नई दिल्ली, एजेंसियां। दिल्ली में 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के जंतर-मंतर से संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा और पुलिस कार्रवाई के बाद मनोरंजन जगत के कई प्रमुख कलाकार छात्रों के समर्थन में सामने आए हैं। प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई, जिसमें 118 से अधिक पुलिसकर्मी और करीब 60 प्रदर्शनकारी घायल हुए। घटना के बाद सोशल मीडिया पर कई फिल्मी हस्तियों ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए शांतिपूर्ण संवाद और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की मांग की। दिलजीत बोले- छात्रों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं होना चाहिए गायक और अभिनेता दिलजीत दोसांझ ने इंस्टाग्राम स्टोरी के जरिए छात्रों का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि छात्रों के साथ सख्ती नहीं बरती जानी चाहिए और प्रशासन को उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। दिलजीत ने यह भी याद दिलाया कि किसानों के आंदोलन के दौरान समर्थन करने पर उन्हें आलोचना और कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ा था तथा कई बार उन्हें 'राष्ट्र-विरोधी' कहा गया। वीर दास ने कलाकारों की चुप्पी पर उठाए सवाल कॉमेडियन और अभिनेता वीर दास ने कलाकारों से सामाजिक मुद्दों पर खुलकर बोलने की अपील की। उन्होंने कहा कि यदि कलाकार जनता के महत्वपूर्ण मुद्दों पर चुप रहते हैं, तो बाद में उनसे समर्थन और टिकट खरीदने की उम्मीद करना उचित नहीं है। उनके अनुसार, युवाओं का भरोसा और समर्थन ही लाइव एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री की सबसे बड़ी ताकत है। हुमा, भूमि और अन्य सितारों ने जताई चिंता अभिनेत्री हुमा कुरैशी ने घटना की तस्वीरों को बेहद दुखद बताते हुए कहा कि ऐसे दृश्य लंबे समय तक याद रहेंगे। उन्होंने बल प्रयोग के बजाय संवाद और धैर्य की आवश्यकता पर जोर दिया। भूमि पेडनेकर ने लिखा कि हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं है और लोकतंत्र में बातचीत सबसे प्रभावी रास्ता है। अनुराग कश्यप ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए, जबकि अदिति राव हैदरी, सोनाक्षी सिन्हा, सोहा अली खान, रितेश देशमुख और जेनेलिया ने भी छात्रों के समर्थन में अपनी बात रखी। कलाकारों की इन प्रतिक्रियाओं ने एक बार फिर लोकतांत्रिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और युवाओं की आवाज को लेकर राष्ट्रीय बहस को तेज कर दिया।
मुंबई, एजेंसियां। दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म 'सतलुज' को लेकर जारी विवाद के बीच मशहूर पंजाबी गायक मनकीरत औलख ने खुलकर फिल्म का समर्थन किया है। मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि "फिल्म 'सतलुज' हमारे दिलों के करीब है। दिलजीत दोसांझ ने जो हुआ, उसका सच दिखाया है।" उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब फिल्म को लेकर देशभर में बहस तेज है और इसके प्रदर्शन पर सवाल उठाए जा रहे हैं। 