नई दिल्ली: घरेलू शेयर बाजार में आज सकारात्मक शुरुआत देखने को मिली। शुरुआती कारोबार में बीएसई सेंसेक्स 400 अंक से अधिक की तेजी के साथ कारोबार करता दिखा, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी50 इंडेक्स 23,300 के स्तर को पार कर गया। सुबह करीब 9:45 बजे सेंसेक्स 430.61 अंक यानी 0.58 फीसदी की बढ़त के साथ 74,349.37 अंक पर कारोबार कर रहा था। वहीं, निफ्टी 114.45 अंक या 0.49 फीसदी चढ़कर 23,356.55 अंक पर पहुंच गया। इस बीच भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 0.2 फीसदी कमजोर होकर 95.54 पर खुला। पिछले कारोबारी सत्र में रुपया 95.35 के स्तर पर बंद हुआ था। रिलायंस इंडस्ट्रीज में सबसे ज्यादा तेजी सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 22 शेयर हरे निशान में खुले। सबसे ज्यादा बढ़त रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयरों में दर्ज की गई, जो करीब 1.5 फीसदी मजबूत हुए। इसके अलावा इन शेयरों में भी तेजी रही: हिंदुस्तान यूनिलीवर भारत इलेक्ट्रॉनिक्स (BEL) इन्फोसिस ट्रेंट स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) लार्सन एंड टुब्रो (L&T) एचडीएफसी बैंक टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) इन शेयरों में रही कमजोरी दूसरी ओर कुछ प्रमुख शेयरों में गिरावट भी देखने को मिली। इनमें शामिल हैं: बजाज फिनसर्व पावरग्रिड टेक महिंद्रा एचसीएल टेक महिंद्रा एंड महिंद्रा सन फार्मा मारुति सुजुकी मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों का प्रदर्शन ब्रॉडर मार्केट में भी मिश्रित रुख देखने को मिला। निफ्टी मिडकैप इंडेक्स में 0.01 फीसदी की बढ़त रही। निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स 0.25 फीसदी मजबूत हुआ। सेक्टरवार प्रदर्शन आज के कारोबार में FMCG सेक्टर सबसे मजबूत रहा। निफ्टी FMCG इंडेक्स में लगभग 1 फीसदी की तेजी दर्ज की गई। इसके अलावा: आईटी सेक्टर में खरीदारी प्राइवेट बैंकिंग शेयरों में मजबूती ऑयल एंड गैस सेक्टर में बढ़त वहीं, मेटल और ऑटो सेक्टर में दबाव देखने को मिला। कच्चे तेल की कीमतों में भी बढ़ोतरी पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतों में हल्की तेजी देखी गई है। ब्रेंट क्रूड 0.65 फीसदी बढ़कर 92.04 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। इंडियन बास्केट की कीमत 1.31 फीसदी बढ़कर 97.19 डॉलर प्रति बैरल हो गई। विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय हालात और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव आने वाले दिनों में भारतीय बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
नई दिल्ली: भारत सरकार ने कोयला क्षेत्र में बड़ा सुधार करते हुए 'कोल एक्सचेंज नियम, 2026' अधिसूचित कर दिए हैं। इस नई व्यवस्था के तहत देश में कोल एक्सचेंज स्थापित किए जाएंगे, जहां बाजार आधारित प्रणाली के जरिए कोयले की खरीद-बिक्री और कीमतों का निर्धारण किया जाएगा। सरकार का मानना है कि इससे कोयला व्यापार में पारदर्शिता बढ़ेगी, सप्लाई चेन मजबूत होगी और ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूती मिलेगी। कोयला मंत्रालय के अनुसार, इन नियमों के जरिए कोल एक्सचेंज स्थापित करने और उनके संचालन के लिए एक स्पष्ट नियामक ढांचा तैयार किया गया है। इससे कोयले की कीमतें मांग और आपूर्ति के आधार पर तय होंगी और उद्योगों को अधिक प्रतिस्पर्धी बाजार उपलब्ध होगा। क्या होंगे बड़े बदलाव? नई व्यवस्था लागू होने के बाद कोयला क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिलेंगे: कोयले की कीमतें बाजार आधारित तरीके से तय होंगी। खरीद-बिक्री प्रक्रिया पहले से अधिक पारदर्शी बनेगी। कमर्शियल और कैप्टिव खदान संचालकों को अधिक खरीदार मिल सकेंगे। सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्र के खिलाड़ी इस प्लेटफॉर्म पर भाग ले सकेंगे। ऊर्जा क्षेत्र की दक्षता और आपूर्ति सुरक्षा मजबूत होगी। कोयला व्यापार में डिजिटल और आधुनिक व्यवस्था विकसित होगी। MMDR संशोधन अधिनियम 2025 से मिला आधार कोयला मंत्रालय ने बताया कि खान और खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2025 के तहत पहली बार खनिज एक्सचेंज की अवधारणा पेश की गई थी। इस कानून ने केंद्र सरकार को कोयला और उसके प्रसंस्कृत रूपों सहित विभिन्न खनिजों के पारदर्शी और कुशल व्यापार को बढ़ावा देने का अधिकार दिया। इसी प्रावधान के तहत 4 जून 2026 को आधिकारिक राजपत्र में कोल एक्सचेंज नियम, 2026 प्रकाशित किए गए। CCO करेगा निगरानी और रेगुलेशन सरकार ने कोल कंट्रोलर ऑर्गनाइजेशन (CCO) को कोल एक्सचेंजों के पंजीकरण और नियमन की जिम्मेदारी सौंपी है। दिसंबर 2025 में CCO को इस कार्य के लिए अधिकृत किया गया था। नई व्यवस्था के तहत पात्र संस्थाओं को: कोल एक्सचेंज स्थापित करने, उनका संचालन करने, बाजार के नियम और उप-नियम बनाने, तथा कोयला व्यापार को सुगम बनाने की अनुमति दी जाएगी। इन एक्सचेंजों का रजिस्ट्रेशन 25 वर्षों तक वैध रहेगा। सरकार का क्या है उद्देश्य? सरकार पारंपरिक आपूर्ति तंत्र से आगे बढ़कर एक अधिक प्रतिस्पर्धी और आधुनिक कोयला बाजार विकसित करना चाहती है। इसका उद्देश्य उद्योगों को बेहतर विकल्प उपलब्ध कराना, व्यापार को आसान बनाना और आत्मनिर्भर ऊर्जा व्यवस्था को बढ़ावा देना है। कोयला मंत्रालय के अनुसार, यह पहल Ease of Doing Business, पारदर्शिता और आधुनिक ऊर्जा पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। बिजली और उद्योग जगत को होगा फायदा विशेषज्ञों का मानना है कि कोल एक्सचेंज शुरू होने से बिजली उत्पादन कंपनियों, इस्पात उद्योग और अन्य कोयला आधारित क्षेत्रों को अधिक लचीला और प्रतिस्पर्धी बाजार मिलेगा। साथ ही देश की ऊर्जा आपूर्ति को भी दीर्घकालिक मजबूती मिलने की उम्मीद है।
नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है। इसके बावजूद भारत समेत कई एशियाई देशों तक कच्चे तेल और LNG की आपूर्ति पूरी तरह बंद नहीं हुई है, बल्कि अब यह अधिक गोपनीय तरीके से की जा रही है। विश्लेषकों के अनुसार, युद्ध से पहले की तुलना में होर्मुज मार्ग से टैंकर ट्रैफिक 90 से 95 प्रतिशत तक घट चुका है। इसके चलते वैश्विक तेल और गैस सप्लाई को ट्रैक करना पहले की तुलना में कहीं अधिक कठिन हो गया है। क्या है 'डार्क मोड' रणनीति? शिपिंग डेटा के अनुसार, बड़ी संख्या में तेल टैंकर अब 'डार्क मोड' में संचालन कर रहे हैं। इसका मतलब है कि जहाज होर्मुज जलडमरूमध्य या फारस की खाड़ी में प्रवेश करते समय अपने AIS (ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम) ट्रांसपोंडर बंद कर देते हैं। पहले इस रणनीति का इस्तेमाल मुख्य रूप से प्रतिबंधों से बचने के लिए ईरान से जुड़े जहाज करते थे, लेकिन अब सामान्य वाणिज्यिक जहाज भी सुरक्षा कारणों और परिचालन जोखिमों के चलते ऐसा कर रहे हैं। वोर्टेक्सा (Vortexa) के आंकड़ों के मुताबिक, इस क्षेत्र से गुजरने वाले 57 प्रतिशत जहाजों ने अपने ट्रांसपोंडर बंद रखे, जबकि मई में यह आंकड़ा बढ़कर रिकॉर्ड 65.2 प्रतिशत तक पहुंच गया। भारत, चीन और पाकिस्तान तक जारी है सप्लाई मौजूदा संकट के बावजूद भारत, चीन और पाकिस्तान जैसे देशों को तेल और LNG की आपूर्ति जारी है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इसके लिए वैकल्पिक समुद्री कॉरिडोर और विशेष मार्गों का उपयोग किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र में ईरान का प्रभाव बढ़ने के कारण कई जहाज सुरक्षित मार्गों के जरिए अपनी खेप गंतव्य देशों तक पहुंचा रहे हैं। सामान्य स्थिति लौटने की उम्मीदें कमजोर शुरुआती अनुमान यह था कि युद्ध कुछ महीनों में समाप्त हो जाएगा और जून से होर्मुज जलडमरूमध्य में सामान्य गतिविधियां बहाल होने लगेंगी। लेकिन संघर्ष अब चौथे महीने में पहुंच चुका है और स्थिति अभी भी अनिश्चित बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में किसी समझौते के बाद भी इस मार्ग को पूरी तरह जोखिम-मुक्त नहीं माना जा सकेगा, क्योंकि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में बदलाव आ चुका है। वैश्विक ऊर्जा बाजार पर बना रहेगा असर होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक माना जाता है। वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में यहां जारी तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय बाजार, शिपिंग लागत और ऊर्जा कीमतों पर लंबे समय तक दिखाई दे सकता है।
नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित होने के कारण देश में कमर्शियल एलपीजी सिलेंडरों की कमी देखने को मिल रही है। इस संकट का असर भारतीय रेलवे की खानपान सेवाओं पर भी पड़ा है। स्थिति से निपटने के लिए इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कॉरपोरेशन (IRCTC) ने कई वर्षों बाद फिर से चलती ट्रेनों में खाना पकाने की व्यवस्था शुरू कर दी है। हालांकि इस बार पारंपरिक गैस चूल्हों की जगह इलेक्ट्रिक इंडक्शन स्टोव का इस्तेमाल किया जा रहा है। क्यों दोबारा शुरू करनी पड़ी पैंट्री कार कुकिंग? पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा कारणों से रेलवे ने चरणबद्ध तरीके से चलती ट्रेनों में खाना पकाने की व्यवस्था बंद कर दी थी और बेस किचन मॉडल अपनाया था। लेकिन एलपीजी की मौजूदा किल्लत के कारण IRCTC को वैकल्पिक व्यवस्था अपनानी पड़ी है। अब LHB पैंट्री कारों में बिजली की मदद से खाना तैयार किया जा रहा है। राजधानी, शताब्दी, दुरंतो और वंदे भारत जैसी अधिकांश प्रीमियम ट्रेनें LHB कोच के साथ संचालित होती हैं। रोजाना 17 लाख यात्रियों को मिलती है फूड सर्विस IRCTC देशभर में करीब 1,400 ट्रेनों में खानपान सेवाएं उपलब्ध कराती है। हर साल लगभग 58 करोड़ यात्रियों को भोजन उपलब्ध कराया जाता है, जबकि प्रतिदिन यह संख्या करीब 17 लाख तक पहुंचती है। रेलवे अधिकारियों के अनुसार, क्लस्टर किचन, बेस किचन और अन्य कैटरिंग सुविधाओं को संचालित करने के लिए प्रतिदिन लगभग 1,000 कमर्शियल LPG सिलेंडरों की आवश्यकता होती है। बड़े स्टेशनों पर भी बढ़ा बिजली का इस्तेमाल IRCTC के CMD संजय कुमार जैन के अनुसार, सभी LHB पैंट्री कारों में पहले से सुरक्षा सुविधाएं मौजूद हैं, इसलिए वहां इंडक्शन आधारित कुकिंग की अनुमति दी गई है। इसके अलावा बड़े रेलवे स्टेशनों पर भी इंडक्शन कुकिंग को बढ़ावा दिया गया है। फ़ूड प्लाजा, रिफ्रेशमेंट रूम और जन आहार आउटलेट संचालकों को माइक्रोवेव और इंडक्शन कुकर के उपयोग के निर्देश दिए गए हैं। वर्तमान में रेलवे किचन में तैयार होने वाले लगभग 60 प्रतिशत भोजन को बिजली की मदद से पकाया जा रहा है। तेल संकट का असर IRCTC की कमाई पर भी बढ़ती इनपुट लागत का असर IRCTC के मुनाफे पर भी दिखाई देने लगा है। वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में कैटरिंग सेगमेंट का EBIT मार्जिन घटकर 6.3 प्रतिशत रह गया, जबकि इससे पहले यह 10.4 प्रतिशत था। विश्लेषकों का मानना है कि यदि लागत का दबाव जारी रहता है तो भविष्य में कीमतों में बदलाव या सेवा मॉडल में सुधार की आवश्यकता पड़ सकती है। हालांकि IRCTC ने स्पष्ट किया है कि कैटरिंग की कीमतें तय करने का अधिकार रेलवे मंत्रालय के पास है। अब भी 341 ट्रेनों में पैंट्री सुविधा नहीं संसदीय आंकड़ों के मुताबिक देश की लंबी दूरी की 341 ट्रेनों में अभी भी पैंट्री कार की सुविधा उपलब्ध नहीं है। मौजूदा संकट ने रेलवे की कैटरिंग व्यवस्था से जुड़ी कई चुनौतियों को भी सामने ला दिया है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। भारतीय रेलवे अगस्त 2026 से अपने लगभग 40 साल पुराने पैसेंजर रिजर्वेशन सिस्टम (PRS) को बदलने जा रहा है। वर्ष 1986 में शुरू किया गया यह सिस्टम अब आधुनिक तकनीक से लैस नए प्लेटफॉर्म की जगह लेगा। रेलवे का दावा है कि इससे टिकट बुकिंग प्रक्रिया पहले से अधिक तेज, सुरक्षित और सुविधाजनक हो जाएगी। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने हाल ही में इस परियोजना की समीक्षा करते हुए अधिकारियों को निर्देश दिया है कि बदलाव के दौरान यात्रियों को किसी तरह की परेशानी न हो। ऑनलाइन टिकट बुकिंग को मिलेगा बड़ा फायदा वर्तमान में देश के करीब 88 प्रतिशत रेल यात्री ऑनलाइन माध्यम से टिकट बुक करते हैं। त्योहारों और पीक सीजन के दौरान पुराने सिस्टम पर अधिक दबाव के कारण सर्वर स्लो होने या तकनीकी समस्याएं सामने आती थीं। नया सिस्टम इन चुनौतियों को दूर करने के लिए तैयार किया गया है, जिससे भारी ट्रैफिक के बावजूद बुकिंग प्रक्रिया सुचारू बनी रहेगी। RailOne ऐप बना यात्रियों की पहली पसंद रेलवे के डिजिटल बदलाव में RailOne ऐप की महत्वपूर्ण भूमिका है। जुलाई 2025 में लॉन्च हुए इस ऐप को अब तक 3.5 करोड़ से अधिक लोग डाउनलोड कर चुके हैं। ऐप के माध्यम से यात्री टिकट बुकिंग और कैंसिलेशन, लाइव ट्रेन स्टेटस, प्लेटफॉर्म जानकारी, कोच पोजिशन और शिकायत दर्ज करने जैसी कई सुविधाओं का लाभ एक ही जगह प्राप्त कर सकते हैं। वर्तमान में प्रतिदिन लगभग 9.29 लाख टिकट इसी ऐप के जरिए बुक किए जा रहे हैं। AI बताएगा टिकट कन्फर्म होने की संभावना नए सिस्टम की सबसे बड़ी विशेषता एआई आधारित वेटिंग लिस्ट प्रेडिक्शन फीचर है। टिकट बुक करते समय यात्रियों को यह जानकारी मिल जाएगी कि उनकी वेटिंग टिकट के कन्फर्म होने की कितनी संभावना है। रेलवे के अनुसार, इस तकनीक की सटीकता पहले 53 प्रतिशत थी, जिसे बढ़ाकर 94 प्रतिशत कर दिया गया है। रेल यात्रा का अनुभव होगा बेहतर अगस्त से नया रिजर्वेशन सिस्टम पूरी तरह लागू होने के बाद टिकट बुकिंग तेज होगी, सर्वर पर दबाव कम होगा और यात्रियों को यात्रा की बेहतर योजना बनाने में मदद मिलेगी। रेलवे का यह कदम देश में डिजिटल और स्मार्ट रेल सेवाओं की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
नई दिल्ली: नीति आयोग के पूर्व सीईओ अमिताभ कांत ने भारत की विदेशी पर्यटन नीति को लेकर बड़ा बयान दिया है। उनका कहना है कि विदेशों में पर्यटन प्रचार (टूरिज्म मार्केटिंग) के बजट में भारी कटौती करने से भारत को आर्थिक मोर्चे पर बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है। उनके मुताबिक इस फैसले का सीधा असर विदेशी पर्यटकों की संख्या पर पड़ा और देश अरबों डॉलर के संभावित राजस्व से वंचित रह गया। इकोनॉमिक टाइम्स में लिखे अपने लेख में अमिताभ कांत ने कहा कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के दौर में पर्यटन ऐसा क्षेत्र है, जो विदेशी मुद्रा अर्जित करने और बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित करने का सबसे तेज माध्यम बन सकता है। 2019 के स्तर तक भी नहीं पहुंच पाया भारत अमिताभ कांत के अनुसार पिछले चार वर्षों में भारत का विदेशी पर्यटन मार्केटिंग बजट लगभग समाप्त कर दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि वर्ष 2024 में भारत में करीब 99 लाख विदेशी पर्यटक पहुंचे, जो कोविड-19 महामारी से पहले वर्ष 2019 के मुकाबले लगभग 10 प्रतिशत कम है। उन्होंने दावा किया कि भारत के कई प्रतिस्पर्धी देश महामारी से पहले के स्तर को पार कर चुके हैं और तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। एक विदेशी पर्यटक से मिलता है ज्यादा आर्थिक लाभ कांत के अनुसार एक विदेशी पर्यटक भारत की जीडीपी में औसतन 3,000 डॉलर (करीब 2.87 लाख रुपये) का योगदान देता है, जबकि एक घरेलू पर्यटक का योगदान केवल 75 डॉलर (करीब 7,000 रुपये) के आसपास होता है। उन्होंने कहा कि यदि भारत विदेशी पर्यटन प्रचार पर 200 मिलियन डॉलर का निवेश करे, तो लगभग 10 लाख अतिरिक्त विदेशी पर्यटकों को आकर्षित किया जा सकता है। इससे— 3.6 अरब डॉलर की आर्थिक गतिविधि उत्पन्न होगी। लगभग 400 मिलियन डॉलर का GST संग्रह होगा। करीब 2.83 लाख नए रोजगार पैदा होंगे। अमिताभ कांत के मुताबिक मार्केटिंग पर खर्च किए गए प्रत्येक डॉलर पर लगभग 18 गुना रिटर्न प्राप्त हो सकता है। दूसरे देशों के उदाहरण भी दिए अपने लेख में उन्होंने कई देशों के उदाहरण देते हुए बताया कि पर्यटन प्रचार में निवेश बढ़ाने से वहां विदेशी पर्यटकों की संख्या और राजस्व दोनों में तेजी आई। मलेशिया मार्केटिंग बजट: 7 करोड़ डॉलर विदेशी पर्यटक: 31% वृद्धि के साथ 2.73 करोड़ राजस्व: 22 अरब डॉलर थाईलैंड मार्केटिंग बजट: 12 करोड़ डॉलर विदेशी पर्यटक: 26% वृद्धि के साथ 3.55 करोड़ राजस्व: 48 अरब डॉलर ब्राजील मार्केटिंग खर्च: 9 करोड़ डॉलर विदेशी पर्यटकों में 22% की वृद्धि सऊदी अरब लगभग 3 करोड़ अतिरिक्त पर्यटक 41 अरब डॉलर का राजस्व अमेरिका Brand USA अभियान के तहत 24 करोड़ डॉलर का निवेश हर एक डॉलर पर लगभग 25 डॉलर का रिटर्न डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भारत की मौजूदगी कमजोर अमिताभ कांत ने कहा कि आज वैश्विक पर्यटन उद्योग सोशल मीडिया, यूट्यूब और डिजिटल कंटेंट पर आधारित हो चुका है, लेकिन भारत इस क्षेत्र में अपेक्षाकृत कमजोर दिखाई देता है। उन्होंने बताया कि "Incredible India" के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फॉलोअर्स तो हैं, लेकिन एंगेजमेंट काफी कम है। इसके मुकाबले कई अन्य देश डिजिटल प्रचार के जरिए करोड़ों लोगों तक अपनी पहुंच बना रहे हैं। क्या दिए सुझाव? अमिताभ कांत ने पर्यटन क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए कई सुझाव दिए— होटल, रेस्टोरेंट और ट्रांसपोर्ट व्यवसाय के लिए नियमों को सरल बनाया जाए। मल्टीपल लाइसेंस व्यवस्था की जगह यूनिफाइड लाइसेंस सिस्टम लागू किया जाए। ऑटोमैटिक रिन्यूअल व्यवस्था शुरू की जाए। ट्रैवल कंटेंट क्रिएटर्स और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को रणनीतिक साझेदार माना जाए। उनका मानना है कि किसी वास्तविक यात्री का अनुभव साझा करने वाला वीडियो, पारंपरिक सरकारी विज्ञापनों की तुलना में अधिक प्रभावी साबित होता है।
