तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच ईरानी मीडिया में एक कथित "हिट लिस्ट" को लेकर दावा सामने आया है। रिपोर्टों में कहा गया है कि ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई के पहले सार्वजनिक संबोधन के दौरान अमेरिका, इजरायल और यूरोप के कई शीर्ष नेताओं को निशाना बनाने की चेतावनी दी गई। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और न ही ईरान सरकार की ओर से कोई आधिकारिक सूची जारी की गई है। रिपोर्टों में किन नेताओं के नाम? ईरानी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कथित सूची में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ, अमेरिकी सेंट्रल कमांड के कमांडर ब्रैड कूपर, इजरायल में अमेरिकी राजदूत माइक हकाबी, आईडीएफ प्रमुख एयाल जमीर और इजरायल के विदेश मंत्री गिदोन सार के नाम बताए गए हैं। ग्राफिक पोस्टर का भी दावा कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि एक ग्राफिक पोस्टर जारी किया गया, जिसमें डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू की तस्वीरों पर स्नाइपर के निशान दर्शाए गए, जबकि अन्य नेताओं को नारंगी रंग की जेल की वर्दी में दिखाया गया। इस ग्राफिक की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। मोजतबा खामेनेई के नाम से बयान का दावा रिपोर्टों के अनुसार, मोजतबा खामेनेई के नाम से जारी कथित संदेश में कहा गया कि "प्रतिशोध हमारे राष्ट्र की सामूहिक इच्छा है और इसे हर हाल में पूरा किया जाएगा।" हालांकि, इस बयान की भी किसी आधिकारिक या स्वतंत्र स्रोत से पुष्टि नहीं हुई है। बढ़ते तनाव के बीच सामने आए दावे ये दावे ऐसे समय सामने आए हैं जब अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव लगातार बढ़ रहा है। क्षेत्रीय सुरक्षा और समुद्री मार्गों को लेकर दोनों देशों के बीच बयानबाजी और तनाव जारी है। आधिकारिक पुष्टि का इंतजार फिलहाल ईरान सरकार, अमेरिकी प्रशासन या सूची में शामिल अन्य देशों की ओर से इन दावों पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। इसलिए इन रिपोर्टों को आधिकारिक पुष्टि होने तक दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
वॉशिंगटन: अमेरिका के वरिष्ठ रिपब्लिकन सीनेटर और पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी सहयोगी लिंडसे ग्राहम का 71 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनके कार्यालय के अनुसार, शनिवार शाम एक संक्षिप्त और अचानक आई बीमारी के बाद उनका निधन हुआ। बाद में शुरुआती मेडिकल जांच में मौत का कारण महाधमनी (एओर्टिक) डिसेक्शन बताया गया। ग्राहम के निधन के बाद अमेरिका और इजरायल के नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी, जबकि ईरान से जुड़े कुछ सरकारी मीडिया संस्थानों, सोशल मीडिया खातों और समर्थकों ने उनके निधन पर खुशी जाहिर की। ट्रंप और नेतन्याहू ने दी श्रद्धांजलि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने लिंडसे ग्राहम को "महान सीनेटर" और "सच्चा देशभक्त" बताते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि इजरायल ने अपना एक मजबूत मित्र खो दिया है। ईरान से जुड़े मीडिया प्लेटफॉर्म पर अलग प्रतिक्रिया ईरान से जुड़े कुछ समाचार प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया खातों ने ग्राहम के निधन पर जश्न जैसा रुख अपनाया। कुछ पोस्टों में उनके खिलाफ तीखी टिप्पणियां की गईं और उनके लंबे समय से ईरान विरोधी रुख का उल्लेख किया गया। सोशल मीडिया पर कुछ ईरान समर्थक खातों ने ग्राहम की तस्वीर वाला एक ग्राफिक भी साझा किया, जिसमें लाल "X" का निशान लगाया गया था। इन पोस्टों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। निर्वासित युवराज रजा पहलवी ने जताया दुख ईरान के निर्वासित युवराज रजा पहलवी ने ग्राहम के निधन पर दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि ग्राहम ईरानी जनता की स्वतंत्रता के समर्थक थे और लोकतंत्र समर्थक ईरानियों के बीच उनका सम्मान था। ईरान सरकार के मुखर आलोचक थे ग्राहम लिंडसे ग्राहम लंबे समय से ईरान की मौजूदा सरकार के आलोचक रहे थे। वे ईरान के खिलाफ कड़े अमेरिकी रुख के समर्थक माने जाते थे और कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ईरानी विपक्ष तथा लोकतांत्रिक बदलाव के समर्थन में बयान दे चुके थे। लंबे राजनीतिक करियर का हुआ अंत दक्षिण कैरोलिना से रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम 2002 से अमेरिकी सीनेट के सदस्य थे। इससे पहले वे अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के सदस्य भी रह चुके थे। विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा मामलों में उनकी सक्रिय भूमिका के कारण वे रिपब्लिकन पार्टी के प्रमुख नेताओं में गिने जाते थे। उनके निधन से अमेरिकी राजनीति में एक महत्वपूर्ण आवाज का अंत माना जा रहा है।
वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के बीच एक बड़ा दावा सामने आया है। रिपोर्टों के मुताबिक, इजरायल ने अमेरिका को ऐसी खुफिया जानकारी दी, जिसमें दावा किया गया कि ईरान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हत्या की साजिश रची है। बताया जा रहा है कि इसी इनपुट के बाद अमेरिका ने ईरान पर दोबारा सैन्य कार्रवाई तेज कर दी। इजरायल ने अमेरिका को क्या जानकारी दी? अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इजरायल ने वॉशिंगटन के साथ ऐसी खुफिया जानकारी साझा की, जिसमें कहा गया कि ईरान ट्रंप को निशाना बनाने की योजना पर काम कर रहा है। इसी इनपुट के बाद अमेरिका ने ईरान के खिलाफ अपने सैन्य अभियान को फिर से गति दी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस जानकारी का हवाला देते हुए ट्रंप प्रशासन पर ईरान के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने का दबाव बनाया। क्या इजरायल के इनपुट पर अमेरिका ने बढ़ाया हमला? हालांकि इस खुफिया जानकारी की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन कुछ अमेरिकी अधिकारियों ने आशंका जताई है कि यह इनपुट अमेरिका को अधिक आक्रामक कार्रवाई के लिए प्रेरित करने की रणनीति भी हो सकती है। इसके बावजूद अमेरिकी सेना ने ईरान पर अपने हमले तेज कर दिए हैं, जिससे क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है। ट्रंप ने भी जताया था जान का खतरा हाल ही में नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने भी सार्वजनिक रूप से कहा था कि उन्हें ईरान से अपनी जान को खतरा है। उन्होंने कहा था, "वे मुझे खत्म करना चाहते हैं। मैं उनकी हर सूची