रोजाना इस्तेमाल होने वाले मसाले न सिर्फ खाने का स्वाद बढ़ाते हैं, बल्कि पाचन तंत्र को भी बेहतर बनाए रखने में मदद करते हैं। लेकिन अगर इन्हीं मसालों में स्टार्च की मिलावट हो जाए, तो यह स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है। इसी को ध्यान में रखते हुए Food Safety and Standards Authority of India ने पाउडर मसालों में संभावित स्टार्च की मिलावट पहचानने का एक आसान घरेलू तरीका बताया है। घर पर ऐसे करें स्टार्च की मिलावट की जांच FSSAI के अनुसार, पाउडर मसालों में स्टार्च की संभावित मिलावट की जांच के लिए यह आसान टेस्ट किया जा सकता है: कांच की साफ प्लेट या कटोरी में थोड़ा-सा पाउडर मसाला लें। उस पर लगभग 0.5 ml आयोडीन सॉल्यूशन की कुछ बूंदें डालें। यदि मसाले का रंग नीला या नीला-काला हो जाता है, तो यह स्टार्च की मौजूदगी का संकेत हो सकता है। यदि रंग में कोई बदलाव नहीं होता, तो स्टार्च की मिलावट की संभावना कम मानी जाती है। ध्यान दें: यह एक प्रारंभिक स्क्रीनिंग टेस्ट है। केवल इस परीक्षण के आधार पर किसी उत्पाद को मिलावटी घोषित नहीं किया जा सकता। यदि किसी मसाले पर संदेह हो, तो उसकी जांच अधिकृत प्रयोगशाला में कराना उचित रहेगा। मिलावटी मसाले क्यों हो सकते हैं नुकसानदायक? मसाले सामान्यतः पाचन में सहायता करते हैं, लेकिन मिलावटी उत्पादों की गुणवत्ता और सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। लंबे समय तक निम्न गुणवत्ता या मिलावटी खाद्य पदार्थों का सेवन स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डाल सकता है। विशेष रूप से, जिन लोगों को मधुमेह (डायबिटीज) है, उन्हें अपने भोजन की सामग्री और गुणवत्ता पर अधिक ध्यान देना चाहिए। हालांकि, केवल स्टार्च की थोड़ी मात्रा अपने आप में "जानलेवा" नहीं मानी जाती। जोखिम इस बात पर निर्भर करता है कि मिलावट किस प्रकार की है, कितनी मात्रा में है और व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति क्या है। मसालों में मिलावट क्यों की जाती है? खाद्य पदार्थों में मिलावट अक्सर लागत कम करने, वजन बढ़ाने या उत्पाद को अधिक आकर्षक दिखाने के उद्देश्य से की जाती है। स्टार्च मिलाने से कुछ पाउडर मसालों की मात्रा और बनावट बढ़ी हुई दिखाई दे सकती है, जिससे उपभोक्ता को वास्तविक गुणवत्ता का पता नहीं चल पाता।
भारत में विटामिन D की कमी से जूझ रहे लोगों के लिए एक अहम खबर सामने आई है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने देश के पहले प्लांट-बेस्ड Vitamin D3 सप्लीमेंट को मंजूरी दे दी है। इसे Fermenta Biotech ने विकसित किया है और अब इसका उपयोग सप्लीमेंट्स, फोर्टिफाइड फूड और पेय पदार्थों में किया जा सकेगा। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में बड़ी आबादी विटामिन D की कमी से प्रभावित है। ऐसे में यह नया विकल्प खासकर शाकाहारी और वीगन लोगों के लिए राहत लेकर आ सकता है। क्या है प्लांट-बेस्ड Vitamin D3? यह Vitamin D3 पौधों से प्राप्त फाइटोस्टेरॉल (Phytosterols) से तैयार किया जाता है। फाइटोस्टेरॉल ऐसे प्राकृतिक यौगिक हैं जो पौधों में पाए जाते हैं और इनसे Vitamin D3 बनाया जा सकता है। चूंकि यह पूरी तरह पौधों पर आधारित है, इसलिए यह उन लोगों के लिए बेहतर विकल्प माना जा रहा है जो पशु-आधारित उत्पादों