रांची। झारखंड सरकार ने राज्य के लाखों अधिकारियों और कर्मचारियों को बड़ी राहत देते हुए महंगाई भत्ते (डीए) में 2 प्रतिशत की वृद्धि कर दी है। वित्त विभाग द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार सातवें वेतनमान का लाभ प्राप्त कर रहे कर्मचारियों का डीए 58 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 प्रतिशत कर दिया गया है। यह बढ़ोतरी 1 जनवरी 2026 से प्रभावी मानी जाएगी, जिससे कर्मचारियों को बढ़े हुए भत्ते के साथ पिछले महीनों का एरियर भी मिलेगा। मंत्रिपरिषद की मंजूरी के बाद जारी हुआ आदेश मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में हुई मंत्रिपरिषद की बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी दी गई थी। इसके बाद वित्त विभाग ने औपचारिक आदेश जारी किया। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि बढ़ा हुआ महंगाई भत्ता केवल मूल वेतन पर देय होगा। झारखंड सेवा संहिता के प्रावधानों के अनुसार विशेष वेतन या वैयक्तिक वेतन को डीए की गणना में शामिल नहीं किया जाएगा। बढ़ती महंगाई के बीच कर्मचारियों को राहत सरकार के इस फैसले से राज्य के कर्मचारियों और अधिकारियों की मासिक आय में बढ़ोतरी होगी। बढ़ती महंगाई के दौर में यह निर्णय आर्थिक राहत प्रदान करेगा। जनवरी 2026 से लागू होने के कारण कर्मचारियों को छह महीने का एरियर भी प्राप्त होगा, जिससे उनके हाथ में अतिरिक्त राशि आएगी। कर्मचारियों के संगठनों ने सरकार के इस निर्णय का स्वागत किया है। केंद्र सरकार के फैसले के बाद राज्य की पहल झारखंड सरकार का यह निर्णय केंद्र सरकार द्वारा केंद्रीय कर्मचारियों के महंगाई भत्ते में बढ़ोतरी किए जाने के बाद लिया गया है। राज्य सरकार ने भी उसी तर्ज पर अपने कर्मचारियों को राहत देने का फैसला किया है। इससे राज्य के विभिन्न विभागों में कार्यरत लाखों कर्मियों को सीधा लाभ मिलेगा। कोल इंडिया कर्मियों को भी बढ़ा लाभ इधर, कोल इंडिया लिमिटेड ने भी अपने वेज बोर्ड कर्मचारियों के लिए वैरिएबल डियरनेस अलाउंस (वीडीए) की नई दर जारी कर दी है। 1 जून से 31 अगस्त 2026 तक कर्मचारियों को 25 प्रतिशत वीडीए मिलेगा। यह संशोधन उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर किया गया है और कोल इंडिया की सभी अनुषंगी कंपनियों के कर्मचारियों पर लागू होगा।
देशभर में 8वें वेतन आयोग को लेकर चर्चाएं तेज हैं। इसी बीच सरकारी कर्मचारियों और पेंशनर्स संगठनों ने एक नई मांग उठाई है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि सरकारी कर्मचारियों और पेंशनर्स को National Pension System, पुरानी पेंशन योजना (OPS) और यूनिफाइड पेंशन स्कीम (UPS) में से अपनी पसंद की योजना चुनने का अधिकार मिलना चाहिए। यह मांग ऐसे समय सामने आई है जब वेतन आयोग वेतन वृद्धि, फिटमेंट फैक्टर, भत्तों और रिटायरमेंट लाभों को लेकर विभिन्न कर्मचारी संगठनों से सुझाव ले रहा है। कर्मचारियों ने क्यों उठाई विकल्प की मांग? कर्मचारी संगठनों का कहना है कि सभी कर्मचारियों की आर्थिक जरूरतें और रिटायरमेंट प्लान अलग-अलग होते हैं। ऐसे में एक ही पेंशन मॉडल सभी पर लागू करना उचित नहीं है। पुरानी पेंशन योजना यानी OPS में रिटायरमेंट के बाद निश्चित पेंशन मिलती है, जो अंतिम वेतन और महंगाई भत्ते से जुड़ी होती है। वहीं NPS में पेंशन बाजार आधारित रिटर्न और जमा फंड पर निर्भर करती है। सरकार द्वारा शुरू की गई UPS योजना में गारंटीड पेंशन जैसी कुछ सुविधाएं दी गई हैं, लेकिन यह भी योगदान आधारित प्रणाली