West Bengal सरकार ने राज्य की OBC आरक्षण व्यवस्था में बड़ा बदलाव करते हुए आरक्षण को 17% से घटाकर 7% कर दिया है। नई सूची के अनुसार अब केवल 66 जातियां ही OBC आरक्षण के दायरे में रहेंगी। इसके साथ ही धर्म आधारित वर्गीकरण की व्यवस्था भी समाप्त कर दी गई है। राज्य सरकार का कहना है कि यह फैसला Calcutta High Court के 2024 के आदेश के आधार पर लिया गया है। हाईकोर्ट ने 2010 से 2012 के बीच OBC सूची में 77 अतिरिक्त जातियों को शामिल करने की प्रक्रिया को अवैध और असंवैधानिक बताया था। हालांकि, 2010 से पहले OBC सूची में शामिल जातियों का दर्जा बरकरार रहेगा। साथ ही, पहले से OBC कोटे के तहत नौकरी पा चुके लोगों की नियुक्तियों पर भी इस फैसले का कोई असर नहीं पड़ेगा। ममता सरकार की OBC-A और OBC-B व्यवस्था खत्म Mamata Banerjee सरकार ने पहले OBC आरक्षण को दो वर्गों में बांटा था। OBC-A को 10% और OBC-B को 7% आरक्षण दिया जा रहा था। इसी दौरान कई नई जातियों को भी सूची में शामिल किया गया था। इसी व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट ने 2024 में फैसला सुनाया था। कोर्ट के आदेश के बाद 2010 के बाद जारी करीब 12 लाख OBC प्रमाणपत्र रद्द हो गए थे। नई सूची में किन जातियों को मिला स्थान नई OBC सूची में कपाली, कुर्मी, सुध्राधार, कर्मकार, सूत्रधार, स्वर्णकार, नाई, तांती, धनुक, कसाई, खंडायत, तुरहा, देवांग और गोआला जैसी जातियां शामिल हैं। वहीं पहाड़िया, हज्जाम और चौधुली जैसे तीन मुस्लिम समुदायों को भी सूची में रखा गया है। राज्य मंत्री Agnimitra Paul ने कैबिनेट बैठक के बाद कहा कि सरकार OBC ढांचे की नई समीक्षा करेगी। इसके लिए जांच समिति बनाई जाएगी और जरूरत पड़ने पर कानूनी प्रक्रिया के तहत कुछ समूहों को दोबारा सूची में शामिल किया जा सकता है। बंगाल कैबिनेट के 7 बड़े फैसले सरकारी नौकरियों में उम्र सीमा 5 साल बढ़ी राज्य कैबिनेट ने सरकारी नौकरियों के लिए अधिकतम आयु सीमा 5 साल बढ़ाने का फैसला किया है। अब ग्रुप-A पदों के लिए उम्र सीमा 41 साल, ग्रुप-B के लिए 44 साल और ग्रुप C-D के लिए 45 साल होगी। यह नियम 11 मई से लागू होगा। भ्रष्टाचार जांच के लिए रिटायर्ड जज की कमेटी सरकार ने संस्थागत भ्रष्टाचार की जांच के लिए Justice Bishwajit Basu की अध्यक्षता में जांच पैनल बनाने को मंजूरी दी है। यह कमेटी सरकारी योजनाओं, निर्माण कार्यों और सेवा वितरण में कथित घोटालों की जांच करेगी। महिलाओं और बच्चियों पर अत्याचार की जांच महिलाओं, बच्चियों, SC-ST और अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े मामलों की जांच के लिए Justice Samapti Chatterjee की अध्यक्षता में दूसरी कमेटी बनाई जाएगी। शिकायत दर्ज कराने के लिए पोर्टल, ईमेल और व्हाट्सऐप सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। धार्मिक आधार पर मिलने वाला मानदेय बंद राज्य सरकार ने 1 जून से इमाम, मुअज्जिन और पुजारियों को दिए जाने वाले सरकारी मानदेय को बंद करने का फैसला लिया है। अभी तक इमामों को 3000 रुपए और मुअज्जिन तथा पुजारियों को 2000 रुपए मासिक सहायता दी जाती थी। महिलाओं को हर महीने 3000 रुपए कैबिनेट ने ‘अन्नपूर्णा योजना’ को मंजूरी दी है। इसके तहत महिलाओं को हर महीने 3000 रुपए की आर्थिक सहायता दी जाएगी। योजना का लाभ सीधे बैंक खातों में भेजा जाएगा। महिलाओं के लिए सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा 1 जून से महिलाओं को सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा मिलेगी। हालांकि सरकार ने फिलहाल बसों की संख्या बढ़ाने की कोई घोषणा नहीं की है। 7वें वेतन आयोग को मंजूरी राज्य सरकार ने कर्मचारियों के वेतन संशोधन के लिए 7वें राज्य वेतन आयोग के गठन को मंजूरी दे दी है। इसका लाभ सरकारी कर्मचारियों के साथ नगर निकायों और सरकारी शिक्षण संस्थानों के कर्मचारियों को भी मिलेगा।
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के राजाबाजार इलाके में सड़क पर नमाज पढ़ने को लेकर हुए विवाद पर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। अब Waris Pathan ने इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि अगर कोई मुसलमान कुछ मिनटों के लिए सड़क पर नमाज पढ़ता है, तो इससे लोगों को परेशानी क्यों होती है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने कहा कि मुसलमान मजबूरी में सार्वजनिक स्थानों पर नमाज अदा करते हैं, शौक से नहीं। ‘5-10 मिनट की नमाज से किसे दिक्कत?’ न्यूज एजेंसी IANS से बातचीत में वारिस पठान ने कहा, “अगर कोई मुसलमान शुक्रवार के दिन 5-10 मिनट के लिए सड़क पर खड़े होकर नमाज पढ़ता है, तो इससे किसके पेट में दर्द होता है? मस्जिदों में जगह नहीं होती, इसलिए लोग बाहर आकर नमाज पढ़ लेते हैं।” उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति धूप, बारिश या सड़क पर खड़े होकर नमाज पढ़ना पसंद नहीं करता, लेकिन कई बार जगह की कमी के कारण ऐसा करना पड़ता है। ‘हिंदू धार्मिक कार्यक्रमों पर सवाल नहीं उठते’ वारिस पठान ने दावा किया कि सार्वजनिक स्थानों पर अन्य धर्मों के आयोजन भी होते हैं, लेकिन उन पर वैसी आपत्ति नहीं उठाई जाती। उन्होंने कहा, “हमने कई बार देखा है कि ट्रेनों में पूजा-पाठ होता है, गरबा होता है, एयरपोर्ट पर धार्मिक आयोजन होते हैं, लेकिन मुसलमान नमाज पढ़ लें तो FIR दर्ज हो जाती है, लोगों को जेल भेज दिया जाता है। यह संविधान की बराबरी की भावना के खिलाफ है।” क्या है पूरा मामला? दरअसल, शुक्रवार को कोलकाता के राजाबाजार इलाके में कुछ लोगों ने सड़क पर नमाज अदा करने की कोशिश की थी। इसके बाद इलाके में तनाव की स्थिति बन गई और यातायात भी प्रभावित हुआ। राज्य में नई सरकार बनने के बाद सार्वजनिक सड़कों पर धार्मिक आयोजन और सड़क जाम को लेकर सख्त रुख अपनाया गया है। प्रशासन का कहना है कि बिना अनुमति सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी धार्मिक गतिविधि की इजाजत नहीं दी जाएगी। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव घटना के बाद इलाके में भारी पुलिस बल तैनात किया गया। कुछ जगहों पर प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच बहस और धक्का-मुक्की की खबरें भी सामने आईं। हालांकि, अतिरिक्त पुलिस और केंद्रीय बलों की तैनाती के बाद स्थिति को नियंत्रण में कर लिया गया। राजनीतिक बयानबाजी तेज इस मुद्दे पर अब राजनीतिक दल आमने-सामने आ गए हैं। AIMIM ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता और समान अधिकारों का मुद्दा बताया है, जबकि प्रशासन का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है। मामले को लेकर सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में बहस लगातार तेज हो रही है।
मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला परिसर को लेकर हाईकोर्ट के फैसले पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं लगातार सामने आ रही हैं। Asaduddin Owaisi ने इस फैसले की आलोचना करते हुए इसकी तुलना बाबरी मस्जिद-राम मंदिर विवाद से की है। उन्होंने कहा कि यह फैसला भारत के संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है और इससे भविष्य में नए धार्मिक विवाद पैदा हो सकते हैं। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने 15 मई को भोजशाला परिसर को हिंदू मंदिर मानते हुए हिंदू पक्ष को पूजा का अधिकार दिया था। अदालत ने परिसर को राजा भोज से जुड़ा स्थल भी माना है। ‘एक धर्म को प्राथमिकता दी गई’ हैदराबाद में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ओवैसी ने कहा कि भोजशाला पर आया फैसला बाबरी मस्जिद मामले में दिए गए निर्णय की तरह दिखाई देता है। उन्होंने कहा, “यह फैसला संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है। बाबरी मस्जिद-राम मंदिर विवाद में भी एक धर्म को प्राथमिकता दी गई थी, जबकि दूसरे समुदाय के पूजा के अधिकार कमजोर कर दिए गए थे।” ओवैसी ने आगे कहा कि ऐसे फैसलों से भविष्य में किसी भी धार्मिक स्थल की पवित्रता को चुनौती देने का रास्ता खुल सकता है। प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट का किया जिक्र ओवैसी ने न्यायपालिका के रुख पर सवाल उठाते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट को संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) से जोड़ चुका है, लेकिन अब उसी सिद्धांत को नजरअंदाज किया जा रहा है। उन्होंने कहा, “प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट का मजाक बना दिया गया है।” ‘बाबरी मस्जिद केस जैसा साबित हुआ फैसला’ ओवैसी ने कहा कि उन्होंने पहले ही चेतावनी दी थी कि बाबरी मस्जिद-राम मंदिर मामले का फैसला भविष्य में ऐसे कई विवादों का आधार बन सकता है। उन्होंने कहा, “मैंने पहले भी कहा था कि बाबरी मस्जिद पर फैसला केवल आस्था के आधार पर दिया गया था। उस समय मैंने कहा था कि इससे आगे कई विवाद खड़े होंगे और आज वही हो रहा है।” उन्होंने यह भी दावा किया कि भोजशाला मामले में मुस्लिम पक्ष लंबे समय से वहां नमाज अदा करता रहा है। मुस्लिम पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट जाने के दिए संकेत इस बीच Khalid Rashid Firangi Mahli ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले से मुस्लिम समुदाय में निराशा जरूर है, लेकिन कानूनी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम पक्ष के पास ऐतिहासिक दस्तावेज और सबूत मौजूद हैं और उन्हें सुप्रीम कोर्ट से न्याय मिलने की उम्मीद है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भोजशाला विवाद को बाबरी मस्जिद मामले से अलग तरीके से देखा जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने हिंदू पक्ष को दिया पूजा का अधिकार मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने अपने फैसले में हिंदू पक्ष को पूजा-अर्चना का अधिकार दिया है। अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के 2003 के उस आदेश को भी आंशिक रूप से निरस्त कर दिया, जिसमें मुस्लिम पक्ष को नमाज की अनुमति दी गई थी। हिंदू पक्ष के वकील Vishnu Shankar Jain ने फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि अब परिसर में केवल हिंदू पूजा होगी और स्थल के प्रबंधन की जिम्मेदारी सरकार के पास रहेगी। क्या है भोजशाला विवाद? धार स्थित भोजशाला परिसर को हिंदू पक्ष मां सरस्वती का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता है। वर्षों से यह मामला अदालत में लंबित था।
केंद्रीय मंत्री Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष Rahul Gandhi की विदेश यात्राओं को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी बिना पूर्व सूचना दिए विदेश यात्रा करते हैं, जबकि नियमों के तहत सांसदों को अपनी यात्रा की जानकारी पहले देना अनिवार्य है। ‘तीन हफ्ते पहले सूचना देना जरूरी’ किरेन रिजिजू ने शुक्रवार को मीडिया से बातचीत में कहा कि किसी भी सांसद को विदेश यात्रा से कम से कम तीन सप्ताह पहले लोकसभा और राज्यसभा सचिवालय को इसकी सूचना देनी होती है। उन्होंने कहा, “यह अनुमति लेने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि सूचना देने का नियम है। सांसद विदेश यात्रा कर सकते हैं, लेकिन उन्हें निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना चाहिए।” राहुल गांधी की यात्राओं पर उठाए सवाल रिजिजू ने दावा किया कि राहुल गांधी 2004 से सांसद हैं और अब तक उनकी 54 विदेश यात्राएं दर्ज की गई हैं। उन्होंने कहा कि केवल यात्राओं की संख्या ही नहीं, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि वह विदेश में कितने दिन रहे और उन यात्राओं पर कितना खर्च हुआ। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि अगर कोई सांसद विदेश में किसी संस्था या संगठन की ओर से आतिथ्य स्वीकार करता है, तो वह मामला Foreign Contribution Regulation Act यानी FCRA के दायरे में आता है और इसकी जानकारी गृह मंत्रालय को देना जरूरी होता है। ‘कांग्रेस नियमों का पालन करे’ किरेन रिजिजू ने कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी से नियमों का पालन करने की अपील करते हुए कहा कि विदेश यात्रा से पहले लोकसभा अध्यक्ष और संबंधित एजेंसियों को आवश्यक जानकारी दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा, “राहुल गांधी को स्पष्ट करना चाहिए कि उन्होंने इतनी विदेश यात्राएं क्यों कीं, किसने उन्हें आमंत्रित किया और विदेश में उनके खर्च का वहन किसने किया।” ‘कानून सबके लिए समान’ केंद्रीय मंत्री ने कहा कि यात्रा करना किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता है, लेकिन सभी नागरिकों और खासकर सांसदों को देश के कानूनों का पालन करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि अगर किसी मामले में जांच या कार्रवाई होती है, तो इसे किसी व्यक्ति विशेष को निशाना बनाना नहीं माना जाना चाहिए। “कानून सबके लिए बराबर है,” रिजिजू ने कहा।
