मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर बढ़ता दिख रहा है। लेबनान के शक्तिशाली सशस्त्र समूह Hezbollah ने साफ कर दिया है कि वह न तो अपने हथियार छोड़ेगा और न ही Israel के साथ सीधे बातचीत करेगा। नईम कासिम का दोटूक संदेश Naim Qassem ने कहा कि मौजूदा हालात में इजराइल से किसी भी तरह की प्रत्यक्ष वार्ता संभव नहीं है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा: "हम अपने हथियार नहीं छोड़ेंगे।" यह बयान ऐसे समय आया है जब क्षेत्र में युद्धविराम को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। लेबनान सरकार को भी चेतावनी कासिम ने Lebanon की सरकार पर भी निशाना साधा। उनका आरोप है कि सरकार ने इजराइल के सामने जरूरत से ज्यादा रियायतें दी हैं। हिजबुल्लाह चाहता है कि यदि कोई वार्ता हो भी, तो वह केवल अप्रत्यक्ष माध्यमों से हो, सीधे नहीं। दक्षिणी लेबनान में इजराइली कार्रवाई Israel Defense Forces ने बताया कि दक्षिणी लेबनान में उसके सैनिकों ने संदिग्ध गतिविधियां देखीं। इसके बाद वायुसेना ने कार्रवाई करते हुए तीन आतंकवादियों को मार गिराया। आईडीएफ ने हिजबुल्लाह के कई ठिकानों और सैन्य ढांचे को भी निशाना बनाने का दावा किया है। नेतन्याहू का आरोप इजराइली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने हिजबुल्लाह पर युद्धविराम समझौते को कमजोर करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि उत्तरी सीमा की सुरक्षा के लिए लेबनान में सैन्य अभियान जारी रहेगा। क्या युद्धविराम खतरे में है? हालात संकेत दे रहे हैं कि संघर्ष फिर भड़क सकता है। हिजबुल्लाह के सख्त रुख और इजराइल की लगातार सैन्य कार्रवाई से युद्धविराम पर खतरा मंडरा रहा है। अमेरिका की भूमिका अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने हाल ही में इजराइल-लेबनान युद्धविराम को तीन सप्ताह बढ़ाने की घोषणा की थी। साथ ही, अमेरिका ने लेबनान को हिजबुल्लाह से निपटने में सहयोग का आश्वासन भी दिया है। मध्य पूर्व की स्थिति फिलहाल बेहद नाजुक बनी हुई है। आने वाले दिनों में घटनाक्रम पूरे क्षेत्र की दिशा तय कर सकता है।
सीजफायर के बीच फिर शुरू हो सकती है बातचीत Donald Trump ने ईरान-अमेरिका तनाव के बीच बड़ा संकेत देते हुए कहा है कि अगले 36 से 72 घंटों में शांति वार्ता को लेकर “अच्छी खबर” आ सकती है। रिपोर्ट्स के अनुसार, दोनों देशों के बीच दूसरी दौर की बातचीत की संभावना बन रही है, हालांकि स्थिति अभी भी अनिश्चित बनी हुई है। पाकिस्तान बना मध्यस्थ, बैकचैनल बातचीत तेज Pakistan इस पूरे मामले में अहम भूमिका निभा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, इस्लामाबाद के जरिए बैकचैनल डिप्लोमेसी जारी है, जिससे बातचीत दोबारा शुरू होने की उम्मीद बढ़ी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों पक्षों के बीच सीजफायर अभी तक काफी हद तक कायम है, जो सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। ईरान से ‘एकजुट प्रस्ताव’ का इंतजार Donald Trump ने हाल ही में सीजफायर को आगे बढ़ाने का ऐलान किया था और कहा था कि अमेरिका, Iran की ओर से एक “संयुक्त प्रस्ताव” का इंतजार कर रहा है। इसके बाद ही आगे की वार्ता शुरू होगी। हालांकि, ईरान ने अभी तक नए दौर की बातचीत में शामिल होने की पुष्टि नहीं की है। होर्मुज जलडमरूमध्य में हमले, बढ़ी चिंता इस बीच Strait of Hormuz में हालात फिर तनावपूर्ण हो गए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड ने तीन