मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने एक बड़ा कदम उठाते हुए अपने सहयोगी देशों को 8.6 अरब डॉलर से ज्यादा के हथियार बेचने की मंजूरी दे दी है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब ईरान के साथ जारी टकराव ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है। किन देशों को मिलेंगे हथियार? अमेरिकी विदेश विभाग की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, जिन देशों को यह सैन्य उपकरण दिए जाएंगे, उनमें शामिल हैं: इजरायल कतर कुवैत संयुक्त अरब अमीरात ये सभी देश लंबे समय से अमेरिका के रणनीतिक सहयोगी रहे हैं और क्षेत्रीय सुरक्षा में अहम भूमिका निभाते हैं। युद्ध और व्यापार साथ-साथ ईरान के साथ संघर्ष में अमेरिका अब तक करीब 25 अरब डॉलर (लगभग 2.37 लाख करोड़ रुपये) खर्च कर चुका है। यह खर्च मुख्य रूप से: गोला-बारूद मिसाइल सिस्टम ड्रोन सैन्य तैनाती पर हुआ है। इस दौरान अमेरिका को हाईटेक हथियारों और डिफेंस सिस्टम के नुकसान का भी सामना करना पड़ा। ऐसे में हथियारों की यह बिक्री एक तरह से उस आर्थिक नुकसान की भरपाई के रूप में देखी जा रही है। डर बना हथियार बाजार की वजह ईरान के हमलों ने इन देशों की सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर कर दिया। रिपोर्ट्स के अनुसार: मिसाइल और ड्रोन हमलों को रोकने में कई डिफेंस सिस्टम पूरी तरह सफल नहीं रहे सैन्य ठिकानों और ऊर्जा प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचा “स्वार्म अटैक” (एक साथ कई हमले) से रक्षा तंत्र पर दबाव बढ़ा इन हालातों ने मिडिल ईस्ट के देशों को अपनी रक्षा क्षमता मजबूत करने के लिए मजबूर कर दिया। THAAD और पैट्रियट भी पड़े कमजोर? इन देशों ने THAAD और Patriot Missile System जैसे एडवांस्ड डिफेंस सिस्टम का इस्तेमाल किया, लेकिन ईरान के कुछ हमलों को रोकने में ये भी पूरी तरह सफल नहीं रहे। इससे यह साफ हुआ कि आधुनिक युद्ध में पारंपरिक रक्षा सिस्टम को और अपग्रेड करने की जरूरत है। अस्थायी शांति, लेकिन खतरा बरकरार अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष अब नौवें सप्ताह में पहुंच चुका है। हालांकि, 8 अप्रैल से एक नाजुक युद्धविराम लागू है, लेकिन हालात अब भी तनावपूर्ण बने हुए हैं। ऐसे में मिडिल ईस्ट के देश: भविष्य के हमलों के लिए तैयार हो रहे हैं अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहे हैं अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग मजबूत कर रहे हैं ट्रंप का दावा और सख्त रुख डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि यह कदम परमाणु खतरे को रोकने के लिए जरूरी था। उन्होंने दावा किया कि: ईरान की सैन्य क्षमता कमजोर हो चुकी है उसके कई डिफेंस सिस्टम नष्ट हो चुके हैं यह कार्रवाई मिडिल ईस्ट और यूरोप को सुरक्षित रखने के लिए की गई दोहरा फायदा: रणनीति और कारोबार विशेषज्ञों के अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका को दोहरा फायदा हुआ है: ईरान पर दबाव बनाकर उसे कमजोर करना सहयोगी देशों को हथियार बेचकर आर्थिक लाभ कमाना यानी, युद्ध के माहौल ने हथियारों के बाजार को और तेज कर दिया है।
व्हाइट हाउस में बातचीत के बाद सीजफायर बढ़ाने की घोषणा अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि इजरायल और लेबनान के बीच चल रहे संघर्ष में लागू सीजफायर को तीन सप्ताह के लिए बढ़ा दिया गया है। यह फैसला व्हाइट हाउस में हुई उच्चस्तरीय वार्ता के बाद लिया गया बताया जा रहा है, जिसमें दोनों देशों के राजदूतों की मुलाकात भी शामिल थी। ट्रंप ने कहा कि बातचीत “सकारात्मक और सफल” रही, हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इस प्रक्रिया में हिज़्बुल्लाह की भूमिका एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। दशकों बाद सीधी बातचीत, लेकिन तनाव अभी भी कायम रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह पहली बार है जब इजरायल और लेबनान के बीच दशकों बाद सीधे कूटनीतिक बातचीत हुई है। दोनों देश औपचारिक रूप से लंबे समय से युद्ध की स्थिति में माने जाते रहे हैं। पहले लागू 10 दिनों के अस्थायी सीजफायर की समय सीमा सोमवार को खत्म होनी थी, लेकिन अब इसे तीन हफ्ते और बढ़ा दिया गया है। ट्रंप का बयान: “इजरायल को आत्मरक्षा का अधिकार है” व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि इजरायल को आत्मरक्षा का पूरा अधिकार है, खासकर तब जब उस पर हमला हो। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने के लिए आगे भी बातचीत जारी रहेगी और अमेरिका इस प्रक्रिया में सहयोग करेगा। लेबनान और इजरायल के बीच शांति की उम्मीद लेबनान और इजरायल के राजनयिकों ने इस बातचीत को सकारात्मक बताया है। लेबनान के प्रतिनिधियों ने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में दोनों देशों के बीच स्थायी शांति की दिशा में प्रगति हो सकती है। लेबनान के नेतृत्व ने संकेत दिया है कि भविष्य की बातचीत में सीमा विवाद, सैनिकों की वापसी और युद्ध के बाद पुनर्निर्माण जैसे मुद्दे शामिल होंगे। हिज़्बुल्लाह बना सबसे बड़ी चुनौती हालांकि, इस कूटनीतिक पहल के बीच हिज़्बुल्लाह एक प्रमुख बाधा के रूप में सामने है। संगठन ने अब तक इस बातचीत का हिस्सा बनने से इनकार किया है और किसी भी समझौते को मानने से भी इंकार किया है। इजरायल का कहना है कि जब तक हिज़्बुल्लाह का प्रभाव कम नहीं होता, तब तक क्षेत्र में स्थायी शांति मुश्किल है। युद्ध और मानवीय संकट का गंभीर असर इस संघर्ष का सबसे बड़ा असर लेबनान की जनता पर पड़ा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले युद्ध में हजारों लोगों की मौत हुई है, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। इसके अलावा, लाखों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं, जिससे मानवीय संकट और गहरा गया है। शांति की दिशा में कदम, लेकिन चुनौतियां बरकरार इजरायल और लेबनान के बीच सीधी बातचीत और सीजफायर विस्तार को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक कदम माना जा रहा है। हालांकि, हिज़्बुल्लाह की भूमिका, क्षेत्रीय तनाव और पुराना युद्ध इतिहास इस प्रक्रिया को अभी भी जटिल बनाए हुए हैं।
तेहरान: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने अमेरिका और इजरायल पर गंभीर आरोप लगाते हुए पड़ोसी देशों से अहम अपील की है। ईरान का कहना है कि अमेरिका और इजरायल क्षेत्र में अस्थिरता फैला रहे हैं और उन्हें यहां के लोगों की सुरक्षा से कोई मतलब नहीं है। ‘हमले के लिए अपनी जमीन न दें’ ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने साफ कहा कि पड़ोसी देश अपनी जमीन, समुद्र या हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई के लिए न होने दें। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि कुछ देशों ने “अनजाने में” अपनी सुविधाओं का गलत इस्तेमाल होने दिया है, जिसे तुरंत रोका जाना चाहिए। ‘अमेरिका-इजरायल से शांति को खतरा’ ईरान का आरोप है कि पिछले 40 दिनों की घटनाओं ने यह साबित कर दिया है कि अमेरिका और इजरायल की नीतियां क्षेत्र में शांति के बजाय तनाव बढ़ाने वाली हैं। तेहरान ने दोहराया कि वह अपने पड़ोसियों के साथ अच्छे संबंध और संप्रभुता के सम्मान में विश्वास रखता है, लेकिन किसी भी तरह की सैन्य साझेदारी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। पाकिस्तान के जरिए बातचीत की कोशिश तनाव के बीच कूटनीतिक प्रयास भी तेज हो गए हैं। पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर तेहरान पहुंचे, जहां उनकी मुलाकात ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से हुई। बताया जा रहा है कि पाकिस्तान, वॉशिंगटन और तेहरान के बीच बातचीत का नया रास्ता निकालने की कोशिश कर रहा है। ट्रंप का रुख सख्त वहीं डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि वह सीजफायर बढ़ाने के पक्ष में नहीं हैं, हालांकि उन्होंने बातचीत के जरिए समाधान की उम्मीद जताई है। डिप्लोमैटिक सूत्रों के मुताबिक, आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर बड़ा अपडेट सामने आ सकता है। बढ़ सकता है क्षेत्रीय तनाव मिडिल ईस्ट में हालात तेजी से बदल रहे हैं। एक तरफ सैन्य तनाव बना हुआ है, तो दूसरी तरफ कूटनीतिक प्रयास भी जारी हैं। अब नजर इस बात पर है कि क्या बातचीत के जरिए समाधान निकलता है या क्षेत्र में टकराव और गहराता है।
