अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव सुरक्षा पर दिए अपने प्राइमटाइम संबोधन में चीन पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान करीब 22 करोड़ मतदाताओं का व्यक्तिगत डेटा चोरी किया गया था। ट्रंप ने इसे अमेरिकी इतिहास का सबसे बड़ा चुनावी डेटा उल्लंघन बताया। हालांकि, ट्रंप के इन आरोपों के समर्थन में उन्होंने अपने भाषण में कोई सार्वजनिक तकनीकी या न्यायिक साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया। डेटा में क्या-क्या होने का दावा? ट्रंप के अनुसार, कथित तौर पर लीक हुए डेटा में मतदाताओं के नाम, पते, फोन नंबर, राजनीतिक दल से जुड़ी जानकारी और अन्य व्यक्तिगत विवरण शामिल थे। उन्होंने आरोप लगाया कि चीन ने इस उद्देश्य के लिए विशेष डेटा संग्रह इकाई बनाई थी। रूस, चीन और उत्तर कोरिया का भी लिया नाम अपने संबोधन में ट्रंप ने कहा कि अमेरिका के चुनावी ढांचे को नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखने वाले देशों में चीन, रूस और उत्तर कोरिया सहित कई विदेशी समूह शामिल हैं। उन्होंने दावा किया कि अमेरिकी खुफिया आकलनों में भी विदेशी हस्तक्षेप को लेकर चिंताएं जताई गई हैं। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों पर फिर उठाए सवाल ट्रंप ने एक बार फिर इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीनों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि ये प्रणालियां साइबर हमलों के प्रति संवेदनशील हो सकती हैं और अमेरिका को कागजी मतपत्र (Paper Ballot) प्रणाली की ओर लौटने पर विचार करना चाहिए। एफबीआई और न्याय विभाग पर भी लगाए आरोप ट्रंप ने आरोप लगाया कि एफबीआई और अमेरिकी न्याय विभाग ने वर्ष 2020 के चुनाव के दौरान मिशिगन में कथित मतदाता धोखाधड़ी से जुड़े मामले की जांच को दबा दिया था। उन्होंने दावा किया कि यह व्यापक स्तर पर तथ्यों को छिपाने का प्रयास था। गैर-नागरिक मतदाताओं का भी किया जिक्र ट्रंप ने यह भी दावा किया कि अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) की जांच में संघीय चुनावों के लिए राज्य की मतदाता सूची में लगभग 2.78 लाख गैर-नागरिकों के पंजीकरण की पहचान हुई है। उन्होंने कहा कि वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है। चुनावी दस्तावेज सार्वजनिक करने का दावा राष्ट्रपति ट्रंप ने बताया कि व्हाइट हाउस ने चुनाव संबंधी खुफिया दस्तावेजों के लिए एक नया ऑनलाइन पोर्टल शुरू किया है। उनके अनुसार, इन दस्तावेजों में चुनाव प्रणाली की कमजोरियों और जांच से जुड़े निष्कर्ष शामिल हैं। उन्होंने लोगों से इन दस्तावेजों को देखने की अपील भी की। मेल-इन वोटिंग का फिर किया विरोध अपने करीब 23 मिनट के भाषण के अंत में ट्रंप ने डाक (मेल-इन) से मतदान का एक बार फिर विरोध किया। उन्होंने इसे "स्वाभाविक रूप से भ्रष्ट" व्यवस्था बताया और कहा कि इससे चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित होती है। हालांकि, अमेरिकी अदालतों, चुनाव अधिकारियों और कई स्वतंत्र जांचों में अब तक ऐसा कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया है, जिससे यह साबित हो कि मेल-इन वोटिंग के कारण व्यापक स्तर पर चुनावी धोखाधड़ी हुई या चुनाव परिणाम प्रभावित हुए थे।
शंघाई, एजेंसियां। चीन की AI कंपनी StepFun ने दुनिया का पहला एजेंटिक AI स्मार्टफोन "STEPX Neo" लॉन्च करने का दावा किया है। यह फोन पारंपरिक स्मार्टफोन से अलग है क्योंकि इसमें Step AOS ऑपरेटिंग सिस्टम और Step Amoo AI एजेंट दिया गया है, जो केवल सवालों के जवाब नहीं देता बल्कि यूज़र के लिए कई काम खुद पूरा कर सकता है। Step Amoo करेगा मल्टी-स्टेप काम अपने आप फोन का सबसे बड़ा आकर्षण Step Amoo AI एजेंट है। यूज़र अगर सिर्फ एक निर्देश देगा, जैसे "वीकेंड ट्रिप बुक कर दो" या "रेस्टोरेंट में टेबल बुक कर दो", तो Amoo खुद अलग-अलग ऐप्स खोलकर टिकट बुक करेगा, होटल खोजेगा, पेमेंट करेगा और पूरा काम बिना बार-बार निर्देश दिए पूरा कर देगा। यह Alipay, Meituan, Didi और Baidu समेत 10 से अधिक बड़े प्लेटफॉर्म के साथ काम कर सकता है। बिना इंटरनेट भी करेगा कई AI फीचर कंपनी के अनुसार, STEPX Neo में ऑन-डिवाइस AI मॉडल दिया गया है, जिससे कई AI फीचर बिना इंटरनेट कनेक्शन के भी काम करेंगे। जरूरत पड़ने पर फोन क्लाउड AI का भी उपयोग करेगा। Step AOS को Android, Linux और RTOS की नींव पर तैयार किया गया है ताकि AI एजेंट को सिस्टम के हर हिस्से तक पहुंच मिल सके। AI स्मार्टफोन की नई दौड़ हुई तेज STEPX Neo के लॉन्च के साथ AI स्मार्टफोन बाजार में नई प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, OpenAI, Apple और अन्य बड़ी टेक कंपनियां भी AI-केंद्रित स्मार्टफोन पर काम कर रही हैं। हालांकि StepFun का दावा है कि उसने दुनिया का पहला मास-मार्केट एजेंटिक AI फोन पेश कर इस दौड़ में बढ़त बना ली है।
नई दिल्ली: 60वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित तमिल के प्रख्यात साहित्यकार, गीतकार और लेखक आर. वैरामुथु ने भारतीय भाषाओं, खासकर तमिल साहित्य की वैश्विक पहचान को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि तमिल साहित्य का समृद्ध खजाना अनुवाद की कमी के कारण दुनिया तक नहीं पहुंच पा रहा है, जिससे कई महान रचनाकारों को उनका उचित सम्मान नहीं मिल पाता। पीटीआई के अनुसार, नई दिल्ली में आयोजित ज्ञानपीठ पुरस्कार समारोह के बाद वैरामुथु ने कहा कि तमिल भाषा का विशाल साहित्य न तो पर्याप्त रूप से दूसरी भारतीय भाषाओं में अनुवादित हुआ है और न ही विदेशी भाषाओं में। इसी वजह से तमिल साहित्य की उत्कृष्ट कृतियां अंतरराष्ट्रीय पाठकों तक नहीं पहुंच पाती हैं। चार दशक के साहित्यिक योगदान का मिला सम्मान आर. वैरामुथु को 60वां ज्ञानपीठ पुरस्कार उनके चार दशक से अधिक लंबे साहित्यिक योगदान के लिए प्रदान किया गया है। उन्होंने कविता, उपन्यास, निबंध और फिल्मी गीतों के माध्यम से तमिल साहित्य को नई पहचान दिलाई है। साहित्य के साथ-साथ सिनेमा में भी उनके योगदान को व्यापक सराहना मिली है। 'कल्लिक्कट्टू एथिकासम' से मिली विशेष पहचान ज्ञानपीठ सम्मान के दौरान उनकी चर्चित कृति 'कल्लिक्कट्टू एथिकासम' (Kallikattu Ithikasam) का विशेष उल्लेख किया गया। यह उपन्यास ग्रामीण जीवन, विस्थापन और मानवीय संघर्ष की संवेदनशील कहानी प्रस्तुत करता है। इसी कृति के लिए वैरामुथु को वर्ष 2003 में साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला था। इसे आधुनिक तमिल साहित्य की सबसे महत्वपूर्ण रचनाओं में गिना जाता है। भारतीय भाषाओं के अनुवाद पर फिर शुरू हुई बहस वैरामुथु के बयान के बाद भारतीय भाषाओं के साहित्य के अनुवाद का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है। लंबे समय से साहित्यकार यह मांग करते रहे हैं कि भारतीय भाषाओं की उत्कृष्ट रचनाओं का बड़े पैमाने पर अनुवाद किया जाए, ताकि वे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक पाठकों तक पहुंच सकें। वैश्विक पहचान के लिए अनुवाद जरूरी वैरामुथु का मानना है कि यदि तमिल सहित सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य का व्यवस्थित और व्यापक अनुवाद किया जाए, तो भारतीय साहित्य को वैश्विक स्तर पर कहीं अधिक पहचान और सम्मान मिल सकता है। उनके अनुसार, भाषा नहीं बल्कि अनुवाद की कमी भारतीय साहित्य की अंतरराष्ट्रीय पहुंच में सबसे बड़ी बाधा है।