पटना की विशेष अदालत में पेश हुए राजद नेता Tejashwi Yadav ने गुरुवार को कोरोना काल में दर्ज नियम उल्लंघन मामले में पटना स्थित MP-MLA कोर्ट में आत्मसमर्पण किया। अदालत में पेश होने के बाद उन्होंने जमानत की अर्जी दाखिल की, जिस पर सुनवाई करते हुए विशेष न्यायाधीश प्रवीण कुमार मालवीय की अदालत ने उन्हें जमानत दे दी। यह मामला कोरोना महामारी के दौरान लागू सरकारी दिशा-निर्देशों और प्रतिबंधों के उल्लंघन से जुड़ा बताया जा रहा है। अदालत में सरेंडर के बाद कानूनी प्रक्रिया पूरी की गई और फिर राहत देते हुए उन्हें बेल प्रदान कर दी गई। कोरोना काल में दर्ज हुआ था मामला जानकारी के अनुसार, कोरोना संक्रमण के दौरान लागू प्रतिबंधों और प्रशासनिक आदेशों का पालन नहीं करने को लेकर यह केस दर्ज किया गया था। मामले में अदालत की ओर से पूर्व में भी कार्रवाई की प्रक्रिया जारी थी। गुरुवार को अदालत में पेश होकर तेजस्वी यादव ने न्यायालय के समक्ष आत्मसमर्पण किया। इसके बाद उनके वकीलों की ओर से जमानत याचिका दायर की गई, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज राजद नेता के अदालत पहुंचने के बाद बिहार की राजनीतिक गलियारों में इस मामले को लेकर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि अदालत से जमानत मिलने के बाद फिलहाल उन्हें बड़ी राहत मिल गई है।
चुनाव परिणाम के बाद खत्म हुई मुख्यमंत्री पद की चर्चा कांग्रेस पार्टी ने गुरुवार को बड़ा राजनीतिक फैसला लेते हुए V. D. Satheesan को केरल का नया मुख्यमंत्री घोषित कर दिया। पार्टी की ओर से प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनके नाम का औपचारिक ऐलान किया गया। 4 मई को विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से ही मुख्यमंत्री पद को लेकर लगातार चर्चाएं चल रही थीं। कई नेताओं के नाम सामने आ रहे थे, लेकिन अब कांग्रेस नेतृत्व ने अंतिम फैसला लेते हुए वीडी सतीशन के नाम पर मुहर लगा दी है। कांग्रेस नेतृत्व ने लिया अंतिम निर्णय पार्टी सूत्रों के अनुसार, पिछले कुछ दिनों से कांग्रेस आलाकमान और वरिष्ठ नेताओं के बीच लगातार बैठकों का दौर चल रहा था। राज्य में नई सरकार के गठन और नेतृत्व को लेकर मंथन किया जा रहा था। गुरुवार को हुई प्रेस वार्ता में इस सस्पेंस को खत्म कर दिया गया। वीडी सतीशन को पार्टी के अनुभवी और प्रभावशाली नेताओं में गिना जाता है। संगठन और विधानसभा में उनकी सक्रिय भूमिका को देखते हुए कांग्रेस ने उन पर भरोसा जताया है। नई सरकार से बढ़ी राजनीतिक उम्मीदें केरल में नई सरकार के गठन के साथ अब लोगों की नजरें मंत्रिमंडल और आने वाले फैसलों पर टिकी हैं। कांग्रेस को उम्मीद है कि वीडी सतीशन के नेतृत्व में राज्य में विकास और प्रशासन को नई दिशा मिलेगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस ने युवा और सक्रिय नेतृत्व को आगे बढ़ाने का संदेश देने की कोशिश की है।
चेन्नई, 4 मई: तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के साथ यह बड़ा सवाल सामने है कि क्या राज्य में एक बार फिर द्रविड़ पहचान वाली पार्टियों का वर्चस्व कायम रहेगा या इस बार ‘राष्ट्रीय पहचान’ की राजनीति अपनी जगह बना पाएगी। दशकों से DMK और AIADMK के इर्द-गिर्द घूमने वाली तमिलनाडु की राजनीति इस बार नए मोड़ पर खड़ी दिख रही है। 1967 से द्रविड़ दलों का दबदबा तमिलनाडु में 1967 के बाद से द्रविड़ विचारधारा से निकली पार्टियों का ही शासन रहा है। DMK और AIADMK के बीच सत्ता का परिवर्तन होता रहा है, जिसे राज्य की “बायपोलर पॉलिटिक्स” कहा जाता है। 234 सीटों वाले विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 118 है। फिलहाल M. K. Stalin के नेतृत्व में DMK की सरकार है, जिसके पास मजबूत ओबीसी वोट बैंक और द्रविड़ पहचान का समर्थन है। AIADMK की चुनौती और कमजोर नेतृत्व AIADMK, जो कभी J. Jayalalithaa के नेतृत्व में मजबूत थी, अब नेतृत्व संकट से जूझती नजर आती है। भाजपा के साथ गठबंधन में होने के बावजूद पार्टी का संगठन पहले जैसा प्रभावशाली नहीं रहा। BJP का ‘नेशनल नैरेटिव’ इस बार Bharatiya Janata Party (BJP) ने तमिलनाडु में अपनी जमीन मजबूत करने के लिए “द्रविड़ बनाम राष्ट्रीय पहचान” का नैरेटिव पेश किया है। पार्टी हिंदुत्व और विकास मॉडल को आगे रख रही है प्रधानमंत्री Narendra Modi और गृहमंत्री Amit Shah ने कई रैलियां कीं लक्ष्य: राज्य में वोट शेयर को 10% से बढ़ाकर 15% तक ले जाना हालांकि, तमिलनाडु में BJP की स्वीकार्यता अभी सीमित रही है, लेकिन इस बार पार्टी DMK के खिलाफ सीधी चुनौती देने की कोशिश में दिख रही है। ‘विजय फैक्टर’ से बदला समीकरण इस चुनाव का सबसे बड़ा ट्विस्ट है अभिनेता से नेता बने Vijay की एंट्री। उनकी पार्टी Tamilaga Vettri Kazhagam (TVK) ने पहली बार चुनाव लड़ते हुए ही राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं। विजय ने आम लोगों के मुद्दों को उठाया युवा और शहरी वोटर्स में मजबूत पकड़ बड़ा फैन बेस, जो वोट में तब्दील होता दिख रहा है राजनीतिक इतिहास में M. G. Ramachandran और J. Jayalalithaa जैसे उदाहरण रहे हैं, जिन्होंने फिल्मी दुनिया से राजनीति में आकर सफलता हासिल की। ऐसे में विजय को भी संभावित ‘गेमचेंजर’ माना जा रहा है। क्या टूटेगा द्रविड़ वर्चस्व? एग्जिट पोल और शुरुआती रुझान संकेत दे रहे हैं कि इस बार मुकाबला पारंपरिक नहीं रहा। DMK अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश में AIADMK अस्तित्व की लड़ाई में BJP नैरेटिव बदलने की कोशिश में TVK नए विकल्प के रूप में उभर रही
