तमिलनाडु: तमिलनाडु सरकार ने राज्य के सभी विधायकों को उनके विधानसभा क्षेत्रों में दौरे और जनसंपर्क के लिए नई कार उपलब्ध कराने का फैसला किया है. सरकार का कहना है कि विधायकों को अपने क्षेत्र में लगातार लोगों के बीच जाना पड़ता है और उनकी समस्याओं को समझने के लिए नियमित दौरे जरूरी हैं. इसी जरूरत को देखते हुए यह सुविधा देने की घोषणा की गयी है. विधानसभा में सरकार की ओर से बताया गया कि विधायकों को नई कार के साथ वाहन और ड्राइवर के खर्च के लिए हर महीने 75 हजार रुपये भी उपलब्ध कराये जाएंगे. इसके अलावा प्रत्येक विधायक के कार्यालय में एक सहायक रखने के लिए 25 हजार रुपये प्रतिमाह देने का प्रावधान किया गया है. यानी विधायकों को वाहन, ड्राइवर और कार्यालयी कामकाज के लिए अतिरिक्त सरकारी सहायता मिलेगी. विधानसभा क्षेत्र में आने-जाने में होगी सुविधा सरकार के अनुसार, विधायकों को अपने विधानसभा क्षेत्र में लगातार दौरे करने पड़ते हैं. उन्हें ग्रामीण इलाकों, स्थानीय कार्यक्रमों और जनता से जुड़े मुद्दों पर पहुंचना होता है. निजी वाहन या परिवहन की व्यवस्था पर निर्भर रहने के कारण कई बार उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है. नई कार मिलने के बाद विधायकों के लिए क्षेत्र में आवागमन आसान होगा. इससे वे जनता की समस्याओं को ज्यादा प्रभावी तरीके से सुन सकेंगे और स्थानीय स्तर पर होने वाले कार्यक्रमों में भी आसानी से शामिल हो सकेंगे. विधायक जोतिमणि ने उठायी थी मांग सरकार का यह फैसला वीसीके विधायक जोतिमणि की उस मांग के बाद आया है, जिसमें उन्होंने विधायकों को सरकारी वाहन उपलब्ध कराने की मांग की थी. उनका कहना था कि स्थानीय निकायों के प्रमुखों को पहले से ही सरकारी वाहनों की सुविधा मिलती है. उन्होंने बताया कि नगर निकायों के अध्यक्ष, मेयर और डिप्टी मेयर को सरकारी गाड़ियां उपलब्ध करायी जाती हैं, जबकि विधायकों को ऐसी सुविधा नहीं मिलती. उनके मुताबिक, वाहन की व्यवस्था नहीं होने के कारण कई बार विधायकों के लिए अपने विधानसभा क्षेत्रों में समय पर पहुंचना मुश्किल हो जाता है. ड्राइवर और कार्यालय सहायक के लिए भी आर्थिक मदद सरकार के फैसले में केवल वाहन उपलब्ध कराने की बात नहीं है. विधायकों को गाड़ी और ड्राइवर के खर्च के लिए ₹75 हजार प्रति माह दिये जाएंगे. वहीं, विधायक कार्यालय में एक सहायक रखने के लिए ₹25 हजार मासिक की सहायता दी जाएगी. इस तरह क्षेत्रीय दौरे के साथ-साथ विधायक के कार्यालय के दैनिक कामकाज को व्यवस्थित करने के लिए भी सरकार की ओर से आर्थिक सहायता मिलेगी. पहले भी उठती रही है सरकारी कार की मांग मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, विधायकों के लिए सरकारी वाहन उपलब्ध कराने की मांग पहले भी अलग-अलग सरकारों के सामने उठती रही है. डीएमके के एक वरिष्ठ विधायक ने बताया कि पहले भी इस तरह का प्रस्ताव सामने आया था, लेकिन आर्थिक स्थिति का हवाला देकर इसे आगे नहीं बढ़ाया जा सका. अब सरकार के इस फैसले के बाद तमिलनाडु के विधायकों को अपने विधानसभा क्षेत्रों में काम करने के लिए वाहन और कार्यालयी सहायता उपलब्ध होने का रास्ता साफ हो गया है.
कोलकाता: स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान कांग्रेस मुख्यालय में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के गायन को लेकर उठा विवाद अब राजनीतिक टकराव में बदल गया है। भारतीय जनता पार्टी और भारतीय जनता युवा मोर्चा ने कांग्रेस नेताओं के खिलाफ पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन किया। बीजेपी ने आरोप लगाया कि सोनिया गांधी द्वारा वंदे मातरम् के गायन को बीच में रोकना राष्ट्रगीत का अपमान है। हालांकि, कांग्रेस की ओर से इस आरोप को लेकर अलग रुख सामने आया है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने सोनिया गांधी से माफी की मांग को खारिज करते हुए कहा कि माफी मांगने का सवाल ही नहीं उठता। इस बयान के बाद विवाद और तेज हो गया है। बंगाल में बीजेपी और भाजयुमो का विरोध प्रदर्शन वंदे मातरम् विवाद को लेकर पश्चिम बंगाल में बीजेपी और भाजयुमो ने कई जगह प्रदर्शन किए। उत्तर बंगाल के सिलीगुड़ी में भाजयुमो कार्यकर्ताओं ने मशाल जुलूस निकाला। प्रदर्शनकारियों ने सोनिया गांधी के साथ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी के खिलाफ भी नारेबाजी की। कोलकाता में राज्य मंत्री इंद्रनील खां के नेतृत्व में भाजयुमो ने विरोध मार्च निकाला। बीजेपी नेताओं ने आरोप लगाया कि राष्ट्रगीत की गरिमा के साथ किसी भी तरह का समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता। पुरुलिया में भी निकला विरोध मार्च पुरुलिया जिले के रघुनाथपुर में भी बीजेपी कार्यकर्ताओं ने विरोध मार्च निकाला। मार्च शहर के विभिन्न हिस्सों से गुजरते हुए खुदीराम मोड़ पहुंचा, जहां विरोध सभा आयोजित की गई। सभा में बीजेपी नेताओं ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए वंदे मातरम् की गरिमा बनाए रखने की मांग की और कथित अपमान के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। बंकिम चंद्र के वंशज ने मांगी माफी विवाद के बीच राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के वंशज सुमित्रो चटर्जी ने भी सोनिया गांधी से बिना शर्त माफी मांगने की अपील की है। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने भी इस मामले पर कांग्रेस को घेरा। उन्होंने आरोप लगाया कि सोनिया गांधी की कार्रवाई से राष्ट्रगीत और उसके रचयिता दोनों का अपमान हुआ है। उन्होंने कहा कि इस घटना से बंगाल के लोगों में नाराजगी है। मिथुन चक्रवर्ती ने कहा- वंदे मातरम् देश का प्राण बीजेपी नेता और अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती से जब इस विवाद पर प्रतिक्रिया मांगी गई तो उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम् देश का प्राण है और जन गण मन देश की आत्मा।’ उन्होंने इस मुद्दे पर इससे ज्यादा टिप्पणी करने से इनकार किया। उनके बयान को भी बीजेपी के राष्ट्रवादी विमर्श के समर्थन के तौर पर देखा जा रहा है। राशिद अल्वी का पलटवार कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने बीजेपी की ओर से सोनिया गांधी से माफी की मांग को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि सोनिया गांधी के माफी मांगने का सवाल ही नहीं उठता। अल्वी ने वंदे मातरम् के ऐतिहासिक संदर्भ का उल्लेख करते हुए कहा कि 1937 में महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर के दौर में इसके दो अंतरों को अपनाए जाने की बात सामने आई थी। उनका तर्क है कि गीत के बाद के हिस्सों में धार्मिक संदर्भ हैं। विवाद के केंद्र में क्या है? दरअसल, स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान कांग्रेस मुख्यालय में वंदे मातरम् के गायन को लेकर विवाद शुरू हुआ। बीजेपी का आरोप है कि सोनिया गांधी ने गीत के गायन को बीच में रुकवाया, जबकि कांग्रेस की ओर से इस घटना को लेकर बीजेपी के आरोपों को स्वीकार नहीं किया गया है। अब यह विवाद राष्ट्रगीत की गरिमा, उसके ऐतिहासिक संदर्भ और राजनीतिक दलों के राष्ट्रवाद के दावों तक पहुंच गया है। बीजेपी इसे राष्ट्रीय सम्मान से जोड़ रही है, जबकि कांग्रेस इसके ऐतिहासिक और धार्मिक संदर्भों पर जोर दे रही है।
नई दिल्ली: संसद के मानसून सत्र के आखिरी दिन गुरुवार को लोकसभा की कार्यवाही बेहद संक्षिप्त रही। सदन की कार्यवाही शुरू होते ही राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ का सामूहिक गान हुआ और इसके तुरंत बाद लोकसभा को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। सत्र के अंतिम दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह समेत कई प्रमुख नेता सदन में मौजूद थे। विपक्ष की ओर से कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी सदन में उपस्थित रहे। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन में पहुंचते ही ‘वंदे मातरम’ के गान की घोषणा की। राष्ट्रगीत के बाद सदन की कार्यवाही को आगे बढ़ाने के बजाय अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। सत्र के आखिरी दिन नहीं हुआ लंबा कामकाज मानसून सत्र के अंतिम दिन सदन में सामान्य विधायी कार्यवाही आगे नहीं बढ़ सकी। कार्यवाही की शुरुआत ‘वंदे मातरम’ से हुई और इसके बाद सदन स्थगित कर दिया गया। इससे पहले पूरे मानसून सत्र के दौरान भी संसद में कई मुद्दों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी राजनीतिक बहस देखने को मिली थी। कई मौकों पर हंगामे और विरोध के कारण कार्यवाही प्रभावित हुई। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, मानसून सत्र में लोकसभा का वास्तविक कामकाज करीब 15 घंटे ही हो सका। सदन में मौजूद रहे प्रधानमंत्री और प्रमुख नेता सत्र के अंतिम दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ गृह मंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी सदन में मौजूद रहे। विपक्ष की ओर से राहुल गांधी समेत कई सांसद सदन में पहुंचे। ऐसे में अंतिम दिन ‘वंदे मातरम’ के सामूहिक गान के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के प्रमुख नेताओं की मौजूदगी ने इसे खास बना दिया। ‘वंदे मातरम’ को लेकर राजनीतिक और ऐतिहासिक महत्व ‘वंदे मातरम’ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय गीत है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की रचना ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लोगों में राष्ट्रीय चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। भारत में ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान और ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त है। संसद में ‘वंदे मातरम’ का सामूहिक गान राष्ट्रीय महत्व की परंपरा से जुड़ा हुआ है। मानसून सत्र के अंतिम दिन सदन की शुरुआत इसी राष्ट्रगीत से होना राजनीतिक और संसदीय दृष्टि से भी चर्चा का विषय बना। हंगामे की आशंका के बीच सीधे स्थगित हुई कार्यवाही सत्र के दौरान विभिन्न मुद्दों को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच टकराव की स्थिति बनी रही थी। ऐसे में अंतिम दिन भी हंगामे की संभावना के बीच लोकसभा अध्यक्ष ने कार्यवाही को लंबा खींचने के बजाय शुरुआत में ही स्थगित करने का निर्णय लिया। इस तरह मानसून सत्र का समापन ‘वंदे मातरम’ के गान के साथ हुआ। अब संसद का अगला सत्र कब बुलाया जाएगा, इस पर सरकार की ओर से आगे कार्यक्रम तय किया जाएगा। लेकिन मानसून सत्र का कम कामकाज, लगातार राजनीतिक गतिरोध और अंतिम दिन की संक्षिप्त कार्यवाही आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का मुद्दा बनी रह सकती है।
नई दिल्ली: संसद के मानसून सत्र के दौरान शुक्रवार को सरकार और विपक्ष के बीच टकराव और तेज हो गया। विपक्षी सांसदों ने संसद भवन के मकर द्वार के सामने प्रदर्शन करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से छात्र प्रदर्शनकारियों पर कथित पुलिस कार्रवाई और अयोध्या के राम मंदिर में दान से जुड़ी कथित वित्तीय गड़बड़ियों पर जवाब देने की मांग की। बारिश के बीच विपक्षी सांसद हाथों में तख्तियां और छाते लेकर संसद परिसर में जुटे। प्रदर्शन के दौरान ‘अमित शाह जवाब दो’ के नारे लगाए गए और सरकार से इन दोनों मुद्दों पर संसद में विस्तृत बयान देने की मांग की गई। छात्र प्रदर्शन पर सरकार को घेरा विपक्ष ने 20 जुलाई को हुए छात्र प्रदर्शन के दौरान कथित पुलिस कार्रवाई का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। विपक्षी दलों का आरोप है कि प्रदर्शन कर रहे छात्रों के साथ सख्ती बरती गई और इस मामले में सरकार को जवाब देना चाहिए। कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने कहा कि यदि सरकार युवाओं के हितों को लेकर गंभीर है तो गृह मंत्री अमित शाह को संसद में आकर इस मुद्दे पर बयान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि छात्रों के खिलाफ हुई कथित कार्रवाई के लिए जवाबदेही तय होनी चाहिए और सरकार को इस पर स्पष्ट रुख रखना चाहिए। राम मंदिर दान मामले पर चर्चा की मांग विपक्ष ने अयोध्या के राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए दान से जुड़ी कथित वित्तीय अनियमितताओं का मुद्दा भी उठाया। कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव का नोटिस देकर इस विषय पर तत्काल चर्चा कराने की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि मंदिर में नकद दान और कीमती सामान के कथित गबन से जुड़े गंभीर आरोप सामने आए हैं। विपक्ष का कहना है कि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और यदि किसी स्तर पर गड़बड़ी हुई है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। लगातार बाधित हो रही संसद की कार्यवाही मानसून सत्र के पिछले दो सप्ताह से विभिन्न मुद्दों पर सरकार और विपक्ष के बीच लगातार गतिरोध बना हुआ है। छात्र आंदोलन, पुलिस कार्रवाई और अन्य राजनीतिक मुद्दों को लेकर विपक्ष लगातार सरकार को घेर रहा है। विपक्षी सांसदों का कहना है कि जब तक सरकार इन मुद्दों पर संसद में जवाब नहीं देती, तब तक उनका विरोध जारी रहेगा।
नई दिल्ली: संसद का मानसून सत्र सिर्फ तीखी राजनीतिक बहसों और आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहा। सदन के भीतर और गलियारों में कई ऐसे हल्के-फुल्के पल भी देखने को मिले, जिन्होंने राजनीतिक माहौल को अलग रंग दे दिया। कभी नेताओं के बीच तंज और हाजिरजवाबी चर्चा का विषय बनी तो कभी सत्ता और विपक्ष के नेताओं की मुस्कुराहट भरी मुलाकात ने सबका ध्यान खींचा। संसदीय परिसर में घटी ऐसी कई घटनाएं पूरे दिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी रहीं। महाराष्ट्र पर केंद्रीय मंत्री का तंज संसद परिसर में एक केंद्रीय मंत्री की मुलाकात महाराष्ट्र से आने वाले एनडीए के एक सहयोगी दल के सांसद से हुई। बातचीत के दौरान मंत्री ने हल्के अंदाज में कहा कि महाराष्ट्र की राजनीतिक संस्कृति बाकी राज्यों से अलग है। उन्होंने कहा कि अन्य राज्यों में जब कोई केंद्रीय मंत्री दौरे पर जाता है तो वहां के सभी सांसद एक साथ मिलते हैं, बैठते हैं और रात्रिभोज भी करते हैं, लेकिन महाराष्ट्र में ऐसा कम देखने को मिलता है। इतना सुनते ही सांसद ने मुस्कुराते हुए मंत्री का हाथ पकड़ लिया और कहा कि उन्हें ऐसी किसी बैठक की जानकारी ही नहीं थी। मौके पर मौजूद पत्रकारों के सामने हुई यह बातचीत राजनीतिक तंज के रूप में पूरे दिन चर्चा में रही। 'QR कोड दे दीजिए' वाला जवाब बना चर्चा संसद परिसर में समाजवादी पार्टी के सांसद इन दिनों चंदा चोरी मामले को लेकर अनोखे अंदाज में विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। वे दानपात्र रखकर सांसदों से सहयोग राशि जुटा रहे हैं। सोमवार को दानपात्र खोलने पर 47,100 रुपये और मंगलवार को 33,050 रुपये के साथ दो चांदी के सिक्के मिले। इसी दौरान सपा सांसद अक्षय यादव ने दावा किया कि किसी भी भाजपा सांसद ने इसमें सहयोग नहीं किया। तभी वहां से गुजर रहे एक भाजपा सांसद और केंद्रीय राज्य मंत्री से उन्होंने श्रीराम के नाम पर चंदा देने का आग्रह किया। इस पर मंत्री ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "QR कोड दे दीजिए", और आगे बढ़ गए। उनका यह जवाब संसद परिसर में मौजूद लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया। मेटा अधिकारियों से फेक वीडियो पर तीखे सवाल संसद की सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) संबंधी स्थायी समिति की बैठक में मेटा के अधिकारियों को भी सांसदों के तीखे सवालों का सामना करना पड़ा। अधिकारियों ने बताया कि तकनीकी त्रुटि के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो गलती से हट गया था, क्योंकि फेक वीडियो हटाने वाली ऑटोमेटेड प्रणाली सक्रिय थी। इस पर समिति की एक महिला सांसद ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर मौजूद एक कथित फर्जी वीडियो दिखाते हुए सवाल किया कि जब उनका फेक वीडियो अब तक नहीं हटाया गया, तो फिर प्रधानमंत्री का वास्तविक वीडियो कैसे हट गया। इस सवाल के बाद बैठक में मेटा अधिकारियों को अपनी तकनीकी प्रक्रिया पर विस्तार से सफाई देनी पड़ी। सत्ता और विपक्ष के नेताओं की सौहार्दपूर्ण मुलाकात संसद भवन के मकर द्वार पर सत्ता और विपक्ष के नेताओं के बीच एक दिलचस्प मुलाकात भी देखने को मिली। कांग्रेस के एक राज्यसभा सांसद और भाजपा के एक लोकसभा सांसद, जो अक्सर टीवी डिबेट में एक-दूसरे के राजनीतिक विरोधी नजर आते हैं, संसद परिसर में मुस्कुराते हुए मिले। दोनों ने हाथ मिलाया, हालचाल पूछा और कुछ मिनट तक बातचीत की। इसी दौरान मौजूद एक पत्रकार ने दोनों नेताओं के सफेद परिधान पर टिप्पणी की। इस पर भाजपा सांसद ने मजाकिया अंदाज में कांग्रेस सांसद की ओर इशारा करते हुए कहा, "इनका जीवन भी बिल्कुल वाइट ही है।" इस टिप्पणी पर आसपास मौजूद लोग मुस्कुरा उठे। बातचीत के दौरान पंजाब कांग्रेस में चल रही अंदरूनी खींचतान का भी जिक्र हुआ। इस पर भाजपा सांसद ने हल्का राजनीतिक तंज किया, जबकि कांग्रेस सांसद ने शांत अंदाज में जवाब देते हुए कहा कि उनकी पार्टी में हालात जल्द सामान्य हो जाएंगे। संसद की राजनीति का दूसरा चेहरा संसद की कार्यवाही के दौरान जहां एक ओर गंभीर मुद्दों पर तीखी बहस होती है, वहीं दूसरी ओर ऐसे हल्के-फुल्के पल यह भी दिखाते हैं कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद व्यक्तिगत स्तर पर नेताओं के बीच संवाद, हास्य और सौहार्द भी बना रहता है। यही संसदीय लोकतंत्र की एक अलग और कम दिखाई देने वाली तस्वीर भी पेश करता है।
