बहराइच, एजेंसियां। उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में भारत-नेपाल सीमा पर सुरक्षा एजेंसियों ने बड़ी कार्रवाई करते हुए प्रतिबंधित गतिविधियों से जुड़े संगठन 'वारिस पंजाब दे' के वांछित आरोपी बिक्रमजीत सिंह को गिरफ्तार किया है। उसके साथ एक अमेरिकी नागरिक को भी पकड़ा गया, जो बिना वैध दस्तावेजों के भारत में प्रवेश करने की कोशिश कर रहा था। दोनों को सशस्त्र सीमा बल (SSB) और स्थानीय पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में पकड़ा गया। नेपाल के रास्ते भारत में दाखिल होने की कोशिश नाकाम जांच एजेंसियों के अनुसार, बिक्रमजीत सिंह लंबे समय से पुलिस की नजर में था और उसके खिलाफ पहले से मामले दर्ज थे। सुरक्षा बलों को सूचना मिली थी कि वह नेपाल सीमा के रास्ते आवाजाही कर सकता है। इसके बाद रूपईडीहा बॉर्डर क्षेत्र में निगरानी बढ़ाई गई और कार्रवाई कर उसे पकड़ लिया गया। अमेरिकी नागरिक से पूछताछ, सुरक्षा एजेंसियां जुटीं जांच में कार्रवाई के दौरान पकड़े गए अमेरिकी नागरिक के पास भारत में प्रवेश से जुड़े वैध दस्तावेज नहीं मिले। सुरक्षा एजेंसियां अब उसकी पहचान, भारत आने के उद्देश्य और अन्य संपर्कों की जांच कर रही हैं। अधिकारियों ने बताया कि मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई और पूछताछ जारी है। सीमा सुरक्षा को लेकर एजेंसियां सतर्क भारत-नेपाल सीमा पर हाल के दिनों में संदिग्ध गतिविधियों को देखते हुए सुरक्षा एजेंसियां लगातार निगरानी बढ़ा रही हैं। अधिकारियों का कहना है कि अवैध प्रवेश, संगठित अपराध और देश विरोधी गतिविधियों से जुड़े किसी भी नेटवर्क के खिलाफ सख्त कार्रवाई जारी रहेगी।
महाराजगंज: भारत-नेपाल सीमा पर एक अमेरिकी नागरिक की गिरफ्तारी के बाद सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हो गई हैं। गिरफ्तार व्यक्ति के पास से चीनी पासपोर्ट, कई दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बरामद हुए हैं। फिलहाल जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि वह भारत में किस उद्देश्य से रह रहा था और सीमा पार करने की कोशिश क्यों कर रहा था। अमेरिकी नागरिक की हुई पहचान गिरफ्तार व्यक्ति की पहचान अमेरिका के कैलिफोर्निया निवासी 36 वर्षीय जॉर्डन ब्राउन के रूप में हुई है। उसे उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले में भारत-नेपाल सीमा पार करने की कथित कोशिश के दौरान पकड़ा गया। उसके पास से मिले चीनी पासपोर्ट और अन्य दस्तावेजों को देखते हुए कई केंद्रीय सुरक्षा और खुफिया एजेंसियां मामले की जांच कर रही हैं। हालांकि, अधिकारियों का कहना है कि शुरुआती जांच में अब तक उसके किसी आतंकी या राष्ट्र विरोधी गतिविधि से जुड़े होने के प्रमाण नहीं मिले हैं। भारत आने और यात्रा रिकॉर्ड की हो रही जांच जांच एजेंसियों के अनुसार, जॉर्डन ब्राउन पिछले वर्ष नवंबर में समुद्री मार्ग से भारत आया था। अब उसकी भारत में आवाजाही, विभिन्न राज्यों की यात्राओं और विदेश यात्रा के रिकॉर्ड की जांच की जा रही है। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के अनुसार, आरोपी द्वारा दी गई हर जानकारी का अलग-अलग एजेंसियां सत्यापन कर रही हैं। उसके इमिग्रेशन रिकॉर्ड, पहचान, यात्रा इतिहास और भारत आने के उद्देश्य की भी पड़ताल की जा रही है। बरामद सामान की होगी फोरेंसिक जांच पुलिस ने जॉर्डन ब्राउन के पास से कई सामान बरामद किए हैं, जिनमें शामिल हैं— चीनी पासपोर्ट मोबाइल फोन नेपाली मुद्रा धार्मिक पुस्तकें एआई ट्रांसलेटर डिवाइस डायरी कलाई घड़ी अन्य निजी सामान इन सभी वस्तुओं की फोरेंसिक जांच कराई जा रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि उनका इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जा रहा था। कई एजेंसियां कर रही हैं पूछताछ मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय और राज्य स्तर की कई सुरक्षा एजेंसियां जॉर्डन ब्राउन से पूछताछ कर रही हैं। जांच का मुख्य फोकस यह जानना है कि एक अमेरिकी नागरिक के पास चीनी पासपोर्ट कैसे पहुंचा, वह लंबे समय तक भारत में किन गतिविधियों में शामिल रहा और नेपाल सीमा तक पहुंचने का उसका उद्देश्य क्या था। फिलहाल जांच जारी है और एजेंसियां सभी तथ्यों की पुष्टि के बाद आगे की कार्रवाई करेंगी।
स्पेन के युवा फुटबॉल स्टार लामिन यामाल ने अपने 19वें जन्मदिन पर सिर्फ हीरों से जड़ा नेकलेस पहनकर ही सुर्खियां नहीं बटोरीं, बल्कि नस्लवाद और विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ एक मजबूत संदेश देकर भी सबका ध्यान खींचा। फ्रांस के खिलाफ फीफा वर्ल्ड कप 2026 के सेमीफाइनल से पहले आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में यामाल ने कहा कि फुटबॉल का असली उद्देश्य लोगों को जोड़ना है, न कि उन्हें बांटना। जन्मदिन पर खुद को दिया खास तोहफा सेमीफाइनल मुकाबले से एक दिन पहले टेक्सास में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में यामाल व्हाइट गोल्ड और डायमंड से बने शानदार नेकलेस के साथ पहुंचे। जब उनसे पूछा गया कि यह जन्मदिन का उपहार किसने दिया, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि यह किसी और का नहीं, बल्कि खुद का दिया हुआ गिफ्ट है। यामाल ने कहा, "यह मुझे किसी ने गिफ्ट नहीं किया। मैंने इसे खुद खरीदा है। यह मेरी तरफ से मेरे लिए तोहफा है।" उनका यह जवाब सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो गया। नस्लवाद पर दिया एकता का संदेश प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान यामाल से हाल ही में फ्रांस की बहुसांस्कृतिक टीम को लेकर उठे राजनीतिक विवाद पर सवाल पूछा गया। हाल ही में स्पेन के पूर्व प्रधानमंत्री मारियानो राजोय की एक टिप्पणी को लेकर विवाद खड़ा हो गया था, जिसमें फ्रांस की टीम की विविधता पर सवाल उठाए गए थे। इस पर यामाल ने बिना किसी विवाद को बढ़ाए बेहद संतुलित जवाब दिया। उन्होंने कहा कि फुटबॉल का मकसद लोगों को एकजुट करना है। फ्रांस और स्पेन दोनों अलग-अलग संस्कृतियों और समुदायों के एकीकरण की मिसाल हैं। ऐसे में किसी की टिप्पणी पर चर्चा करने से ज्यादा जरूरी यह है कि खेल लोगों को जोड़ने का काम करे। विविधता की मिसाल हैं यामाल लामिन यामाल खुद भी विविध सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आते हैं। उनके पिता मोरक्को से हैं, जबकि उनकी मां इक्वेटोरियल गिनी मूल की हैं। ऐसे में उनका बयान आधुनिक और समावेशी समाज की सोच को दर्शाता है। छोटे भाई की वायरल लोकप्रियता पर भी बोले यामाल ने अपने छोटे भाई केयने का भी जिक्र किया, जो स्पेन के मैचों के दौरान स्टेडियम में अपनी मस्तीभरी हरकतों की वजह से सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रिय हो चुके हैं। उन्होंने हंसते हुए कहा कि उनके भाई को खुद भी नहीं पता कि वह इंटरनेट पर वायरल हो चुके हैं। कैमरा देखते ही वह वही शरारतें करते हैं जो घर पर करते हैं और उन्हें टीवी पर देखकर उन्हें