देश की दो बड़ी सरकारी कंपनियां भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL) और स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) अपने प्रतिष्ठित महारत्न (Maharatna) दर्जे को बचाने की चुनौती का सामना कर रही हैं। केंद्र सरकार ने दोनों कंपनियों को वित्तीय प्रदर्शन सुधारने के लिए एक साल का समय दिया है। यदि इस अवधि में स्थिति नहीं सुधरी, तो इनका दर्जा घटाकर नवरत्न (Navratna) किया जा सकता है। क्यों मंडरा रहा है खतरा? सरकारी मूल्यांकन के अनुसार, BHEL और SAIL पिछले तीन वर्षों में औसतन 5,000 करोड़ रुपये से अधिक का वार्षिक शुद्ध लाभ (PAT) अर्जित करने की अनिवार्य शर्त पूरी नहीं कर पाईं। यही वजह है कि दोनों कंपनियां महारत्न की पात्रता के सबसे अहम मानदंड पर पिछड़ गई हैं। यह पहली बार है जब किसी महारत्न कंपनी को दर्जा घटाने की चेतावनी दी गई है। महारत्न दर्जे के लिए क्या हैं शर्तें? महारत्न का दर्जा बनाए रखने के लिए कंपनियों को पिछले तीन वर्षों के औसत आधार पर कुछ प्रमुख मानदंड पूरे करने होते हैं— वार्षिक टर्नओवर 25,000 करोड़ रुपये से अधिक हो। कुल संपत्ति (Net Worth) 15,000 करोड़ रुपये से ज्यादा हो। औसत वार्षिक शुद्ध लाभ (PAT) 5,000 करोड़ रुपये से अधिक हो। कंपनी की वैश्विक उपस्थिति या अंतरराष्ट्रीय कारोबार मजबूत हो। देश की 14 महारत्न कंपनियों में केवल BHEL और SAIL ही लाभ संबंधी मानदंड पूरा नहीं कर सकीं। दर्जा घटने से क्या होगा असर? अगर दोनों कंपनियों का दर्जा महारत्न से घटाकर नवरत्न कर दिया जाता है, तो उनकी वित्तीय स्वायत्तता प्रभावित होगी। महारत्न कंपनियां सरकार की मंजूरी के बिना 5,000 करोड़ रुपये तक का निवेश कर सकती हैं। नवरत्न कंपनियां केवल 1,000 करोड़ रुपये तक का निवेश स्वतंत्र रूप से कर सकती हैं। इससे बड़े निवेश और विस्तार योजनाओं पर असर पड़ सकता है। सरकार ने नियम भी किए सख्त वित्त वर्ष 2026-27 से सरकारी कंपनियों के लिए प्रदर्शन मानकों को और कड़ा किया जा रहा है। अब— CSR दायित्वों में चूक, MSME भुगतान में देरी, उत्तराधिकार (Succession Planning) की कमी जैसे मामलों में अंक काटे जाएंगे और कंपनियों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ेगा। सुधार के लिए क्या हो रही है तैयारी? SAIL के लिए इस्पात मंत्रालय के अनुसार, कंपनी का औसत टर्नओवर पिछले चार वर्षों में एक लाख करोड़ रुपये से अधिक रहा है और नेटवर्थ भी मजबूत है। हालांकि, स्टील की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण मुनाफे पर असर पड़ा है। BHEL के लिए नीति आयोग ने BHEL की मानव संसाधन (HR) नीतियों को कंपनी की प्रगति में प्रमुख बाधा बताया है। भारी उद्योग मंत्रालय ने कहा है कि कंपनी के लिए नई सुधार योजना तैयार की जा रही है और प्रदर्शन में सुधार के संकेत मिलने लगे हैं। 'महारत्न' मानदंडों की भी होगी समीक्षा नीति आयोग का मानना है कि महारत्न के लिए निर्धारित मानदंड वर्ष 2010 से नहीं बदले गए हैं, जबकि अर्थव्यवस्था का आकार और कारोबारी परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं। इसलिए सरकार इन मानकों की दोबारा समीक्षा करने पर भी विचार कर रही है।
टाटा समूह से जुड़ा एक नया विवाद सामने आया है, जो करीब 37 साल पुराने शेयर ट्रांसफर से संबंधित है। इस मामले में टाटा ट्रस्ट्स ने याचिकाकर्ता सुरेश तुलसीराम पाटिलखेड़े और उनकी वकील कात्यायनी अग्रवाल के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए कानूनी नोटिस भेजा है। ट्रस्ट्स ने दोनों से लगाए गए आरोप वापस लेने को कहा है, अन्यथा 1000 करोड़ रुपये के हर्जाने की मांग की जाएगी। क्या है पूरा मामला? विवाद जनवरी 1989 में नवजबाई रतन टाटा ट्रस्ट (NRTT) से दिवंगत नवल एच. टाटा को ट्रांसफर किए गए 833 शेयरों से जुड़ा है। वर्तमान में ये शेयर रतन टाटा, जिमी टाटा और नोएल टाटा के परिवार से जुड़े हैं। याचिकाकर्ता सुरेश पाटिलखेड़े ने महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के समक्ष शिकायत दर्ज कर इस शेयर ट्रांसफर की जांच की मांग की थी। शिकायत में लगाए गए प्रमुख आरोप शेयर एक सार्वजनिक चैरिटेबल ट्रस्ट से निजी व्यक्ति को ट्रांसफर किए गए। ट्रांसफर के लिए कोई वैध प्रस्ताव या ट्रांसफर डीड नहीं थी। यह सौदा बिना किसी भुगतान (Nil Consideration) के किया गया। टाटा ट्रस्ट्स ने आरोपों को बताया बेबुनियाद टाटा ट्रस्ट्स ने इन सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि नवल टाटा ने ट्रांसफर से लगभग एक वर्ष पहले ट्रस्ट से इस्तीफा दे दिया था। ट्रस्ट्स के मुताबिक— इस लेन-देन को दोनों संस्थाओं के बोर्ड की मंजूरी प्राप्त थी। शेयरों के बदले उचित भुगतान किया गया था। पूरी प्रक्रिया की कानूनी समीक्षा देश के प्रसिद्ध न्यायविद नानी पालखीवाला ने की थी। पहले भी लगा था बैठकों पर प्रतिबंध इसी याचिका के आधार पर महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर ने 15 मई को टाटा ट्रस्ट्स की बैठकों और महत्वपूर्ण फैसलों पर अस्थायी रोक लगाई थी। जांच पूरी होने तक ट्रस्ट्स की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही थी। अब ट्रस्टियों की अगली बैठक 8 जून को प्रस्तावित है। 'सीरियल लिटिगेटर' बताया टाटा ट्रस्ट्स ने अपने बयान में सुरेश पाटिलखेड़े को "सीरियल लिटिगेटर" यानी आदतन मुकदमेबाज बताया है। ट्रस्ट का आरोप है कि इन दावों का उद्देश्य टाटा परिवार और ट्रस्ट्स की 130 वर्ष पुरानी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना है। क्यों अहम है यह विवाद? टाटा ट्रस्ट्स देश के सबसे बड़े परोपकारी संगठनों में से एक हैं और टाटा समूह की कई कंपनियों में उनकी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। ऐसे में इस तरह के कानूनी विवाद कॉरपोरेट गवर्नेंस और ट्रस्ट प्रबंधन के दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
भारत और अमेरिका के बीच बहुप्रतीक्षित व्यापार समझौते (Trade Deal) को लेकर बातचीत निर्णायक चरण में पहुंच चुकी है। इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने प्रधानमंत्री Narendra Modi की जमकर तारीफ की है। दूसरी ओर ट्रंप प्रशासन ने भारत समेत कई देशों के उत्पादों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रस्ताव भी पेश कर दिया है, जिससे वार्ता के बीच नई चुनौती खड़ी हो गई है। ट्रंप बोले- मोदी मेरे अच्छे मित्र हैं व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी उनके अच्छे मित्र हैं और दोनों देशों के संबंध मजबूत बने हुए हैं। उन्होंने कहा, “मुझे आपके प्रधानमंत्री बहुत पसंद हैं। वह मेरे अच्छे दोस्त हैं और हमारे रिश्ते बेहद अच्छे हैं।” ट्रंप ने यह भी दावा किया कि पहले भारत को अमेरिका के साथ व्यापार में अधिक लाभ मिलता था, लेकिन अब परिस्थितियां बदल रही हैं और अमेरिका को भी बेहतर आर्थिक फायदा मिलने लगा है। नई दिल्ली में चार दिन चली अहम व्यापार वार्ता 1 जून से 4 जून तक नई दिल्ली में भारत और अमेरिका के अधिकारियों के बीच विस्तृत व्यापार वार्ता हुई। इस दौरान दोनों पक्षों ने कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की। वार्ता में मुख्य रूप से निम्न मुद्दे शामिल रहे: वस्तुओं का व्यापार सीमा शुल्क प्रक्रियाएं व्यापार सुगमता गैर-टैरिफ बाधाएं आर्थिक एवं रणनीतिक सहयोग दोनों देशों ने बातचीत को सकारात्मक बताया और कहा कि अंतरिम व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की दिशा में तेजी से काम जारी है। समझौता अंतिम चरण में पहुंचा भारत में अमेरिका के राजदूत Sergio Gor ने हाल ही में संकेत दिया कि अधिकांश मुद्दों पर सहमति बन चुकी है और वार्ता अब अंतिम चरण में है। वहीं केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री Piyush Goyal भी कह चुके हैं कि अधिकांश मतभेद दूर हो चुके हैं और केवल कुछ तकनीकी बिंदुओं पर चर्चा जारी है। नई टैरिफ नीति ने बढ़ाई अनिश्चितता ट्रेड डील में प्रगति के बावजूद ट्रंप प्रशासन ने एक नया प्रस्ताव पेश किया है, जिसने कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिका ने संकेत दिया है कि कुछ देशों से आने वाले आयातित उत्पादों पर 10 प्रतिशत से 12.