गुरु पूर्णिमा भारतीय सनातन परंपरा का एक अत्यंत पावन और महत्वपूर्ण पर्व है। यह दिन गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि गुरु ही शिष्य को अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाते हैं और आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। शास्त्रों के अनुसार, जिस व्यक्ति पर आपकी पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा हो, उसी को अपना गुरु बनाना चाहिए। एक बार गुरु से दीक्षा और गुरु मंत्र प्राप्त होने के बाद शिष्य का कर्तव्य है कि वह गुरु की आज्ञा का पालन करे, उनके बताए मार्ग पर चले और गुरु मंत्र को सदैव गोपनीय रखे। गुरु मंत्र को गोपनीय रखने की परंपरा क्यों है? धर्मग्रंथों में गुरु मंत्र को अत्यंत गोपनीय रखने का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि गुरु द्वारा दिया गया मंत्र केवल शब्दों का समूह नहीं होता, बल्कि वह आध्यात्मिक ऊर्जा और साधना का माध्यम होता है। शास्त्रों के अनुसार, गुरु मंत्र की शक्ति तभी प्रभावी होती है जब साधक उसका नियमित और निष्ठापूर्वक जप करता है तथा उसे अनावश्यक रूप से दूसरों के सामने प्रकट नहीं करता। प्रकृति भी देती है यही संदेश धार्मिक व्याख्याओं में गुरु मंत्र की तुलना प्रकृति के नियमों से की गई है। जैसे— बीज मिट्टी के भीतर छिपकर ही विशाल वृक्ष बनता है। गर्भ में पल रहा जीवन पूर्ण विकसित होने तक सुरक्षित और गोपनीय रहता है। संचित ऊर्जा समय आने पर सबसे अधिक प्रभावशाली रूप में प्रकट होती है। उसी प्रकार गुरु मंत्र भी साधक के अंतर्मन में मौन रूप से विकसित होने वाली आध्यात्मिक शक्ति माना जाता है। इसलिए इसे गोपनीय रखने की परंपरा बनाई गई है। गुरु मंत्र सार्वजनिक करने से क्या माना जाता है? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि साधक बार-बार अपने गुरु मंत्र की चर्चा करता है, तो उसका ध्यान साधना से हटकर दूसरों की प्रतिक्रिया, प्रशंसा, शंका या तुलना की ओर जा सकता है। ऐसी स्थिति में साधना का केंद्र भीतर की बजाय बाहर हो जाता है, जिससे आध्यात्मिक एकाग्रता प्रभावित हो सकती है। इसी कारण गुरु मंत्र को निजी साधना का विषय माना गया है। शास्त्रों में क्या कहा गया है? धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि व्यक्ति के कल्याण के लिए कुछ बातों को सदैव गोपनीय रखना चाहिए और उनमें गुरु मंत्र प्रमुख है। मान्यता के अनुसार— गुरु मंत्र किसी भी व्यक्ति को नहीं बताना चाहिए। परिवार, मित्र या परिचितों के बीच भी इसे साझा नहीं करना चाहिए। गुरु द्वारा दी गई मंत्र-जप की विशेष विधि भी गोपनीय रखनी चाहिए। गुरु के निर्देशों का श्रद्धापूर्वक पालन करना ही शिष्य का धर्म माना गया है। पति-पत्नी को भी गुरु मंत्र साझा न करने की सलाह परंपरागत धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि पति ने गुरु मंत्र प्राप्त किया है तो उसे अपनी पत्नी को भी वह मंत्र नहीं बताना चाहिए। इसी प्रकार यदि पत्नी ने गुरु मंत्र प्राप्त किया है तो उसे भी अपने पति के साथ मंत्र साझा नहीं करना चाहिए। इसी कारण कई परंपराओं में पति-पत्नी एक साथ गुरु से मंत्र दीक्षा ग्रहण करते हैं, ताकि दोनों अपनी-अपनी साधना गुरु के निर्देशानुसार कर सकें। एक गुरु और एक मंत्र पर निष्ठा का महत्व धार्मिक ग्रंथों में यह भी उल्लेख मिलता है कि जिस प्रकार पूर्ण श्रद्धा के साथ किसी एक आराध्य की उपासना करने से साधक को आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है, उसी प्रकार एक गुरु से प्राप्त गुरु मंत्र का नियमित जप और गुरु के प्रति अटूट निष्ठा साधना को सफल बनाने का माध्यम माना गया है।
Astrology Remedies: बढ़ती महंगाई, अनिश्चित आय और लगातार बढ़ते खर्चों के बीच आज बड़ी संख्या में लोग आर्थिक परेशानियों का सामना कर रहे हैं। कई बार अच्छी कमाई और अथक मेहनत के बावजूद धन घर में टिक नहीं पाता या अचानक आने वाले खर्च आर्थिक संतुलन बिगाड़ देते हैं। ज्योतिष शास्त्र में ऐसे समय के लिए कुछ पारंपरिक और सरल उपाय बताए गए हैं, जिन्हें श्रद्धा और नियमितता के साथ करने से आर्थिक बाधाओं में कमी आने और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ने की मान्यता है। हालांकि, यह सभी उपाय धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित हैं। इनका कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। शुक्रवार को झाड़ू दान करने की परंपरा ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार, लंबे समय से आर्थिक तंगी का सामना कर रहे लोगों को शुक्रवार के दिन किसी मंदिर में झाड़ू दान करने की सलाह दी जाती है। झाड़ू को मां लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इससे घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और धन प्राप्ति के नए अवसर बनने लगते हैं। धनिया का उपाय माना जाता है शुभ धन वृद्धि के लिए मंगलवार या गुरुवार का दिन शुभ माना गया है। इस दिन एक मिट्टी के पात्र में 21 रुपये के सिक्के रखकर उसके ऊपर मिट्टी डाल दें और उसमें धनिया के बीज बो दें। नियमित रूप से पानी देने के बाद यदि पौधा हरा-भरा विकसित होता है तो इसे शुभ संकेत माना जाता है। बाद में सिक्कों को निकालकर लाल कपड़े में बांधकर तिजोरी या धन रखने के स्थान पर रखने की परंपरा है। अशोक और केले की जड़ से जुड़े उपाय मान्यता के अनुसार, शुक्रवार को अशोक के पेड़ की जड़ लाकर गंगाजल से शुद्ध करने के बाद लाल कपड़े में लपेटकर तिजोरी में रखना शुभ माना जाता है। वहीं गुरुवार के दिन केले के वृक्ष की जड़ को पीले कपड़े में बांधकर धारण करने की भी परंपरा है। ज्योतिष शास्त्र में इन्हें आर्थिक बाधाओं को कम करने वाला उपाय माना गया है। सूखे नारियल का विशेष उपाय शनिवार के दिन एक सूखे नारियल में आटा, गुड़, तिल और चीनी भरकर किसी सुनसान स्थान पर भूमि में दबाने की मान्यता प्रचलित है। माना जाता है कि इससे ग्रह दोषों के कारण धन प्राप्ति में आने वाली रुकावटें कम होती हैं। इसके अलावा शनिवार को चींटियों को आटा खिलाना और शनि देव को सरसों के तेल का दीपक अर्पित करना भी शुभ माना जाता है। समुद्री नमक से सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाने की मान्यता घर में सकारात्मक वातावरण बनाए रखने के लिए पोछे के पानी में थोड़ा समुद्री नमक मिलाने की सलाह दी जाती है। मान्यता है कि इससे नकारात्मक ऊर्जा कम होती है, परिवार में प्रेम और सौहार्द बढ़ता है और आर्थिक उन्नति के मार्ग खुलते हैं। कुछ लोग घर में एक कटोरी में समुद्री नमक रखकर समय-समय पर उसे बदलने की परंपरा भी अपनाते हैं।
हिंदू धर्म में स्कंद षष्ठी का विशेष महत्व माना जाता है। यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र भगवान कार्तिकेय को समर्पित होता है, जिन्हें स्कंद, मुरुगन और कुमारस्वामी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत और पूजा करने से जीवन में सुख, समृद्धि, साहस और सफलता का आशीर्वाद प्राप्त होता है। स्कंद षष्ठी 2026 की तिथि और शुभ मुहूर्त वैदिक पंचांग के अनुसार, स्कंद षष्ठी तिथि 19 जून 2026 को शाम 5:00 बजे से शुरू होकर 20 जून 2026 को दोपहर 3:47 बजे तक रहेगी। इस दिन कई शुभ योग और विशेष मुहूर्त बन रहे हैं, जिनका धार्मिक दृष्टि से खास महत्व माना गया है। ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:03 बजे से 4:43 बजे तक अमृत काल: सुबह 8:36 बजे से 10:06 बजे तक अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:54 बजे से दोपहर 12:50 बजे तक विजय मुहूर्त: दोपहर 2:42 बजे से 3:38 बजे तक इस वर्ष स्कंद षष्ठी पर रवि योग और निशिता मुहूर्त जैसे शुभ संयोग भी बन रहे हैं, जिससे इस पर्व का आध्यात्मिक महत्व और बढ़ गया है। स्कंद षष्ठी पर करें यह आसान उपाय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, स्कंद षष्ठी के दिन भगवान कार्तिकेय को लाल या पीले रंग के फूल अर्पित करना शुभ माना जाता है। पूजा के दौरान "ॐ स्कन्दाय नमः" मंत्र का 108 बार जाप करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और मन को शांति मिलती है। इसके अलावा पूजा स्थल पर घी का दीपक जलाकर कुछ समय भगवान कार्तिकेय का ध्यान करने की भी परंपरा है। मान्यता है कि इससे मानसिक तनाव कम होता है और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। भगवान कार्तिकेय और तारकासुर की कथा का संदेश पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान कार्तिकेय ने अपनी दिव्य शक्ति और पराक्रम से अत्याचारी दैत्य तारकासुर का वध किया था। यह कथा केवल देव और दानव के युद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक भी मानी जाती है। भगवान कार्तिकेय का जीवन यह संदेश देता है कि साहस, संयम और सही दिशा में किए गए प्रयास किसी भी कठिनाई पर विजय दिला सकते हैं। स्कंद षष्ठी का आध्यात्मिक महत्व स्कंद षष्ठी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मबल, सकारात्मक सोच और नई शुरुआत का प्रतीक भी माना जाता है। मान्यता है कि सच्ची श्रद्धा और भक्ति से किए गए छोटे-छोटे उपाय भी जीवन में बड़े सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।
