तमिलनाडु में किसानों ने अपनी मांगों को लेकर मुख्यमंत्री C. Joseph Vijay की सरकार के खिलाफ आंदोलन का ऐलान कर दिया है। किसान संगठनों का आरोप है कि सरकार चुनावी घोषणा पत्र में किए गए फसल ऋण माफी के वादे से पीछे हट रही है। किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगें पूरी नहीं की गईं, तो 30 जून को पूरे राज्य में भूख हड़ताल की जाएगी। 30 जून को राज्यव्यापी भूख हड़ताल का ऐलान किसान नेता P. R. Pandian ने कहा कि राज्य सरकार को किसानों की मांगों पर तत्काल निर्णय लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि सरकार ने फसल ऋण माफी से जुड़ी मांगों को स्वीकार नहीं किया, तो किसान 30 जून को पूरे तमिलनाडु में भूख हड़ताल कर विरोध प्रदर्शन करेंगे। उन्होंने कहा, "सरकार ने किसानों से जो वादे किए थे, उन्हें पूरा करना चाहिए। यदि ऐसा नहीं हुआ तो किसान राज्यव्यापी आंदोलन करने को मजबूर होंगे।" चुनावी घोषणा पत्र में किया था फसल ऋण माफी का वादा C. Joseph Vijay के नेतृत्व वाली Tamilaga Vettri Kazhagam (टीवीके) ने विधानसभा चुनाव के दौरान किसानों से कई बड़े वादे किए थे। इनमें सबसे प्रमुख वादा फसल ऋण माफी (Crop Loan Waiver) का था। किसान संगठनों का कहना है कि चुनाव प्रचार के दौरान विजय ने आश्वासन दिया था कि सरकार बनने के बाद सबसे पहले किसानों के कृषि ऋण माफ किए जाएंगे। क्या था टीवीके का चुनावी वादा? टीवीके के चुनावी घोषणा पत्र के अनुसार— 5 एकड़ से कम भूमि वाले किसानों का पूरा कृषि ऋण माफ किया जाएगा। 5 एकड़ से अधिक भूमि वाले किसानों का 50 प्रतिशत कृषि ऋण माफ किया जाएगा। लेकिन हाल ही में सरकार द्वारा जारी संशोधित नीति में केवल 75,000 रुपये तक का ऋण लेने वाले छोटे और सीमांत किसानों का पूरा कर्ज माफ करने की घोषणा की गई है। किसानों ने सरकार पर वादाखिलाफी का लगाया आरोप किसान संगठनों का कहना है कि सरकार ने अपने मूल वादे में बदलाव कर किसानों के साथ अन्याय किया है। उनका आरोप है कि सरकार अब बिना किसी सीमा के सभी किसानों के कृषि ऋण माफ करने की अपनी प्रतिबद्धता से पीछे हट रही है। किसान नेता पी.आर. पांडियन ने कहा कि किसान संगठन सभी कृषि ऋणों की पूर्ण माफी की मांग पर अड़े हुए हैं और जब तक सरकार स्पष्ट घोषणा नहीं करती, आंदोलन जारी रहेगा। सरकार के सामने बढ़ सकती है चुनौती तमिलनाडु में कृषि ऋण माफी का मुद्दा अब राजनीतिक रूप लेता दिख रहा है। यदि 30 जून को राज्यव्यापी भूख हड़ताल होती है, तो मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की सरकार के सामने अपनी पहली बड़ी किसान चुनौती खड़ी हो सकती है। आने वाले दिनों में सरकार और किसान संगठनों के बीच बातचीत इस विवाद की दिशा तय करेगी।
C. Joseph Vijay ने शुक्रवार को अपने मंत्रिमंडल का एक और विस्तार किया। इस विस्तार के साथ तमिलनाडु सरकार में मंत्रियों की संख्या संविधान द्वारा निर्धारित अधिकतम सीमा तक पहुंच गई है। इस बार Indian Union Muslim League (IUML) और Viduthalai Chiruthaigal Katchi (VCK) के एक-एक विधायक को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है। ए.