चेन्नई/पुडुचेरी, 4 मई: तमिलनाडु और पुडुचेरी विधानसभा चुनावों की मतगणना सोमवार सुबह 8 बजे कड़ी सुरक्षा के बीच शुरू हुई। शुरुआती रुझानों में तमिलनाडु में त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिल रहा है, जहां एक तरफ DMK, दूसरी ओर AIADMK और तीसरी ओर अभिनेता Vijay की पार्टी TVK ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। तमिलनाडु में शुरुआती रुझान 234 सीटों वाले तमिलनाडु विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 118 है। शुरुआती रुझानों में: AIADMK करीब 20 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है TVK लगभग 18 सीटों पर आगे चल रही है DMK को 9 सीटों पर बढ़त मिलती दिख रही है हालांकि शुरुआती चरण में आए अन्य रुझानों में तस्वीर बदलती भी नजर आई, जहां कभी DMK तो कभी AIADMK बढ़त बनाते दिखे। इससे साफ है कि मुकाबला बेहद करीबी है और अंतिम नतीजों तक स्थिति में बड़ा बदलाव संभव है। विजय की पार्टी का प्रभाव पहली बार चुनाव मैदान में उतरी TVK ने शुरुआती रुझानों में ही मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। Vijay की लोकप्रियता का असर वोटिंग पैटर्न में साफ नजर आ रहा है, जिससे पारंपरिक दलों की गणित प्रभावित हो सकती है। पुडुचेरी में NDA को बढ़त 30 सीटों वाले पुडुचेरी विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 16 है। शुरुआती रुझानों में: AINRC को 2 सीटों पर बढ़त कांग्रेस 1 सीट पर आगे NDA गठबंधन कुल मिलाकर बढ़त की स्थिति में यहां पहले से NDA समर्थित सरकार है और रुझान उसी की वापसी के संकेत दे रहे हैं। वोटिंग और मतगणना की अहम जानकारी तमिलनाडु में 23 अप्रैल को मतदान हुआ, जिसमें 85.10% वोटिंग दर्ज हुई कुल 4.87 करोड़ मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया पुडुचेरी में 9 अप्रैल को मतदान हुआ और 89.87% मतदान दर्ज किया गया राज्य के 62 काउंटिंग सेंटरों और पुडुचेरी के 6 केंद्रों पर मतगणना जारी है क्या कहते हैं राजनीतिक संकेत? DMK नेताओं का दावा है कि पार्टी स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाएगी, जबकि AIADMK और NDA भी जीत को लेकर आश्वस्त हैं। TVK की एंट्री ने चुनाव को त्रिकोणीय बना दिया है, जिससे किसी भी दल के लिए स्पष्ट बहुमत हासिल करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष Nitin Nabin ने अपने पहले टीवी इंटरव्यू में विपक्ष पर जोरदार हमला बोला है। एबीपी न्यूज को दिए इस एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में उन्होंने समाजवादी पार्टी के प्रमुख Akhilesh Yadav, कांग्रेस नेता Rahul Gandhi और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee को निशाने पर लिया। उनके बयानों ने एक बार फिर राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। अखिलेश यादव पर ‘टोपी’ वाला तंज इंटरव्यू के दौरान जब उनसे उत्तर प्रदेश की राजनीति और समाजवादी पार्टी के प्रदर्शन पर सवाल पूछा गया, तो नितिन नवीन ने सीधे तौर पर अखिलेश यादव की राजनीतिक शैली पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा: “आजकल अखिलेश यादव ने टोपी पहनना थोड़ा कम कर दिया है” “पहले ये लोग हर जगह टोपी पहनकर जाते थे” यह बयान केवल एक प्रतीकात्मक टिप्पणी नहीं, बल्कि विपक्ष की कथित “पहचान आधारित राजनीति” पर निशाना माना जा रहा है। उन्होंने ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) जैसे नारों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इससे उनकी सोच और राजनीति का अंदाजा लगाया जा सकता है। ‘टोपी’ और वोट बैंक की राजनीति पर जवाब जब इंटरव्यू में उनसे पूछा गया कि क्या बीजेपी “टोपी पहनने वालों” को पसंद नहीं करती, तो उन्होंने सफाई देते हुए कहा: “हमें टोपी से कोई दिक्कत नहीं है, हमें ढोंग से दिक्कत है” “जो लोग केवल दिखावे के लिए पहचान का इस्तेमाल करते हैं, उनसे समस्या है” उन्होंने आगे यह भी कहा कि: तीन तलाक कानून के बाद बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाओं ने बीजेपी को समर्थन दिया इससे यह साबित होता है कि बीजेपी का समर्थन किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है राहुल गांधी पर भी साधा निशाना नितिन नवीन ने Rahul Gandhi और अखिलेश यादव के पुराने राजनीतिक समीकरणों का जिक्र करते हुए कहा कि: दोनों नेताओं ने पहले कई संयुक्त रैलियां और अभियान चलाए लेकिन इन अभियानों का जनता पर कोई ठोस असर नहीं पड़ा उन्होंने कहा कि केवल रैलियां और जुलूस निकालने से जनता का विश्वास नहीं जीता जा सकता। ममता बनर्जी पर गंभीर आरोप पश्चिम बंगाल की राजनीति पर बोलते हुए नितिन नवीन ने Mamata Banerjee सरकार पर तीखा हमला किया। उन्होंने आरोप लगाया कि: राज्य में अवैध घुसपैठ एक बड़ी समस्या बन चुकी है “बांग्लादेशी घुसपैठिए” भारत में आकर बस गए हैं इन लोगों को चिन्हित कर वापस भेजने (डिपोर्ट) की जरूरत है यह बयान ऐसे समय में आया है जब बंगाल में चुनावी माहौल अपने चरम पर है और सुरक्षा तथा पहचान के मुद्दे प्रमुख बने हुए हैं। चुनावी रणनीति या राजनीतिक हमला? विश्लेषकों का मानना है कि नितिन नवीन के ये बयान: सीधे तौर पर विपक्ष की सामाजिक और राजनीतिक रणनीति पर हमला हैं चुनावी माहौल को प्रभावित करने की कोशिश भी माने जा सकते हैं “टोपी” जैसे प्रतीकों पर टिप्पणी अक्सर संवेदनशील मानी जाती है, क्योंकि यह पहचान और समुदाय से जुड़े मुद्दों को छूती है। क्या हो सकता है राजनीतिक असर? इस बयान के बाद: समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दल पलटवार कर सकते हैं मुद्दा चुनावी सभाओं और मीडिया बहस का केंद्र बन सकता है
West Bengal में आगामी विधानसभा चुनाव के पहले चरण से ठीक पहले प्रशासन ने बड़ा कदम उठाया है। राज्य के उत्पाद शुल्क (Excise) विभाग ने 16 जिलों में शराब की बिक्री पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी किया है। इस फैसले के तहत आज रात 9 बजे से न सिर्फ शराब की दुकानें बंद रहेंगी, बल्कि बार और पब को भी संचालन रोकना होगा। क्यों लिया गया यह फैसला? चुनाव के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने और निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित करने के लिए यह कदम उठाया गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त Gyanesh Kumar पहले ही कह चुके हैं कि स्वतंत्र और शांतिपूर्ण चुनाव के लिए हर जरूरी उपाय किए जाएंगे। ऐसे में माना जा रहा है कि शराब बिक्री पर यह रोक चुनाव आयोग की उसी रणनीति का हिस्सा है, ताकि: मतदान के दौरान किसी तरह की गड़बड़ी न हो शराब