healthcare innovation

AI-powered medical analysis system assisting doctors in detecting ovarian cancer and women’s reproductive health conditions
AI से ओवरी से जुड़ी बीमारियों के इलाज में नई उम्मीद, रिसर्च में सामने आए बड़े नतीजे

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI अब महिलाओं की स्वास्थ्य सेवाओं, खासकर ओवरी से जुड़ी बीमारियों के इलाज और पहचान में बड़ी भूमिका निभा सकता है। एक नई सिस्टमेटिक रिव्यू और मेटा-एनालिसिस में पाया गया है कि AI तकनीक ओवेरियन कैंसर और अन्य ओवेरियन कंडीशंस की पहचान और इलाज को ज्यादा सटीक और पर्सनलाइज्ड बना सकती है। रिसर्च के अनुसार, AI आधारित मॉडल्स ने ओवेरियन कैंसर की पहचान में काफी बेहतर प्रदर्शन किया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में महिलाओं की स्वास्थ्य सेवाओं को और मजबूत बना सकती है। ओवेरियन कैंसर पहचानने में AI की बड़ी सफलता स्टडी में पाया गया कि AI मॉडल्स ने अल्ट्रासाउंड स्कैन और ब्लड टेस्ट डेटा को मिलाकर ओवेरियन कैंसर की पहचान लगभग 90 प्रतिशत मामलों में सही तरीके से की। रिपोर्ट के मुताबिक, AI सिस्टम्स ने कैंसर की मौजूदगी पहचानने में 89 से 94 प्रतिशत तक की सटीकता दिखाई। वहीं जिन मरीजों में कैंसर नहीं था, उन्हें सही तरीके से पहचानने की क्षमता भी 85 से 91 प्रतिशत तक रही। सर्जरी और IVF में भी मददगार AI सिर्फ कैंसर की पहचान तक सीमित नहीं है। रिसर्च में बताया गया कि Explainable AI टूल्स एडवांस ओवेरियन कैंसर में सर्जिकल प्लानिंग में भी प्रभावी साबित हुए। इन टूल्स ने यह अनुमान लगाने में मदद की कि सर्जरी के दौरान सभी दिखाई देने वाले कैंसर सेल्स को पूरी तरह हटाया जा सकेगा या नहीं। इसके अलावा IVF यानी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन प्रक्रिया में भी AI उपयोगी साबित हुआ। AI एल्गोरिद्म ने ओवेरियन स्टिम्युलेशन प्रोटोकॉल को बेहतर बनाने और फॉलिकल ग्रोथ का अनुमान लगाने में डॉक्टरों की मदद की। PCOS जैसी समस्याओं में भी संभावनाएं रिसर्चर्स के मुताबिक, AI तकनीक Polycystic Ovary Syndrome जैसी जटिल हार्मोनल समस्याओं की पहचान और इलाज को भी अधिक सटीक बना सकती है। AI की मदद से मरीज की स्थिति के अनुसार पर्सनलाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान तैयार करना संभव हो सकता है। अभी भी मौजूद हैं कई चुनौतियां हालांकि विशेषज्ञों ने यह भी माना कि रिसर्च के अच्छे नतीजों के बावजूद AI को रोजमर्रा की क्लिनिकल प्रैक्टिस में लागू करना अभी आसान नहीं है। 81 स्टडीज के विश्लेषण में पाया गया कि कई रिसर्च अलग-अलग AI सिस्टम्स और रेट्रोस्पेक्टिव डेटा पर आधारित थीं। सिर्फ 22 प्रतिशत स्टडीज में मल्टीसेंटर और प्रॉस्पेक्टिव वैलिडेशन किया गया था। इसी वजह से वैज्ञानिकों ने मजबूत वैलिडेशन, स्टैंडर्ड रिपोर्टिंग सिस्टम और क्लिनिकल वर्कफ्लो में बेहतर इंटीग्रेशन की जरूरत बताई है। जिम्मेदार AI उपयोग पर जोर रिसर्चर्स ने कहा कि हेल्थकेयर सेक्टर में AI का उपयोग करते समय एथिकल और जिम्मेदार गवर्नेंस बेहद जरूरी है। मरीजों की प्राइवेसी, डेटा सुरक्षा और मेडिकल फैसलों की पारदर्शिता को प्राथमिकता देना अहम होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में AI महिलाओं की स्वास्थ्य सेवाओं में बड़ा बदलाव ला सकता है, खासकर ओवेरियन कैंसर, IVF और हार्मोनल डिसऑर्डर्स के इलाज में।  