भारत का एक स्टार्टअप इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) सेक्टर में ऐसी तकनीक विकसित कर रहा है, जो भविष्य में चीन पर निर्भरता कम करने में बड़ी भूमिका निभा सकती है। बेंगलुरु स्थित Vimag Labs ने एक ऐसा इलेक्ट्रिक मोटर तैयार किया है, जिसमें रेयर अर्थ मैग्नेट (Rare Earth Magnets) की जरूरत नहीं पड़ती। कंपनी का दावा है कि यह मोटर सॉफ्टवेयर की मदद से पारंपरिक मैग्नेट की तरह काम करता है और प्रदर्शन के मामले में मौजूदा तकनीक को कड़ी टक्कर दे सकता है। कोरोना काल की समस्या से जन्मा नया आइडिया Vimag Labs के सह-संस्थापक और CEO मनीष सेठ के अनुसार, वर्ष 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान कंपनी के मोटर प्रोटोटाइप के लिए जरूरी मैग्नेट शंघाई पोर्ट पर कई महीनों तक फंसे रहे। इस अनुभव ने उन्हें ऐसी तकनीक विकसित करने की प्रेरणा दी, जिससे भविष्य में विदेशी सप्लाई चेन पर निर्भरता कम की जा सके। इसके बाद कंपनी ने पूरी तरह मैग्नेट-फ्री और रेयर अर्थ-फ्री इलेक्ट्रिक मोटर विकसित करने पर काम शुरू किया। क्यों जरूरी हैं रेयर अर्थ मैग्नेट? आधुनिक इलेक्ट्रिक वाहनों में इस्तेमाल होने वाले हाई-परफॉर्मेंस मोटरों में नियोडिमियम-आयरन-बोरॉन (NdFeB) जैसे रेयर अर्थ मैग्नेट का उपयोग किया जाता है। ये मोटर की ताकत, दक्षता, टॉर्क और बैटरी की रेंज बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हैं। हालांकि, वैश्विक स्तर पर इन मैग्नेट की सप्लाई पर चीन का दबदबा है। रिपोर्टों के अनुसार, दुनिया के अधिकांश रेयर अर्थ मिनरल्स और उनसे बनने वाले मैग्नेट की सप्लाई चीन के नियंत्रण में है। ऐसे में किसी भी तरह की निर्यात पाबंदी या सप्लाई बाधित होने पर पूरी EV इंडस्ट्री प्रभावित हो सकती है। सॉफ्टवेयर से तैयार होता है 'वर्चुअल मैग्नेट' Vimag Labs की सबसे बड़ी खासियत इसकी Software-Defined Magnet तकनीक है। इस तकनीक में पारंपरिक स्थायी मैग्नेट की जगह कॉपर कॉइल और स्टील का उपयोग किया जाता है। इसके बाद विशेष सॉफ्टवेयर और इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल सिस्टम के जरिए मोटर के अंदर आवश्यक चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field) तैयार किया जाता है। कंपनी का कहना है कि इस तकनीक से मोटर का प्रदर्शन पारंपरिक Permanent Magnet Synchronous Motor (PMSM) के बराबर या कई परिस्थितियों में उससे बेहतर हो सकता है। बैटरी की बचत और बेहतर रेंज का दावा कंपनी के मुताबिक, सॉफ्टवेयर के जरिए चुंबकीय क्षेत्र को लगातार नियंत्रित किया जा सकता है। इससे मोटर अधिक दक्षता के साथ काम करता है और वाहन की बैटरी पर कम दबाव पड़ता है। इसका सीधा फायदा वाहन की ड्राइविंग रेंज बढ़ने और बैटरी की लागत कम होने के रूप में मिल सकता है। साथ ही, भविष्य में सॉफ्टवेयर अपडेट के जरिए मोटर के प्रदर्शन में सुधार भी किया जा सकता है, जबकि पारंपरिक मैग्नेट वाले मोटरों में ऐसा संभव नहीं होता। भारत में ही हो सकता है पूरा निर्माण इस मोटर के निर्माण में मुख्य रूप से कॉपर, स्टील और सामान्य इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स का उपयोग किया जाता है। इसलिए इसका उत्पादन पूरी तरह भारत में किया जा सकता है और रेयर अर्थ मैटेरियल पर निर्भरता काफी हद तक कम हो सकती है। कंपनी का मानना है कि भारत में सेमीकंडक्टर उद्योग के विस्तार के साथ इस तकनीक की लागत भी भविष्य में और कम होगी। कई कंपनियों के साथ चल रही है टेस्टिंग Vimag Labs फिलहाल इलेक्ट्रिक दोपहिया और तिपहिया वाहनों पर फोकस कर रही है। कंपनी ने कई प्रमुख वाहन निर्माताओं के साथ अपनी तकनीक की टेस्टिंग शुरू कर दी है। इसके अलावा, एक प्रमुख कमर्शियल थ्री-व्हीलर पावरट्रेन सप्लायर और भारत की अग्रणी यात्री वाहन कंपनियों के साथ भी तकनीकी सहयोग पर काम चल रहा है। कंपनी यूरोप के ऑटोमोबाइल उद्योग के साथ भी इस तकनीक को जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रही है। इस साल हजारों मोटर सप्लाई करने की तैयारी कंपनी का लक्ष्य इस वर्ष अपने उत्पादन को बढ़ाकर 1,000 से 10,000 मोटर तक पहुंचाने का है। इसके लिए Vimag Labs निवेश जुटाने की तैयारी भी कर रही है। कंपनी इससे पहले लगभग 5 मिलियन डॉलर की Series A फंडिंग हासिल कर चुकी है। भविष्य की योजना में शामिल है अपना चिप Vimag Labs भविष्य में अपने मोटर के लिए विशेष Application-Specific Integrated Circuit (ASIC) विकसित करने की योजना पर भी काम कर रही है। कंपनी का दावा है कि इससे मोटर के इलेक्ट्रॉनिक्स की लागत में उल्लेखनीय कमी आ सकती है और वैश्विक चिप सप्लाई पर निर्भरता भी घटेगी। साथ ही कंपनी इलेक्ट्रिक ट्रक, बसों और रक्षा क्षेत्र में इस तकनीक के उपयोग की संभावनाओं पर भी काम कर रही है। भारत के लिए क्यों अहम है यह तकनीक? विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तकनीक बड़े स्तर पर सफल होती है, तो भारत इलेक्ट्रिक वाहन निर्माण में आयातित रेयर अर्थ मैग्नेट पर अपनी निर्भरता कम कर सकता है। इससे सप्लाई चेन मजबूत होगी, उत्पादन लागत घटेगी और देश की डीप-टेक एवं इलेक्ट्रिक मोबिलिटी इंडस्ट्री को नई गति मिल सकती है।
ताइपे: ताइवान के आसपास एक बार फिर चीन की समुद्री गतिविधियां बढ़ गई हैं। ताइवान के राष्ट्रीय रक्षा मंत्रालय ने रविवार को बताया कि द्वीप के आसपास चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (PLAN) के 5 युद्धपोत और 10 सरकारी जहाज देखे गए। हालांकि इस दौरान किसी भी चीनी सैन्य विमान की गतिविधि दर्ज नहीं की गई। मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जारी बयान में कहा कि ताइवान के सशस्त्र बलों ने पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर रखी और स्थिति के अनुसार आवश्यक कदम उठाए। अधिकारियों के मुताबिक, किसी भी चीनी लड़ाकू विमान की मौजूदगी नहीं मिलने के कारण इस बार विमान संबंधी कोई अलग रिपोर्ट जारी नहीं की गई। पहले भी सामने आ चुकी हैं ऐसी गतिविधियां ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने इससे पहले भी अपने आसपास चीनी सैन्य विमान और नौसैनिक पोतों की मौजूदगी की जानकारी दी थी। हर बार ताइवान की सेना ने निगरानी बढ़ाते हुए स्थिति पर नजर रखी और आवश्यक सुरक्षा उपाय अपनाए। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की इस तरह की नियमित सैन्य और समुद्री गतिविधियां ताइवान पर दबाव बनाने की उसकी रणनीति का हिस्सा हैं। चीन ने अमेरिका से क्या कहा? इसी बीच, 3 जुलाई को चीन ने अमेरिका से ताइवान से जुड़े मामलों में अतिरिक्त सावधानी बरतने की अपील की थी। भारत में चीन के राजदूत जू फीहोंग के अनुसार, चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ बातचीत में दोनों देशों के बीच मतभेद कम करने और संबंधों को सही दिशा में आगे बढ़ाने पर जोर दिया। ताइवान को लेकर चीन का दावा चीन ताइवान को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है और लंबे समय से 'वन चाइना' नीति पर जोर देता रहा है। दूसरी ओर, ताइवान अपनी अलग सरकार, सेना और लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ स्वतंत्र रूप से प्रशासन चला रहा है। ताइवान की राजनीतिक स्थिति आज भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे संवेदनशील मुद्दों में शामिल है। यह विवाद संप्रभुता, आत्मनिर्णय और अंतरराष्ट्रीय कानून से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है। इतिहास से जुड़ा है विवाद चीन का ताइवान पर दावा 1683 से जुड़ा माना जाता है, जब किंग राजवंश ने मिंग समर्थक कोक्सिंगा को हराकर द्वीप पर नियंत्रण स्थापित किया था। इसके बाद से ताइवान की राजनीतिक स्थिति कई ऐतिहासिक और भू-राजनीतिक घटनाओं के कारण लगातार अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बनी हुई है।
