नई दिल्ली, एजेंसियां। देशभर में E20 पेट्रोल को लेकर वाहन मालिकों के बीच चल रही आशंकाओं पर इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी (ICT) के कुलपति प्रो. अनिरुद्ध बी. पंडित ने स्पष्ट किया है कि E20 ईंधन तकनीकी रूप से सुरक्षित है। उन्होंने कहा कि इस नीति से भारत का कच्चे तेल पर आयात निर्भरता कम होगी, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और इथेनॉल की बढ़ती मांग से किसानों को भी आर्थिक लाभ मिलेगा। E20 से अर्थव्यवस्था और किसानों को मिलेगा लाभ प्रो. पंडित के अनुसार, पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण से पेट्रोलियम आयात में कमी आएगी, जिससे देश का आयात बिल घटेगा। वहीं, इथेनॉल उत्पादन बढ़ने से गन्ना और अनाज उत्पादक किसानों को बेहतर बाजार और आय के अवसर मिलेंगे। E20 को लेकर फैली आशंकाएं निराधार उन्होंने कहा कि E20 ईंधन के खिलाफ सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे कई दावे वैज्ञानिक आधार पर सही नहीं हैं। सरकार ने इस नीति को लागू करने से पहले व्यापक परीक्षण, प्रयोगशाला अध्ययन और तकनीकी मूल्यांकन किए हैं, जिसके बाद ही इसे मंजूरी दी गई है। नई गाड़ियों के लिए पूरी तरह उपयुक्त प्रो. पंडित ने बताया कि वर्तमान में निर्मित अधिकांश नए वाहन E20 ईंधन के अनुकूल बनाए जा रहे हैं। हालांकि, बहुत पुराने वाहनों में फ्यूल सिस्टम के कुछ रबर और पॉलीमर पार्ट्स पर इथेनॉल का असर पड़ सकता है, जिससे समय के साथ उनकी कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है। इथेनॉल ईंधन का भारत में पुराना इतिहास उन्होंने कहा कि भारत में इथेनॉल आधारित ईंधन कोई नई अवधारणा नहीं है। 1940 और 1950 के दशक में भी इथेनॉल आधारित ईंधन का उपयोग किया गया था। ऐसे में आधुनिक तकनीक के दौर में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण को सुरक्षित और व्यावहारिक विकल्प माना जा सकता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। देशभर में E20 पेट्रोल को लेकर चर्चा तेज है। कुछ वाहन मालिकों की शिकायतों और सोशल मीडिया पर वायरल दावों के बाद सरकार ने E20 पेट्रोल को लेकर विस्तृत सफाई जारी की है। सरकार का कहना है कि E20 कोई प्रयोग नहीं, बल्कि वर्षों की वैज्ञानिक जांच और परीक्षण के बाद लागू की गई नीति है। क्या होता है E20 पेट्रोल? E20 पेट्रोल में 20% इथेनॉल और 80% पेट्रोल का मिश्रण होता है। इथेनॉल गन्ना, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों से तैयार होने वाला जैव ईंधन है। इसका उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर भारत की निर्भरता कम करना, प्रदूषण घटाना और किसानों की आय बढ़ाना है। देशभर में 1 अप्रैल 2026 से E20 पेट्रोल की आपूर्ति शुरू की गई है। सरकार ने क्या कहा? पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अनुसार E20 पेट्रोल पर उठ रही कई आशंकाएं तथ्यों पर आधारित नहीं हैं। मंत्रालय का कहना है कि यह ईंधन व्यापक लैब और रोड टेस्ट के बाद लागू किया गया है। सरकार के मुताबिक E20 से विदेशी मुद्रा की बचत होगी, ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम होगा और घरेलू इथेनॉल उद्योग को भी बढ़ावा मिलेगा। क्या माइलेज कम होता है? सरकार ने स्वीकार किया है कि कुछ वाहनों में E20 पेट्रोल के उपयोग से माइलेज में लगभग 3 से 5 