48 घंटे में OTT से हटाई गई फिल्म फिल्म 'सतलुज' रिलीज के करीब 48 घंटे के भीतर ही OTT प्लेटफॉर्म से हटा दी गई थी। सरकार के निर्देश के बाद मेकर्स ने इसे प्लेटफॉर्म से हटाया, जिसके बाद इस फैसले को लेकर कई पक्षों की प्रतिक्रियाएं सामने आईं। फिल्म के समर्थन और विरोध में लगातार बयानबाजी जारी है। इतिहास छिपाने के बजाय सामने लाने की मांग फिल्म विवाद पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और पंजाब ह्यूमन राइट्स ऑर्गेनाइजेशन से जुड़े जस्टिस (सेवानिवृत्त) रंजीत सिंह ने भी कहा कि इतिहास को छिपाया नहीं जाना चाहिए। उन्होंने जसवंत सिंह खालड़ा मामले का जिक्र करते हुए कहा कि नई पीढ़ी को उस दौर की सच्चाई और हुए अत्याचारों की जानकारी मिलनी चाहिए, ताकि वे इतिहास से सीख ले सकें। उन्होंने दोषी पुलिस अधिकारी की रिहाई पर भी सवाल उठाते हुए दोबारा गिरफ्तारी की मांग की। फिल्म में कई चर्चित कलाकार निर्देशक हनी त्रेहान की इस फिल्म का निर्माण RSVP और मैकगफिन पिक्चर्स ने किया है। फिल्म में दिलजीत दोसांझ के साथ अर्जुन रामपाल, कंवलजीत सिंह, सुविंदर विक्की और गीतिका विद्या भी अहम भूमिकाओं में नजर आए हैं। हालांकि फिल्म को लेकर विवाद अभी भी जारी है, लेकिन मनकीरत औलख सहित कई लोग इसे ऐतिहासिक घटनाओं को सामने लाने वाली महत्वपूर्ण फिल्म बता रहे हैं।
मुंबई, एजेंसियां। फिल्म निर्देशक अनुराग कश्यप ने एक बार फिर सेंसरशिप को लेकर खुलकर अपनी राय रखी है। उन्होंने दावा किया कि अभिनेता दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' पर तत्कालीन CBFC चेयरमैन प्रसून जोशी ने फिल्म देखे बिना ही आपत्ति जताई थी। अनुराग का कहना है कि उन्हें यह जानकारी फिल्म के निर्देशक हनी त्रेहान से मिली थी। 'फिल्म देखे बिना ही लगाए गए सवाल' अनुराग कश्यप के मुताबिक, 'सतलुज' को सेंसर बोर्ड की ओर से बड़ी संख्या में कट लगाने के सुझाव दिए गए थे। उनका आरोप है कि उस समय फिल्म पर बिना पूरी तरह देखे ही आपत्तियां दर्ज की गईं, जिसके कारण फिल्म को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। 'समस्या सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, पूरा सिस्टम' अनुराग कश्यप ने कहा कि सेंसरशिप से जुड़ी दिक्कतों के लिए केवल किसी एक अधिकारी या संस्था को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। उनके अनुसार, यह पूरे सिस्टम से जुड़ा मुद्दा है, जिसमें व्यापक सुधार की जरूरत है। OTT रिलीज के बाद भी हुआ विवाद रिपोर्ट के अनुसार, सेंसर प्रक्रिया में आई चुनौतियों के बाद फिल्म को सिनेमाघरों की बजाय OTT पर रिलीज किया गया था। हालांकि, रिलीज के कुछ ही समय बाद इसे प्लेटफॉर्म से हटा लिया गया, जिसके बाद यह मामला फिर चर्चा में आ गया। बयान के बाद फिर शुरू हुई बहस अनुराग कश्यप के इस बयान के बाद सोशल मीडिया और फिल्म इंडस्ट्री में सेंसरशिप की प्रक्रिया को लेकर नई बहस छिड़ गई है। कई लोग फिल्म निर्माण में रचनात्मक स्वतंत्रता की बात कर रहे हैं, जबकि कुछ का मानना है कि सेंसर बोर्ड के नियमों का पालन भी जरूरी है।