surbhi मई 12, 2026 0
AI analyzing MRI brain scan to detect tumor with high accuracy using deep learning model
AI से ब्रेन ट्यूमर की पहचान में क्रांति: MRI से 98% तक सटीक डायग्नोसिस, डॉक्टरों का काम होगा आसान

नई दिल्ली: मेडिकल टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में एक बड़ी सफलता सामने आई है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित एक नया डीप लर्निंग मॉडल अब MRI स्कैन के जरिए ब्रेन ट्यूमर की पहचान को और तेज़, सटीक और भरोसेमंद बना सकता है। इस तकनीक का नाम MultiAttenNet है, जो जटिल मामलों में भी ट्यूमर को बेहतर तरीके से पहचानने में सक्षम है। कैसे काम करता है यह AI मॉडल? MultiAttenNet एक हाइब्रिड डीप लर्निंग सिस्टम है, जिसमें: मल्टी-स्केल CNN (Convolutional Neural Networks) ट्रांसफॉर्मर बेस्ड अटेंशन मैकेनिज्म का इस्तेमाल किया गया है। यह तकनीक न सिर्फ इमेज के छोटे-छोटे हिस्सों को बारीकी से समझती है, बल्कि पूरे MRI स्कैन का कॉन्टेक्स्ट भी पकड़ती है। इससे अलग-अलग आकार और अनियमित संरचना वाले ट्यूमर की पहचान आसान हो जाती है। फॉल्स पॉजिटिव कम, सटीकता ज्यादा इस मॉडल की सबसे बड़ी खासियत है इसका “अडैप्टिव अटेंशन सिस्टम”, जो सिर्फ जरूरी हिस्सों पर फोकस करता है। इससे: गलत अलर्ट (False Positives) कम होते हैं ट्यूमर की लोकेशन और बाउंड्री ज्यादा सटीक मिलती है कितनी है सटीकता? रिसर्च के दौरान इस मॉडल का परीक्षण कई बड़े डेटासेट्स पर किया गया, जिनमें Brain Tumor Segmentation 2023 शामिल है। नतीजे बेहद प्रभावशाली रहे: Accuracy: 98.4% Sensitivity: 96.8% Specificity: 99.2% False Positive Rate: सिर्फ 1.3% यह प्रदर्शन मौजूदा कई एडवांस सिस्टम्स से बेहतर बताया जा रहा है। कम डेटा में भी असरदार इस AI मॉडल की एक खासियत यह भी है कि यह “सेमी-सुपरवाइज्ड लर्निंग” पर काम करता है। यानी: कम लेबल्ड डेटा में भी ट्रेन हो सकता है अनलेबल्ड डेटा का भी उपयोग करता है अलग-अलग क्लीनिकल परिस्थितियों में बेहतर काम करता है डॉक्टरों और मरीजों के लिए क्या मतलब? ब्रेन ट्यूमर की जल्दी और सही पहचान इलाज के लिए बेहद जरूरी होती है। इस तकनीक से: डॉक्टरों का वर्कलोड कम होगा डायग्नोसिस में एकरूपता (Consistency) बढ़ेगी मरीजों को जल्दी और बेहतर इलाज मिल सकेगा

surbhi मई 4, 2026 0
AI analyzing antibiotic data in hospital to combat antimicrobial resistance crisis
AMR संकट के बीच AI के जिम्मेदार इस्तेमाल की जरूरत, ESCMID 2026 में विशेषज्ञ की चेतावनी