के जरिए मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश रोकी जा सके हिंसा या अव्यवस्था की आशंका कम हो अचानक फैसले से दुकानदार हैरान दिलचस्प बात यह है कि: पहले जानकारी थी कि 21 अप्रैल से शराब की दुकानें बंद होंगी लेकिन उत्पाद शुल्क विभाग ने अचानक तीन दिन पहले ही आदेश जारी कर दिया इस अचानक फैसले से शराब विक्रेताओं में असमंजस की स्थिति बन गई है। हालांकि, दुकानदारों का कहना है कि वे सरकारी निर्देशों का पालन करेंगे, लेकिन बिना पूर्व सूचना के ऐसा निर्णय उनके व्यापार को प्रभावित करता है। किन जिलों में लागू है प्रतिबंध? पहले चरण के मतदान के तहत कुल 16 जिलों में यह प्रतिबंध लागू किया गया है। इनमें शामिल हैं: Cooch Behar Alipurduar Jalpaiguri Kalimpong Darjeeling Uttar Dinajpur Dakshin Dinajpur Malda Murshidabad Birbhum Paschim Bardhaman Bankura Purulia Paschim Medinipur Purba Medinipur Jhargram इन सभी जिलों में 23 अप्रैल को पहले चरण का मतदान होना है। कितनी सीटों पर होगा मतदान? पहले चरण में राज्य की 152 विधानसभा सीटों पर वोटिंग होगी। यह चरण खास तौर पर उत्तर बंगाल और कुछ दक्षिणी जिलों को कवर करता है, जहां सुरक्षा और संवेदनशीलता को देखते हुए प्रशासन पहले से ही अलर्ट मोड पर है। चुनाव के दौरान ‘ड्राई डे’ का नियम भारत में चुनाव के दौरान शराब बिक्री पर रोक लगाना एक सामान्य प्रक्रिया है, जिसे ‘ड्राई डे’ कहा जाता है। इसका मकसद होता है: मतदाताओं को किसी भी तरह के लालच या दबाव से बचाना चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाना कानून-व्यवस्था बनाए रखना
West Bengal में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर Election Commission of India (ECI) ने पहचान सत्यापन के नियमों को लेकर बड़ा और सख्त फैसला लिया है। आयोग ने साफ कर दिया है कि मतदान के दौरान किसी भी मतदाता को पहचान छिपाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। अगर किसी की पहचान पर जरा सा भी संदेह होता है, तो उसे अपना चेहरा दिखाना अनिवार्य होगा–चाहे वह घूंघट में हो या बुर्का में। यह फैसला चुनाव की पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए लिया गया है, क्योंकि पिछले चुनावों में फर्जी मतदान को लेकर कई शिकायतें सामने आई थीं। क्या हैं नए नियम? चुनाव आयोग द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार: मतदान केंद्र पर आने वाले हर मतदाता की पहचान की पुष्टि की जाएगी अगर कोई मतदाता चेहरा ढककर आता है और पहचान को लेकर संदेह होता है, तो उसे चेहरा दिखाना होगा महिला मतदाताओं की पहचान केवल महिला अधिकारी द्वारा ही जांची जाएगी किसी भी परिस्थिति में पहचान सत्यापन से छूट नहीं दी जाएगी आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह नियम सभी मतदाताओं पर समान रूप से लागू होगा और इसका उद्देश्य किसी विशेष समुदाय को निशाना बनाना नहीं, बल्कि चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाना है। महिला कर्मियों की अहम भूमिका इस प्रक्रिया को संवेदनशील तरीके से लागू करने के लिए आयोग ने खास इंतजाम किए हैं: हर मतदान केंद्र पर कम से कम एक महिला कर्मचारी की तैनाती अनिवार्य की गई है जहां जरूरत होगी, महिला अधिकारी अलग से जाकर पहचान सत्यापन करेंगी इससे महिला मतदाताओं की गरिमा और निजता (privacy) बनी रहेगी क्यों जरूरी हुआ यह कदम? चुनाव आयोग के मुताबिक, कई बार देखा गया है कि: कुछ लोग नकली पहचान के साथ वोट डालने की कोशिश करते हैं घूंघट या बुर्का का इस्तेमाल पहचान छिपाने के लिए किया जाता है इससे फर्जी मतदान (Bogus Voting) की संभावना बढ़ जाती है इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए आयोग ने इस बार सख्ती बढ़ाने का फैसला किया है, ताकि हर वोट असली मतदाता द्वारा ही डाला जाए। पहले भी हो चुका है विवाद यह मुद्दा नया नहीं है। इससे पहले Bihar के चुनावों में भी घूंघट और बुर्का में पहचान सत्यापन को लेकर विवाद हुआ था। कुछ राजनीतिक दलों ने इसे लेकर आपत्ति जताई थी वहीं चुनाव आयोग ने इसे चुनाव की निष्पक्षता के लिए जरूरी बताया था इस बार बंगाल में पहले से ही स्पष्ट नियम जारी कर दिए गए हैं, ताकि मतदान के दिन किसी तरह की भ्रम की स्थिति न बने। संवेदनशील माने जा रहे हैं ज्यादातर बूथ चुनाव आयोग के अनुसार: राज्य के अधिकांश मतदान केंद्र संवेदनशील श्रेणी में आते हैं करीब 8,500 बूथों को अत्यंत संवेदनशील घोषित किया गया है पहले चरण में होने वाले मतदान के लिए 1,500 बूथों पर अतिरिक्त सुरक्षा दी जा रही है यह आंकड़े बताते हैं कि इस बार चुनाव को लेकर प्रशासन काफी सतर्क है। सुरक्षा के व्यापक इंतजाम निष्पक्ष और शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करने के लिए कई अतिरिक्त कदम उठाए गए हैं: सभी प्रमुख मतदान केंद्रों पर CCTV कैमरे लगाए जाएंगे केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती की जाएगी मतदान केंद्रों के अंदर और बाहर कड़ी निगरानी रखी जाएगी भीड़ नियंत्रण के लिए विशेष व्यवस्था की जाएगी क्या होगा असर? विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले के कई असर हो सकते हैं: फर्जी मतदान पर रोक लगेगी चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी मतदाताओं का भरोसा मजबूत होगा
नई दिल्ली: Amit Shah ने संसद में परिसीमन को लेकर उठ रही आशंकाओं पर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने साफ कहा कि नए परिसीमन के बाद दक्षिण भारत के राज्यों का प्रतिनिधित्व कम नहीं होगा, बल्कि इसमें बढ़ोतरी होगी। शाह ने विपक्ष के दावों को “भ्रम फैलाने वाला” बताते हुए लोकसभा में पांच बिंदुओं के जरिए अपनी बात रखी। 5 पॉइंट्स में समझाया - कैसे बढ़ेगा प्रतिनिधित्व गृह मंत्री ने आंकड़ों के साथ बताया कि दक्षिणी राज्यों को किसी तरह का नुकसान नहीं होगा: कर्नाटक: वर्तमान में 28 सीटें (5.15%) हैं, जो बढ़कर 42 सीटें हो जाएंगी (5.14%) आंध्र प्रदेश: 25 सीटों से बढ़कर 38 सीटें (4.65%) तेलंगाना: 17 सीटों से बढ़कर 26 सीटें (3.18%) तमिलनाडु: 39 सीटों से बढ़कर 59 सीटें (7.23%) केरल: 20 सीटों से बढ़कर 30 सीटें (3.67%) कुल प्रतिनिधित्व भी बढ़ेगा Amit Shah ने बताया कि फिलहाल दक्षिणी राज्यों से 129 सांसद लोकसभा में आते हैं, जो कुल 23.76% है। परिसीमन के बाद यह संख्या बढ़कर 195 सीट हो जाएगी और हिस्सा लगभग 24% तक पहुंच जाएगा। यानी सीटें भी बढ़ेंगी और हिस्सेदारी भी लगभग स्थिर रहेगी। विपक्ष के आरोपों पर पलटवार कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra की ओर से परिसीमन आयोग में पक्षपात की आशंका जताने पर शाह ने कहा कि सरकार ने किसी कानून में बदलाव नहीं किया है। उन्होंने तंज करते हुए कहा कि अगर पहले किसी सरकार ने इसमें हेरफेर किया होगा, तो वह अलग बात है, लेकिन मौजूदा सरकार ऐसा नहीं करेगी। 