सनातन धर्म में अधिक मास यानी पुरुषोत्तम मास का विशेष महत्व माना गया है। यह पवित्र मास लगभग हर तीन वर्ष में एक बार आता है और इसमें किए गए जप, तप, दान और पूजा का फल अक्षय माना जाता है। ज्येष्ठ अधिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाई जाने वाली अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी इस वर्ष 12 जून 2026 को पड़ रही है। इस बार यह तिथि कई शुभ योगों के साथ आ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन रवि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और उन्मीलिनी महाद्वादशी का दुर्लभ संयोग बन रहा है, जिससे इस व्रत और पूजा का महत्व और भी बढ़ गया है। भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता की होती है विशेष पूजा अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी के दिन भगवान श्रीराम, उनके अनुज लक्ष्मण जी और माता सीता की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। यह पर्व भाईचारे, पारिवारिक प्रेम और धर्म के आदर्श मूल्यों का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और सच्चे मन से इस व्रत को करने वाले भक्तों के जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है। 'चंपक द्वादशी' के नाम से भी प्रसिद्ध है यह पर्व अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी को "चंपक द्वादशी" भी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु, श्रीराम या श्रीकृष्ण को चंपा के फूल अर्पित करने का विशेष महत्व बताया गया है। पूजा विधि प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें। सूर्य देव को अर्घ्य देकर व्रत का संकल्प लें। एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। भगवान को पीले या सफेद वस्त्र, चंदन और चंपा के फूल अर्पित करें। मौसमी फल और सात्विक मिठाई का भोग लगाएं। दीपक और धूप जलाकर रामलक्ष्मण द्वादशी व्रत कथा का पाठ करें। श्रीराम के मंत्रों का जाप करें और अंत में आरती करके पूजा संपन्न करें। अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी का धार्मिक महत्व रुके हुए कार्यों में मिलती है सफलता मान्यता है कि इस दिन श्रीराम और लक्ष्मण जी की पूजा करने से लंबे समय से रुके हुए कार्यों में सफलता मिलने लगती है और जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। परिवार में बढ़ता है प्रेम और सौहार्द यह पर्व भगवान राम और लक्ष्मण के आदर्श भाईचारे का प्रतीक माना जाता है। इस दिन पूजा करने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और भाइयों के बीच प्रेम और विश्वास मजबूत होता है। अक्षय पुण्य और मोक्ष की प्राप्ति पुरुषोत्तम मास में किए गए दान-पुण्य का फल कभी समाप्त नहीं होता। इस दिन अन्न, वस्त्र या धन का दान करने से दरिद्रता दूर होने की मान्यता है और साधक के लिए मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। श्रद्धा और भक्ति का विशेष दिन अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि भगवान श्रीराम के आदर्शों और पारिवारिक मूल्यों को जीवन में अपनाने का संदेश भी देती है। इस पावन अवसर पर श्रद्धा और भक्ति के साथ की गई पूजा व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता और सुख-समृद्धि लाने वाली मानी जाती है।