  दुनियाभर में बढ़ते एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) संकट को लेकर वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता लगातार गहराती जा रही है। अनुमान है कि 2025 तक यह संकट हर साल करीब 1 करोड़ लोगों की जान को खतरे में डाल सकता है। इसी बीच ESCMID Global 2026 में पेश किए गए नए शोध में बताया गया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) इस समस्या से निपटने में बड़ी भूमिका निभा सकता है–लेकिन इसके इस्तेमाल में सावधानी बेहद जरूरी है। AI कैसे कर सकता है AMR से मुकाबला यूके की University of Hertfordshire से जुड़ी शोधकर्ता Rasha Elshenawy ने अपने अध्ययन में बताया कि AI आधारित मशीन लर्निंग एल्गोरिदम अस्पतालों में एंटीबायोटिक के सही उपयोग, समय पर हस्तक्षेप और संक्रमण के जोखिम का पूर्वानुमान लगाने में मददगार साबित हो रहे हैं। उनके अनुसार, AI सिस्टम अस्पतालों में एंटीबायोटिक उपयोग के पैटर्न का विश्लेषण कर यह संकेत दे सकता है कि कहां दवाओं के प्रति प्रतिरोध (resistance) बढ़ने की संभावना है, जिससे डॉक्टर समय रहते सही कदम उठा सकें। रिसर्च में मिले प्रभावशाली नतीजे अध्ययन के दौरान: AI ने 84.7% सटीकता के साथ सही प्रिस्क्रिप्शन का अनुमान लगाया 156 संभावित दवा-इंटरैक्शन की पहचान की गई 89 मामलों में डोज़ एडजस्टमेंट की जरूरत बताई गई डेटा की सटीकता 99.2% पाई गई यह सिस्टम महामारी के दौरान बढ़े हुए 40% कार्यभार के बावजूद प्रभावी बना रहा, जो इसकी मजबूती को दर्शाता है। लो-इनकम देशों में बड़ी चुनौतियां हालांकि, AMR का सबसे ज्यादा असर लो और मिडिल-इनकम देशों (LMICs) में देखने को मिलता है, जहां संसाधनों की कमी, नीति और प्रशिक्षण के अभाव जैसी कई बाधाएं मौजूद हैं। रिसर्च में यह भी सामने आया कि इन देशों में AI लागू करना तकनीकी रूप से संभव तो है, लेकिन इसके लिए मजबूत वित्तीय समर्थन, प्रशिक्षण और स्थानीय स्तर पर नवाचार की जरूरत है। जिम्मेदार AI उपयोग पर जोर विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि AI का इस्तेमाल बिना उचित जांच और सत्यापन के नहीं किया जाना चाहिए। Rasha Elshenawy ने स्पष्ट कहा कि किसी भी AI सिस्टम को लागू करने से पहले उसकी विश्वसनीयता और सटीकता सुनिश्चित करना अनिवार्य है, ताकि मरीजों पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़े। उन्होंने यह भी जोर दिया कि अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों को AI अपनाने से पहले मजबूत परीक्षण प्रक्रिया और स्पष्ट दिशानिर्देश तैयार करने होंगे। आगे की राह विशेषज्ञों के मुताबिक, AMR से लड़ाई में AI एक शक्तिशाली उपकरण बन सकता है, लेकिन इसके लिए जरूरी है: मजबूत वैलिडेशन और टेस्टिंग हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स की ट्रेनिंग मरीज-केंद्रित दृष्टिकोण नीति और वित्तीय समर्थन अगर इन पहलुओं पर ध्यान दिया जाए, तो AI न केवल एंटीबायोटिक के सही उपयोग को बढ़ावा देगा, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य संकट को कम करने में भी मददगार साबित हो सकता है।  

surbhi अप्रैल 23, 2026 0
Advanced exosome-based therapy shows promise in healing wounds with minimal scarring in new study
दाग-रहित घाव भरने की दिशा में बड़ी खोज: नई तकनीक से स्कार कम करने की उम्मीद

