पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव में उम्मीदवारों के लिए दो बच्चों की सीमा तय करने वाले कानून पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं। महाराष्ट्र सरकार की उस नीति की सुनवाई के दौरान अदालत ने पूछा कि जब देश में जन्म दर लगातार घट रही है, तो दो से अधिक बच्चों वाले लोगों को चुनाव लड़ने से वंचित रखने का औचित्य क्या है। मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि इस विषय पर पहले दिए गए अपने फैसले पर भी दोबारा विचार करने की आवश्यकता पड़ सकती है। पूर्व सरपंच की अयोग्यता को दी गई है चुनौती यह मामला महाराष्ट्र के काकोडा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव से जुड़ा है। उन्हें महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत तीसरे बच्चे के जन्म के बाद पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया था। यह प्रावधान 13 सितंबर 2000 से लागू है, जिसके अनुसार दो से अधिक जीवित बच्चे होने पर कोई व्यक्ति पंचायत और अन्य स्थानीय निकायों का चुनाव नहीं लड़ सकता। पुराने फैसले पर पुनर्विचार के संकेत सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2003 के जावेद बनाम हरियाणा सरकार मामले का भी उल्लेख किया। उस फैसले में अदालत ने हरियाणा के दो-बच्चे संबंधी कानून को संवैधानिक माना था। हालांकि, मौजूदा सुनवाई में अदालत ने कहा कि वर्तमान सामाजिक और जनसंख्या संबंधी परिस्थितियों को देखते हुए उस निर्णय की दोबारा समीक्षा की आवश्यकता हो सकती है। घटती जन्म दर पर अदालत की टिप्पणी सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत में जन्म दर लगातार कम हो रही है। ऐसे में यह विचार करना जरूरी है कि दो से अधिक बच्चों वाले लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानून आज भी प्रासंगिक और संवैधानिक हैं या नहीं। अदालत ने संकेत दिया कि बदलती जनसंख्या परिस्थितियों के मद्देनजर इस नीति का नए सिरे से मूल्यांकन किया जाना चाहिए। सात राज्यों के कानूनों का होगा अध्ययन सुप्रीम कोर्ट ने मामले की विस्तृत सुनवाई करने का फैसला किया है। अदालत ने महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता रुक्मिणी बोबडे को एमिकस क्यूरी (अदालत की सहायता करने वाली वकील) नियुक्त किया है। उन्हें उन सात राज्यों के कानूनों का अध्ययन करने का निर्देश दिया गया है, जहां दो से अधिक बच्चों वाले लोगों के पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लागू है। इसके साथ ही न्यायालय ने भारत में घटती जन्म दर से संबंधित अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों और उपलब्ध आंकड़ों का भी अध्ययन करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई में इन सभी पहलुओं पर विस्तार से विचार किया जाएगा।
जम्मू: श्री माता वैष्णो देवी मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाई गई चांदी के प्रबंधन को लेकर दायर याचिका पर जम्मू की एक अदालत ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने मामले की जांच कर रही क्राइम ब्रांच को 29 जुलाई तक पूरा रिकॉर्ड पेश करने का निर्देश दिया है। मामला मंदिर में चढ़ाई गई चांदी में कथित गड़बड़ी और जांच में देरी से जुड़ा है। अदालत ने मांगा जांच का पूरा रिकॉर्ड मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने क्राइम ब्रांच से जांच से जुड़े सभी दस्तावेज और कार्रवाई का विवरण अदालत में पेश करने को कहा है। यह निर्देश याचिकाकर्ता अधिवक्ता दीपक शर्मा द्वारा पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए जाने के बाद दिया