है भोजन के बाद होने वाले शुगर स्पाइक को कम करने में मदद मिलती है, जो डायबिटीज और प्रीडायबिटीज के मरीजों के लिए बेहद फायदेमंद है। 2. इंसुलिन संवेदनशीलता में सुधार नियमित वॉक करने से शरीर इंसुलिन के प्रति बेहतर प्रतिक्रिया देता है, जिससे ग्लूकोज आसानी से कोशिकाओं तक पहुंच पाता है। 3. पाचन तंत्र को बनाता है मजबूत खाने के बाद टहलने से बाउल मूवमेंट बेहतर होता है और पेट फूलना, भारीपन तथा अपच जैसी समस्याओं से राहत मिल सकती है। 4. वजन नियंत्रित रखने में मददगार हल्की शारीरिक गतिविधि कैलोरी बर्न करने में मदद करती है, जिससे मोटापा और टाइप-2 डायबिटीज का खतरा कम हो सकता है। 5. हार्ट और मेटाबॉलिज्म को फायदा ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है और शरीर का मेटाबॉलिज्म सक्रिय रहता है, जिससे समग्र स्वास्थ्य को लाभ मिलता है। ब्लड शुगर कंट्रोल करने के लिए अपनाएं ये आदतें खाना खाने के बाद 10-20 मिनट तक टहलें। ज्यादा मीठा और ओवरईटिंग से बचें। भोजन में फाइबर युक्त खाद्य पदार्थ शामिल करें। पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं। शुगरी ड्रिंक्स और प्रोसेस्ड फूड का सेवन कम करें। प्रोटीन, हेल्दी फैट और कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट वाला संतुलित आहार लें। नियमित व्यायाम करें और वजन नियंत्रित रखें। भोजन के तुरंत बाद लेटने से बचें। यदि डायबिटीज या प्रीडायबिटीज है तो नियमित ब्लड शुगर जांच करवाएं। विशेषज्ञों का मानना है कि खाने के बाद की छोटी-सी सैर लंबे समय में ब्लड शुगर नियंत्रण, बेहतर पाचन और अच्छी नींद जैसी कई स्वास्थ्य समस्याओं में लाभ पहुंचा सकती है।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में खराब खानपान और धूप से दूरी के कारण विटामिन डी की कमी तेजी से बढ़ रही है। लंबे समय तक इस जरूरी विटामिन की कमी केवल हड्डियों को ही नहीं, बल्कि शरीर के शुगर मेटाबॉलिज्म को भी प्रभावित कर सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि कम विटामिन डी स्तर टाइप-2 डायबिटीज के खतरे को बढ़ाने में भूमिका निभा सकता है। इंसुलिन के लिए क्यों जरूरी है विटामिन डी? विटामिन डी केवल कैल्शियम के अवशोषण और हड्डियों की मजबूती तक सीमित नहीं है। यह इंसुलिन के उत्पादन और उसके प्रभावी कार्य में भी मदद करता है। इंसुलिन वह हार्मोन है जो रक्त में मौजूद शुगर को नियंत्रित करता है। अध्ययनों के अनुसार, जिन लोगों में विटामिन डी की कमी होती है, उनमें इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में शरीर इंसुलिन का सही तरीके से उपयोग नहीं कर पाता, जिससे टाइप-2 डायबिटीज का जोखिम बढ़ सकता है। डायबिटीज के साथ बढ़ सकता है अन्य बीमारियों का खतरा विशेषज्ञों के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को विटामिन डी की कमी और डायबिटीज दोनों हैं, तो माइक्रोवैस्कुलर जटिलताओं का खतरा भी बढ़ सकता है। इसका असर शरीर की छोटी रक्त वाहिकाओं पर पड़ता है, जिससे कई गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। इनमें शामिल हैं: डायबिटिक रेटिनोपैथी (आंखों की बीमारी) डायबिटिक नेफ्रोपैथी (किडनी को नुकसान) डायबिटिक न्यूरोपैथी (नसों की कमजोरी) विटामिन डी की कमी से शरीर में सूजन बढ़ सकती है, जो रक्त वाहिकाओं की अंदरूनी परत को नुकसान पहुंचाकर ब्लड फ्लो को प्रभावित कर सकती है। विटामिन डी की कमी के संकेत लगातार थकान और कमजोरी मांसपेशियों में दर्द हड्डियों में दर्द बार-बार बीमार पड़ना ऊर्जा की कमी ब्लड शुगर नियंत्रण में परेशानी विटामिन