चोट या सर्जरी के बाद बनने वाले दाग (scars) लंबे समय से चिकित्सा क्षेत्र के लिए चुनौती रहे हैं। अब एक नए अध्ययन ने इस दिशा में उम्मीद जगाई है। शोध में पाया गया है कि Pirfenidone से लोड किए गए एक्सोसोम्स (PFD-exosomes) घाव को बिना दाग के भरने में मदद कर सकते हैं। एक्सोसोम तकनीक: बिना सेल के इलाज का नया तरीका घाव भरने के दौरान त्वचा में फाइब्रोब्लास्ट (fibroblast) नामक कोशिकाएं अत्यधिक सक्रिय हो जाती हैं, जिससे कोलेजन ज्यादा बनता है और स्कार बनता है। Pirfenidone पहले से ही एक एंटी-फाइब्रोटिक दवा के रूप में इस्तेमाल होती है, लेकिन इसे सही तरीके से प्रभावित जगह तक पहुंचाना चुनौतीपूर्ण रहा है। इस समस्या के समाधान के लिए वैज्ञानिकों ने Exosomes का इस्तेमाल किया–ये छोटे-छोटे कण होते हैं जो कोशिकाओं के बीच संदेश पहुंचाने का काम करते हैं। यह एक “cell-free therapy” है, यानी इसमें सीधे कोशिकाओं का उपयोग नहीं होता। कैसे तैयार किए गए PFD-exosomes शोधकर्ताओं ने मानव त्वचा की कोशिकाओं (dermal fibroblasts) से एक्सोसोम्स निकाले और उनमें Pirfenidone को लोड किया। इसके लिए दो तकनीकों–PEG precipitation और affinity-based methods–का इस्तेमाल किया गया, जिसमें affinity-based तकनीक ज्यादा शुद्ध और बेहतर साबित हुई। दवा को एक्सोसोम्स में डालने के लिए “sonication” तकनीक अपनाई गई, जिससे उनकी संरचना सुरक्षित रखते हुए दवा को सफलतापूर्वक लोड किया गया। क्या मिले नतीजे? एक्सोसोम्स अकेले भी फाइब्रोब्लास्ट की वृद्धि और मूवमेंट को बेहतर बनाते हैं PFD-exosomes ने दवा के एंटी-फाइब्रोटिक असर को और बढ़ाया जानवरों पर किए गए परीक्षण में घाव तेजी से भरे त्वचा में कोलेजन का निर्माण संतुलित रहा, जिससे दाग कम बने भविष्य की चिकित्सा में बड़ी भूमिका यह तकनीक भविष्य में घाव के इलाज को पूरी तरह बदल सकती है। PFD-exosomes न केवल घाव को जल्दी भरने में मदद करते हैं, बल्कि दाग बनने की संभावना भी कम करते हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इस तकनीक को आम मरीजों तक पहुंचाने से पहले क्लीनिकल ट्रायल और लंबी अवधि की सुरक्षा जांच जरूरी होगी।  

surbhi अप्रैल 21, 2026 0
Doctor conducting penicillin allergy testing in a hospital to ensure accurate antibiotic treatment.
पेनिसिलिन एलर्जी टेस्टिंग से बड़ा बदलाव: WHO-रिस्ट्रिक्टेड एंटीबायोटिक्स का उपयोग घटा, इलाज हुआ अधिक सटीक