का सेवन नहीं करते। सामान्य Vitamin D3 से कैसे अलग है? बाजार में उपलब्ध अधिकांश Vitamin D3 सप्लीमेंट लैनोलिन (Lanolin) से बनाए जाते हैं। लैनोलिन भेड़ की ऊन से प्राप्त एक प्राकृतिक पदार्थ है, जिससे Vitamin D3 तैयार किया जाता है। इसके विपरीत, नया प्लांट-बेस्ड Vitamin D3 किसी भी पशु स्रोत पर निर्भर नहीं है। यही वजह है कि इसे शाकाहारी, वीगन और जैन समुदाय के लोगों के लिए अधिक उपयुक्त माना जा रहा है। क्या असर में भी उतना ही प्रभावी है? विशेषज्ञों का कहना है कि प्लांट-बेस्ड Vitamin D3 की रासायनिक संरचना और शरीर में अवशोषित होने की क्षमता (Bioavailability) पारंपरिक Vitamin D3 के समान है। यानी यह शरीर में Vitamin D के स्तर को बढ़ाने में उतना ही प्रभावी हो सकता है। हालांकि, इसका असर व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति और शरीर की जरूरत के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। Vitamin D2 और Vitamin D3 में क्या अंतर है? Vitamin D के दो प्रमुख रूप होते हैं— Vitamin D2 (Ergocalciferol): आमतौर पर पौधों से प्राप्त होता है। Vitamin D3 (Cholecalciferol): पारंपरिक रूप से पशु स्रोतों से बनाया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, Vitamin D3 शरीर में Vitamin D का स्तर बढ़ाने में Vitamin D2 की तुलना में अधिक प्रभावी माना जाता है। यही कारण है कि डॉक्टर अक्सर Vitamin D3 सप्लीमेंट की सलाह देते हैं। किन लोगों के लिए फायदेमंद हो सकता है? यह नया प्लांट-बेस्ड Vitamin D3 विशेष रूप से इन लोगों के लिए उपयोगी हो सकता है— शाकाहारी और वीगन लोग जैन समुदाय के लोग जिनमें Vitamin D की कमी पाई गई हो ऐसे लोग जो पशु-आधारित सप्लीमेंट का इस्तेमाल नहीं करना चाहते क्या इसे खाने-पीने की चीजों में मिलाया जा सकेगा? इस नए Vitamin D3 को पाउडर और ऑयल दोनों रूपों में तैयार किया गया है। इसकी मदद से दूध, पेय पदार्थ, हेल्थ ड्रिंक, गमीज़ और अन्य फोर्टिफाइड खाद्य उत्पादों में Vitamin D मिलाया जा सकेगा। इससे लोगों तक Vitamin D पहुंचाना पहले की तुलना में अधिक आसान हो सकता है। Vitamin D की कमी के क्या हैं लक्षण? यदि शरीर में लंबे समय तक Vitamin D की कमी बनी रहे तो कई स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। इसके सामान्य लक्षणों में शामिल हैं— हड्डियों में दर्द मांसपेशियों की कमजोरी लगातार थकान बार-बार फ्रैक्चर होना बच्चों में विकास की धीमी गति रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होना ऐसे लक्षण दिखाई देने पर डॉक्टर से सलाह लेकर जांच करानी चाहिए। डॉक्टर की सलाह के बिना सप्लीमेंट न लें हालांकि प्लांट-बेस्ड Vitamin D3 एक नया और बेहतर विकल्प माना जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि किसी भी प्रकार का Vitamin D सप्लीमेंट शुरू करने से पहले जांच कराना और डॉक्टर से उचित मात्रा (Dose) व अवधि के बारे में सलाह लेना जरूरी है। नई मंजूरी के बाद उम्मीद की जा रही है कि यह विकल्प भारत में Vitamin D की कमी से जूझ रहे लाखों लोगों, खासकर शाकाहारी समुदाय, के लिए एक सुलभ और प्रभावी समाधान साबित हो सकता है।