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। हालांकि मंत्रालय का कहना है कि इसके बदले मिलने वाले पर्यावरणीय और आर्थिक लाभ कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। साथ ही E20 के कारण इंजन खराब होने या फ्यूल टैंक में जंग लगने जैसी वायरल खबरों को भी सरकार ने भ्रामक बताया है। विवाद क्यों बढ़ा? हाल ही में कुछ वाहन मालिकों और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने E20 पेट्रोल से वाहन खराब होने के दावे किए, जिसके बाद यह मुद्दा चर्चा में आ गया। सरकार और वाहन निर्माता कंपनियों का कहना है कि कई मामलों में समस्या का कारण दूषित ईंधन या वाहन की तकनीकी खराबी थी, न कि E20 पेट्रोल। फिलहाल E20 को लेकर बहस जारी है, लेकिन सरकार ने साफ किया है कि फिलहाल इस नीति में बदलाव की कोई योजना नहीं है।
FIFA World Cup 2026 में स्पेन ने शानदार प्रदर्शन करते हुए बेल्जियम को 2-1 से हराकर सेमीफाइनल में अपनी जगह पक्की कर ली है। लॉस एंजिलिस स्टेडियम में खेले गए रोमांचक क्वार्टर फाइनल मुकाबले में स्पेन ने आखिरी मिनटों में गोल दागकर जीत दर्ज की। अब सेमीफाइनल में उसका मुकाबला मौजूदा उपविजेता फ्रांस से डलास में होगा, जिसे टूर्नामेंट के सबसे बड़े मुकाबलों में से एक माना जा रहा है। कोच का बड़ा फैसला स्पेन के लिए साबित हुआ गेम चेंजर स्पेन के मुख्य कोच लुइस डे ला फुएंते ने इस मुकाबले में शुरुआती एकादश में बड़ा बदलाव करते हुए स्टार मिडफील्डर पेड्री की जगह फाबियन रूइज को मौका दिया। यह फैसला टीम के लिए बेहद सफल साबित हुआ। फाबियन रूइज ने पूरे मैच में मिडफील्ड पर शानदार नियंत्रण बनाए रखा और स्पेन के लिए पहला गोल भी दागा। उन्होंने आक्रमण और रक्षा दोनों में प्रभावशाली प्रदर्शन किया। फाबियन रूइज ने दिलाई शुरुआती बढ़त मैच के शुरुआती मिनटों से ही स्पेन ने गेंद पर कब्जा बनाए रखा और लगातार बेल्जियम के डिफेंस पर दबाव बनाया। 30वें मिनट में दानी ओल्मो के शॉट को बेल्जियम के गोलकीपर थिबाउट कूर्तुआ ने रोक दिया, लेकिन रीबाउंड पर फाबियन रूइज ने शानदार फिनिश करते हुए गेंद को नेट में पहुंचा दिया और स्पेन को 1-0 की बढ़त दिला दी। इसके बाद युवा स्टार लामिन यामाल ने भी अपनी तेज ड्रिब्लिंग से बेल्जियम की रक्षा पंक्ति को कई बार चुनौती दी, हालांकि वह गोल करने से चूक गए। डी केटेलारे ने बेल्जियम की कराई वापसी पहले हाफ के अंतिम चरण में बेल्जियम ने शानदार वापसी की। कप्तान केविन डी ब्रुने ने बेहतरीन थ्रू पास देकर टिमोथी कास्टान्ये को मौका बनाया। कास्टान्ये के सटीक क्रॉस पर चार्ल्स डी केटेलारे ने 41वें मिनट में शानदार हेडर लगाकर स्कोर 1-1 से बराबर कर दिया। पहले हाफ की समाप्ति तक दोनों टीमें बराबरी पर थीं। दूसरे हाफ में दोनों टीमों के बीच कांटे की टक्कर दूसरे हाफ में दोनों टीमों ने लगातार आक्रामक खेल दिखाया। स्पेन ने गेंद पर अधिक नियंत्रण रखा, जबकि बेल्जियम ने तेज काउंटर अटैक के जरिए बढ़त बनाने की कोशिश की। दोनों गोलकीपरों और डिफेंडरों ने कई शानदार बचाव किए, जिससे लंबे समय तक स्कोर नहीं बदल सका। कूर्तुआ की चोट ने बदला मैच का रुख 71वें मिनट में बेल्जियम को बड़ा झटका लगा जब अनुभवी गोलकीपर थिबाउट कूर्तुआ चोटिल होकर मैदान से बाहर हो गए। उनकी जगह युवा गोलकीपर सेने लामेन्स को उतारा गया। इस बदलाव के बाद स्पेन ने लगातार दबाव बढ़ाया और बेल्जियम के डिफेंस