Vunakizumab यानी वुनाकिजुमैब को लेकर हुए बड़े क्लीनिकल परीक्षण में उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं। शोध के अनुसार यह नई दवा सक्रिय रेडियोग्राफिक एक्सियल स्पॉन्डिलोआर्थराइटिस यानी Axial Spondyloarthritis के मरीजों में लक्षणों को कम करने और लंबे समय तक नियंत्रण बनाए रखने में प्रभावी साबित हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह दवा उन मरीजों के लिए नई उम्मीद बन सकती है, जिन्हें मौजूदा उपचारों से पर्याप्त राहत नहीं मिल पा रही है। क्या है एक्सियल स्पॉन्डिलोआर्थराइटिस? Axial Spondyloarthritis एक सूजन संबंधी बीमारी है, जो मुख्य रूप से रीढ़ की हड्डी और शरीर के बड़े जोड़ों को प्रभावित करती है। इसके कारण पीठ दर्द, अकड़न और चलने-फिरने में परेशानी हो सकती है। रेडियोग्राफिक एक्सियल स्पॉन्डिलोआर्थराइटिस को सामान्य रूप से एंकायलोजिंग स्पॉन्डिलाइटिस भी कहा जाता है। यह बीमारी लंबे समय में रीढ़ की हड्डियों को प्रभावित कर सकती है और मरीज के जीवन की गुणवत्ता पर गंभीर असर डाल सकती है। इंटरल्यूकिन-17 को निशाना बनाकर काम करती है दवा Vunakizumab एक नई मोनोक्लोनल एंटीबॉडी दवा है, जो इंटरल्यूकिन-17ए नामक सूजन बढ़ाने वाले प्रोटीन को निशाना बनाती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इंटरल्यूकिन-17 शरीर में सूजन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में इसे नियंत्रित करने से एक्सियल स्पॉन्डिलोआर्थराइटिस जैसी बीमारियों के लक्षणों को कम किया जा सकता है। चीन के 38 अस्पतालों में हुआ बड़ा परीक्षण यह फेज-2 से फेज-3 तक का यादृच्छिक, डबल-ब्लाइंड और प्लेसीबो-नियंत्रित क्लीनिकल परीक्षण था, जिसे जून 2021 से मार्च 2023 के बीच चीन के 38 अस्पतालों में आयोजित किया गया। अध्ययन में 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के 548 मरीजों को शामिल किया गया, जिन्हें सक्रिय रेडियोग्राफिक Axial Spondyloarthritis था। शोध के दौरान मरीजों को अलग-अलग समूहों में बांटकर या तो वुनाकिजुमैब की खुराक दी गई या प्लेसीबो दिया गया। बाद में 120 मिलीग्राम की खुराक को सबसे उपयुक्त माना गया। मरीजों में दिखा बेहतर चिकित्सीय सुधार 16 सप्ताह बाद परीक्षण के नतीजों में पाया गया कि वुनाकिजुमैब लेने वाले मरीजों में लक्षणों में स्पष्ट सुधार हुआ। एएसएएस20 प्रतिक्रिया दर वुनाकिजुमैब समूह में 65.6 प्रतिशत रही, जबकि प्लेसीबो समूह में यह 42.5 प्रतिशत थी। इसी तरह एएसएएस40 प्रतिक्रिया भी दवा लेने वाले मरीजों में अधिक देखी गई। शोधकर्ताओं के अनुसार मरीजों में सुधार 32 सप्ताह तक बना रहा, जो इस दवा की लंबे समय तक प्रभावी रहने की क्षमता को दर्शाता है। सुरक्षा प्रोफाइल भी रही संतोषजनक अध्ययन में यह भी पाया गया कि Vunakizumab का सुरक्षा प्रोफाइल प्लेसीबो के समान रहा। दवा लेने वाले अधिकांश मरीजों में गंभीर दुष्प्रभाव नहीं देखे गए। विशेषज्ञों का कहना है कि यह परिणाम भविष्य में इस दवा को इंटरल्यूकिन-17 आधारित सूजन संबंधी बीमारियों के इलाज में उपयोगी विकल्प बना सकते हैं। भविष्य में मिल सकता है नया उपचार विकल्प शोधकर्ताओं का मानना है कि वुनाकिजुमैब एक्सियल स्पॉन्डिलोआर्थराइटिस के मरीजों के लिए भविष्य में एक महत्वपूर्ण उपचार विकल्प बन सकता है, खासकर उन लोगों के लिए जिन्हें मौजूदा दवाओं से सीमित लाभ मिलता है। हालांकि विशेषज्ञों ने कहा कि विभिन्न देशों और आबादी पर आगे और अध्ययन किए जाने की आवश्यकता होगी, ताकि इसके दीर्घकालिक प्रभाव और सुरक्षा को बेहतर तरीके से समझा जा सके।