भारतीय रसोई में खाना बनाने के लिए अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तरह के तेल का इस्तेमाल किया जाता है। उत्तर भारत में जहां सरसों का तेल सबसे ज्यादा लोकप्रिय है, वहीं दक्षिण भारत में नारियल तेल का उपयोग अधिक होता है। लेकिन अब इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने सलाह दी है कि लंबे समय तक सिर्फ एक ही प्रकार के तेल का इस्तेमाल करना बेहतर विकल्प नहीं है। ICMR की नई डाइटरी गाइडलाइंस के मुताबिक, बेहतर स्वास्थ्य के लिए खाना बनाने में समय-समय पर अलग-अलग खाद्य तेलों का इस्तेमाल करना चाहिए। इससे शरीर को विभिन्न प्रकार के आवश्यक फैटी एसिड और पोषक तत्व मिलते हैं। क्यों बदल-बदलकर इस्तेमाल करना चाहिए कुकिंग ऑयल? ICMR और FSSAI के अनुसार, कोई भी एक कुकिंग ऑयल सभी जरूरी पोषक तत्व उपलब्ध नहीं कराता। हर खाद्य तेल की अपनी अलग पोषण संबंधी विशेषताएं होती हैं। ऐसे में यदि लोग अलग-अलग तेलों का संतुलित उपयोग करते हैं, तो शरीर को विभिन्न प्रकार के हेल्दी फैट्स और एंटीऑक्सीडेंट्स मिल सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि हेल्दी डाइट का मतलब तेल पूरी तरह छोड़ देना नहीं, बल्कि सही मात्रा और सही तरीके से उसका इस्तेमाल करना है। ICMR की हेल्दी ऑयल गाइडलाइन स्वस्थ रहने के लिए ICMR ने कुछ आसान सुझाव दिए हैं— एक ही तेल का लगातार इस्तेमाल करने के बजाय समय-समय पर तेल बदलें। तेल का उपयोग सीमित मात्रा में करें। एक बार इस्तेमाल किए गए तेल को दोबारा गर्म करने से बचें। ट्रांस फैट वाले खाद्य पदार्थों का सेवन कम करें। डीप फ्राई की बजाय स्टीम, ग्रिल या रोस्टेड भोजन को प्राथमिकता दें। कौन-सा तेल किसलिए फायदेमंद है? सरसों का तेल सरसों का तेल मोनोअनसैचुरेटेड फैटी एसिड और ओमेगा-3 फैटी एसिड का अच्छा स्रोत माना जाता है। यह हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हो सकता है और इसमें एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण भी पाए जाते हैं। तिल का तेल तिल के तेल में ओमेगा-6 फैटी एसिड और प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट्स मौजूद होते हैं। यह शरीर में सूजन कम करने और कोशिकाओं की सुरक्षा में मदद कर सकता है। नारियल तेल नारियल तेल में मीडियम चेन ट्राइग्लिसराइड्स (MCTs) पाए जाते हैं, जो शरीर को जल्दी ऊर्जा उपलब्ध कराने में मदद करते हैं। हालांकि इसका सेवन भी सीमित मात्रा में करने की सलाह दी जाती है। पाम ऑयल ICMR के अनुसार, पाम ऑयल में टोकोफेरॉल्स, टोकोट्रिएनोल्स (विटामिन E के रूप) और कैरोटेनॉयड्स जैसे पोषक तत्व मौजूद होते हैं। संतुलित मात्रा में उपयोग करने पर यह भी आहार का हिस्सा हो सकता है। हालांकि इसका अत्यधिक सेवन किसी भी अन्य तेल की तरह उचित नहीं माना जाता। सूरजमुखी का तेल सूरजमुखी का तेल विटामिन-E और पॉलीअनसैचुरेटेड फैटी एसिड से भरपूर होता है। यह त्वचा और हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभदायक माना जाता है। तेल की मात्रा कैसे करें कम? FSSAI के मुताबिक, यदि आप रोजाना इस्तेमाल होने वाले तेल की मात्रा में लगभग 10 प्रतिशत की कमी कर दें, तो इससे स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। इसके अलावा— डीप फ्राइड फूड्स कम खाएं। प्रोसेस्ड और पैकेज्ड खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित करें। घर में कम तेल वाले भोजन को प्राथमिकता दें। भोजन में फल, सब्जियां और साबुत अनाज की मात्रा बढ़ाएं। क्या है विशेषज्ञों की सलाह? विशेषज्ञों का कहना है कि स्वस्थ जीवनशैली के लिए किसी एक तेल को 'सबसे बेहतर' मानने के बजाय संतुलित और विविधतापूर्ण आहार अपनाना ज्यादा जरूरी है। अलग-अलग कुकिंग ऑयल का सीमित मात्रा में उपयोग, संतुलित खानपान और नियमित शारीरिक गतिविधि मिलकर हृदय और संपूर्ण स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