2029 से पहले लागू नहीं होगा परिसीमन शाह ने यह भी स्पष्ट किया कि परिसीमन प्रक्रिया 2029 से पहले लागू नहीं होगी। जब तक आयोग की रिपोर्ट संसद और राष्ट्रपति की मंजूरी से पास नहीं होती, तब तक चुनाव पुरानी व्यवस्था के तहत ही होंगे। राजनीतिक बयानबाजी भी तेज समाजवादी पार्टी प्रमुख Akhilesh Yadav पर कटाक्ष करते हुए शाह ने कहा कि 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर उन्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है, हालांकि जीत का दावा अलग बात है। सरकार का दावा है कि परिसीमन से दक्षिण भारत का प्रतिनिधित्व कम नहीं होगा, बल्कि संख्या में वृद्धि के साथ संतुलन बना रहेगा। हालांकि, इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस अभी भी जारी है और आने वाले समय में यह बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है।
आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में पुरुषों की त्वचा लगातार धूप, धूल और प्रदूषण के संपर्क में रहती है। ऑफिस जाने का रोज़ाना सफर हो, वीकेंड पर बाइक राइड हो या आउटडोर स्पोर्ट्स–इन सबके कारण चेहरे पर जिद्दी टैन, असमान स्किन टोन और डलनेस साफ दिखाई देने लगती है। अच्छी बात यह है कि टैन हटाने के लिए आपको बहुत जटिल या लंबी स्किनकेयर रूटीन की जरूरत नहीं है। सही प्रोडक्ट्स और साइंटिफिक अप्रोच के साथ आप सिर्फ एक हफ्ते में अपनी स्किन को बेहतर बना सकते हैं। आखिर टैन होता क्यों है? जब आपकी त्वचा सूरज की UV किरणों के संपर्क में आती है, तो शरीर खुद को बचाने के लिए मेलानिन नामक पिगमेंट बनाता है। यही मेलानिन त्वचा को डार्क बनाता है। पुरुषों की त्वचा महिलाओं की तुलना में लगभग 20% मोटी होती है और इसमें ऑयल प्रोडक्शन भी ज्यादा होता है। यही कारण है कि टैन त्वचा पर जमा होकर ज्यादा गहरा और पैची दिखाई देता है। 7 दिनों का असरदार डिटैन रूटीन Step 1: दिन की शुरुआत करें डिटैन फेसवॉश से कई पुरुष आज भी चेहरे पर साबुन या बॉडी वॉश का इस्तेमाल करते हैं, जो स्किन के लिए नुकसानदायक हो सकता है। एक अच्छा डिटैन फेसवॉश त्वचा की ऊपरी परत से डेड स्किन और गंदगी हटाता है। यह स्किन को साफ करने के साथ-साथ आगे इस्तेमाल होने वाले प्रोडक्ट्स को बेहतर तरीके से काम करने में मदद करता है। Step 2: हफ्ते में 2 बार डिटैन फेस मास्क लगाएं सिर्फ फेसवॉश से गहरा टैन नहीं हटता। इसके लिए डिटैन फेस मास्क जरूरी है। यह मास्क खास एक्टिव इंग्रीडिएंट्स और क्ले से बना होता है, जो त्वचा के अंदर जमा मेलानिन को तोड़ने में मदद करता है। हफ्ते में 2 बार 10–15 मिनट लगाने से स्किन धीरे-धीरे साफ और ब्राइट दिखने लगती है। Step 3: मॉइश्चराइजर से स्किन को हाइड्रेट रखें बहुत से लोग मानते हैं कि टैन हटाने के लिए स्किन को ड्राय रखना चाहिए, लेकिन यह गलत है। ड्राय स्किन और भी ज्यादा डल और डार्क दिखती है। इसलिए हर बार फेसवॉश या मास्क के बाद एक हल्का, ऑयल-फ्री मॉइश्चराइजर जरूर लगाएं। इससे त्वचा सॉफ्ट, हेल्दी और ग्लोइंग बनी रहती है। Step 4: सनस्क्रीन है सबसे जरूरी अगर आप सनस्क्रीन नहीं लगाते, तो आपका सारा डिटैन प्रयास बेकार हो सकता है। SPF 50 वाला ब्रॉड-स्पेक्ट्रम सनस्क्रीन रोज सुबह लगाना जरूरी है। यह आपकी त्वचा को UV किरणों से बचाता है और नए टैन को बनने से रोकता है। यह रूटीन क्यों सबसे असरदार है? यह डिटैन रूटीन तीन स्तरों पर काम करता है: Removal (हटाना): डेड और डार्क स्किन को साफ करता है Correction (सुधार): गहरे पिगमेंट को कम करता है Prevention (बचाव): नए टैन को बनने से रोकता है
रांची। झारखंड में लगातार सामने आ रहे घोटालों को लेकर राजनीतिक माहौल गरमा गया है। भाजपा नेता बाबूलाल मरांडी ने राज्य की हेमंत सोरेन सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में भ्रष्टाचार इस कदर बढ़ गया है कि “जहां हाथ डालिए, वहीं नया घोटाला सामने आ जाता है।”मरांडी ने कहा कि खनन क्षेत्र में पत्थर, कोयला, बालू और लौह अयस्क की खुली लूट तो दिख रही है, लेकिन इसके अलावा भी सरकारी धन की बड़े पैमाने पर बंदरबांट हो रही है। उनके अनुसार यह स्थिति राज्य को “अंदर से खोखला” कर रही है और आम जनता इससे परेशान है। रांची में करोड़ों की अवैध निकासी का मामला राजधानी रांची में हाल ही में पशुपालन विभाग के दो कर्मचारियों द्वारा लगभग 2.94 करोड़ रुपये की अवैध निकासी का मामला सामने आया है। मरांडी ने दावा किया कि यह कोई एकल घटना नहीं है, बल्कि बोकारो और हजारीबाग जैसे अन्य जिलों में भी इसी तरह की वित्तीय अनियमितताएं सामने आ चुकी हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि यह घोटाले पिछले कई वर्षों से जारी हैं और अब धीरे-धीरे उजागर हो रहे हैं, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं। उच्च अधिकारियों की भूमिका पर उठे सवाल मरांडी ने कहा कि इतने बड़े पैमाने पर हो रही गड़बड़ियां बिना उच्च अधिकारियों की मिलीभगत के संभव नहीं हैं। उन्होंने इसे “संगठित भ्रष्टाचार” करार देते हुए सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। सरकार से जांच और कार्रवाई की मांग भाजपा नेता ने राज्य सरकार से सभी विभागों का व्यापक ऑडिट कराने, कोषागार से हुई निकासी की निष्पक्ष जांच कराने और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। साथ ही उन्होंने सरकारी धन की वसूली सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया।