डी की कमी कैसे दूर करें? विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ आसान उपाय अपनाकर विटामिन डी के स्तर को बेहतर बनाया जा सकता है: रोज सुबह 20 से 30 मिनट धूप में समय बिताएं। आहार में अंडा, मशरूम, फैटी फिश, दूध और दही शामिल करें। नियमित रूप से व्यायाम, योग और वॉक करें। डॉक्टर की सलाह पर विटामिन डी सप्लीमेंट लें। जरूरत पड़ने पर 25(OH)D टेस्ट करवाएं। क्या केवल विटामिन डी की कमी से डायबिटीज होती है? स्वास्थ्य विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि डायबिटीज एक बहु-कारक बीमारी है। केवल विटामिन डी की कमी को इसका एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता। हालांकि, पर्याप्त विटामिन डी स्तर बनाए रखना बेहतर इंसुलिन संवेदनशीलता और समग्र स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े कर्मचारियों पर की गई एक नई रिसर्च ने यह संकेत दिया है कि नाइट शिफ्ट में काम करना टाइप 2 डायबिटीज के मरीजों के लिए गंभीर चुनौतियां पैदा कर सकता है। 10 दिनों तक चले इस ऑब्जर्वेशनल अध्ययन में पाया गया कि रात में काम करने से खानपान की आदतें, जागने का समय और ब्लड शुगर का उतार-चढ़ाव काफी प्रभावित होता है। स्टडी में क्या पाया गया? इस अध्ययन में टाइप 2 डायबिटीज से पीड़ित 37 हेल्थकेयर वर्कर्स को शामिल किया गया, जिनमें से अधिकतर महिलाएं थीं और नर्स या मिडवाइफ के रूप में कार्यरत थीं। रिसर्च के दौरान प्रतिभागियों की ब्लड शुगर, फिजिकल एक्टिविटी, डाइट और नींद के पैटर्न को बारीकी से मॉनिटर किया गया। हालांकि औसत ब्लड शुगर लेवल में खास अंतर नहीं पाया गया, लेकिन ग्लूकोज में उतार-चढ़ाव (ग्लाइसेमिक वेरिएबिलिटी) नाइट शिफ्ट के दौरान ज्यादा देखा गया। खासतौर पर ‘मीन एब्सोल्यूट ग्लूकोज चेंज’ और ‘कंटीन्यूस ओवरलैपिंग नेट ग्लाइसेमिक एक्शन’ जैसे संकेतकों में बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो यह दिखाता है कि रात में काम करने से ब्लड शुगर ज्यादा अस्थिर हो सकता है। खानपान पर असर नाइट शिफ्ट के दौरान लोगों की खाने की आदतों में भी बड़ा बदलाव देखा गया। इन दिनों में कैलोरी इनटेक सबसे ज्यादा (लगभग 2199 kcal) रहा। साथ ही मीठे स्नैक्स का सेवन भी बढ़ गया - जो कुल ऊर्जा का करीब 13.4% था, जबकि आराम के दिनों में यह घटकर 7.8% रह गया। खाने की संख्या भी नाइट शिफ्ट में सबसे ज्यादा रही (औसतन 7 बार), जबकि आराम के दिनों में यह घटकर लगभग 3.4 बार रह गई। एक्टिविटी और जागने का समय रात में काम करने वाले लोग ज्यादा समय तक जागते रहे - औसतन 22 घंटे से अधिक। इसके साथ ही उनकी फिजिकल एक्टिविटी भी बढ़ी, जहां स्टेप काउंट 13,775 तक पहुंच गया। यह बदलाव शरीर के मेटाबॉलिज्म और शुगर कंट्रोल को प्रभावित कर सकते हैं। क्यों है यह चिंता का विषय? विशेषज्ञों के अनुसार, नाइट शिफ्ट में काम करने से शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक प्रभावित होती है, जिससे हार्मोनल बैलेंस बिगड़ सकता है। यह डायबिटीज के मरीजों में ब्लड शुगर कंट्रोल को और कठिन बना देता है। क्या है समाधान? इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि नाइट शिफ्ट करने वाले डायबिटीज मरीजों के लिए अलग तरह की डाइट, नींद और लाइफस्टाइल प्लानिंग जरूरी है। हेल्थ एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऐसे लोगों के लिए विशेष गाइडलाइन और सपोर्ट सिस्टम विकसित किए जाने चाहिए, ताकि वे अपनी बीमारी को बेहतर तरीके से नियंत्रित कर सकें।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।