पूजा में हर वस्तु का होता है विशेष महत्व सनातन धर्म में पूजा-पाठ के दौरान इस्तेमाल होने वाली प्रत्येक वस्तु का अपना धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है। अलग-अलग देवी-देवताओं की प्रिय सामग्री भी अलग होती है। इसी कारण कुछ वस्तुएं कुछ देवताओं को अर्पित की जाती हैं, जबकि कुछ वस्तुओं का उपयोग वर्जित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बरगद (वट वृक्ष) का पत्ता कुछ देवी-देवताओं की पूजा में अर्पित नहीं किया जाता। आइए जानते हैं इसके पीछे की मान्यताएं। भगवान विष्णु को क्यों नहीं चढ़ाया जाता बरगद का पत्ता? Lord Vishnu की पूजा में तुलसी दल का विशेष महत्व माना गया है। तुलसी को भक्ति, पवित्रता और सात्विकता का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बरगद का वृक्ष तप, वैराग्य और स्थिरता का प्रतीक है, जबकि भगवान विष्णु को कोमल और सात्विक अर्पण अधिक प्रिय माने जाते हैं। इसी कारण उनकी पूजा में बरगद के पत्ते चढ़ाने की परंपरा नहीं है। मां लक्ष्मी की पूजा में क्यों माना जाता है वर्जित? Goddess Lakshmi धन, वैभव और समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बरगद का वृक्ष स्थायित्व, तपस्या और मोक्ष का प्रतीक माना जाता है। गृहस्थ जीवन में लक्ष्मी पूजा के दौरान कमल, गुलाब और अन्य शुभ पुष्पों का प्रयोग अधिक शुभ माना जाता है। इसलिए मां लक्ष्मी को बरगद का पत्ता अर्पित करने की परंपरा नहीं है। गणेश जी की पूजा में भी नहीं होता उपयोग Lord Ganesha की पूजा में दूर्वा, मोदक और लाल पुष्पों का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गणेश जी को ऐसी वस्तुएं अर्पित की जाती हैं जो मंगल, सौभाग्य और शुभता का प्रतीक हों। बरगद का पत्ता वैराग्य और कठोर तपस्या से जुड़ा माना जाता है, इसलिए इसे गणेश पूजा में उपयोग नहीं किया जाता। बरगद के वृक्ष का धार्मिक महत्व हालांकि कुछ देवताओं की पूजा में बरगद का पत्ता अर्पित नहीं किया जाता, लेकिन वट वृक्ष स्वयं हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना गया है। Vat Savitri Vrat और वट पूजा जैसे धार्मिक अनुष्ठानों में बरगद के वृक्ष की विशेष पूजा की जाती है। इसे दीर्घायु, अखंड सौभाग्य और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। पूजा करते समय रखें इन बातों का ध्यान देवी-देवताओं की प्रिय और वर्जित वस्तुओं की जानकारी रखें। ताजे और स्वच्छ फूल-पत्तियों का ही उपयोग करें। श्रद्धा और विधि-विधान के साथ पूजा करें। पूजा सामग्री का चयन धार्मिक परंपराओं के अनुसार करें। धार्मिक मान्यता क्या कहती है? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु, मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा में बरगद का पत्ता अर्पित नहीं किया जाता। माना जाता है कि प्रत्येक देवता की प्रिय सामग्री अलग होती है और उसी के अनुरूप पूजा करने से शुभ फल प्राप्त होते हैं। नोट: यह जानकारी प्रचलित धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। विभिन्न क्षेत्रों और परंपराओं में मान्यताएं अलग-अलग हो सकती हैं।
सनातन धर्म में तिलक केवल एक धार्मिक चिन्ह नहीं, बल्कि आस्था, ऊर्जा और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक माना जाता है। पूजा-पाठ, यज्ञ, दान और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में तिलक का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार तिलक धारण करने से व्यक्ति को शुभ फल प्राप्त होते हैं और उसकी आध्यात्मिक शक्ति में वृद्धि होती है। शास्त्रों में तिलक का महत्व धार्मिक ग्रंथों में तिलक को अत्यंत पवित्र माना गया है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्मपर्व में उल्लेख मिलता है कि स्नान, दान, तप, हवन, देवपूजन और पितरों से जुड़े कर्म यदि तिलक लगाए बिना किए जाएं तो उनका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। यही कारण है कि वैदिक परंपरा में पूजा और धार्मिक अनुष्ठान से पहले तिलक धारण करने की परंपरा रही है। किस अंगुली से तिलक लगाने का क्या फल मिलता है? स्कंदपुराण में तिलक लगाने की विधि और उसके प्रभाव का विस्तार से वर्णन किया गया है। अनामिका (रिंग फिंगर) से तिलक लगाने पर शांति और मानसिक संतुलन की प्राप्ति होती है। मध्यमा अंगुली से तिलक करने पर आयु वृद्धि का फल बताया गया है। अंगूठे से लगाया गया तिलक स्वास्थ्य और बल प्रदान करने वाला माना जाता है। तर्जनी अंगुली से तिलक लगाने को मोक्ष प्राप्ति से जोड़ा गया है। देवी-देवताओं के अनुसार अलग-अलग तिलक हिंदू धर्म में विभिन्न संप्रदायों और उपासना पद्धतियों के अनुसार तिलक के स्वरूप भी अलग-अलग होते हैं। विष्णु भक्तों का ऊर्ध्व तिलक भगवान विष्णु के उपासक माथे पर दो सीधी रेखाओं वाला ऊर्ध्व तिलक धारण करते हैं, जो भक्ति