बीजिंग: चीन की ब्रह्मपुत्र नदी (यारलुंग त्सांगपो) पर बन रही दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना को लेकर नई चिंताएं सामने आई हैं। चीनी वैज्ञानिकों की एक ताजा स्टडी में दावा किया गया है कि इस मेगा डैम के नीचे एक सक्रिय भूगर्भीय दरार (एक्टिव फॉल्ट लाइन) मौजूद है, जो भविष्य में परियोजना की सुरक्षा और मजबूती के लिए बड़ा खतरा बन सकती है। यह परियोजना भारत के अरुणाचल प्रदेश की सीमा के बेहद करीब बनाई जा रही है, इसलिए इस अध्ययन को रणनीतिक और पर्यावरणीय दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रिसर्च में क्या सामने आया? पिछले महीने चीनी जर्नल Sedimentary Geology and Tethyan Geology में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, 'पैझेन फॉल्ट' (Paizhen Fault) नामक भूगर्भीय दरार हिमयुग से लगातार सक्रिय रही है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इस क्षेत्र में लगातार भूगर्भीय गतिविधियों के कारण— चट्टानें कमजोर हो चुकी हैं, बड़े बांधों की नींव प्रभावित हो सकती है, सड़क, पुल, सुरंग और जलाशयों जैसी परियोजनाओं की स्थिरता पर खतरा बढ़ सकता है। इस अध्ययन की निगरानी चीन की सरकारी संस्था चाइना जियोलॉजिकल सर्वे ने की है, जिससे रिपोर्ट को विशेष महत्व दिया जा रहा है। बांध की सुरक्षा पर क्यों बढ़ी चिंता? वैज्ञानिकों के अनुसार, जिस इलाके में जलाशय बनाया जा रहा है, वहीं सक्रिय फॉल्ट लाइन मौजूद है। लगातार होने वाली भूगर्भीय हलचल भविष्य में संरचनात्मक जोखिम पैदा कर सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि भूकंप संभावित क्षेत्र में इतनी बड़ी जलविद्युत परियोजना का निर्माण अतिरिक्त इंजीनियरिंग चुनौतियां पैदा करता है। भारत के करीब बन रहा है मेगा डैम चीन यह विशाल बांध तिब्बत में उस स्थान पर बना रहा है, जहां यारलुंग त्सांगपो (ब्रह्मपुत्र) नदी अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करने से पहले एक बड़ा यू-टर्न लेती है। इसके बाद यही नदी भारत में ब्रह्मपुत्र और फिर बांग्लादेश में जमुना नदी के रूप में बहती है। इस भौगोलिक स्थिति के कारण भारत लंबे समय से इस परियोजना पर नजर बनाए हुए है। 167.8 अरब डॉलर की परियोजना चीन ने जुलाई 2025 में इस परियोजना का आधिकारिक निर्माण शुरू किया था। परियोजना की प्रमुख बातें: अनुमानित लागत: 167.8 अरब अमेरिकी डॉलर वार्षिक बिजली उत्पादन: 300 अरब किलोवाट-घंटे से अधिक दावा: 30 करोड़ से अधिक लोगों की बिजली जरूरतें पूरी होंगी यह दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में शामिल मानी जा रही है। भूकंप संभावित क्षेत्र में निर्माण परियोजना पूर्वी हिमालय के उस क्षेत्र में बनाई जा रही है जहां टेक्टोनिक प्लेटों की गतिविधियां लगातार होती रहती हैं। तिब्बती पठार भूकंप के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। ऐसे में वैज्ञानिकों का कहना है कि सक्रिय फॉल्ट लाइन को ध्यान में रखते हुए परियोजना की सुरक्षा और दीर्घकालिक स्थिरता का लगातार वैज्ञानिक मूल्यांकन आवश्यक होगा। चीन के दावे पर उठे सवाल चीन पहले दावा कर चुका है कि यह परियोजना क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को कम करने और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने में मदद करेगी। हालांकि, नई वैज्ञानिक रिपोर्ट के सामने आने के बाद इस दावे पर सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सक्रिय भूगर्भीय दरार वाले क्षेत्र में इतने बड़े बांध का निर्माण भविष्य में सुरक्षा संबंधी नई चुनौतियां पैदा कर सकता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। फीफा विश्व कप 2026 के क्वार्टर फाइनल में फ्रांस ने शानदार प्रदर्शन करते हुए मोरक्को को 2-0 से हराकर सेमीफाइनल में प्रवेश कर लिया। बोस्टन स्टेडियम में खेले गए इस मुकाबले में पहले हाफ में दोनों टीमें गोल नहीं कर सकीं। मोरक्को के गोलकीपर यासीन बोनो ने शुरुआती दबाव के बीच एक महत्वपूर्ण पेनल्टी बचाकर अपनी टीम को मुकाबले में बनाए रखा, लेकिन दूसरे हाफ में फ्रांस के आक्रामक खेल के सामने मोरक्को टिक नहीं सका। एम्बाप्पे ने खोला खाता, डेम्बेले ने जीत की मुहर लगाई फ्रांस की ओर से पहला गोल कप्तान किलियन एम्बाप्पे ने 60वें मिनट में किया। डेसिरे डौए के पास पर एम्बाप्पे ने तीन रक्षकों से घिरे होने के बावजूद शानदार कौशल का प्रदर्शन करते हुए दमदार शॉट लगाया, जिसे मोरक्को के गोलकीपर रोक नहीं सके। इसके महज छह मिनट बाद एम्बाप्पे ने ही उस्मान डेम्बेले को शानदार पास दिया, जिसे डेम्बेले ने गोल में बदलकर फ्रांस की बढ़त 2-0 कर दी। इस गोल के साथ फ्रांस ने मुकाबले पर पूरी तरह अपनी पकड़ मजबूत कर ली। गोल्डन बूट की दौड़ में मेसी की बराबरी पूरे मैच में फ्रांस का दबदबा साफ नजर आया। टीम ने कुल 22 शॉट लगाए, जिनमें नौ शॉट गोलपोस्ट पर रहे। दूसरी ओर मोरक्को केवल पांच शॉट ही लगा सका, जिनमें सिर्फ एक शॉट लक्ष्य पर था। फ्रांस की मजबूत रक्षा पंक्ति ने मोरक्को को ज्यादा अवसर नहीं दिए। इस जीत के साथ फ्रांस लगातार खिताब की दौड़ में बना हुआ है। वहीं, किलियन एम्बाप्पे ने इस विश्व कप में अपना आठवां गोल दागकर गोल्डन बूट की दौड़ में अर्जेंटीना के लियोनेल मेसी की बराबरी कर ली है। तीसरा विश्व कप खेल रहे एम्बाप्पे के अब विश्व कप इतिहास में 20 गोल हो चुके हैं, जबकि छह विश्व कप खेल चुके मेसी 21 गोल के साथ शीर्ष स्थान पर बने हुए हैं।
न्यूयॉर्क: अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र (UN) मुख्यालय के बाहर गुरुवार को एक व्यक्ति ने कथित तौर पर खुद को आग लगा ली। गंभीर रूप से झुलसे 52 वर्षीय व्यक्ति को तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। घटना के बाद इलाके में सुरक्षा बढ़ा दी गई और पुलिस ने जांच शुरू कर दी है। बौद्ध भिक्षु जैसे वस्त्र पहनकर पहुंचा था व्यक्ति प्रत्यक्षदर्शियों और सामने आए वीडियो के अनुसार, व्यक्ति पारंपरिक बौद्ध भिक्षु जैसे वस्त्र पहने हुए था। उसने पहले फुटपाथ पर तिब्बती झंडा रखा और फिर खुद को आग के हवाले कर दिया। कुछ ही सेकंड में वह सड़क पर गिर पड़ा। मौके पर मौजूद लोगों ने तुरंत पुलिस और आपातकालीन सेवाओं को सूचना दी। 'चीन तिब्बत छोड़ो' लिखे पर्चे बरामद न्यूयॉर्क पुलिस विभाग (NYPD) के अनुसार, घटनास्थल से "China Out of Tibet" (चीन तिब्बत छोड़ो) लिखे कई पर्चे बरामद किए गए हैं। शुरुआती जांच में घटना को तिब्बत से जुड़े विरोध प्रदर्शन से जोड़कर देखा जा रहा है, पुलिस ने अभी तक किसी आधिकारिक निष्कर्ष की पुष्टि नहीं की है। मृतक की पहचान फिलहाल सार्वजनिक नहीं की गई है, क्योंकि पहले उसके परिजनों को सूचना देना जरूरी है। 