नई दिल्ली, एजेंसियां। देश में खाद्य उत्पादों के विज्ञापन और लेबलिंग पर सख्ती बढ़ाते हुए Food Safety and Standards Authority of India ने 14 प्रमुख फूड बिजनेस ऑपरेटर्स (FBOs) को नोटिस जारी किया है। इन कंपनियों पर Food Safety and Standards Act, 2006 के प्रावधानों के उल्लंघन, भ्रामक ब्रांड दावों, गलत लेबलिंग और उपभोक्ताओं को गुमराह करने वाले विज्ञापनों के आरोप हैं। नियामक का कहना है कि यह कार्रवाई उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा और खाद्य सुरक्षा नियमों के पालन को सुनिश्चित करने के लिए की गई है। 'नेचुरल', 'ऑर्गेनिक' और हेल्थ क्लेम पर उठाए सवाल FSSAI ने नोटिस में कई उत्पादों पर 'नेचुरल', 'ऑर्गेनिक', 'नो एडेड शुगर', 'हार्ट प्रो' और '100% ऑथेंटिक' जैसे दावों पर आपत्ति जताई है। जांच के दायरे में आए प्रमुख ब्रांडों में Kinder Joy, Saffola, Bikanervala, Pluck, Raw Pressery, Atom PWR और MasterChow Foods शामिल हैं। नियामक ने कंपनियों से इन दावों के समर्थन में वैज्ञानिक प्रमाण और आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा है। हाइजीन और गुणवत्ता संबंधी शिकायतों पर भी सख्ती बीकानेरवाला को सोशल मीडिया पर सामने आई स्वच्छता संबंधी शिकायत के बाद नोटिस भेजा गया है। वहीं, परम डेयरी लिमिटेड से आईआरसीटीसी कैटरिंग के जरिए सप्लाई किए गए दही और रबड़ी में कथित फंगल संक्रमण की शिकायत पर जवाब मांगा गया है। FSSAI ने संबंधित कंपनियों से सप्लाई चेन, गुणवत्ता नियंत्रण, सुधारात्मक कदम और भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के उपायों की विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। नियामक ने स्पष्ट किया है कि स्वास्थ्य संबंधी दावे या किसी बीमारी के इलाज का प्रचार बिना मंजूरी के नहीं किया जा सकता। सभी कंपनियों को निर्धारित समय के भीतर सुधारात्मक कार्रवाई कर अनुपालन रिपोर्ट जमा करने के निर्देश दिए गए हैं। FSSAI का मानना है कि इस अभियान से खाद्य उत्पादों के विज्ञापन अधिक पारदर्शी होंगे और उपभोक्ताओं को सही जानकारी उपलब्ध कराई जा सकेगी।
नई दिल्ली: अक्सर कहा जाता है कि "नाम में क्या रखा है", लेकिन कई बार यही नाम किसी उत्पाद की सबसे बड़ी पहचान और बिक्री का आधार बन जाता है। यही वजह है कि भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने कुछ कंपनियों के ब्रांड नाम और उनके उत्पादों पर किए गए दावों को लेकर आपत्ति जताई है। खाद्य नियामक FSSAI ने खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के कथित उल्लंघन के आरोप में आठ कंपनियों को नोटिस जारी किया है। प्राधिकरण का कहना है कि इन कंपनियों के ब्रांड नाम, टैगलाइन या उत्पाद संबंधी दावे उपभोक्ताओं को भ्रमित कर सकते हैं। इन कंपनियों को भेजा गया नोटिस FSSAI की ओर से नोटिस पाने वाली कंपनियों में शामिल हैं— Emami