में शामिल हूं। अभी तक मैं भाग्यशाली रहा हूं, लेकिन यह हमेशा नहीं चल सकता।" अमेरिका-ईरान तनाव फिर चरम पर कुछ समय पहले दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम (सीजफायर) लागू हुआ था, लेकिन हालिया घटनाओं के बाद हालात फिर से बिगड़ गए हैं। अमेरिका ने ईरान के कई ठिकानों पर कार्रवाई की है, जबकि ईरान भी जवाबी कदम उठा रहा है। इससे पूरे पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने की आशंका है। खामेनेई के अंतिम संस्कार के बाद बढ़ी संवेदनशीलता इसी बीच ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को मशहद में सुपुर्द-ए-खाक किया गया। एक सप्ताह तक चले श्रद्धांजलि कार्यक्रमों के बाद उन्हें इमाम रजा दरगाह परिसर के पास दफनाया गया। अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया। विश्लेषकों का मानना है कि ईरान के नए राजनीतिक दौर और अमेरिका-ईरान तनाव के बीच आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया की स्थिति और अधिक संवेदनशील हो सकती है।
गढ़वा। भारत निर्वाचन आयोग के निर्देशानुसार झारखंड में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के तहत गढ़वा जिला तेजी से आगे बढ़ रहा है। जिला निर्वाचन पदाधिकारी सह उपायुक्त पशुपति नाथ मिश्रा की निगरानी में मतदाता सूची को अधिक शुद्ध, अद्यतन और त्रुटिरहित बनाने के लिए व्यापक अभियान चलाया जा रहा है। जिला प्रशासन का लक्ष्य 29 जुलाई 2026 तक सभी कार्य पूरे कर 5 अगस्त को अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन सुनिश्चित करना है। अभियान के तहत बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन, गणना प्रपत्रों का वितरण और आवश्यक दस्तावेजों का संकलन कर रहे हैं। अब तक जिले के दोनों विधानसभा क्षेत्रों के सभी 957 ईपी पार्ट्स का डाउनलोड और प्रिंट कार्य शत-प्रतिशत पूरा किया जा चुका है। इसके बाद गणना प्रपत्रों के वितरण का कार्य तेज गति से जारी है। डिजिटाइजेशन और सत्यापन भी तेजी से जारी जिला प्रशासन के अनुसार अब तक 7,50,779 गणना प्रपत्र, यानी कुल का 87.09 प्रतिशत, वितरित किए जा चुके हैं। इनमें 1,70,070 प्रपत्रों का डिजिटाइजेशन, 399 प्रपत्रों का ऑनलाइन सबमिशन और 1,69,671 प्रपत्रों का सफल सत्यापन पूरा हो चुका है। साथ ही 71,396 प्रपत्रों की मैपिंग और 95,957 प्रोजेनी मैपिंग भी पूरी कर ली गई है। गढ़वा विधानसभा क्षेत्र में कुल 4,26,661 मतदाताओं में से 3,43,836 प्रपत्र वितरित किए जा चुके हैं, जबकि भवनाथपुर विधानसभा क्षेत्र में 4,35,431 मतदाताओं के लिए 4,06,943 प्रपत्रों का वितरण किया जा चुका है। दोनों क्षेत्रों में डिजिटाइजेशन और सत्यापन का कार्य भी लगातार प्रगति पर है। उपायुक्त पशुपति नाथ मिश्रा ने सभी मतदाताओं से अपील की है कि बीएलओ के घर आने पर आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराएं, गणना प्रपत्र सही तरीके से भरें और समय पर जमा करें। उन्होंने कहा कि जनसहभागिता से ही शुद्ध, पारदर्शी और विश्वसनीय मतदाता सूची तैयार की जा सकती है, जो लोकतंत्र को और अधिक मजबूत बनाएगी।
रोम, एजेंसियां। इजरायल और लेबनान के बीच सीमा पर जारी तनाव को कम करने के उद्देश्य से अगले सप्ताह इटली की राजधानी रोम में नई शांति वार्ता आयोजित की जाएगी। यह बैठक 15 और 16 जुलाई को अमेरिकी मध्यस्थता में होगी, जिसमें दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल सुरक्षा और सीमा से जुड़े लंबित मुद्दों पर चर्चा करेंगे। सीमा सुरक्षा और संघर्ष विराम पर होगी चर्चा वार्ता में दोनों पक्ष सीमा पर स्थायी शांति, संघर्ष विराम के प्रभावी क्रियान्वयन, सुरक्षा व्यवस्था और विवादित क्षेत्रों से जुड़े मुद्दों पर विचार करेंगे। हाल के महीनों में दोनों देशों के बीच कई दौर की बातचीत हो चुकी है और रोम में होने वाली बैठक को उसी प्रक्रिया की अगली कड़ी माना जा रहा है। अमेरिका निभाएगा मध्यस्थ की भूमिका अमेरिका की मध्यस्थता में हो रही इस बैठक का उद्देश्य दोनों देशों के बीच विश्वास बहाल करना और सीमा पर हिंसा की घटनाओं को कम करना है। इटली सरकार ने भी इस वार्ता की मेजबानी का स्वागत करते हुए इसे क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है। शांति प्रक्रिया पर टिकी दुनिया की नजर विश्लेषकों का मानना है कि यदि रोम वार्ता सकारात्मक रहती है तो इजरायल-लेबनान सीमा पर लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, दोनों देशों के बीच कई संवेदनशील मुद्दे अब भी लंबित हैं, इसलिए इस बातचीत को चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।
Benjamin Netanyahu on India: इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने दावा किया है कि अमेरिका के अलावा भारत भी इजरायल का एक मजबूत और भरोसेमंद सहयोगी है। उन्होंने कहा कि 1.4 अरब आबादी वाले भारत से उन्हें व्यापक समर्थन मिल रहा है। नेतन्याहू का यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा था कि अमेरिका ही इजरायल का एकमात्र ताकतवर सहयोगी है। 'भारत से मिल रहा है जबरदस्त समर्थन' फॉक्स न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में नेतन्याहू ने कहा कि इजरायल के कई मित्र देश हैं और भारत उनमें प्रमुख है। उन्होंने कहा, "अमेरिका के अलावा हमारे और भी दोस्त हैं। भारत भी उनमें से एक है। 1.4 अरब आबादी वाले इस देश से हमें जबरदस्त समर्थन मिल रहा है।" नेतन्याहू ने यह भी दावा किया कि उन्हें सोशल मीडिया, विशेष रूप से फेसबुक पर भारतीयों का व्यापक समर्थन मिलता है। उन्होंने कहा कि उनके सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भारत से बड़ी संख्या में समर्थक जुड़े हुए हैं। भारत-इजरायल संबंधों का किया जिक्र इजरायली प्रधानमंत्री ने भारत और इजरायल के बीच मजबूत होते संबंधों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच वर्षों से रणनीतिक और मैत्रीपूर्ण संबंध रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपने रिश्तों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि दोनों नेताओं के बीच व्यक्तिगत स्तर पर भी अच्छे संबंध हैं। इसी वर्ष नेतन्याहू ने प्रधानमंत्री मोदी को अपना "पर्सनल फ्रेंड" बताया था और भारत को एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति (Global Power) कहा था। जेडी वेंस ने क्या कहा था? नेतन्याहू की यह टिप्पणी अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के उस बयान के बाद आई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ही इस समय ऐसे नेता हैं, जो पूरी मजबूती से इजरायल के साथ खड़े हैं। वेंस ने कहा था कि यदि