20 वर्षों से अमेरिका में रहने का दावा कुछ मीडिया रिपोर्टों में मृतक की पहचान लोबगा रांगजेन के रूप में की गई है। बताया गया है कि वह लगभग 20 वर्षों से अमेरिका में रह रहा था। अधिकारियों ने अभी तक इस पहचान की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। UN ने क्या कहा? संयुक्त राष्ट्र के प्रवक्ता ने बताया कि घटना उस समय हुई जब दिनभर की आधिकारिक बैठकें समाप्त हो चुकी थीं। इसलिए इस घटना का संयुक्त राष्ट्र के नियमित कामकाज पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। तिब्बत मुद्दे पर पहले भी हो चुके हैं आत्मदाह तिब्बत से जुड़े संगठनों के अनुसार, वर्ष 2009 से अब तक 150 से अधिक तिब्बती चीन के शासन के विरोध में आत्मदाह कर चुके हैं। इनमें बौद्ध भिक्षु, साध्वियां, छात्र, किसान और आम नागरिक शामिल रहे हैं। तिब्बती संगठनों का कहना है कि ऐसे विरोध प्रदर्शन धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक पहचान की रक्षा, तिब्बती भाषा के संरक्षण और दलाई लामा की तिब्बत वापसी जैसी मांगों से जुड़े रहे हैं। वहीं, चीन का आरोप है कि इन घटनाओं के पीछे निर्वासित तिब्बती नेतृत्व लोगों को उकसाता है। दूसरी ओर, निर्वासित तिब्बती प्रशासन इन आरोपों को खारिज करते हुए कहता है कि लोग चीन की नीतियों और बढ़ते सरकारी दबाव के विरोध में ऐसा कदम उठाते हैं। जांच जारी न्यूयॉर्क पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है। अधिकारी आत्मदाह के पीछे की परिस्थितियों, घटनास्थल से मिले दस्तावेजों और उपलब्ध वीडियो फुटेज की जांच कर रहे हैं। फिलहाल घटना के कारणों को लेकर कोई आधिकारिक निष्कर्ष जारी नहीं किया गया है।
बीजिंग/ढाका: चीन अब पाकिस्तान के बाद दक्षिण एशिया में अपनी रणनीतिक मौजूदगी और मजबूत करने की दिशा में एक और बड़ा कदम बढ़ा रहा है। चीन ने म्यांमार और बांग्लादेश के जरिए नए आर्थिक गलियारे (Economic Corridor) के निर्माण की योजना पर काम तेज कर दिया है। इस प्रस्तावित परियोजना का उद्देश्य सड़क, रेल और बंदरगाहों के नेटवर्क के माध्यम से चीन को सीधे बंगाल की खाड़ी से जोड़ना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह परियोजना आगे बढ़ती है तो इसका असर केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका क्षेत्रीय सामरिक संतुलन पर भी प्रभाव पड़ सकता है। क्या है चीन का नया इकोनॉमिक कॉरिडोर? रिपोर्टों के अनुसार, प्रस्तावित कॉरिडोर के तहत चीन के कुनमिंग शहर को म्यांमार के रास्ते बांग्लादेश के मोंगला बंदरगाह समेत अन्य प्रमुख समुद्री बंदरगाहों से जोड़ा जाएगा। इस परियोजना के जरिए चीन माल ढुलाई के लिए वैकल्पिक मार्ग विकसित करना चाहता है, साथ ही बंगाल की खाड़ी तक अपनी पहुंच को भी मजबूत करना चाहता है। बांग्लादेश-चीन वार्ता में हुई चर्चा हाल ही में चीन की यात्रा पर गए बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने इस परियोजना पर चीनी नेतृत्व के साथ विस्तृत चर्चा की। इसके बाद बांग्लादेश में चीन के राजदूत याओ वेन ने बताया कि दोनों देश आर्थिक सहयोग के साथ-साथ कूटनीतिक और रक्षा मामलों में '2+2 संवाद' की व्यवस्था विकसित करने पर भी सहमत हुए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में इस आर्थिक गलियारे में अन्य इच्छुक देशों की भागीदारी के लिए भी चीन खुला रुख अपनाएगा। CPEC की तर्ज पर नया प्रोजेक्ट विश्लेषकों के अनुसार, यह परियोजना काफी हद तक चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) की तर्ज पर तैयार की जा रही है। जिस तरह CPEC के माध्यम से चीन को पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के जरिए अरब सागर तक सीधी पहुंच मिली, उसी प्रकार नया कॉरिडोर चीन को बंगाल की खाड़ी तक एक वैकल्पिक संपर्क मार्ग उपलब्ध करा सकता है। भारत की रणनीतिक चिंता क्यों बढ़ी? भारत के लिए इस परियोजना का महत्व केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामरिक भी माना जा रहा है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, सड़क, रेल और बंदरगाह जैसी आधारभूत संरचनाओं का उपयोग सामान्य परिस्थितियों में व्यापार और परिवहन के लिए होता है, लेकिन किसी सैन्य या आपात स्थिति में इन्हीं मार्गों का इस्तेमाल सैनिकों, सैन्य उपकरणों और रसद की तेज आवाजाही के लिए भी किया जा सकता है। इसी कारण भारत इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती बुनियादी ढांचा परियोजनाओं और समुद्री पहुंच पर करीबी नजर बनाए हुए है। क्षेत्रीय समीकरणों पर रहेगी नजर चीन की यह पहल ऐसे समय सामने आई है जब दक्षिण एशिया और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। यदि यह परियोजना आगे बढ़ती है, तो इसका प्रभाव क्षेत्रीय व्यापार, कनेक्टिविटी और सुरक्षा समीकरणों पर पड़ सकता है। हालांकि, परियोजना के सभी पहलुओं और संभावित प्रभावों को लेकर अभी आगे की कूटनीतिक और तकनीकी प्रक्रियाएं बाकी हैं।
ढाका: तीस्ता नदी परियोजना को लेकर भारत की चिंताओं के बीच चीन ने पहली बार अपना आधिकारिक रुख स्पष्ट किया है। बांग्लादेश में चीन के राजदूत याओ वेन ने कहा कि चीन इस परियोजना में केवल बांग्लादेश के अनुरोध पर सहयोग कर रहा है और इसके पीछे उसका कोई अन्य रणनीतिक उद्देश्य नहीं है। ढाका स्थित चीनी दूतावास में आयोजित प्रेस वार्ता में याओ वेन ने कहा कि तीस्ता परियोजना पूरी तरह बांग्लादेश के विकास और वहां के लोगों की जरूरतों से जुड़ी है। उन्होंने कहा कि चीन इस परियोजना को सफल बनाने के लिए हरसंभव तकनीकी और आर्थिक सहयोग देने को तैयार है। तारिक रहमान की चीन यात्रा में रही तीस्ता परियोजना की चर्चा चीन के राजदूत का यह बयान बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की हालिया चीन यात्रा के बाद सामने आया है। इस दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच कई अहम परियोजनाओं पर चर्चा हुई, जिनमें तीस्ता नदी प्रबंधन परियोजना प्रमुख रही। याओ वेन ने कहा कि तीस्ता नदी के आसपास रहने वाले लाखों लोगों की आजीविका इस परियोजना से जुड़ी हुई है। ऐसे में चीन बांग्लादेश की जरूरतों के अनुरूप इस परियोजना में अधिकतम सहयोग देगा। यूनुस सरकार के समय हुए समझौते पर भी दी सफाई प्रेस वार्ता के दौरान जब पिछली अंतरिम सरकार के कार्यकाल में एक चीनी कंपनी और बांग्लादेशी संस्था के बीच हुए समझौता ज्ञापन (MoU) के बारे में सवाल पूछा गया तो याओ वेन ने कहा कि वह समझौता केवल एक कंपनी और सरकारी संस्था के बीच था। उन्होंने बताया कि अब परियोजना सरकार-स्तर पर आगे बढ़ रही है और चीन पहले विस्तृत सर्वेक्षण कराएगा, जिसके बाद आगे की प्रक्रिया तय होगी। भारत की चिंताओं पर क्या कहा? जब पत्रकारों ने पूछा कि भारत इस परियोजना को लेकर चिंता जता रहा है और यदि ऊपरी हिस्से से पर्याप्त पानी नहीं छोड़ा गया तो परियोजना पर क्या असर पड़ेगा, तो याओ वेन ने कहा कि यह चीन का विषय नहीं है। उन्होंने कहा, "चीन केवल बांग्लादेश की अपेक्षाओं के अनुरूप इस परियोजना में सहयोग कर रहा है। इसके अलावा हमारा कोई अन्य उद्देश्य या चिंता नहीं है।" बांग्लादेश-म्यांमार-चीन कॉरिडोर पर भी रखी बात याओ वेन ने बांग्लादेश-म्यांमार-चीन आर्थिक कॉरिडोर (BMCC) का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यह कोई नई अवधारणा नहीं है। करीब 15 वर्ष पहले चीन ने बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार (BCIM) आर्थिक कॉरिडोर का प्रस्ताव रखा था, लेकिन यह योजना अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सकी। भारत के लिए भी खुला रखा प्रस्ताव चीन के राजदूत ने कहा कि यदि भारत भविष्य में इस आर्थिक कॉरिडोर से जुड़ना चाहता है तो चीन उसका स्वागत करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसमें शामिल होना या नहीं होना पूरी तरह भारत का निर्णय होगा। उन्होंने कहा कि फिलहाल चीन बांग्लादेश और म्यांमार के साथ क्षेत्रीय संपर्क और आर्थिक सहयोग बढ़ाने की दिशा में प्रतिबद्धता के साथ काम कर रहा है। भारत की क्यों बढ़ी है चिंता? तीस्ता नदी पूर्वी हिमालय से निकलकर सिक्किम और पश्चिम बंगाल से होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है। नदी के जल बंटवारे और प्रबंधन का मुद्दा लंबे समय से भारत और बांग्लादेश के बीच चर्चा का विषय रहा है। भारत की चिंता इस बात को लेकर भी है कि प्रस्तावित परियोजना सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के निकट स्थित है, जिसे देश के पूर्वोत्तर राज्यों से संपर्क बनाए रखने के लिहाज से बेहद रणनीतिक क्षेत्र माना जाता है। ऐसे में इस परियोजना को क्षेत्रीय और सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
वॉशिंगटन: Steve Daines ने भारत की विश्वसनीयता की सराहना करते हुए चीन पर अप्रत्यक्ष निशाना साधा। उन्होंने कहा कि जब वह चीन की यात्रा करते हैं तो अपना मोबाइल फोन वॉशिंगटन में छोड़ देते हैं, लेकिन भारत आते समय वही फोन अपने साथ लेकर आते हैं। उनका यह बयान सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा का विषय बन गया है। भारत पर भरोसा, चीन को लेकर सतर्कता Steve Daines ने U.S.-India Strategic Partnership Forum के लीडरशिप समिट में कहा कि उनका यह व्यवहार दोनों देशों के प्रति भरोसे के स्तर को दर्शाता है। उन्होंने कहा, "जब मैं चीन जाता हूं, तो मेरा यह फोन मेरे साथ नहीं जाता। यह वॉशिंगटन में ही रहता है। लेकिन जब मैं दिल्ली या भारत के किसी भी शहर में आता हूं, तो यही फोन मेरे साथ होता है।" उनके अनुसार, यही एक विश्वसनीय मित्र और रणनीतिक साझेदार की पहचान है। भारत-अमेरिका मिलकर दे सकते हैं चीन को चुनौती सीनेटर डेंस ने कहा कि भारत और अमेरिका मिलकर तकनीक, नवाचार और उन्नत उद्योगों के क्षेत्र में चीन को प्रभावी चुनौती देने की क्षमता रखते हैं। उन्होंने कहा कि भारत की प्रतिभा और अमेरिका की तकनीकी क्षमता का संयोजन वैश्विक स्तर पर एक मजबूत और भरोसेमंद विकल्प तैयार कर सकता है। चीन से रिश्ते पूरी तरह खत्म नहीं हो सकते डेंस ने माना कि अमेरिका चीन के साथ अपने संबंध पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकता, लेकिन उसे आर्थिक और रणनीतिक जोखिम कम करने की दिशा में काम करना होगा। उनके मुताबिक, इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए भारत जैसे भरोसेमंद साझेदारों के साथ सहयोग बढ़ाना आवश्यक है। भारत-अमेरिका साझेदारी को बताया अहम सीनेटर ने कहा कि वॉशिंगटन में चीन से जुड़ी चुनौतियों पर लगातार चर्चा होती रहती है, लेकिन अब अमेरिका को यह तय करना होगा कि भविष्य में किन देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत किया जाए। उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच मजबूत संबंध केवल दोनों लोकतांत्रिक देशों के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता, आर्थिक विकास और तकनीकी सहयोग के लिए भी महत्वपूर्ण होंगे।
बीजिंग: चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भ्रष्टाचार और अनुशासनहीनता के खिलाफ जारी अभियान के तहत बड़ा कदम उठाते हुए नेशनल पीपल्स कांग्रेस (NPC) के 13 सदस्यों को उनके पदों से हटा दिया है। इनमें पीपल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के छह वरिष्ठ सैन्य अधिकारी भी शामिल हैं। इस कार्रवाई को चीनी सेना में चल रहे व्यापक भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का हिस्सा माना जा रहा है। NPC ने जारी की आधिकारिक अधिसूचना नेशनल पीपल्स कांग्रेस की ओर से जारी अधिसूचना में संबंधित अधिकारियों को पद से हटाने की पुष्टि की गई है। नोटिस में उनके खिलाफ कार्रवाई के विस्तृत कारणों का उल्लेख नहीं किया गया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लंबे समय से चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के तहत लिया गया है। किन अधिकारियों पर हुई कार्रवाई? पद से हटाए गए छह वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों में शामिल हैं— जनरल शू श्वेचियांग जनरल ली फेंगबियाओ जनरल गुओ पुशियाओ वांग कांगपिंग झांग मिंगहुआ यिन होंगशिंग ये अधिकारी पीएलए के विभिन्न महत्वपूर्ण विभागों और कमांड में अहम जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं, जिनमें थिएटर कमांड, साइबर स्पेस फोर्स और इक्विपमेंट डेवलपमेंट डिपार्टमेंट शामिल हैं। लंबे समय से सार्वजनिक कार्यक्रमों से थे गायब रिपोर्टों के अनुसार, इन अधिकारियों की गतिविधियों को लेकर काफी समय से सवाल उठ रहे थे। कई अधिकारी लंबे समय से महत्वपूर्ण सार्वजनिक कार्यक्रमों और आधिकारिक आयोजनों से भी अनुपस्थित थे, जिसके बाद उनके खिलाफ कार्रवाई की अटकलें तेज हो गई थीं। 2012 से जारी है भ्रष्टाचार विरोधी अभियान साल 2012 में सत्ता संभालने के बाद राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने चीन में व्यापक भ्रष्टाचार विरोधी अभियान शुरू किया था। इस अभियान के तहत अब तक हजारों सरकारी और सैन्य अधिकारियों के खिलाफ जांच और कार्रवाई की जा चुकी है। पिछले कुछ वर्षों में विशेष रूप से पीएलए के शीर्ष नेतृत्व और रक्षा प्रतिष्ठान से जुड़े कई वरिष्ठ अधिकारियों को भी भ्रष्टाचार और अनुशासनहीनता के आरोपों में पद से हटाया गया है। सेना पर नियंत्रण मजबूत करने की रणनीति विशेषज्ञों का मानना है कि इन कार्रवाइयों का उद्देश्य केवल भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना ही नहीं, बल्कि सेना पर केंद्रीय नेतृत्व का नियंत्रण और मजबूत करना भी है। शी जिनपिंग लगातार पीएलए को आधुनिक, अनुशासित और पार्टी के प्रति पूर्णतः जवाबदेह बनाने पर जोर देते रहे हैं। चीन सरकार ने इस ताजा कार्रवाई के पीछे के विशिष्ट कारणों का सार्वजनिक रूप से खुलासा नहीं किया है।