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लगाया जा सकता है। अमेरिकी प्रशासन का दावा है कि इन देशों से आयात होने वाले कुछ उत्पाद कथित तौर पर जबरन श्रम (Forced Labour) से तैयार किए गए हो सकते हैं। भारत समेत 54 अर्थव्यवस्थाओं पर उठाए सवाल अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) ने 54 देशों और अर्थव्यवस्थाओं की सूची जारी की है, जिन पर पर्याप्त आयात निगरानी न होने का आरोप लगाया गया है। इस सूची में भारत के अलावा कई प्रमुख देश शामिल हैं: China Japan Australia United Kingdom Saudi Arabia United Arab Emirates Singapore South Korea Türkiye यूएसटीआर के अनुसार जिन देशों के पास जबरन श्रम से बने उत्पादों पर प्रभावी नियंत्रण व्यवस्था नहीं है, उन्हें अधिक शुल्क का सामना करना पड़ सकता है। कपड़ा और परिधान क्षेत्र पर विशेष फोकस प्रस्तावित नीति में वस्त्र और परिधान उद्योग के लिए विशेष प्रावधान भी शामिल हैं। कुछ देशों को सीमित मात्रा में कम शुल्क पर अमेरिकी बाजार तक पहुंच दी जा सकती है, जबकि अन्य उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लागू रहेगा। भारत-अमेरिका रिश्तों में अवसर और चुनौती दोनों विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा दौर में भारत और अमेरिका दोनों व्यापक व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के करीब हैं। लेकिन टैरिफ और श्रम मानकों से जुड़े नए अमेरिकी प्रस्ताव वार्ता को जटिल बना सकते हैं। एक तरफ ट्रंप प्रधानमंत्री मोदी की खुलकर प्रशंसा कर रहे हैं और समझौते को लेकर आशावाद जता रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ अतिरिक्त शुल्क की चेतावनी देकर दबाव की रणनीति भी अपना रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में होने वाली बातचीत यह तय करेगी कि दोनों देश व्यापारिक साझेदारी को नई ऊंचाई तक ले जाते हैं या कुछ मुद्दे अब भी अड़चन बने रहते हैं।
वैश्विक बाजारों में कमजोर संकेतों और पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारतीय शेयर बाजार ने गुरुवार को भारी गिरावट के साथ शुरुआत की। हालांकि कारोबार आगे बढ़ने के साथ बाजार ने कुछ हद तक रिकवरी दिखाई और शुरुआती नुकसान की भरपाई करने की कोशिश की। शुरुआत में 500 अंकों से ज्यादा टूटा सेंसेक्स कारोबार की शुरुआत में बीएसई सेंसेक्स 500 अंकों से अधिक लुढ़क गया, जबकि एनएसई निफ्टी 50 भी महत्वपूर्ण स्तर से नीचे फिसल गया। सुबह करीब 9:20 बजे सेंसेक्स 284.51 अंक यानी 0.38 प्रतिशत की गिरावट के साथ 74,061.66 अंक पर कारोबार कर रहा था। वहीं निफ्टी 67.25 अंक यानी 0.29 प्रतिशत टूटकर 23,338.35 अंक पर पहुंच गया। हालांकि दिन चढ़ने के साथ खरीदारी लौटने लगी और बाजार में सुधार देखने को मिला। बाद में सेंसेक्स करीब 100 अंकों की बढ़त के साथ कारोबार करता दिखाई दिया। इन शेयरों में दिखी मजबूती शुरुआती कमजोरी के बावजूद कुछ प्रमुख शेयरों में अच्छी खरीदारी देखने को मिली। इनमें शामिल रहे— इटरनल टाइटन अडानी पोर्ट्स एशियन पेंट्स टेक महिंद्रा भारत इलेक्ट्रॉनिक्स टीसीएस एनटीपीसी हिंदुस्तान यूनिलीवर इन शेयरों में आई मजबूती ने बाजार को संभालने में अहम भूमिका निभाई। इन दिग्गज शेयरों पर रहा दबाव सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 18 शेयर गिरावट के साथ खुले। सबसे ज्यादा दबाव ट्रेंट पर देखने को मिला। गिरावट वाले प्रमुख शेयरों में शामिल रहे— ट्रेंट इन्फोसिस एचडीएफसी बैंक बजाज फिनसर्व इंडिगो सन फार्मा कोटक महिंद्रा बैंक एचसीएल टेक व्यापक बाजार का हाल मुख्य सूचकांकों के साथ-साथ व्यापक बाजार में भी कमजोरी दर्ज की गई। निफ्टी मिडकैप सूचकांक में 0.22 प्रतिशत की गिरावट निफ्टी स्मॉलकैप सूचकांक में 0.15 प्रतिशत की गिरावट सेक्टोरल सूचकांकों में सूचना प्रौद्योगिकी, रियल्टी और निजी बैंकिंग शेयरों में सबसे अधिक दबाव देखा गया। वहीं दूसरी ओर— उपभोक्ता टिकाऊ वस्तु क्षेत्र तेल एवं गैस क्षेत्र रसायन क्षेत्र में सकारात्मक कारोबार देखने को मिला। रुपये में हल्की मजबूती इस बीच भारतीय मुद्रा में भी मामूली सुधार देखने को मिला। रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 7 पैसे मजबूत होकर 95.69 के स्तर पर खुला। बाजार में गिरावट की वजह क्या रही? विश्लेषकों के अनुसार बाजार पर सबसे बड़ा दबाव पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का रहा। क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों और भू-राजनीतिक अनिश्चितता ने वैश्विक निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। ऐसे माहौल में निवेशक जोखिम वाले निवेश से दूरी बनाते हैं, जिसका असर शेयर बाजारों पर दिखाई देता है। इसके अलावा निवेशकों की नजर भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक के नतीजों पर भी टिकी हुई है। ब्याज दरों और आर्थिक वृद्धि को लेकर आने वाले फैसले बाजार की अगली दिशा तय कर सकते हैं। निवेशकों के लिए क्या संकेत? विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा समय में वैश्विक घटनाक्रम बाजार की चाल को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे में निवेशकों को अल्पकालिक उतार-चढ़ाव से घबराने के बजाय मजबूत कंपनियों और दीर्घकालिक निवेश रणनीति पर ध्यान देना चाहिए।
राजेश एक्सपोर्ट्स पर सेबी की बड़ी कार्रवाई, रेवेन्यू बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के आरोप के बाद शेयर में लगा लोअर सर्किट सोने की रिफाइनिंग और आभूषण निर्माण क्षेत्र की प्रमुख कंपनी Rajesh Exports को बड़ा झटका लगा है। बाजार नियामक Securities and Exchange Board of India (सेबी) ने कंपनी और इसके प्रमोटर Rajesh Mehta के खिलाफ अंतरिम आदेश जारी करते हुए गंभीर वित्तीय अनियमितताओं की ओर संकेत किया है। सेबी की कार्रवाई के बाद गुरुवार को कंपनी के शेयरों में भारी बिकवाली देखने को मिली और बाजार खुलते ही शेयर लोअर सर्किट पर पहुंच गया। शेयर में 5 प्रतिशत की गिरावट बीएसई पर राजेश एक्सपोर्ट्स का शेयर पिछले कारोबारी सत्र में 110.15 रुपये पर बंद हुआ था। सेबी के आदेश के बाद शेयर करीब 5 प्रतिशत गिरकर 104.65 रुपये पर खुला और लोअर सर्किट में फंस गया। कंपनी के शेयर का 52 सप्ताह का उच्चतम स्तर 239 रुपये और न्यूनतम स्तर 80.11 रुपये रहा है। सेबी की जांच में क्या सामने आया? सेबी द्वारा 3 जून को जारी अंतरिम आदेश के अनुसार, जांच और फोरेंसिक ऑडिट के दौरान कई गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के संकेत मिले हैं। नियामक का आरोप है कि कंपनी ने अपने राजस्व (रेवेन्यू) को लगभग 97 से 99 प्रतिशत तक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया। सेबी ने इस मामले को अत्यंत गंभीर और असाधारण प्रकृति का बताया है। जांच एजेंसी का कहना है कि कंपनी ने जांच के दौरान अपेक्षित सहयोग भी नहीं किया और कई महत्वपूर्ण जानकारियां समय पर उपलब्ध नहीं कराईं। शिकायत के बाद शुरू हुई जांच मार्च 2024 में सेबी को कंपनी के खातों में दिखाए गए बड़े पैमाने के ट्रेड रिसीवेबल्स को लेकर शिकायत प्राप्त हुई थी। इसके बाद नियामक ने अप्रैल 2020 से मार्च 2024 तक की अवधि की विस्तृत जांच शुरू की। मामले की गहराई से जांच के लिए फोरेंसिक ऑडिट भी कराया गया, जिसमें वित्तीय रिकॉर्ड और संबंधित पक्षों के साथ हुए लेन-देन की समीक्षा की गई। प्रमोटर पर लगा बाजार में कारोबार करने पर प्रतिबंध सेबी ने अपने अंतरिम आदेश में राजेश मेहता को अगले आदेश तक कंपनी के शेयरों में किसी भी प्रकार का लेन-देन करने से रोक दिया है। इसका मतलब है कि वे फिलहाल कंपनी के शेयर खरीद, बेच या ट्रांसफर नहीं कर सकेंगे। इसके अलावा कंपनी को 30 दिनों के भीतर जांच से संबंधित सभी आवश्यक दस्तावेज और जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया है। विदेशी सहायक कंपनियों की भी हुई जांच सेबी ने केवल भारत में कंपनी के वित्तीय रिकॉर्ड की जांच नहीं की, बल्कि सिंगापुर और स्विट्जरलैंड स्थित राजेश एक्सपोर्ट्स की सहायक कंपनियों की वित्तीय रिपोर्टिंग की भी समीक्षा की है। कंपनी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सोने के उत्पादों की बिक्री करती है और "शुभ जूलर्स" ब्रांड के तहत आभूषण स्टोर भी संचालित करती है। निवेशकों के लिए क्या है संकेत? विशेषज्ञों का मानना है कि नियामकीय जांच और वित्तीय अनियमितताओं के आरोप किसी भी सूचीबद्ध कंपनी के लिए गंभीर मामला होते हैं। ऐसे मामलों में निवेशकों को आधिकारिक सूचनाओं और नियामक संस्थाओं के अपडेट पर नजर बनाए रखनी चाहिए।