भी खुशी होती है। गोल नहीं, टीम की जीत ज्यादा अहम पूरे टूर्नामेंट में अब तक सिर्फ एक गोल करने को लेकर पूछे गए सवाल पर भी यामाल बिल्कुल शांत नजर आए। उन्होंने कहा कि हर टूर्नामेंट अलग होता है और उनके लिए व्यक्तिगत आंकड़ों से ज्यादा महत्वपूर्ण टीम की सफलता है। यामाल का कहना था कि जब तक स्पेन जीत रहा है, उन्हें अपने गोलों की संख्या की चिंता नहीं है। उन्होंने उम्मीद जताई कि टीम आगे बढ़ेगी और उन्हें गोल करने के और अवसर मिलेंगे। फ्रांस के खिलाफ रोमांचक मुकाबले की उम्मीद स्पेन और फ्रांस के बीच होने वाले सेमीफाइनल को लेकर यामाल ने कहा कि दोनों टीमें आक्रमण और बचाव में मजबूत हैं, इसलिए मुकाबला बेहद संतुलित और रोमांचक रहने वाला है। उनके अनुसार यह वही मैच है जिसका दुनिया भर के फुटबॉल प्रशंसक लंबे समय से इंतजार कर रहे थे। मैदान के बाहर भी दिखी परिपक्व सोच महज 19 साल की उम्र में यामाल ने जिस आत्मविश्वास और परिपक्वता के साथ नस्लवाद, राजनीति और खेल की भूमिका पर अपनी बात रखी, उसने यह साफ कर दिया कि वह केवल मैदान पर ही नहीं, बल्कि मैदान के बाहर भी नई पीढ़ी के प्रभावशाली खिलाड़ियों में शामिल हो चुके हैं।
महराजगंज: उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले में भारत-नेपाल सीमा पर सशस्त्र सीमा बल (SSB) ने एक अमेरिकी नागरिक को बिना वैध पासपोर्ट और यात्रा दस्तावेजों के नेपाल में प्रवेश करने की कोशिश करते हुए गिरफ्तार किया है। शुरुआती जांच में सामने आया है कि वह पिछले करीब सात महीने से बिना पासपोर्ट के भारत में रह रहा था। सुरक्षा एजेंसियां अब उसके भारत आने के पूरे घटनाक्रम और गतिविधियों की जांच कर रही हैं। नेपाल सीमा पार करने की कोशिश में पकड़ा गया एसएसबी की 22वीं बटालियन रविवार को नियमित गश्त कर रही थी। इसी दौरान सोनौली थाना क्षेत्र के मैनिहवा इलाके में सीमा स्तंभ संख्या 516 के पास एक विदेशी नागरिक नेपाल की ओर बढ़ता दिखाई दिया। जवानों ने उसे रोककर दस्तावेज मांगे, लेकिन उसके पास कोई वैध पासपोर्ट या यात्रा संबंधी दस्तावेज नहीं मिला। पूछताछ में उसने अपना नाम जॉर्डन ब्राउन (36) बताया और खुद को अमेरिका के कैलिफोर्निया का निवासी बताया। जवानों को देखकर भागने लगा महराजगंज के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सिद्धार्थ के अनुसार, जब एसएसबी जवानों ने उससे पूछताछ शुरू की तो वह मौके से भागने का प्रयास करने लगा। हालांकि, जवानों ने तुरंत उसे पकड़ लिया और हिरासत में ले लिया। थाईलैंड में पासपोर्ट खोने का दावा पुलिस पूछताछ में जॉर्डन ब्राउन ने बताया कि वह टूरिस्ट वीजा पर थाईलैंड गया था, जहां उसका पासपोर्ट खो गया। उसने यह भी दावा किया कि वह पहले अमेरिकी नौसेना (US Navy) में अधिकारी के रूप में कार्य कर चुका है। हालांकि, पुलिस उसके सभी दावों का सत्यापन कर रही है। समुद्र के रास्ते भारत पहुंचने का दावा पूछताछ में ब्राउन ने बताया कि वह थाईलैंड से समुद्री मार्ग के जरिए श्रीलंका पहुंचा और वहां से 2 नवंबर 2025 को समुद्र के रास्ते भारत आया। इसके बाद वह लंबे समय तक गोवा में रहा। बाद में वह गोवा से बेंगलुरु और फिर उत्तर प्रदेश के सोनौली बॉर्डर पहुंचा, जहां से वह नेपाल में प्रवेश करने की कोशिश कर रहा था। सात महीने तक बिना पासपोर्ट कैसे रहा? जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि जॉर्डन ब्राउन करीब सात महीने तक बिना वैध पासपोर्ट और यात्रा दस्तावेजों के भारत में कैसे रहा और विभिन्न राज्यों में आवाजाही कैसे करता रहा। पुलिस अब उसके संपर्कों, यात्रा मार्ग और भारत में रहने की पूरी अवधि की जांच कर रही है। सुरक्षा एजेंसियां कर रही हैं पूछताछ फिलहाल अमेरिकी नागरिक को हिरासत में रखकर पूछताछ की जा रही है। पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि उसके दावे कितने सही हैं और भारत में उसके रहने का वास्तविक उद्देश्य क्या था। जांच पूरी होने के बाद आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