जहाजों पर हमला किया, जिनमें से दो को कब्जे में ले लिया गया। यह इलाका दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है, ऐसे में यहां बढ़ती गतिविधियां वैश्विक चिंता का कारण बन रही हैं। लेबनान में भी जारी हिंसा Lebanon में भी स्थिति स्थिर नहीं है। दक्षिणी इलाके में एक वाहन पर हुए हमले में दो लोगों की मौत हो गई। यह हमला सीजफायर लागू होने के बावजूद हुआ, जिससे क्षेत्रीय शांति पर सवाल उठ रहे हैं। विशेषज्ञों की राय: उम्मीद और खतरे दोनों विशेषज्ञों का मानना है कि एक तरफ बातचीत की संभावना बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर जारी हिंसा शांति प्रक्रिया को कमजोर कर सकती है। अगर अगले 72 घंटों में सकारात्मक संकेत मिलते हैं, तो यह मिडिल ईस्ट में तनाव कम करने की दिशा में बड़ा कदम हो सकता है।
फांसी टलने का दावा, ट्रंप ने जताई ‘सराहना’ Donald Trump ने दावा किया है कि Iran में जिन 8 महिला प्रदर्शनकारियों को फांसी दी जानी थी, उनकी सजा रोक दी गई है। ट्रंप ने कहा कि यह फैसला उनके अनुरोध के बाद लिया गया और उन्होंने इसे “अच्छी खबर” बताते हुए ईरान के इस कदम की सराहना की। उन्होंने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि इन महिलाओं में से चार को रिहा किया जाएगा, जबकि बाकी को एक महीने की सजा दी जाएगी। ईरान का पलटवार: ‘पूरी तरह झूठा दावा’ ट्रंप के इस बयान पर ईरान ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। ईरानी न्यायपालिका से जुड़े मीडिया ने इस दावे को पूरी तरह गलत बताया और कहा कि ऐसी किसी फांसी की योजना ही नहीं थी। ईरान ने आरोप लगाया कि Donald Trump युद्ध के बीच “झूठी उपलब्धियां” गिनाने की कोशिश कर रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भ्रम फैलाया जा रहा है। पहले की अपील और कूटनीतिक संकेत गौरतलब है कि एक दिन पहले ही ट्रंप ने इन महिलाओं को नुकसान न पहुंचाने की अपील की थी और इसे बातचीत की शुरुआत के लिए सकारात्मक कदम बताया था। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के बयान कूटनीतिक दबाव बनाने और वैश्विक संदेश देने की रणनीति का हिस्सा हो सकते हैं। सीजफायर के बावजूद तनाव कायम हाल ही में Donald Trump ने ईरान के साथ सीजफायर की अवधि बढ़ाने का ऐलान किया था, लेकिन साथ ही समुद्री नाकेबंदी जारी रखने की बात भी कही। वहीं, ईरान ने भी खाड़ी क्षेत्र में जहाजों को जब्त करने जैसी कार्रवाई जारी रखी है, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव कम होने के बजाय और बढ़ता दिख रहा है। कौन हैं ये महिलाएं? हालांकि ट्रंप ने इन महिलाओं के नाम सार्वजनिक नहीं किए, लेकिन कुछ रिपोर्ट्स में गोलनाज नराघी, वीनस हुसैनीनेजाद और बीटा हेम्मती जैसे नाम सामने आए हैं। हालांकि इनकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
सीजफायर के बावजूद बातचीत अटकी, बढ़ा कूटनीतिक तनाव Iran और United States के बीच जारी तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian ने साफ कहा है कि दोनों देशों के बीच बातचीत आगे नहीं बढ़ पा रही है और इसके पीछे अमेरिका की नीतियां जिम्मेदार हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए अमेरिका पर “दोहरी नीति” अपनाने का आरोप लगाया और कहा कि दुनिया अब इन विरोधाभासी बयानों और कार्रवाइयों को देख रही है। बातचीत में रुकावट के 3 बड़े कारण ईरान ने बातचीत के असफल रहने के पीछे तीन मुख्य वजहें बताई हैं: वायदों का उल्लंघन (Breach of commitments) समुद्री