नई दिल्ली, एजेंसियां। देश के सर्राफा बाजार में गुरुवार को सोने और चांदी दोनों की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। पिछले कुछ दिनों से रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंची कीमती धातुओं की कीमतों में आई नरमी से निवेशकों और ग्राहकों को राहत मिली है। हालांकि वायदा बाजार में हल्की रिकवरी देखने को मिली, लेकिन खुदरा बाजार में सोना और चांदी अब भी अपने हालिया उच्च स्तर से नीचे कारोबार कर रहे हैं। 24 और 22 कैरेट सोने के भाव में कमी आज 24 कैरेट सोने की कीमत विभिन्न शहरों में लगभग 1.56 लाख रुपये से 1.61 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के बीच रही। राजधानी दिल्ली में 24 कैरेट सोने का भाव 1,59,530 रुपये प्रति 10 ग्राम दर्ज किया गया, जबकि 22 कैरेट सोना 1,46,230 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बिक रहा है। मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु और हैदराबाद में 24 कैरेट सोने का भाव 1,59,380 रुपये प्रति 10 ग्राम रहा, जबकि 22 कैरेट सोना 1,46,100 रुपये प्रति 10 ग्राम पर कारोबार कर रहा है। चेन्नई में सोने की कीमत सबसे अधिक रही, जहां 24 कैरेट सोना 1,61,240 रुपये और 22 कैरेट सोना 1,47,800 रुपये प्रति 10 ग्राम दर्ज किया गया। क्यों गिरे सोने के दाम? विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक आर्थिक बाजारों में अनिश्चितता पैदा की है। हालांकि सामान्य तौर पर भू-राजनीतिक संकट के दौरान सोने को सुरक्षित निवेश माना जाता है, लेकिन इस बार निवेशकों को आशंका है कि बढ़ते तनाव से महंगाई बढ़ सकती है। यदि महंगाई बढ़ती है तो अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा रख सकता है। ऊंची ब्याज दरों के कारण निवेशक बॉन्ड और अन्य ब्याज देने वाले निवेश विकल्पों की ओर रुख करते हैं, जिससे सोने की मांग कमजोर पड़ती है और कीमतों पर दबाव बनता है। चांदी में भी बड़ी गिरावट सोने के साथ-साथ चांदी की कीमतों में भी गिरावट दर्ज की गई है। बुधवार को चांदी के भाव में 3,000 से 4,500 रुपये प्रति किलोग्राम तक की कमी आई थी। हालांकि गुरुवार सुबह मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) में चांदी के वायदा कारोबार में हल्की रिकवरी देखने को मिली। दिल्ली में 999 शुद्धता वाली चांदी का भाव 2,96,900 रुपये प्रति किलोग्राम रहा, जबकि मुंबई में यह 2,95,900 रुपये प्रति किलो दर्ज किया गया। चेन्नई और हैदराबाद में चांदी के दाम अपेक्षाकृत अधिक रहे, जहां कीमतें 3.03 लाख रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास बनी हुई हैं। खरीदारों के लिए अवसर विश्लेषकों का मानना है कि कीमतों में आई यह नरमी आभूषण खरीदने वालों और दीर्घकालिक निवेशकों के लिए अच्छा अवसर हो सकती है। हालांकि वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए आने वाले दिनों में सोने और चांदी के भाव में उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना बनी हुई है।
जापान के कॉर्पोरेट जगत में एक ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला है। दुनिया की सबसे बड़ी ऑटोमोबाइल निर्माता कंपनियों में शामिल Toyota Motor Corporation अब जापान की सबसे वैल्यूएबल कंपनी नहीं रही। करीब 26 वर्षों बाद कंपनी को मार्केट कैपिटलाइजेशन के मामले में शीर्ष स्थान गंवाना पड़ा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सेक्टर में निवेशकों की बढ़ती दिलचस्पी के चलते SoftBank Group और KIOXIA Holdings Corporation ने टोयोटा को पीछे छोड़ दिया है। सॉफ्टबैंक बनी जापान की सबसे वैल्यूएबल कंपनी सोमवार के कारोबार में सॉफ्टबैंक ग्रुप के शेयरों में करीब 14 प्रतिशत की तेज उछाल देखने को मिली। इस तेजी के साथ कंपनी का मार्केट कैप लगभग 304 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जिससे वह जापान की सबसे मूल्यवान कंपनी बन गई। सॉफ्टबैंक के चेयरमैन Masayoshi Son लगातार AI और नई तकनीकों में बड़े निवेश कर रहे हैं। कंपनी का जुड़ाव OpenAI और SB Energy जैसी परियोजनाओं से भी है, जिसने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है। इस साल सॉफ्टबैंक के शेयरों में 80 प्रतिशत से अधिक की बढ़त दर्ज की गई है। KIOXIA ने भी टोयोटा को छोड़ा पीछे सिर्फ सॉफ्टबैंक ही नहीं, बल्कि KIOXIA Holdings के शेयरों में भी लगभग 11 प्रतिशत की तेजी देखने को मिली। इस उछाल के बाद KIOXIA का मार्केट कैप करीब 249.82 अरब डॉलर पहुंच गया, जो टोयोटा के 247.56 अरब डॉलर के मार्केट कैप से अधिक है। इस तरह जापान की दो तकनीकी कंपनियां मार्केट वैल्यू के मामले में टोयोटा से आगे निकल गई हैं। क्यों पिछड़ रही है टोयोटा? हालांकि टोयोटा आज भी दुनिया की सबसे बड़ी वाहन निर्माता कंपनियों में शामिल है, लेकिन निवेशकों की प्राथमिकताएं तेजी से बदल रही हैं। मुख्य कारण: AI और सेमीकंडक्टर कंपनियों में बढ़ता निवेश टेक्नोलॉजी सेक्टर में तेज ग्रोथ की उम्मीद चीनी इलेक्ट्रिक वाहन कंपनियों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा ऑटोमोबाइल सेक्टर में अपेक्षाकृत धीमी वृद्धि वहीं इस साल टोयोटा के शेयरों में लगभग 10 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। निवेशकों का झुकाव अब AI की ओर वैश्विक बाजारों में इस समय AI सबसे बड़ा निवेश विषय बना हुआ है। अमेरिका, जापान और चीन समेत दुनिया भर के निवेशक उन कंपनियों में पैसा लगा रहे हैं जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा सेंटर, चिप निर्माण और क्लाउड टेक्नोलॉजी से जुड़ी हैं। इसी वजह से सॉफ्टबैंक जैसी कंपनियों को जबरदस्त फायदा मिल रहा है, जबकि पारंपरिक उद्योगों की कंपनियां निवेशकों का उतना ध्यान आकर्षित नहीं कर पा रही हैं। दुनिया की वैल्यूएबल कंपनियों में जापान की स्थिति मार्केट कैप के आधार पर वैश्विक रैंकिंग में सॉफ्टबैंक अब दुनिया की 48वीं सबसे मूल्यवान कंपनी बन गई है। हालिया तेजी के बाद उसकी रैंकिंग में 13 स्थानों का सुधार हुआ है। दूसरी ओर टोयोटा 70वें स्थान पर खिसक गई है। वैश्विक स्तर पर: टॉप 10 में 8 कंपनियां अमेरिका की हैं। टॉप 100 में चीन की 11 कंपनियां शामिल हैं। जापान की 4 कंपनियों को जगह मिली है। भारत की कोई भी कंपनी अभी टॉप 100 वैल्यूएबल कंपनियों की सूची में शामिल नहीं है। क्या संकेत देता है यह बदलाव? टोयोटा का शीर्ष स्थान गंवाना केवल एक कंपनी की रैंकिंग बदलने की कहानी नहीं है, बल्कि यह वैश्विक निवेश ट्रेंड में आए बड़े बदलाव का संकेत भी है। निवेशक अब पारंपरिक ऑटोमोबाइल उद्योग से ज्यादा AI, सेमीकंडक्टर और उभरती तकनीकों पर दांव लगा रहे हैं। यदि यही रुझान जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों की सूची में तकनीकी कंपनियों का दबदबा और बढ़ सकता है।
भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित अंतरिम व्यापार समझौते (Interim Trade Agreement) को अंतिम रूप देने की दिशा में सोमवार से चार दिवसीय उच्चस्तरीय वार्ता शुरू हो रही है। दोनों देशों के मुख्य व्यापार वार्ताकार समझौते के कानूनी मसौदे और विभिन्न व्यापारिक मुद्दों पर विस्तृत चर्चा करेंगे। भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व वाणिज्य विभाग में अतिरिक्त सचिव दर्पण जैन करेंगे, जबकि अमेरिकी पक्ष का नेतृत्व अमेरिका के मुख्य व्यापार वार्ताकार ब्रेंडन लिंच के हाथों में होगा। यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब दोनों देश व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते (Bilateral Trade Agreement-BTA) की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। फरवरी में बनी थी प्रारंभिक सहमति भारत और अमेरिका ने 7 फरवरी को जारी संयुक्त बयान में पारस्परिक रूप से लाभकारी अंतरिम व्यापार समझौते की रूपरेखा पर सहमति जताई थी। इसके तहत दोनों देशों ने व्यापार बाधाओं को कम करने, निवेश बढ़ाने और आर्थिक सहयोग को मजबूत करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की थी। अब दोनों पक्षों के सामने इस समझौते के कानूनी मसौदे को अंतिम रूप देने की चुनौती है, ताकि इसे औपचारिक रूप से लागू किया जा सके। कई अहम मुद्दों पर होगी चर्चा वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, बैठक के दौरान बाजार पहुंच (Market Access), गैर-शुल्कीय बाधाएं (Non-Tariff Measures), सीमा शुल्क प्रक्रियाएं, व्यापार सुविधा, निवेश प्रोत्साहन और आर्थिक सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया जाएगा। इसके अलावा व्यापक भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के अगले चरणों पर भी चर्चा होने की संभावना है। शुल्क कटौती पर रहेगा फोकस प्रस्तावित रूपरेखा के तहत अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर लगाए गए कुछ शुल्कों में राहत देने की सहमति जताई थी। समझौते के अनुसार, भारत पर लागू कुछ आयात शुल्कों को कम करने और व्यापारिक प्रतिबंधों में ढील देने पर बातचीत आगे बढ़नी थी। बाद में अमेरिका में न्यायिक और नीतिगत बदलावों के कारण वार्ता की समय-सीमा प्रभावित हुई। फरवरी में प्रस्तावित बैठक स्थगित कर दी गई थी, जिसके बाद अब दोनों पक्ष एक बार फिर बातचीत की मेज पर आमने-सामने होंगे। व्यापक व्यापार समझौते की दिशा में अहम कदम विशेषज्ञों का मानना है कि यह चार दिवसीय वार्ता केवल अंतरिम समझौते तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य के व्यापक भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की नींव भी मजबूत कर सकती है। दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच बढ़ता व्यापारिक सहयोग वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, निवेश और रणनीतिक साझेदारी को नई दिशा दे सकता है। भारत-ओमान एफटीए का भी होगा औपचारिक एलान उधर, भारत और ओमान के बीच मुक्त व्यापार समझौता (FTA) सोमवार से प्रभावी होने जा रहा है। दोनों देश इस संबंध में औपचारिक घोषणा करेंगे। माना जा रहा है कि इससे खाड़ी क्षेत्र में भारत के व्यापारिक और आर्थिक संबंधों को नई मजबूती मिलेगी।
जून महीने की शुरुआत के साथ ही होटल, रेस्तरां, कैटरिंग और छोटे कारोबारियों को महंगाई का एक और झटका लगा है। तेल विपणन कंपनियों ने 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल LPG सिलेंडर की कीमतों में बढ़ोतरी कर दी है। नई दरें 1 जून से लागू हो गई हैं। राजधानी दिल्ली में 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल LPG सिलेंडर की कीमत में 42 रुपये की वृद्धि की गई है, जिसके बाद इसकी कीमत बढ़कर 3,113.50 रुपये हो गई है। वहीं कोलकाता में सिलेंडर 53.50 रुपये महंगा होकर 3,255.50 रुपये का हो गया है। इसके अलावा 5 किलोग्राम वाले फ्री ट्रेड LPG (FTL) सिलेंडर की कीमत में भी 11 रुपये की बढ़ोतरी की गई है। दिल्ली में इसकी नई कीमत 821.50 रुपये तय की गई है। प्रमुख शहरों में नई कीमतें देश के अन्य बड़े शहरों में भी कमर्शियल गैस सिलेंडर के दाम बढ़ाए गए हैं। शहर नई कीमत (19 किग्रा कमर्शियल LPG) दिल्ली ₹3,113.50 मुंबई ₹3,067.50 कोलकाता ₹3,255.50 चेन्नई ₹3,283.00 लखनऊ ₹3,236.00 जयपुर ₹3,155.00 घरेलू उपभोक्ताओं को राहत आम घरेलू उपभोक्ताओं के लिए राहत की खबर है। 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू LPG सिलेंडर की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। दिल्ली में घरेलू गैस सिलेंडर फिलहाल 913 रुपये में उपलब्ध रहेगा। कारोबारियों पर बढ़ेगा दबाव कमर्शियल LPG की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी का सीधा असर होटल, ढाबा, रेस्तरां और कैटरिंग उद्योग पर पड़ सकता है। कारोबारी संगठनों का कहना है कि परिचालन लागत बढ़ने से खाने-पीने की वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में भी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। क्या है कीमत बढ़ने की वजह? विशेषज्ञों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा कीमतों में तेजी और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव इसका प्रमुख कारण है। ईरान और खाड़ी क्षेत्र से जुड़े घटनाक्रमों के चलते वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिससे LPG की अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर दबाव बढ़ा है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में वैश्विक बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव का असर घरेलू LPG कीमतों पर भी दिखाई देता है। कमर्शियल गैस सिलेंडर की कीमतों में ताजा बढ़ोतरी से छोटे और मध्यम कारोबारियों की लागत बढ़ने की आशंका है, जबकि घरेलू उपभोक्ताओं को फिलहाल राहत बरकरार रखी गई है।
सोना और चांदी खरीदने की योजना बना रहे लोगों के लिए अहम अपडेट है। 30 मई 2026 को सर्राफा बाजार में दोनों कीमती धातुओं की कीमतों में मजबूती देखने को मिली। जहां चांदी में एक ही दिन में ₹5,000 प्रति किलोग्राम की बड़ी तेजी दर्ज की गई, वहीं सोना भी ₹1,600 प्रति 10 ग्राम तक मजबूत हुआ। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक आर्थिक संकेतों, अमेरिका-ईरान के बीच संभावित समझौते, महंगाई के आंकड़ों और घरेलू शादी-ब्याह के सीजन की मांग ने सोने और चांदी को समर्थन दिया है। दिल्ली सर्राफा बाजार में क्या रहे भाव? राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के सर्राफा बाजार में शुक्रवार को: सोना: ₹1,62,000 प्रति 10 ग्राम चांदी: ₹2,74,700 प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई। आज के ताजा गोल्ड रेट गुड रिटर्न्स के अनुसार शनिवार सुबह: 24 कैरेट सोना: ₹1,57,650 प्रति 10 ग्राम 22 कैरेट सोना: ₹1,44,510 प्रति 10 ग्राम 18 कैरेट सोना: ₹1,18,240 प्रति 10 ग्राम चांदी की कीमत: ₹2,80,100 प्रति किलोग्राम पर कारोबार करती नजर आई। प्रमुख शहरों में सोने का भाव (30 मई 2026) शहर 24 कैरेट 22 कैरेट 18 कैरेट Delhi ₹1,57,190 ₹1,44,100 ₹1,17,930 Mumbai ₹1,57,040 ₹1,43,950 ₹1,17,780 Kolkata ₹1,57,640 ₹1,44,500 ₹1,18,230 Chennai ₹1,59,280 ₹1,46,000 ₹1,22,550 Lucknow ₹1,57,790 ₹1,44,650 ₹1,18,380 Kanpur ₹1,57,790 ₹1,44,650 ₹1,18,380 Patna ₹1,57,690 ₹1,44,550 ₹1,18,280 Jaipur ₹1,57,790 ₹1,44,650 ₹1,18,380 Indore ₹1,57,690 ₹1,44,550 ₹1,18,280 Bhopal ₹1,57,690 ₹1,44,550 ₹1,18,280 MCX पर कैसा रहा कारोबार? मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर कीमतों में मिला-जुला रुख देखने को मिला। सोना अगस्त डिलीवरी: ₹1,61,059 प्रति 10 ग्राम (₹146 की बढ़त) जून डिलीवरी: ₹1,56,000 (₹925 की गिरावट) अक्टूबर डिलीवरी: ₹1,64,732 (₹624 की बढ़त) चांदी जुलाई डिलीवरी: ₹2,67,000 प्रति किलोग्राम ₹2,537 की गिरावट दर्ज कीमतों में तेजी की वजह क्या है? विशेषज्ञों के अनुसार, कई कारण सोने और चांदी को समर्थन दे रहे हैं: 1. वैश्विक अनिश्चितता अमेरिका और ईरान के बीच जारी कूटनीतिक गतिविधियों पर निवेशकों की नजर बनी हुई है। ऐसे माहौल में निवेशक सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख करते हैं। 2. ब्याज दरों को लेकर उम्मीदें अमेरिकी महंगाई के ताजा आंकड़ों के बाद निवेशक Federal Reserve की भविष्य की ब्याज दर नीति का आकलन कर रहे हैं, जिसका असर सोने की कीमतों पर पड़ रहा है। 3. शादी-ब्याह की मांग भारत में शादी और मांगलिक कार्यक्रमों के सीजन के चलते ज्वेलरी की मांग बढ़ने की उम्मीद है, जिससे घरेलू बाजार में कीमतों को समर्थन मिल रहा है। 4. चांदी को औद्योगिक सपोर्ट चांदी को केवल सुरक्षित निवेश ही नहीं, बल्कि औद्योगिक मांग का भी लाभ मिल रहा है। सोलर एनर्जी, इलेक्ट्रॉनिक्स और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में इसकी खपत लगातार बढ़ रही है। आगे क्या रह सकता है रुख? कमोडिटी विशेषज्ञों का मानना है कि निकट भविष्य में सोने और चांदी पर किसी बड़े बिकवाली दबाव की संभावना फिलहाल कम दिखाई दे रही है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और घरेलू मांग दोनों कीमतों को सहारा दे रहे हैं। हालांकि निवेशकों को खरीदारी से पहले अपने स्थानीय ज्वेलर्स से ताजा रेट जरूर जांच लेना चाहिए क्योंकि शहर, टैक्स और मेकिंग चार्ज के अनुसार कीमतों में अंतर हो सकता है।