Healthy & Tasty Health Aid TruVy The Healthy Factory Healthy Master Healthy Choice Plan B Newherbs नियामक का मानना है कि इन कंपनियों के कुछ नाम और दावे उत्पादों की वास्तविक प्रकृति से अलग संदेश दे सकते हैं। Emami Healthy & Tasty पर क्या है आपत्ति? कोलकाता स्थित इमामी समूह की एडिबल ऑयल यूनिट Emami Healthy & Tasty के नाम पर FSSAI ने सवाल उठाया है। प्राधिकरण का कहना है कि "Healthy & Tasty" जैसा ट्रेड नाम उपभोक्ताओं में यह धारणा बना सकता है कि उत्पाद स्वाभाविक रूप से स्वास्थ्य के लिए बेहतर है, जबकि ऐसे दावों को नियमों के अनुरूप साबित करना आवश्यक होता है। 'Plant Based Vegan' दावे पर Plan B को नोटिस Plan B अपने उत्पादों को "Plant Based Vegan" के रूप में प्रचारित करती है। FSSAI के अनुसार, कंपनी ने आवश्यक स्वीकृतियां प्राप्त किए बिना अपने उत्पादों को वीगन के रूप में पेश किया, जिससे ग्राहकों के बीच गलत धारणा बन सकती है। The Healthy Factory के उत्पाद भी जांच के दायरे में The Healthy Factory के— Zero Maida Whole Wheat Bread Zero Maida Pizza Base जैसे उत्पादों पर किए गए दावों को भी FSSAI ने जांच के दायरे में रखा है। नियामक का कहना है कि ऐसे दावे उपभोक्ताओं को भ्रमित कर सकते हैं। TruVy और Newherbs पर भी सवाल TruVy के— Healthy Mix Veggie Chips Healthy Ragi Chips Healthy Moong Dal Chips जैसे उत्पादों में कई अन्य सामग्री शामिल होने के बावजूद "Healthy" शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई गई है। वहीं Newherbs की "True Vitamin" श्रृंखला को लेकर FSSAI का कहना है कि यह नाम उसके निर्धारित मानकों में परिभाषित नहीं है और इससे उपभोक्ता भ्रमित हो सकते हैं। टैगलाइन और ब्रांडिंग पर भी आपत्ति FSSAI ने Healthy Master की टैगलाइन "Vision to Serve Healthy", Healthy Choice के "Healthy Food for Healthy Life Poha" और Health Aid के ब्रांड नाम पर भी सवाल उठाए हैं। प्राधिकरण का मानना है कि केवल नाम या टैगलाइन देखकर ग्राहक उत्पाद को अधिक स्वास्थ्यवर्धक मान सकते हैं, जबकि वास्तविक पोषण मूल्य अलग हो सकता है। उपभोक्ताओं के लिए क्या है संदेश? विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी खाद्य उत्पाद को खरीदते समय केवल उसके नाम या पैकेजिंग पर भरोसा करने के बजाय— न्यूट्रिशन लेबल पढ़ें, सामग्री (Ingredients) की सूची देखें, और प्रमाणित दावों पर ही भरोसा करें।
नई दिल्ली: गर्मियों का मौसम आते ही बाजार में आमों की बहार दिखाई देने लगती है। फलों के राजा कहे जाने वाले आम का स्वाद हर किसी को पसंद होता है, लेकिन कई बार जल्दी मुनाफा कमाने के लिए व्यापारियों द्वारा आमों को कृत्रिम तरीके से पकाकर बाजार में उतार दिया जाता है। ऐसे आम स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने लोगों को केमिकल से पके आमों की पहचान करने के लिए कुछ आसान तरीके बताए हैं। कैल्शियम कार्बाइड से पकाए जाते हैं कई आम एफएसएसएआई के अनुसार, कुछ व्यापारी आमों को जल्दी पकाने के लिए कैल्शियम कार्बाइड का इस्तेमाल करते हैं। इस रसायन से एसिटिलीन गैस निकलती है, जिसे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना जाता है। कई शोधों में इसके अंदर मौजूद विषैले तत्वों को शरीर के लिए खतरनाक बताया