यरुशलम/बेरूत: मध्य पूर्व में लंबे समय से जारी संघर्ष को खत्म करने की दिशा में अमेरिका की मध्यस्थता से इजरायल और लेबनान के बीच एक महत्वपूर्ण फ्रेमवर्क समझौता तैयार किया गया है। इस समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच स्थायी शांति और सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था बहाल करना है। समझौते की घोषणा के तुरंत बाद हिज्बुल्लाह ने इसका कड़ा विरोध करते हुए चेतावनी दी है कि यदि इसे लागू करने की कोशिश की गई तो लेबनान गृहयुद्ध जैसी स्थिति की ओर बढ़ सकता है। अमेरिका ने किया समझौते का ऐलान अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने शुक्रवार को इस फ्रेमवर्क समझौते की घोषणा करते हुए कहा कि यह इजरायल और लेबनान के बीच स्थायी शांति की दिशा में पहला बड़ा कदम है। उन्होंने बताया कि अमेरिका ने पूरे समझौते में मध्यस्थ और सहयोगी की भूमिका निभाई है। इस समझौते पर लेबनान की राजदूत नादा हमादेह, इजरायल के राजदूत येचिएल लेइटर और अमेरिकी विदेश विभाग के अधिकारियों ने हस्ताक्षर किए। क्या हैं समझौते की प्रमुख शर्तें? समझौते के तहत दक्षिणी लेबनान में तत्काल युद्धविराम लागू करने और हिज्बुल्लाह द्वारा सभी तरह की सैन्य गतिविधियां एवं रॉकेट हमले रोकने की शर्त रखी गई है। इसके साथ ही संगठन को दक्षिणी लेबनान से पीछे हटना होगा। जिन इलाकों से इजरायली सेना और हिज्बुल्लाह पीछे हटेंगे, वहां लेबनानी सेना की तैनाती की जाएगी ताकि सीमा क्षेत्र में स्थायी सुरक्षा व्यवस्था स्थापित की जा सके। अमेरिका करेगा निगरानी, लेबनान को मिलेगी आर्थिक सहायता मार्को रुबियो ने बताया कि समझौते के क्रियान्वयन की निगरानी अमेरिका की अगुवाई में बनाए गए त्रिपक्षीय सैन्य समन्वय समूह द्वारा की जाएगी। इसके अलावा अमेरिका ने लेबनान के लिए तत्काल 10 करोड़ डॉलर की मानवीय सहायता देने की घोषणा की है। साथ ही लेबनानी सशस्त्र बलों को मजबूत करने और सरकारी नियंत्रण बढ़ाने के लिए 3 करोड़ डॉलर से अधिक की अतिरिक्त सहायता भी उपलब्ध कराई जाएगी। दक्षिणी लेबनान में बनाए जाएंगे दो पायलट जोन समझौते के तहत दक्षिणी लेबनान में दो पायलट सुरक्षा क्षेत्र विकसित किए जाएंगे। इन क्षेत्रों से इजरायली सेना चरणबद्ध तरीके से पीछे हटेगी और उनकी जगह लेबनानी सेना तैनात होगी। इजरायल ने स्पष्ट किया है कि सेना की पूरी वापसी तभी होगी जब हिज्बुल्लाह अपने हथियार छोड़ेगा और उसका सैन्य ढांचा पूरी तरह समाप्त होगा। लेबनान ने बताया संप्रभुता बहाल करने की दिशा में बड़ा कदम अमेरिका में लेबनान की राजदूत नादा हमादेह ने इस समझौते का स्वागत करते हुए कहा कि इससे लेबनान की संप्रभुता मजबूत होगी, सीमा पर संघर्ष समाप्त होगा और विस्थापित नागरिक अपने घर लौट सकेंगे। उन्होंने इस पहल का श्रेय लेबनान के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सशस्त्र बलों के सहयोग को दिया। नेतन्याहू बोले- हिज्बुल्लाह के निरस्त्रीकरण पर निर्भर करेगी आगे की कार्रवाई इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि लेबनानी सेना जल्द ही सीमावर्ती इलाकों का नियंत्रण संभालेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि इजरायली सेना की आगे की वापसी पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगी कि लेबनानी सेना हिज्बुल्लाह को हथियार छोड़ने और उसके सैन्य ढांचे को खत्म करने में कितनी सफल रहती है। इजरायल के राजदूत येचिएल लेइटर ने भी इस समझौते को "परफॉर्मेंस आधारित" बताते हुए कहा कि इसकी सफलता पूरी तरह जमीनी स्तर पर लागू होने वाले कदमों पर निर्भर करेगी। हिज्बुल्लाह ने किया समझौते का विरोध समझौते की घोषणा के तुरंत बाद हिज्बुल्लाह ने इसका कड़ा विरोध किया। संगठन के वरिष्ठ सांसद हसन फदलल्लाह ने कहा कि यदि लेबनानी सरकार अमेरिकी समर्थन के साथ इस समझौते को लागू करने की कोशिश करती है तो देश गृहयुद्ध जैसी स्थिति में पहुंच सकता है। उन्होंने कहा कि हिज्बुल्लाह किसी भी कीमत पर अपने हथियार नहीं छोड़ेगा और इस दिशा में किए जाने वाले हर प्रयास का विरोध करेगा। हजारों लोगों की जान ले चुका है संघर्ष इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच मौजूदा संघर्ष में अब तक भारी जनहानि हो चुकी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इजरायली सैन्य कार्रवाई में 4,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 10 लाख से ज्यादा लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं। वहीं संघर्ष के दौरान 37 इजरायली सैनिकों के भी मारे जाने की जानकारी सामने आई है। ऐसे में यह समझौता क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने की दिशा में एक अहम पहल माना जा रहा है, हालांकि हिज्बुल्लाह के विरोध के चलते इसके सफल क्रियान्वयन को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है।
Israel-Lebanon Conflict: दक्षिणी लेबनान में इज़राइल की सैन्य मौजूदगी को लेकर एक नया दावा सामने आने के बाद क्षेत्र में हलचल तेज हो गई है। एक अमेरिकी अधिकारी ने दावा किया है कि इज़राइल ने दक्षिणी लेबनान के कुछ कब्जे वाले इलाकों से अपनी सेना हटा ली है। लेबनान के अधिकारियों ने इस दावे की पुष्टि करने से इनकार किया है। ऐसे में सीमा पर हालात अब भी तनावपूर्ण बने हुए हैं और विस्थापित नागरिक अपने घर लौटने का इंतजार कर रहे हैं। अमेरिकी अधिकारी का दावा, लेबनान ने नहीं की पुष्टि मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि इज़राइली सेना दक्षिणी लेबनान के कुछ इलाकों से पीछे हट चुकी है और अब वहां सुरक्षा की जिम्मेदारी लेबनानी सेना को संभालनी चाहिए। यह दावा ऐसे समय सामने आया है, जब अमेरिका क्षेत्रीय तनाव कम करने के लिए लगातार कूटनीतिक प्रयास कर रहा है। लेबनान के एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि दक्षिणी लेबनान में इज़राइल द्वारा बनाए गए तथाकथित "बफर जोन" से सेना हटने की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। युद्धविराम के बावजूद सीमा पर तनाव कायम इज़राइल और हिज्बुल्लाह के बीच लंबे समय से जारी संघर्ष के बीच कई बार युद्धविराम की घोषणा की गई, लेकिन सीमा पर तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। हाल के महीनों में छिटपुट घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। फिलहाल अमेरिका की मध्यस्थता से क्षेत्र में तनाव कम करने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात अब भी सामान्य नहीं हो पाए हैं। ईरान और हिज्बुल्लाह की स्पष्ट शर्त ईरान ने कहा है कि किसी भी व्यापक शांति समझौते में लेबनान की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और इज़राइल को दक्षिणी लेबनान से पूरी तरह सेना हटानी होगी। वहीं, हिज्बुल्लाह ने भी स्पष्ट किया है कि वह अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में किसी भी तरह की इज़राइली सैन्य मौजूदगी स्वीकार नहीं करेगा और कब्जे का विरोध जारी रखेगा। घर लौटने का इंतजार कर रहे हजारों विस्थापित दक्षिणी लेबनान के कई गांव युद्ध के दौरान भारी तबाही का शिकार हुए हैं। बड़ी संख्या में लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए थे और अब भी सुरक्षित वापसी का इंतजार कर रहे हैं। दिब्बीन गांव की निवासी मिलिया अल-शेख ने बताया कि उनका घर अब भी बंद सैन्य क्षेत्र में है। गांव तक जाने वाले रास्तों पर कंटीले तार लगे हैं और आम नागरिकों की आवाजाही प्रतिबंधित है। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि उन्हें अपने घर की मौजूदा स्थिति तक की जानकारी नहीं है। स्थायी शांति पर टिकी दुनिया की नजर दक्षिणी लेबनान में हालात को लेकर अब भी असमंजस बना हुआ है। एक ओर सेना हटने के दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर स्थानीय प्रशासन इसकी पुष्टि नहीं कर रहा। ऐसे में क्षेत्र के हजारों विस्थापित लोगों की सुरक्षित वापसी और स्थायी शांति को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर आने वाले घटनाक्रम पर टिकी हुई है।