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (Foreign Contribution Regulation Act - FCRA) में प्रस्तावित संशोधनों को लेकर देश और विदेश दोनों जगह बहस तेज हो गई है। संसद में इस विधेयक पर चर्चा के बीच अमेरिका के रिपब्लिकन सांसद रिले मूर ने भारत सरकार के प्रस्तावित बदलावों पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि नए प्रावधानों से सरकार को चर्चों और धार्मिक संस्थाओं के कामकाज तथा उनकी संपत्तियों पर अधिक नियंत्रण मिल सकता है। मूर ने इसे ईसाई समुदाय के लिए चिंता का विषय बताते हुए कहा कि यदि यह विधेयक मौजूदा स्वरूप में पारित होता है, तो इसका असर भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों पर भी पड़ सकता है। सोशल मीडिया पर रिले मूर ने क्या कहा? अमेरिकी सांसद रिले मूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर भारत में ईसाई समुदाय के लंबे इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि संत थॉमस के मालाबार तट पर आने के बाद से भारत में ईसाई धर्म की मजबूत मौजूदगी रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि FCRA में प्रस्तावित संशोधन सरकार को चर्चों और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं से जुड़ी संपत्तियों और उनके प्रबंधन में हस्तक्षेप करने की शक्ति दे सकते हैं। मूर ने अपने बयान में कहा कि यह सिर्फ प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि ईसाई समुदाय के अधिकारों से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि यह कानून इसी स्वरूप में लागू होता है तो यह भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय संबंधों में भी चिंता का कारण बन सकता है। क्या है FCRA कानून? विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) भारत में उन संस्थाओं को नियंत्रित करता है जो विदेशों से आर्थिक सहायता या चंदा प्राप्त करती हैं। यह कानून गैर-सरकारी संगठनों (NGO), धार्मिक ट्रस्टों, शैक्षणिक संस्थानों, सामाजिक संगठनों और अन्य गैर-लाभकारी संस्थाओं पर लागू होता है। मौजूदा नियमों के अनुसार विदेशी चंदा प्राप्त करने के लिए किसी भी संस्था को केंद्रीय गृह मंत्रालय से FCRA पंजीकरण कराना अनिवार्य होता है। यह पंजीकरण पांच वर्षों के लिए मान्य रहता है और इसके बाद नवीनीकरण कराना पड़ता है। प्रस्तावित संशोधनों में क्या बदलाव होंगे? सरकार ने FCRA में कई महत्वपूर्ण बदलाव प्रस्तावित किए हैं। सबसे अहम प्रस्ताव एक 'नामित प्राधिकरण' (Designated Authority) के गठन का है। यदि किसी संस्था का FCRA पंजीकरण रद्द हो जाता है, उसकी अवधि समाप्त हो जाती है या संस्था स्वयं अपना पंजीकरण वापस लेती है, तो यह नामित प्राधिकरण विदेशी चंदे और उससे अर्जित संपत्तियों का प्रबंधन संभाल सकेगा। इसके अलावा प्रस्तावित संशोधनों में कई नई शर्तें भी जोड़ी गई हैं। प्रमुख प्रस्तावित बदलाव संस्था को पंजीकरण के समय अपने कार्य का स्पष्ट उद्देश्य बताना होगा। जिन राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों में संस्था कार्य करेगी, उनका उल्लेख अनिवार्य होगा। संस्था को निर्धारित श्रेणियों में से अपने कार्य क्षेत्र का चयन करना होगा। FCRA पंजीकरण के नवीनीकरण के लिए पिछले दो वर्षों में कम-से-कम 10 लाख रुपये के विदेशी अंशदान के उपयोग का विवरण देना होगा। विदेशी धन किस परियोजना और किस गतिविधि पर खर्च किया गया, इसका पूरा ब्यौरा देना होगा। विदेशी अंशदान देने वाले वास्तविक (Ultimate Beneficial Donor) दाता की पहचान बताना अनिवार्य होगा। संस्था को अपनी वेबसाइट और सभी सोशल मीडिया खातों का विवरण भी वार्षिक रिपोर्ट में देना होगा। सबसे ज्यादा विवाद किस प्रावधान पर? विवाद का सबसे बड़ा कारण नामित प्राधिकरण को मिलने वाले अधिकार हैं। विपक्षी दलों, कई गैर-सरकारी संगठनों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि इससे केंद्र सरकार को विदेशी सहायता प्राप्त संस्थाओं पर अत्यधिक प्रशासनिक नियंत्रण मिल जाएगा। धार्मिक संगठनों की चिंता है कि यदि किसी चर्च, ट्रस्ट या संस्था का FCRA पंजीकरण रद्द हो जाता है या उसका नवीनीकरण नहीं होता, तो विदेशी सहायता से संचालित स्कूल, अस्पताल, अनाथालय, सामाजिक सेवा केंद्र और अन्य संपत्तियां सरकारी प्रबंधन में जा सकती हैं। सरकार का क्या कहना है? केंद्र सरकार ने इन आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा है कि प्रस्तावित संशोधनों का उद्देश्य किसी संस्था या धार्मिक समुदाय को निशाना बनाना नहीं है। सरकार के अनुसार इन बदलावों का मकसद विदेशी धन के उपयोग में पारदर्शिता बढ़ाना, जवाबदेही सुनिश्चित करना और धन के दुरुपयोग को रोकना है। सरकार का कहना है कि विदेशी सहायता का उपयोग केवल उसी उद्देश्य के लिए हो, जिसके लिए उसे अनुमति दी गई है, इसलिए निगरानी व्यवस्था को मजबूत करना आवश्यक है। संसद में जारी है बहस FCRA संशोधन विधेयक पर संसद में चर्चा जारी है। एक ओर सरकार इसे विदेशी फंडिंग व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने वाला सुधार बता रही है, वहीं विपक्ष, कई सामाजिक संगठनों और धार्मिक संस्थाओं का कहना है कि कुछ प्रावधानों की समीक्षा की जानी चाहिए ताकि वैध संस्थाओं के कामकाज पर अनावश्यक प्रशासनिक हस्तक्षेप न हो। इसी बीच अमेरिकी सांसद रिले मूर की टिप्पणी ने इस बहस को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बना दिया है।
CJP Meeting: NEET-UG आंदोलन के बाद अब कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) अपने अगले राजनीतिक और संगठनात्मक कदमों की तैयारी में जुट गई है। पार्टी ने 5 अगस्त को महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर में शीर्ष नेताओं और प्रमुख पदाधिकारियों की अहम बैठक बुलाई है। इस बैठक में जंतर-मंतर पर चले लंबे आंदोलन के बाद संगठन की आगे की रणनीति, विस्तार और भविष्य की योजनाओं पर विस्तार से चर्चा की जाएगी। अभिजीत दीपके के आवास पर होगी बैठक पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, यह बैठक CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके के आवास पर आयोजित होगी। इसमें पार्टी के शीर्ष नेता, प्रमुख पदाधिकारी और विभिन्न राज्यों से जुड़े प्रतिनिधि शामिल होंगे। बैठक का उद्देश्य आंदोलन के अनुभवों की समीक्षा करना और आगामी कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार करना है। जंतर-मंतर आंदोलन के बाद लिया जाएगा फीडबैक दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक महीने तक चले आंदोलन के बाद पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों को कुछ समय परिवार के साथ बिताने की सलाह दी थी। इसी दौरान वरिष्ठ पदाधिकारियों को जिम्मेदारी दी गई थी कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में छात्रों, युवाओं और स्वयंसेवकों से संवाद कर उनकी राय और सुझाव जुटाएं। बताया जा रहा है कि बैठक में इन्हीं सुझावों के आधार पर संगठन की आगे की दिशा और अभियान तय किए जाएंगे। बैठक के बाद होगी प्रेस कॉन्फ्रेंस 5 अगस्त को बैठक समाप्त होने के तुरंत बाद CJP प्रेस कॉन्फ्रेंस करेगी। इसमें पार्टी नेतृत्व आंदोलन के बाद की रणनीति, आगामी कार्यक्रमों और संगठन से जुड़े महत्वपूर्ण फैसलों की आधिकारिक घोषणा करेगा। माना जा रहा है कि प्रेस वार्ता में पार्टी के विस्तार और भविष्य के अभियानों को लेकर भी जानकारी दी जा सकती है। फ्रेंडशिप डे पर छात्रों से मिले अभिजीत दीपके बैठक से पहले CJP संस्थापक अभिजीत दीपके ने अपने आवास पर छात्रों, स्थानीय नागरिकों और आसपास के जिलों से आए समर्थकों से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने बच्चों और युवाओं के साथ 'फ्रेंडशिप डे' भी मनाया और उनसे बातचीत कर आंदोलन से जुड़े अनुभव साझा किए। आंदोलन के बाद संगठनात्मक तैयारी तेज राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि NEET आंदोलन के बाद यह बैठक CJP के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पार्टी अब आंदोलन के अनुभवों को संगठनात्मक विस्तार और भविष्य की रणनीति में बदलने की कोशिश कर रही है। ऐसे में 5 अगस्त की बैठक और उसके बाद होने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस पर सभी की नजरें टिकी हैं।