पर पकड़ मजबूत कर ली। मेरिनो ने 88वें मिनट में दिलाई यादगार जीत मुकाबले का निर्णायक पल 88वें मिनट में आया। स्पेन के डिफेंडर पाउ क्यूबार्सी के दूर से लगाए गए शॉट को गोलकीपर सेने लामेन्स पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सके। रीबाउंड पर मौजूद मिकेल मेरिनो ने बिना कोई गलती किए गेंद को गोल में पहुंचाकर स्पेन को 2-1 की बढ़त दिला दी। अंतिम मिनटों में बेल्जियम ने बराबरी की पूरी कोशिश की, लेकिन स्पेन के डिफेंस ने कोई मौका नहीं दिया और टीम ने सेमीफाइनल का टिकट हासिल कर लिया। अब फ्रांस से होगा हाई-वोल्टेज सेमीफाइनल इस जीत के साथ स्पेन फीफा विश्व कप 2026 के अंतिम चार में पहुंच गया है। अब उसका मुकाबला डलास में मौजूदा उपविजेता फ्रांस से होगा। दोनों यूरोपीय दिग्गज शानदार फॉर्म में हैं, इसलिए इस मुकाबले को टूर्नामेंट के सबसे रोमांचक और बहुप्रतीक्षित मैचों में शामिल किया जा रहा है।
कभी कॉर्पोरेट दुनिया में करियर ग्रोथ का सबसे बड़ा लक्ष्य मैनेजर बनना माना जाता था। लेकिन अब यह तस्वीर तेजी से बदल रही है। Microsoft की हालिया छंटनी के बाद एक बार फिर यह सवाल उठने लगा है कि क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) मैनेजरों की जगह लेने जा रहा है? विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा नहीं है। कंपनियां मैनेजरों को खत्म नहीं कर रहीं, बल्कि अनावश्यक मैनेजमेंट लेयर कम करके नेतृत्व की भूमिका को नए सिरे से परिभाषित कर रही हैं। Microsoft की छंटनी ने बढ़ाई चर्चा Microsoft ने हालिया जॉब कट्स के दौरान अपनी मैनेजमेंट लेयर को भी कम किया है। कंपनी AI पर बड़े स्तर पर निवेश कर रही है और संगठन को अधिक तेज, चुस्त (Agile) और प्रभावी बनाने की दिशा में काम कर रही है। यही रणनीति Amazon, Meta और Shopify जैसी कई बड़ी टेक कंपनियां भी अपना रही हैं। इस ट्रेंड को अब कॉर्पोरेट जगत में "Management Diet" कहा जा रहा है, जिसमें संगठन के भीतर गैर-जरूरी मैनेजमेंट स्तरों को हटाकर निर्णय प्रक्रिया को सरल बनाया जा रहा है। AI नहीं, संगठनात्मक बदलाव है बड़ी वजह विशेषज्ञों के अनुसार यह बदलाव केवल AI की वजह से नहीं हो रहा है। True Balance के चीफ ह्यूमन रिसोर्स ऑफिसर (CHRO) गौरव शर्मा का कहना है कि कंपनियां अब यह मूल्यांकन कर रही हैं कि कौन-सी मैनेजमेंट लेयर वास्तव में व्यवसाय को मूल्य दे रही है। यदि किसी स्तर की भूमिका केवल रिपोर्टिंग, समन्वय और प्रशासनिक कार्यों तक सीमित है, तो उसे अधिक प्रभावी तरीके से AI के जरिए संभाला जा सकता है। वहीं HireYou के CHRO अभिजीत घोष के मुताबिक कंपनियां अपने संगठन को अधिक तेज और लचीला बनाने के लिए संरचनात्मक बदलाव कर रही हैं। AI इस बदलाव को आसान बना रहा है क्योंकि अब कई प्रशासनिक जिम्मेदारियां तकनीक संभाल सकती है। AI किन मैनेजमेंट कार्यों को संभाल रहा है? आज AI कई ऐसे कार्य तेजी से कर रहा है जो पहले मिडिल मैनेजर की जिम्मेदारी माने जाते थे। इनमें शामिल हैं: प्रदर्शन (Performance) की निगरानी प्रोजेक्ट की प्रगति पर नजर रखना मीटिंग का सारांश तैयार करना कर्मचारियों की शेड्यूलिंग संसाधनों का आवंटन ऑनबोर्डिंग और रिपोर्टिंग अनुपालन (Compliance) की निगरानी इन कार्यों के ऑटोमेट होने से मैनेजरों का समय बच रहा है और संगठन कम मैनेजमेंट लेयर के साथ भी प्रभावी ढंग से काम कर पा रहे