एम. शाहजहां और वन्नी अरासु ने ली मंत्री पद की शपथ आईयूएमएल विधायक A. M. Shahjahan और वीसीके विधायक Vanni Arasu ने शुक्रवार को मंत्री पद की शपथ ली। राज्यपाल Rajendra Vishwanath Arlekar ने लोक भवन में आयोजित समारोह में दोनों नेताओं को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। शाहजहां Papanasam विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं, जबकि वन्नी अरासु Tindivanam सीट से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे हैं। मंत्रियों की संख्या पहुंची 35 नए विस्तार के बाद मुख्यमंत्री विजय समेत मंत्रियों की कुल संख्या 35 हो गई है, जो राज्य में संवैधानिक सीमा के बराबर मानी जा रही है। इस विस्तार के जरिए विजय सरकार ने अपने सहयोगी दलों को भी सत्ता में प्रतिनिधित्व देने की रणनीति को आगे बढ़ाया है। गुरुवार को भी हुआ था बड़ा विस्तार इससे पहले गुरुवार को मुख्यमंत्री विजय ने अपने मंत्रिमंडल में 23 मंत्रियों को शामिल किया था। इनमें 21 विधायक उनकी पार्टी Tamilaga Vettri Kazhagam (TVK) से थे, जबकि दो मंत्री कांग्रेस कोटे से बनाए गए थे। वहीं, 10 मई को जब विजय ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, तब उनके साथ नौ विधायकों ने भी मंत्री पद की शपथ ली थी। कैसे बनी विजय सरकार? तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में इस बार टीवीके को बड़ी सफलता मिली, लेकिन पार्टी पूर्ण बहुमत से करीब 10 सीट पीछे रह गई। इसके बाद Indian National Congress ने विजय को समर्थन दिया। बाद में कम्युनिस्ट पार्टी, मुस्लिम लीग और वीसीके ने भी सरकार को समर्थन देने का ऐलान किया। अब सहयोगी दलों के नेताओं को मंत्रिमंडल में शामिल कर विजय ने गठबंधन को और मजबूत करने का संकेत दिया है। कम्युनिस्ट पार्टी अब भी बाहर सरकार को समर्थन देने वाली पार्टियों में से अभी तक कम्युनिस्ट पार्टी को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। राजनीतिक हलकों में इसे लेकर चर्चाएं तेज हैं कि आने वाले समय में कैबिनेट में और बदलाव हो सकते हैं।
सी जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली तमिलनाडु सरकार आज अपने मंत्रिमंडल का बड़ा विस्तार करने जा रही है। गुरुवार सुबह चेन्नई में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में 23 विधायक मंत्री पद की शपथ लेंगे। मुख्यमंत्री की सिफारिश पर राज्यपाल ने सभी नियुक्तियों को मंजूरी दे दी है। यह शपथ ग्रहण समारोह सुबह 10 बजे चेन्नई के लोक भवन में आयोजित होगा। सरकार की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, नए मंत्रियों के शामिल होने से प्रशासनिक कामकाज में तेजी और क्षेत्रीय संतुलन को मजबूती मिलने की उम्मीद है। कांग्रेस की सरकार में वापसी इस कैबिनेट विस्तार की सबसे बड़ी राजनीतिक खासियत कांग्रेस की सरकार में एंट्री मानी जा रही है। लंबे समय बाद तमिलनाडु में किसी क्षेत्रीय दल के नेतृत्व वाली सरकार में कांग्रेस को प्रतिनिधित्व मिला है। कांग्रेस के दो विधायकों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है, जिससे राज्य की राजनीति में नए समीकरण बनने के संकेत मिल रहे हैं। ये विधायक बनेंगे मंत्री नई कैबिनेट में राज्य के विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की गई है। मंत्री पद की शपथ लेने वालों में थूथुकुडी से