वह इजरायल की सरकार में होते, तो अपने सबसे बड़े और ताकतवर सहयोगी अमेरिका की सार्वजनिक आलोचना नहीं करते। उन्होंने यह भी कहा कि पिछले कुछ महीनों में इजरायल की सुरक्षा के लिए इस्तेमाल किए जा रहे अधिकांश हथियार अमेरिका में बने हैं और उनका खर्च अमेरिकी करदाताओं के पैसे से उठाया गया है। पीएम मोदी के इजरायल दौरे का भी किया जिक्र रिपोर्ट के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फरवरी 2025 में इजरायल का दौरा किया था। उस दौरान उन्होंने कहा था कि भारत पूरी मजबूती और विश्वास के साथ इजरायल के साथ खड़ा है। यह बयान ऐसे समय आया था, जब कुछ दिनों बाद अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की थी, जिसके बाद पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ गया था। रणनीतिक साझेदारी लगातार मजबूत भारत और इजरायल के बीच रक्षा, कृषि, साइबर सुरक्षा, तकनीक, नवाचार और व्यापार समेत कई क्षेत्रों में सहयोग लगातार बढ़ रहा है। दोनों देश आतंकवाद विरोधी सहयोग और सामरिक साझेदारी को भी मजबूत करने पर लगातार काम कर रहे हैं। नेतन्याहू का ताजा बयान दोनों देशों के मजबूत होते संबंधों की एक और पुष्टि के तौर पर देखा जा रहा है।
तेल अवीव: इजराइल ने अमेरिकी मीडिया में प्रकाशित उस रिपोर्ट को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें दावा किया गया था कि अमेरिका-ईरान शांति वार्ता के दौरान ईरान के वरिष्ठ वार्ताकारों को निशाना बनाने की योजना बनाई जा रही थी। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के कार्यालय ने इस रिपोर्ट को "पूरी तरह झूठा" और "फेक न्यूज" करार दिया है। प्रधानमंत्री कार्यालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जारी बयान में कहा कि रिपोर्ट का वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। रिपोर्ट में क्या कहा गया था? अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स ने कुछ वर्तमान और पूर्व अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से दावा किया था कि इजराइल कथित तौर पर ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ को निशाना बनाने की योजना बना सकता था। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों नेता ईरान की ओर से युद्धविराम और शांति वार्ता में प्रमुख भूमिका निभा रहे थे। अमेरिका की चिंता का दावा रिपोर्ट में कहा गया था कि अप्रैल में चल रही वार्ताओं के दौरान अमेरिकी अधिकारियों को आशंका थी कि यदि ईरानी वार्ताकारों पर हमला हुआ तो शांति प्रक्रिया पूरी तरह पटरी से उतर सकती है और क्षेत्र में संघर्ष दोबारा तेज हो सकता है। इसी कारण अमेरिका ने कथित तौर पर क्षेत्र के कुछ देशों के माध्यम से ईरान को संभावित खतरे के प्रति सतर्क करने का प्रयास किया था। संघर्ष और खुफिया सहयोग को लेकर भी दावा रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि 28 फरवरी को शुरू हुए सैन्य अभियान में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और कई वरिष्ठ अधिकारियों की मौत हुई थी तथा इस अभियान में अमेरिकी खुफिया जानकारी का उपयोग किया गया। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र या आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ट्रंप-नेतन्याहू संबंधों का भी जिक्र रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि अमेरिका और इजराइल के करीबी संबंधों के बावजूद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जून 2026 के दौरान लेबनान और ईरान से जुड़े मुद्दों पर कई मौकों पर प्रधानमंत्री नेतन्याहू की सार्वजनिक आलोचना की थी। इसके आधार पर रिपोर्ट में संकेत दिया गया कि क्षेत्रीय तनाव और शांति वार्ता को लेकर दोनों सहयोगी देशों के बीच कुछ मतभेद उभर सकते हैं। इजराइल ने किया स्पष्ट इनकार इजराइली सरकार ने इन सभी दावों को पूरी तरह निराधार बताते हुए कहा कि रिपोर्ट में प्रकाशित जानकारी तथ्यात्मक रूप से गलत है और इसका वास्तविक घटनाओं से कोई संबंध नहीं है। फिलहाल इस मामले पर अमेरिका या ईरान की ओर से कोई नया आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
वॉशिंगटन,एजेंसियां। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने फोन पर बातचीत के दौरान जल्द अमेरिका में मुलाकात करने पर सहमति जताई है। दोनों नेताओं के बीच होने वाली बैठक में ईरान, पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति और क्षेत्रीय सहयोग प्रमुख मुद्दे रहेंगे। ईरान और क्षेत्रीय सुरक्षा रहेगा मुख्य एजेंडा सूत्रों के अनुसार, बैठक में ईरान के परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों और हाल के तनावपूर्ण घटनाक्रमों पर विस्तार से चर्चा होगी। दोनों देश पश्चिम एशिया में स्थिरता बनाए रखने और सुरक्षा सहयोग को और मजबूत करने पर भी विचार करेंगे। अमेरिका-इजरायल संबंधों को मिलेगी नई दिशा हाल के सप्ताहों में दोनों देशों के बीच कुछ मुद्दों पर मतभेद की खबरें सामने आई थीं, लेकिन ताजा बातचीत के बाद दोनों नेताओं ने रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने की प्रतिबद्धता दोहराई है। माना जा रहा है कि यह बैठक क्षेत्रीय कूटनीति और भविष्य की संयुक्त रणनीति तय करने में अहम साबित हो सकती है।
तेहरान/वॉशिंगटन: इजरायल और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच एक अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट में बड़ा दावा किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच अंतरिम शांति समझौते पर बातचीत के दौरान इजरायल कथित तौर पर ईरान के शीर्ष वार्ताकारों को निशाना बनाने की योजना पर काम कर रहा था। हालांकि, इन दावों की किसी भी पक्ष ने आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में बड़ा दावा अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स ने वर्तमान और पूर्व अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से दावा किया है कि ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघचीऔर संसद के स्पीकर मोहम्मद बाकर गालिबाफ कथित तौर पर इजरायल की टारगेट लिस्ट में शामिल थे। दोनों नेता युद्धविराम और शांति वार्ता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका को आशंका थी कि यदि इन नेताओं पर हमला होता है तो शांति वार्ता पूरी तरह विफल हो सकती है। अमेरिका ने जताई थी चिंता रिपोर्ट में कहा गया है कि अप्रैल में शुरू हुई वार्ताओं के दौरान वॉशिंगटन ने क्षेत्र के कुछ मित्र देशों के जरिए ईरान को संभावित सुरक्षा खतरे की जानकारी भी पहुंचाई थी। अमेरिकी अधिकारियों को डर था कि वार्ता में शामिल नेताओं पर किसी भी तरह का हमला पूरे कूटनीतिक प्रयास को पटरी से उतार सकता है। ईरानी नेतृत्व को निशाना बनाने की रणनीति का दावा रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ईरान के शीर्ष नेताओं को निशाना बनाना युद्ध की शुरुआत से ही इजरायल की कथित रणनीति का हिस्सा रहा है। दावे के मुताबिक, इजरायल की सूची में वरिष्ठ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिकारी अली लारीजानी और पूर्व विदेश मंत्री कमाल खराजी जैसे अन्य प्रमुख नेताओं के नाम भी शामिल थे। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। पाकिस्तान यात्रा के दौरान भी सुरक्षा का खतरा रिपोर्ट के अनुसार, इसी वर्ष अप्रैल में जब अब्बास अराघची और मोहम्मद बाकर गालिबाफ वार्ता के सिलसिले में इस्लामाबाद पहुंचे थे, तब भी उनकी सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता बनी हुई थी। बताया गया है कि पाकिस्तान ने ईरानी प्रतिनिधिमंडल के विमान को अपने लड़ाकू विमानों की सुरक्षा उपलब्ध कराई थी। वापसी के दौरान ईरानी सुरक्षा एजेंसियों ने कथित खुफिया सूचना के आधार पर विमान को संभावित खतरे की चेतावनी दी। तेहरान की जगह मशहद में उतारा गया विमान रिपोर्ट में दावा किया गया है कि संभावित सुरक्षा खतरे को देखते हुए ईरानी विमान को तेहरान के बजाय मशहद हवाई अड्डे पर उतारा गया। इसके बाद प्रतिनिधिमंडल ने सड़क मार्ग से करीब आठ घंटे की यात्रा कर तेहरान पहुंचकर अपना सफर पूरा किया। आधिकारिक पुष्टि नहीं रिपोर्ट में किए गए सभी दावों की अब तक स्वतंत्र या आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। न तो इजरायल, न अमेरिका और न ही ईरान की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया जारी की गई है। ऐसे में इन दावों को फिलहाल मीडिया रिपोर्ट के तौर पर ही देखा जा रहा है।
यरुशलम/नई दिल्ली: Sharren Haskel ने कहा है कि ईरान पर भरोसा करना आसान नहीं है और भारत सहित सभी लोकतांत्रिक देशों को सतर्क रहना चाहिए। उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु एवं क्षेत्रीय तनाव से जुड़े मुद्दों पर बातचीत जारी है। अमेरिका-ईरान वार्ता पर जताया संदेह समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, शैरेन हैस्केल ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए अमेरिका-ईरान वार्ता से बहुत अधिक उम्मीद नहीं की जा सकती। उन्होंने ईरान को एक आक्रामक शासन बताते हुए कहा कि केवल बातचीत पर्याप्त नहीं है, बल्कि भरोसा तभी कायम हो सकता है जब उसके व्यवहार में वास्तविक बदलाव दिखाई दे। इजराइल लंबे समय से लगाता रहा है आरोप इजराइल लगातार ईरान पर आरोप लगाता रहा है कि वह पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ाने, विभिन्न सशस्त्र समूहों का समर्थन करने और अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। दूसरी ओर, ईरान इन आरोपों को खारिज करता रहा है और कहता है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है तथा इजराइल क्षेत्रीय तनाव बढ़ाने के लिए जिम्मेदार है। दोनों देशों के बीच तनाव 1979 की Iranian Revolution के बाद से लगातार बना हुआ है और हाल के वर्षों में कई बार सैन्य टकराव भी देखने को मिले हैं। भारत का संतुलित रुख भारत ने अब तक पश्चिम एशिया के मुद्दों पर संतुलित और स्वतंत्र विदेश नीति अपनाई है। भारत के इजराइल के साथ रक्षा, कृषि और प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में मजबूत संबंध हैं। वहीं ईरान भारत की ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं के लिए महत्वपूर्ण साझेदार बना हुआ है। इसी कारण भारत दोनों देशों के साथ अपने संबंध बनाए रखते हुए किसी एक पक्ष का खुला समर्थन करने से बचता रहा है। वैश्विक नजर अमेरिका-ईरान वार्ता पर अमेरिका और ईरान के बीच चल रही वार्ता का उद्देश्य क्षेत्रीय तनाव कम करना और परमाणु कार्यक्रम से जुड़े विवादों का समाधान तलाशना है। इजराइल लगातार इस प्रक्रिया को लेकर अपनी आशंकाएं व्यक्त करता रहा है। शैरेन हैस्केल का ताजा बयान भी इसी नीति को दोहराता है कि स्थायी भरोसे के लिए केवल कूटनीतिक बातचीत नहीं, बल्कि ईरान के व्यवहार में ठोस बदलाव आवश्यक है।
तेहरान: ईरान की संसद के अध्यक्ष Mohammad Bagher Ghalibaf ने दावा किया है कि इजरायल किसी भी कीमत पर ईरान और अमेरिका के बीच हुए हालिया समझौते को सफल नहीं होने देना चाहता। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अमेरिकी प्रशासन के भीतर भी इस समझौते को लेकर मतभेद मौजूद हैं। स्विट्जरलैंड की यात्रा से लौटने के बाद एक टीवी इंटरव्यू में गालिबाफ ने कहा कि तेहरान और वॉशिंगटन के बीच हुए 14 बिंदुओं वाले "इस्लामाबाद समझौते" को लागू करने की कोशिश की जा रही है, लेकिन इजरायल इसके रास्ते में बाधा डाल रहा है। 'इजरायल समझौते से घबराया हुआ है' ईरानी समाचार एजेंसी ISNA के अनुसार, गालिबाफ ने कहा कि यह समझौता लेबनान में युद्ध समाप्त करने, विस्थापित लोगों की वापसी सुनिश्चित करने और कब्जे वाले क्षेत्रों से सेना हटाने जैसे प्रावधानों पर आधारित है। उन्होंने आरोप लगाया कि इजरायल इस समझौते का विरोध इसलिए कर रहा है क्योंकि यह उसके और अमेरिका के लिए "हार का दस्तावेज" साबित होगा। गालिबाफ ने कहा कि समझौते पर सहमति बनने के बाद इजरायल ने लेबनान में अपनी सैन्य गतिविधियां तेज कर दीं, ताकि समझौते के क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न हो। लेबनान की संप्रभुता पर दिया जोर ईरानी संसद अध्यक्ष ने कहा कि समझौते के अनुसार लेबनान की सुरक्षा की जिम्मेदारी वहां की सरकार के पास होगी और देश की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सीमाओं का सम्मान किया जाएगा। उन्होंने कहा कि विस्थापित नागरिकों को अपने घर लौटने का अधिकार मिलना चाहिए और कब्जा किए गए इलाकों से सैन्य बलों की वापसी होनी चाहिए। 'अमेरिकी प्रशासन के भीतर भी मतभेद' गालिबाफ ने दावा किया कि समझौते को लेकर अमेरिकी प्रशासन के भीतर भी अलग-अलग राय है। उन्होंने अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio और उपराष्ट्रपति JD Vance का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों की प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं। उनके अनुसार, हाल के दिनों में अमेरिकी अधिकारियों की कुछ गतिविधियां इस समझौते की भावना के अनुरूप नहीं थीं। दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं ईरान की ओर से किए गए इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। अमेरिका या इजरायल की ओर से भी इस संबंध में तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। क्षेत्र में जारी तनाव के बीच अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच कूटनीतिक और सुरक्षा संबंधी घटनाक्रमों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी हुई है।