Donald Trump Iran Warning: मध्य पूर्व में शांति बहाली की कोशिशों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है। स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में अमेरिका, ईरान, पाकिस्तान और कतर के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत जारी है, लेकिन इसी दौरान ट्रंप ने ईरान को सीधे सैन्य कार्रवाई की चेतावनी देकर तनाव बढ़ा दिया है। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर दी धमकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक सख्त पोस्ट साझा करते हुए कहा कि ईरान को लेबनान में सक्रिय अपने समर्थित सशस्त्र गुटों और प्रॉक्सी संगठनों को तुरंत हिंसक गतिविधियां रोकने के लिए कहना चाहिए। ट्रंप ने लिखा, "यदि ईरान ने अपने भारी भुगतान पाने वाले प्रॉक्सी संगठनों को तबाही मचाने से नहीं रोका, तो अमेरिका फिर से बड़ा हमला करेगा। यह हमला पिछले सप्ताह की कार्रवाई से भी कहीं अधिक भीषण होगा।" शांति वार्ता के बीच बढ़ा कूटनीतिक दबाव ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है, जब स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के लिए महत्वपूर्ण वार्ता चल रही है। इस बैठक में पाकिस्तान और कतर मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं और परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा तथा आर्थिक प्रतिबंधों जैसे मुद्दों पर चर्चा हो रही है। ट्रंप की नई चेतावनी ने इस शांति प्रक्रिया पर अनिश्चितता के बादल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति का यह बयान ईरान पर अतिरिक्त कूटनीतिक दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा है। लेबनान में ईरान समर्थित गुटों को लेकर अमेरिका चिंतित अमेरिका लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि ईरान लेबनान में सक्रिय अपने समर्थित संगठनों, विशेष रूप से हिज्बुल्लाह, के जरिए क्षेत्र में अस्थिरता पैदा करता है। वॉशिंगटन का मानना है कि इन संगठनों की गतिविधियां न केवल इजरायल बल्कि पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा के लिए चुनौती हैं। ट्रंप ने अपने संदेश में स्पष्ट संकेत दिया कि यदि ईरान ने इन समूहों पर नियंत्रण नहीं किया, तो अमेरिका सैन्य विकल्प अपनाने से पीछे नहीं हटेगा। वार्ता पर पड़ सकता है असर विश्लेषकों का कहना है कि एक तरफ शांति वार्ता और दूसरी तरफ सैन्य कार्रवाई की खुली चेतावनी, दोनों मिलकर अमेरिका-ईरान संबंधों को और जटिल बना सकते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि ईरान ट्रंप की चेतावनी पर क्या प्रतिक्रिया देता है और क्या स्विट्जरलैंड में जारी वार्ता किसी ठोस समझौते तक पहुंच पाती है। मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच ट्रंप का यह बयान एक बार फिर इस क्षेत्र की नाजुक स्थिति को उजागर करता है।
वॉशिंगटन/बेरूत: पश्चिम एशिया में शांति स्थापित करने की कोशिशों को बड़ा झटका लगा है। अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी शांति समझौते को अंतिम रूप देने के लिए स्विट्जरलैंड में प्रस्तावित उच्चस्तरीय वार्ता फिलहाल टल गई है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने अपना स्विट्जरलैंड दौरा रद्द कर दिया है। इस बीच इजरायल ने दक्षिणी लेबनान में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर हवाई हमले तेज कर दिए हैं, जिनमें कम से कम 16 लोगों की मौत हो गई है। ताजा घटनाक्रम ने अमेरिका-ईरान शांति पहल और पश्चिम एशिया में युद्धविराम की उम्मीदों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वर्साय समझौते के बाद भी नहीं रुके इजरायली हमले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की मौजूदगी में बुधवार को फ्रांस के वर्साय महल में अमेरिका और ईरान के बीच एक प्रारंभिक 14-सूत्रीय समझौता हुआ था। इस समझौते का उद्देश्य पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को रोकना और सभी मोर्चों पर तत्काल सैन्य कार्रवाई समाप्त करना था। समझौते के कुछ ही घंटों बाद इजरायली सेना ने दक्षिणी लेबनान में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर ताबड़तोड़ हवाई हमले शुरू कर दिए। इन हमलों में 16 लोगों के मारे जाने की खबर है। नेतन्याहू ने पीछे हटने से किया इनकार इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक हिजबुल्लाह का खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता, तब तक इजरायली सेना लेबनान में अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रखेगी। नेतन्याहू के इस रुख ने युद्धविराम और क्षेत्रीय शांति की संभावनाओं को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। स्विट्जरलैंड में होने वाली तकनीकी वार्ता टली अमेरिका और ईरान के बीच हुए प्रारंभिक समझौते को स्थायी शांति समझौते में बदलने के लिए शुक्रवार को स्विट्जरलैंड के बुर्गेनस्टॉक रिसॉर्ट में तकनीकी स्तर की वार्ता प्रस्तावित थी। इस बैठक का नेतृत्व अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को करना था, लेकिन उन्होंने अपना स्विट्जरलैंड दौरा रद्द कर दिया, जिसके बाद यह वार्ता अनिश्चितकाल के लिए टाल दी गई। व्हाइट हाउस ने बताई 'लॉजिस्टिक्स' समस्या व्हाइट हाउस ने जेडी वेंस का दौरा रद्द होने के पीछे व्यवस्थागत और लॉजिस्टिक्स संबंधी कारणों का हवाला दिया है। हिजबुल्लाह समर्थक मीडिया संस्थान अल-मायादीन की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने लेबनान पर इजरायल के लगातार हो रहे हमलों के विरोध में अपने प्रतिनिधिमंडल को स्विट्जरलैंड भेजने से इनकार कर दिया है। इजरायल को जेडी वेंस की दोटूक चेतावनी शांति समझौते के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इजरायल को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि इस समय दुनिया में केवल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ही ऐसे नेता हैं जो इजरायल के प्रति सबसे अधिक सहानुभूति रखते हैं। वेंस के बयान को इजरायल के आक्रामक सैन्य रुख पर अमेरिकी असंतोष और युद्ध रोकने के बढ़ते दबाव के रूप में देखा जा रहा है। अधर में लटका 60 दिनों का युद्धविराम बुधवार को हुए समझौते के तहत कम-से-कम 60 दिनों के लिए संघर्षविराम बढ़ाने पर सहमति बनी थी। लेकिन लेबनान में जारी इजरायली हमलों और स्विट्जरलैंड वार्ता के टलने से पूरा शांति समझौता संकट में पड़ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लेबनान में हिंसा नहीं रुकी, तो पश्चिम एशिया में शांति स्थापित करने की यह बड़ी कूटनीतिक पहल पूरी तरह विफल हो सकती है। पश्चिम एशिया में फिर बढ़ा अनिश्चितता का माहौल अमेरिका-ईरान समझौते के बावजूद लेबनान में जारी संघर्ष और इजरायल के सख्त रुख ने क्षेत्र में तनाव को फिर बढ़ा दिया है। अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच कोई नया कूटनीतिक रास्ता निकलेगा या पश्चिम एशिया एक बार फिर व्यापक संघर्ष की ओर बढ़ेगा।