देश में प्रस्तावित महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े विधेयकों को लेकर करीब 500 सामाजिक कार्यकर्ताओं और महिला संगठनों ने केंद्र सरकार को एक संयुक्त पत्र लिखा है। 495 हस्ताक्षरों वाले इस पत्र में संसद के विशेष सत्र और विधेयक की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। ‘जल्दबाज़ी में बुलाया गया विशेष सत्र’ पत्र में कहा गया है कि 16–18 अप्रैल 2026 के लिए बुलाया गया विशेष सत्र जल्दबाज़ी में आयोजित किया गया है। हस्ताक्षरकर्ताओं के अनुसार: कई राज्यों में चुनाव जारी हैं आचार संहिता लागू है ऐसे समय में महत्वपूर्ण विधेयक लाना उचित नहीं ‘पर्याप्त समय नहीं दिया गया’ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि: महिला समूहों और संगठनों को सुझाव देने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला व्यापक चर्चा और परामर्श के बिना बिल लाया जा रहा है ड्राफ्ट सार्वजनिक करने की मांग पत्र में सरकार से मांग की गई है कि: प्रस्तावित विधेयकों का ड्राफ्ट सार्वजनिक किया जाए सभी हितधारकों से सलाह-मशविरा किया जाए परिसीमन और जनगणना से अलग रखने की अपील हस्ताक्षरकर्ताओं ने सुझाव दिया कि: महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया से अलग रखा जाए सत्र का फोकस केवल Nari Shakti Vandan Adhiniyam में आवश्यक संशोधनों तक सीमित हो निर्वाचन आयोग की भूमिका पर चिंता पत्र में Election Commission of India की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए, खासकर: आरक्षित सीटों की पहचान पारदर्शिता और प्रक्रिया को लेकर प्रमुख हस्ताक्षरकर्ता कौन? इस पत्र पर कई प्रमुख हस्तियों के हस्ताक्षर हैं, जिनमें शामिल हैं: Romila Thapar Nandini Sundar Yogendra Yadav Amu Joseph Anjana Prakash Kalpana Kannabiran क्या है मुद्दे की अहमियत? महिला आरक्षण बिल को देश की राजनीति में एक बड़ा सुधार माना जा रहा है, लेकिन इस पत्र से साफ है कि: प्रक्रिया और समय को लेकर असहमति है पारदर्शिता और व्यापक चर्चा की मांग तेज हो गई है अब देखना होगा कि सरकार इन मांगों पर क्या रुख अपनाती है और क्या इस बिल पर आगे व्यापक सहमति बन पाती है।
पटना: Bihar में नई सरकार के गठन से पहले ही बड़ा प्रशासनिक फेरबदल देखने को मिला है। मुख्यमंत्री Nitish Kumar के करीबी माने जाने वाले कई आईएएस और आईपीएस अधिकारियों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर भेज दिया गया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब नीतीश कुमार के इस्तीफे और नई सरकार के गठन की प्रक्रिया जारी है। क्या है पूरा मामला: केंद्र सरकार ने अधिसूचना जारी कर बिहार कैडर के कई IAS और IPS अधिकारियों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर बुलाया पहली सूची में मुख्यमंत्री के करीबी अधिकारियों के नाम शामिल दूसरी सूची भी जल्द जारी होने की संभावना किन अधिकारियों को मिली केंद्रीय जिम्मेदारी: 2003 बैच के IAS Anupam Kumar को ऊर्जा मंत्रालय में जॉइंट सेक्रेटरी बनाया गया उनकी पत्नी IAS Pratima S Verma को भी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति मिली IAS Vandana Preyasi को उर्वरक विभाग में जॉइंट सेक्रेटरी नियुक्त किया गया IPS राकेश राठी और IAS श्रवनन एम को भी केंद्र भेजा गया इस्तीफे से पहले बड़ा कदम Nitish Kumar 14 अप्रैल को दोपहर 3 बजे इस्तीफा देने वाले हैं 15 अप्रैल को नई सरकार के गठन की संभावना इससे पहले ही करीबी अफसरों का केंद्र जाना सियासी और प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय क्यों अहम है यह फेरबदल: नई सरकार के गठन से पहले प्रशासनिक ढांचे में बदलाव नीतीश कुमार के भरोसेमंद अधिकारियों का राज्य से बाहर जाना भविष्य की प्रशासनिक कार्यशैली पर असर की संभावना केंद्र और राज्य के बीच समन्वय को लेकर नई दिशा आगे क्या: अधिकारियों की दूसरी सूची जल्द जारी हो सकती है नई सरकार बनने के बाद और भी प्रशासनिक बदलाव संभव नौकरशाही में बड़े स्तर पर पुनर्गठन की उम्मीद बिहार में राजनीतिक बदलाव के साथ-साथ प्रशासनिक स्तर पर भी बड़े फैसले लिए जा रहे हैं। नीतीश कुमार के इस्तीफे से पहले उनके करीबी अधिकारियों का केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में राज्य की प्रशासनिक संरचना में व्यापक बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
महाराष्ट्र की सियासत में बारामती उपचुनाव ने नया मोड़ ले लिया है। नामांकन के दौरान दाखिल चुनावी हलफनामों ने पवार परिवार की संपत्ति को लेकर बहस छेड़ दी है। Sunetra Pawar की कुल संपत्ति करीब ₹122 करोड़ सामने आई है, जो उनके ससुर Sharad Pawar की घोषित संपत्ति (करीब ₹61 करोड़) से लगभग दोगुनी है। हालांकि परिवार के भीतर तुलना करें तो Sunetra Pawar अपनी ननद Supriya Sule से अभी भी पीछे हैं, जिनकी कुल संपत्ति लगभग ₹167 करोड़ बताई गई है। इन आंकड़ों के सामने आने के बाद बारामती की सियासत में ‘परिवार बनाम संपत्ति’ की चर्चा तेज हो गई है। इस बीच चुनावी मुकाबला भी अब दिलचस्प हो गया है। Indian National Congress ने बारामती सीट से अधिवक्ता आकाश विश्वनाथ मोरे को उम्मीदवार बनाकर मैदान में उतार दिया है। पार्टी अध्यक्ष Mallikarjun Kharge की मंजूरी के बाद यह फैसला लिया गया, जिससे मुकाबला अब एकतरफा नहीं रहा। बारामती सीट लंबे समय से पवार परिवार का गढ़ मानी जाती रही है। पूर्व उपमुख्यमंत्री Ajit Pawar ने यहां से लगातार आठ बार जीत हासिल की थी। उनके निधन के बाद यह सीट खाली हुई और अब उनकी पत्नी Sunetra Pawar इस उपचुनाव में अपनी किस्मत आजमा रही हैं। पहले इस सीट पर निर्विरोध जीत की चर्चा थी, लेकिन कांग्रेस के मैदान में आने से अब सीधा और कड़ा मुकाबला तय माना जा रहा है। इस चुनाव में अब केवल राजनीतिक विरासत ही नहीं, बल्कि उम्मीदवारों की संपत्ति और छवि भी अहम मुद्दा बनती दिख रही है। निर्वाचन आयोग के अनुसार, बारामती और राहुरी सीटों पर 23 अप्रैल 2026 को मतदान होगा, जबकि मतगणना 4 मई 2026 को की जाएगी। ऐसे में आने वाले दिनों में यह चुनाव और भी ज्यादा हाई-प्रोफाइल होने की संभावना है।