यरुशलम: Benjamin Netanyahu ने ईरान को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि आवश्यकता पड़ी तो इजरायल दोबारा सैन्य कार्रवाई करने से नहीं हिचकेगा। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय तनाव को लेकर कूटनीतिक बातचीत जारी है। तुर्की की सरकारी समाचार एजेंसी अनादोलु के अनुसार, एक इंटरव्यू में नेतन्याहू ने कहा कि इजरायल अपनी सुरक्षा के मामले में किसी अन्य देश पर निर्भर नहीं रहेगा और ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाने को तैयार है। 'जरूरत पड़ी तो तीसरी बार भी करेंगे कार्रवाई' नेतन्याहू ने दावा किया कि ईरान के खिलाफ पहले की गई सैन्य कार्रवाइयों ने इजरायल को संभावित परमाणु खतरे से बचाया। उन्होंने कहा कि यदि इजरायल की सुरक्षा को फिर से खतरा महसूस हुआ, तो ईरान के खिलाफ एक और सैन्य अभियान शुरू किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इजरायल अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में स्वतंत्र रूप से निर्णय लेगा और किसी भी संभावित खतरे का जवाब देने के लिए तैयार रहेगा। अमेरिका-ईरान वार्ता के बीच बढ़ा तनाव नेतन्याहू का बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने और परमाणु मुद्दों पर सहमति बनाने के प्रयास जारी हैं। दोनों पक्ष संघर्षविराम को व्यापक राजनीतिक समझौते में बदलने की दिशा में बातचीत कर रहे हैं। इन वार्ताओं में क्षेत्रीय सुरक्षा, प्रतिबंधों में संभावित राहत और परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दे प्रमुख एजेंडे में शामिल हैं। इजरायल ने दोहराया अपना रुख इजरायल पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि वह ऐसे किसी भी समझौते से स्वयं को बाध्य नहीं मानेगा, जो उसकी दृष्टि में ईरान की सैन्य या परमाणु क्षमताओं को बढ़ावा देता हो। इजरायली नेतृत्व का कहना है कि देश की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और आवश्यकता पड़ने पर वह एकतरफा कार्रवाई करने का अधिकार सुरक्षित रखता है। ट्रंप ने संयम बरतने की अपील की वहीं, Donald Trump ने सार्वजनिक रूप से सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। उन्होंने कहा है कि पश्चिम एशिया में दोबारा सैन्य तनाव बढ़ना किसी के हित में नहीं होगा और कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
मुंबई,एजेंसियां। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में बुधवार को हुई भारी बारिश ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित कर दिया। लगातार हो रही बारिश के कारण कई निचले इलाकों में जलभराव की स्थिति बन गई, जिससे सड़क यातायात बाधित रहा और लोगों को आवागमन में भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। अंधेरी सबवे में करीब पांच फीट पानी भर जाने के कारण प्रशासन को एहतियातन इसे यातायात के लिए बंद करना पड़ा। लोकल ट्रेन सेवा पर पड़ा असर भारी बारिश का असर मुंबई की लाइफलाइन कही जाने वाली लोकल ट्रेन सेवा पर भी देखने को मिला। वेस्टर्न, सेंट्रल और हार्बर लाइन की कई ट्रेनें देरी से चलीं। हार्बर लाइन पर ओवरहेड इलेक्ट्रिक (OHE) वायर में तकनीकी खराबी आने से कई लोकल ट्रेनें बीच रास्ते में ही रुक गईं। सुबह के व्यस्त समय में आई इस समस्या से हजारों यात्रियों को परेशानी उठानी पड़ी। रेलवे की तकनीकी टीम ने मौके पर पहुंचकर मरम्मत कार्य शुरू किया, जिसके बाद धीरे-धीरे सेवाएं सामान्य करने का प्रयास किया गया। बालकनी गिरने से व्यक्ति की मौत दक्षिण मुंबई के बाबुलनाथ रोड स्थित MHADA की 'सूर्यप्रकाश' इमारत में मंगलवार देर रात तीसरी मंजिल की बालकनी का एक हिस्सा अचानक गिर गया। हादसे में 51 वर्षीय संतोष रामचंद्र भारस्कर गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। घटना के बाद फायर ब्रिगेड, पुलिस, एम्बुलेंस और नगर निगम की टीम मौके पर पहुंची तथा सुरक्षा के मद्देनजर आवश्यक कदम उठाए गए। कई जिलों में ऑरेंज अलर्ट भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने मुंबई, ठाणे, पालघर, रायगढ़, रत्नागिरी और सिंधुदुर्ग जिलों के लिए ऑरेंज अलर्ट जारी किया है। विभाग ने अगले चार से पांच दिनों तक भारी बारिश, तेज हवाओं और कुछ स्थानों पर बिजली गिरने की चेतावनी दी है। प्रशासन ने नागरिकों से अनावश्यक यात्रा से बचने, जलभराव वाले क्षेत्रों से दूर रहने और मौसम विभाग की सलाह का पालन करने की अपील की है। वहीं, रेलवे, नगर निगम और आपदा प्रबंधन विभाग को किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए अलर्ट मोड पर रखा गया है।
वॉशिंगटन/बेरूत: पश्चिम एशिया में शांति स्थापित करने की कोशिशों को बड़ा झटका लगा है। अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी शांति समझौते को अंतिम रूप देने के लिए स्विट्जरलैंड में प्रस्तावित उच्चस्तरीय वार्ता फिलहाल टल गई है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने अपना स्विट्जरलैंड दौरा रद्द कर दिया है। इस बीच इजरायल ने दक्षिणी लेबनान में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर हवाई हमले तेज कर दिए हैं, जिनमें कम से कम 16 लोगों की मौत हो गई है। ताजा घटनाक्रम ने अमेरिका-ईरान शांति पहल और पश्चिम एशिया में युद्धविराम की उम्मीदों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वर्साय समझौते के बाद भी नहीं रुके इजरायली हमले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की मौजूदगी में बुधवार को फ्रांस के वर्साय महल में अमेरिका और ईरान के बीच एक प्रारंभिक 14-सूत्रीय समझौता हुआ था। इस समझौते का उद्देश्य पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को रोकना और सभी मोर्चों पर तत्काल सैन्य कार्रवाई समाप्त करना था। समझौते के कुछ ही घंटों बाद इजरायली सेना ने दक्षिणी लेबनान में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर ताबड़तोड़ हवाई हमले शुरू कर दिए। इन हमलों में 16 लोगों के मारे जाने की खबर है। नेतन्याहू ने पीछे हटने से किया इनकार इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक हिजबुल्लाह का खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता, तब तक इजरायली सेना लेबनान में अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रखेगी। नेतन्याहू के इस रुख ने युद्धविराम और क्षेत्रीय शांति