और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। शक्ति उपासकों का तिलक मां शक्ति की आराधना करने वाले साधक प्रायः दो बिंदुओं या विशेष स्वरूप का तिलक लगाते हैं, जो शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक होता है। शिव भक्तों का त्रिपुंड भगवान शिव के भक्त भस्म से तीन आड़ी रेखाओं वाला त्रिपुंड धारण करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि त्रिपुंड धारण कर जप, तप और पूजा करने से आध्यात्मिक उन्नति होती है। तिलक का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व माथे के बीच का भाग, जहां तिलक लगाया जाता है, शरीर का एक महत्वपूर्ण ऊर्जा केंद्र माना जाता है। योग और ध्यान परंपरा में इसे आज्ञा चक्र कहा जाता है। यह स्थान दोनों भौंहों के बीच स्थित होता है और मानसिक एकाग्रता तथा चेतना से जुड़ा माना जाता है। मान्यता है कि इस स्थान पर चंदन, कुमकुम या भस्म का तिलक लगाने से मन को शांति मिलती है, एकाग्रता बढ़ती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। कई विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि माथे के इस हिस्से पर हल्का दबाव मानसिक तनाव को कम करने और ध्यान केंद्रित करने में सहायक हो सकता है। केवल परंपरा नहीं, आस्था और ऊर्जा का प्रतीक तिलक सनातन संस्कृति की एक महत्वपूर्ण पहचान है। यह व्यक्ति की धार्मिक आस्था, आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है। पूजा, व्रत और शुभ कार्यों में तिलक लगाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी श्रद्धालु इसे शुभता, सकारात्मकता और ईश्वरीय कृपा का प्रतीक मानते हैं।
Ganga Dussehra और Ganga Saptami सनातन धर्म में मां गंगा को समर्पित दो बेहद पवित्र पर्व माने जाते हैं। दोनों ही त्योहारों पर गंगा स्नान, पूजा-पाठ और दान का विशेष महत्व होता है। हालांकि, कई लोग इन दोनों पर्वों को एक ही समझ लेते हैं, जबकि इनकी तिथि, पौराणिक कथा और धार्मिक महत्व पूरी तरह अलग हैं। हिंदू मान्यताओं के अनुसार मां गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि मोक्ष प्रदान करने वाली देवी हैं। आइए जानते हैं गंगा सप्तमी और गंगा दशहरा के बीच क्या अंतर है। तिथि और समय में अंतर दोनों पर्व हिंदू पंचांग के अलग-अलग महीनों में मनाए जाते हैं। Ganga Saptami वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाई जाती है। Ganga Dussehra ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। गंगा सप्तमी और गंगा दशहरा का महत्व Ganga Saptami को मां गंगा का जन्मोत्सव माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन मां गंगा भगवान ब्रह्मा के कमंडल से प्रकट हुई थीं। कहा जाता है कि उन्होंने भगवान विष्णु के चरणों को पवित्र जल से धोकर स्वर्ग में स्थान प्राप्त किया था। वहीं Ganga Dussehra मां गंगा के पृथ्वी पर अवतरण का पर्व माना जाता है। इसी दिन मां गंगा स्वर्ग से धरती पर उतरी थीं और भगवान शिव ने उनके प्रचंड वेग को अपनी जटाओं में धारण किया था। गंगा सप्तमी से जुड़ी कथा पौराणिक कथा के अनुसार जब मां गंगा स्वर्ग से प्रवाहित हो रही थीं, तब उनके तेज बहाव से ऋषि जह्नु की कुटिया और पूजा सामग्री बह गई। इससे क्रोधित होकर ऋषि जह्नु ने पूरी गंगा नदी को पी लिया। बाद में देवताओं और राजा भगीरथ की प्रार्थना पर ऋषि जह्नु ने वैशाख शुक्ल सप्तमी के दिन अपने कान से गंगा को पुनः बाहर निकाला। इसी कारण इस दिन को मां गंगा का ‘दूसरा जन्म’ भी कहा जाता है। इस घटना के बाद मां गंगा को ‘जाह्नवी’ नाम मिला। गंगा दशहरा की पौराणिक कथा Ganga Dussehra का संबंध राजा भगीरथ की कठोर तपस्या से जुड़ा है। मान्यता है कि राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए हजारों वर्षों तक तप किया था। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ब्रह्मा ने मां गंगा को पृथ्वी पर भेजने की अनुमति दी। लेकिन गंगा के तीव्र वेग को संभालना संभव नहीं था। तब भगवान शिव ने मां गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया और बाद में शांत धारा के रूप में पृथ्वी पर प्रवाहित किया। दोनों पर्वों का धार्मिक महत्व दोनों ही पर्वों पर गंगा स्नान, दान-पुण्य और पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन दिनों गंगा स्नान करने से पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। भारत में घरों, दुकानों और वाहनों के बाहर नींबू और मिर्च टांगने की परंपरा काफी पुरानी है। आज भी कई लोग इसे बुरी नजर और नकारात्मक ऊर्जा से बचाव का तरीका मानते हैं। हालांकि कुछ लोग इसे अंधविश्वास कहते हैं, लेकिन इसके पीछे धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ वैज्ञानिक तर्क भी जुड़े हुए हैं। बुरी नजर से बचाने की मान्यता मान्यता है कि नींबू और मिर्च नकारात्मक ऊर्जा को अपने अंदर समाहित कर लेते हैं। लोग मानते हैं कि नींबू बुरी शक्तियों को सोख लेता है, जबकि मिर्च ईर्ष्या और नकारात्मकता को खत्म करने का काम करती है। इसी कारण व्यापारिक प्रतिष्ठानों और घरों के मुख्य द्वार पर इसे लटकाया जाता है। कई लोग यह भी मानते हैं कि जब नींबू-मिर्च सूखकर काले पड़ जाते हैं, तो इसका मतलब होता है कि उन्होंने सारी नकारात्मक ऊर्जा अपने अंदर ले ली है। वास्तु और सकारात्मक ऊर्जा से भी जुड़ी है परंपरा वास्तु शास्त्र के अनुसार घर के मुख्य द्वार पर नींबू-मिर्च लगाने से नकारात्मक ऊर्जा घर में प्रवेश नहीं कर पाती। इससे घर का वातावरण सकारात्मक बना रहता है और सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। वैज्ञानिक कारण भी हैं मौजूद विशेषज्ञों के अनुसार पुराने समय में कीड़े-मकोड़ों को दूर रखने के लिए प्राकृतिक उपाय अपनाए जाते थे। नींबू की तेज खुशबू और मिर्च की तीखी गंध मक्खियों और कीड़ों को दूर रखने में मदद करती थी। यही वजह है कि इसे प्राकृतिक रिपेलेंट के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। हर सप्ताह बदलने की परंपरा परंपरा के अनुसार नींबू-मिर्च को सप्ताह में एक बार, विशेष रूप से शनिवार को बदलना शुभ माना जाता है। माना जाता है कि समय के साथ यह नकारात्मक ऊर्जा को अपने अंदर समेट लेते हैं, इसलिए इन्हें नियमित रूप से बदलना जरूरी होता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व 19 मार्च से शुरू हो रहा है। नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा से पहले घटस्थापना यानी कलश स्थापना की जाती है, जिसे समृद्धि और दिव्य ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि सही विधि से घटस्थापना करने पर घर में सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। घटस्थापना से पहले करें तैयारी घटस्थापना करने से पहले आवश्यक सामग्री जैसे कलश, मिट्टी, जौ, नारियल, आम के पत्ते, लाल वस्त्र, अक्षत, कुमकुम, धूप और दीपक एकत्रित कर लें। इसके बाद स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल की साफ-सफाई कर गंगाजल का छिड़काव करें। पूजा के लिए ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) को शुभ माना जाता है। ऐसे करें कलश स्थापना पूजा स्थल पर एक साफ कपड़ा बिछाकर मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद एक पात्र में मिट्टी डालकर उसमें जौ बोएं और जल छिड़कें। अब कलश पर कुमकुम से ओम या स्वस्तिक बनाएं और उसमें जल, सिक्का, हल्दी व सुपारी डालें। कलश के मुख पर आम के पत्ते रखें और लाल कपड़े में लिपटा नारियल ऊपर स्थापित करें। पूजन और संकल्प का महत्व कलश को जौ के बीच या मां दुर्गा के पास स्थापित करने के बाद धूप-दीप जलाकर मां शैलपुत्री की पूजा करें और मंत्रों का जाप करें। जो भक्त नौ दिनों का व्रत रखते हैं, वे इसी समय संकल्प लें। धार्मिक मान्यता है कि संकल्प लेने से पूजा का फल पूर्ण रूप से प्राप्त होता है और नवरात्रि के दौरान विशेष आशीर्वाद मिलता है।
कलावा के रंगों का रहस्य: कौन सा धागा देता है किस तरह का लाभ, जानें धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व हिंदू धर्म में पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान हाथ में कलावा या मौली बांधने की परंपरा सदियों पुरानी है। इसे केवल एक साधारण धागा नहीं माना जाता, बल्कि आस्था, सुरक्षा और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक समझा जाता है। आमतौर पर लोग लाल रंग का कलावा बांधते हैं, लेकिन ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग रंग के कलावे का अपना अलग महत्व बताया गया है। माना जाता है कि यदि व्यक्ति अपनी जरूरत या उद्देश्य के अनुसार कलावा धारण करता है, तो उसे जीवन में विशेष लाभ मिल सकता है। लाल कलावा: शक्ति और साहस का प्रतीक लाल रंग का कलावा सबसे अधिक प्रचलित है और इसे ऊर्जा, शक्ति और साहस का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसे धारण करने से व्यक्ति को मानसिक शांति मिलती है और जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति प्राप्त होती है। इसे भगवान हनुमान और देवी दुर्गा की कृपा से भी जोड़ा जाता है, इसलिए पूजा-पाठ के समय अक्सर यही कलावा बांधा जाता है। पीला कलावा: गुरु कृपा और ज्ञान की वृद्धि पीले रंग का कलावा गुरु ग्रह से जुड़ा माना जाता है। मान्यता है कि इसे धारण करने से ज्ञान, बुद्धि और शुभता में वृद्धि होती है। शिक्षा, अध्यात्म या ज्ञान से जुड़े कार्य करने वाले लोगों के लिए पीला कलावा विशेष रूप से शुभ माना जाता है। काला कलावा: नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा काले रंग का कलावा आमतौर पर बुरी नजर और नकारात्मक शक्तियों से बचाव के लिए बांधा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह व्यक्ति को नजर दोष से बचाने के साथ-साथ शनि से जुड़ी परेशानियों को कम करने में भी सहायक माना जाता है। हरा कलावा: स्वास्थ्य और तरक्की का संकेत हरा रंग समृद्धि, विकास और उन्नति का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि हरा कलावा बांधने से स्वास्थ्य में सुधार होता है और जीवन में प्रगति के नए अवसर मिलते हैं। ज्योतिष के अनुसार यह रंग बुध ग्रह से भी जुड़ा हुआ माना जाता है। सफेद कलावा: शांति और पवित्रता का प्रतीक सफेद रंग शांति, पवित्रता और संतुलन का प्रतीक है। सफेद कलावा धारण करने से मन में स्थिरता और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। इसे चंद्रमा और शुक्र ग्रह की कृपा से भी जोड़ा जाता है। नीला कलावा: कर्म और सफलता के लिए नीला रंग धैर्य, अनुशासन और कर्म का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि नीला कलावा पहनने से व्यक्ति अपने कार्यों में एकाग्रता बनाए रखता है और सफलता की ओर आगे बढ़ता है। कई लोग इसे शनि से जुड़ी सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करने के लिए भी धारण करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कलावा केवल एक धागा नहीं, बल्कि आस्था और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। सही उद्देश्य और श्रद्धा के साथ इसे धारण करने से जीवन में मानसिक संतुलन, सुरक्षा और सफलता की भावना को बल मिलता है।
नई दिल्ली: हिंदू धर्म में शक्ति उपासना के लिए Chaitra Navratri का पर्व बेहद पवित्र और फलदायी माना जाता है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होकर नवमी तक चलने वाले इन नौ दिनों में भक्त मां शक्ति की साधना, जप-तप और व्रत के जरिए उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। साल 2026 में Chaitra Navratri 19 मार्च से शुरू होकर 27 मार्च तक मनाई जाएगी। यदि आप इस बार पहली बार नवरात्रि का व्रत रखने की योजना बना रहे हैं, तो पूजा-विधि और नियमों के बारे में पहले से जान लेना बेहद ज़रूरी माना जाता है। चैत्र नवरात्रि व्रत के मुख्य नियम 1. पूजा सामग्री पहले से तैयार रखें नवरात्रि व्रत शुरू करने से एक दिन पहले सभी ज़रूरी पूजा सामग्री एकत्र कर ले, ताकि प्रतिपदा के दिन पूजा में किसी प्रकार की बाधा न आए। 2. सुबह जल्दी उठकर ले व्रत का संकल्प प्रतिपदा के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और मन को पवित्र करते हुए Durga माता का ध्यान करें। इसके बाद पूरे नौ दिनों तक व्रत रखने का संकल्प ले। 3. कलश स्थापना से शुरू करें पूजा नवरात्रि के पहले दिन यानी प्रतिपदा पर विधि-विधान से कलश स्थापना की जाती है। इसे किसी योग्य पुजारी के मार्गदर्शन में करना शुभ माना जाता है। 4. देवी पूजा के लिए अलग आसन रखें माता की साधना हमेशा लाल रंग के ऊनी आसन पर बैठकर करनी चाहिए। पूजा के लिए एक ही आसन का प्रयोग करना शुभ माना जाता है। 5. नौ दिनों तक रखें संयम नवरात्रि व्रत के दौरान साधक को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए और तामसिक भोजन जैसे मांस-मदिरा, लहसुन-प्याज आदि से पूरी तरह परहेज करना चाहिए। 6. अखंड ज्योति का रखें विशेष ध्यान अगर घर में कलश स्थापना के साथ अखंड ज्योति जलाई जाती है, तो घर को बंद करके बाहर नहीं जाना चाहिए। ज्योति को लगातार जलते रहना चाहिए। 