Derek O'Brien

Kriti Sanon Egg Freezing
कृति सेनन का बड़ा खुलासा, 'मिमी' की तैयारी के दौरान एग फ्रीज करवाने का लिया था फैसला

मुंबई, एजेंसियां। बॉलीवुड अभिनेत्री कृति सेनन ने पहली बार अपनी निजी जिंदगी से जुड़ा बड़ा खुलासा किया है। कृति ने बताया कि उन्होंने फिल्म 'मिमी' की तैयारी के दौरान अपने एग फ्रीज करवाने का फैसला लिया था। उनका कहना है कि वह शादी या मातृत्व को किसी सामाजिक दबाव या "बायोलॉजिकल क्लॉक" के आधार पर नहीं, बल्कि अपनी इच्छा और सही समय पर चुनना चाहती हैं।   'मिमी' की तैयारी के दौरान लिया फैसला   कृति ने बताया कि 'मिमी' के लिए उन्हें वजन बढ़ाना था और उसी दौरान उन्होंने एग फ्रीजिंग की प्रक्रिया पूरी कराई। उनके मुताबिक, इस प्रक्रिया के दौरान शरीर में सूजन और हार्मोनल बदलाव आते हैं, इसलिए उन्हें लगा कि यह इसके लिए सबसे उपयुक्त समय है।   'यह मेरे लिए सबसे बड़ा तोहफा था'   कृति सेनन ने कहा कि एग फ्रीजिंग का फैसला आसान नहीं था, लेकिन यह उनके जीवन के सबसे अच्छे फैसलों में से एक है। उन्होंने कहा कि वह खुद को भविष्य के लिए एक विकल्प देना चाहती थीं, ताकि शादी और परिवार शुरू करने का निर्णय पूरी तरह उनकी इच्छा पर आधारित हो।   महिलाओं को दिया अपना फैसला खुद लेने का संदेश   अभिनेत्री ने कहा कि हर महिला को अपनी जिंदगी के बड़े फैसले खुद लेने का अधिकार होना चाहिए। उन्होंने माना कि यह प्रक्रिया महंगी है और हर किसी के लिए संभव नहीं होती, लेकिन यदि अवसर मिले तो महिलाओं को अपने भविष्य के बारे में स्वतंत्र रूप से सोचने का अधिकार होना चाहिए।

anjali kumari जुलाई 7, 2026 0
West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee during a Trinamool Congress meeting amid the party symbol dispute before the Election Commission.
TMC चुनाव चिह्न विवाद: ममता बनर्जी गुट ने चुनाव आयोग को सौंपा जवाब, कहा- 2027 तक वैध है राष्ट्रीय समिति

कोलकाता: तृणमूल कांग्रेस (TMC) में जारी आंतरिक विवाद के बीच पार्टी के चुनाव चिह्न ‘जोड़ा फूल’ को लेकर मामला चुनाव आयोग तक पहुंच गया है। इस बीच ममता बनर्जी गुट ने निर्वाचन आयोग को अपना विस्तृत जवाब सौंपते हुए दावा किया है कि पार्टी की वर्तमान राष्ट्रीय कार्यसमिति वर्ष 2027 तक पूरी तरह वैध है और उससे पहले किसी समानांतर संगठन का गठन पार्टी संविधान के अनुरूप नहीं है। आयोग को सौंपे कानूनी और संगठनात्मक दस्तावेज ममता बनर्जी गुट ने चुनाव आयोग को दिए गए दस्तावेजों में कहा है कि पार्टी के संविधान और संगठनात्मक चुनाव प्रक्रिया के अनुसार मौजूदा राष्ट्रीय समिति का कार्यकाल 2027 तक निर्धारित है। ऐसे में इस अवधि के दौरान किसी अन्य गुट द्वारा खुद को "असली तृणमूल कांग्रेस" घोषित करना या समानांतर समिति बनाना नियमों के विरुद्ध है। पार्टी का कहना है कि वर्तमान नेतृत्व को निर्धारित कार्यकाल तक संगठन चलाने का पूर्ण वैधानिक अधिकार प्राप्त है। बागी गुट ने 22 जून को बनाई थी नई समिति तृणमूल कांग्रेस के बागी नेता रीतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने 22 जून को नई राष्ट्रीय समिति गठित करने का दावा किया था। इस गुट ने खुद को पार्टी का वास्तविक प्रतिनिधि बताते हुए चुनाव चिह्न पर अधिकार जताया था। हालांकि, ममता बनर्जी गुट ने इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा है कि पार्टी के अधिकृत संगठन में इस तरह के किसी बदलाव का कोई संवैधानिक आधार नहीं है। डेरेक ओब्रायन और अभिषेक बनर्जी ही अधिकृत प्रतिनिधि चुनाव आयोग को दिए गए जवाब में ममता गुट ने स्पष्ट किया है कि आयोग के समक्ष पार्टी का आधिकारिक पक्ष रखने के लिए केवल डेरेक ओब्रायनऔर राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ही अधिकृत प्रतिनिधि हैं। दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि हाल ही में प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने वाली चंद्रिमा भट्टाचार्य या बागी गुट का कोई अन्य नेता पार्टी की ओर से चुनाव आयोग के समक्ष प्रतिनिधित्व करने का अधिकार नहीं रखता। बहुमत का भी किया दावा ममता बनर्जी खेमे ने दावा किया है कि पार्टी के अधिकांश सांसद, जिला संगठन और जमीनी कार्यकर्ता आज भी उनके नेतृत्व के साथ मजबूती से खड़े हैं। उनका कहना है कि कुछ विधायकों या नेताओं के अलग होने से पार्टी के मूल संगठन की वैधता पर कोई असर नहीं पड़ता। अब चुनाव आयोग के फैसले पर नजर दोनों गुटों द्वारा अपने-अपने दावे और दस्तावेज प्रस्तुत किए जाने के बाद अब फैसला चुनाव आयोग के हाथ में है। आयोग दोनों पक्षों के दस्तावेजों की जांच करेगा और उसके बाद व्यक्तिगत सुनवाई की तारीख तय की जाएगी। आयोग के अंतिम निर्णय से यह स्पष्ट होगा कि तृणमूल कांग्रेस के आधिकारिक संगठन और उसके चुनाव चिह्न ‘जोड़ा फूल’ पर किस गुट का अधिकार रहेगा।  