बीजिंग/नई दिल्ली: भारत की सुरक्षा चिंताओं के बीच चीन ने तीस्ता नदी परियोजना पर अपना रुख स्पष्ट किया है। चीन ने कहा है कि बांग्लादेश के साथ उसका सहयोग किसी तीसरे देश, विशेष रूप से भारत, को निशाना बनाकर नहीं किया जा रहा है। साथ ही उसने जोर देकर कहा कि दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंध किसी भी बाहरी प्रभाव से मुक्त होने चाहिए। तीस्ता परियोजना को चीन का खुला समर्थन बीजिंग में आयोजित नियमित प्रेस वार्ता के दौरान चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने कहा कि चीन बांग्लादेश की 'तीस्ता नदी व्यापक उपचार एवं पुनर्वास परियोजना' का समर्थन करने के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने कहा कि यह परियोजना आम लोगों की आजीविका से जुड़ी एक महत्वपूर्ण पहल है और बांग्लादेश सरकार इसे प्राथमिकता दे रही है। चीन इस परियोजना के जरिए दोनों देशों के बीच विकास सहयोग को और मजबूत करना चाहता है। आर्थिक और जल संसाधन क्षेत्रों में बढ़ेगा सहयोग गुओ जियाकुन ने कहा कि चीन और बांग्लादेश अपनी विकास रणनीतियों में बेहतर तालमेल स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने बताया कि दोनों देश अर्थव्यवस्था, व्यापार, जल संरक्षण और जनकल्याण जैसे क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार करने के इच्छुक हैं। भारत की आपत्तियों पर पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, "चीन-बांग्लादेश सहयोग किसी तीसरे पक्ष को लक्षित नहीं करता और इसे किसी भी बाहरी प्रभाव से मुक्त रखा जाना चाहिए।" भारत पहले ही जता चुका है आपत्ति भारत ने तीस्ता नदी से जुड़ी परियोजनाओं में चीन की संभावित भागीदारी पर पहले ही चिंता जताई है। नई दिल्ली का मानना है कि यह परियोजना भारत-बांग्लादेश सीमा के अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र के निकट स्थित है, इसलिए इसमें चीन की मौजूदगी सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकती है। क्यों अहम है तीस्ता नदी? तीस्ता नदी का उद्गम पूर्वी हिमालय में होता है। यह सिक्किम और पश्चिम बंगाल से होकर बांग्लादेश में प्रवेश करती है, जहां यह सिंचाई, कृषि और लाखों लोगों की आजीविका का प्रमुख स्रोत है। 'चिकन नेक' के कारण बढ़ी भारत की चिंता भारत की सबसे बड़ी चिंता यह है कि तीस्ता नदी परियोजना सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के बेहद करीब स्थित है। यह संकरा भूभाग भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्से से जोड़ने वाला एकमात्र स्थलीय संपर्क मार्ग है और सामरिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस क्षेत्र में चीन की वित्तीय, तकनीकी या बुनियादी ढांचा संबंधी मौजूदगी बढ़ती है, तो इसका असर भारत की सुरक्षा और क्षेत्रीय रणनीतिक संतुलन पर पड़ सकता है। इसी कारण भारत पूरे घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए है।
नई दिल्ली: दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डेटा सेंटर और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के तेजी से विस्तार के साथ बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रही है। इस बढ़ती जरूरत को पूरा करने के लिए देश बड़े पैमाने पर क्लीन एनर्जी (स्वच्छ ऊर्जा) की ओर बढ़ रहे हैं। हालांकि, इस वैश्विक बदलाव में चीन ने सोलर उपकरणों, बैटरियों और ऊर्जा भंडारण तकनीक की सप्लाई चेन पर मजबूत पकड़ बना ली है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बढ़ता दबदबा भारत जैसे देशों के लिए अवसर के साथ-साथ रणनीतिक चुनौती भी बन सकता है। क्लीन एनर्जी सप्लाई चेन में चीन की मजबूत स्थिति चीन आज वैश्विक स्तर पर कई प्रमुख क्लीन एनर्जी उत्पादों के निर्माण में अग्रणी है, जिनमें शामिल हैं— सोलर पैनल और फोटोवोल्टिक (PV) सेल लिथियम-आयन बैटरियां ग्रिड-स्केल एनर्जी स्टोरेज सिस्टम इलेक्ट्रिक वाहनों के बैटरी कंपोनेंट्स इसी वजह से दुनिया के कई देश अपने ऊर्जा प्रोजेक्ट्स के लिए चीनी उपकरणों पर निर्भर हैं। अमेरिका को भी बढ़ा निर्यात हालिया व्यापार आंकड़ों के अनुसार, चीन से अमेरिका को क्लीन एनर्जी उत्पादों का निर्यात बढ़ा है। मुख्य आंकड़े: सोलर सेल्स का निर्यात: 346% की वार्षिक वृद्धि लिथियम-आयन बैटरी निर्यात: 20.8% की बढ़ोतरी लेड-एसिड बैटरी निर्यात: 151% की वृद्धि यह दर्शाता है कि वैश्विक बाजार में चीनी उत्पादों की मांग बनी हुई है। क्यों बढ़ रही है क्लीन एनर्जी की मांग? विश्लेषकों के अनुसार इसके पीछे कई प्रमुख कारण हैं— AI और डेटा सेंटरों की बढ़ती बिजली खपत ऊर्जा सुरक्षा पर बढ़ता फोकस जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने की कोशिश सौर और बैटरी तकनीक की घटती लागत कुछ विश्लेषणों में पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बढ़ी चिंताओं को भी क्लीन एनर्जी की मांग बढ़ने का एक कारण माना गया है। भारत के लिए क्या है चुनौती? भारत तेजी से सौर ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन और बैटरी स्टोरेज क्षमता बढ़ा रहा है। सरकार ने घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित करने के लिए कई कदम उठाए हैं, जिनमें— PLI (Production Linked Incentive) योजना सोलर उपकरणों पर Basic Customs Duty (BCD) 'मेक इन इंडिया' अभियान शामिल हैं। इसके बावजूद, कई परियोजनाओं में अब भी चीनी सोलर सेल, मॉड्यूल और बैटरी कंपोनेंट्स का उपयोग किया जा रहा है, क्योंकि वे अक्सर लागत के लिहाज से अधिक प्रतिस्पर्धी माने जाते हैं। बढ़ती बिजली मांग से बढ़ेगा दबाव भारत में AI, क्लाउड कंप्यूटिंग और नए डेटा सेंटरों के विस्तार के कारण आने वाले वर्षों में बिजली की मांग लगातार बढ़ने की संभावना है। ऐसे में— अधिक सोलर क्षमता स्थापित करनी होगी। बड़े पैमाने पर बैटरी स्टोरेज सिस्टम विकसित करने होंगे। घरेलू विनिर्माण क्षमता को मजबूत करना होगा। आयात पर निर्भरता कम करनी होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत स्थानीय उत्पादन, अनुसंधान और सप्लाई चेन को मजबूत करने में सफल रहता है, तो वह इस चुनौती को अवसर में बदल सकता है।
बीजिंग: चीन की राजधानी बीजिंग में शुक्रवार दोपहर एक चौंकाने वाला हादसा सामने आया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक छोटा विमान शहर की सबसे ऊंची इमारतों में शामिल 109 मंजिला CITIC टावर (चाइना ज़ून) से टकरा गया। टक्कर के बाद इमारत के ऊपरी हिस्से से मलबा गिरने लगा, जिससे इलाके में अफरा-तफरी मच गई। घटना के तुरंत बाद प्रशासन ने इमारत को खाली कराते हुए जांच शुरू कर दी। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो हादसे के बाद सोशल मीडिया पर कई वीडियो और तस्वीरें तेजी से वायरल हुईं। इनमें टावर से मलबा गिरता दिखाई दिया। कुछ तस्वीरों में विमान की टेल का हिस्सा और पास खड़ी एक टैक्सी की क्षतिग्रस्त खिड़की भी नजर आई। एहतियात के तौर पर इमारत में मौजूद सभी लोगों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। घटनास्थल पर फायर ब्रिगेड, पुलिस और एंबुलेंस की कई टीमें पहुंचीं। टावर के आसपास सुरक्षा घेरा बनाकर राहत और जांच का काम शुरू किया गया। हल्के स्पोर्ट्स विमान की हुई पहचान मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ऑनलाइन उपलब्ध रजिस्ट्रेशन जानकारी के आधार पर विमान की पहचान Sunward SA 60L Aurora नामक हल्के स्पोर्ट्स विमान के रूप में की गई है। बताया जा रहा है कि यह विमान एक स्थानीय जनरल एविएशन कंपनी द्वारा संचालित किया जा रहा था। अधिकारियों ने अभी तक विमान की आधिकारिक पहचान या उसके मिशन से जुड़ी कोई पुष्टि नहीं की है। फ्लाइट ट्रैकिंग डेटा में दिखा असामान्य उड़ान मार्ग रिपोर्ट्स के मुताबिक, फ्लाइट ट्रैकिंग प्लेटफॉर्म Flightradar24 पर उपलब्ध डेटा में दावा किया गया है कि हादसे से पहले विमान ने सामान्य उड़ान मार्ग छोड़कर अलग दिशा में उड़ान भरी थी। इस दावे की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि विमान निर्धारित मार्ग से क्यों भटका और आखिर टावर से टकराने की वजह क्या रही। फिलहाल किसी बड़े नुकसान की पुष्टि नहीं प्रशासन की ओर से अभी तक किसी के हताहत होने या घायल होने की आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है। अधिकारियों का कहना है कि नुकसान का आकलन किया जा रहा है और विस्तृत जांच के बाद ही पूरी स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। बीजिंग में पहले से लागू हैं सख्त उड़ान नियम यह घटना ऐसे समय हुई है जब बीजिंग में ड्रोन और छोटे विमानों के संचालन को लेकर पहले से कड़े नियम लागू हैं। 1 मई से राजधानी के अधिकांश हिस्से को प्रभावी रूप से ड्रोन-फ्री जोन घोषित किया गया है। नियमों के तहत बिना सरकारी अनुमति ड्रोन खरीदने, किराये पर लेने या उड़ाने पर प्रतिबंध है। ऐसे में यह हादसा सुरक्षा एजेंसियों के लिए भी गंभीर जांच का विषय बन गया है। जांच जारी चीनी प्रशासन ने हादसे की विस्तृत जांच शुरू कर दी है। अधिकारी विमान के टावर से टकराने के कारण, उड़ान मार्ग, तकनीकी स्थिति और संभावित मानवीय या तकनीकी चूक की जांच कर रहे हैं। फिलहाल प्रशासन ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने और आधिकारिक जानकारी का इंतजार करने की अपील की है।