नाकेबंदी (Naval blockade) लगातार धमकियां (Threats) Masoud Pezeshkian ने कहा कि ईरान कभी भी बातचीत के खिलाफ नहीं रहा, लेकिन मौजूदा हालात में भरोसे की कमी सबसे बड़ी बाधा बन गई है। ट्रंप के सीजफायर विस्तार के बाद टली बातचीत रिपोर्ट्स के अनुसार, इस सप्ताह Pakistan में अमेरिका-ईरान के बीच वार्ता होने वाली थी, लेकिन Donald Trump द्वारा सीजफायर बढ़ाने के ऐलान के बाद इसे फिलहाल टाल दिया गया। अमेरिका का कहना है कि ईरान को एक संयुक्त प्रस्ताव तैयार करने के लिए अतिरिक्त समय दिया गया है। तनाव बरकरार: जहाज जब्ती और नाकेबंदी जारी सीजफायर के बावजूद दोनों देशों के बीच तनाव कम नहीं हुआ है। ईरान ने हाल ही में तीन जहाजों को जब्त किया, जबकि अमेरिका ने Strait of Hormuz के पास अपनी नौसैनिक नाकेबंदी जारी रखी है। व्हाइट हाउस की ओर से साफ किया गया है कि ईरान के प्रस्ताव पर कोई तय समयसीमा नहीं दी गई है और आगे की रणनीति राष्ट्रपति के निर्णय पर निर्भर करेगी। नाकेबंदी हटाने पर टिकी अगली बातचीत United Nations में ईरान के प्रतिनिधि ने संकेत दिया है कि यदि अमेरिका नाकेबंदी हटाता है, तो अगली वार्ता जल्द हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात में भरोसे की बहाली और ठोस कदम ही दोनों देशों को बातचीत की टेबल तक वापस ला सकते हैं।
ट्रंप ने बढ़ाया ईरान के साथ युद्धविराम अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान के साथ जारी सीजफायर को आगे बढ़ाने का ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि यह तब तक जारी रहेगा, जब तक ईरान के नेता एक साझा प्रस्ताव पेश नहीं करते और बातचीत पूरी नहीं हो जाती। ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पोस्ट करते हुए बताया कि यह फैसला पाकिस्तान के अनुरोध पर लिया गया है। पाकिस्तान की अपील का हवाला ट्रंप ने कहा कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif और सेना प्रमुख Asim Munir की अपील के बाद अमेरिका ने हमले को टालने का निर्णय लिया। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान की सरकार फिलहाल आंतरिक रूप से बंटी हुई है, इसलिए बातचीत के लिए समय देना जरूरी है। सैन्य दबाव बरकरार रहेगा सीजफायर बढ़ाने के बावजूद अमेरिका ने ईरान पर दबाव बनाए रखा है। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी सेना को पूरी तरह तैयार रहने के निर्देश दिए गए हैं और ईरान के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी जारी रहेगी। यह कदम एक तरफ तनाव को कम करने का संकेत देता है, वहीं दूसरी ओर सैन्य तैयारियों को भी कायम रखता है। ईरान की कड़ी प्रतिक्रिया ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने इस नाकेबंदी को “युद्ध जैसी कार्रवाई” बताया है। उन्होंने चेतावनी दी कि व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाना और क्रू को रोकना हालात को और बिगाड़ सकता है। ईरान ने यह भी संकेत दिया है कि वह पाकिस्तान में होने वाली बातचीत में शामिल नहीं होगा। साजिश का आरोप और बढ़ता तनाव ईरान के एक वरिष्ठ सलाहकार ने ट्रंप के फैसले को “समय खरीदने की चाल” बताया है। उनका कहना है कि यह किसी संभावित हमले की तैयारी हो सकती है। दूसरी ओर, पाकिस्तान ने इस फैसले का स्वागत किया है और उम्मीद जताई है कि बातचीत के जरिए स्थायी समाधान निकलेगा। कूटनीतिक हल पर टिकी नजर फिलहाल यह फैसला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव कम करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, अमेरिका और ईरान के बीच मतभेद अभी भी बरकरार हैं और आने वाले दिनों में हालात किस दिशा में जाएंगे, इस पर सभी की नजर बनी हुई है।