अस्पतालों में एंटीबायोटिक के सही इस्तेमाल को लेकर एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय स्टडी सामने आई है, जिसमें पाया गया कि Penicillin Allergy Testing के जरिए गलत एलर्जी लेबल हटाने से इलाज की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। इस प्रक्रिया ने World Health Organization द्वारा सीमित (restricted) एंटीबायोटिक्स के उपयोग को भी कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विशेषज्ञों के अनुसार, अस्पताल में भर्ती लगभग 10 में से 1 मरीज खुद को पेनिसिलिन एलर्जी वाला बताता है, जबकि इनमें से अधिकांश मामलों में यह दावा गलत होता है। इसके चलते डॉक्टर अक्सर व्यापक (broad-spectrum) या कम प्रभावी एंटीबायोटिक्स का उपयोग करते हैं, जिससे एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस बढ़ता है और मरीजों के परिणाम भी प्रभावित होते हैं। कैसे किया गया अध्ययन? यह अध्ययन 8 देशों के 40 अस्पतालों में किया गया, जिसमें 5,000 से अधिक मरीज शामिल थे। जिन मरीजों ने पेनिसिलिन एलर्जी की जानकारी दी थी, उनका डिजिटल टूलकिट के जरिए मूल्यांकन किया गया। कुछ मरीजों पर Direct Oral Challenge (DOC) टेस्ट किया गया–यह एक निगरानी में किया जाने वाला परीक्षण है, जिससे यह पता लगाया जाता है कि वास्तव में एलर्जी है या नहीं। चौंकाने वाले नतीजे 1,573 मरीजों में DOC टेस्ट किया गया इनमें से 95.5% मरीजों को “डीलैबल” कर दिया गया, यानी वे वास्तव में एलर्जिक नहीं थे केवल 4.5% मरीजों में एलर्जी की पुष्टि हुई गंभीर साइड इफेक्ट बेहद कम (सिर्फ 0.4%) पाए गए एंटीबायोटिक इस्तेमाल पर असर इस टेस्टिंग का सीधा असर दवाइयों के चयन पर पड़ा: जिन मरीजों का DOC हुआ, उन्हें 90 दिनों के भीतर पेनिसिलिन मिलने की संभावना 13 गुना ज्यादा रही WHO के “Watch” और “Reserve” कैटेगरी के एंटीबायोटिक्स का उपयोग 27% तक कम हुआ यह परिणाम बताते हैं कि सही एलर्जी जांच एंटीबायोटिक के बेहतर और जिम्मेदार उपयोग (antibiotic stewardship) में अहम भूमिका निभा सकती है। चुनौतियां और आगे की राह हालांकि इस तकनीक के उपयोग में कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी सामने आईं, जैसे स्टाफ की कमी, प्रशिक्षण और जोखिम को लेकर धारणा। बावजूद इसके, 6 महीनों में 77 डॉक्टरों ने इस डिजिटल टूल को अपनाया, जो एक सकारात्मक संकेत है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर Penicillin Allergy Testing और DOC को नियमित चिकित्सा प्रक्रिया में शामिल किया जाता है, तो यह न केवल मरीजों के बेहतर इलाज में मदद करेगा, बल्कि एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस जैसी वैश्विक समस्या से निपटने में भी अहम भूमिका निभाएगा।  

surbhi अप्रैल 13, 2026 0
Laboratory scientist analyzing DNA sequencing data for paediatric leukaemia diagnosis using advanced genomic technology.
बच्चों में ल्यूकेमिया की पहचान में नई क्रांति: Long Read Sequencing से बढ़ी सटीकता और तेजी