मुंबई, एजेंसियां। दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म 'सतलुज' को लेकर पंजाब में विवाद लगातार गहराता जा रहा है। OTT प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद अब इस फिल्म की स्क्रीनिंग गुरुद्वारों और सार्वजनिक स्थानों पर मुफ्त में शुरू हो गई है। गुरदासपुर, मोगा और पठानकोट के कई गुरुद्वारों में संगत के लिए फिल्म दिखाई जा रही है। भारतीय किसान यूनियन और कई सिख संगठनों ने घोषणा की है कि आने वाले दिनों में इसे पंजाब के गांव-गांव तक पहुंचाया जाएगा, ताकि अधिक से अधिक लोग इसे देख सकें। वहीं, दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (DSGMC) ने भी दिल्ली के गुरुद्वारों के साथ-साथ स्कूलों और कॉलेजों में फिल्म की स्क्रीनिंग तथा जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और मानवाधिकारों पर आधारित सेमिनार आयोजित करने का ऐलान किया है। फिल्म को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने अभिनेता दिलजीत दोसांझ पर तीखा हमला बोलते हुए उन्हें "बहुरूपिया" बताया। बिट्टू ने आरोप लगाया कि फिल्म पंजाब या सिख समाज की सेवा के लिए नहीं, बल्कि लोगों के दर्द और भावनाओं को बेचकर आर्थिक लाभ कमाने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि दिलजीत परिस्थितियों के अनुसार अपना रुख बदलते हैं और प्रचार पाने के लिए विवादों का सहारा लेते हैं। दूसरी ओर, गुरुद्वारा प्रबंधकों और सिख संगठनों का कहना है कि फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और 1990 के दशक में पंजाब में कथित फर्जी मुठभेड़ों तथा लावारिस शवों के मामलों की जांच पर आधारित है। उनका आरोप है कि फिल्म को OTT से हटाकर इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय को दबाने की कोशिश की गई है। उनका कहना है कि यदि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फिल्म उपलब्ध नहीं होगी, तो धार्मिक और सामाजिक मंचों के माध्यम से इसे लोगों तक पहुंचाया जाएगा। कानूनी विशेषज्ञों का भी मानना कानूनी विशेषज्ञों का भी मानना है कि यदि स्क्रीनिंग का उद्देश्य सामाजिक जागरूकता है और कॉपीराइट सहित अन्य कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन नहीं होता, तो गुरुद्वारों में फिल्म दिखाना अपने आप में गैरकानूनी नहीं माना जाएगा। उधर, केंद्र सरकार ने फिल्म से जुड़े विवाद की समीक्षा के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, आशंका है कि फिल्म के कुछ दृश्य और घटनाएं अलगाववादी तत्वों द्वारा गलत तरीके से इस्तेमाल की जा सकती हैं। समिति फिल्म की सामग्री, तथ्यों और प्रस्तुति का अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट देगी। फिल्म जसवंत सिंह खालड़ा के संघर्ष, कथित मानवाधिकार उल्लंघनों और उनके रहस्यमय अपहरण एवं हत्या की पृष्ठभूमि को दर्शाती है। यही कारण है कि रिलीज के बाद से यह फिल्म केवल मनोरंजन का विषय नहीं रही, बल्कि इतिहास, राजनीति, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों के केंद्र में आ गई है।
मुंबई, एजेंसियां। अभिनेता और गायक दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ को ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद विवाद लगातार गहराता जा रहा है। इसी बीच फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लॉइज (FWICE) के अध्यक्ष बी.एन. तिवारी ने अभिनेता की फिल्म चयन पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्हें ऐसे विषयों पर काम करते समय अधिक जिम्मेदारी और समझदारी दिखानी चाहिए। बी.एन. तिवारी ने कहा आईएएनएस से बातचीत में बी.