की संभावनाओं को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। स्विट्जरलैंड में होने वाली तकनीकी वार्ता टली अमेरिका और ईरान के बीच हुए प्रारंभिक समझौते को स्थायी शांति समझौते में बदलने के लिए शुक्रवार को स्विट्जरलैंड के बुर्गेनस्टॉक रिसॉर्ट में तकनीकी स्तर की वार्ता प्रस्तावित थी। इस बैठक का नेतृत्व अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को करना था, लेकिन उन्होंने अपना स्विट्जरलैंड दौरा रद्द कर दिया, जिसके बाद यह वार्ता अनिश्चितकाल के लिए टाल दी गई। व्हाइट हाउस ने बताई 'लॉजिस्टिक्स' समस्या व्हाइट हाउस ने जेडी वेंस का दौरा रद्द होने के पीछे व्यवस्थागत और लॉजिस्टिक्स संबंधी कारणों का हवाला दिया है। हिजबुल्लाह समर्थक मीडिया संस्थान अल-मायादीन की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने लेबनान पर इजरायल के लगातार हो रहे हमलों के विरोध में अपने प्रतिनिधिमंडल को स्विट्जरलैंड भेजने से इनकार कर दिया है। इजरायल को जेडी वेंस की दोटूक चेतावनी शांति समझौते के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इजरायल को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि इस समय दुनिया में केवल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ही ऐसे नेता हैं जो इजरायल के प्रति सबसे अधिक सहानुभूति रखते हैं। वेंस के बयान को इजरायल के आक्रामक सैन्य रुख पर अमेरिकी असंतोष और युद्ध रोकने के बढ़ते दबाव के रूप में देखा जा रहा है। अधर में लटका 60 दिनों का युद्धविराम बुधवार को हुए समझौते के तहत कम-से-कम 60 दिनों के लिए संघर्षविराम बढ़ाने पर सहमति बनी थी। लेकिन लेबनान में जारी इजरायली हमलों और स्विट्जरलैंड वार्ता के टलने से पूरा शांति समझौता संकट में पड़ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लेबनान में हिंसा नहीं रुकी, तो पश्चिम एशिया में शांति स्थापित करने की यह बड़ी कूटनीतिक पहल पूरी तरह विफल हो सकती है। पश्चिम एशिया में फिर बढ़ा अनिश्चितता का माहौल अमेरिका-ईरान समझौते के बावजूद लेबनान में जारी संघर्ष और इजरायल के सख्त रुख ने क्षेत्र में तनाव को फिर बढ़ा दिया है। अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच कोई नया कूटनीतिक रास्ता निकलेगा या पश्चिम एशिया एक बार फिर व्यापक संघर्ष की ओर बढ़ेगा।
वॉशिंगटन: लेबनान की राजधानी बेरूत पर इजराइली हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। ट्रंप ने इजराइल और ईरान दोनों को चेतावनी देते हुए कहा कि पश्चिम एशिया में शांति स्थापित करने के प्रयास निर्णायक चरण में हैं और ऐसे समय में किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई से बचना चाहिए। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर पोस्ट करते हुए कहा, “आज सुबह बेरूत पर हुआ हमला नहीं होना चाहिए था, खासकर ऐसे दिन जब हम ईरान के साथ शांति समझौते के बहुत करीब हैं।” ‘इजराइल को आत्मरक्षा का अधिकार, लेकिन जवाबी हमला बेमतलब था’ ट्रंप ने कहा कि इजराइल को अपनी सुरक्षा और खतरों से बचाव का पूरा अधिकार है, लेकिन जिस घटना के जवाब में यह हमला किया गया, उसमें कोई घायल या हताहत नहीं हुआ था। ऐसे में इस तरह की सैन्य कार्रवाई की आवश्यकता नहीं थी। उन्होंने कहा, “इजराइल को अपने नागरिकों की रक्षा करने का अधिकार है, लेकिन इस मामले में की गई जवाबी कार्रवाई बेमतलब थी।” ‘अब आगे कोई हमला नहीं होना चाहिए’ अमेरिकी राष्ट्रपति ने सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील करते हुए कहा कि क्षेत्र में शांति स्थापित करने के लिए सभी पक्षों को पीछे हटना होगा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न केवल इजराइल को लेबनान में आगे कोई हमला नहीं करना चाहिए, बल्कि हिज्बुल्ला और अन्य संगठनों को भी इजराइल के खिलाफ किसी प्रकार की सैन्य कार्रवाई से बचना चाहिए। ट्रंप ने लिखा, “हम एक ऐसे समझौते के बेहद करीब हैं, जो लेबनान समेत पूरे क्षेत्र में शांति ला सकता है। सभी पक्षों को पीछे हटना चाहिए। इजराइल को लेबनान में और हमले नहीं करने चाहिए और हिज्बुल्ला समेत किसी भी अन्य पक्ष को भी इजराइल पर हमला नहीं करना चाहिए।”
बेरूत: पश्चिम एशिया में तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। इजराइल की सेना (IDF) ने रविवार को लेबनान की राजधानी बेरूत में हिज्बुल्ला से जुड़े ठिकानों पर हवाई हमले किए। इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के कार्यालय ने कहा कि यह कार्रवाई उत्तरी इजराइल पर हिज्बुल्ला के हालिया हमलों के जवाब में की गई है। इजराइली सेना के मुताबिक, हमलों का निशाना हिज्बुल्ला से संबंधित सैन्य ढांचे और रणनीतिक ठिकाने थे। इससे पहले भी इजराइल ने एक सप्ताह पूर्व बेरूत के दक्षिणी उपनगरों पर हमला किया था, जिसके बाद क्षेत्रीय तनाव और बढ़ गया था। हिज्बुल्ला के मिसाइल हमलों के बाद बढ़ा तनाव हिज्बुल्ला ने दो मार्च को उत्तरी इजराइल पर कई मिसाइलें दागी थीं। यह हमला अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के खिलाफ की गई सैन्य कार्रवाई के दो दिन बाद हुआ था। हिज्बुल्ला ने इन हमलों को क्षेत्रीय आक्रामकता के खिलाफ जवाबी कदम बताया था। इजराइल का कहना है कि वह अपनी सुरक्षा और नागरिकों की रक्षा के लिए आवश्यक सभी कदम उठाने के लिए प्रतिबद्ध है और सीमा पार से होने वाले हमलों का कड़ा जवाब दिया जाएगा। ईरान ने रखी नई शर्त हिज्बुल्ला के प्रमुख समर्थक ईरान ने कहा है कि अमेरिका-ईरान युद्धविराम समझौते में लेबनान में इजराइली सैन्य अभियानों को रोकना भी शामिल होना चाहिए। तेहरान का कहना है कि यदि लेबनान में हमले जारी रहते हैं, तो क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करना मुश्किल होगा। अमेरिका-ईरान युद्धविराम पर पाकिस्तान का दावा इस बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान पश्चिम एशिया में युद्ध समाप्त करने के लिए एक अंतिम मसौदा समझौते की शर्तों पर सहमत हो गए हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने मध्यस्थता की कोशिशों में भूमिका निभाई है और दोनों देशों के साथ आगे की प्रक्रिया पर काम कर रहा है। गौरतलब है कि अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के खिलाफ 28 फरवरी को शुरू किए गए सैन्य अभियान के बाद पूरे पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ गई थी। इस संघर्ष के कारण फारस की खाड़ी से तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति भी गंभीर रूप से प्रभावित हुई। सात अप्रैल से दोनों पक्षों के बीच युद्धविराम लागू है, लेकिन इजराइल-हिज्बुल्ला तनाव के चलते क्षेत्र में हालात अब भी नाजुक बने हुए हैं।