ताइपे/बीजिंग: एक ओर स्विट्जरलैंड में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने और मध्य पूर्व में शांति बहाल करने के लिए बातचीत जारी है, वहीं एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन ने ताइवान को लेकर नई रणनीति अपनानी शुरू कर दी है। ताइवान के एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी ने दावा किया है कि बीजिंग अब सीधे सैन्य टकराव के बजाय "हाइब्रिड युद्ध" (Hybrid Warfare) के जरिए ताइवान पर दबाव बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। ताइवान राष्ट्रीय सुरक्षा संस्थान के उप महासचिव हो चेंगहुई ने स्थानीय मीडिया से बातचीत में कहा कि चीन अपनी रणनीति में तटरक्षक बल, वैज्ञानिक अनुसंधान पोत, आर्थिक दबाव, दुष्प्रचार अभियान और मनोवैज्ञानिक रणनीतियों का इस्तेमाल कर रहा है। उनका कहना है कि बीजिंग बिना औपचारिक युद्ध छेड़े ताइवान की सुरक्षा और जनमत को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है। क्या होता है हाइब्रिड युद्ध? हाइब्रिड युद्ध ऐसी रणनीति है, जिसमें किसी देश पर दबाव बनाने के लिए सीधे सैन्य कार्रवाई के बजाय साइबर हमले, दुष्प्रचार, आर्थिक प्रतिबंध, राजनीतिक हस्तक्षेप, खुफिया अभियानों और कानूनी दावों जैसे गैर-पारंपरिक उपायों का इस्तेमाल किया जाता है। इसका उद्देश्य प्रतिद्वंद्वी देश को अंदर से कमजोर करना और अपने रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाना होता है। रूस-यूक्रेन और ईरान संघर्ष से सबक ले रहा चीन हो चेंगहुई के अनुसार, रूस-यूक्रेन युद्ध और ईरान से जुड़े हालिया घटनाक्रमों ने चीन को यह एहसास कराया है कि खुले युद्ध के जरिए राजनीतिक लक्ष्य हासिल करना कठिन और महंगा साबित हो सकता है। ऐसे में बीजिंग अब ऐसी रणनीतियों पर अधिक ध्यान दे रहा है, जो युद्ध की सीमा से नीचे रहकर भी प्रतिद्वंद्वी पर दबाव बना सकें। उन्होंने कहा कि चीन समुद्री दावों, तटरक्षक जहाजों की तैनाती और प्रचार अभियानों के माध्यम से ताइवान के साथ-साथ जापान और फिलीपींस जैसे क्षेत्रीय देशों पर भी कूटनीतिक दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। तटरक्षक बल बना चीन की नई रणनीति का हथियार ताइवान के सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि चीन का तटरक्षक बल उसकी हाइब्रिड रणनीति का सबसे अहम हिस्सा बन चुका है। चीनी जहाज विवादित समुद्री क्षेत्रों में लगातार गतिविधियां बढ़ा रहे हैं, जिससे अनिश्चितता और तनाव का माहौल पैदा हो रहा है। हो चेंगहुई ने ताइवान के विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ), ताइवान स्ट्रेट की मध्य रेखा और किनमेन-मात्सु द्वीपों के आसपास के समुद्री इलाकों को भविष्य में चीनी गतिविधियों का संभावित केंद्र बताया है। फिलीपींस मॉडल अपनाने की सलाह ताइवान के सुरक्षा विशेषज्ञों ने सरकार को फिलीपींस की "पूर्ण पारदर्शिता नीति" अपनाने की सलाह दी है। उनके अनुसार, फिलीपींस ने चीनी समुद्री घुसपैठ की घटनाओं को सार्वजनिक कर और उनका दस्तावेजीकरण करके बीजिंग के दुष्प्रचार का प्रभावी मुकाबला किया है। उन्होंने सुझाव दिया कि ताइवान भी अपने बाहरी द्वीपों के आसपास तटरक्षक गश्त का लाइव प्रसारण शुरू कर सकता है। साथ ही जापान और फिलीपींस के साथ खुफिया जानकारी साझा करने, संयुक्त समुद्री निगरानी और कानून प्रवर्तन सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका-ईरान वार्ता के बीच चीन की यह नई रणनीति एशिया-प्रशांत क्षेत्र में एक नए प्रकार की भू-राजनीतिक चुनौती को जन्म दे सकती है, जहां सीधे युद्ध के बजाय हाइब्रिड रणनीतियां भविष्य की प्रतिस्पर्धा का प्रमुख माध्यम बन सकती हैं।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में पाकिस्तान और चीन की एक महत्वपूर्ण पहल को कथित तौर पर झटका लगा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका ने बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) और उसकी सहयोगी इकाई मजीद ब्रिगेड को संयुक्त राष्ट्र की 1267 प्रतिबंध सूची में शामिल करने के प्रस्ताव को आगे बढ़ने से रोक दिया है। बताया जा रहा है कि पाकिस्तान और चीन ने सितंबर 2025 में संयुक्त रूप से यह प्रस्ताव पेश किया था। दोनों देशों का तर्क था कि BLA और मजीद ब्रिगेड क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हैं और इन्हें वैश्विक आतंकवादी संगठनों की सूची में शामिल किया जाना चाहिए। पाकिस्तान ने क्या कहा था? संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के स्थायी प्रतिनिधि आसिम इफ्तिखार अहमद ने दावा किया था कि BLA, मजीद ब्रिगेड, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) और अन्य उग्रवादी संगठन अफगानिस्तान में मौजूद ठिकानों से गतिविधियां संचालित कर रहे हैं। पाकिस्तान ने आरोप लगाया था कि इन संगठनों के लिए सीमा पार मौजूद ठिकाने हमलों और घुसपैठ के केंद्र बने हुए हैं। पाकिस्तान और चीन ने इसी आधार पर संयुक्त राष्ट्र की 1267 प्रतिबंध समिति से BLA और मजीद ब्रिगेड को आतंकवादी संगठनों की सूची में शामिल करने की मांग की थी। अमेरिका ने क्यों रोकी पहल? रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र की 1267 प्रतिबंध व्यवस्था के तहत किसी संगठन को सूचीबद्ध करने के लिए अल-कायदा, ISIS या उनसे जुड़े नेटवर्क के साथ स्पष्ट संबंधों के पर्याप्त साक्ष्य आवश्यक होते हैं। इसी आधार पर प्रस्ताव को तत्काल मंजूरी नहीं मिल सकी। सूत्रों के मुताबिक, ब्रिटेन और फ्रांस ने भी इस प्रस्ताव को लेकर आपत्तियां जताई थीं, जिसके चलते इसे आगे नहीं बढ़ाया जा सका। दिलचस्प है अमेरिकी रुख अमेरिका पहले ही BLA को अपने घरेलू कानूनों के तहत आतंकवादी संगठन घोषित कर चुका है। इसके बावजूद संयुक्त राष्ट्र स्तर पर उसे प्रतिबंधित करने के मामले में वॉशिंगटन ने अतिरिक्त साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रियाओं की आवश्यकता बताई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटनाक्रम अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद से जुड़े मामलों में विभिन्न देशों के अलग-अलग दृष्टिकोण को दर्शाता है। पाकिस्तान के लिए क्या मायने? यदि रिपोर्ट्स सही हैं, तो यह पाकिस्तान और चीन की उस कोशिश के लिए झटका माना जा सकता है जिसके जरिए दोनों देश BLA के खिलाफ वैश्विक स्तर पर कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित करना चाहते थे। अभी तक संयुक्त राष्ट्र की ओर से इस विषय पर कोई विस्तृत सार्वजनिक टिप्पणी सामने नहीं आई है। इसलिए मामले को लेकर अंतिम स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार किया जा रहा है।