गया। याचिका में 500 करोड़ रुपये की चांदी में अनियमितता का आरोप याचिकाकर्ता अधिवक्ता दीपक शर्मा का आरोप है कि श्री माता वैष्णो देवी मंदिर में वर्षों के दौरान श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाई गई करीब 20 टन चांदी, जिसकी अनुमानित कीमत 500 करोड़ रुपये से अधिक बताई गई है, उसके प्रबंधन में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हुई हैं। याचिका में दावा किया गया है कि इस मामले में गबन और मिलावट की आशंका है तथा अब तक इस संबंध में प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं की गई है। नकली और मिलावटी चांदी के आरोप याचिकाकर्ता ने अदालत में यह भी दावा किया कि मंदिर में जमा चांदी का बड़ा हिस्सा कथित रूप से मिलावटी या नकली हो सकता है। उन्होंने यह सवाल उठाया कि क्या देशभर से आने वाले लाखों श्रद्धालु नकली चांदी चढ़ा सकते हैं। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि कथित मिलावटी चांदी में कैडमियम जैसी धातु मौजूद होने की आशंका है। हालांकि, इन दावों की अभी तक किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी या अदालत द्वारा पुष्टि नहीं हुई है। FIR दर्ज न होने पर उठाए सवाल दीपक शर्मा का कहना है कि उन्होंने 9 मई को क्राइम ब्रांच से मामले की जांच की मांग की थी, लेकिन उनकी शिकायत पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। बाद में क्राइम ब्रांच ने अदालत को बताया कि शिकायत को दूसरे पुलिस प्राधिकरण के पास भेज दिया गया है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि क्राइम ब्रांच स्वयं इस तरह के मामलों की जांच करने के लिए अधिकृत एजेंसी है, इसलिए उसे शिकायत मिलने पर एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू करनी चाहिए थी। 29 जुलाई की सुनवाई पर टिकी नजर अब इस मामले में अगली सुनवाई 29 जुलाई को होगी। अदालत के निर्देश के अनुसार क्राइम ब्रांच को उस दिन जांच से संबंधित पूरा रिकॉर्ड और अब तक की गई कार्रवाई का विवरण प्रस्तुत करना होगा। अदालत के समक्ष पेश होने वाली रिपोर्ट के आधार पर आगे की कानूनी प्रक्रिया तय की जाएगी। गौरतलब है कि फिलहाल ये आरोप न्यायिक प्रक्रिया के अधीन हैं और मामले में अदालत की अंतिम टिप्पणी या किसी भी पक्ष की जिम्मेदारी अभी तय नहीं हुई है।
कोलकाता: तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सांसद महुआ मोइत्रा ने अपने खिलाफ दर्ज कथित नफरती भाषण के मामले में गिरफ्तारी की आशंका जताते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट का रुख किया है। उन्होंने अदालत से जांच के दौरान किसी भी दंडात्मक कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगाने और पुलिस पूछताछ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से कराने की अनुमति देने की मांग की है। मामले पर हाईकोर्ट 15 जुलाई को सुनवाई करेगा। गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक की मांग महुआ मोइत्रा ने अपनी याचिका में कहा है कि जांच के दौरान पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर सकती है। इसलिए उन्होंने अदालत से अनुरोध किया है कि अंतिम निर्णय तक उनके खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई न की जाए। इसके साथ ही उन्होंने व्यक्तिगत रूप से थाने में उपस्थित होने से छूट देने और वर्चुअल माध्यम से पूछताछ की अनुमति देने की भी मांग की है। हाईकोर्ट ने सुनवाई की तारीख तय की मामले का उल्लेख किए जाने पर न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य ने कहा कि याचिका पर 15 जुलाई को सुनवाई की जाएगी। अदालत