उद्योगपति Anil Ambani से जुड़े रिलायंस एडीए (ADA) समूह के मामलों में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने बड़ी कार्रवाई करते हुए पहली चार्जशीट दाखिल की है। यह चार्जशीट मुंबई की विशेष सीबीआई अदालत में पेश की गई, जिसमें कुल 16 आरोपियों को नामजद किया गया है। सीबीआई की इस कार्रवाई को रिलायंस समूह से जुड़े कथित बैंक ऋण घोटाले और सार्वजनिक धन के दुरुपयोग की जांच में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। 16 आरोपियों के खिलाफ दाखिल हुई चार्जशीट चार्जशीट में Reliance Communications Limited, कंपनी के पांच वरिष्ठ अधिकारियों और तीन बैंकों के 10 अधिकारियों को आरोपी बनाया गया है। इन अधिकारियों का संबंध State Bank of India, Bank of Maharashtra और पूर्ववर्ती Syndicate Bank से बताया गया है। आरोपियों पर आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, आपराधिक गबन और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपराध करने के आरोप लगाए गए हैं। किन बैंक ऋणों की जांच कर रही है CBI? सीबीआई की जांच मुख्य रूप से विभिन्न बैंकों द्वारा स्वीकृत बड़ी ऋण सुविधाओं के कथित दुरुपयोग से जुड़ी है। जांच में शामिल प्रमुख वित्तीय सुविधाएं: SBI द्वारा स्वीकृत 1,200 करोड़ रुपये का टर्म लोन बैंक ऑफ महाराष्ट्र द्वारा स्वीकृत 500 करोड़ रुपये की लेटर ऑफ क्रेडिट सुविधा सिंडिकेट बैंक द्वारा स्वीकृत 350 करोड़ रुपये की लेटर ऑफ क्रेडिट सुविधा जांच एजेंसी का आरोप है कि इन ऋणों और बैंकिंग सुविधाओं के उपयोग में गंभीर अनियमितताएं हुईं, जिससे बैंकों को नुकसान पहुंचा। SBI की शिकायत पर दर्ज हुआ था मामला सीबीआई ने SBI की शिकायत के आधार पर रिलायंस कम्युनिकेशंस और अनिल अंबानी के खिलाफ मामला दर्ज किया था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि कंपनी की गतिविधियों से बैंक को लगभग 2,929 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। एफआईआर के अनुसार, SBI के नेतृत्व वाले बैंक कंसोर्टियम ने रिलायंस कम्युनिकेशंस को बड़े पैमाने पर ऋण उपलब्ध कराया था। 19,694 करोड़ रुपये से अधिक की कुल देनदारी जांच दस्तावेजों के अनुसार, रिलायंस कम्युनिकेशंस पर कुल 19,694.33 करोड़ रुपये की देनदारी थी। इस कर्ज में 17 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक शामिल थे। सीबीआई यह भी जांच कर रही है कि ऋण राशि का उपयोग निर्धारित उद्देश्यों के लिए किया गया था या नहीं तथा कहीं सार्वजनिक धन का दुरुपयोग तो नहीं हुआ। आगे भी हो सकती है बड़ी कार्रवाई सीबीआई ने कहा है कि मामले की जांच अभी जारी है। एजेंसी अन्य संभावित साजिशकर्ताओं और वित्तीय लेन-देन की भी जांच कर रही है। जांच पूरी होने के बाद इस मामले में पूरक चार्जशीट दाखिल की जा सकती है। इसके अलावा रिलायंस समूह की अन्य कंपनियों से जुड़े मामलों में भी कई एफआईआर दर्ज हैं, जिनकी जांच जारी है। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रही जांच रिलायंस समूह की विभिन्न कंपनियों के खिलाफ दर्ज मामलों की जांच सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में चल रही है। सीबीआई ने रिलायंस कम्युनिकेशंस, रिलायंस होम फाइनेंस, रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस और अन्य इकाइयों से जुड़े कुल सात मामलों की जांच शुरू की है। ऐसे में पहली चार्जशीट दाखिल होने के बाद आने वाले दिनों में इस पूरे मामले में और महत्वपूर्ण कानूनी व जांच संबंधी घटनाक्रम सामने आ सकते हैं।
पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों का असर अब आम लोगों की जेब पर भी पड़ सकता है। ईंधन लागत में बढ़ोतरी के बाद वाराणसी के ट्रांसपोर्ट कारोबारियों ने माल ढुलाई दरों में वृद्धि करने का फैसला लिया है। इस निर्णय के बाद खाद्य और दैनिक उपयोग की कई वस्तुओं की कीमतों में भी इजाफा होने की आशंका जताई जा रही है। 1 जून से माल भाड़े में 20 फीसदी बढ़ोतरी ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन के पदाधिकारी रविंद्र सिंह ने बताया कि डीजल और पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के कारण माल ढुलाई की लागत लगातार बढ़ रही है। इसी मुद्दे पर ट्रांसपोर्ट कारोबारियों की बैठक बुलाई गई थी, जिसमें सर्वसम्मति से माल भाड़े में 20 प्रतिशत बढ़ोतरी का फैसला लिया गया। उन्होंने कहा कि यह नई दरें 1 जून से लागू होंगी। इसका असर देश के विभिन्न हिस्सों से वाराणसी की मंडियों तक आने वाले ट्रांसपोर्ट वाहनों पर पड़ेगा। व्यापारियों ने जताई महंगाई बढ़ने की आशंका व्यापारियों का मानना है कि माल ढुलाई खर्च बढ़ने का सीधा असर वस्तुओं की कीमतों पर पड़ेगा। उनका कहना है कि यदि परिवहन लागत बढ़ती है तो कारोबारियों को अतिरिक्त खर्च उपभोक्ताओं तक पहुंचाना पड़ सकता है। व्यापारियों के अनुसार, आने वाले दिनों में कई जरूरी वस्तुओं के दाम 5 से 10 प्रतिशत तक बढ़ सकते हैं। चीनी, दाल, तेल और सूखे मेवे हो सकते हैं महंगे व्यापारियों ने बताया कि जिन वस्तुओं की आपूर्ति दूसरे राज्यों से होती है, उन पर सबसे अधिक असर पड़ सकता है। इनमें चीनी, दाल, सरसों, खाद्य तेल, बादाम और अन्य किराना उत्पाद शामिल हैं। माल ढुलाई महंगी होने से इन वस्तुओं की खरीद लागत बढ़ेगी, जिसका असर खुदरा बाजार में भी देखने को मिल सकता है। पूर्वांचल की बड़ी मंडी है विशेश्वरगंज वाराणसी की विशेश्वरगंज मंडी पूर्वांचल की प्रमुख थोक मंडियों में गिनी जाती है। यहां देश के अलग-अलग राज्यों से बड़ी मात्रा में कृषि और खाद्य उत्पाद पहुंचते हैं। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के विभिन्न क्षेत्रों से आने वाला सामान इसी मंडी के जरिए पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई जिलों तक पहुंचता है। ऐसे में माल भाड़े में वृद्धि का प्रभाव व्यापक स्तर पर देखने को मिल सकता है। आम उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है असर विशेषज्ञों का मानना है कि परिवहन लागत बढ़ने पर सप्लाई चेन का खर्च भी बढ़ जाता है। यदि माल भाड़े में 20 प्रतिशत तक वृद्धि लागू होती है, तो आने वाले हफ्तों में रोजमर्रा की कई वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है, जिससे आम उपभोक्ताओं का मासिक बजट प्रभावित हो सकता है।
मुंबई, एजेंसियां। भारतीय शेयर बाजार ने शुक्रवार को मजबूती के साथ कारोबार की शुरुआत की। पिछले कारोबारी सत्र की गिरावट के बाद बाजार में खरीदारी लौटती दिखी और सेंसेक्स-निफ्टी दोनों हरे निशान में कारोबार करते नजर आए। शुरुआती कारोबार में बीएसई सेंसेक्स 350 अंकों से अधिक उछलकर 76 हजार के पार पहुंच गया, जबकि एनएसई निफ्टी 24 हजार के करीब कारोबार करता दिखा। सुबह 9 बजकर 27 मिनट पर सेंसेक्स 78.34 अंकों की बढ़त के साथ 75,946.14 के स्तर पर पहुंच गया। वहीं निफ्टी 10.40 अंकों की मजबूती के साथ 23,917.55 पर कारोबार करता नजर आया। शुरुआती कारोबार में बाजार में तेजी का माहौल देखने को मिला, हालांकि बाद में कुछ मुनाफावसूली भी देखने को मिली। कच्चे तेल में नरमी से मिला सहारा विशेषज्ञों के अनुसार, बाजार को सबसे बड़ा समर्थन कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट से मिला है। ब्रेंट क्रूड की कीमत 92 डॉलर प्रति बैरल से नीचे बनी हुई है, जिससे निवेशकों की धारणा मजबूत हुई है। इससे महंगाई को लेकर चिंता भी कुछ कम हुई है। आईटी और फार्मा शेयरों में जोरदार खरीदारी सेक्टोरल इंडेक्स की बात करें तो आईटी और फार्मा शेयरों में सबसे ज्यादा तेजी देखने को मिली। निफ्टी आईटी इंडेक्स दो प्रतिशत से ज्यादा चढ़ा, जबकि फार्मा और हेल्थकेयर सेक्टर भी बढ़त में रहे। पीएसयू बैंक, ऑटो, मेटल और ऑयल एंड गैस शेयरों में भी खरीदारी का माहौल बना रहा। हालांकि एफएमसीजी और मीडिया सेक्टर में हल्की गिरावट दर्ज की गई। ग्लोबल बाजारों से मिले सकारात्मक संकेत अमेरिकी और एशियाई बाजारों से मिले मजबूत संकेतों ने भी भारतीय बाजार को सपोर्ट दिया। वॉल स्ट्रीट में टेक शेयरों की तेजी का असर एशियाई बाजारों पर भी दिखाई दिया। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अगर निफ्टी 24,000 के स्तर को मजबूती से पार कर लेता है, तो आने वाले दिनों में इसमें और तेजी देखने को मिल सकती है। वहीं 23,800 का स्तर बाजार के लिए मजबूत सपोर्ट माना जा रहा है।
