इस्लामाबाद/नई दिल्ली: पाकिस्तान ने पिछले 16 महीनों में अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम को अभूतपूर्व गति देते हुए छह नए अर्थ-ऑब्जर्वेशन (पृथ्वी अवलोकन) सैटेलाइट लॉन्च किए हैं। सुरक्षा और अंतरिक्ष मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि इन उपग्रहों ने पाकिस्तान की निगरानी क्षमता को पहले की तुलना में काफी मजबूत बना दिया है। रिपोर्टों के अनुसार, इनमें से कई सैटेलाइट भारत, विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर और उत्तरी सीमावर्ती क्षेत्रों की बार-बार निगरानी करने में सक्षम हैं। इस तेज विस्तार में चीन की तकनीकी और प्रक्षेपण सहायता को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 16 महीनों में छह नए मिशन रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2025 से जून 2026 के बीच पाकिस्तान ने छह प्रमुख अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजे हैं। इनमें PAUSAT-1, PRSC-EO1, PRSS-2, HS-1, PRSC-EO2 और PRSC-EO3 शामिल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इतने कम समय में लगातार छह सैटेलाइट मिशनों का सफल संचालन पाकिस्तान के अंतरिक्ष कार्यक्रम में एक बड़े बदलाव का संकेत देता है। यह विस्तार ऐसे समय में हुआ है जब दक्षिण एशिया में सामरिक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। नागरिक परियोजना या रणनीतिक निगरानी? पाकिस्तान की अंतरिक्ष एजेंसी सुपारको (SUPARCO) इन उपग्रहों को कृषि, पर्यावरण अध्ययन, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और आपदा निगरानी जैसी नागरिक आवश्यकताओं से जुड़ा बताती रही है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट्स आमतौर पर दोहरे उपयोग (Dual-Use) की क्षमता रखते हैं। यानी इन्हें नागरिक उद्देश्यों के साथ-साथ सैन्य और रणनीतिक निगरानी के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। कौन-कौन से सैटेलाइट हुए लॉन्च? PAUSAT-1: शुरुआत जनवरी 2025 में 14 जनवरी 2025 को पाकिस्तान ने PAUSAT-1 लॉन्च किया। यह एक अर्थ-ऑब्जर्वेशन क्यूबसैट है जिसे पृथ्वी की निम्न कक्षा में स्थापित किया गया। PRSC-EO1: तीन दिन बाद दूसरा मिशन 17 जनवरी 2025 को PRSC-EO1 लॉन्च किया गया। इसका उद्देश्य भू-स्थानिक डेटा एकत्र करना और पृथ्वी की सतह की निगरानी करना बताया गया। PRSS-2: हाई-रिजॉल्यूशन इमेजिंग क्षमता जुलाई 2025 में लॉन्च किया गया PRSS-2 उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरें लेने में सक्षम माना जाता है। इससे जमीन पर होने वाली गतिविधियों की अधिक स्पष्ट निगरानी संभव होती है। HS-1: पहला हाइपरस्पेक्ट्रल सैटेलाइट अक्टूबर 2025 में पाकिस्तान ने HS-1 लॉन्च किया, जिसे उसका पहला हाइपरस्पेक्ट्रल अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट बताया गया। यह विभिन्न तरंगदैर्घ्यों पर डेटा एकत्र कर जमीन पर मौजूद वस्तुओं और संरचनाओं की बेहतर पहचान करने में सक्षम है। PRSC-EO2 और PRSC-EO3 फरवरी और अप्रैल 2026 में लॉन्च किए गए PRSC-EO2 और PRSC-EO3 को पाकिस्तान के पृथ्वी अवलोकन कार्यक्रम का अगला चरण माना जा रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, PRSC-EO3 की कक्षा को विशेष रूप से अधिक निगरानी क्षमता प्रदान करने के लिए डिजाइन किया गया है। जम्मू-कश्मीर पर विशेष फोकस? रिपोर्ट में सबसे अधिक चर्चा PRSC-EO3 को लेकर की गई है। दावा किया गया है कि इसे ऐसी कक्षा में स्थापित किया गया है, जिससे दक्षिण एशिया के कुछ क्षेत्रों, खासकर जम्मू-कश्मीर और उत्तरी भारत के ऊपर अधिक बार निगरानी संभव हो सके। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी क्षेत्र की बार-बार तस्वीरें लेने की क्षमता से सीमावर्ती गतिविधियों, बुनियादी ढांचे में बदलाव और सैन्य तैनाती पर लगातार नजर रखना आसान हो जाता है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। आधुनिक तकनीक से लैस हैं नए उपग्रह रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के हालिया सैटेलाइट मिशनों में हाई-रिजॉल्यूशन ऑप्टिकल इमेजिंग, हाइपरस्पेक्ट्रल सेंसर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित डेटा विश्लेषण जैसी उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। इन तकनीकों की मदद से बड़े पैमाने पर डेटा संग्रहण, गतिविधियों की पहचान और विस्तृत भू-स्थानिक विश्लेषण संभव हो सकता है। 1961 के बाद सबसे तेज विस्तार पाकिस्तान की अंतरिक्ष एजेंसी सुपारको की स्थापना 1961 में हुई थी। रिपोर्ट के अनुसार, स्थापना के बाद से पाकिस्तान ने कुल 15 सैटेलाइट मिशन संचालित किए हैं। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से छह मिशन केवल पिछले 16 महीनों में पूरे किए गए हैं। विशेषज्ञ इसे पाकिस्तान के अंतरिक्ष कार्यक्रम का सबसे तेज विस्तार मान रहे हैं। चीन बना सबसे बड़ा सहयोगी हाल के अधिकांश पाकिस्तानी सैटेलाइट मिशनों में चीन की भूमिका प्रमुख रही है। कई उपग्रहों को चीनी रॉकेटों की सहायता से लॉन्च किया गया, जबकि कुछ परियोजनाएं संयुक्त तकनीकी सहयोग के तहत विकसित की गईं। विश्लेषकों का मानना है कि चीन के सहयोग के बिना इतने कम समय में इस स्तर का विस्तार संभव नहीं होता। यही कारण है कि पाकिस्तान-चीन अंतरिक्ष सहयोग को क्षेत्रीय रणनीतिक समीकरणों के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह घटनाक्रम? विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक युद्ध और राष्ट्रीय सुरक्षा में अंतरिक्ष आधारित निगरानी की भूमिका लगातार बढ़ रही है। सीमाओं की निगरानी, सैन्य गतिविधियों का आकलन, संचार नेटवर्क और वास्तविक समय की खुफिया जानकारी जुटाने में सैटेलाइट्स की अहम भूमिका होती है। ऐसे में पाकिस्तान की बढ़ती अंतरिक्ष निगरानी क्षमता को भारत के रणनीतिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि भारत को भी अपनी पृथ्वी अवलोकन, संचार और निगरानी उपग्रह क्षमताओं को लगातार मजबूत बनाए रखना होगा। भविष्य की सामरिक प्रतिस्पर्धा का नया मोर्चा विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले वर्षों में अंतरिक्ष केवल वैज्ञानिक अनुसंधान का क्षेत्र नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक प्रतिस्पर्धा का प्रमुख मंच भी बनेगा। पाकिस्तान के हालिया सैटेलाइट मिशन इस बात का संकेत हैं कि दक्षिण एशिया में अंतरिक्ष आधारित निगरानी और खुफिया क्षमताओं की दौड़ अब और तेज होने वाली है।
हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच श्रीलंका के कोलंबो बंदरगाह पर एक दुर्लभ स्थिति देखने को मिली। भारत और पाकिस्तान के युद्धपोत एक ही दिन कोलंबो पहुंचे, जिससे क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक समीकरणों को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। श्रीलंकाई नौसेना के मुताबिक पाकिस्तान नौसेना के युद्धपोत पीएनएस तैमूर, पीएनएस असलात और पनडुब्बी पीएनएस/एम हैंगोर 1 जून को कोलंबो पहुंचे। लगभग उसी समय भारतीय नौसेना का युद्धपोत आईएनएस ऐरावत भी बंदरगाह पर पहुंचा। भारत का दौरा नियमित नौसैनिक कार्यक्रम का हिस्सा भारतीय नौसेना ने स्पष्ट किया है कि आईएनएस ऐरावत की यात्रा एक नियमित ऑपरेशनल मिशन के तहत की गई है। इस दौरान