बाल चिकित्सा के क्षेत्र में Paediatric Leukaemia की पहचान और इलाज को लेकर एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रगति सामने आई है। हाल ही में हुए एक अध्ययन में Long Read Sequencing तकनीक ने पारंपरिक जांच तरीकों की तुलना में अधिक सटीक और व्यापक परिणाम दिए हैं, जिससे बीमारी की पहचान और वर्गीकरण में बड़ा सुधार संभव हुआ है। क्या है Long Read Sequencing और क्यों है खास? ल्यूकेमिया में जीन फ्यूजन (Gene Fusion) बीमारी के मुख्य कारणों में से एक होते हैं, जो संरचनात्मक बदलावों (Structural Variants) से उत्पन्न होते हैं। वर्तमान क्लीनिकल प्रक्रियाओं में इन बदलावों को पहचानने के लिए कई अलग-अलग परीक्षणों की जरूरत पड़ती है, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ जाते हैं। लेकिन Long Read Sequencing एक ही टेस्ट में इन जटिल जीन बदलावों को पहचानने में सक्षम है, जिससे पूरी प्रक्रिया सरल और तेज हो सकती है। अध्ययन में क्या सामने आया? इस प्रूफ-ऑफ-कॉन्सेप्ट स्टडी में 17 बच्चों पर इस तकनीक का परीक्षण किया गया। परिणाम बेहद सकारात्मक रहे: सभी पहले से ज्ञात महत्वपूर्ण जीन बदलाव (5/5) को इस तकनीक ने सही तरीके से पहचाना पारंपरिक जांच के साथ 100% समानता (Concordance) देखी गई कई नए और पहले छूटे हुए जीन बदलाव भी सामने आए नई खोज: छूटे हुए मामलों की पहचान सबसे अहम बात यह रही कि इस तकनीक ने ऐसे जीन बदलाव भी पकड़े, जो पहले की जांच में सामने नहीं आए थे। इन नई खोजों की मदद से 12 में से 4 मरीजों में ल्यूकेमिया के एक विशेष जीन सबटाइप की पहचान संभव हो सकी, जो पहले तय नहीं हो पाई थी। इन्हीं में एक जटिल बदलाव ins(11;10)(q23.3;p12p12) भी शामिल था, जिससे KMT2A::MLLT10 जीन फ्यूजन बना–जो क्लीनिकली बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इलाज और भविष्य पर असर इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि Long Read Sequencing भविष्य में Paediatric Leukaemia के निदान के लिए एक प्रभावी “वन-स्टॉप सॉल्यूशन” बन सकता है। इसके संभावित फायदे: तेज और सटीक निदान कम लागत और समय बेहतर जीन आधारित वर्गीकरण मरीज के लिए अधिक सटीक इलाज की योजना विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तकनीक को नियमित क्लीनिकल प्रैक्टिस में शामिल किया जाता है, तो यह बच्चों में ल्यूकेमिया के इलाज के तरीके को पूरी तरह बदल सकती है।  

surbhi अप्रैल 13, 2026 0
Scientist analyzing blood sample for multi-cancer detection using advanced cfDNA methylation testing technology.
एक ही ब्लड टेस्ट से कई कैंसर का पता लगाने की दिशा में बड़ी सफलता, रिसर्च में चौंकाने वाले नतीजे

स्वास्थ्य क्षेत्र में एक बड़ी प्रगति सामने आई है, जहां वैज्ञानिकों ने एक ऐसा लो-कॉस्ट ब्लड टेस्ट विकसित किया है, जो एक साथ कई प्रकार के कैंसर का पता लगाने में सक्षम हो सकता है। यह नई तकनीक cell-free DNA (cfDNA) पर आधारित है, जिसे भविष्य में कैंसर स्क्रीनिंग के तरीके को पूरी तरह बदलने वाला माना जा रहा है। क्या है यह नई तकनीक? मल्टीकैंसर डिटेक्शन के लिए विकसित इस नई टेस्ट तकनीक का नाम MethylScan है। यह खून में मौजूद cfDNA के मिथाइलेशन पैटर्न का विश्लेषण करके शरीर के अलग-अलग अंगों से जुड़े कैंसर के संकेतों को पहचानता है। यह टेस्ट न केवल कम खर्चीला है, बल्कि एक ही सैंपल से कई बीमारियों की पहचान करने की क्षमता रखता है, जो इसे मौजूदा टेस्ट्स से अलग बनाता है। स्टडी में क्या पाया गया? इस रिसर्च में 1061 लोगों पर परीक्षण किया गया और इसके नतीजे बेहद प्रभावशाली रहे: लिवर, लंग, ओवेरियन और स्टमक कैंसर की पहचान में AUROC स्कोर 0.938 रहा सेंसिटिविटी 63.3% और स्पेसिफिसिटी 98% दर्ज की गई शुरुआती स्टेज के कैंसर में भी टेस्ट ने 0.916 का AUROC हासिल किया लिवर कैंसर मॉनिटरिंग में सेंसिटिविटी 79.6% तक पहुंची ये आंकड़े बताते हैं कि यह तकनीक शुरुआती चरण में भी कैंसर पहचानने की दिशा में कारगर हो सकती है। क्यों है यह खोज अहम? अब तक ज्यादातर कैंसर टेस्ट महंगे होते हैं और एक समय में एक ही बीमारी का पता लगा पाते हैं। लेकिन यह नया ब्लड टेस्ट: एक साथ कई कैंसर की पहचान कर सकता है शुरुआती स्टेज में बीमारी पकड़ने में मददगार हो सकता है कम लागत के कारण ज्यादा लोगों तक पहुंच सकता है क्या हैं सीमाएं? हालांकि यह शोध काफी उम्मीद जगाता है, लेकिन अभी इसे बड़े स्तर पर और अलग-अलग आबादी पर जांचने की जरूरत है। साथ ही शुरुआती स्टेज के कैंसर में सेंसिटिविटी को और बेहतर करने की आवश्यकता है। भविष्य की दिशा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में ऐसे ब्लड टेस्ट: कैंसर स्क्रीनिंग को आसान और सुलभ बना सकते हैं समय रहते इलाज शुरू करने में मदद करेंगे हेल्थकेयर सिस्टम पर बोझ कम कर सकते हैं