चीन के राष्ट्रपति Xi Jinping अगले सप्ताह उत्तर कोरिया की राजधानी Pyongyang का दौरा करेंगे। सात वर्षों बाद होने जा रही यह यात्रा चीन और उत्तर कोरिया के संबंधों के लिए अहम मानी जा रही है। चीनी सरकारी मीडिया के अनुसार, शी जिनपिंग 8 और 9 जून को उत्तर कोरिया के नेता Kim Jong Un के निमंत्रण पर राजकीय यात्रा पर रहेंगे। इस दौरान दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। परमाणु कार्यक्रम पर हो सकती है अहम बातचीत इस दौरे की घोषणा ऐसे समय हुई है जब उत्तर कोरिया ने हाल ही में एक नई सुविधा का खुलासा किया है, जिसे परमाणु हथियार कार्यक्रम से जुड़ा माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्योंगयांग के परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा और पूर्वी एशिया की रणनीतिक स्थिति पर दोनों नेताओं के बीच विस्तृत चर्चा हो सकती है। उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षणों को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय पहले से चिंता जताता रहा है। रूस-उत्तर कोरिया की बढ़ती नजदीकियां भी चर्चा में हाल के वर्षों में उत्तर कोरिया और रूस के बीच संबंध तेजी से मजबूत हुए हैं। रक्षा सहयोग, सैन्य संपर्क और विभिन्न रणनीतिक समझौतों ने दोनों देशों को और करीब लाया है। विश्लेषकों का मानना है कि चीन यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उत्तर कोरिया पर उसका पारंपरिक प्रभाव बरकरार रहे। ऐसे में शी जिनपिंग की यह यात्रा केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन से भी जुड़ी हुई मानी जा रही है। बीजिंग के लिए क्यों महत्वपूर्ण है प्योंगयांग? चीन लंबे समय से उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा आर्थिक और राजनीतिक सहयोगी रहा है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और वैश्विक दबावों के बीच बीजिंग ने कई मौकों पर प्योंगयांग का समर्थन किया है। चीन के लिए उत्तर कोरिया केवल पड़ोसी देश नहीं, बल्कि पूर्वी एशिया में उसकी रणनीतिक सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। इसलिए कोरियाई प्रायद्वीप में स्थिरता बनाए रखना बीजिंग की प्राथमिकताओं में शामिल है। अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया की भी नजर शी जिनपिंग की यात्रा पर अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया समेत कई देशों की करीबी नजर रहेगी। इन देशों को आशंका है कि चीन और उत्तर कोरिया के बीच बढ़ता सहयोग क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस दौरे के बाद परमाणु नीति, सैन्य सहयोग और क्षेत्रीय रणनीति को लेकर नए संकेत मिल सकते हैं। 2019 के बाद पहली उत्तर कोरिया यात्रा शी जिनपिंग इससे पहले वर्ष 2019 में उत्तर कोरिया गए थे। उससे पहले किसी चीनी राष्ट्रपति की प्योंगयांग यात्रा 2005 में हुई थी। ऐसे में सात साल बाद होने वाली यह यात्रा दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संपर्क को नई दिशा देने वाली मानी जा रही है। क्षेत्रीय राजनीति में बढ़ सकती है नई हलचल पूर्वी एशिया में बदलते भू-राजनीतिक हालात, रूस-उत्तर कोरिया संबंधों की मजबूती और उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम के बीच शी जिनपिंग का प्योंगयांग दौरा अंतरराष्ट्रीय राजनीति की महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जा रहा है। अब दुनिया की नजर इस बात पर होगी कि इस मुलाकात से चीन-उत्तर कोरिया साझेदारी को नई मजबूती मिलती है या फिर क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में कोई नया संदेश सामने आता है।
बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान अपनी पहली विदेश यात्रा को लेकर चर्चा में हैं। फरवरी 2026 में सत्ता संभालने के बाद वह पहली बार किसी विदेशी दौरे पर जा रहे हैं, लेकिन उनकी पहली मंजिल न तो भारत है और न ही चीन। इसके बजाय उन्होंने पहले मलेशिया जाने का फैसला किया है। इसके बाद वह चीन का दौरा करेंगे। ढाका ने बदली रणनीति, चीन से पहले तय किया कुआलालंपुर का कार्यक्रम मई 2026 में बांग्लादेशी मीडिया में खबरें आई थीं कि तारिक रहमान सीधे चीन जा सकते हैं। बाद में सरकार ने 21-22 जून को मलेशिया और उसके बाद 23 जून से चीन यात्रा का कार्यक्रम तय किया। विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को ध्यान में रखकर लिया गया है। भारत और चीन के बीच संतुलन साधने की कोशिश में नई सरकार बांग्लादेश सरकार नहीं चाहती कि उसकी पहली विदेश यात्रा को किसी एक शक्ति केंद्र के प्रति झुकाव के रूप में देखा जाए। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, बीएनपी सरकार की 'बांग्लादेश फर्स्ट' नीति इसी संतुलन को दर्शाती है। कुआलालंपुर क्यों बना पहली पसंद? मलेशिया एक मुस्लिम बहुल देश होने के साथ-साथ बांग्लादेश का महत्वपूर्ण आर्थिक और सामाजिक साझेदार भी है। वहां बड़ी संख्या में बांग्लादेशी नागरिक काम और पढ़ाई कर रहे हैं। इसलिए पहली यात्रा के लिए मलेशिया अपेक्षाकृत सुरक्षित और कम विवादास्पद विकल्प माना गया। नई दिल्ली ने पहले ही बढ़ाया था रिश्तों का हाथ फरवरी 2026 में शपथ ग्रहण के दौरान भारत की ओर से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला शामिल हुए थे। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संदेश और भारत आने का निमंत्रण भी सौंपा था। इसे दोनों देशों के संबंधों को नया आयाम देने की कोशिश माना गया था। मलेशिया दौरे में प्रवासी श्रमिकों और निवेश पर रहेगा फोकस कुआलालंपुर यात्रा के दौरान प्रवासी बांग्लादेशी कामगारों के हित, शिक्षा सहयोग, व्यापार, निवेश और रोजगार के अवसरों पर चर्चा होने की संभावना है। मलेशिया में लाखों बांग्लादेशी नागरिक कार्यरत हैं। बीजिंग यात्रा पर टिकी क्षेत्रीय कूटनीति की नजरें मलेशिया के बाद होने वाला चीन दौरा ज्यादा रणनीतिक माना जा रहा है। चीन बांग्लादेश का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदारों में से एक है और दोनों देशों के बीच कई बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट लंबित हैं। तीस्ता परियोजना पर भारत की चिंता बढ़ा सकता है चीन-बांग्लादेश संवाद रिपोर्टों के अनुसार, चीन यात्रा के दौरान तीस्ता नदी प्रबंधन परियोजना पर चर्चा हो सकती है। यह परियोजना भारत के लिए भी संवेदनशील मानी जाती है क्योंकि इसका संबंध भारत-बांग्लादेश जल बंटवारे और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। ढाका की नई विदेश नीति का पहला बड़ा परीक्षण तारिक रहमान की पहली विदेश यात्रा को केवल एक राजनयिक कार्यक्रम नहीं बल्कि बांग्लादेश की नई विदेश नीति की दिशा तय करने वाले कदम के रूप में देखा जा रहा है। मलेशिया और चीन के दौरे से यह स्पष्ट होगा कि ढाका आने वाले वर्षों में क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों के बीच किस तरह संतुलन बनाकर चलना चाहता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।