ने महुआ मोइत्रा के वकील को सभी प्रतिवादियों को नोटिस भेजने का निर्देश भी दिया है। क्या है पूरा मामला? महुआ मोइत्रा के वकील ने अदालत को बताया कि हाल ही में नदिया जिले की एक निचली अदालत में पेशी के दौरान कुछ लोगों ने चेहरा ढककर उन पर अंडे फेंके और विरोध प्रदर्शन किया था। इस घटना के बाद महुआ मोइत्रा ने सोशल मीडिया पर कथित रूप से टिप्पणी की थी कि "जो लोग अपना चेहरा ढकते हैं, उन्हें बुर्का पहन लेना चाहिए।" इसी बयान को लेकर उनके खिलाफ नफरती भाषण का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज की गई है। पुलिस नोटिस पर जताई आपत्ति याचिका में कहा गया है कि पुलिस लगातार उन्हें थाने में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के लिए नोटिस भेज रही है। महुआ मोइत्रा की ओर से आशंका जताई गई है कि यदि वह थाने जाती हैं तो उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है या उनके साथ दोबारा हमला हो सकता है। इसी आधार पर उन्होंने अदालत से व्यक्तिगत उपस्थिति के बजाय ऑनलाइन पूछताछ की अनुमति देने की मांग की है। 15 जुलाई की सुनवाई पर टिकी नजर अब इस मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट 15 जुलाई को सुनवाई करेगा। अदालत यह तय करेगी कि महुआ मोइत्रा को गिरफ्तारी से अंतरिम राहत दी जाए या नहीं और क्या उन्हें वर्चुअल माध्यम से पूछताछ की अनुमति मिल सकती है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दुनिया में प्रतिस्पर्धा लगातार तेज होती जा रही है। इसी बीच OpenAI ने अपने नए फ्लैगशिप AI मॉडल GPT-5.6 Sol को पेश किया है। कंपनी का दावा है कि यह मॉडल स्वतंत्र Design Arena बेंचमार्क में Anthropic के Claude Fable 5 से आगे निकल गया है। इसके साथ ही OpenAI ने कहा कि GPT-5.6 Sol को कोडिंग, तर्क क्षमता (Reasoning), सुरक्षा और कई अन्य AI कार्यों में भी पहले के मुकाबले बेहतर बनाया गया है। Design Arena रैंकिंग में हासिल किया पहला स्थान OpenAI के अध्यक्ष ग्रेग ब्रॉकमैन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इस उपलब्धि की जानकारी साझा करते हुए इसे कंपनी के लिए एक बड़ा पड़ाव बताया। Design Arena द्वारा जारी फ्रंट-एंड डिज़ाइन लीडरबोर्ड के अनुसार, GPT-5.6 Sol ने 1353 Elo स्कोर के साथ पहला स्थान हासिल किया। वहीं, GLM 5.2 1351 अंकों के साथ दूसरे और Claude Fable 5 1345 अंकों के साथ तीसरे स्थान पर रहा। यह रैंकिंग AI मॉडल्स की वेब डिज़ाइन और फ्रंट-एंड डेवलपमेंट क्षमता के आधार पर तैयार की जाती है। क्या है GPT-5.6 फैमिली? OpenAI ने GPT-5.6 सीरीज़ के तहत तीन नए मॉडल लॉन्च किए हैं- GPT-5.6 Sol – जटिल कोडिंग, उन्नत रीजनिंग और AI एजेंट आधारित कार्यों के लिए। GPT-5.6 Terra – रोजमर्रा के कार्यों और संतुलित प्रदर्शन के लिए। GPT-5.6 Luna – कम लागत और तेज़ स्पीड वाले AI कार्यों के लिए। फिलहाल इन मॉडलों को सीमित संख्या में चुनिंदा डेवलपर्स और एंटरप्राइज पार्टनर्स के लिए उपलब्ध कराया गया है। आने वाले हफ्तों में इन्हें व्यापक स्तर पर उपलब्ध कराया जाएगा। नए फीचर्स से लैस है GPT-5.6 Sol OpenAI के अनुसार, GPT-5.6 Sol में कई नए फीचर्स शामिल किए गए हैं। इनमें प्रमुख हैं- Maximum Reasoning Mode, जो जटिल समस्याओं को बेहतर तरीके से हल करने में सक्षम है। Ultra Mode, जिसमें सब-एजेंट्स की मदद से कई चरणों वाले कार्य पूरे किए जा सकते हैं। वैज्ञानिक शोध, विशेषकर बायोलॉजी और साइबर सिक्योरिटी से जुड़े कार्यों में बेहतर प्रदर्शन। कम टोकन इस्तेमाल करते हुए अधिक प्रभावी परिणाम देने की क्षमता। सुरक्षा पर भी दिया गया खास ध्यान OpenAI