वॉशिंगटन: लेबनान की राजधानी बेरूत पर इजराइली हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। ट्रंप ने इजराइल और ईरान दोनों को चेतावनी देते हुए कहा कि पश्चिम एशिया में शांति स्थापित करने के प्रयास निर्णायक चरण में हैं और ऐसे समय में किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई से बचना चाहिए। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर पोस्ट करते हुए कहा, “आज सुबह बेरूत पर हुआ हमला नहीं होना चाहिए था, खासकर ऐसे दिन जब हम ईरान के साथ शांति समझौते के बहुत करीब हैं।” ‘इजराइल को आत्मरक्षा का अधिकार, लेकिन जवाबी हमला बेमतलब था’ ट्रंप ने कहा कि इजराइल को अपनी सुरक्षा और खतरों से बचाव का पूरा अधिकार है, लेकिन जिस घटना के जवाब में यह हमला किया गया, उसमें कोई घायल या हताहत नहीं हुआ था। ऐसे में इस तरह की सैन्य कार्रवाई की आवश्यकता नहीं थी। उन्होंने कहा, “इजराइल को अपने नागरिकों की रक्षा करने का अधिकार है, लेकिन इस मामले में की गई जवाबी कार्रवाई बेमतलब थी।” ‘अब आगे कोई हमला नहीं होना चाहिए’ अमेरिकी राष्ट्रपति ने सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील करते हुए कहा कि क्षेत्र में शांति स्थापित करने के लिए सभी पक्षों को पीछे हटना होगा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न केवल इजराइल को लेबनान में आगे कोई हमला नहीं करना चाहिए, बल्कि हिज्बुल्ला और अन्य संगठनों को भी इजराइल के खिलाफ किसी प्रकार की सैन्य कार्रवाई से बचना चाहिए। ट्रंप ने लिखा, “हम एक ऐसे समझौते के बेहद करीब हैं, जो लेबनान समेत पूरे क्षेत्र में शांति ला सकता है। सभी पक्षों को पीछे हटना चाहिए। इजराइल को लेबनान में और हमले नहीं करने चाहिए और हिज्बुल्ला समेत किसी भी अन्य पक्ष को भी इजराइल पर हमला नहीं करना चाहिए।”
बेरूत: पश्चिम एशिया में तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। इजराइल की सेना (IDF) ने रविवार को लेबनान की राजधानी बेरूत में हिज्बुल्ला से जुड़े ठिकानों पर हवाई हमले किए। इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के कार्यालय ने कहा कि यह कार्रवाई उत्तरी इजराइल पर हिज्बुल्ला के हालिया हमलों के जवाब में की गई है। इजराइली सेना के मुताबिक, हमलों का निशाना हिज्बुल्ला से संबंधित सैन्य ढांचे और रणनीतिक ठिकाने थे। इससे पहले भी इजराइल ने एक सप्ताह पूर्व बेरूत के दक्षिणी उपनगरों पर हमला किया था, जिसके बाद क्षेत्रीय तनाव और बढ़ गया था। हिज्बुल्ला के मिसाइल हमलों के बाद बढ़ा तनाव हिज्बुल्ला ने दो मार्च को उत्तरी इजराइल पर कई मिसाइलें दागी थीं। यह हमला अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के खिलाफ की गई सैन्य कार्रवाई के दो दिन बाद हुआ था। हिज्बुल्ला ने इन हमलों को क्षेत्रीय आक्रामकता के खिलाफ जवाबी कदम बताया था। इजराइल का कहना है कि वह अपनी सुरक्षा और नागरिकों की रक्षा के लिए आवश्यक सभी कदम उठाने के लिए प्रतिबद्ध है और सीमा पार से होने वाले हमलों का कड़ा जवाब दिया जाएगा। ईरान ने रखी नई शर्त हिज्बुल्ला के प्रमुख समर्थक ईरान ने कहा है कि अमेरिका-ईरान युद्धविराम समझौते में लेबनान में इजराइली सैन्य अभियानों को रोकना भी शामिल होना चाहिए। तेहरान का कहना है कि यदि लेबनान में हमले जारी रहते हैं, तो क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करना मुश्किल होगा। अमेरिका-ईरान युद्धविराम पर पाकिस्तान का दावा इस बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान पश्चिम एशिया में युद्ध समाप्त करने के लिए एक अंतिम मसौदा समझौते की शर्तों पर सहमत हो गए हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने मध्यस्थता की कोशिशों में भूमिका निभाई है और दोनों देशों के साथ आगे की प्रक्रिया पर काम कर रहा है। गौरतलब है कि अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के खिलाफ 28 फरवरी को शुरू किए गए सैन्य अभियान के बाद पूरे पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ गई थी। इस संघर्ष के कारण फारस की खाड़ी से तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति भी गंभीर रूप से प्रभावित हुई। सात अप्रैल से दोनों पक्षों के बीच युद्धविराम लागू है, लेकिन इजराइल-हिज्बुल्ला तनाव के चलते क्षेत्र में हालात अब भी नाजुक बने हुए हैं।
मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। ईरान द्वारा इजरायल पर बैलिस्टिक मिसाइल हमले किए जाने के बाद इजरायल ने जवाबी कार्रवाई करते हुए तेहरान समेत कई ईरानी शहरों में सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने दावा किया कि क्षेत्रीय घटनाक्रमों पर अंतिम निर्णय वही लेते हैं और कूटनीतिक समाधान की कोशिशें अभी भी जारी हैं। ईरानी मिसाइल हमले के बाद बदला घटनाक्रम रविवार रात ईरान ने इजरायल पर कई बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। अप्रैल में हुए युद्धविराम के बाद दोनों देशों के बीच यह पहली प्रत्यक्ष सैन्य भिड़ंत मानी जा रही है। तेहरान ने कहा कि यह कार्रवाई लेबनान की राजधानी Beirut पर इजरायली हमलों के जवाब में की गई है। ईरान का आरोप है कि लेबनान में इजरायल के सैन्य अभियान ने क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ाया है। उत्तरी इजरायल में गूंजे सायरन ईरान ने दावा किया कि उसने उत्तरी इजरायल की ओर 10 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। हमले की चेतावनी मिलते ही कई इलाकों में एयर रेड सायरन बजने लगे और नागरिकों को सुरक्षित स्थानों पर जाने के निर्देश दिए गए। ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के अनुसार, हमले का प्रमुख लक्ष्य रामत डेविड एयर बेस था। दूसरी ओर इजरायली सेना ने कहा कि उसकी वायु रक्षा प्रणाली ने अधिकांश मिसाइलों को रास्ते में ही नष्ट कर दिया। तेहरान, इस्फहान और तबरीज में धमाकों की आवाजें ईरान के हमले के कुछ घंटों बाद तेहरान के कई हिस्सों में जोरदार विस्फोट सुनाई दिए। Tehran के मेहराबाद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के आसपास भी धमाकों की सूचना मिली। इसके अलावा Isfahan और Tabriz में भी विस्फोट दर्ज किए गए। रिपोर्टों के मुताबिक, खुजेस्तान प्रांत के बंदर-ए-महशहर स्थित करुण पेट्रोकेमिकल कंपनी को भी निशाना बनाया गया। इजरायली वायु सेना ने कहा कि उसके वरिष्ठ सैन्य अधिकारी लगातार स्थिति की समीक्षा कर रहे हैं और ईरान में चल रहे सैन्य अभियानों की निगरानी कर रहे हैं। लेबनान बना विवाद का केंद्र मौजूदा संघर्ष का सबसे बड़ा कारण लेबनान में जारी सैन्य गतिविधियां हैं। ईरान लगातार कहता रहा है कि लेबनान पर इजरायली हमले बंद होना किसी भी व्यापक शांति समझौते की पूर्व शर्त है। मार्च से इजरायल, Hezbollah के खिलाफ अभियान चला रहा है। इजरायल का आरोप है कि संगठन ने उसकी सीमा पर रॉकेट और ड्रोन हमले किए थे, जबकि ईरान का कहना है कि लेबनान में सैन्य कार्रवाई जारी रहने तक स्थायी शांति संभव नहीं है। ट्रंप बोले- अंतिम फैसले मैं लेता हूं तनावपूर्ण हालात के बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उम्मीद जताई कि ईरान के साथ वार्ता पूरी तरह विफल नहीं हुई है। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि मौजूदा घटनाक्रम से समझौते की संभावनाओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा और क्षेत्रीय मामलों में अंतिम निर्णय वही लेते हैं। रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप ने हाल ही में इजरायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu से फोन पर बातचीत भी की थी और उन्हें आगे सैन्य कार्रवाई से बचने की सलाह दी थी। ईरान की कड़ी चेतावनी ईरान के संसद अध्यक्ष Mohammad Bagher Ghalibaf ने कहा कि अमेरिकी सैन्य ठिकाने और इजरायली हित अब वैध लक्ष्य हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि क्षेत्रीय समझौतों का उल्लंघन होने के कारण हालात बिगड़े हैं। अप्रैल में युद्धविराम लागू होने के बाद से रविवार तक ईरान ने सीधे तौर पर इजरायल पर हमला नहीं किया था, लेकिन अब उसने प्रत्यक्ष जवाबी कार्रवाई की है। तेल बाजार में बढ़ी चिंता ईरान-इजरायल तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी दिखाई दिया। सोमवार की शुरुआती ट्रेडिंग में कच्चे तेल की कीमतों में 3 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई और ब्रेंट क्रूड 96 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संघर्ष