भारत और नेपाल के बीच रिश्तों को मजबूत बनाने की कोशिशों के बीच नेपाल द्वारा भारत-नेपाल सीमा पर चीनी तकनीक आधारित थर्मल निगरानी कैमरे लगाने की खबरों ने नई चर्चा छेड़ दी है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, नेपाल उत्तराखंड से सटी सीमा पर आधुनिक थर्मल सर्विलांस सिस्टम स्थापित कर रहा है, जिनका उपयोग दिन और रात दोनों समय गतिविधियों की निगरानी के लिए किया जाएगा। रिपोर्टों में दावा किया गया है कि इन कैमरों के संचालन के लिए चीनी संचार और इंटरनेट ढांचे का इस्तेमाल किया जा सकता है। इन दावों की अभी तक भारत या नेपाल की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। 2016 से शुरू हुई थी तकनीकी साझेदारी नेपाल और चीन के बीच सीमा निगरानी से जुड़ा तकनीकी सहयोग कोई नया नहीं है। दोनों देशों के बीच वर्ष 2016 में सुरक्षा और तकनीकी सहयोग को लेकर समझौते हुए थे। इसके बाद 2019 में सीमा क्षेत्रों के सर्वेक्षण और तकनीकी अध्ययन के लिए वित्तीय मंजूरी दी गई। झूलाघाट समेत कई सीमावर्ती क्षेत्रों का सर्वेक्षण किया गया था, जहां बाद में निगरानी प्रणाली स्थापित करने की योजना बनाई गई। इसी प्रक्रिया के तहत अब थर्मल कैमरों की तैनाती को आगे बढ़ाया जा रहा है। उत्तराखंड सीमा के किन क्षेत्रों पर रहेगी नजर? भारत और नेपाल के बीच उत्तराखंड में करीब 275 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है। भारतीय सीमा की सुरक्षा Sashastra Seema Bal (SSB) और नेपाल की ओर से Armed Police Force Nepal संभालती है। भारतीय क्षेत्र में पिथौरागढ़, झूलाघाट, धारचूला, चंपावत और ऊधमसिंह नगर जैसे इलाके इस सीमा का हिस्सा हैं। वहीं नेपाल की ओर दार्चुला, बैतड़ी, डडेलधुरा और कंचनपुर जिले सीमा से जुड़े हुए हैं। कालापानी विवाद के बाद बढ़ा फोकस विश्लेषकों का मानना है कि 2020 में कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को लेकर भारत-नेपाल के बीच पैदा हुए विवाद के बाद नेपाल ने सीमा क्षेत्रों में अपनी सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया। इसी दौरान नेपाल ने कई नए बॉर्डर आउट पोस्ट (BOP) स्थापित किए और इलेक्ट्रॉनिक निगरानी प्रणालियों के विस्तार की योजना शुरू की। थर्मल कैमरों की तैनाती को उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। भारत ने भी मजबूत की निगरानी व्यवस्था सीमा पार गतिविधियों पर नजर रखने के लिए भारत ने भी हाल के वर्षों में निगरानी व्यवस्था को मजबूत किया है। प्रमुख सीमा बिंदुओं पर डिजिटल रिकॉर्डिंग सिस्टम, आधुनिक स्क्रीनिंग उपकरण और चौबीसों घंटे गश्त की व्यवस्था की गई है। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, सीमा पार करने वाले लोगों की डिजिटल रिकॉर्डिंग और पहचान सत्यापन की प्रक्रिया को और सख्त बनाया गया है। संवेदनशील इलाकों में SSB और स्थानीय पुलिस संयुक्त रूप से निगरानी कर रही है। राजनीतिक बयानबाजी भी बनी चिंता नेपाल की राजनीति में समय-समय पर कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा जैसे सीमा विवादों को लेकर बयान सामने आते रहे हैं। हाल के महीनों में नेपाल के प्रधानमंत्री Balen Shah के कुछ बयानों ने भी चर्चा पैदा की थी, बाद में नेपाल के विदेश मंत्रालय ने स्पष्टीकरण जारी किया था। रिश्ते सुधारने की कोशिश जारी सीमा पर तकनीकी गतिविधियों के बीच दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संपर्क भी जारी हैं। नेपाल के राजनीतिक नेतृत्व और भारतीय अधिकारियों के बीच हाल के महीनों में कई उच्चस्तरीय मुलाकातें हुई हैं। डिजिटल भुगतान, स्वास्थ्य, कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति बनी है। सीमा पर चीन निर्मित निगरानी उपकरणों की तैनाती और संभावित चीनी संचार नेटवर्क के इस्तेमाल की खबरों ने सुरक्षा विशेषज्ञों और रणनीतिक विश्लेषकों का ध्यान जरूर आकर्षित किया है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर दोनों देशों की आधिकारिक प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण मानी जाएगी।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल पुलिस के विशेष कार्य बल (एसटीएफ) ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के नेता और फलता विधानसभा सीट से पूर्व उम्मीदवार जहांगीर को भारत-नेपाल सीमा के निकट से गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस के अनुसार, जहांगीर खान पर जबरन वसूली सहित कई गंभीर आरोप हैं और वह लंबे समय से फरार चल रहे थे। पुलिस अधिकारियों ने बताया कि गिरफ्तारी उत्तरी बंगाल के भारत-नेपाल सीमा क्षेत्र से की गई। हालांकि सुरक्षा कारणों से गिरफ्तारी की सटीक जगह और ऑपरेशन से जुड़ी अन्य जानकारियां सार्वजनिक नहीं की गई हैं। बताया जा रहा है कि दक्षिण 24 परगना जिले के फलता थाने में उनके खिलाफ सात अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज हैं। हाईकोर्ट से राहत खत्म होने के बाद कार्रवाई मामले में महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब Calcutta High Court ने 26 मई को जहांगीर खान को मिली अंतरिम सुरक्षा को रद्द कर दिया। इसके बाद पुलिस की कार्रवाई तेज हुई और उनकी तलाश के लिए कई स्थानों पर छापेमारी की गई। अंततः एसटीएफ ने उन्हें सीमा क्षेत्र से गिरफ्तार करने में सफलता हासिल की। चुनावी हिंसा को लेकर भी रहे चर्चा में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान फलता सीट पर मतदान के समय हिंसा और नियमों के उल्लंघन के आरोपों के कारण जहांगीर खान सुर्खियों में रहे थे। चुनाव के दौरान उन्होंने चुनाव आयोग द्वारा तैनात अधिकारियों को सार्वजनिक रूप से चुनौती दी थी, जिससे मामला काफी चर्चित हुआ था। विवाद बढ़ने के बाद इस सीट पर दोबारा मतदान भी कराया गया था। पार्टी ने बनाई दूरी चुनाव से पहले जहांगीर खान ने अपना नामांकन वापस ले लिया था। हालांकि उस समय यह स्पष्ट नहीं हुआ था कि यह निर्णय पार्टी नेतृत्व के निर्देश पर लिया गया था या व्यक्तिगत स्तर पर। बाद में All India Trinamool Congress ने स्पष्ट किया था कि यह उनका निजी फैसला था और पार्टी का इससे कोई संबंध नहीं है। पुलिस अब जहांगीर खान से पूछताछ कर रही है और उनके खिलाफ दर्ज मामलों की जांच को आगे बढ़ाया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि मामले में कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे की कार्रवाई की जाएगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।