Cauvery Water Dispute: कावेरी जल विवाद को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच एक बार फिर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय द्वारा बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने की पहल के कुछ दिनों बाद उनकी सरकार के वरिष्ठ मंत्री आर. निर्मलकुमार ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि शिवकुमार कांग्रेस नेतृत्व की बजाय डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन के इशारों पर काम करते हैं। 'कांग्रेस नहीं, स्टालिन की सुनते हैं डीके शिवकुमार' इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, पत्रकारों से बातचीत में आर. निर्मलकुमार ने कहा कि डीके शिवकुमार अपनी ही पार्टी कांग्रेस के नेताओं की बात नहीं सुनते। उन्होंने दावा किया कि अगर एमके स्टालिन या उनका परिवार कोई सुझाव देता है, तो शिवकुमार उसी के अनुसार फैसला लेते हैं। निर्मलकुमार ने कहा, "डीके शिवकुमार कांग्रेस नेतृत्व की भी नहीं सुनते। अगर एमके स्टालिन या उनका परिवार कुछ कहेगा, तो वह उसी के मुताबिक काम करेंगे। दोनों के बीच बेहद करीबी रिश्ते हैं।" डीएमके पर भी लगाए गंभीर आरोप तमिलनाडु सरकार के मंत्री ने आरोप लगाया कि डीएमके यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि कावेरी जल विवाद के मुद्दे पर मुख्यमंत्री विजय राजनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ गए हैं। उन्होंने कहा कि जब राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रही थी, तब डीएमके ने अलग से याचिका दाखिल कर मामले को और उलझाने की कोशिश की। निर्मलकुमार ने सवाल उठाया कि जब डीएमके तमिलनाडु की सत्ता में थी, तब उसने कावेरी विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में प्रभावी कानूनी पहल क्यों नहीं की। AIADMK पर भी साधा निशाना आर. निर्मलकुमार ने विपक्षी दल AIADMK को भी आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि एक ओर पार्टी विधानसभा में कावेरी मुद्दे पर पारित प्रस्ताव का समर्थन करती है, जबकि दूसरी ओर अदालत में उसी प्रस्ताव को चुनौती देती है। उन्होंने इसे विरोधाभासी और राजनीतिक अवसरवाद करार दिया। बातचीत की पहल के बाद बढ़ा टकराव गौरतलब है कि पिछले सप्ताह मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने कावेरी जल विवाद को बातचीत के जरिए सुलझाने के लिए कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से मुलाकात का प्रस्ताव रखा था। हालांकि कर्नाटक सरकार की ओर से फिलहाल इस बैठक को टाल दिया गया। इसके बाद दोनों राज्यों के बीच राजनीतिक बयानबाजी और तेज हो गई है। कावेरी विवाद क्यों है अहम? कावेरी नदी का जल बंटवारा लंबे समय से तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच विवाद का विषय रहा है। दोनों राज्यों के किसान सिंचाई और पेयजल के लिए इस नदी पर काफी हद तक निर्भर हैं। हर साल मानसून के दौरान जल छोड़ने की मात्रा को लेकर दोनों राज्यों के बीच विवाद गहराता है और मामला कई बार सुप्रीम कोर्ट तथा कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण तक पहुंच चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बावजूद कावेरी जल विवाद का स्थायी समाधान केवल आपसी संवाद, न्यायिक निर्देशों के पालन और जल प्रबंधन की बेहतर व्यवस्था से ही संभव है।
PM Modi Video Message: जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी दिवंगत मां के खिलाफ कथित अभद्र भाषा के इस्तेमाल को लेकर जारी विवाद के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने युवाओं के नाम एक वीडियो संदेश जारी किया है। अपने संदेश में उन्होंने कहा कि गलती करने वाले युवाओं को सजा देने के बजाय उन्हें सही रास्ता दिखाने की जरूरत है और वह उन्हें माफ करना चाहते हैं। 'जो हुआ, देश और दुनिया ने देखा' प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, "जंतर-मंतर पर जो कुछ भी हुआ, देश और दुनिया ने देखा। कुछ शरारती बच्चों ने भद्दी-भद्दी गालियां दीं। मुझे भी गालियां दी गईं और मेरी स्वर्गीय माता के लिए भी अपशब्द कहे गए। लेकिन बचपन में गलतियां होती हैं और उनसे सुधरने का अवसर भी होता है।" उन्होंने कहा कि समाज में इस घटना को लेकर आक्रोश स्वाभाविक है, लेकिन ऐसे समय में दंड नहीं बल्कि मार्गदर्शन अधिक जरूरी है। 'सजा नहीं, सही राह दिखाने की जरूरत' प्रधानमंत्री ने कहा कि यह चिंता का विषय है कि देश की बेटियां इस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर रही हैं। उन्होंने कहा, "मैं समाज के आक्रोश को समझ सकता हूं। यह एक सांस्कृतिक झटका है कि हमारी बेटियां इस तरह की भाषा कैसे बोल सकती हैं। लेकिन समय उन्हें सजा देने का नहीं, बल्कि गले लगाकर सही राह दिखाने का है। ये गुमराह बच्चे हैं और इन्हें राह दिखाना हमारा काम है।" 'मैं उन्हें माफ करना चाहता हूं' अपने संदेश में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि वह इन युवाओं को माफ करना चाहते हैं। उन्होंने कहा, "मैं उन्हें माफ करना चाहता हूं। समाज भी मेरी इस भावना को स्वीकार करे। अदालतों के चक्कर कटवाने और प्रताड़ित करने से परिस्थितियां नहीं बदलेंगी।" प्रधानमंत्री ने कहा कि युवाओं को अपनी गलतियों से सीखने और बेहतर नागरिक बनने का अवसर मिलना चाहिए। युवाओं से देश निर्माण में जुड़ने की अपील वीडियो संदेश के अंत में प्रधानमंत्री मोदी ने युवाओं से सकारात्मक सोच के साथ देश के विकास में भागीदारी निभाने की अपील की। उन्होंने कहा, "आओ, हम मिलकर देश को आगे बढ़ाएं। गलतियों से सीखें और अपने सपनों को साकार करें। मैं आपके उज्ज्वल भविष्य के लिए जीता हूं।" प्रधानमंत्री का यह संदेश ऐसे समय आया है, जब जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान कथित आपत्तिजनक नारों को लेकर राजनीतिक बहस तेज है और इस मामले में कानूनी कार्रवाई भी जारी है।
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की खबर सामने आने के बाद भी जंतर-मंतर पर चल रहा आंदोलन समाप्त नहीं होगा। कॉक्रोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने स्पष्ट किया है कि संगठन की दो प्रमुख मांगें अभी भी बाकी हैं और जब तक उन पर कार्रवाई नहीं होती, तब तक प्रदर्शन जारी रहेगा। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की खबर सामने आते ही जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे समर्थकों के बीच उत्साह का माहौल देखने को मिला। हालांकि, CJP नेतृत्व ने इसे आंदोलन की अंतिम जीत मानने से इनकार करते हुए कहा कि यह केवल उनकी मांगों की दिशा में पहला कदम है। अभिजीत दीपके ने रखीं दो प्रमुख मांगें अभिजीत दीपके ने मीडिया से बातचीत में कहा कि शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बावजूद संगठन अपनी दो महत्वपूर्ण मांगों पर अडिग है। पहली मांग उन छात्रों के परिवारों के लिए मुआवजे की है, जिन्होंने कथित तौर पर परीक्षा विवाद के दौरान आत्महत्या की। दीपके ने मांग की कि ऐसे प्रत्येक परिवार को एक करोड़ रुपये का आर्थिक मुआवजा दिया जाए। दूसरी मांग 20 जुलाई को प्रदर्शन के दौरान छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर है। उन्होंने कहा कि जिन पुलिस अधिकारियों ने बल प्रयोग किया, उनके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए। "आंदोलन तब तक जारी रहेगा" दीपके ने कहा कि उनकी मांगें केवल इस्तीफे तक सीमित नहीं थीं। उनका कहना है कि जब तक सरकार लिखित रूप में उनकी सभी मांगों पर निर्णय नहीं लेती, तब तक आंदोलन समाप्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने दावा किया कि पिछले कई दिनों से लोग यह मान रहे थे कि इस्तीफा संभव नहीं है, लेकिन छात्रों के लगातार आंदोलन और दबाव के कारण यह स्थिति बनी। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक आंदोलन की सफलता बताया और कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने से बदलाव संभव है। छात्रों पर दर्ज मामलों को वापस लेने की मांग CJP ने यह भी मांग उठाई कि 20 जुलाई के बाद आंदोलन में शामिल छात्रों पर यदि कोई कानूनी मामले दर्ज किए गए हैं तो उन्हें वापस लिया जाए। संगठन का कहना है कि छात्रों के खिलाफ दर्ज कार्रवाई उनके भविष्य को प्रभावित कर सकती है, इसलिए सरकार को इस दिशा में भी सकारात्मक निर्णय लेना चाहिए। इसके अलावा, दीपके ने रैपिड एक्शन फोर्स और दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए। आंदोलन पर आगे क्या? संगठन ने संकेत दिया है कि आने वाले दिनों में सरकार के साथ बातचीत के आधार पर आगे की रणनीति तय की जाएगी। फिलहाल प्रदर्शन जारी रहेगा और CJP का कहना है कि जब तक सभी प्रमुख मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक आंदोलन वापस नहीं लिया जाएगा। उधर, NEET परीक्षा विवाद और परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता को लेकर देशभर में छात्रों और विभिन्न संगठनों की ओर से अलग-अलग स्तर पर आवाज उठाई जा रही है। आने वाले दिनों में सरकार की ओर से उठाए जाने वाले कदमों पर सभी की नजर बनी हुई है.
सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक द्वारा 26 दिन का अनशन समाप्त किए जाने के बावजूद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने साफ कर दिया है कि जंतर-मंतर पर उनका आंदोलन जारी रहेगा। संगठन का कहना है कि जब तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा नहीं देते, तब तक प्रदर्शन खत्म नहीं होगा। NEET प्रश्नपत्र लीक मामले को लेकर CJP के नेतृत्व में छात्र पिछले कई दिनों से जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारी परीक्षा प्रणाली में सुधार, जवाबदेही तय करने और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। अभिजीत दीपके ने क्या कहा? CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर सोनम वांगचुक के अनशन समाप्त करने का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि वांगचुक ने अपने साहस और त्याग से देश का ध्यान छात्रों के मुद्दों की ओर आकर्षित किया। उन्होंने लिखा कि देश के लिए सोनम वांगचुक का जीवन बेहद महत्वपूर्ण है और उनके अनशन खत्म होने से राहत मिली है। हालांकि दीपके ने स्पष्ट किया, "CJP का जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन अभी खत्म नहीं होगा। जब तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा नहीं देते, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।" 'Charging up...' पोस्ट से बढ़ी चर्चा अभिजीत दीपके ने एक अन्य पोस्ट में "Charging up..." लिखते हुए एक तस्वीर साझा की, जिसमें एक व्यक्ति के हाथ में ड्रिप लगी हुई दिखाई दे रही है। इस पोस्ट को आंदोलन जारी रहने के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। सोनम वांगचुक ने खत्म किया 26 दिन का अनशन सोनम वांगचुक ने गुरुवार (23 जुलाई) देर रात 26 दिनों से जारी अपना अनिश्चितकालीन अनशन समाप्त कर दिया। उन्होंने बताया कि सरकार की ओर से मिले आश्वासनों के बाद यह फैसला लिया गया। सरकार ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने, परीक्षा प्रणाली में सुधार पर चर्चा करने और कथित पेपर लीक से प्रभावित छात्रों के परिवारों को राहत देने जैसे मुद्दों पर विचार करने का भरोसा दिया है। CJP अपनी मांगों पर कायम सोनम वांगचुक के अनशन समाप्त होने के बावजूद CJP का कहना है कि उनका आंदोलन अभी समाप्त नहीं हुआ है। संगठन का कहना है कि जब तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे समेत उनकी प्रमुख मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन जारी रहेगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आधी रात जारी वीडियो संदेश के बाद भी NEET पेपर लीक मामले पर सियासी घमासान थमता नहीं दिख रहा है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री के संबोधन पर प्रतिक्रिया देते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने छात्रों की सबसे बड़ी मांग—केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे—पर कोई जवाब नहीं दिया। राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर प्रधानमंत्री के वीडियो को साझा करते हुए कहा कि छात्र लगातार शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं, ऐसे में आधी रात को वीडियो जारी कर उनकी भावनाओं और समझदारी का अपमान नहीं किया जाना चाहिए। राहुल गांधी ने रखीं तीन मांगें राहुल गांधी ने सरकार के सामने तीन प्रमुख मांगें रखीं— केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को तत्काल पद से हटाया जाए। प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर कार्रवाई करने वालों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएं। सरकार छात्रों से सार्वजनिक रूप से माफी मांगे। पीएम मोदी ने क्या कहा? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने वीडियो संदेश में कहा कि उनकी सरकार प्रश्नपत्र लीक के मामलों से निपटने के लिए सख्त कानून लाने जा रही है। उन्होंने बताया कि शुक्रवार (24 जुलाई) को केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में इस विधेयक के मसौदे पर चर्चा होगी और उसे अंतिम रूप दिया जाएगा। इसके बाद अगले सप्ताह इसे संसद में पेश किया जाएगा। प्रधानमंत्री ने कहा कि प्रस्तावित कानून में पेपर लीक कराने वालों के खिलाफ कड़ी सजा का प्रावधान होगा, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं पर रोक लगाई जा सके और छात्रों का भरोसा कायम रहे। फास्ट ट्रैक कोर्ट शुरू होने का दावा अपने संदेश में प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्होंने पेपर लीक मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने के निर्देश दिए थे और अब इन अदालतों ने काम शुरू कर दिया है। उनका कहना था कि इससे दोषियों को जल्द सजा दिलाने में मदद मिलेगी। NEET परीक्षा पर सरकार का पक्ष प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाएं लाखों छात्रों और उनके परिवारों को प्रभावित करती हैं। उन्होंने बताया कि आरोप सामने आने के बाद सरकार ने कई आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा और छात्रों का शैक्षणिक वर्ष खराब न हो, इसके लिए जल्द दोबारा परीक्षा आयोजित कराई गई। प्रधानमंत्री के अनुसार, पुनः आयोजित NEET परीक्षा में 22 लाख से अधिक छात्रों ने हिस्सा लिया और उसका परिणाम 19 जुलाई को जारी किया गया। मुद्दे पर जारी है सियासी टकराव प्रधानमंत्री के नए कानून और फास्ट ट्रैक कोर्ट की घोषणा के बावजूद विपक्ष अपने रुख पर कायम है। कांग्रेस का कहना है कि जवाबदेही तय करने के लिए शिक्षा मंत्री का इस्तीफा जरूरी है, जबकि सरकार का दावा है कि वह परीक्षा प्रणाली में सुधार और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के लिए प्रतिबद्ध है।
कांग्रेस संसदीय दल (CPP) की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने केंद्र सरकार की शिक्षा नीति और छात्रों के खिलाफ हुई कार्रवाई को लेकर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार और जवाबदेही की मांग कर रहे छात्रों के साथ सरकार ऐसा व्यवहार कर रही है, मानो वे देश के दुश्मन हों। सोनिया गांधी ने कहा कि छात्रों की आवाज दबाने के बजाय उनकी मांगों को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। 'शिक्षा व्यवस्था का पतन, युवा भारत की पीड़ा' शीर्षक से लिखा लेख अंग्रेजी दैनिक द हिंदू में प्रकाशित अपने लेख "An Education System's Collapse, Young India's Trauma" (शिक्षा व्यवस्था का पतन, युवा भारत की पीड़ा) में सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर शिक्षा व्यवस्था को कमजोर करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि देशभर के छात्र केवल परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और सुधार की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकार ने उनके शांतिपूर्ण विरोध का जवाब "कायरता और अकारण क्रूरता" से दिया है। सोनिया गांधी ने लिखा कि छात्रों ने सरकार के शिक्षा सुधार संबंधी दावों की वास्तविकता उजागर कर दी है। उनका कहना है कि सरकार युवाओं को देश का भविष्य मानने के बजाय उनके साथ कठोर रवैया अपना रही है। 'शिक्षा व्यवस्था युवाओं को उम्मीद नहीं, निराशा दे रही' अपने लेख में सोनिया गांधी ने कहा कि मौजूदा शिक्षा व्यवस्था युवाओं को अवसर देने के बजाय निराशा और असुरक्षा की ओर धकेल रही है। उनके अनुसार, देश में चल रहा छात्र आंदोलन दो बड़ी वजहों का परिणाम है। पहली, ऐसी शिक्षा व्यवस्था जिसने छात्रों का भरोसा तोड़ दिया है और दूसरी, केंद्र सरकार का रवैया, जो जवाबदेही तय करने और सुधारात्मक कदम उठाने से लगातार बचता रहा है। उन्होंने कहा कि छात्रों के साथ खड़ा होना केवल राजनीतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज और लोकतंत्र के प्रति नैतिक एवं संवैधानिक दायित्व भी है। पुलिस कार्रवाई पर भी उठाए सवाल सोनिया गांधी ने छात्र आंदोलन के दौरान पुलिस की कार्रवाई पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करने वाली दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ अत्यधिक बल प्रयोग किया। उन्होंने कहा कि यह पहली बार नहीं है जब छात्रों के विरोध प्रदर्शन पर ऐसी कार्रवाई हुई हो। अपने लेख में उन्होंने 2020 के CAA-NRC विरोध प्रदर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय भी विश्वविद्यालय परिसरों में पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों की कार्रवाई हुई थी। इसके अलावा उन्होंने महिला पहलवानों के आंदोलन का भी जिक्र करते हुए कहा कि देश उन घटनाओं को भी नहीं भूला है। सरकार पर शिक्षा व्यवस्था कमजोर करने का आरोप कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार की नीतियों के कारण देश की शिक्षा व्यवस्था लगातार कमजोर हुई है। उन्होंने कहा कि बार-बार सामने आ रहे पेपर लीक, परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और छात्रों में बढ़ती निराशा जैसे मुद्दे गंभीर चिंता का विषय हैं। सोनिया गांधी ने कहा कि सरकार को छात्रों की आवाज दबाने के बजाय उनकी मांगों को गंभीरता से सुनना चाहिए। उनका कहना था कि यदि समय रहते शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार नहीं किए गए, तो इसका असर केवल छात्रों के भविष्य पर ही नहीं, बल्कि देश के विकास और भविष्य पर भी पड़ेगा। छात्रों के समर्थन की अपील अपने लेख के अंत में सोनिया गांधी ने सभी राजनीतिक दलों और समाज से छात्रों के साथ खड़े होने की अपील की। उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार और युवाओं के भविष्य की रक्षा के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। उनके मुताबिक, छात्रों की मांगों को लोकतांत्रिक तरीके से सुनना और उन पर कार्रवाई करना किसी भी जिम्मेदार सरकार का दायित्व होना चाहिए।