पर काम करती है। इसी वजह से कई कर्मचारी अभी भी OPS को ज्यादा सुरक्षित मानते हैं। पेंशन सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा कर्मचारी संगठनों के मुताबिक अब सरकारी कर्मचारियों के बीच सबसे बड़ी चिंता रिटायरमेंट के बाद की आर्थिक सुरक्षा को लेकर है। कर्मचारी चाहते हैं कि उन्हें पहले से स्पष्ट हो कि सेवा समाप्ति के बाद उन्हें कितनी पेंशन मिलेगी। कर्मचारी संगठनों का मानना है कि कुछ लोग निश्चित पेंशन चाहते हैं, जबकि कुछ कर्मचारी NPS या UPS जैसी योजनाओं में बने रहना पसंद कर सकते हैं। इसलिए विकल्प देने से कर्मचारियों को अपनी जरूरत के हिसाब से फैसला लेने की स्वतंत्रता मिलेगी। क्या अभी बदल सकते हैं योजना? फिलहाल केंद्र सरकार के कर्मचारियों को OPS, NPS और UPS के बीच स्वतंत्र रूप से विकल्प बदलने की अनुमति नहीं है। 1 जनवरी 2004 के बाद नियुक्त अधिकांश केंद्रीय कर्मचारी NPS के दायरे में आते हैं। ऐसे किसी भी बदलाव के लिए सरकार को नई नीति बनानी होगी और संबंधित आयोगों की सिफारिशों की जरूरत पड़ेगी। हालांकि कर्मचारी संगठनों का कहना है कि पिछले कुछ हफ्तों में इस मुद्दे पर चर्चा तेज हुई है। VRS कर्मचारियों को लेकर भी चर्चा पेंशन विकल्प के अलावा स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) लेने वाले कर्मचारियों को लेकर भी नए सुझाव सामने आए हैं। कर्मचारी संगठनों की मांग है कि VRS लेने वाले कर्मचारियों को रिटायरमेंट के तुरंत बाद पेंशन का लाभ मिलना चाहिए। उनका कहना है कि लंबे समय तक सेवा देने वाले कर्मचारियों को रिटायरमेंट के बाद पेंशन को लेकर अनिश्चितता का सामना नहीं करना चाहिए। 8वें वेतन आयोग में जारी हैं बैठकें 8th Pay Commission देशभर में कर्मचारी संगठनों, पेंशनर्स समूहों और सरकारी प्रतिनिधियों के साथ लगातार बैठकें कर रहा है। आयोग वेतन, पेंशन, भत्तों और सेवा शर्तों को लेकर सुझाव जुटा रहा है। हालांकि OPS, NPS और UPS में विकल्प देने को लेकर अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन इस मुद्दे ने वेतन आयोग की चर्चाओं में नई बहस जरूर छेड़ दी है।
रांची। झारखंड में हुए ट्रेजरी घोटाले के बाद राज्य में वेतन भुगतान में विलंब हो रहा है। कर्मियों का वेतन अटकने लगा है। इसे देखते हुए राज्य सरकार ने अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन भुगतान को लेकर नई गाइडलाइन बनाई है। इससे पहले घोटाला सामने आने पर वित्त विभाग ने विभिन्न तरह की सत्यापन व्यवस्था लागू की थी। उससे कर्मियों के वेतन भुगतान में काफी विलंब होने लगा था। इसलिए अब नई व्यवस्था हुई है। वेतन भुगतान में आगे गड़बड़ी न हो, इसके लिए वित्त विभाग ने एक एसओपी तैयार की है। सरकारी कर्मचारियों के मास्टर डेटाबेस में छेड़छाड़ कर अवैध तरीके से वेतन निकासी की संभावना को खत्म करने के लिए एक चेक लिस्ट बनाई गई है। उसी को फॉलो कर ट्रेजरी पे बिलों का भुगतान करेगा। प्रधान महालेखाकार की रिपोर्ट से गंभीर गड़बड़ियों का खुलासा होने के बाद वित्त विभाग ने इम्प्लॉय मास्टर डेटा को सुरक्षित करने के लिए दिशा-निर्देश व एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) जारी किया है। संयुक्त सचिव ज्योति कुमारी झा के हस्ताक्षर से जारी इस आदेश के तहत अब डेटा में किसी भी तरह का बदलाव पूरी तरह से नियंत्रित और ऑनलाइन होगा। अभी कर्मचारियों के प्रोफाइल को 'फ्रीज' किया जा रहा दरअसल, वर्तमान आईएफएमएस प्रणाली के अंतर्गत मार्च-अप्रैल से वेतन निकासी के साथ ही डीडीओ स्तर से