Donald Trump की अपील के बावजूद Pakistan ने साफ कर दिया है कि वह फिलहाल Abraham Accords का हिस्सा नहीं बनेगा। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री Khawaja Asif ने कहा कि इस्लामाबाद ऐसा कोई समझौता स्वीकार नहीं करेगा, जो देश की “मूल विचारधारा” के खिलाफ हो। ट्रंप ने मुस्लिम देशों से की थी अपील मिडिल ईस्ट में नए कूटनीतिक समीकरण बनाने की कोशिश कर रहे ट्रंप ने हाल ही में कई मुस्लिम और अरब देशों से अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होने की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि ईरान के साथ संभावित समझौते के बाद मध्य पूर्व में स्थायी शांति का नया दौर शुरू हो सकता है। ट्रंप ने Saudi Arabia, Qatar, पाकिस्तान, Turkey, Egypt, Jordan और Bahrain जैसे देशों से इस समझौते में शामिल होने की अपील की थी। पाकिस्तान ने क्या कहा? पाकिस्तानी चैनल समा टीवी को दिए इंटरव्यू में ख्वाजा आसिफ ने कहा कि पाकिस्तान ऐसे किसी समझौते में शामिल नहीं होगा, जो उसकी बुनियादी विचारधारा से टकराता हो। उन्होंने कहा, “हमारा रुख पूरी तरह साफ है। यह हमारे लिए स्वीकार्य नहीं है।” आसिफ ने इजरायल के साथ किसी संभावित समझौते पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि “आप उन लोगों के साथ कैसे बैठ सकते हैं, जिनकी बात पर एक दिन के लिए भी भरोसा नहीं किया जा सकता?” उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान दुनिया के उन गिने-चुने देशों में है, जिसके पासपोर्ट पर इजरायल का नाम तक नहीं लिखा जाता। सऊदी अरब भी अपने रुख पर कायम सऊदी अरब ने भी अपने पुराने रुख को दोहराते हुए कहा है कि जब तक फिलिस्तीन को मान्यता नहीं मिलती, वह इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने पर आगे नहीं बढ़ेगा। रिपोर्टों के मुताबिक, रियाद का कहना है कि फिलिस्तीन मुद्दे का समाधान उसकी पहली प्राथमिकता है। ट्रंप ने दी थी चेतावनी ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा था कि अगर ईरान के साथ समझौता सफल नहीं हुआ तो क्षेत्र फिर बड़े संघर्ष की ओर बढ़ सकता है। उन्होंने इसे “मध्य पूर्व के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण समझौता” बताते हुए कहा कि अमेरिका अब्राहम अकॉर्ड्स का दायरा और बढ़ाना चाहता है। ट्रंप ने यहां तक संकेत दिया कि भविष्य में ईरान भी इस ढांचे का हिस्सा बन सकता है। क्या है अब्राहम अकॉर्ड्स? अब्राहम अकॉर्ड्स 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता में हुए समझौते हैं, जिनके तहत कई अरब देशों ने इजरायल के साथ राजनयिक और आर्थिक संबंध सामान्य किए थे। United Arab Emirates और बहरीन इस समझौते को स्वीकार करने वाले पहले देश थे। बाद में मोरक्को और सूडान जैसे देश भी इससे जुड़े। ट्रंप का दावा है कि इससे क्षेत्रीय व्यापार, निवेश और सुरक्षा सहयोग को बढ़ावा मिला है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने एक बड़ा कदम उठाते हुए अपने सहयोगी देशों को 8.6 अरब डॉलर से ज्यादा के हथियार बेचने की मंजूरी दे दी है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब ईरान के साथ जारी टकराव ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है। किन देशों को मिलेंगे हथियार? अमेरिकी विदेश विभाग की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, जिन देशों को यह सैन्य उपकरण दिए जाएंगे, उनमें शामिल हैं: इजरायल कतर कुवैत संयुक्त अरब अमीरात ये सभी देश लंबे समय से अमेरिका के रणनीतिक सहयोगी रहे हैं और क्षेत्रीय सुरक्षा में अहम भूमिका निभाते हैं। युद्ध और व्यापार साथ-साथ ईरान के साथ संघर्ष में अमेरिका अब तक करीब 25 अरब डॉलर (लगभग 2.37 लाख करोड़ रुपये) खर्च कर चुका है। यह खर्च मुख्य रूप से: गोला-बारूद मिसाइल सिस्टम ड्रोन सैन्य तैनाती पर हुआ है। इस दौरान अमेरिका को हाईटेक हथियारों और डिफेंस सिस्टम के नुकसान का भी सामना करना पड़ा। ऐसे में हथियारों की यह बिक्री एक तरह से उस आर्थिक नुकसान की भरपाई के रूप में देखी जा रही है। डर बना हथियार बाजार की वजह ईरान के हमलों ने इन देशों की सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर कर दिया। रिपोर्ट्स के अनुसार: मिसाइल और ड्रोन हमलों को रोकने में कई डिफेंस सिस्टम पूरी तरह सफल नहीं रहे सैन्य ठिकानों और ऊर्जा प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचा “स्वार्म अटैक” (एक साथ कई हमले) से रक्षा तंत्र पर दबाव बढ़ा इन हालातों ने मिडिल ईस्ट के देशों को अपनी रक्षा क्षमता मजबूत करने के लिए मजबूर कर दिया। THAAD और पैट्रियट भी पड़े कमजोर? इन देशों ने THAAD और Patriot Missile System जैसे एडवांस्ड डिफेंस सिस्टम का इस्तेमाल किया, लेकिन ईरान के कुछ हमलों को रोकने में ये भी पूरी तरह सफल नहीं रहे। इससे यह साफ हुआ कि आधुनिक युद्ध में पारंपरिक रक्षा सिस्टम को और अपग्रेड करने की जरूरत है। अस्थायी शांति, लेकिन खतरा बरकरार अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष अब नौवें सप्ताह में पहुंच चुका है। हालांकि, 8 अप्रैल से एक नाजुक युद्धविराम लागू है, लेकिन हालात अब भी तनावपूर्ण बने हुए हैं। ऐसे में मिडिल ईस्ट के देश: भविष्य के हमलों के लिए तैयार हो रहे हैं अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहे हैं अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग मजबूत कर रहे हैं ट्रंप का दावा और सख्त रुख डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि यह कदम परमाणु खतरे को रोकने के लिए जरूरी था। उन्होंने दावा किया कि: ईरान की सैन्य क्षमता कमजोर हो चुकी है उसके कई डिफेंस सिस्टम नष्ट हो चुके हैं यह कार्रवाई मिडिल ईस्ट और यूरोप को सुरक्षित रखने के लिए की गई दोहरा फायदा: रणनीति और कारोबार विशेषज्ञों के अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका को दोहरा फायदा हुआ है: ईरान पर दबाव बनाकर उसे कमजोर करना सहयोगी देशों को हथियार बेचकर आर्थिक लाभ कमाना यानी, युद्ध के माहौल ने हथियारों के बाजार को और तेज कर दिया है।