एन. तिवारी ने कहा कि दिलजीत पंजाब के बड़े कलाकार हैं और उनकी लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें ऐसे फैसले लेने चाहिए, जिनका समाज और उनकी छवि पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े। उनका कहना था कि यदि किसी फिल्म की सामग्री सामाजिक विवाद या कानून-व्यवस्था की स्थिति पैदा कर सकती है, तो उसकी गंभीरता से समीक्षा की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि सिनेमा का उद्देश्य मनोरंजन और सकारात्मक संदेश देना है, इसलिए संवेदनशील विषयों पर विशेष सावधानी जरूरी है। तिवारी ने सेंसर प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए उन्होंने कहा कि यदि किसी फिल्म को लंबी जांच और समीक्षा के बाद मंजूरी दी जाती है, तो बाद में उस पर दोबारा आपत्ति उठना कई सवाल खड़े करता है। उनके अनुसार, सेंसर बोर्ड को शुरुआती चरण में ही सभी आपत्तियों का समाधान कर देना चाहिए, ताकि फिल्म निर्माताओं को आर्थिक नुकसान का सामना न करना पड़े। क्या है मामला ? दरअसल, यह फिल्म पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर आधारित है। फिल्म पहले ‘पंजाब 95’ नाम से सेंसर बोर्ड के पास भेजी गई थी, जहां कथित तौर पर 127 संशोधनों का सुझाव दिया गया था। मेकर्स ने इन बदलावों को स्वीकार नहीं किया और बाद में नए नाम ‘सतलुज’ से इसे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज कर दिया। सरकारी सूत्रों के अनुसार, फिल्म को बिना आवश्यक प्रक्रियाओं का पालन किए ओटीटी पर जारी किए जाने और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के मद्देनजर प्लेटफॉर्म से हटाने का निर्देश दिया गया। अब फिल्म को लेकर बहस तेज हो गई है और सभी की नजर इस पर है कि आगे निर्माता और संबंधित पक्ष क्या कदम उठाते हैं।
मुंबई, एजेंसियां। पंजाबी सुपरस्टार दिलजीत दोसांझ की बहुचर्चित फिल्म 'Punjab 95' आखिरकार करीब तीन साल के लंबे इंतजार के बाद दर्शकों तक पहुंच गई है। सेंसर बोर्ड के साथ लंबे विवाद के बाद फिल्म को नए शीर्षक के साथ और बिना किसी कट के OTT प्लेटफॉर्म पर रिलीज किया गया है। फिल्म की रिलीज के साथ ही सोशल मीडिया पर इसकी चर्चा तेज हो गई है। सेंसर विवाद के कारण अटकी रही थी रिलीज फिल्म की रिलीज लंबे समय से सेंसर बोर्ड से जुड़े विवादों के कारण टलती रही। निर्माताओं का कहना था कि फिल्म में कई कट लगाने के सुझाव दिए गए थे, लेकिन वे मूल कहानी से समझौता नहीं करना चाहते थे। आखिरकार फिल्म को नए नाम के साथ बिना किसी दृश्य में बदलाव किए डिजिटल माध्यम से दर्शकों के सामने लाया गया। मानवाधिकार कार्यकर्ता के जीवन पर आधारित है फिल्म यह फिल्म पंजाब के चर्चित मानवाधिकार कार्यकर्ता Jaswant Singh Khalra के जीवन और उनके संघर्ष पर आधारित है। फिल्म में दिलजीत दोसांझ ने मुख्य भूमिका निभाई है। निर्देशक ने वास्तविक घटनाओं को पर्दे पर संवेदनशील तरीके से पेश करने की कोशिश की है, जिसे दर्शकों और समीक्षकों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है। रिलीज के बाद सोशल मीडिया पर मिली सकारात्मक प्रतिक्रिया फिल्म रिलीज होते ही सोशल मीडिया पर दर्शकों ने दिलजीत दोसांझ के अभिनय और फिल्म की कहानी की सराहना की। कई यूजर्स ने इसे लंबे इंतजार के बाद आई एक दमदार और प्रभावशाली फिल्म बताया। फिल्म की OTT रिलीज के बाद इसके