हैं। AI नहीं कर सकता नेतृत्व की जगह विशेषज्ञ मानते हैं कि AI डेटा और प्रशासनिक कार्यों में मदद कर सकता है, लेकिन इंसानी नेतृत्व की जगह नहीं ले सकता। कर्मचारियों को प्रेरित करना, विवाद सुलझाना, कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेना, टीम का विश्वास जीतना और सकारात्मक कार्य संस्कृति बनाना ऐसे काम हैं जिनमें मानवीय समझ और अनुभव की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि भविष्य में प्रभावी नेतृत्व की अहमियत और बढ़ने वाली है। मैनेजर की भूमिका कैसे बदल रही है? अब भविष्य का मैनेजर केवल टीम की निगरानी करने वाला व्यक्ति नहीं होगा। नई भूमिका में मैनेजर को इन जिम्मेदारियों पर अधिक ध्यान देना होगा: कर्मचारियों का विकास और कोचिंग रणनीतिक निर्णय लेना नवाचार को बढ़ावा देना अलग-अलग टीमों के बीच बेहतर सहयोग स्थापित करना व्यवसायिक समस्याओं का समाधान करना जो मैनेजर केवल अनुमोदन, रिपोर्टिंग और रोजमर्रा की निगरानी तक सीमित रहेंगे, उनके लिए भविष्य अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। करियर ग्रोथ का नया मतलब विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में करियर की सफलता केवल मैनेजर बनने से तय नहीं होगी। युवा पेशेवरों को अब इन कौशलों पर ध्यान देना होगा: AI टूल्स की समझ किसी क्षेत्र में गहरी विशेषज्ञता समस्या समाधान क्षमता विभिन्न टीमों के साथ सहयोग लगातार नई तकनीकों को सीखने की आदत व्यवसायिक परिणामों की जिम्मेदारी लेना यानी भविष्य में पदनाम (Designation) से अधिक महत्व कौशल और प्रभाव (Impact) का होगा। क्या भारत में भी दिखेगा यही ट्रेंड? विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की कंपनियां भी धीरे-धीरे इसी दिशा में आगे बढ़ेंगी। डिजिटल-फर्स्ट कंपनियां अपेक्षाकृत तेजी से फ्लैट संगठनात्मक ढांचे को अपनाएंगी, जबकि बड़े पारंपरिक संगठनों में यह बदलाव धीरे-धीरे देखने को मिलेगा। हालांकि अंतिम लक्ष्य सभी का लगभग एक जैसा होगा—कम मैनेजमेंट लेयर, तेज निर्णय प्रक्रिया और अधिक प्रभावी नेतृत्व। बदलते दौर में नेतृत्व ही बनेगा सबसे बड़ी ताकत AI के बढ़ते इस्तेमाल के बावजूद कंपनियों को अच्छे नेताओं की आवश्यकता बनी रहेगी। फर्क सिर्फ इतना होगा कि भविष्य में वही मैनेजर सबसे अधिक सफल होंगे जो लोगों को प्रेरित कर सकें, भरोसा कायम रखें, कठिन फैसले लें और लगातार बदलते कारोबारी माहौल में अपनी टीम का सही मार्गदर्शन कर सकें।
पटना, एजेंसियां। बिहार के चर्चित यूट्यूबर और जन सुराज नेता मनीष कश्यप एक नए विवाद को लेकर सुर्खियों में हैं। उन्होंने दावा किया था कि उनकी नई टोयोटा इनोवा हाइक्रॉस में E20 पेट्रोल भरवाने के बाद इंजन में गंभीर खराबी आ गई। इस दावे का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, जिसके बाद E20 ईंधन को लेकर देशभर में बहस छिड़ गई। टोयोटा ने दावों को किया खारिज टोयोटा किर्लोस्कर मोटर ने वाहन की तकनीकी जांच के बाद कहा कि कार में आई खराबी E20 पेट्रोल की वजह से नहीं, बल्कि ईंधन में पानी/दूषित ईंधन होने के कारण हुई। कंपनी ने स्पष्ट किया कि इनोवा हाइक्रॉस E20 ईंधन के अनुरूप है। मनीष कश्यप के खिलाफ FIR दर्ज मामले के बाद टोयोटा ने मनीष कश्यप के खिलाफ FIR दर्ज कराई है। कंपनी का आरोप है कि बिना तकनीकी पुष्टि के किए गए दावों से उसकी छवि को नुकसान पहुंचा है। रिपोर्टों