और बढ़ता है तो वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, खासकर Strait of Hormuz को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल परिवहन होता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और इजराइल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu के बीच लेबनान में जारी सैन्य कार्रवाई को लेकर तीखी बातचीत हुई है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप ने हिजबुल्लाह के खिलाफ इजराइल के बढ़ते हमलों पर नाराजगी जताते हुए नेतन्याहू से सीधे सवाल किए। माना जा रहा है कि इस मुद्दे ने वॉशिंगटन और तेल अवीव के बीच उभरते मतभेदों को भी सामने ला दिया है। लेबनान में बढ़े हमलों से बढ़ी क्षेत्रीय तनाव की आशंका रिपोर्ट्स के मुताबिक, इजराइल ने हाल के दिनों में लेबनान की राजधानी बेरूत के दक्षिणी इलाकों में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर हमले तेज कर दिए हैं। इसके साथ ही दक्षिणी लेबनान में जमीनी सैन्य अभियान भी आगे बढ़ाया गया है। इन घटनाओं के बाद पूरे क्षेत्र में बड़े संघर्ष की आशंका बढ़ गई है। अमेरिका को चिंता है कि क्षेत्र में बढ़ता तनाव ईरान के साथ चल रही कूटनीतिक वार्ताओं को प्रभावित कर सकता है। वहीं, ईरान ने भी चेतावनी दी है कि ऐसी सैन्य कार्रवाइयां शांति प्रयासों को कमजोर कर सकती हैं। रिपोर्ट में ट्रंप की कड़ी प्रतिक्रिया का दावा डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म Axios की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने फोन पर नेतन्याहू के फैसलों को लेकर तीखी नाराजगी जताई। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ट्रंप का मानना है कि इजराइल की मौजूदा रणनीति उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग कर सकती है और अमेरिका की कूटनीतिक कोशिशों को भी नुकसान पहुंचा सकती है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया कि बातचीत के दौरान ट्रंप ने नेतन्याहू के रवैये पर बेहद कठोर टिप्पणी की और कहा कि उनके कदमों के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। “आखिर आप कर क्या रहे हैं?”: रिपोर्ट एक अमेरिकी अधिकारी के हवाले से दावा किया गया है कि फोन वार्ता के दौरान ट्रंप ने नेतन्याहू से नाराजगी भरे लहजे में पूछा, “आखिर आप कर क्या रहे हैं?” रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति का मानना था कि लगातार सैन्य कार्रवाई क्षेत्रीय हालात को और जटिल बना सकती है। इन दावों पर व्हाइट हाउस या इजराइली प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। बेरूत में हमलों के बाद बढ़ी लोगों की चिंता सोमवार को नेतन्याहू और इजराइल के रक्षा मंत्री ने बेरूत के दहियेह इलाके में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर कार्रवाई का आदेश दिया। इजराइल का आरोप है कि हिजबुल्लाह युद्धविराम समझौते का उल्लंघन कर रहा है और उसके क्षेत्र पर हमले कर रहा है। हमलों की खबर के बाद बेरूत के दक्षिणी उपनगरों में दहशत का माहौल बन गया। संभावित हवाई हमलों की आशंका के बीच कई लोगों ने सुरक्षित स्थानों की ओर रुख किया। ईरान ने दी नई चेतावनी Iran ने कहा है कि लेबनान में जारी इजराइली सैन्य अभियान अमेरिका और ईरान के बीच चल रही वार्ताओं को प्रभावित कर सकता है। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि क्षेत्र में स्थायी शांति के लिए लेबनान में युद्धविराम बनाए रखना आवश्यक है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि लेबनान मोर्चे पर तनाव और बढ़ता है, तो इसका असर न केवल इजराइल-हिजबुल्लाह संघर्ष पर पड़ेगा, बल्कि अमेरिका-ईरान संबंधों और पूरे पश्चिम एशिया की स्थिरता पर भी दिखाई दे सकता है।
मिडिल ईस्ट यानी पश्चिम एशिया में हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। गाजा में इजरायल और हमास के बीच जंग तेज है, वहीं लेबनान सीमा पर हिजबुल्लाह और इजरायल के बीच भी हमले बढ़ गए हैं। दूसरी तरफ ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव पूरे क्षेत्र में नए संकट का संकेत दे रहा है। इन हालातों से भारत की चिंता भी बढ़ गई है। गाजा में इजरायल का बड़ा हमला इजरायल ने गाजा में हमास के सैन्य प्रमुख मोहम्मद ओदेह को निशाना बनाकर बड़ा हमला किया है। इजरायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने कहा कि 7 अक्टूबर हमले में शामिल लोगों को छोड़ा नहीं जाएगा। इजरायल का दावा है कि यह कार्रवाई आतंकवाद के खिलाफ अभियान का हिस्सा है। इस हमले के बाद गाजा में आम लोगों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। लगातार बमबारी से कई इलाकों में भारी नुकसान हुआ है और मानवीय संकट गहरा रहा है। लेबनान सीमा पर भी बढ़ा तनाव इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच लेबनान सीमा पर भी हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं। लेबनान से रॉकेट और ड्रोन हमलों के बाद इजरायल ने कई इलाकों में जवाबी कार्रवाई की है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, हाल के महीनों में लेबनान में हजारों लोगों की मौत हो चुकी है। सीमा पर लगातार हो रहे हमलों से पूरे इलाके में डर का माहौल है। ईरान और अमेरिका के बीच टकराव अमेरिका ने हाल ही में ईरान के कुछ सैन्य ठिकानों और जहाजों पर हमला किया। अमेरिकी सेना का कहना है कि यह कार्रवाई अपने सैनिकों की सुरक्षा के लिए की गई थी। वहीं ईरान ने इसे उकसावे वाली कार्रवाई बताते हुए जवाब देने की चेतावनी दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कहा कि ईरान के साथ समझौते की कोशिश जारी है, लेकिन अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है। दूसरी तरफ ईरान का कहना है कि बातचीत जारी है, लेकिन जल्द समझौते की उम्मीद नहीं है। तेल और व्यापार पर पड़ सकता है असर मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर दुनिया की अर्थव्यवस्था पर भी दिख सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में शामिल है। अगर यहां हालात और खराब होते हैं तो तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं और समुद्री व्यापार प्रभावित हो सकता है। भारत क्यों है चिंतित? भारत के लिए मिडिल ईस्ट बेहद अहम क्षेत्र है। भारत अपने तेल का बड़ा हिस्सा इसी इलाके से खरीदता है। इसके अलावा लाखों भारतीय वहां काम करते हैं। ऐसे में युद्ध बढ़ने का असर भारत की अर्थव्यवस्था और नागरिकों पर भी पड़ सकता है। भारत ने सभी पक्षों से शांति बनाए रखने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की है। भारतीय विदेश मंत्रालय लगातार हालात पर नजर बनाए हुए है। शांति की राह अभी मुश्किल गाजा, लेबनान और ईरान से जुड़े अलग-अलग मोर्चों पर बढ़ते तनाव ने पूरे मिडिल ईस्ट को अस्थिर बना दिया है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ती टकराहट के कारण आने वाले दिनों में हालात और गंभीर हो सकते हैं। फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या बातचीत से हालात संभलेंगे या संघर्ष और बढ़ेगा।