कर्मचारियों के प्रोफाइल को 'फ्रीज' किया जा रहा है। इस कारण से वेतन भुगतान की प्रक्रिया के दौरान कर्मचारी के प्रोफाइल में कोई भी बदलाव संभव नहीं था। इसके कारण कर्मचारियों का प्रमोशन, पदनाम परिवर्तन, ट्रांसफर, वेतन संशोधन और बैंक अकाउंट डिटेल्स जैसे जरूरी अपडेट समय पर नहीं हो पा रहे थे। इससे अगले महीने का वेतन अटकने की आशंका बनी रहती थी। इसी परेशानी को दूर करने और डेटा से छेड़छाड़ रोकने के लिए यह नई व्यवस्था लागू की गई है। ये किया है वित्त विभाग ने वित्त विभाग ने कर्मचारियों के डेटा को दो मुख्य हिस्सों में बांटा है। दोनों के लिए अलग-अलग नियम तय किए गए हैं। बेसिक प्रोफाइल में कर्मचारी का जीपीएफ नंबर, नाम, जन्म तिथि, आधार नंबर, पैन नंबर, मोबाइल नंबर, जेंडर और नॉमिनी जैसी स्थायी जानकारियां रहेंगी। जीपीएफ नंबर और नाम में संशोधन की प्रक्रिया पहले की तरह ही पेंशन एवं लेखा निदेशालय के स्तर से होगी। जो अन्य जानकारियों को डीडीओ द्वारा फ्रीज किया गया है, उनमें सुधार के लिए कर्मचारी को ईम्प्लोयी पोर्टल के जरिए ऑनलाइन रिक्वेस्ट करना होगा। डीडीओ इसे अप्रूव कर पेंशन एवं लेखा निदेशालय को ऑनलाइन फॉरवर्ड करेंगे और वहीं से अंतिम संशोधन किया जाएगा। सैलरी और पोस्टिंग प्रोफाइल में कर्मचारी का पदनाम, पोस्टिंग स्थान, बेसिक पे, पे बैंड, पे लेवल, बैंक अकाउंट नंबर और आईएफएससी कोड होगा। प्रोफाइल में जैसे ही कोई बदलाव होगा, उसकी सूचना तुरंत कर्मचारी के मोबाइल पर एसएमएस के जरिए चली जाएगी।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के लिए बड़ा फैसला लेते हुए सातवां वेतन आयोग लागू करने को मंजूरी दे दी है। राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में इस प्रस्ताव पर सहमति बनने के बाद कर्मचारियों की सैलरी में बढ़ोतरी का रास्ता साफ हो गया है। लंबे समय से कर्मचारी इस फैसले का इंतजार कर रहे थे। माना जा रहा है कि नए वेतनमान लागू होने से लाखों कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को सीधा लाभ मिलेगा। कैबिनेट बैठक में कई अहम फैसले राज्य सरकार की कैबिनेट बैठक में सिर्फ वेतन आयोग ही नहीं, बल्कि कई अन्य महत्वपूर्ण फैसले भी लिए गए। सरकार ने सभी धार्मिक अनुग्रह अनुदान (ex-gratia) को फिलहाल रोकने का निर्णय लिया है। सूचना एवं सांस्कृतिक मामलों (I&CA) विभाग के तहत दिए जाने वाले अनुग्रह अनुदान भी अब बंद रहेंगे। सरकार का कहना है कि इन योजनाओं की समीक्षा की जाएगी। OBC सूची की होगी दोबारा जांच कैबिनेट ने पिछली सरकार द्वारा तैयार की गई राज्य की OBC सूची की समीक्षा का भी फैसला लिया है। सरकार अब इस सूची का दोबारा मूल्यांकन करेगी ताकि पात्र वर्गों को सही लाभ मिल सके। इस मुद्दे को लेकर राज्य में पहले से राजनीतिक बहस चल रही थी। महिलाओं के लिए नई योजनाओं का ऐलान राज्य की महिला एवं बाल विकास मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि कैबिनेट ने ‘अन्नपूर्णा योजना’ को भी मंजूरी दे दी है। इस योजना के तहत 1 जून से महिलाओं को हर महीने 3,000 रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी। इसके अलावा राज्य सरकार ने महिलाओं के लिए बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा देने का भी ऐलान किया है। यह सुविधा भी 1 जून से लागू होगी। सरकार का दावा है कि इन योजनाओं से महिलाओं की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और उन्हें रोजमर्रा के खर्चों में राहत मिलेगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।