का कहना है कि GPT-5.6 में सुरक्षा को पहले से अधिक मजबूत बनाया गया है। कंपनी के मुताबिक, मॉडल को साइबर दुरुपयोग, संवेदनशील जैविक जानकारी के गलत इस्तेमाल और सुरक्षा उपायों को दरकिनार करने जैसी संभावित चुनौतियों से बचाने के लिए व्यापक परीक्षण किए गए हैं। OpenAI ने बताया कि मॉडल की सुरक्षा जांच के लिए लाखों GPU घंटों तक ऑटोमेटेड रेड-टीमिंग और विशेषज्ञों द्वारा परीक्षण किए गए। कब मिलेगा GPT-5.6? फिलहाल GPT-5.6 API और Codex के जरिए चुनिंदा पार्टनर्स के लिए उपलब्ध है। OpenAI ने संकेत दिया है कि आने वाले कुछ सप्ताह में इसे ChatGPT प्लेटफॉर्म पर भी चरणबद्ध तरीके से जारी किया जाएगा। कितनी होगी कीमत? OpenAI ने GPT-5.6 मॉडल्स की API कीमतें भी घोषित की हैं- GPT-5.6 Sol – 5 डॉलर प्रति मिलियन इनपुट टोकन और 30 डॉलर प्रति मिलियन आउटपुट टोकन GPT-5.6 Terra – 2.5 डॉलर प्रति मिलियन इनपुट और 15 डॉलर प्रति मिलियन आउटपुट टोकन GPT-5.6 Luna – 1 डॉलर प्रति मिलियन इनपुट और 6 डॉलर प्रति मिलियन आउटपुट टोकन AI प्रतिस्पर्धा में बढ़ी टक्कर GPT-5.6 Sol के लॉन्च के साथ OpenAI और Anthropic के बीच प्रतिस्पर्धा और तेज होने की उम्मीद है। बेहतर डिज़ाइन क्षमता, उन्नत कोडिंग, मजबूत रीजनिंग और सुरक्षा फीचर्स के साथ OpenAI अपने नए मॉडल को डेवलपर्स और एंटरप्राइज ग्राहकों के लिए अधिक सक्षम विकल्प के रूप में पेश कर रहा है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में वर्षों से लंबित मामलों के जल्द निपटारे के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने बड़ा कदम उठाया है। उन्होंने पुराने मामलों की सुनवाई में तेजी लाने के उद्देश्य से चार विशेष (स्पेशल) बेंचों का गठन किया है। इनमें दो बेंच सिविल मामलों और दो बेंच आपराधिक मामलों की सुनवाई करेंगी। 93 हजार से अधिक मामले अभी भी लंबित एएनआई के अनुसार, सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में इस समय करीब 93,000 मामले लंबित हैं। इनमें से लगभग 35 से 40 प्रतिशत मामले काफी पुराने हैं, जिनका लंबे समय से निपटारा नहीं हो सका है। उन्होंने कहा कि नई व्यवस्था का उद्देश्य इन पुराने मामलों को प्राथमिकता के आधार पर सूचीबद्ध कर तेजी से सुनवाई करना है। सिविल और आपराधिक मामलों के लिए अलग-अलग बेंच नई रोस्टर व्यवस्था के तहत: दो स्पेशल बेंच केवल सिविल मामलों की सुनवाई करेंगी। दो स्पेशल बेंच केवल आपराधिक (क्रिमिनल) मामलों पर काम करेंगी। अलग-अलग बेंच बनने से मामलों की सुनवाई अधिक व्यवस्थित होगी और पुराने मामलों के निपटारे की गति बढ़ने की उम्मीद है। पुराने मामलों के बोझ को कम करना लक्ष्य सुप्रीम कोर्ट में वर्षों से लंबित मामलों की बढ़ती संख्या को लेकर लगातार चिंता जताई जाती रही है। नई स्पेशल बेंचों का मुख्य उद्देश्य इसी लंबित बोझ को कम करना और लंबे समय से न्याय का इंतजार कर रहे लोगों को जल्द राहत दिलाना है। इन बेंचों में नियमित रूप से पुराने मामलों की सुनवाई की जाएगी, ताकि न्याय मिलने में हो रही देरी को कम किया जा सके। न्यायिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने की पहल कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत का यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया को अधिक तेज, व्यवस्थित और प्रभावी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यदि यह व्यवस्था सफल रहती है, तो सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या घटने के साथ-साथ समयबद्ध न्याय सुनिश्चित करने में भी मदद मिलेगी। इससे न्यायपालिका में आम लोगों का भरोसा और मजबूत होने की उम्मीद है.