7. फलाहार का करें सेवन नवरात्रि व्रत में सामान्य अन्न का सेवन नहीं किया जाता। इसकी जगह फलाहार लिया जाता है। कुट्टू या सिंहाड़े के आटे का उपयोग किया जा सकता है सामान्य नमक की जगह सेंधा नमक का इस्तेमाल करें 8. कपड़ों के रंग का रखें ध्यान नवरात्रि में काले रंग के कपड़े पहनने से बचना चाहिए। शक्ति साधना के लिए लाल और पीले रंग के वस्त्र अधिक शुभ माने जाते हैं। 9. अष्टमी या नवमी पर कन्या पूजन नवरात्रि के अंतिम दो दिनों यानी अष्टमी या नवमी पर कन्या पूजन किया जाता है। इस दौरान 2 से 9 वर्ष तक की कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर पूजा की जाती है और उन्हें भोजन कराया जाता है। 10. व्रत का पारण नवमी के दिन पूजा के बाद व्रत का पारण किया जाता है। इसके बाद पूजा में उपयोग की गई सामग्री को किसी पवित्र स्थान पर मिट्टी में दबा देना शुभ माना जाता है। Note: यहां दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य परंपराओं पर आधारित है। IDTV Indradhanush इसकी पुष्टि नहीं करता है।
हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि को विशेष धार्मिक महत्व दिया जाता है, लेकिन Chaitra Amavasya को वर्ष की प्रमुख अमावस्याओं में गिना जाता है। यह दिन खास तौर पर पितरों की शांति, दान-पुण्य और आध्यात्मिक साधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन किए गए स्नान, तर्पण और दान से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और परिवार पर उनकी कृपा बनी रहती है। देशभर में श्रद्धालु इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करते हैं या घर पर ही विधि-विधान से पूजा कर अपने पितरों का स्मरण करते हैं। धार्मिक परंपराओं के अनुसार इस दिन कुछ विशेष नियमों का पालन करना भी आवश्यक माना जाता है, ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके। चैत्र अमावस्या 2026 की तिथि और समय हिंदू पंचांग के अनुसार Chaitra Amavasya की तिथि 18 मार्च 2026 को सुबह 08:25 बजे से शुरू होकर 19 मार्च 2026 को सुबह 06:52 बजे तक रहेगी। शास्त्रों के अनुसार स्नान, दान और पितरों का तर्पण जैसे शुभ कार्य 19 मार्च को करना अधिक फलदायी माना गया है। तामसिक भोजन से रखें दूरी धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक अमावस्या के दिन मांस, मछली, शराब और अन्य तामसिक भोजन से दूर रहना चाहिए। इस दिन सात्विक भोजन करना शुभ माना जाता है। ऐसा करने से मन शांत रहता है और व्यक्ति पूजा-पाठ में पूरी श्रद्धा के साथ शामिल हो पाता है। घर में शांति बनाए रखना जरूरी अमावस्या के दिन घर में झगड़ा या विवाद करने से बचने की सलाह दी जाती है। मान्यता है कि इस दिन नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव अधिक हो सकता है, इसलिए सकारात्मक माहौल बनाए रखना जरूरी होता है। परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम और सौहार्द बनाए रखने से आध्यात्मिक वातावरण भी मजबूत होता है। पितरों का तर्पण और सम्मान चैत्र अमावस्या को पितरों को समर्पित दिन माना जाता है। इस दिन पूर्वजों के नाम से तर्पण करना, उनका स्मरण करना और जरूरतमंदों को दान देना विशेष पुण्यदायी माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि इससे पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। सुबह जल्दी उठकर करें पूजा अमावस्या के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करना और भगवान का ध्यान करना शुभ माना जाता है। देर तक सोने के बजाय सुबह ध्यान, जप और पूजा-पाठ करने से आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है और मन में सकारात्मकता बनी रहती है। दान-पुण्य का विशेष महत्व इस दिन जरूरतमंदों को भोजन, कपड़े या धन का दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। कहा जाता है कि अमावस्या के दिन किया गया दान कई गुना फल देता है और व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि और शांति का मार्ग प्रशस्त करता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अगर इस दिन श्रद्धा और नियमों के साथ पूजा-पाठ, तर्पण और दान किया जाए, तो व्यक्ति को आध्यात्मिक संतोष के साथ-साथ पारिवारिक सुख-शांति भी प्राप्त होती है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।