Deepshikha जुलाई 7, 2026 0
Samajwadi Party MP Jaya Bachchan meets TMC chief Mamata Banerjee at her Kalighat residence in Kolkata, with TMC MP Derek O'Brien also present.
जया बच्चन ने कोलकाता में ममता बनर्जी से की मुलाकात, विपक्षी एकजुटता पर फिर शुरू हुई चर्चा

कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की हार के बाद राज्य की राजनीति में लगातार हलचल बनी हुई है। इसी बीच समाजवादी पार्टी (सपा) की राज्यसभा सांसद Jaya Bachchan ने गुरुवार को तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री Mamata Banerjee से उनके कालीघाट स्थित आवास पर मुलाकात की। इस बैठक को विपक्षी राजनीति के लिहाज से अहम माना जा रहा है। बैठक में तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद Derek O'Brien भी मौजूद रहे। दोनों नेताओं के बीच हुई बातचीत के आधिकारिक विवरण सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। क्यों महत्वपूर्ण मानी जा रही है यह मुलाकात? यह मुलाकात ऐसे समय हुई है जब हाल ही में समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता Kiranmoy Nanda ने कोलकाता दौरे के दौरान तृणमूल कांग्रेस की चुनावी हार के लिए ममता बनर्जी को जिम्मेदार ठहराया था। उन्होंने कहा था कि राज्य की जनता अब ममता बनर्जी को नहीं चाहती। नंदा के इस बयान के बाद विपक्षी गठबंधन के सहयोगी दलों के बीच रिश्तों को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं। चुनाव के बाद अखिलेश यादव भी पहुंचे थे कोलकाता पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष Akhilesh Yadav भी कोलकाता पहुंचे थे और उन्होंने ममता बनर्जी से उनके आवास पर मुलाकात की थी। उस समय इस मुलाकात को तृणमूल कांग्रेस के प्रति समर्थन और विपक्षी एकजुटता के संकेत के रूप में देखा गया था। अब जया बच्चन की मुलाकात ने एक बार फिर दोनों दलों के बीच राजनीतिक संवाद को लेकर चर्चाओं को तेज कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों की राय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि समाजवादी पार्टी के कुछ नेताओं की सार्वजनिक आलोचना के बावजूद शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर संवाद जारी है। ऐसे में यह मुलाकात संकेत देती है कि विपक्षी दल भविष्य की राजनीतिक रणनीति और राष्ट्रीय मुद्दों पर सहयोग बनाए रखने के इच्छुक हैं। कुणाल घोष ने क्या कहा? तृणमूल कांग्रेस के नेता Kunal Ghosh ने बैठक के बाद कहा कि ममता बनर्जी और जया बच्चन के बीच लंबे समय से व्यक्तिगत और राजनीतिक संबंध हैं। उन्होंने बताया कि दोनों नेताओं के बीच राष्ट्रीय मुद्दों और मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों पर चर्चा हुई तथा राष्ट्रहित के मुद्दों पर मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता दोहराई गई। बैठक में किसी विशेष राजनीतिक रणनीति या भविष्य के गठबंधन को लेकर दोनों दलों की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।  