मुंबई, एजेंसियां। भारतीय बैंकों ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल–जून) में करीब ₹15,000 करोड़ के नए गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) को बिक्री के लिए बाजार में उतारा है। सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बैंक इन फंसे कर्जों को एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियों और अन्य निवेशकों को बेचकर अपनी बैलेंस शीट मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। कुल NPA बिक्री का आंकड़ा ₹50,000 करोड़ के करीब बैंकिंग क्षेत्र के सूत्रों के मुताबिक, पहली तिमाही में पुराने और नए NPA को मिलाकर लगभग ₹50,000 करोड़ के फंसे कर्ज बिक्री की प्रक्रिया में हैं। इनमें कॉरपोरेट लोन, इंफ्रास्ट्रक्चर, रियल एस्टेट और MSME सेक्टर से जुड़े डिफॉल्ट खाते प्रमुख हैं। इससे बैंकों को खराब ऋण कम करने और पूंजी की स्थिति मजबूत करने में मदद मिलने की उम्मीद है। ARC कंपनियों की बढ़ी सक्रियता एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियां इन NPA खातों की खरीद में सक्रिय रुचि दिखा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ब्याज दरों में स्थिरता और अर्थव्यवस्था में सुधार के चलते कई फंसे हुए खातों की रिकवरी की संभावना बढ़ी है, इसलिए ARC कंपनियां बड़े पैमाने पर इन परिसंपत्तियों की बोली लगाने की तैयारी कर रही हैं। बैंकों की बैलेंस शीट होगी मजबूत विशेषज्ञों का कहना है कि NPA की बिक्री से बैंकों की बैलेंस शीट साफ होगी, प्रावधान का बोझ कम होगा और नए कर्ज देने की क्षमता बढ़ेगी। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) भी बैंकों को समय पर फंसे कर्जों के समाधान और जोखिम प्रबंधन को मजबूत करने पर लगातार जोर दे रहा है।
West Bengal Gunda Act News: पश्चिम बंगाल सरकार के नए ‘पश्चिम बंगाल जन सुरक्षा एवं असामाजिक गतिविधियों पर नियंत्रण अधिनियम, 2026’ (गुंडा रोधी कानून) के लागू होते ही इसे कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस मामले में तत्काल सुनवाई से इनकार करते हुए कहा कि याचिका पर नियमित प्रक्रिया के तहत सुनवाई होगी। कानून लागू होते ही दायर हुई जनहित याचिका सोमवार से लागू हुए इस कानून के खिलाफ मानवाधिकार कार्यकर्ता मिलन मालाकार ने कलकत्ता हाईकोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दाखिल की है। याचिका में कानून को असंवैधानिक बताते हुए इसके क्रियान्वयन पर तत्काल रोक लगाने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि कानून के कई प्रावधान नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं और इसका दुरुपयोग होने की आशंका है। हाईकोर्ट ने तत्काल सुनवाई से किया इनकार कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तपब्रत चक्रवर्ती और न्यायमूर्ति पार्थसारथी चटर्जी की खंडपीठ के समक्ष याचिकाकर्ता के वकील सब्यसाची चटर्जी ने मामले की तत्काल सुनवाई की मांग की। हालांकि, अदालत ने इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया और कहा कि मामले की सुनवाई सामान्य न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार तय की जाएगी। कानून के किन प्रावधानों पर उठ रहे हैं सवाल? याचिका में कानून की कई धाराओं को संविधान के विरुद्ध बताया गया है। प्रमुख आपत्तियां इस