कैंसर उपचार के क्षेत्र में एक नई रिसर्च ने ALK-ड्रिवन न्यूरोब्लास्टोमा (ALK driven neuroblastoma) के इलाज में उम्मीदें बढ़ा दी हैं। नए प्रारंभिक क्लिनिकल डेटा के अनुसार दवा Lorlatinib ने कुछ खास आनुवंशिक (genetic) प्रोफाइल वाले मरीजों में काफी अच्छा प्रभाव दिखाया है। यह अध्ययन 25 मरीजों के एक समूह पर आधारित है, जिसमें ALK जीन म्यूटेशन से जुड़े हाई-रिस्क न्यूरोब्लास्टोमा के मरीज शामिल थे। अध्ययन में क्या पाया गया? शोधकर्ताओं के अनुसार 17 मूल्यांकन योग्य मरीजों में: 64.7% मरीजों में ट्यूमर में स्पष्ट सुधार (objective response) देखा गया 11 में से 17 मरीजों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी सबसे उल्लेखनीय परिणाम उन मरीजों में मिले जिनमें ALK hotspot mutation पाया गया: इन मरीजों में 100% रिस्पॉन्स रेट दर्ज किया गया शुरुआती इलाज में भी दिखा असर अध्ययन में यह भी देखा गया कि जिन 6 मरीजों को कीमोथेरेपी के साथ Lorlatinib दिया गया, उन सभी में इलाज के सकारात्मक परिणाम मिले। इससे संकेत मिलता है कि यह दवा शुरुआती (frontline) उपचार रणनीति में भी उपयोगी हो सकती है। जेनेटिक प्रोफाइल के अनुसार अलग-अलग असर रिसर्च में यह भी सामने आया कि हर मरीज पर दवा का असर एक जैसा नहीं था। ALK hotspot mutation वाले मरीजों में सबसे बेहतर परिणाम MYCN amplification या rare ALK mutations वाले मरीजों में केवल 25% रिस्पॉन्स कुछ मामलों में दवा का असर काफी सीमित रहा यह स्पष्ट करता है कि ट्यूमर की जेनेटिक संरचना इलाज की सफलता में अहम भूमिका निभाती है। दवा प्रतिरोध (Resistance) और जटिलताएं शोधकर्ताओं ने कुछ मामलों में दवा के प्रति प्रतिरोध के संकेत भी देखे, जिनमें: BRAF fusions MET amplification NF1 mutations हालांकि, इन मैकेनिज्म की पूरी पुष्टि अभी बाकी है। सुरक्षा को लेकर चिंता भी सामने आई अध्ययन में यह भी पाया गया कि कुछ मरीजों में: फेफड़ों से जुड़ी जटिलताएं (pulmonary toxicity) देखी गईं खासकर जब Lorlatinib को इम्यूनोथेरेपी या कीमोथेरेपी के साथ दिया गया इससे संकेत मिलता है कि प्रभावशाली होने के बावजूद दवा के सुरक्षा पहलुओं पर और शोध जरूरी है।
Dupilumab पर हुई एक नई स्टडी में सामने आया है कि यह दवा Prurigo Nodularis (PN) से पीड़ित मरीजों को पहले से कहीं अधिक व्यापक लाभ दे सकती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, भले ही कुछ मरीज क्लीनिकल ट्रायल के सबसे सख्त ट्रीटमेंट लक्ष्य तक नहीं पहुंचे, फिर भी उनमें खुजली, त्वचा के घावों और जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार देखा गया। क्या है Prurigo Nodularis? Prurigo Nodularis एक गंभीर और लंबे समय तक रहने वाली त्वचा संबंधी बीमारी है, जिसमें शरीर पर बेहद खुजली वाले गांठदार घाव (nodules) बन जाते हैं। यह बीमारी मरीजों की: नींद मानसिक स्वास्थ्य दैनिक जीवन सामाजिक गतिविधियों पर गहरा असर डाल सकती है। दो बड़े क्लीनिकल ट्रायल्स का विश्लेषण यह नई स्टडी LIBERTY-PN PRIME और PRIME2 नामक दो बड़े क्लीनिकल ट्रायल्स के डेटा पर आधारित थी। पहले के परिणामों में पाया गया था कि 24 सप्ताह के इलाज के बाद: Dupilumab लेने वाले 35.3% मरीजों में खुजली और त्वचा