गया है। केमिकल से पके आम की 5 पहचान पूरा आम एक समान चमकीले पीले रंग का दिखाई देता है। आम में प्राकृतिक खुशबू नहीं होती। बाहर से मुलायम लेकिन अंदर से सख्त महसूस होता है। स्वाद फीका या असामान्य होता है। छिलके पर सफेद पाउडर जैसे कण दिखाई दे सकते हैं। प्राकृतिक रूप से पके आम की 5 पहचान आम पर हरे और पीले रंग के मिश्रित पैच दिखाई देते हैं। डंठल के पास मीठी और प्राकृतिक खुशबू आती है। हल्का दबाने पर आम थोड़ा नरम महसूस होता है। स्वाद मीठा और रसदार होता है। छिलके पर प्राकृतिक काले धब्बे दिखाई दे सकते हैं। क्यों खतरनाक है कैल्शियम कार्बाइड? विशेषज्ञों के अनुसार, कैल्शियम कार्बाइड में आर्सेनिक और अन्य विषैले तत्वों की अशुद्धियां हो सकती हैं। कुछ शोधों में ऐसे रसायनों के लंबे समय तक संपर्क को कैंसर, डायबिटीज और थायरॉइड संबंधी समस्याओं के बढ़ते जोखिम से भी जोड़ा गया है। इसलिए आम खरीदते समय केवल उसका रंग देखकर फैसला न करें, बल्कि उसकी खुशबू, बनावट और स्वाद पर भी ध्यान दें। थोड़ी सी सावधानी आपकी सेहत को सुरक्षित रख सकती है।
नई दिल्ली: गर्मियों के मौसम के साथ बाजारों में आम, केला और पपीता की आमद तेज हो गई है, लेकिन इस बार इन फलों की गुणवत्ता को लेकर सरकार पहले से ज्यादा सतर्क नजर आ रही है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने राज्यों को निर्देश दिए हैं कि वे फल मंडियों, गोदामों और थोक बाजारों में सख्त निगरानी रखें और जरूरत पड़ने पर छापेमारी भी करें। केमिकल से पकाए फलों पर सख्ती FSSAI ने साफ किया है कि आम, केला और पपीता जैसे फलों को कृत्रिम रूप से पकाने के लिए इस्तेमाल होने वाले खतरनाक रसायनों पर पूरी तरह प्रतिबंध है। खास तौर पर कैल्शियम कार्बाइड (जिसे आम भाषा में ‘मसाला’ कहा जाता है) का उपयोग गैरकानूनी है। यह केमिकल न सिर्फ फलों की गुणवत्ता को खराब करता है, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा पैदा करता है। सेहत पर पड़ सकता है गंभीर असर विशेषज्ञों के मुताबिक, कैल्शियम कार्बाइड के संपर्क या सेवन से: निगलने में दिक्कत उल्टी और पेट की परेशानी त्वचा पर जलन या अल्सर जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसके अलावा कुछ व्यापारी एथेफोन जैसे घोल का भी इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसे भी सुरक्षित नहीं माना जाता। राज्यों को दिए गए सख्त निर्देश FSSAI ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के खाद्य सुरक्षा आयुक्तों और क्षेत्रीय अधिकारियों को निर्देश दिया है कि: फल मंडियों और स्टोरेज सेंटर की नियमित जांच हो थोक बाजारों और सप्लाई चेन पर कड़ी नजर रखी जाए संदिग्ध मामलों में तुरंत कार्रवाई की जाए खासतौर पर उन जगहों पर ज्यादा सतर्कता बरतने को कहा गया है, जहां बड़े पैमाने पर मौसमी फलों का भंडारण किया जाता है। उपभोक्ताओं की सुरक्षा प्राथमिकता FSSAI का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उपभोक्ताओं तक जो फल पहुंचें, वे न सिर्फ स्वाद में अच्छे हों बल्कि पूरी तरह सुरक्षित भी हों। गर्मियों में फलों की मांग बढ़ने के साथ मिलावट और केमिकल के इस्तेमाल का खतरा भी बढ़ जाता है, ऐसे में इस बार नियामक पहले से ही एक्शन मोड में नजर आ रहा है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।