संसद के मानसून सत्र का आज (शुक्रवार, 24 जुलाई) पांचवां दिन है। पिछले चार दिनों तक विपक्ष के हंगामे की वजह से सदन की कार्यवाही बार-बार बाधित हुई। आज सरकार पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली में सुधार से जुड़ा एक अहम विधेयक पेश कर सकती है। हालांकि, सरकार की ओर से अभी तक प्रस्तावित बिल का पूरा विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया है। सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस इस विधेयक का अध्ययन करने के बाद सदन में चर्चा में हिस्सा ले सकती है। ऐसे में आज का दिन संसद की कार्यवाही के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पेपर लीक पर घमासान जारी नीट पेपर लीक मामले को लेकर देशभर में जारी छात्र आंदोलन और संसद के भीतर विपक्ष के विरोध के बीच सरकार और विपक्ष आमने-सामने हैं। विपक्ष लगातार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि वह इस मुद्दे पर चर्चा के लिए पूरी तरह तैयार है। सत्तापक्ष का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का भरोसा दे चुके हैं और सरकार परीक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए आवश्यक कदम उठा रही है। खरगे का पीएम मोदी पर निशाना कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने शुक्रवार सुबह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा। उन्होंने लिखा, "जब संसद चल रही होती है तो प्रधानमंत्री को संसद के पटल पर बयान देना होता है, देर रात वीडियो बनाकर संसद के बाहर एकतरफा 'मन की बात' नहीं करनी होती। पीएम मोदी, आज संसद में आने से पहले धर्मेंद्र प्रधान को बर्खास्त करके आइए।" खरगे का यह बयान प्रधानमंत्री मोदी के उस वीडियो संदेश के बाद आया, जिसमें उन्होंने पेपर लीक मामलों पर सख्त कानून और फास्ट ट्रैक कोर्ट की घोषणा की थी। निर्मला सीतारमण बोलीं- चर्चा के लिए सरकार तैयार गुरुवार को संसद परिसर में मीडिया से बातचीत के दौरान केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि नीट पेपर लीक का मामला देश के छात्रों और उनके भविष्य से जुड़ा है, इसलिए सरकार इसे बेहद गंभीरता से ले रही है। उन्होंने कहा कि पेपर लीक मामले में शामिल कई आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है और सरकार फास्ट ट्रैक कोर्ट के माध्यम से जल्द कार्रवाई सुनिश्चित करना चाहती है। सीतारमण ने कहा, "पेपर लीक के बाद तुरंत दोबारा परीक्षा कराई गई और परिणाम भी घोषित किए गए। अब छात्र आगे की पढ़ाई की तैयारी कर रहे हैं। यदि विपक्ष चर्चा चाहता है तो सरकार संसद में इस विषय पर चर्चा के लिए पूरी तरह तैयार है।" विपक्ष पर लगाया शर्तें बदलने का आरोप वित्त मंत्री ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि पहले उसने संसद में चर्चा की मांग की और जब सरकार ने सहमति दे दी, तब विपक्ष ने नई-नई शर्तें रखनी शुरू कर दीं। उन्होंने कहा कि सरकार हर मुद्दे पर चर्चा चाहती है, लेकिन संसद की कार्यवाही बाधित करने से किसी समस्या का समाधान नहीं होगा। आज के सत्र पर सबकी नजर मानसून सत्र के पांचवें दिन सभी की नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार पेपर लीक से जुड़ा प्रस्तावित विधेयक पेश करती है या नहीं। साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि विपक्ष चर्चा में शामिल होता है या शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर अपना विरोध जारी रखता है। पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था और छात्र आंदोलन के मुद्दे पर आज संसद में तीखी बहस होने के आसार हैं।
NEET पेपर लीक मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाने की घोषणा के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने सरकार के प्रस्ताव को अपर्याप्त बताते हुए अपनी मांगों पर कायम रहने का ऐलान किया है। CJP ने कहा कि उनकी प्राथमिक मांग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा है। साथ ही प्रधानमंत्री से छात्रों से सार्वजनिक माफी मांगने और शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार करने की भी मांग की गई है। प्रमुख बातें PM मोदी ने पेपर लीक मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाने का ऐलान किया। CJP ने कहा- "फास्ट-ट्रैक कोर्ट नहीं, धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा चाहिए।" संगठन ने प्रधानमंत्री से छात्रों से सार्वजनिक माफी मांगने की मांग की। जंतर-मंतर पर CJP का आंदोलन लगातार जारी। सरकार और CJP दोनों ने बातचीत की इच्छा जताई। PM के ऐलान पर CJP की प्रतिक्रिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सोशल मीडिया पोस्ट के तुरंत बाद CJP ने अपने आधिकारिक X हैंडल पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि केवल फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाने से छात्रों की मांगें पूरी नहीं होंगी। संगठन ने कहा कि सरकार को सबसे पहले केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेना चाहिए। CJP ने अपने पोस्ट में लिखा कि सरकार को भ्रष्ट परीक्षा व्यवस्था में सुधार करना चाहिए और छात्रों से सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए। "युवाओं की आवाज सुनी जाए" CJP ने अपने पोस्ट में कहा, "सबसे पहले युवाओं की मांग स्वीकार कीजिए। हमें धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा चाहिए। भ्रष्ट सिस्टम को सुधारा जाए और सभी छात्रों से माफी मांगी जाए। ये आपके देश के युवा हैं, जो अपने भविष्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं।" संगठन ने प्रधानमंत्री के पोस्ट को रिपोस्ट करते हुए धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग दोहराई। जंतर-मंतर पर जारी है प्रदर्शन NEET पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली में कथित अनियमितताओं के विरोध में CJP का धरना जंतर-मंतर पर लगातार जारी है। प्रदर्शनकारी शिक्षा व्यवस्था में सुधार, जवाबदेही तय करने और परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी बनाने की मांग कर रहे हैं। बातचीत के लिए तैयार दोनों पक्ष छात्र आंदोलन के बीच केंद्र सरकार ने बातचीत की इच्छा जताई है। वहीं CJP नेताओं अभिजीत दीपके और सौरभ दास ने भी कहा है कि वे वार्ता के लिए तैयार हैं। हालांकि, उनका कहना है कि सरकार का प्रतिनिधि जंतर-मंतर या किसी तटस्थ स्थान पर आकर बातचीत करे। सरकार की ओर से क्या कहा गया? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को कहा कि पेपर लीक के दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा और उन्हें जल्द सजा दिलाने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट स्थापित किए जाएंगे। इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी सोशल मीडिया पर छात्रों के हितों की रक्षा और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात दोहराई।