Deepshikha जुलाई 3, 2026 0
Former West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee amid controversy over changes in her security personnel and Z-category protection.
बंगाल में ‘सुरक्षा’ पर संग्राम! ममता बनर्जी के पसंदीदा बॉडीगार्ड हटाने पर टीएमसी-भाजपा आमने-सामने, डेरेक बोले- रातभर बिना सुरक्षा रहीं दीदी

  पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री Mamata Banerjee की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर राज्य की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने आरोप लगाया है कि नई भाजपा सरकार ने ममता बनर्जी की सुरक्षा में वर्षों से तैनात अधिकारियों को हटाकर उनकी सुरक्षा से खिलवाड़ किया है। वहीं, मुख्यमंत्री Suvendu Adhikari ने स्पष्ट कर दिया है कि पूर्व मुख्यमंत्री को अपनी पसंद के सुरक्षा अधिकारी चुनने का अधिकार नहीं है और सुरक्षा तैनाती का फैसला पुलिस प्रशासन करेगा। क्या है पूरा विवाद? 2026 के विधानसभा चुनाव में सत्ता परिवर्तन के बाद ममता बनर्जी की सुरक्षा में तैनात कुछ पुराने सुरक्षा अधिकारियों को हटाकर नए अधिकारियों की नियुक्ति की गई है। टीएमसी का दावा है कि ये अधिकारी कई वर्षों से, यहां तक कि ममता बनर्जी के रेल मंत्री रहने के समय से उनकी सुरक्षा में तैनात थे। ममता बनर्जी के करीबी नेताओं ने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात कर पुराने अधिकारियों को वापस तैनात करने की मांग की, लेकिन सरकार ने इस मांग को खारिज कर दिया। टीएमसी का आरोप- ‘राजनीतिक प्रतिशोध का नया निचला स्तर’ All India Trinamool Congress (AITC) की आधिकारिक वेबसाइट से जुड़े नेताओं ने इस कदम को ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ करार दिया है। टीएमसी ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि: “ममता बनर्जी की सुरक्षा में लंबे समय से तैनात कर्मियों को हटाना कोई प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि उन्हें अलग-थलग करने और खतरे में डालने की सोची-समझी कोशिश है।” पार्टी ने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी पर निशाना साधते हुए कहा कि यह कदम ‘बदले की राजनीति’ और ‘सत्ता के दुरुपयोग’ का उदाहरण है। डेरेक ओब्रायन का दावा- रातभर नहीं था कोई सुरक्षाकर्मी Derek O'Brien ने दावा किया कि ममता बनर्जी के कोलकाता स्थित कालीघाट आवास से लंबे समय से तैनात निजी सुरक्षा अधिकारियों (PSO) को हटा दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि: “बुधवार रात ममता बनर्जी के घर के बाहर कोई सुरक्षाकर्मी तैनात नहीं था।” डेरेक ने इसे पूर्व मुख्यमंत्री की सुरक्षा के साथ गंभीर लापरवाही बताया। सागरिका घोष ने उठाए सवाल टीएमसी की राज्यसभा सांसद Sagarika Ghose ने भी सरकार पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि: पूर्व मुख्यमंत्री की सुरक्षा राजनीति का विषय नहीं है। यह राज्य सरकार की संस्थागत जिम्मेदारी है। अचानक सुरक्षा अधिकारियों को हटाने का कारण स्पष्ट किया जाना चाहिए। यदि ममता बनर्जी को देर रात बिना सुरक्षा छोड़ा गया, तो यह बेहद गंभीर मामला है। शुभेंदु सरकार का रुख क्या है? मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का कहना है कि: सुरक्षा अधिकारियों की तैनाती पुलिस प्रशासन का अधिकार है। किसी भी पूर्व मुख्यमंत्री को अपनी पसंद के अधिकारियों की मांग करने का विशेष अधिकार नहीं है। सुरक्षा व्यवस्था पेशेवर और प्रशासनिक मानकों के आधार पर तय की जाएगी। ममता बनर्जी को किस स्तर की सुरक्षा प्राप्त है? ममता बनर्जी को वर्तमान में ‘जेड श्रेणी (Z Category) सुरक्षा’ प्राप्त है। इस श्रेणी में प्रशिक्षित सुरक्षा कर्मियों की एक बड़ी टीम, व्यक्तिगत सुरक्षा अधिकारी (PSO) और अन्य सुरक्षा प्रबंध शामिल होते हैं। राजनीतिक महत्व यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद टीएमसी और भाजपा के बीच राजनीतिक तनाव लगातार बढ़ रहा है। ममता बनर्जी की सुरक्षा को लेकर उठा यह विवाद राज्य की राजनीति में एक नए टकराव का केंद्र बन गया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकार इस मामले पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी करती है या नहीं, और क्या टीएमसी इस मुद्दे को राजनीतिक और कानूनी स्तर पर आगे बढ़ाती है।  