जहाज को आवश्यक रसद और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई जाएगी। इसके अलावा भारतीय नौसैनिक दल श्रीलंकाई नौसेना के साथ कई पेशेवर और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेगा। जहाज 4 जून तक कोलंबो में तैनात रहेगा। भारत ने इस यात्रा को अपनी ‘नेबरहुड फर्स्ट’ और ‘महासागर’ नीति के तहत क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करने की पहल बताया है। पाकिस्तानी बेड़े में शामिल रही चीन निर्मित आधुनिक पनडुब्बी पाकिस्तान की ओर से कोलंबो पहुंचे नौसैनिक समूह में दो युद्धपोतों के साथ पनडुब्बी पीएनएस/एम हैंगोर भी शामिल रही। यही पनडुब्बी इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चर्चित हिस्सा बनी हुई है। बताया जा रहा है कि हैंगोर श्रेणी की यह पनडुब्बी चीन की सहायता से विकसित की गई है और इसे पाकिस्तान की समुद्री क्षमता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह पनडुब्बी लंबी दूरी की मिसाइलें दागने में सक्षम है। श्रीलंका नौसेना के साथ होंगे संयुक्त कार्यक्रम पाकिस्तानी नौसेना ने इस यात्रा को सद्भावना और लॉजिस्टिक सपोर्ट मिशन बताया है। इस दौरान पाकिस्तानी नौसैनिक अधिकारी श्रीलंका के विभिन्न स्थलों का दौरा करेंगे और दोनों देशों की नौसेनाओं के बीच कई संयुक्त गतिविधियां आयोजित की जाएंगी। श्रीलंकाई नौसेना ने यह भी जानकारी दी है कि पाकिस्तानी जहाज पश्चिमी समुद्री क्षेत्र में एक संयुक्त समुद्री अभ्यास में भाग लेंगे। हिंद महासागर में चीन की बढ़ती मौजूदगी पर फिर चर्चा भारत और पाकिस्तान के जहाजों की एक साथ मौजूदगी ने चीन की हिंद महासागर रणनीति को लेकर भी बहस तेज कर दी है। पिछले कुछ वर्षों में चीन ने इस क्षेत्र में अपने आर्थिक और सामरिक प्रभाव का विस्तार किया है। पाकिस्तान का Gwadar Port और श्रीलंका का Hambantota Port अक्सर चीन की समुद्री रणनीति के महत्वपूर्ण केंद्रों के रूप में देखे जाते हैं। इसके अलावा China-Pakistan Economic Corridor भी क्षेत्रीय संपर्क और समुद्री पहुंच को मजबूत करने की व्यापक योजना का हिस्सा माना जाता है। श्रीलंका ने साधा संतुलन का रास्ता श्रीलंका लंबे समय से भारत, चीन और पाकिस्तान के बीच संतुलित संबंध बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। एक ओर भारत उसका प्रमुख सुरक्षा और आर्थिक साझेदार है, वहीं दूसरी ओर कोलंबो चीन और पाकिस्तान के साथ भी अपने रिश्तों को मजबूत बनाए रखना चाहता है। इसी नीति के तहत श्रीलंका ने दोनों देशों के नौसैनिक जहाजों का स्वागत किया है और किसी भी पक्ष के प्रति झुकाव दिखाने से बचा है। भारत के लिए क्यों अहम है यह घटनाक्रम? रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि भारत के लिए यह घटनाक्रम केवल एक नियमित बंदरगाह यात्रा नहीं है। पाकिस्तान की नौसेना में शामिल नई चीनी पनडुब्बियों और हिंद महासागर में बढ़ती चीन-पाकिस्तान साझेदारी पर भारत की नजर बनी हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार क्षेत्र में बदलते रणनीतिक हालात भारत को अपनी समुद्री सुरक्षा, साझेदारियों और निगरानी क्षमताओं को और मजबूत करने की आवश्यकता की याद दिलाते हैं। क्षेत्रीय शक्ति संतुलन का नया संकेत कोलंबो बंदरगाह पर भारत और पाकिस्तान के युद्धपोतों की एक साथ मौजूदगी ने यह संकेत दिया है कि हिंद महासागर आने वाले वर्षों में वैश्विक और क्षेत्रीय शक्तियों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का प्रमुख केंद्र बना रहेगा। ऐसे में श्रीलंका जैसे देशों की भूमिका भी पहले से अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।