रांची। गर्मी की छुट्टियों में बढ़ती भीड़ को देखते हुए रेलवे ने अजमेर और रांची के बीच साप्ताहिक स्पेशल ट्रेन चलाने का फैसला किया है। इससे ट्रेन से सफर करने वाले यात्रियों को काफी राहत मिलेगी। 17 अप्रैल से 10 जुलाई तक चलेगी गाड़ी संख्या 09619 अजमेर-रांची साप्ताहिक स्पेशल ट्रेन 17 अप्रैल से 10 जुलाई तक चलेगी। यह ट्रेन हर शुक्रवार रात 11:05 बजे अजमेर से चलेगी और रविवार सुबह 7:30 बजे रांची पहुंचेगी। रांची से अजमेर जाने का समय गाड़ी संख्या 09620 रांची-अजमेर स्पेशल ट्रेन 19 अप्रैल से 12 जुलाई तक चलेगी। यह ट्रेन हर रविवार सुबह 10:50 बजे रांची से रवाना होगी और सोमवार शाम 6:35 बजे अजमेर पहुंचेगी। ट्रेन में मिलेंगी ये सुविधाए इस स्पेशल ट्रेन में यात्रियों की सुविधा के लिए सेकेंड एसी, थर्ड एसी, स्लीपर और सामान्य श्रेणी के कुल 20 कोच लगाए जाएंगे। यात्रियों को फायदा रेलवे के इस फैसले से झारखंड और राजस्थान के बीच यात्रा करने वाले यात्रियों को बड़ी राहत मिलेगी।
देश के अलग-अलग राज्यों में विधानसभा चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज हो गई है। पश्चिम बंगाल, केरल और असम से बड़ी खबरें सामने आई हैं। बंगाल: 90 लाख से ज्यादा मतदाता लिस्ट से बाहर चुनाव आयोग के मुताबिक 90.66 लाख वोटरों के नाम हटाए गए इनमें से: 32.68 लाख पात्र वोटरों के नाम फिर जोड़े गए 27.16 लाख नाम स्थायी रूप से हटाए गए करीब 60 लाख मामलों की जांच की गई थी यह कार्रवाई स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत की गई केरल: LDF दफ्तर के सामने किसान की मौत केरल के वैकोम में LDF कार्यालय के सामने एक किसान ने फांसी लगाकर जान दे दी किसान ने आरोप लगाया था कि CPI नेताओं ने उसकी रोजी-रोटी छीन ली कांग्रेस नेता के.सी. वेणुगोपाल ने CM पिनारायी विजयन से जवाब मांगा और सरकार पर निशाना साधा केरल चुनाव: आज शाम थमेगा प्रचार 9 अप्रैल को होने वाले चुनाव के लिए प्रचार आज शाम खत्म होगा साइलेंस पीरियड में पाबंदियां: जनसभाएं, रैलियां, जुलूस पूरी तरह बंद मनोरंजन कार्यक्रमों पर रोक मीडिया में राजनीतिक विज्ञापन के लिए पूर्व अनुमति जरूरी मकसद: मतदाता बिना दबाव के मतदान कर सकें असम: CM हिमंता का कांग्रेस पर पलटवार पत्नी पर लगे आरोपों पर CM हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा: “किसी परिवार को इस तरह बदनाम नहीं कर सकते” चेतावनी दी कि कांग्रेस को इसके परिणाम भुगतने होंगे
भुवनेश्वर, 31 मार्च 2026: ओडिशा की राजनीति में इन दिनों जबरदस्त हलचल देखने को मिल रही है। विवाद की वजह बना है Nishikant Dubey का एक बयान, जिसमें उन्होंने दिग्गज नेता Biju Patnaik को लेकर टिप्पणी की। इस बयान के बाद न सिर्फ विपक्ष, बल्कि उनकी अपनी पार्टी के नेताओं ने भी नाराजगी जताई है। क्या कहा था निशिकांत दुबे ने? बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने दावा किया था कि 1960 के दशक में चीन के साथ युद्ध के दौरान बीजू पटनायक, पूर्व प्रधानमंत्री Jawaharlal Nehru और अमेरिकी खुफिया एजेंसी के बीच एक कड़ी के रूप में काम कर रहे थे। इस बयान को लेकर राजनीतिक गलियारों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली और इसे बीजू पटनायक की छवि पर सवाल उठाने वाला माना गया। नवीन पटनायक का तीखा हमला बीजू पटनायक के बेटे और ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री Naveen Patnaik ने इस बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि इस तरह की टिप्पणी न केवल अपमानजनक है, बल्कि तथ्यों से परे भी है। नवीन पटनायक ने यहां तक कह दिया कि ऐसा बयान देने वाले को “मानसिक जांच” की जरूरत है। सफाई में क्या बोले निशिकांत दुबे? विवाद बढ़ता देख निशिकांत दुबे ने सफाई देते हुए कहा कि उनका इशारा बीजू पटनायक की ओर नहीं, बल्कि नेहरू-गांधी परिवार की ओर था। उन्होंने कहा कि बीजू पटनायक उनके लिए भी सम्माननीय हैं और उनके योगदान पर सवाल उठाना उचित नहीं है। उन्होंने ओडिशा की जनता से अपील की कि इस मुद्दे को राजनीतिक रूप न दिया जाए। बीजेपी ने बनाई दूरी इस विवाद के बाद बीजेपी के कई नेताओं ने भी दुबे के बयान से खुद को अलग कर लिया। पार्टी के वरिष्ठ नेता Baijayant Panda ने बीजू पटनायक को महान देशभक्त बताते हुए कहा कि उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाना पूरी तरह अस्वीकार्य है। बीजेडी का विरोध और प्रदर्शन Biju Janata Dal ने इस मुद्दे को लेकर विरोध तेज कर दिया है। पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने भुवनेश्वर में प्रदर्शन किया और निशिकांत दुबे से बिना शर्त माफी की मांग की। राज्यसभा में भी इस मुद्दे पर विरोध दर्ज कराया गया, जिससे यह विवाद अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। क्यों बढ़ा विवाद? बीजू पटनायक ओडिशा ही नहीं, बल्कि देश के एक सम्मानित और प्रभावशाली नेता रहे हैं। ऐसे में उनके खिलाफ किसी भी विवादित टिप्पणी को जनता और राजनीतिक दल गंभीरता से लेते हैं। यही वजह है कि यह मामला तेजी से तूल पकड़ गया और अब तक शांत नहीं हुआ है।
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ने को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। मौजूदा 403 सीटों के मुकाबले भविष्य में यह संख्या बढ़कर 605 तक पहुंच सकती है। हालांकि, यह बदलाव 2027 के विधानसभा चुनाव में लागू नहीं होगा। क्यों बढ़ सकती हैं सीटें? यह चर्चा संभावित परिसीमन (Delimitation) और नारी वंदन अधिनियम के तहत प्रस्तावित बदलावों के कारण शुरू हुई है। सूत्रों के मुताबिक: लोकसभा और विधानसभा सीटों में करीब 50% तक बढ़ोतरी हो सकती है यूपी में लोकसभा सीटें 80 से बढ़कर 120 हो सकती हैं विधानसभा सीटें 403 से बढ़कर 605 होने का अनुमान 2027 चुनाव पर क्या असर? 2027 के विधानसभा चुनाव पुरानी 403 सीटों पर ही होंगे सीटों में बढ़ोतरी परिसीमन के बाद लागू होगी संभावना है कि 2032 के बाद नए ढांचे पर चुनाव हो आबादी के हिसाब से क्यों जरूरी? यूपी में तेजी से बढ़ती आबादी के कारण: एक विधानसभा क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या काफी बढ़ गई है आंकड़ों पर नजर: 1952: 347 सीटें, प्रति सीट ~1.82 लाख आबादी 1973: 425 सीटें, प्रति सीट ~2.8 लाख वर्तमान (403 सीट): प्रति सीट ~4.95 लाख आबादी अगर 605 सीटें होती हैं तो: प्रति सीट आबादी घटकर करीब 3.30 लाख रह जाएगी जिलों में क्या होगा बदलाव? अभी 75 जिलों में औसतन 3-5 विधानसभा सीटें हैं बढ़ोतरी के बाद यह संख्या 6-8 सीट प्रति जिला हो सकती है बड़े और छोटे विधानसभा क्षेत्र सबसे बड़े क्षेत्र: साहिबाबाद, लोनी, मुरादनगर (7-12 लाख मतदाता) छोटे क्षेत्र: महोबा, सीसामऊ
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।