Deepshikha जून 19, 2026 0
Mamata Banerjee with senior TMC leaders during party organizational restructuring in West Bengal.
तृणमूल में बड़े संगठनात्मक बदलाव, ममता ने वरिष्ठ नेताओं को सौंपी अहम जिम्मेदारी

  कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में तृणमूल कांग्रेस (TMC) को मिले झटके और पार्टी के भीतर बढ़ती असंतोष की चर्चाओं के बीच मुख्यमंत्री एवं पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी ने बड़ा संगठनात्मक फेरबदल किया है। पार्टी के नए ढांचे में कई वरिष्ठ नेताओं की भूमिका बढ़ाई गई है, जबकि संगठन के संचालन और रणनीतिक फैसलों को लेकर नई व्यवस्था बनाई गई है। वरिष्ठ नेताओं को मिली अहम भूमिका पार्टी सूत्रों के अनुसार, राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय और वरिष्ठ नेता सौगत रॉय को संगठनात्मक और राजनीतिक समन्वय से जुड़े महत्वपूर्ण दायित्व दिए गए हैं। वहीं सांसद महुआ मोइत्रा को राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की राजनीतिक और मीडिया रणनीति में अधिक सक्रिय भूमिका सौंपी गई है। अभिषेक बनर्जी की भूमिका पर चर्चा नए संगठनात्मक बदलावों के बाद पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी की भूमिका को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है। तृणमूल कांग्रेस की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की गई है, लेकिन पार्टी के अंदर लिए गए नए फैसलों को नेतृत्व की जिम्मेदारियों के पुनर्वितरण के रूप में देखा जा रहा है। दिल्ली और बंगाल दोनों पर फोकस पार्टी ने राष्ट्रीय राजनीति और संसदीय रणनीति पर अधिक ध्यान देने के लिए राज्यसभा सांसद डेरेक ओ'ब्रायन को फिर से प्रमुख जिम्मेदारी दी है। उन्हें दिल्ली में पार्टी की राजनीतिक रणनीति और संवाद को मजबूत करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। कई जिलों में संगठनात्मक बदलाव सूत्रों के मुताबिक, उत्तर 24 परगना, नदिया और मालदा समेत कई महत्वपूर्ण जिलों में संगठनात्मक स्तर पर बदलाव किए गए हैं। विधानसभा चुनाव में अपेक्षा के अनुरूप प्रदर्शन नहीं होने के बाद पार्टी नेतृत्व ने जिला इकाइयों में नई नियुक्तियों का फैसला किया है। बागी सुरों के बीच संगठन को मजबूत करने की कोशिश हाल के दिनों में पार्टी के कुछ नेताओं और जनप्रतिनिधियों की नाराजगी की खबरें सामने आई थीं। ऐसे में ममता बनर्जी का यह कदम संगठन को एकजुट रखने और कार्यकर्ताओं में नया संदेश देने की कोशिश माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस अपने संगठन को नए सिरे से खड़ा करने की रणनीति पर काम कर रही है और वरिष्ठ नेताओं को आगे लाकर संतुलन बनाने की कोशिश की जा रही है। संसदीय अनुशासन पर भी जोर पार्टी ने संसदीय गतिविधियों को अधिक प्रभावी बनाने के लिए सांसदों के समन्वय और अनुशासन पर भी विशेष ध्यान देने का फैसला किया है। इसके तहत संसदीय दल के भीतर जिम्मेदारियों का पुनर्वितरण किया गया है। तृणमूल कांग्रेस के इस संगठनात्मक पुनर्गठन को पार्टी के लिए आने वाले राजनीतिक दौर की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इन बदलावों का पार्टी की आंतरिक राजनीति और विपक्षी राजनीति में उसकी भूमिका पर क्या असर पड़ता है।  

Deepshikha जून 8, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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