Crisil Report: पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अब भारतीय कंपनियों की कमाई पर भी दिखाई देने लगा है। रेटिंग एजेंसी CRISIL की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, यदि आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) में व्यवधान लंबे समय तक जारी रहता है, तो वित्त वर्ष 2026-27 में भारतीय कंपनियों के परिचालन लाभ (Operating Margin) में करीब 200 बेसिस पॉइंट यानी 2 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक, बढ़ती ईंधन लागत, महंगा परिवहन, कमजोर होता रुपया और सप्लाई चेन की समस्याएं कंपनियों की लाभप्रदता पर दबाव बढ़ा रही हैं। 34 प्रमुख सेक्टरों का किया गया अध्ययन क्रिसिल ने 34 ऐसे उद्योग क्षेत्रों का स्ट्रेस टेस्ट किया, जो उसकी रेटेड कॉर्पोरेट ऋण का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा हैं। एजेंसी ने अनुमान लगाया है कि पश्चिम एशिया में संकट की स्थिति पूरे वित्त वर्ष में करीब नौ महीने तक बनी रह सकती है। रिपोर्ट में यह भी माना गया है कि इस दौरान कच्चे तेल की औसत कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल तक रह सकती है, जो पहले के 95 डॉलर प्रति बैरल के अनुमान से काफी अधिक है। कंपनियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी लागत नियंत्रण क्रिसिल रेटिंग्स के प्रबंध निदेशक Subodh Rai के अनुसार, कंपनियों के लिए बिक्री बढ़ाने से ज्यादा मुश्किल लागत और मुनाफे को संभालना होगा। उन्होंने कहा कि जिन 34 क्षेत्रों का अध्ययन किया गया, उनमें से 22 सेक्टरों की परिचालन लाभप्रदता में 10 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आ सकती है। इसकी मुख्य वजह बढ़ती इन्वेंट्री लागत और उपभोक्ताओं पर पूरा लागत बोझ तुरंत न डाल पाना है। किन कारणों से बढ़ रहा दबाव? पश्चिम एशिया संकट के चलते कई कंपनियों को अपनी सप्लाई चेन में बदलाव करना पड़ रहा है। इसके अलावा उन्हें निम्न चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है- ईंधन और माल ढुलाई लागत में वृद्धि शिपमेंट में देरी कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव रुपये में कमजोरी वैश्विक व्यापार मार्गों में बाधाएं इन कारणों से उत्पादन लागत बढ़ रही है और कंपनियों का मार्जिन प्रभावित हो रहा है। राहत की बात: मजबूत बैलेंस शीट हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारतीय कंपनियों की वित्तीय स्थिति पहले की तुलना में काफी मजबूत है। घरेलू मांग, सरकारी पूंजीगत खर्च (Capex) और बेहतर बैलेंस शीट उन्हें इस संकट से निपटने में मदद कर सकती हैं। पिछले 10 वर्षों में भारत की कंपनियों का औसत कर्ज अनुपात (Gearing Ratio) घटकर 0.5 गुना रह गया है, जबकि ब्याज भुगतान क्षमता (Interest Coverage Ratio) दोगुनी होकर 5 गुना से अधिक हो गई है। केवल कुछ सेक्टरों की क्रेडिट गुणवत्ता पर असर क्रिसिल का अनुमान है कि मौजूदा परिस्थितियों के बावजूद अधिकांश कंपनियां अपने क्रेडिट प्रोफाइल को स्थिर बनाए रखेंगी। एजेंसी के अनुसार केवल 8 सेक्टर, जो कुल रेटेड कॉर्पोरेट ऋण का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा हैं, उनकी क्रेडिट गुणवत्ता पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। MSME क्षेत्र के लिए राहत रिपोर्ट में सरकार की नई ECLGS 5.0 (Emergency Credit Line Guarantee Scheme) की भी सराहना की गई है। क्रिसिल का मानना है कि यह योजना विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) को राहत देने में मदद करेगी, क्योंकि इस वर्ग की कंपनियों के पास बड़े कॉर्पोरेट्स की तुलना में कम वित्तीय सुरक्षा होती है। भारत इंक का आउटलुक स्थिर, लेकिन सतर्क क्रिसिल ने कहा कि पश्चिम एशिया संकट और वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत इंक की समग्र क्रेडिट गुणवत्ता फिलहाल स्थिर बनी हुई है। हालांकि कंपनियों को आने वाले महीनों में लागत प्रबंधन, आपूर्ति श्रृंखला और नकदी प्रवाह पर विशेष ध्यान देना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं और भू-राजनीतिक तनाव जारी रहता है, तो कॉर्पोरेट सेक्टर के लिए चुनौतियां और बढ़ सकती हैं।
भारतीय रुपये में हाल के महीनों में आई कमजोरी को लेकर चल रही बहस के बीच वरिष्ठ अर्थशास्त्री और पूर्व योजना आयोग उपाध्यक्ष Montek Singh Ahluwalia ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के रुख का समर्थन किया है। उनका कहना है कि रुपये की विनिमय दर को बाजार की वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार चलने देना चाहिए और हर हाल में उसे एक निश्चित स्तर पर बनाए रखने की कोशिश उचित नहीं होती। रुपये पर क्यों बढ़ा दबाव? पिछले कुछ महीनों में भारतीय रुपये पर कई वैश्विक और घरेलू कारणों से दबाव बढ़ा है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान संकट के चलते कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई, जिससे भारत के आयात बिल और महंगाई को लेकर चिंताएं बढ़ गईं। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में उछाल का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इसके साथ ही विदेशी निवेशकों की बिकवाली और वैश्विक अनिश्चितता ने भी रुपये को कमजोर किया। ‘रुपये का कमजोर होना लगभग तय था’ मोंटेक सिंह अहलूवालिया का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में रुपये पर दबाव आना स्वाभाविक था। उनके अनुसार, जब बाजार की परिस्थितियां प्रतिकूल हो जाएं तो विनिमय दर में कुछ गिरावट आने देना आर्थिक रूप से गलत नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक भारत चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) को विदेशी पूंजी निवेश के जरिए आसानी से संभालता रहा, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पूंजी प्रवाह की गति धीमी पड़ने से स्थिति बदल गई है। ऐसे में केवल विदेशी मुद्रा भंडार खर्च कर रुपये को बचाने की रणनीति लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकती। कमजोर रुपया निर्यात के लिए फायदेमंद अहलूवालिया ने यह भी कहा कि रुपये में नियंत्रित गिरावट का एक सकारात्मक पहलू भी है। इससे भारतीय निर्यातकों को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिल सकता है। जब घरेलू मुद्रा कमजोर होती है तो विदेशों में भारतीय उत्पाद अपेक्षाकृत सस्ते हो जाते हैं, जिससे निर्यात बढ़ने की संभावना रहती है। उनका मानना है कि मध्यम अवधि में यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए लाभकारी साबित हो सकता है। RBI की रणनीति पर जारी है बहस हाल के समय में कई अर्थशास्त्रियों और नीति विशेषज्ञों के बीच यह चर्चा तेज हुई है कि क्या RBI को रुपये की रक्षा के लिए आक्रामक हस्तक्षेप करना चाहिए या फिर बाजार को अपनी दिशा तय करने देनी चाहिए। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े वैश्विक झटकों के दौरान किसी विशेष विनिमय दर को बनाए रखने की कोशिश आर्थिक रूप से महंगी और अस्थिर साबित हो सकती है। भारतीय अर्थव्यवस्था की बड़ी चुनौतियां रुपये के मुद्दे पर बात करते हुए मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने भारतीय अर्थव्यवस्था की कुछ संरचनात्मक चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि निजी निवेश और निर्यात की धीमी रफ्तार कई वर्षों से चिंता का विषय रही है। उनके मुताबिक भारत को निवेश आकर्षित करने और आर्थिक वृद्धि को गति देने के लिए और अधिक सुधारों की जरूरत है। साथ ही वैश्विक निवेशकों को स्पष्ट और भरोसेमंद नीति संकेत देने होंगे। व्यापार समझौतों पर जोर अहलूवालिया ने सुझाव दिया कि भारत को एशियाई देशों के साथ व्यापारिक संबंधों को और मजबूत करना चाहिए। उनका मानना है कि वैश्विक व्यापार वृद्धि में एशिया की भूमिका लगातार बढ़ रही है और भारत को इसका लाभ उठाने के लिए नए व्यापार समझौतों और आर्थिक साझेदारियों पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ाने के लिए निवेश संरक्षण से जुड़े ढांचों को मजबूत करना आवश्यक है। आगे क्या रहेगा रुपये की दिशा? हाल के दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में कुछ नरमी आने और भू-राजनीतिक तनाव कम होने की उम्मीदों के बीच रुपये में हल्की रिकवरी देखने को मिली है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में रुपये की चाल मुख्य रूप से इन कारकों पर निर्भर करेगी - कच्चे तेल की वैश्विक कीमतें विदेशी निवेश प्रवाह अमेरिकी ब्याज दरें पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति भारत की आर्थिक वृद्धि और निर्यात प्रदर्शन फिलहाल, मोंटेक सिंह अहलूवालिया का मानना है कि बाजार की परिस्थितियों के अनुरूप रुपये को समायोजित होने देना एक व्यावहारिक और संतुलित आर्थिक नीति का हिस्सा है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।