व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचने की उम्मीद जताई जा रही है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। पंजाबी गायक और अभिनेता दिलजीत दोसांझ के हालिया खुलासे के बाद गॉलब्लैडर स्टोन (पित्ताशय की पथरी) एक बार फिर चर्चा में है। दिलजीत ने बताया कि करीब 10 साल पहले जांच के दौरान उनके गॉलब्लैडर में 11-12 मिमी की पथरी का पता चला था, लेकिन उन्होंने अब तक इसकी सर्जरी नहीं कराई है। इसके बाद लोगों के मन में यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या लंबे समय तक गॉलब्लैडर स्टोन के साथ रहना सुरक्षित है और इसका इलाज टालने से क्या खतरे हो सकते हैं। गॉलब्लैडर और किडनी स्टोन में होता है अंतर गॉलब्लैडर स्टोन पित्ताशय में कोलेस्ट्रॉल या बिलीरुबिन के जमा होने से बनती है, जबकि किडनी स्टोन मूत्र में मौजूद कैल्शियम ऑक्सलेट, यूरिक एसिड और अन्य खनिजों के क्रिस्टल से बनती है। कई लोगों में पथरी वर्षों तक बिना किसी लक्षण के रहती है, लेकिन कुछ मामलों में छोटी पथरी भी असहनीय दर्द का कारण बन सकती है। इलाज में देरी से बढ़ सकती हैं जटिलताएं गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. विपिन राय के अनुसार, गॉलब्लैडर स्टोन का समय पर इलाज जरूरी है। यदि पथरी पित्त नली को अवरुद्ध कर दे तो बार-बार पित्ताशय में सूजन, संक्रमण, पीलिया, अग्न्याशय (पैंक्रियास) में सूजन और गंभीर जटिलताएं विकसित हो सकती हैं। लंबे समय तक इलाज न होने पर गॉलब्लैडर कैंसर का खतरा भी बढ़ सकता है, हालांकि यह स्थिति दुर्लभ मानी जाती है। इन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें विशेषज्ञों का कहना है कि पेट के दाहिने हिस्से में तेज दर्द, तैलीय भोजन के बाद दर्द बढ़ना, मतली, उल्टी, पीलिया, पेशाब में परेशानी या कमर में लगातार दर्द जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। अल्ट्रासाउंड से गॉलब्लैडर स्टोन की पहचान की जाती है और जरूरत पड़ने पर कोलेसिस्टेक्टॉमी (गॉलब्लैडर हटाने की सर्जरी) की जाती है। पर्याप्त पानी पीना, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और स्वस्थ वजन बनाए रखना पथरी के खतरे को कम करने में मददगार माना जाता है।
Main Vaapas Aaunga Box Office Collection Day 6: इम्तियाज अली के निर्देशन में बनी फिल्म 'मैन वापस आऊंगा' बॉक्स ऑफिस पर धीमी शुरुआत के बावजूद अब वापसी की कोशिश करती नजर आ रही है। दिलजीत दोसांझ स्टारर इस फिल्म ने रिलीज के छठे दिन पहले दिन से ज्यादा कमाई दर्ज की है, जिससे निर्माताओं को कुछ राहत मिली है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, फिल्म ने बुधवार यानी रिलीज के छठे दिन लगभग 1.80 करोड़ रुपये का नेट कलेक्शन किया। दिलचस्प बात यह है कि फिल्म ने पहले दिन सिर्फ 1.15 करोड़ रुपये से ओपनिंग की थी। इस तरह छठे दिन की कमाई शुरुआती दिन के मुकाबले करीब 50 प्रतिशत अधिक रही। छह दिनों में 10 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार फिल्म का कुल छह दिनों का भारतीय नेट बॉक्स ऑफिस कलेक्शन लगभग 10.25 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। अनुमान है कि पहले सप्ताह के अंत तक फिल्म करीब 12 करोड़ रुपये का कारोबार कर सकती है। दिनवार बॉक्स ऑफिस कलेक्शन दिन कमाई शुक्रवार ₹1.15 करोड़ शनिवार ₹1.85 करोड़ रविवार ₹2.60 करोड़ सोमवार ₹1.20 करोड़ मंगलवार ₹1.65 करोड़ बुधवार ₹1.80 करोड़ कुल ₹10.25 करोड़ पंजाब और दिल्ली-एनसीआर में मिल रहा बेहतर रिस्पॉन्स फिल्म को सबसे अच्छा रिस्पॉन्स ईस्ट पंजाब और दिल्ली-एनसीआर सर्किट से मिल रहा है। इसकी बड़ी वजह दिलजीत दोसांझ की लोकप्रियता और फिल्म का विभाजन (Partition) से जुड़ा भावनात्मक विषय माना जा रहा है। हालांकि ट्रेड विशेषज्ञों का मानना है कि इन क्षेत्रों में भी फिल्म का प्रदर्शन औसत ही कहा जा सकता है। कुछ मल्टीप्लेक्स में अच्छी ऑक्यूपेंसी देखने को मिली है, लेकिन कुल मिलाकर फिल्म अभी भी बड़े स्तर पर दर्शकों को आकर्षित करने में संघर्ष कर रही है। वीकेंड पर होगा असली इम्तिहान फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर मजबूत स्थिति में पहुंचने के लिए आने वाले वीकेंड में बड़ी छलांग लगाने की जरूरत होगी। ट्रेड विश्लेषकों के अनुसार, यदि रविवार को फिल्म 4 से 5 करोड़ रुपये तक की कमाई करने में सफल रहती है और इसके बाद भी स्थिर प्रदर्शन बनाए रखती है, तभी इसकी स्थिति बेहतर हो सकती है। लेकिन यह राह आसान नहीं है, क्योंकि जल्द ही 'कॉकटेल 2' रिलीज होने जा रही है, जो लगभग उसी दर्शक वर्ग को आकर्षित करेगी जिसे 'मैन वापस आऊंगा' टारगेट कर रही है। इम्तियाज अली के लिए राहत की खबर पिछली कुछ फिल्मों के बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन को देखते हुए इम्तियाज अली के लिए यह फिल्म एक उम्मीद की किरण लेकर आई है। उनकी फिल्मों को आमतौर पर अच्छा संगीत और एक खास दर्शक वर्ग का समर्थन मिलता है, लेकिन कई बार शुरुआती उत्साह के बाद कलेक्शन में गिरावट देखी जाती रही है। इस बार स्थिति उलट है। शुरुआत कमजोर रही, लेकिन फिल्म धीरे-धीरे अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। हालांकि फिल्म की लागत को देखते हुए सिर्फ यह पॉजिटिव ट्रेंड ही पर्याप्त साबित होगा या नहीं, यह आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा।
फायरिंग की घटना के बाद गरमाई सियासत Diljit Dosanjh के मैनेजर के घर के बाहर हुई फायरिंग के बाद मामला अब राजनीतिक रंग लेता नजर आ रहा है। पंजाब के मुख्यमंत्री Bhagwant Mann ने इस घटना को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ समय से दिलजीत दोसांझ पर राजनीति में शामिल होने का दबाव बनाया जा रहा था। मुख्यमंत्री ने कहा कि कलाकारों को जबरन राजनीति में लाने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए। क्या बोले भगवंत मान? Bhagwant Mann ने मीडिया से बातचीत में कहा कि पिछले कुछ दिनों से ऐसी खबरें सामने आ रही थीं कि भाजपा दिलजीत दोसांझ को राजनीति में लाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि दिलजीत पहले ही साफ कर चुके हैं कि उनका राजनीति में आने का कोई इरादा नहीं है। ऐसे में उन पर दबाव बनाना सही नहीं है। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि कई राजनीतिक दल लोकप्रिय कलाकारों की फैन फॉलोइंग का फायदा उठाना चाहते हैं। विजय का भी लिया उदाहरण भगवंत मान ने दक्षिण भारतीय अभिनेता Vijay का उदाहरण देते हुए कहा कि फिल्मों की लोकप्रियता कई बार नेताओं को कलाकारों को राजनीति में लाने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने दावा किया कि इसी तरह कुछ लोग दिलजीत दोसांझ की लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें राजनीति में शामिल करना चाहते हैं। मैनेजर के घर पर हुई थी गोलीबारी रिपोर्ट्स के अनुसार, हरियाणा के करनाल में दिलजीत दोसांझ के मैनेजर गुरप्रताप सिंह कांग के घर के बाहर अज्ञात हमलावरों ने फायरिंग की थी। घटना के बाद इलाके में दहशत फैल गई, हालांकि किसी के घायल होने की खबर सामने नहीं आई। पुलिस मामले की जांच में जुटी हुई है। लॉरेंस बिश्नोई गैंग ने ली जिम्मेदारी मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि इस घटना की जिम्मेदारी Lawrence Bishnoi Gang ने ली है। फिलहाल पुलिस सुरक्षा एजेंसियों के साथ मिलकर पूरे मामले की जांच कर रही है और हमलावरों की तलाश जारी है। राजनीति में आने से पहले ही कर चुके हैं इनकार Diljit Dosanjh पहले भी सोशल मीडिया के जरिए साफ कर चुके हैं कि वे राजनीति में शामिल नहीं होने वाले हैं। इसके बावजूद लगातार उनके राजनीति में आने की अटकलें लगती रही हैं, जिन पर अब फायरिंग की घटना के बाद बहस और तेज हो गई है।
चंडीगढ़, एजेंसियां। दिलजीत दोसांझ को लेकर पंजाब की राजनीति में नई चर्चा शुरू हो गई है। दक्षिण भारत के सुपरस्टार विजय के तमिलनाडु की राजनीति में सक्रिय होने और मुख्यमंत्री बनने के बाद अब पंजाब में भी ऐसा चेहरा तलाशने की बहस तेज हो गई है। पूर्व सैन्य अधिकारियों और बुद्धिजीवियों के समूह Jago Punjab Manch ने दिलजीत दोसांझ से राजनीति में आने की भावुक अपील की है। दिलजीत ने विनम्रता से ठुकराया प्रस्ताव सोशल मीडिया पर जब एक अखबार ने सवाल पूछा कि क्या दिलजीत पंजाब का नया राजनीतिक चेहरा बन सकते हैं, तो उन्होंने बेहद संक्षिप्त लेकिन साफ जवाब दिया। दिलजीत ने लिखा, “कभी नहीं... मेरा काम मनोरंजन करना है... मैं अपने क्षेत्र में बहुत खुश हूं।” उनके इस जवाब ने साफ कर दिया कि फिलहाल राजनीति में आने का उनका कोई इरादा नहीं है। क्यों उठी दिलजीत को राजनीति में लाने की मांग? ‘जागो पंजाब मंच’ के प्रमुख और पूर्व आईएएस अधिकारी S. S. Boparai ने कहा कि पंजाब इस समय कर्ज, नशे और राजनीतिक नेतृत्व के संकट से गुजर रहा है। उन्होंने दिलजीत की बेदाग छवि, युवाओं में लोकप्रियता और देशभक्ति को उनकी सबसे बड़ी ताकत बताया। बोपाराई के अनुसार, कनाडा में तिरंगा लहराकर दिलजीत ने अपने साहसी रुख का परिचय दिया। विवादों और समर्थन के बीच दिलजीत दिलजीत हाल के वर्षों में कई सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा में रहे हैं। किसान आंदोलन के दौरान उन्होंने किसानों का खुलकर समर्थन किया था। वहीं, उन्हें खालिस्तानी समर्थक संगठनों से धमकियां भी मिलीं। इस बीच भाजपा ने उनका समर्थन करते हुए उन्हें भारत का “सांस्कृतिक राजदूत” बताया। प्रधानमंत्री Narendra Modi से उनकी मुलाकात ने भी राजनीतिक अटकलों को हवा दी। कलाकारों का पंजाब राजनीति में मजबूत रिकॉर्ड पंजाब में कलाकारों का राजनीति में सफल रिकॉर्ड रहा है। Bhagwant Mann, Vinod Khanna, Hans Raj Hans और Sunny Deol जैसे कई नाम राजनीति में अपनी पहचान बना चुके हैं। हालांकि फिलहाल दिलजीत ने राजनीति से दूरी बनाए रखने का संकेत दिया है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।