के अनुसार, इस मामले में कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है। सरकार ने भी दी सफाई विवाद बढ़ने पर पेट्रोलियम मंत्रालय ने भी बयान जारी कर कहा कि E20 पेट्रोल पूरी तरह परीक्षण के बाद लागू किया गया है और इससे संबंधित वायरल दावों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं मिला है। सरकार और ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों ने लोगों से अफवाहों पर विश्वास न करने की अपील की। सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस इस पूरे विवाद के बाद सोशल मीडिया पर E20 पेट्रोल, वाहन सुरक्षा और उपभोक्ता अधिकारों को लेकर बहस तेज हो गई है। वहीं, मनीष कश्यप अपने दावों पर कायम हैं, जबकि टोयोटा और सरकार दोनों ने उनके आरोपों को तकनीकी जांच के आधार पर खारिज किया है।
E20 पेट्रोल पर जारी बहस के बीच सरकार बना रही अगला रोडमैप देशभर में E20 पेट्रोल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के बाद केंद्र सरकार अब ईंधन में एथेनॉल मिश्रण को अगले स्तर तक ले जाने की तैयारी कर रही है। सूत्रों के अनुसार, सरकार 2027 तक E21 पेट्रोल और 2029 तक E25 पेट्रोल लागू करने की संभावनाओं का मूल्यांकन कर रही है। हालांकि, यह बदलाव एक साथ नहीं बल्कि चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा ताकि ऑटोमोबाइल उद्योग और उपभोक्ताओं को पर्याप्त समय मिल सके। चरणबद्ध तरीके से बढ़ेगा एथेनॉल मिश्रण सरकारी सूत्रों के मुताबिक, फिलहाल सरकार सीधे अधिक एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन पर जाने के बजाय धीरे-धीरे बदलाव की रणनीति पर काम कर रही है। प्रस्ताव के अनुसार, 2027 में E21 पेट्रोल और उसके दो साल बाद 2029 में E25 पेट्रोल पेश किया जा सकता है। सूत्रों का कहना है कि सरकार E25 को मौजूदा नीति के तहत पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण की अधिकतम सीमा बनाने पर भी विचार कर रही है। ऑटो उद्योग को मिलेगा तैयारी का समय सरकार का मानना है कि उच्च एथेनॉल मिश्रण लागू करने से पहले वाहन निर्माता कंपनियों, ऑटो पार्ट्स उद्योग, ईंधन आपूर्ति नेटवर्क और इंफ्रास्ट्रक्चर को तैयार होने का पर्याप्त समय मिलना चाहिए। एक अधिकारी के अनुसार, यह बदलाव इस तरह किया जाएगा कि इंजन तकनीक, सप्लाई चेन और फ्यूल वितरण व्यवस्था बिना किसी बड़े व्यवधान के नए मानकों के अनुरूप ढल सके। E20 को लेकर उपभोक्ताओं की चिंताओं पर भी नजर देशभर में E20 पेट्रोल उपलब्ध होने के बावजूद कई वाहन मालिकों ने माइलेज, इंजन प्रदर्शन और पुराने वाहनों की अनुकूलता को लेकर सवाल उठाए हैं। सरकार इन चिंताओं से भी अवगत है और इसी वजह से अगले चरण की योजना को धीरे-धीरे लागू करने पर जोर दिया जा रहा है। विशेष रूप से पुराने वाहनों के मालिकों के बीच यह चिंता बनी हुई है कि अधिक एथेनॉल मिश्रण उनके वाहन के प्रदर्शन और रखरखाव लागत को प्रभावित कर सकता है। कच्चे तेल पर निर्भरता घटाने की बड़ी रणनीति भारत का एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम देश की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा है। इसका उद्देश्य आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना और घरेलू स्तर पर उत्पादित एथेनॉल की मांग बढ़ाना है। सरकार ने E20 पेट्रोल की देशव्यापी उपलब्धता अपने मूल 2030 के लक्ष्य से