श्रीनाथ, अविनाशी से कमाली एस, कुमारपालयम से सी विजयलक्ष्मी और कांचीपुरम से आरवी रंजीतकुमार शामिल हैं। इसके अलावा कुंभकोणम से विनोद, तिरुवदानई से राजीव, कडलूर से बी राजकुमार, अरक्कोनम से वी गांधीराज और ओट्टापिडारम से मथन राजा पी को भी मंत्रिमंडल में जगह मिली है। सूची में राजपालयम से जगदेश्वरी के, किल्लियूर से कांग्रेस विधायक राजेश कुमार एस, ईरोड ईस्ट से एम विजय बालाजी, रासीपुरम से लोगेश तमिलसेल्वन डी और सेलम साउथ से विजय तमिलन पार्थिबन ए के नाम भी शामिल हैं। इसके साथ ही श्रीरंगम से रमेश, मेलूर से कांग्रेस विधायक पी विश्वनाथन, वेलाचेरी से कुमार आर, श्रीपेरंबदूर से थेन्नारासु के और कोयंबटूर नॉर्थ से वी संपत कुमार भी मंत्री पद की शपथ लेंगे। अंतिम सूची में अरंथांगी से मोहम्मद फरवास जे, तांबरम से डी सरथकुमार, डॉ. राधाकृष्णन नगर से एन मैरी विल्सन और किनाथुकादावु से विग्नेश के को भी शामिल किया गया है। सरकार को मिलेगी नई ऊर्जा राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस विस्तार के जरिए विजय सरकार संगठन और प्रशासन दोनों स्तरों पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है। क्षेत्रीय संतुलन, सामाजिक प्रतिनिधित्व और सहयोगी दलों को साथ लेकर चलने की रणनीति इस कैबिनेट विस्तार में साफ दिखाई दे रही है।
तमिलनाडु की राजनीति में एक बड़ा विवाद उस समय खत्म होता दिखा जब मुख्यमंत्री C Joseph Vijay ने अपने ज्योतिषी राधान पंडित Rickey Radhan Pandit Vettrivel की विशेष कर्तव्य अधिकारी (OSD) के रूप में हुई नियुक्ति को वापस ले लिया। यह फैसला भारी राजनीतिक विरोध और सहयोगी दलों की नाराज़गी के बाद लिया गया। नियुक्ति के बाद बढ़ा विवाद, विपक्ष और सहयोगियों ने जताई आपत्ति कुछ ही दिन पहले राधान वेत्रिवेल को मुख्यमंत्री कार्यालय में OSD नियुक्त किया गया था। लेकिन इस फैसले के तुरंत बाद राज्य की राजनीति में हंगामा मच गया। सत्तारूढ़ गठबंधन के सहयोगी दलों–जैसे Viduthalai Chiruthaigal Katchi, Communist Party of India (Marxist) और Communist Party of India–ने इस नियुक्ति पर कड़ी आपत्ति जताई। इन दलों का कहना था कि सरकारी पद पर ज्योतिषी की नियुक्ति “अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाला कदम” है और इससे वैज्ञानिक सोच को नुकसान पहुंचता है। “वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दें” – नेताओं की तीखी प्रतिक्रिया विरोध जताते हुए वकिल और नेताओं ने सरकार से अपील की कि प्रशासन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी जाए। एक विधायक ने कहा कि सरकार को जनता के पैसों से ऐसे पद नहीं बनाने चाहिए जो अंधविश्वास को बढ़ावा दें। वाम दलों के नेताओं ने भी कहा कि सरकार का दायित्व है कि वह तर्कसंगत सोच और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को मजबूत करे। DMDK नेता ने भी उठाए सवाल Desiya Murpokku Dravida Kazhagam की नेता ने भी इस फैसले की आलोचना की। उन्होंने कहा कि जनता, खासकर युवाओं ने बदलाव के लिए सरकार को चुना है, ऐसे में इस तरह की नियुक्तियां गलत संदेश देती हैं। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति निजी रूप से ज्योतिष पर विश्वास करता है, तो वह उसका व्यक्तिगत मामला हो सकता है, लेकिन सरकारी पद पर इसकी भूमिका उचित नहीं है। जयललिता के दौर से भी हुई तुलना इस पूरे विवाद के बीच पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता के शासनकाल की भी चर्चा शुरू हो गई, जहां कथित तौर पर ज्योतिष और सलाहकारों की भूमिका को लेकर पहले भी बहस होती रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह विवाद पुरानी राजनीतिक परंपराओं की याद भी दिलाता है। दबाव बढ़ा तो सरकार ने लिया यू-टर्न विवाद बढ़ने के बाद मुख्यमंत्री विजय ने संकेत दिया था कि इस नियुक्ति पर पुनर्विचार किया जाएगा। इसके बाद ही आधिकारिक रूप से राधान वेत्रिवेल की OSD नियुक्ति को रद्द कर दिया गया। सूत्रों के अनुसार, सरकार ने यह कदम गठबंधन सहयोगियों की नाराज़गी और विपक्ष के तीखे हमलों को देखते हुए उठाया। राजनीतिक संदेश और आगे की स्थिति हालांकि गठबंधन दलों ने सरकार से समर्थन वापस नहीं लिया है, लेकिन इस घटना ने राजनीतिक हलकों में हलचल जरूर पैदा कर दी है। विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला सरकार के लिए एक बड़ा “मैसेजिंग इश्यू” बन गया था, जिसे संभालना जरूरी हो गया था। अब सभी की नजर इस बात पर है कि मुख्यमंत्री विजय आगे प्रशासनिक फैसलों में किस तरह संतुलन बनाते हैं और क्या यह विवाद लंबे समय तक राजनीतिक असर छोड़ेगा।
तमिलनाडु में नई सरकार के गठन के बीच मंगलवार को विधानसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद का चुनाव संपन्न हुआ। टीवीके विधायक जेसीडी प्रभाकर को सर्वसम्मति से तमिलनाडु विधानसभा का नया अध्यक्ष चुना गया, जबकि एम रविशंकर को उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी मिली। 13 मई को मुख्यमंत्री C. Joseph Vijay को विधानसभा में बहुमत साबित करना है। उससे पहले सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने के लिए अध्यक्ष का चुनाव कराया गया। मुख्यमंत्री विजय ने रखा प्रभाकर के नाम का प्रस्ताव विधानसभा की बैठक के दौरान कार्यवाहक अध्यक्ष एमवी करुपैया ने बताया कि मुख्यमंत्री विजय की ओर से जेसीडी प्रभाकर के नाम का प्रस्ताव रखा गया था। अध्यक्ष पद के लिए केवल एक ही नामांकन दाखिल हुआ, जिसके चलते प्रभाकर को निर्विरोध और सर्वसम्मति से चुना गया। उदयनिधि स्टालिन और सेंगोत्तैयान ने दी बधाई सदन की परंपरा के अनुसार नेता सदन केए सेंगोत्तैयान और विपक्ष के नेता Udhayanidhi Stalin नव निर्वाचित अध्यक्ष प्रभाकर को उनकी कुर्सी तक लेकर गए। सत्ता पक्ष और विपक्ष के सदस्यों ने मेज थपथपाकर उनका स्वागत किया। एम रविशंकर बने विधानसभा उपाध्यक्ष अध्यक्ष पद संभालने के बाद प्रभाकर ने उपाध्यक्ष पद के चुनाव की प्रक्रिया पूरी कराई। थुरैयूर से टीवीके विधायक एम रविशंकर उपाध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल करने वाले एकमात्र उम्मीदवार थे। उनका नामांकन सेंगोत्तैयान ने प्रस्तावित किया था। कोई अन्य उम्मीदवार नहीं होने के कारण रविशंकर भी निर्विरोध निर्वाचित घोषित किए गए। नई सरकार के गठन के बाद अब सबकी नजर 13 मई को होने वाले विश्वास मत पर टिकी हुई है, जहां मुख्यमंत्री विजय अपनी सरकार का बहुमत साबित करेंगे।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।