दोनों में बड़ा सुधार हुआ जबकि placebo समूह में यह आंकड़ा केवल 8.9% था लेकिन वैज्ञानिक यह जानना चाहते थे कि जो मरीज “optimal response” तक नहीं पहुंचे, क्या उन्हें भी फायदा मिला? लक्ष्य पूरा न होने पर भी मरीजों को मिला फायदा नई स्टडी में उन मरीजों का विश्लेषण किया गया जो 24 सप्ताह बाद भी ट्रायल के सबसे सख्त लक्ष्य तक नहीं पहुंचे थे। इसके बावजूद Dupilumab लेने वाले कई मरीजों में महत्वपूर्ण सुधार देखे गए: 61% से अधिक मरीजों की जीवन गुणवत्ता में बड़ा सुधार 55.8% मरीजों ने अपनी बीमारी को “हल्का” या “न के बराबर” बताया आधे से ज्यादा मरीजों में 75% तक त्वचा के घाव भर गए इन सभी परिणामों की तुलना placebo समूह से की गई और अंतर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण पाया गया। सिर्फ “पूर्ण इलाज” ही सफलता नहीं शोधकर्ताओं का कहना है कि किसी इलाज की सफलता को केवल कठोर ट्रायल एंडपॉइंट्स से नहीं मापना चाहिए। कई मरीजों को: खुजली से राहत त्वचा में सुधार बेहतर नींद रोजमर्रा की जिंदगी में आसानी जैसे फायदे मिले, भले ही वे “पूर्ण या लगभग पूर्ण” सुधार की श्रेणी में नहीं आए। लंबी अवधि की रणनीति पर जोर विशेषज्ञों ने कहा कि यह अध्ययन PN के इलाज में “Treat-to-Target” यानी लंबे समय तक लक्ष्य आधारित उपचार रणनीति की जरूरत को मजबूत करता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, आंशिक सुधार वाले मरीजों में भी Dupilumab का इलाज जारी रखने से लंबे समय में और बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।
अग्नाशय कैंसर (Pancreatic Cancer) के इलाज में एक नई लक्षित चिकित्सा (Targeted Therapy) ने उम्मीद की नई किरण दिखाई है। हाल ही में सामने आए एक Phase I/II क्लीनिकल ट्रायल में पाया गया कि Daraxonrasib नामक दवा ने एडवांस स्टेज अग्नाशय कैंसर के मरीजों में बेहतर सर्वाइवल और ट्यूमर नियंत्रण के परिणाम दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज दुनिया के सबसे घातक कैंसरों में से एक माने जाने वाले अग्नाशय कैंसर के उपचार में बड़ा बदलाव ला सकती है। KRAS म्यूटेशन को माना जाता था इलाज से बाहर Pancreatic Ductal Adenocarcinoma (PDAC) के 90 प्रतिशत से अधिक मामलों में KRAS म्यूटेशन पाया जाता है। लंबे समय तक वैज्ञानिक KRAS म्यूटेशन को “इलाज से बाहर” यानी ऐसा लक्ष्य मानते रहे, जिस पर दवा प्रभावी ढंग से काम नहीं कर सकती थी। यही वजह रही कि अग्नाशय कैंसर के अधिकांश मरीजों के लिए अब तक कीमोथेरेपी ही मुख्य उपचार विकल्प बनी हुई थी। हालांकि हाल के वर्षों में मॉलिक्यूलर टार्गेटेड थेरेपी के क्षेत्र में हुई प्रगति ने RAS inhibition strategy को लेकर नई संभावनाएं पैदा की हैं। Daraxonrasib इसी दिशा में विकसित की गई एक Pan-RAS inhibitor दवा है, जिसे विभिन्न प्रकार के RAS म्यूटेशन को निशाना बनाने के लिए तैयार किया गया है। क्या था अध्ययन? इस Phase I/II क्लीनिकल ट्रायल में पहले से उपचार प्राप्त कर चुके एडवांस RAS-म्यूटेंट अग्नाशय कैंसर के 168 मरीजों को शामिल किया गया। मरीजों को प्रतिदिन Daraxonrasib की मौखिक खुराक दी गई, जिसकी मात्रा 300 मिलीग्राम तक रखी गई। अध्ययन का मुख्य उद्देश्य दवा की सुरक्षा (Safety) का मूल्यांकन करना था, जबकि ट्यूमर रिस्पॉन्स और सर्वाइवल परिणामों को द्वितीयक मापदंड के रूप में जांचा गया। ट्यूमर नियंत्रण में दिखा सकारात्मक असर