इजरायल ने दावा किया है कि गाजा पट्टी में चलाए गए एक बड़े सैन्य अभियान में हमास के नए सैन्य प्रमुख मोहम्मद ओदेह को मार गिराया गया है। इजरायल डिफेंस फोर्स (IDF) के मुताबिक, गाजा के रिमाल इलाके में की गई एयरस्ट्राइक में ओदेह की मौत हुई। इजरायली सेना का कहना है कि मोहम्मद ओदेह 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल पर हुए हमले के प्रमुख योजनाकारों में शामिल था। एक हफ्ते पहले ही बना था हमास का नया सैन्य प्रमुख इजरायल के अनुसार, मोहम्मद ओदेह को करीब एक सप्ताह पहले ही हमास की सैन्य शाखा की कमान सौंपी गई थी। उसने एज्जेदीन अल-हद्दाद की जगह ली थी। इजरायल ने दावा किया था कि एज्जेदीन अल-हद्दाद की भी 15 मई को गाजा में किए गए एक हमले में मौत हो गई थी। नेतन्याहू बोले- सभी जिम्मेदार लोगों तक पहुंचेंगे इजरायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने इस कार्रवाई की पुष्टि करते हुए कहा कि 7 अक्टूबर हमले में शामिल हर व्यक्ति को निशाना बनाया जाएगा। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि इजरायल हमले के सभी जिम्मेदार लोगों तक पहुंचेगा और कार्रवाई जारी रहेगी। ओदेह पर हत्या और अपहरण की साजिश का आरोप इजरायली सेना ने मोहम्मद ओदेह पर कई इजरायली नागरिकों और सैनिकों की हत्या, अपहरण और हमलों की साजिश रचने का आरोप लगाया है। IDF के मुताबिक, 7 अक्टूबर हमले के दौरान वह हमास के इंटेलिजेंस स्टाफ का प्रमुख था और हमले की योजना तैयार करने में उसकी अहम भूमिका थी। दक्षिण लेबनान में भी बढ़े इजरायली हमले गाजा के साथ-साथ इजरायल ने दक्षिण लेबनान में भी अपने हवाई हमले तेज कर दिए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, टायर और मरजायौन जिलों समेत कई इलाकों में लगातार एयरस्ट्राइक की गईं। बुर्ज रहाल, सरीफा, अस-सवाना और कबरिखा जैसे इलाकों को भी निशाना बनाया गया। अरबी मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि मंगलवार को हुए हमलों में 31 लोगों की मौत हुई, जबकि करीब 40 लोग घायल हुए हैं। हिजबुल्लाह पर दबाव बढ़ा रहा इजरायल प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने हाल ही में सेना को हिजबुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई और तेज करने के निर्देश दिए थे। उन्होंने कहा था कि इजरायल हिजबुल्लाह के साथ युद्ध जैसी स्थिति में है और हाल के हफ्तों में उसके 600 से ज्यादा लड़ाकों को मार गिराया गया है। इजरायल ने कहा- कार्रवाई और तेज होगी नेतन्याहू ने अपने वीडियो संदेश में कहा कि इजरायल अपनी सैन्य कार्रवाई धीमी नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि सेना को और अधिक तेज और सख्त अभियान चलाने के निर्देश दिए गए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ड्रोन हमलों में बढ़ोतरी के बाद इजरायल ने अपनी सैन्य रणनीति और ज्यादा आक्रामक कर दी है।
Benjamin Netanyahu ने अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के साथ हुई अहम बातचीत में साफ संकेत दिया है कि Israel अपनी सुरक्षा नीति में किसी तरह की नरमी नहीं बरतेगा। अमेरिका और Iran के बीच संभावित शांति समझौते की चर्चाओं के बीच नेतन्याहू ने कहा कि इजरायल को Lebanon समेत हर मोर्चे पर सैन्य कार्रवाई करने की पूरी स्वतंत्रता चाहिए। लेबनान में कार्रवाई जारी रखने पर जोर रिपोर्ट्स के मुताबिक, नेतन्याहू ने ट्रंप से फोन पर बातचीत के दौरान कहा कि इजरायल अपने खिलाफ किसी भी खतरे पर कार्रवाई करने की आजादी बनाए रखेगा। इसमें लेबनान में चल रहे अभियान भी शामिल हैं, जहां इजरायली सेना ईरान समर्थित Hezbollah के खिलाफ लगातार ऑपरेशन चला रही है। बताया गया कि ट्रंप ने भी इजरायल के इस रुख का समर्थन किया। ईरानी परमाणु कार्यक्रम पर ट्रंप सख्त रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने बातचीत में दोहराया कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने और ईरानी क्षेत्र से समृद्ध यूरेनियम हटाने की मांग पर अमेरिका कायम रहेगा। उन्होंने साफ किया कि इन शर्तों के बिना किसी अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए जाएंगे। बातचीत के बाद ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखा कि नेतन्याहू के साथ उनकी बातचीत “बेहद अच्छी” रही। नेतन्याहू ने किया बातचीत का खुलासा नेतन्याहू ने भी सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए बताया कि उन्होंने ट्रंप के साथ ईरान के परमाणु कार्यक्रम और Strait of Hormuz को दोबारा खोलने से जुड़े समझौते पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि “ऑपरेशन रोअरिंग लायन” और “एपिक फ्यूरी” के दौरान अमेरिकी और इजरायली सेनाओं ने मिलकर ईरानी खतरे के खिलाफ काम किया। साथ ही उन्होंने इजरायल की सुरक्षा के प्रति ट्रंप की प्रतिबद्धता की भी सराहना की। होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने पर बन रहा समझौता इस बीच अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को लेकर बातचीत तेज हो गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) पर काफी हद तक चर्चा पूरी हो चुकी है, जिसका उद्देश्य होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलना है। फरवरी में अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाई के बाद यह समुद्री मार्ग लगभग बंद हो गया था, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हुई। रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि Pakistan की मध्यस्थता से वार्ता आगे बढ़ रही है। ड्राफ्ट समझौते में क्या शर्तें? ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रस्तावित मसौदे में यह शर्त शामिल है कि अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान या उसके समर्थक समूहों पर हमला नहीं करेंगे। बदले में ईरान भी पहले हमला न करने का आश्वासन देगा। इजरायल के भीतर इस संभावित समझौते को लेकर मतभेद दिखाई दे रहे हैं। Benny Gantz ने चेतावनी दी है कि यदि समझौते के हिस्से के रूप में लेबनान में युद्धविराम लागू किया गया, तो यह इजरायल के लिए रणनीतिक गलती साबित हो सकती है।
वॉशिंगटन में दो दिन तक चलेगी अहम बैठक Lebanon और Israel के बीच जारी तनाव को कम करने के लिए गुरुवार से अमेरिका में नई शांति वार्ता शुरू होने जा रही है। वॉशिंगटन में होने वाली इस बातचीत को बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि दोनों देशों के बीच लागू युद्धविराम (Ceasefire) अब समाप्ति के करीब पहुंच चुका है। हालांकि सीजफायर औपचारिक रूप से अभी लागू माना जा रहा है, लेकिन इस दौरान भी इजरायली हवाई हमलों में सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है। इजरायली हमलों में 22 लोगों की मौत लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, बुधवार को इजरायल ने दक्षिण और पूर्वी लेबनान में करीब 40 स्थानों पर हवाई हमले किए। इन हमलों में कम से कम 22 लोगों की जान गई, जिनमें 8 बच्चे भी शामिल हैं। राजधानी Beirut सहित कई शिया बहुल इलाकों में भारी तबाही की खबरें सामने आई हैं। लगातार हो रहे हमलों से आम नागरिकों में भय और गुस्सा बढ़ता जा रहा है। ट्रंप ने जताई थी ऐतिहासिक समझौते की उम्मीद पिछले महीने 23 अप्रैल को दोनों देशों के प्रतिनिधि व्हाइट हाउस में मिले थे। उस दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने सीजफायर को तीन सप्ताह के लिए बढ़ाने की घोषणा की थी और उम्मीद जताई थी कि जल्द ही इजरायल और लेबनान के नेताओं के बीच ऐतिहासिक शिखर बैठक होगी। हालांकि लेबनान के राष्ट्रपति Joseph Aoun ने साफ कहा था कि जब तक इजरायली हमले बंद नहीं होते और सुरक्षा समझौता नहीं बनता, तब तक ऐसी बैठक संभव नहीं है। हिज्बुल्लाह पर कार्रवाई को लेकर दबाव इजरायल लगातार यह कहता रहा है कि वह ईरान समर्थित संगठन Hezbollah के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रखेगा। इजरायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने हाल ही में कहा था कि “जो भी इजरायल को धमकी देगा, उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।” रिपोर्ट्स के मुताबिक, मार्च से अब तक लेबनान में इजरायली हमलों में 2800 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें बड़ी संख्या में बच्चे शामिल हैं। अमेरिका की मध्यस्थता में होगी बातचीत इस बार होने वाली वार्ता में अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio शामिल नहीं होंगे, क्योंकि राष्ट्रपति ट्रंप चीन दौरे पर हैं। हालांकि अमेरिकी मध्यस्थों की टीम दोनों देशों के प्रतिनिधियों के साथ दो दिनों तक बातचीत करेगी। लेबनान की ओर से विशेष दूत Simon Karam हिस्सा लेंगे, जबकि इजरायल का प्रतिनिधित्व उसके अमेरिका स्थित राजदूत Yechiel Leiter करेंगे। क्षेत्रीय तनाव से वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित ईरान-इजरायल संघर्ष और लेबनान में जारी हिंसा का असर अब पूरे पश्चिम एशिया क्षेत्र पर दिखाई दे रहा है। तेल आपूर्ति, व्यापार और वैश्विक बाजारों पर भी इसका दबाव बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह वार्ता सफल नहीं होती, तो आने वाले दिनों में संघर्ष और गंभीर रूप ले सकता है।