अमेरिकी राष्ट्रपति के ऐलान के बाद इज़राइल को युद्ध रोकने पर मजबूर होना पड़ा लेबनान में जारी संघर्ष के बीच अब एक बड़ा कूटनीतिक मोड़ सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अचानक युद्धविराम की घोषणा कर दी, जिसके बाद इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को अपनी सैन्य रणनीति बदलनी पड़ी। रिपोर्टों के मुताबिक, यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने इस संघर्ष में सीधे हस्तक्षेप करते हुए इज़राइल के फैसलों को प्रभावित किया है। ट्रंप की घोषणा से पहले ही तय हो गया युद्धविराम जानकारी के अनुसार, ट्रंप ने पहले ही यह संकेत दे दिया था कि इज़राइल और लेबनान के बीच युद्धविराम जल्द लागू होगा। इसके कुछ ही घंटों बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर घोषणा कर दी कि संघर्ष रोक दिया गया है और दोनों पक्षों को सैन्य कार्रवाई बंद करनी होगी। इसके बाद इज़राइल सरकार के पास ज्यादा विकल्प नहीं बचे और उसे युद्धविराम को स्वीकार करना पड़ा। नेतन्याहू की सैन्य योजना पर फिर पड़ा असर इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू हाल ही में हिज़बुल्लाह के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जारी रखने की बात कर रहे थे। इज़राइली सेना भी नए हमलों की योजना तैयार कर रही थी। लेकिन अमेरिकी दबाव के बाद स्थिति बदल गई और सरकार को युद्ध रोकने का निर्णय लेना पड़ा। देश को जानकारी ट्रंप के पोस्ट से मिली सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इज़राइल के नागरिकों और कई नेताओं को युद्धविराम की जानकारी अपने प्रधानमंत्री से नहीं, बल्कि ट्रंप के सोशल मीडिया पोस्ट से मिली। इससे इज़राइली राजनीतिक हलकों में भी चर्चा तेज हो गई है। ट्रंप बनते जा रहे हैं निर्णायक शक्ति विश्लेषकों का कहना है कि हाल के महीनों में ट्रंप ने कई अंतरराष्ट्रीय मामलों में सीधे हस्तक्षेप किया है, जिनमें गाजा, ईरान और अब लेबनान शामिल हैं। रिपोर्टों के अनुसार, कई मौकों पर उन्होंने: युद्धविराम लागू कराया सैन्य कार्रवाई रोकने का दबाव बनाया और क्षेत्रीय नेताओं से सीधे बातचीत को प्रभावित किया गाजा और ईरान संघर्ष पर भी असर इससे पहले गाजा और ईरान से जुड़े संघर्षों में भी अमेरिका ने इज़राइल की रणनीति पर प्रभाव डाला था। कई मामलों में इज़राइल को अपने सैन्य अभियान सीमित करने पड़े, जिससे उसे निर्णायक जीत हासिल नहीं हो सकी। हिज़बुल्लाह अभी भी बड़ा खतरा युद्धविराम के बावजूद लेबनान में हिज़बुल्लाह की स्थिति मजबूत बनी हुई है। संगठन ड्रोन और रॉकेट हमलों की क्षमता रखता है, जिससे इज़राइल की सुरक्षा चुनौती बनी हुई है। नेतन्याहू का बयान: शांति और युद्ध दोनों तैयार युद्धविराम के बाद नेतन्याहू ने कहा कि इज़राइल ने अमेरिका के अनुरोध पर समझौता किया है, लेकिन जरूरत पड़ने पर सेना फिर से कार्रवाई के लिए तैयार है। उन्होंने कहा: “हमारे एक हाथ में हथियार है, और दूसरा हाथ शांति के लिए बढ़ा हुआ है।” स्थिति अभी भी नाजुक हालांकि युद्धविराम लागू हो चुका है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह अस्थायी है और क्षेत्र में तनाव अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। आने वाले दिनों में हालात फिर बदल सकते हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।