संसद के मानसून सत्र के चौथे दिन भी NEET पेपर लीक और छात्रों के मुद्दे पर लोकसभा और राज्यसभा में जोरदार हंगामा देखने को मिला। विपक्ष ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग दोहराते हुए सदन की कार्यवाही बाधित की। हंगामे के चलते दोनों सदनों की कार्यवाही कई बार स्थगित करनी पड़ी। खरगे की दो टूक: पहले इस्तीफा, फिर चर्चा राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि विपक्ष शुरू से ही NEET मामले पर चर्चा चाहता था, लेकिन सरकार ने पहले इस पर सहमति नहीं दी। उन्होंने आरोप लगाया कि छात्रों पर पुलिस कार्रवाई हुई और विपक्षी नेताओं का अपमान किया गया। खरगे ने स्पष्ट कहा कि जब तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा नहीं देते, तब तक विपक्ष किसी भी चर्चा में शामिल नहीं होगा। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि राज्यसभा परिसर में उन्हें रोकने की कोशिश की गई, जिसे उन्होंने लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ बताया। दोनों सदनों की कार्यवाही बार-बार स्थगित विपक्ष के लगातार हंगामे के कारण गुरुवार को भी संसद की कार्यवाही सुचारु रूप से नहीं चल सकी। राज्यसभा की कार्यवाही पहले 12 बजे और बाद में दोपहर 2 बजे तक स्थगित कर दी गई। लोकसभा की कार्यवाही भी लगातार नारेबाजी के कारण पहले 12 बजे और फिर 2 बजे तक के लिए स्थगित करनी पड़ी। पीएम मोदी और अमित शाह का संदेश देशभर में जारी छात्र आंदोलन के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि युवाओं का भविष्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है और पेपर लीक के दोषियों को जल्द सजा दिलाने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाए जाएंगे। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी प्रधानमंत्री के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि यह कदम शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा। रिजिजू का विपक्ष पर हमला संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा कि सरकार शुरू से ही NEET मामले पर चर्चा चाहती है, लेकिन विपक्ष नई-नई शर्तें रख रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार किसी भी विषय पर खुली चर्चा के पक्ष में है, लेकिन सदन की कार्यवाही शर्तों के आधार पर नहीं चल सकती। राहुल गांधी ने सरकार को घेरा लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर शिक्षा व्यवस्था को लेकर हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने शिक्षा प्रणाली को कमजोर होने दिया और छात्र लगातार परेशान हैं। राहुल गांधी ने कहा कि देश के युवाओं के भविष्य की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है और इस मुद्दे पर जवाबदेही तय होनी चाहिए। प्रियंका गांधी और महुआ मोइत्रा का विरोध प्रियंका गांधी वाड्रा ने संसद परिसर में विपक्ष के प्रदर्शन में हिस्सा लिया और सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। महुआ मोइत्रा ने दिल्ली मेट्रो स्टेशनों को बंद किए जाने पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार विपक्ष और छात्रों की आवाज दबाने की कोशिश कर रही है। सुरजेवाला ने नियम 267 के तहत दिया नोटिस कांग्रेस सांसद रणदीप सिंह सुरजेवाला ने राज्यसभा में नियम 267 के तहत नोटिस देकर NEET पेपर लीक, छात्रों पर पुलिस कार्रवाई और शिक्षा व्यवस्था में सुधार पर तत्काल चर्चा की मांग की। उनका कहना है कि यह मुद्दा लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़ा है और इसे प्राथमिकता के आधार पर सदन में उठाया जाना चाहिए।
पश्चिम बंगाल सरकार के मंत्री और भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने छात्र आंदोलन को लेकर विपक्ष और प्रदर्शनकारियों पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत को बांग्लादेश, पाकिस्तान और श्रीलंका जैसी स्थिति में धकेलने की कोशिश की जा रही है। साथ ही दावा किया कि प्रदर्शनकारियों के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ है। हालांकि, उन्होंने कहा कि ऐसी कोशिशें पहले भी नाकाम रही हैं और इस बार भी सफल नहीं होंगी। 'भारत को बांग्लादेश बनाने की कोशिश हो रही है' कोलकाता में मीडिया से बातचीत के दौरान दिलीप घोष ने कहा कि कुछ लोग भारत में वैसा ही माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जैसा पहले बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका में जन आंदोलनों के दौरान देखने को मिला था। उन्होंने दावा किया कि इन प्रयासों का उद्देश्य देश में अस्थिरता पैदा करना है, लेकिन ऐसी कोशिशें सफल नहीं होंगी। 'प्रदर्शनकारी विदेशी ताकतों की कठपुतली' दिलीप घोष ने आरोप लगाया कि आंदोलन में शामिल कुछ लोग विदेशी ताकतों के इशारे पर काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि शुरुआत में आंदोलन से जुड़े कई लोगों को भी अब एहसास हो गया है कि उन्हें केवल मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। उनके अनुसार, कुछ पेशेवर समूह माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। संसद सत्र को बताया आसान निशाना उन्होंने कहा कि संसद सत्र के दौरान विरोध प्रदर्शन करना इसलिए आसान होता है, क्योंकि उस समय बड़ी संख्या में मीडिया मौजूद रहती है। घोष के मुताबिक, प्रदर्शनकारी इसी का फायदा उठाकर राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं। 'मोदी सरकार सही समय पर फैसला लेगी' दिलीप घोष ने कहा कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और गृह मंत्री अमित शाह हालात पर नजर रखे हुए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार उचित समय पर उचित निर्णय लेगी। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यदि सरकार कोई कड़ा कदम उठाती है, तो विपक्ष उसे राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश करेगा। किसान आंदोलन का दिया उदाहरण दिलीप घोष ने अपने बयान में किसान आंदोलन का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जिस तरह पहले हुए आंदोलनों से विपक्ष को अपेक्षित परिणाम नहीं मिले, उसी तरह वर्तमान छात्र आंदोलन भी सफल नहीं होगा। उनके अनुसार, जनता का व्यापक समर्थन आंदोलन के साथ नहीं है और विपक्ष चुनाव में हारने के बाद ऐसे आंदोलनों के जरिए राजनीतिक माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है।
आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। जंतर-मंतर पहुंचे केजरीवाल ने कहा कि छात्रों के साथ हुई कार्रवाई गलत है और उनकी आवाज को दबाया नहीं जा सकता। केजरीवाल ने कहा, "मोदी जी के अपने बच्चे नहीं हैं, इसलिए वह बच्चों का दर्द नहीं समझते। ये सभी हमारे बच्चे हैं। बच्चों को पीटना सही नहीं है।" छात्रों से बोले- डटे रहो, जीत आपकी होगी जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों को संबोधित करते हुए केजरीवाल ने कहा कि उन्हें डरने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा, "मैं छात्रों से कहना चाहता हूं कि वे डटे रहें। दुनिया के सबसे बड़े तानाशाह को भी जनता के सामने झुकना पड़ता है।" शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग केजरीवाल ने कहा कि आम आदमी पार्टी की तीन प्रमुख मांगें हैं— केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें। देश में पारदर्शी और भरोसेमंद परीक्षा प्रणाली लागू हो। पेपर लीक की घटनाओं पर स्थायी रोक लगाई जाए। उन्होंने आरोप लगाया कि लगातार हो रहे पेपर लीक से लाखों छात्रों का भविष्य प्रभावित हो रहा है। हिरासत में लिए गए छात्रों के लिए कानूनी मदद की मांग केजरीवाल ने मंदिर मार्ग और संसद मार्ग थाने का दौरा करने के बाद कहा कि हिरासत में लिए गए छात्रों को लंबे समय से बैठाकर रखा गया है। उन्होंने नई दिल्ली के डीसीपी सचिन शर्मा को पत्र लिखकर मांग की कि प्रदर्शन से जुड़ी सभी एफआईआर की प्रतियां और हिरासत में लिए गए लोगों की सूची तुरंत सार्वजनिक की जाए, ताकि छात्रों को कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जा सके। AAP ने जारी किया हेल्पलाइन नंबर पुलिस कार्रवाई में घायल छात्रों को लेकर चिंता जताते हुए केजरीवाल ने कहा कि देश के भविष्य के साथ ऐसा व्यवहार स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस बीच आम आदमी पार्टी ने प्रदर्शन से प्रभावित छात्रों और उनके परिवारों की सहायता के लिए हेल्पलाइन नंबर भी जारी किया है। पार्टी का कहना है कि इसके जरिए लापता छात्रों का पता लगाने और घायलों तक चिकित्सीय सहायता पहुंचाने में मदद की जाएगी। छात्रों के मुद्दे पर तेज हुई सियासत छात्रों के विरोध प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई के बाद राजधानी दिल्ली में राजनीतिक माहौल गरमा गया है। विपक्ष लगातार केंद्र सरकार पर छात्रों की आवाज दबाने का आरोप लगा रहा है, जबकि सरकार और पुलिस का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कार्रवाई की गई।
NEET पेपर लीक और छात्रों पर कथित पुलिस कार्रवाई को लेकर शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन अब बड़ा राजनीतिक विवाद बन गया है। कांग्रेस के प्रदर्शन और प्रधानमंत्री आवास के पास धरने के बाद केंद्र सरकार और विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं। एक ओर केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने राहुल गांधी पर वादा तोड़ने का आरोप लगाया, वहीं कांग्रेस ने सरकार पर छात्रों की आवाज दबाने और संसद में चर्चा से बचने का आरोप लगाया है। जितेंद्र सिंह ने क्या कहा? केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने दावा किया कि राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और प्रियंका गांधी वाड्रा के साथ धरने पर बैठे थे। उन्होंने कहा कि सरकार ने बातचीत के लिए उन्हें और गृह सचिव गोविंद मोहन को भेजा था। जितेंद्र सिंह के मुताबिक, सरकार ने राहुल गांधी से अनुरोध किया कि निर्धारित स्थान के अलावा कहीं और धरना देने से आम लोगों को परेशानी हो रही है। सरकार का दावा- चर्चा की मांग मान ली थी केंद्रीय मंत्री ने कहा कि राहुल गांधी ने पहले शर्त रखी थी कि यदि सरकार NEET पेपर लीक और छात्रों के मुद्दे पर संसद में चर्चा कराने के लिए तैयार हो जाए, तो वह धरना समाप्त कर देंगे। सरकार का दावा है कि इस मांग को तत्काल स्वीकार कर लिया गया और संसद में चर्चा के लिए सहमति भी दे दी गई। 