रियाद, एजेंसियां। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच Iran ने Saudi Arabia में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकाने Prince Sultan Air Base पर मिसाइल हमला किया है। रिपोर्ट्स के अनुसार इस हमले में United States Air Force के पांच एयर-टैंकर (रिफ्यूलिंग) विमान क्षतिग्रस्त हो गए। हालांकि किसी के घायल होने या मौत की सूचना नहीं मिली है। 15वें दिन में पहुंचा संघर्ष पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष अब और उग्र होता जा रहा है। मिसाइल और ड्रोन हमलों के बीच यह टकराव करीब 15वें दिन में प्रवेश कर चुका है। इसी दौरान ईरान ने सऊदी अरब में मौजूद अमेरिकी एयरबेस को निशाना बनाते हुए जोरदार हमला किया। पांच अमेरिकी विमान हुए क्षतिग्रस्त सूत्रों के मुताबिक, हमले के समय एयरबेस पर खड़े अमेरिकी वायुसेना के पांच रिफ्यूलिंग विमान क्षतिग्रस्त हो गए। हालांकि विमान पूरी तरह नष्ट नहीं हुए हैं और उन्हें मरम्मत के लिए भेजा गया है। पहले भी हुए कई सैन्य हादसे इससे पहले पश्चिमी इराक में अमेरिकी वायुसेना का एक केसी-135 सैन्य रिफ्यूलिंग विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जिसमें छह क्रू मेंबर की मौत हो गई थी। वहीं कुवैत में फ्रेंडली फायर की घटना में तीन अमेरिकी F-15 लड़ाकू विमान भी गिर गए थे, हालांकि उस घटना में एयरक्रू सुरक्षित रहे थे। अमेरिका-ईरान संघर्ष से बढ़ा तनाव गौरतलब है कि यह संकट तब शुरू हुआ जब United States और Israel ने 28 फरवरी को ईरान पर बड़े हमले किए थे। इसके बाद से ईरान लगातार जवाबी कार्रवाई कर रहा है। हालात ऐसे हैं कि पूरा पश्चिम एशिया युद्ध जैसे माहौल में पहुंच गया है और इसका असर वैश्विक राजनीति और तेल बाजार पर भी पड़ रहा है।
अमेरिका-इजराइल के साथ जंग के छठे दिन तेहरान का सख्त संदेश मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच ईरान ने अमेरिका और इजराइल को कड़ी चेतावनी दी है। ईरान ने कहा है कि अगर इस्लामिक गणराज्य में सत्ता परिवर्तन की कोशिश की गई, तो वह इजराइल के डिमोना परमाणु केंद्र को निशाना बनाएगा। ईरान की अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी Iranian Students' News Agency (आईएसएनए) ने एक सैन्य अधिकारी के हवाले से यह जानकारी दी है। डिमोना परमाणु स्थल पर हमले की चेतावनी रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी सैन्य अधिकारी ने साफ कहा कि यदि अमेरिका और इजराइल ईरान की मौजूदा व्यवस्था को हटाने की दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो जवाब में इजराइल के परमाणु ठिकाने डिमोना को निशाना बनाया जाएगा। डिमोना स्थित परमाणु केंद्र को इजराइल के सबसे संवेदनशील और रणनीतिक ठिकानों में गिना जाता है। यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब क्षेत्र में हालात पहले से ही बेहद तनावपूर्ण हैं। इजराइल पर मिसाइलों की बौछार, लाखों लोग बंकरों में गुरुवार तड़के ईरान ने इजराइल पर मिसाइलों की नई खेप दागी। हमले के बाद इजराइल के कई शहरों में सायरन बजने लगे और लाखों लोगों को बम शेल्टर में शरण लेनी पड़ी। यह हमला ऐसे समय हुआ जब अमेरिका और इजराइल के साथ ईरान की जंग छठे दिन में प्रवेश कर चुकी है। लगातार हो रहे हमलों और जवाबी कार्रवाई से पूरे क्षेत्र में भय और अस्थिरता का माहौल बना हुआ है। छठे दिन भी जारी संघर्ष मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले कुछ दिनों में ईरान और इजराइल के बीच मिसाइल और ड्रोन हमलों की कई घटनाएं सामने आई हैं। अमेरिका के समर्थन से इजराइल की कार्रवाई और उसके जवाब में ईरान की प्रतिक्रिया ने हालात को और गंभीर बना दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि अगर तनाव इसी तरह बढ़ता रहा, तो यह संघर्ष व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है, जिसका असर पूरी दुनिया की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की बढ़ी चिंता ईरान की डिमोना परमाणु स्थल पर हमले की चेतावनी ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ा दी है। परमाणु स्थलों को निशाना बनाने की किसी भी कोशिश से बड़े पैमाने पर विनाश और पर्यावरणीय संकट का खतरा पैदा हो सकता है। फिलहाल दुनिया की नजरें मध्य पूर्व पर टिकी हैं, जहां हालात तेजी से बदल रहे हैं और कूटनीतिक समाधान की संभावनाएं कमजोर पड़ती दिख रही हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।