Iran और United States के बीच तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा ईरान के ताजा शांति प्रस्ताव को खारिज किए जाने के बाद तेहरान ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। ईरान ने साफ चेतावनी दी है कि अगर उस पर हमला हुआ, तो उसके सशस्त्र बल “हमलावर को सबक सिखाने” के लिए पूरी तरह तैयार हैं। ट्रंप ने क्या कहा? वॉशिंगटन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने ईरान के प्रस्ताव को “अस्वीकार्य” बताते हुए खारिज कर दिया। उन्होंने कहा: “यह युद्धविराम गंभीर लाइफ सपोर्ट पर है।” ट्रंप ने हालात की तुलना ऐसे मरीज से की जिसकी “जीवित रहने की संभावना सिर्फ एक प्रतिशत” बची हो। अमेरिकी राष्ट्रपति के इस बयान के बाद मिडिल ईस्ट में तनाव और बढ़ गया है। ईरान ने दी जवाबी चेतावनी ट्रंप की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए ईरानी संसद के स्पीकर Mohammad Bagher Ghalibaf ने कहा कि ईरान किसी भी संघर्ष के लिए तैयार है। उन्होंने X पर लिखा: “हमारे सशस्त्र बल किसी भी हमले का जवाब देने और हमलावर को सबक सिखाने के लिए तैयार हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि “खराब रणनीति और गलत फैसलों का परिणाम हमेशा बुरा ही होता है।” ईरान के प्रस्ताव में क्या था? ईरानी विदेश मंत्रालय के मुताबिक, तेहरान ने जो प्रस्ताव दिया था उसमें: ईरानी बंदरगाहों की अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी खत्म करने पूरे क्षेत्र में सैन्य अभियान रोकने लेबनान में Hezbollah को निशाना बनाने वाले हमलों पर रोक विदेशों में फ्रीज ईरानी संपत्तियों को जारी करने जैसी मांगें शामिल थीं। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Esmail Baghaei ने कहा: “हमने किसी तरह की रियायत नहीं मांगी, सिर्फ ईरान के वैध अधिकारों की मांग की है।” होर्मुज स्ट्रेट पर बढ़ा दबाव तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर भी दिखाई देने लगा है। Strait of Hormuz में पहले से चल रही रुकावटों के कारण तेल बाजार दबाव में हैं। अगर स्थिति और बिगड़ती है, तो: कच्चे तेल की कीमतों में बड़ा उछाल वैश्विक सप्लाई चेन पर असर पेट्रोल-डीजल महंगा होना खाद्य और परिवहन लागत बढ़ना जैसे असर देखने को मिल सकते हैं। क्यों बढ़ रहा है तनाव? विशेषज्ञों के मुताबिक दोनों देशों के बीच मुख्य विवाद: ईरान के परमाणु कार्यक्रम अमेरिकी प्रतिबंध मिडिल ईस्ट में सैन्य मौजूदगी इजरायल और हिजबुल्ला को लेकर टकराव को लेकर है। हालिया बयानबाजी से साफ है कि फिलहाल दोनों पक्ष पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रहे हैं। ऐसे में मिडिल ईस्ट में अस्थिरता और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर बढ़ता दिख रहा है। लेबनान के शक्तिशाली सशस्त्र समूह Hezbollah ने साफ कर दिया है कि वह न तो अपने हथियार छोड़ेगा और न ही Israel के साथ सीधे बातचीत करेगा। नईम कासिम का दोटूक संदेश Naim Qassem ने कहा कि मौजूदा हालात में इजराइल से किसी भी तरह की प्रत्यक्ष वार्ता संभव नहीं है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा: "हम अपने हथियार नहीं छोड़ेंगे।" यह बयान ऐसे समय आया है जब क्षेत्र में युद्धविराम को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। लेबनान सरकार को भी चेतावनी कासिम ने Lebanon की सरकार पर भी निशाना साधा। उनका आरोप है कि सरकार ने इजराइल के सामने जरूरत से ज्यादा रियायतें दी हैं। हिजबुल्लाह चाहता है कि यदि कोई वार्ता हो भी, तो वह केवल अप्रत्यक्ष माध्यमों से हो, सीधे नहीं। दक्षिणी लेबनान में इजराइली कार्रवाई Israel Defense Forces ने बताया कि दक्षिणी लेबनान में उसके सैनिकों ने संदिग्ध गतिविधियां देखीं। इसके बाद वायुसेना ने कार्रवाई करते हुए तीन आतंकवादियों को मार गिराया। आईडीएफ ने हिजबुल्लाह के कई ठिकानों और सैन्य ढांचे को भी निशाना बनाने का दावा किया है। नेतन्याहू का आरोप इजराइली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने हिजबुल्लाह पर युद्धविराम समझौते को कमजोर करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि उत्तरी सीमा की सुरक्षा के लिए लेबनान में सैन्य अभियान जारी रहेगा। क्या युद्धविराम खतरे में है? हालात संकेत दे रहे हैं कि संघर्ष फिर भड़क सकता है। हिजबुल्लाह के सख्त रुख और इजराइल की लगातार सैन्य कार्रवाई से युद्धविराम पर खतरा मंडरा रहा है। अमेरिका की भूमिका अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने हाल ही में इजराइल-लेबनान युद्धविराम को तीन सप्ताह बढ़ाने की घोषणा की थी। साथ ही, अमेरिका ने लेबनान को हिजबुल्लाह से निपटने में सहयोग का आश्वासन भी दिया है। मध्य पूर्व की स्थिति फिलहाल बेहद नाजुक बनी हुई है। आने वाले दिनों में घटनाक्रम पूरे क्षेत्र की दिशा तय कर सकता है।
व्हाइट हाउस में बातचीत के बाद सीजफायर बढ़ाने की घोषणा अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि इजरायल और लेबनान के बीच चल रहे संघर्ष में लागू सीजफायर को तीन सप्ताह के लिए बढ़ा दिया गया है। यह फैसला व्हाइट हाउस में हुई उच्चस्तरीय वार्ता के बाद लिया गया बताया जा रहा है, जिसमें दोनों देशों के राजदूतों की मुलाकात भी शामिल थी। ट्रंप ने कहा कि बातचीत “सकारात्मक और सफल” रही, हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इस प्रक्रिया में हिज़्बुल्लाह की भूमिका एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। दशकों बाद सीधी बातचीत, लेकिन तनाव अभी भी कायम रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह पहली बार है जब इजरायल और लेबनान के बीच दशकों बाद सीधे कूटनीतिक बातचीत हुई है। दोनों देश औपचारिक रूप से लंबे समय से युद्ध की स्थिति में माने जाते रहे हैं। पहले लागू 10 दिनों के अस्थायी सीजफायर की समय सीमा सोमवार को खत्म होनी थी, लेकिन अब इसे तीन हफ्ते और बढ़ा दिया गया है। ट्रंप का बयान: “इजरायल को आत्मरक्षा का अधिकार है” व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि इजरायल को आत्मरक्षा का पूरा अधिकार है, खासकर तब जब उस पर हमला हो। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने के लिए आगे भी बातचीत जारी रहेगी और अमेरिका इस प्रक्रिया में सहयोग करेगा। लेबनान और इजरायल के बीच शांति की उम्मीद लेबनान और इजरायल के राजनयिकों ने इस बातचीत को सकारात्मक बताया है। लेबनान के प्रतिनिधियों ने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में दोनों देशों के बीच स्थायी शांति की दिशा में प्रगति हो सकती है। लेबनान के नेतृत्व ने संकेत दिया है कि भविष्य की बातचीत में सीमा विवाद, सैनिकों की वापसी और युद्ध के बाद पुनर्निर्माण जैसे मुद्दे शामिल होंगे। हिज़्बुल्लाह बना सबसे बड़ी चुनौती हालांकि, इस कूटनीतिक पहल के बीच हिज़्बुल्लाह एक प्रमुख बाधा के रूप में सामने है। संगठन ने अब तक इस बातचीत का हिस्सा बनने से इनकार किया है और किसी भी समझौते को मानने से भी इंकार किया है। इजरायल का कहना है कि जब तक हिज़्बुल्लाह का प्रभाव कम नहीं होता, तब तक क्षेत्र में स्थायी शांति मुश्किल है। युद्ध और मानवीय संकट का गंभीर असर इस संघर्ष का सबसे बड़ा असर लेबनान की जनता पर पड़ा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले युद्ध में हजारों लोगों की मौत हुई है, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। इसके अलावा, लाखों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं, जिससे मानवीय संकट और गहरा गया है। शांति की दिशा में कदम, लेकिन चुनौतियां बरकरार इजरायल और लेबनान के बीच सीधी बातचीत और सीजफायर विस्तार को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक कदम माना जा रहा है। हालांकि, हिज़्बुल्लाह की भूमिका, क्षेत्रीय तनाव और पुराना युद्ध इतिहास इस प्रक्रिया को अभी भी जटिल बनाए हुए हैं।