लगभग पांच वर्ष पहले हासिल कर ली है, जिसे इस कार्यक्रम की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। विदेशी मुद्रा की बड़ी बचत का दावा सरकारी अनुमान के अनुसार, 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण से भारत हर वर्ष लगभग 4.5 करोड़ बैरल कच्चे तेल की बचत कर रहा है। इसके साथ ही विदेशी मुद्रा पर करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये का बोझ भी कम हुआ है। हालांकि, भविष्य में E21 और E25 जैसे उच्च एथेनॉल मिश्रण लागू करने से पहले सरकार उद्योग की तैयारी, तकनीकी क्षमता और उपभोक्ताओं की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए अंतिम निर्णय लेगी।
नई दिल्ली,एजेंसियां। केंद्र सरकार ने पेट्रोल में 22% से 30% तक एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन पर एक्साइज ड्यूटी पूरी तरह खत्म करने का फैसला किया है। इस निर्णय का उद्देश्य देश में स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना है। हालांकि, वर्तमान में देशभर के अधिकांश पेट्रोल पंपों पर उपलब्ध E20 पेट्रोल (20% एथेनॉल मिश्रण) पर इस छूट का कोई लाभ नहीं मिलेगा। E22 से E30 तक के नए ईंधन होंगे टैक्स फ्री सरकार की नई अधिसूचना के तहत E22, E25, E27 और E30 जैसे उच्च एथेनॉल मिश्रण वाले पेट्रोल वेरिएंट्स को एक्साइज ड्यूटी से मुक्त किया गया है। यह पहली बार है जब E20 से ऊपर के एथेनॉल ब्लेंड्स को प्रोत्साहित करने के लिए वित्तीय राहत दी गई है। इससे तेल कंपनियों को अधिक एथेनॉल मिश्रण अपनाने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। क्या है एथेनॉल और क्यों है अहम? एथेनॉल एक प्रकार का अल्कोहल है, जिसे गन्ना, मक्का, सड़े आलू और अन्य कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है। इसे पेट्रोल में मिलाकर ईंधन के रूप में उपयोग किया जाता है, जिससे प्रदूषण कम होता है और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटती है। भारत सरकार लंबे समय से एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम को बढ़ावा दे रही है। आयात बिल घटाने और किसानों को लाभ देने की योजना भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। सरकार का मानना है कि अधिक एथेनॉल मिश्रण से विदेशी तेल पर निर्भरता कम होगी और गन्ना किसानों को अतिरिक्त बाजार मिलेगा। इससे देश की ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत होगी। कीमतों में राहत की उम्मीद नहीं हालांकि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन आम उपभोक्ताओं को फिलहाल पेट्रोल की कीमतों में राहत मिलने की संभावना नहीं है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, एथेनॉल की खरीद लागत अभी भी कई मामलों में रिफाइंड पेट्रोल से अधिक है। इसलिए उच्च एथेनॉल मिश्रण के बावजूद खुदरा कीमतों में कमी लाना आसान नहीं होगा। माइलेज और इंजन पर क्या असर? ऑटोमोबाइल उद्योग के अनुसार E20 ईंधन से कुछ पुरानी गाड़ियों में माइलेज में मामूली कमी आ सकती है, लेकिन इससे वाहन की सुरक्षा या इंजन पर कोई बड़ा खतरा नहीं है। सरकार का मानना है कि भविष्य में अधिक एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन भारत की हरित ऊर्जा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनेंगे।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।