शोधकर्ताओं के अनुसार: 300mg खुराक लेने वाले और पहले एक बार उपचार प्राप्त कर चुके लगभग 30 प्रतिशत मरीजों में ट्यूमर का आकार कम होने का स्पष्ट प्रभाव देखा गया। लगभग 90 प्रतिशत मरीजों में बीमारी नियंत्रित रही, यानी ट्यूमर या तो सिकुड़ गया या स्थिर बना रहा। कुछ मरीज समूहों में उपचार का प्रभाव 8 महीने से अधिक समय तक बना रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि अग्नाशय कैंसर जैसे आक्रामक कैंसर में इस तरह का परिणाम चिकित्सकीय रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। जीवन अवधि में भी सुधार अलग से सामने आए Phase III topline data में सर्वाइवल परिणाम और भी उत्साहजनक रहे। अध्ययन के अनुसार: Daraxonrasib लेने वाले मरीजों की औसत Overall Survival 13.2 महीने रही। जबकि सामान्य कीमोथेरेपी लेने वाले मरीजों में यह केवल 6.7 महीने दर्ज की गई। यह अंतर संकेत देता है कि RAS-targeted therapy भविष्य में अग्नाशय कैंसर के इलाज की दिशा बदल सकती है। साइड इफेक्ट्स भी रहे चुनौती हालांकि इस थेरेपी ने सकारात्मक परिणाम दिखाए, लेकिन कुछ दुष्प्रभाव भी सामने आए। सबसे आम साइड इफेक्ट्स में शामिल थे: त्वचा पर चकत्ते (Rash) मतली (Nausea) थकान (Fatigue) मुंह में सूजन या छाले (Mucositis) करीब 30 प्रतिशत मरीजों में Grade 3 या उससे अधिक गंभीर दुष्प्रभाव दर्ज किए गए। अब जारी है बड़ा Phase III ट्रायल Daraxonrasib की प्रभावशीलता को और बेहतर तरीके से समझने के लिए फिलहाल Phase III RASolute 302 ट्रायल चल रहा है। इस अध्ययन में मेटास्टेटिक अग्नाशय कैंसर मरीजों में इस नई थेरेपी की तुलना standard second-line chemotherapy से की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बड़े क्लीनिकल ट्रायल में भी ऐसे ही सकारात्मक परिणाम मिलते हैं, तो यह थेरेपी अग्नाशय कैंसर मरीजों के लिए लंबे समय से प्रतीक्षित बड़ी सफलता साबित हो सकती है। क्यों महत्वपूर्ण है यह रिसर्च? अग्नाशय कैंसर दुनिया के सबसे घातक कैंसरों में गिना जाता है, क्योंकि अधिकतर मामलों का पता बीमारी के अंतिम चरण में चलता है और मरीजों की जीवित रहने की संभावना बेहद कम होती है। ऐसे में targeted therapy का सफल होना कैंसर रिसर्च के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। Daraxonrasib से जुड़े शुरुआती परिणाम यह संकेत देते हैं कि भविष्य में कैंसर का इलाज अधिक व्यक्तिगत (Personalized) और म्यूटेशन-आधारित उपचार पद्धतियों की ओर बढ़ सकता है।
मध्यम से गंभीर Atopic Dermatitis के इलाज में Ultraviolet B phototherapy (UVB) लंबे समय से प्रभावी विकल्प माना जाता है, खासकर उन मरीजों के लिए जो टॉपिकल स्टेरॉयड जैसे उपचारों से पर्याप्त लाभ नहीं पा रहे हैं। अब एक नई रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल ने narrowband और broadband UVB के बीच तुलना करते हुए अहम निष्कर्ष सामने रखे हैं। स्टडी कैसे की गई? इस अध्ययन में 18 वर्ष से अधिक उम्र के 69 मरीज शामिल किए गए, जिन्हें मध्यम से गंभीर और ट्रीटमेंट-रेफ्रैक्टरी एटोपिक डर्मेटाइटिस था। मरीजों को दो समूहों में बांटा गया: एक को broadband UVB दूसरे को narrowband UVB दोनों समूहों को 12 हफ्तों तक फुल-बॉडी फोटोथेरेपी दी गई, साथ ही उनकी मौजूदा टॉपिकल थेरेपी जारी रही। अध्ययन का मुख्य मापदंड Eczema Area and Severity Index (EASI) स्कोर में बदलाव था। असर