दक्षिणी लेबनान में फिर भड़की हिंसा, सीजफायर पर सवाल इजरायल और लेबनान के बीच जारी अस्थायी सीजफायर के बावजूद एक बार फिर तनाव बढ़ गया है। दक्षिणी लेबनान में इजरायली हवाई हमले में एक महिला पत्रकार सहित कुल 5 लोगों की मौत हो गई है। इस घटना ने पहले से ही कमजोर चल रहे सीजफायर समझौते पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हमला लेबनान के अत-तिरी गांव और आसपास के इलाकों में किया गया, जहां दो वाहनों और बाद में एक इमारत को निशाना बनाया गया। पत्रकारों पर हमला, अमल खलील की मौत घटना के दौरान दो पत्रकार मौके पर कवरेज के लिए पहुंचे थे, तभी दूसरा हवाई हमला हुआ। इस हमले में दोनों पत्रकार गंभीर रूप से घायल हो गए। बाद में मलबे से निकालने के दौरान महिला पत्रकार अमल खलील की मौत हो गई। अमल खलील स्थानीय मीडिया संस्थान “अल-अखबार” के लिए काम करती थीं। उनकी मौत के बाद मीडिया जगत में शोक की लहर है और पत्रकार सुरक्षा को लेकर चिंता और बढ़ गई है। इजरायली सेना का दावा – हिज्बुल्लाह को बनाया निशाना इजरायल डिफेंस फोर्स (IDF) ने बयान जारी करते हुए कहा है कि यह हमला हिज्बुल्लाह की गतिविधियों के जवाब में किया गया। सेना के अनुसार, दक्षिणी लेबनान में दो संदिग्ध लोग इजरायली सैनिकों के करीब पहुंच रहे थे, जिसके बाद खतरे को देखते हुए कार्रवाई की गई। इजरायल का दावा है कि हिज्बुल्लाह सीजफायर का उल्लंघन कर रहा है और सैन्य ठिकानों के पास गतिविधियां बढ़ा रहा है। लेबनान ने लगाया आरोप, पत्रकारों पर हमला निंदनीय लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने इजरायली हमले की कड़ी निंदा की है। वहीं सूचना मंत्री ने कहा कि बचाव कार्य के दौरान भी हमला किया गया, जो बेहद गंभीर और अस्वीकार्य है। सरकार ने इसे मीडिया की स्वतंत्रता और मानवीय सुरक्षा पर हमला बताया है। सीजफायर पर फिर मंडराया संकट इस ताजा घटना के बाद इजरायल-लेबनान सीजफायर एक बार फिर खतरे में दिख रहा है। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर उल्लंघन का आरोप लगा रहे हैं, जिससे क्षेत्र में तनाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
अमेरिकी राष्ट्रपति के ऐलान के बाद इज़राइल को युद्ध रोकने पर मजबूर होना पड़ा लेबनान में जारी संघर्ष के बीच अब एक बड़ा कूटनीतिक मोड़ सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अचानक युद्धविराम की घोषणा कर दी, जिसके बाद इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को अपनी सैन्य रणनीति बदलनी पड़ी। रिपोर्टों के मुताबिक, यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने इस संघर्ष में सीधे हस्तक्षेप करते हुए इज़राइल के फैसलों को प्रभावित किया है। ट्रंप की घोषणा से पहले ही तय हो गया युद्धविराम जानकारी के अनुसार, ट्रंप ने पहले ही यह संकेत दे दिया था कि इज़राइल और लेबनान के बीच युद्धविराम जल्द लागू होगा। इसके कुछ ही घंटों बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर घोषणा कर दी कि संघर्ष रोक दिया गया है और दोनों पक्षों को सैन्य कार्रवाई बंद करनी होगी। इसके बाद इज़राइल सरकार के पास ज्यादा विकल्प नहीं बचे और उसे युद्धविराम को स्वीकार करना पड़ा। नेतन्याहू की सैन्य योजना पर फिर पड़ा असर इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू हाल ही में हिज़बुल्लाह के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जारी रखने की बात कर रहे थे। इज़राइली सेना भी नए हमलों की योजना तैयार कर रही थी। लेकिन अमेरिकी दबाव के बाद स्थिति बदल गई और सरकार को युद्ध रोकने का निर्णय लेना पड़ा। देश को जानकारी ट्रंप के पोस्ट से मिली सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इज़राइल के नागरिकों और कई नेताओं को युद्धविराम की जानकारी अपने प्रधानमंत्री से नहीं, बल्कि ट्रंप के सोशल मीडिया पोस्ट से मिली। इससे इज़राइली राजनीतिक हलकों में भी चर्चा तेज हो गई है। ट्रंप बनते जा रहे हैं निर्णायक शक्ति विश्लेषकों का कहना है कि हाल के महीनों में ट्रंप ने कई अंतरराष्ट्रीय मामलों में सीधे हस्तक्षेप किया है, जिनमें गाजा, ईरान और अब लेबनान शामिल हैं। रिपोर्टों के अनुसार, कई मौकों पर उन्होंने: युद्धविराम लागू कराया सैन्य कार्रवाई रोकने का दबाव बनाया और क्षेत्रीय नेताओं से सीधे बातचीत को प्रभावित किया गाजा और ईरान संघर्ष पर भी असर इससे पहले गाजा और ईरान से जुड़े संघर्षों में भी अमेरिका ने इज़राइल की रणनीति पर प्रभाव डाला था। कई मामलों में इज़राइल को अपने सैन्य अभियान सीमित करने पड़े, जिससे उसे निर्णायक जीत हासिल नहीं हो सकी। हिज़बुल्लाह अभी भी बड़ा खतरा युद्धविराम के बावजूद लेबनान में हिज़बुल्लाह की स्थिति मजबूत बनी हुई है। संगठन ड्रोन और रॉकेट हमलों की क्षमता रखता है, जिससे इज़राइल की सुरक्षा चुनौती बनी हुई है। नेतन्याहू का बयान: शांति और युद्ध दोनों तैयार युद्धविराम के बाद नेतन्याहू ने कहा कि इज़राइल ने अमेरिका के अनुरोध पर समझौता किया है, लेकिन जरूरत पड़ने पर सेना फिर से कार्रवाई के लिए तैयार है। उन्होंने कहा: “हमारे एक हाथ में हथियार है, और दूसरा हाथ शांति के लिए बढ़ा हुआ है।” स्थिति अभी भी नाजुक हालांकि युद्धविराम लागू हो चुका है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह अस्थायी है और क्षेत्र में तनाव अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। आने वाले दिनों में हालात फिर बदल सकते हैं।
वॉशिंगटन: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने कड़ा रुख अपनाते हुए साफ कर दिया है कि ईरानी तेल ले जा रहे चीनी जहाजों को रोका जाएगा। यह कार्रवाई वैश्विक ऊर्जा सप्लाई के सबसे अहम रास्ते Strait of Hormuz पर लागू की जा रही है। 10,000 सैनिक और नेवल शिप्स तैनात अमेरिकी सेना ने नाकाबंदी को लागू करने के लिए: 10,000 से ज्यादा सैनिक करीब 12 नौसैनिक जहाज (Naval Ships) तैनात किए हैं। सेना के अनुसार, नाकाबंदी के पहले 24 घंटों में एक भी जहाज होर्मुज स्ट्रेट पार नहीं कर पाया। 6 व्यापारिक जहाजों को वापस लौटने का आदेश दिया गया हालांकि कुछ रिपोर्ट्स में 4 जहाजों के गुजरने का दावा भी किया गया हर देश के जहाजों पर लागू नियम अमेरिका की यह कार्रवाई: ईरान के बंदरगाहों में जाने या निकलने वाले सभी जहाजों पर लागू जहाज किसी भी देश का हो, नियम समान रहेगा बातचीत की कोशिश भी जारी तनाव के बीच कूटनीतिक प्रयास भी जारी हैं: वॉशिंगटन में लेबनान-इजराइल सीजफायर पर पहले दौर की बातचीत हुई इसे सकारात्मक बताया गया, अगली बैठक की तैयारी जारी 24 घंटे के 5 बड़े अपडेट्स 1. छूट खत्म होने की चेतावनी अमेरिकी ट्रेजरी ने कहा कि ईरानी तेल बिक्री पर दी गई अस्थायी छूट जल्द खत्म होगी। 2. यूरोप का अलग मिशन यूरोपीय देश होर्मुज में जहाजों की आवाजाही बहाल करने के लिए नया अंतरराष्ट्रीय मिशन बना रहे हैं–खास बात, इसमें अमेरिका शामिल नहीं है। 3. कनाडा की मदद Canada ने Lebanon के लिए 40 मिलियन डॉलर की सहायता का ऐलान किया। 4. हिजबुल्लाह के हमले Hezbollah ने दावा किया कि उसने 24 घंटे में 34 हमले किए, जिनमें Israel के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। 5. ट्रंप का बयान अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कहा कि ईरान के साथ बातचीत अगले 2 दिनों में फिर शुरू हो सकती है। होर्मुज स्ट्रेट पर अमेरिकी नाकाबंदी ने वैश्विक तेल सप्लाई और समुद्री व्यापार को सीधे प्रभावित किया है। जहां एक ओर सैन्य दबाव बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर कूटनीतिक बातचीत की कोशिशें भी जारी हैं–आने वाले दिनों में हालात किस दिशा में जाएंगे, इस पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।
मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच JD Vance के नेतृत्व में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल शनिवार को Islamabad पहुंच गया, जहां United States और Iran के बीच अहम शांति वार्ता होने जा रही है। यह बातचीत छह सप्ताह से जारी संघर्ष को समाप्त करने के प्रयासों के तहत बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जिसने न केवल मध्य पूर्व बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित किया है। वार्ता से पहले ही सख्त रुख, ईरान की नई शर्तें औपचारिक बातचीत शुरू होने से पहले ही ईरान ने कड़ा रुख अपनाते हुए साफ संकेत दिए हैं कि बातचीत आसान नहीं होगी। ईरानी संसद के अध्यक्ष Mohammad Bagher Ghalibaf ने कहा कि वार्ता तभी आगे बढ़ेगी जब United States लेबनान में स्थिति और ईरानी संपत्तियों को अनफ्रीज करने जैसे मुद्दों पर ठोस आश्वासन देगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अगर अमेरिका “ईमानदार समझौता” पेश करता है, तो ईरान बातचीत के लिए तैयार है। ट्रंप का सख्त संदेश, वेंस का संतुलित बयान वार्ता से पहले Donald Trump ने कड़ा बयान देते हुए कहा कि ईरान के पास “कोई पत्ते नहीं हैं” और वह सिर्फ बातचीत के जरिए ही स्थिति संभाल सकता है। दूसरी ओर, जेडी वेंस ने उम्मीद जताई कि बातचीत सकारात्मक दिशा में जा सकती है, लेकिन चेतावनी भी दी कि अगर ईरान ने चाल चलने की कोशिश की तो अमेरिका सख्त रुख अपनाएगा। भारी-भरकम प्रतिनिधिमंडल और कड़ी सुरक्षा इस वार्ता की गंभीरता का अंदाजा दोनों पक्षों के बड़े प्रतिनिधिमंडलों से लगाया जा सकता है। ईरान की ओर से करीब 70 सदस्यीय टीम पहुंची है, जबकि अमेरिका की ओर से पहले से ही लगभग 100 अधिकारियों की टीम Islamabad में मौजूद है। पाकिस्तान सरकार ने राजधानी में अभूतपूर्व सुरक्षा व्यवस्था लागू की है, जिसमें हजारों सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए हैं। युद्धविराम के बावजूद तनाव बरकरार हाल ही में घोषित दो सप्ताह के युद्धविराम के बावजूद हालात पूरी तरह शांत नहीं हैं। Strait of Hormuz में अब भी पाबंदियां बनी हुई हैं, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो रही है। वहीं Lebanon में Hezbollah और Israel के बीच झड़पें जारी हैं, जिससे शांति प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो रहे हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था पर टिकी नजरें इस संघर्ष ने ऊर्जा आपूर्ति, तेल कीमतों और वैश्विक व्यापार पर गहरा असर डाला है। ईरान जहां प्रतिबंध हटाने और Strait of Hormuz पर नियंत्रण की मांग कर रहा है, वहीं अमेरिका इस पर सख्त रुख बनाए हुए है। ऐसे में यह वार्ता न केवल क्षेत्रीय शांति बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए भी निर्णायक साबित हो सकती है। अनिश्चित भविष्य, समझौता या टकराव? दोनों पक्षों के बीच कई अहम मुद्दों पर अब भी गहरी खाई बनी हुई है। पाकिस्तान के सूत्रों के मुताबिक, वार्ताकारों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं - या तो ठोस समझौता करें या बातचीत छोड़ दें। ऐसे में आने वाले कुछ दिन तय करेंगे कि यह वार्ता शांति की ओर बढ़ेगी या फिर क्षेत्र एक बार फिर संघर्ष की ओर लौटेगा।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच Donald Trump ने ईरान को कड़ा संदेश देते हुए साफ कहा है कि दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्ग Strait of Hormuz को हर हाल में खोला जाएगा - चाहे इसके लिए किसी समझौते का इंतजार करना पड़े या नहीं। “डील हो या न हो, रास्ता खुलेगा” अमेरिका के जॉइंट बेस एंड्रयूज में मीडिया से बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि ईरान अब सैन्य रूप से कमजोर हो चुका है और अमेरिका इस रणनीतिक जलडमरूमध्य को खोलने के लिए तैयार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर बातचीत में देरी होती है, तो अमेरिका “दूसरे विकल्प” अपनाने से भी पीछे नहीं हटेगा। पाकिस्तान में शांति वार्ता की पहल इस बीच, अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance के नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय टीम Islamabad पहुंच चुकी है। इस टीम में Steve Witkoff Jared Kushner जैसे वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं। यह प्रतिनिधिमंडल ईरान के साथ शांति वार्ता को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। ईरान की दो सख्त शर्तें दूसरी ओर, ईरानी संसद के स्पीकर Mohammad Bagher Ghalibaf के नेतृत्व में ईरानी प्रतिनिधिमंडल भी पाकिस्तान पहुंच चुका है। ईरान ने बातचीत से पहले दो बड़ी शर्तें रखी हैं: लेबनान में तत्काल सीजफायर ईरान के रोके गए फंड की रिहाई ईरानी टीम में विदेश मंत्री Seyed Abbas Araghchi और अन्य वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं। सीजफायर पर उलझन बरकरार अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर को लेकर अब भी मतभेद बने हुए हैं। Islamic Republic of Iran Broadcasting के अनुसार, ईरान चाहता है कि लेबनान में इजरायली हमले भी इस समझौते में शामिल हों। हालांकि, अमेरिका और इजरायल ने साफ किया है कि Hezbollah के खिलाफ ऑपरेशन इस सीजफायर का हिस्सा नहीं होगा। दुनिया की नजर इस्लामाबाद बैठक पर व्हाइट हाउस के मुताबिक, 11 अप्रैल को Islamabad में पहली औपचारिक बैठक है। इस बातचीत को पश्चिम एशिया में जारी तनाव को खत्म करने की दिशा में अहम माना जा रहा है। अब सवाल यही है - क्या ईरान अपनी शर्तों पर अड़ा रहेगा या बातचीत के जरिए कोई बीच का रास्ता निकलेगा? पूरी दुनिया की नजरें इस हाई-प्रोफाइल मीटिंग पर टिकी हैं।
US–Iran–Israel War Update: इजरायल के लेबनान पर हमले जारी रहने के बीच ईरान के नए सर्वोच्च नेता मुज्तबा खामेनेई का अहम बयान सामने आया है। उन्होंने साफ किया कि ईरान युद्ध नहीं चाहता, लेकिन अपने अधिकारों से पीछे भी नहीं हटेगा। क्या बोले खामेनेई? “हमने युद्ध नहीं चाहा और हम इसे नहीं चाहते…” “लेकिन किसी भी परिस्थिति में अपने अधिकार नहीं छोड़ेंगे” “इस संघर्ष में शामिल सभी पक्षों को हम एक ही मानते हैं” उनके इस बयान को सीधे तौर पर लेबनान में इजरायल के हमलों से जोड़कर देखा जा रहा है। इजरायल का रुख अब भी सख्त इजरायली पीएम पहले ही कह चुके हैं: “लेबनान में कोई सीजफायर लागू नहीं” हिज़्बुल्लाह के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जारी होर्मुज स्ट्रेट पर चेतावनी खामेनेई ने बड़ा संकेत देते हुए कहा: ईरान होर्मुज स्ट्रेट को संभालने का तरीका बदल सकता है जनता से अपील: सड़कों पर आकर अपनी आवाज उठाएं इसका सीधा असर वैश्विक तेल सप्लाई पर पड़ सकता है। बैकग्राउंड क्या है? 28 फरवरी को युद्ध की शुरुआत के दिन ही अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत इसके बाद मुज्तबा खामेनेई बने नए सुप्रीम लीडर अभी तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए, सिर्फ लिखित संदेशों के जरिए संवाद हेल्थ को लेकर भी अटकलें कुछ रिपोर्ट्स में दावा: खामेनेई कोमा जैसी स्थिति में है ईरान के कोम शहर में इलाज जारी हालांकि, सरकार की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।