surbhi अप्रैल 11, 2026 0
Doctor analyzing prostate MRI scan to assess cancer risk and surgical treatment planning.
प्रोस्टेट सर्जरी से पहले MRI से मिल सकता है कैंसर के भविष्य का संकेत, नई स्टडी में बड़ा खुलासा

प्रोस्टेट कैंसर के इलाज में एक महत्वपूर्ण बदलाव सामने आया है। नई रिसर्च के अनुसार, सर्जरी से पहले किया गया MRI (मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग) अब केवल बीमारी की पहचान और स्टेजिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मरीज के दीर्घकालिक परिणामों का भी सटीक अनुमान लगाने में मदद कर सकता है। करीब 40 स्टडीज और 24,941 मरीजों के डेटा पर आधारित इस व्यापक मेटा-एनालिसिस ने यह साबित किया है कि प्री-ट्रीटमेंट MRI से डॉक्टरों को कैंसर के जोखिम और उसके फैलाव के बारे में अहम जानकारी मिल सकती है। MRI में दिखने वाले संकेत जो बढ़ाते हैं खतरा रिसर्च में पाया गया कि MRI में दिखने वाला Extraprostatic Extension (mrT3a) यानी कैंसर का प्रोस्टेट के बाहर फैलना, खराब परिणामों से जुड़ा है। ऐसे मरीजों में: बायोकेमिकल रिकरेंस (कैंसर का दोबारा उभरना) का खतरा 2 गुना से ज्यादा मेटास्टेसिस (कैंसर का फैलना) का जोखिम 3 गुना से अधिक प्रोस्टेट कैंसर से मृत्यु का खतरा लगभग 11 गुना ज्यादा पाया गया इसी तरह, Seminal Vesicle Invasion (mrT3b) भी एक हाई-रिस्क संकेत माना गया, जो कैंसर के तेजी से बढ़ने और फैलने की संभावना को बढ़ाता है। MRI के अन्य अहम पैरामीटर्स स्टडी में कुछ अन्य MRI आधारित संकेत भी सामने आए, जो कैंसर के दोबारा लौटने की संभावना को बढ़ाते हैं: उच्च PI-RADS स्कोर (4–5) ट्यूमर का आकार 20 mm या उससे अधिक कम ADC (Apparent Diffusion Coefficient) वैल्यू इन सभी फैक्टर्स से कैंसर के दोबारा होने का खतरा लगभग दोगुना हो जाता है, भले ही अन्य क्लिनिकल रिपोर्ट सामान्य क्यों न हों। इलाज की योजना बनाने में कैसे मददगार? विशेषज्ञों का मानना है कि सर्जरी से पहले सही रिस्क का आकलन बेहद जरूरी होता है। MRI से मिली जानकारी: मरीज को सही काउंसलिंग देने में मदद करती है सर्जरी की रणनीति तय करने में सहायक होती है एडजुवेंट थेरेपी (अतिरिक्त इलाज) की जरूरत का संकेत देती है क्यों है यह रिसर्च अहम? इस स्टडी में न तो कोई बड़ा पब्लिकेशन बायस पाया गया और न ही डेटा में असामान्य भिन्नता, जिससे इसके निष्कर्ष मजबूत माने जा रहे हैं। अब यह साफ होता जा रहा है कि MRI सिर्फ एक डायग्नोस्टिक टूल नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली प्रोग्नोस्टिक टूल भी है, जो मरीज के भविष्य के जोखिम को समझने में डॉक्टरों की मदद कर सकता है।  