'फिर बदल दी मांग' जितेंद्र सिंह का आरोप है कि सरकार की सहमति मिलने के बाद राहुल गांधी ने अपनी मांग बदल दी और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की नई शर्त जोड़ दी। उन्होंने कहा कि सरकार ने राहुल गांधी को याद दिलाया कि पहले केवल चर्चा की मांग की गई थी, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी मांग बदल दी। मंत्री ने इसे लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ बताया। राहुल गांधी का पलटवार लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने केंद्र सरकार पर छात्रों की आवाज दबाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि छात्रों पर की गई कार्रवाई हर भारतीय परिवार पर हमला है। राहुल गांधी ने लोगों से कांग्रेस के आंदोलन का समर्थन करने की अपील करते हुए कहा कि छात्रों को न्याय मिलने तक उनकी लड़ाई जारी रहेगी। कांग्रेस का आरोप कांग्रेस का कहना है कि सरकार संसद में NEET पेपर लीक और छात्रों के मुद्दे पर चर्चा से बच रही है। पार्टी नेताओं के मुताबिक, पिछले कई सप्ताह से शिक्षा मंत्री के इस्तीफे और संसद में चर्चा की मांग की जा रही थी, लेकिन जब सदन में बहस का मौका नहीं मिला तो विपक्ष को सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करना पड़ा। संसद से सड़क तक पहुंचा विवाद NEET पेपर लीक और छात्रों के विरोध प्रदर्शन का मुद्दा अब संसद से लेकर सड़क तक राजनीतिक टकराव का केंद्र बन गया है। सरकार और विपक्ष दोनों एक-दूसरे पर लोकतांत्रिक मूल्यों के उल्लंघन का आरोप लगा रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह राजनीतिक बहस का प्रमुख विषय बना रह सकता है।
CJP Protest Jantar Mantar: दिल्ली के जंतर-मंतर से संसद मार्च के दौरान सोमवार को हुए हंगामे के बाद कई ऐसी तस्वीरें और वीडियो सामने आए, जिन्होंने पूरे घटनाक्रम की मानवीय तस्वीर को उजागर किया। कहीं सड़क पर बिखरी चप्पलें दिखीं, कहीं घायल और रोते हुए छात्र-छात्राएं नजर आए, तो कहीं भीड़ के बीच एक प्रदर्शनकारी बेहोश पड़ा दिखाई दिया। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में कई प्रदर्शनकारियों ने पुलिस कार्रवाई के दौरान अपने अनुभव साझा किए और लाठीचार्ज के आरोप लगाए। 'सबसे आगे था, अचानक लाठीचार्ज शुरू हो गया' सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में 16 वर्षीय एक प्रदर्शनकारी दावा करता है कि वह मार्च के दौरान सबसे आगे चल रहा था, तभी अचानक पुलिस ने लाठीचार्ज शुरू कर दिया। छात्र का कहना है कि उसे बुरी तरह पीटा गया और वह समझ नहीं पा रहा कि उसकी गलती क्या थी। एक अन्य वीडियो में एक युवक अचेत अवस्था में दिखाई देता है, जिसके आसपास मौजूद लोग उसे संभालने और प्राथमिक उपचार देने की कोशिश करते नजर आते हैं। रोती छात्रा ने सुनाई आपबीती एक अन्य वीडियो में एक छात्रा भावुक होकर बताती है कि वह सुबह से प्रदर्शन में शामिल थी। उसके अनुसार, पुलिस कार्रवाई शुरू होने के बाद वह वहां से निकलने की कोशिश कर रही थी, लेकिन इसी दौरान लाठीचार्ज हुआ और कई छात्रों को चोटें आईं। वीडियो में छात्रा रोते हुए पूरे घटनाक्रम का जिक्र करती दिखाई देती है। बिखरी चप्पलें बनीं अफरातफरी की गवाह प्रदर्शन के बाद सड़क पर बड़ी संख्या में चप्पलें और अन्य सामान बिखरा दिखाई दिया। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि वे किन लोगों की थीं, लेकिन ये तस्वीरें प्रदर्शन के दौरान मची भगदड़ और अव्यवस्था की कहानी बयां करती नजर आईं। कई सोशल मीडिया यूजर्स ने इन तस्वीरों को आंदोलन की सबसे मार्मिक तस्वीरों में से एक बताया। पुलिसकर्मी की पत्नी भी पहुंची प्रदर्शन में वायरल वीडियो में एक महिला ने बताया कि उनके पति दिल्ली पुलिस में कार्यरत हैं, लेकिन वह अपने बेटे के भविष्य और शिक्षा व्यवस्था को लेकर चिंतित हैं। इसी वजह से वह प्रदर्शन में शामिल होने पहुंचीं। उनका बयान सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से साझा किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर सामने आए कई दावे सोमवार की घटनाओं के बाद सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में वीडियो और पोस्ट साझा किए गए, जिनमें प्रदर्शनकारियों ने चोट लगने, पुलिस कार्रवाई और आंदोलन के दौरान हुई अफरातफरी के अपने-अपने अनुभव बताए। इन वीडियो में छात्रों की चिंता, अभिभावकों की भावनाएं और आंदोलन के दौरान की अव्यवस्था साफ दिखाई देती है। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई थी झड़प सोमवार को हजारों प्रदर्शनकारी कथित परीक्षा अनियमितताओं पर जवाबदेही तय करने और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर संसद की ओर मार्च कर रहे थे। संसद मार्ग के पास पुलिस ने उन्हें रोक दिया, जिसके बाद दोनों पक्षों के बीच झड़प हुई। स्थिति बिगड़ने पर पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज किया।
CJP Protest Updates: दिल्ली में CJP के संसद मार्च के बाद जारी विरोध प्रदर्शन के बीच मंगलवार सुबह जंतर-मंतर पर एक बार फिर हलचल तेज हो गई। CJP प्रमुख अभिजीत दीपके सुबह-सुबह धरना स्थल पहुंचे और सोशल मीडिया पर अपने समर्थकों, खासकर घायल छात्राओं से माफी मांगी। वहीं, आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने घायल छात्रों से मिलने राम मनोहर लोहिया (RML) अस्पताल जाने और सुबह 11 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस करने का ऐलान किया। इस बीच सोनम वांगचुक ने कहा कि छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई को देखते हुए वह अपना अनशन नहीं तोड़ेंगे। अभिजीत दीपके ने समर्थकों से मांगी माफी CJP प्रमुख अभिजीत दीपके ने एक्स पर पोस्ट कर कहा कि वह उन सभी समर्थकों से माफी मांगते हैं, जो प्रदर्शन के दौरान घायल हुए, विशेषकर उन छात्राओं से जिनके साथ कथित तौर पर पुलिस ने मारपीट की। उन्होंने लिखा कि, "हम और बेहतर कर सकते थे। दिल्ली पुलिस की कार्रवाई से आपको बचाने के लिए मैं और अधिक प्रयास कर सकता था।" उन्होंने घायल प्रदर्शनकारियों से व्यक्तिगत रूप से संपर्क करने की भी अपील की। केजरीवाल करेंगे प्रेस कॉन्फ्रेंस, फिर जाएंगे RML अस्पताल आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने कहा कि वह सुबह 11 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस कर छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई के खिलाफ अपनी बात रखेंगे। इसके बाद वह संसद मार्च के दौरान घायल हुए छात्रों से मिलने राम मनोहर लोहिया अस्पताल जाएंगे। मनीष तिवारी ने छात्रों के आंदोलन का किया समर्थन कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने प्रदर्शन कर रहे छात्रों के समर्थन में सोशल मीडिया पर एक शेर साझा किया। उन्होंने लिखा— "संघर्षों के साए में, असली आज़ादी पलती है, इतिहास उधर मुड़ जाता है, जिस ओर जवानी चलती है।" इसके साथ उन्होंने लिखा कि आंदोलित छात्र ही मजबूत राष्ट्र की पहचान हैं। संजय राउत बोले- 20 जुलाई लोकतंत्र के लिए काला दिन शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत ने दिल्ली पुलिस की कार्रवाई की आलोचना करते हुए कहा कि छात्रों पर लाठीचार्ज लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि सरकार जवाबदेही तय करने के बजाय दमन का रास्ता अपना रही है और 20 जुलाई को भारतीय लोकतंत्र के लिए "काला दिवस" के रूप में याद रखा जाएगा। कैसी है सोनम वांगचुक की तबीयत? डॉक्टरों के अनुसार सोनम वांगचुक की हालत फिलहाल स्थिर है, लेकिन वह अभी भी मेडिकल निगरानी में हैं। उनका ब्लड शुगर सामान्य से कम है और शरीर में पोटैशियम का स्तर 3.2 mEq/L दर्ज किया गया है। जांच में एनीमिया और सफेद रक्त कोशिकाओं की संख्या भी कम पाई गई है। डॉक्टरों ने IV फ्लूइड और ग्लूकोज लेने की सलाह दी है, लेकिन वांगचुक ने इसे लेने से इनकार कर दिया है। फिलहाल वह ORS और पोटैशियम की दवा ले रहे हैं। CJP का दावा- गीतांजलि के साथ हुई बदसलूकी CJP के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने आरोप लगाया कि संसद मार्च के दौरान सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि के साथ पुलिस ने बदसलूकी की। उनका दावा है कि उन्हें बाल पकड़कर वाहन से बाहर खींचा गया और प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया गया। हालांकि, दिल्ली पुलिस पहले ही ऐसे आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि पुलिस ने किसी महिला प्रदर्शनकारी के साथ दुर्व्यवहार नहीं किया और लोगों से भ्रामक जानकारी न फैलाने की अपील की है। अनशन जारी रखने पर अड़े सोनम वांगचुक सोनम वांगचुक ने कहा कि छात्रों और युवाओं पर हुई पुलिस कार्रवाई बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उनका कहना है कि जब तक उनकी प्रमुख मांगों पर सकारात्मक पहल नहीं होती, तब तक वह अपना अनिश्चितकालीन अनशन समाप्त नहीं करेंगे। इससे जंतर-मंतर पर जारी आंदोलन के और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।