व्हाइट हाउस में बातचीत के बाद सीजफायर बढ़ाने की घोषणा अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि इजरायल और लेबनान के बीच चल रहे संघर्ष में लागू सीजफायर को तीन सप्ताह के लिए बढ़ा दिया गया है। यह फैसला व्हाइट हाउस में हुई उच्चस्तरीय वार्ता के बाद लिया गया बताया जा रहा है, जिसमें दोनों देशों के राजदूतों की मुलाकात भी शामिल थी। ट्रंप ने कहा कि बातचीत “सकारात्मक और सफल” रही, हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इस प्रक्रिया में हिज़्बुल्लाह की भूमिका एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। दशकों बाद सीधी बातचीत, लेकिन तनाव अभी भी कायम रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह पहली बार है जब इजरायल और लेबनान के बीच दशकों बाद सीधे कूटनीतिक बातचीत हुई है। दोनों देश औपचारिक रूप से लंबे समय से युद्ध की स्थिति में माने जाते रहे हैं। पहले लागू 10 दिनों के अस्थायी सीजफायर की समय सीमा सोमवार को खत्म होनी थी, लेकिन अब इसे तीन हफ्ते और बढ़ा दिया गया है। ट्रंप का बयान: “इजरायल को आत्मरक्षा का अधिकार है” व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि इजरायल को आत्मरक्षा का पूरा अधिकार है, खासकर तब जब उस पर हमला हो। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने के लिए आगे भी बातचीत जारी रहेगी और अमेरिका इस प्रक्रिया में सहयोग करेगा। लेबनान और इजरायल के बीच शांति की उम्मीद लेबनान और इजरायल के राजनयिकों ने इस बातचीत को सकारात्मक बताया है। लेबनान के प्रतिनिधियों ने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में दोनों देशों के बीच स्थायी शांति की दिशा में प्रगति हो सकती है। लेबनान के नेतृत्व ने संकेत दिया है कि भविष्य की बातचीत में सीमा विवाद, सैनिकों की वापसी और युद्ध के बाद पुनर्निर्माण जैसे मुद्दे शामिल होंगे। हिज़्बुल्लाह बना सबसे बड़ी चुनौती हालांकि, इस कूटनीतिक पहल के बीच हिज़्बुल्लाह एक प्रमुख बाधा के रूप में सामने है। संगठन ने अब तक इस बातचीत का हिस्सा बनने से इनकार किया है और किसी भी समझौते को मानने से भी इंकार किया है। इजरायल का कहना है कि जब तक हिज़्बुल्लाह का प्रभाव कम नहीं होता, तब तक क्षेत्र में स्थायी शांति मुश्किल है। युद्ध और मानवीय संकट का गंभीर असर इस संघर्ष का सबसे बड़ा असर लेबनान की जनता पर पड़ा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले युद्ध में हजारों लोगों की मौत हुई है, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। इसके अलावा, लाखों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं, जिससे मानवीय संकट और गहरा गया है। शांति की दिशा में कदम, लेकिन चुनौतियां बरकरार इजरायल और लेबनान के बीच सीधी बातचीत और सीजफायर विस्तार को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक कदम माना जा रहा है। हालांकि, हिज़्बुल्लाह की भूमिका, क्षेत्रीय तनाव और पुराना युद्ध इतिहास इस प्रक्रिया को अभी भी जटिल बनाए हुए हैं।
तेहरान: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने अमेरिका और इजरायल पर गंभीर आरोप लगाते हुए पड़ोसी देशों से अहम अपील की है। ईरान का कहना है कि अमेरिका और इजरायल क्षेत्र में अस्थिरता फैला रहे हैं और उन्हें यहां के लोगों की सुरक्षा से कोई मतलब नहीं है। ‘हमले के लिए अपनी जमीन न दें’ ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने साफ कहा कि पड़ोसी देश अपनी जमीन, समुद्र या हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई के लिए न होने दें। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि कुछ देशों ने “अनजाने में” अपनी सुविधाओं का गलत इस्तेमाल होने दिया है, जिसे तुरंत रोका जाना चाहिए। ‘अमेरिका-इजरायल से शांति को खतरा’ ईरान का आरोप है कि पिछले 40 दिनों की घटनाओं ने यह साबित कर दिया है कि अमेरिका और इजरायल की नीतियां क्षेत्र में शांति के बजाय तनाव बढ़ाने वाली हैं। तेहरान ने दोहराया कि वह अपने पड़ोसियों के साथ अच्छे संबंध और संप्रभुता के सम्मान में विश्वास रखता है, लेकिन किसी भी तरह की सैन्य साझेदारी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। पाकिस्तान के जरिए बातचीत की कोशिश तनाव के बीच कूटनीतिक प्रयास भी तेज हो गए हैं। पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर तेहरान पहुंचे, जहां उनकी मुलाकात ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से हुई। बताया जा रहा है कि पाकिस्तान, वॉशिंगटन और तेहरान के बीच बातचीत का नया रास्ता निकालने की कोशिश कर रहा है। ट्रंप का रुख सख्त वहीं डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि वह सीजफायर बढ़ाने के पक्ष में नहीं हैं, हालांकि उन्होंने बातचीत के जरिए समाधान की उम्मीद जताई है। डिप्लोमैटिक सूत्रों के मुताबिक, आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर बड़ा अपडेट सामने आ सकता है। बढ़ सकता है क्षेत्रीय तनाव मिडिल ईस्ट में हालात तेजी से बदल रहे हैं। एक तरफ सैन्य तनाव बना हुआ है, तो दूसरी तरफ कूटनीतिक प्रयास भी जारी हैं। अब नजर इस बात पर है कि क्या बातचीत के जरिए समाधान निकलता है या क्षेत्र में टकराव और गहराता है।
रियाद, एजेंसियां। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच Iran ने Saudi Arabia में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकाने Prince Sultan Air Base पर मिसाइल हमला किया है। रिपोर्ट्स के अनुसार इस हमले में United States Air Force के पांच एयर-टैंकर (रिफ्यूलिंग) विमान क्षतिग्रस्त हो गए। हालांकि किसी के घायल होने या मौत की सूचना नहीं मिली है। 15वें दिन में पहुंचा संघर्ष पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष अब और उग्र होता जा रहा है। मिसाइल और ड्रोन हमलों के बीच यह टकराव करीब 15वें दिन में प्रवेश कर चुका है। इसी दौरान ईरान ने सऊदी अरब में मौजूद अमेरिकी एयरबेस को निशाना बनाते हुए जोरदार हमला किया। पांच अमेरिकी विमान हुए क्षतिग्रस्त सूत्रों के मुताबिक, हमले के समय एयरबेस पर खड़े अमेरिकी वायुसेना के पांच रिफ्यूलिंग विमान क्षतिग्रस्त हो गए। हालांकि विमान पूरी तरह नष्ट नहीं हुए हैं और उन्हें मरम्मत के लिए भेजा गया है। पहले भी हुए कई सैन्य हादसे इससे पहले पश्चिमी इराक में अमेरिकी वायुसेना का एक केसी-135 सैन्य रिफ्यूलिंग विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जिसमें छह क्रू मेंबर की मौत हो गई थी। वहीं कुवैत में फ्रेंडली फायर की घटना में तीन अमेरिकी F-15 लड़ाकू विमान भी गिर गए थे, हालांकि उस घटना में एयरक्रू सुरक्षित रहे थे। अमेरिका-ईरान संघर्ष से बढ़ा तनाव गौरतलब है कि यह संकट तब शुरू हुआ जब United States और Israel ने 28 फरवरी को ईरान पर बड़े हमले किए थे। इसके बाद से ईरान लगातार जवाबी कार्रवाई कर रहा है। हालात ऐसे हैं कि पूरा पश्चिम एशिया युद्ध जैसे माहौल में पहुंच गया है और इसका असर वैश्विक राजनीति और तेल बाजार पर भी पड़ रहा है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।