surbhi अप्रैल 10, 2026 0
Doctor consulting patient via telemedicine app discussing diet plan for fatty liver and diabetes management
नई स्टडी में खुलासा: टेलीमेडिसिन से कम हो सकता है फैटी लिवर का खतरा, डायबिटीज मरीजों के लिए उम्मीद की किरण

एक नई स्टडी में सामने आया है कि न्यूट्रिशन आधारित टेलीमेडिसिन मॉडल, टाइप 2 डायबिटीज और मोटापे से जूझ रहे लोगों में लिवर से जुड़ी गंभीर बीमारी Metabolic dysfunction-associated steatotic liver disease (MASLD) के खतरे को काफी हद तक कम कर सकता है। MASLD एक ऐसी स्थिति है, जिसमें लिवर में फैट जमा होने लगता है और यह आगे चलकर गंभीर बीमारी Metabolic dysfunction-associated steatohepatitis में बदल सकती है, जिससे मृत्यु और अन्य जटिलताओं का जोखिम बढ़ जाता है। क्यों खतरनाक है MASLD? Type 2 Diabetes और मोटापे से पीड़ित लोगों में MASLD तेजी से बढ़ती समस्या बनती जा रही है। दुनियाभर में इसके मामलों में बढ़ोतरी के कारण डॉक्टर अब ऐसे उपायों की तलाश में हैं, जो आसान, सुलभ और लंबे समय तक असरदार हों। टेलीमेडिसिन से मिला बड़ा फायदा इस स्टडी में 2015 से 2024 के बीच 5,000 से ज्यादा मरीजों पर एक खास टेलीमेडिसिन प्रोग्राम कार्बोहाइड्रेट कम करने पर आधारित न्यूट्रिशन थेरेपी का असर देखा गया। रिसर्च में सामने आया कि: टेलीमेडिसिन अपनाने वाले मरीजों में लिवर रोग का खतरा 36% कम था गंभीर स्थिति (MASH) में जाने का खतरा 62% कम हुआ एडवांस्ड लिवर डिजीज का रिस्क 67% तक घटा लिवर से जुड़ी जटिलताएं 75% तक कम देखी गईं वजन घटाना बना सबसे बड़ा हथियार स्टडी में यह भी पाया गया कि जिन मरीजों ने 15% या उससे ज्यादा वजन कम किया, उनमें लिवर बीमारी का खतरा और भी कम हो गया। यानी डाइट कंट्रोल और वजन घटाना, दोनों मिलकर इस बीमारी के खिलाफ मजबूत सुरक्षा दे सकते हैं। ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों के लिए बड़ा समाधान टेलीमेडिसिन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह उन लोगों तक भी पहुंच सकता है, जहां हेल्थकेयर सुविधाएं सीमित हैं। ऐसे में यह मॉडल भविष्य में बड़े स्तर पर लागू किया जा सकता है।  

surbhi अप्रैल 4, 2026 0
Popular post
शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Top week

RIMS hostel death
झारखंड

रिम्स हॉस्टल में एमबीबीएस छात्र की मौत, फंदे से लटका शव बरामद

Anjali Kumari मई 16, 2026 0