में नहीं दिखा बड़ा अंतर रिजल्ट्स के मुताबिक, दोनों ही थेरेपी ने बीमारी की गंभीरता में उल्लेखनीय सुधार किया: Broadband UVB: EASI में औसत −8.1 की कमी Narrowband UVB: EASI में औसत −8.9 की कमी दोनों के बीच का अंतर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण नहीं था, यानी प्रभाव लगभग समान रहा। इसके अलावा vIGA, POEM, PP-NRS, DLQI और RECAP जैसे अन्य क्लिनिकल और मरीज-आधारित मापदंडों में भी दोनों ग्रुप्स के बीच कोई खास अंतर नहीं पाया गया। सहनशीलता में बड़ा फर्क हालांकि, टॉलरबिलिटी (सहनशीलता) के मामले में फर्क देखने को मिला: Broadband UVB ग्रुप में 4 मरीजों ने साइड इफेक्ट्स के कारण इलाज छोड़ दिया Narrowband UVB ग्रुप में कोई भी मरीज बीच में नहीं छोड़ा यह दर्शाता है कि narrowband UVB ज्यादा सुरक्षित और बेहतर सहन किया जाने वाला विकल्प हो सकता है। क्या है इसका मतलब? इस अध्ययन से यह साफ होता है कि दोनों UVB थेरेपी प्रभावी हैं, लेकिन बेहतर सहनशीलता के कारण narrowband UVB को प्राथमिकता दी जा सकती है। यह निष्कर्ष डॉक्टरों को इलाज का सही विकल्प चुनने में मदद कर सकता है, खासकर उन मरीजों के लिए जिनकी बीमारी लंबे समय से नियंत्रण में नहीं आ रही।
नई दिल्ली: कार्डियक सर्जरी के बाद मरीजों की रिकवरी को बेहतर बनाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली High-Flow Nasal Oxygen Therapy को लेकर एक बड़े क्लीनिकल ट्रायल में चौंकाने वाले नतीजे सामने आए हैं। इस अध्ययन में पाया गया कि यह थेरेपी मरीजों के रिकवरी परिणामों में कोई खास सुधार नहीं करती। 1200 से ज्यादा मरीजों पर हुआ अध्ययन यह मल्टीसेंटर, रैंडमाइज्ड क्लीनिकल ट्रायल 17 कार्डियक सर्जरी केंद्रों में किया गया, जिसमें 1,280 वयस्क मरीज शामिल थे। इन मरीजों में Chronic Obstructive Pulmonary Disease, अस्थमा, मोटापा या धूम्रपान का इतिहास जैसे जोखिम कारक मौजूद थे। क्या थी जांच की प्रक्रिया? मरीजों को दो समूहों में बांटा गया– एक समूह को High-Flow Nasal Oxygen Therapy दिया गया दूसरे समूह को सामान्य ऑक्सीजन थेरेपी (Standard Oxygen Therapy) दोनों समूहों को सर्जरी के बाद कम से कम 16 घंटे तक संबंधित उपचार दिया गया। अध्ययन का मुख्य लक्ष्य यह देखना था कि 90 दिनों के भीतर मरीज कितने दिन घर पर स्वस्थ रहते हैं (DAH90)। नतीजे: कोई बड़ा अंतर नहीं अध्ययन के नतीजों में दोनों समूहों के बीच कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं पाया गया। दोनों समूहों में DAH90 का मीडियन 0 दिन रहा अतिरिक्त रेस्पिरेटरी सपोर्ट की जरूरत में भी कोई खास कमी नहीं देखी गई इससे साफ हुआ कि High-Flow Nasal Oxygen Therapy रिकवरी को तेज करने या जटिलताओं को कम करने में प्रभावी साबित नहीं हुई। क्या बदलेंगे इलाज के तरीके? यह अध्ययन डॉक्टरों के लिए एक अहम संकेत देता है कि सर्जरी के बाद नियमित रूप से HFNOT का इस्तेमाल जरूरी नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि सामान्य ऑक्सीजन थेरेपी (SOT) अधिकांश मरीजों के लिए पर्याप्त और प्रभावी है। आगे की रिसर्च की जरूरत हालांकि शोधकर्ताओं ने यह भी कहा कि यह अध्ययन केवल हाई-रिस्क मरीजों में प्रोफिलैक्टिक उपयोग पर केंद्रित था। इसलिए यह संभव है कि कुछ विशेष परिस्थितियों या मरीजों के समूह में HFNOT का फायदा मिल सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।