प्रकार हैं: बिना मुकदमे के 12 महीने तक हिरासत कानून के तहत जिलाधिकारी और पुलिस आयुक्त को यह अधिकार दिया गया है कि वे किसी व्यक्ति को भविष्य में असामाजिक गतिविधियों की आशंका के आधार पर बिना मुकदमा चलाए अधिकतम एक वर्ष तक निवारक हिरासत में रख सकते हैं। वकील की सहायता पर प्रतिबंध कानून की धारा 10(4) के अनुसार, हिरासत में लिए गए व्यक्ति को सलाहकार बोर्ड के समक्ष सामान्य रूप से अपने वकील के माध्यम से पक्ष रखने की अनुमति नहीं होगी, जब तक कि बोर्ड विशेष अनुमति न दे। ‘गुंडा’ की परिभाषा पर विवाद याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि कानून में ‘गुंडा’ और ‘असामाजिक गतिविधियों’ की परिभाषा अत्यधिक व्यापक और अस्पष्ट है। इससे राजनीतिक विरोध, शांतिपूर्ण प्रदर्शन या असहमति व्यक्त करने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई की आशंका है। राज्य सरकार का क्या कहना है? राज्य सरकार का कहना है कि यह कानून राजनीतिक हिंसा, रंगदारी, संगठित अपराध और असामाजिक गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण के उद्देश्य से लाया गया है। सरकार के अनुसार, राज्य में कानून-व्यवस्था को मजबूत करने और अपराध पर सख्ती से रोक लगाने के लिए इस तरह के कानून की आवश्यकता थी। विपक्ष और मानवाधिकार संगठनों का विरोध विपक्षी दलों और कई मानवाधिकार संगठनों ने इस कानून का विरोध किया है। उनका आरोप है कि इससे प्रशासन और पुलिस को अत्यधिक अधिकार मिल जाएंगे, जिनका दुरुपयोग हो सकता है। कानूनी विशेषज्ञों की राय कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि नए कानून के कई प्रावधान राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) जैसी निवारक हिरासत की व्यवस्था से मिलते-जुलते हैं। उनका मानना है कि यदि इन शक्तियों के उपयोग पर पर्याप्त निगरानी नहीं रही, तो नागरिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों पर प्रभाव पड़ सकता है। अब इस मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट नियमित सुनवाई के दौरान कानून की संवैधानिक वैधता और याचिकाकर्ताओं की आपत्तियों पर विचार करेगा।
उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रही महिलाओं के लिए अच्छी खबर है। UP Anganwadi Bharti 2026 के तहत राज्य के छह नए जिलों में 1110 आंगनवाड़ी कार्यकर्ता पदों पर भर्ती के लिए आवेदन प्रक्रिया शुरू हो गई है। इच्छुक और पात्र महिला अभ्यर्थी अपने जिले के अनुसार निर्धारित अंतिम तिथि तक ऑनलाइन आवेदन कर सकती हैं। यह भर्ती आगरा, मथुरा, संभल, औरैया, श्रावस्ती और चंदौली जिलों में की जाएगी। आवेदन केवल ऑनलाइन माध्यम से स्वीकार किए जाएंगे। किन जिलों में कितने पद? यूपी सरकार द्वारा जारी भर्ती अधिसूचना के अनुसार विभिन्न जिलों में रिक्त पद इस प्रकार हैं- जिला रिक्त पद आवेदन की अंतिम तिथि आगरा 322 25 जुलाई 2026 मथुरा 236 24 जुलाई 2026 औरैया 181 28 जुलाई 2026 संभल 177 28 जुलाई 2026 चंदौली 126 25 जुलाई 2026 श्रावस्ती 68 27 जुलाई 2026 कुल 1110 - कौन कर सकता है आवेदन? भर्ती में आवेदन करने के लिए उम्मीदवार को निम्नलिखित पात्रता पूरी करनी होगी- केवल महिला अभ्यर्थी आवेदन कर सकती हैं। किसी मान्यता प्राप्त बोर्ड से 12वीं पास होना आवश्यक है। ग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट उम्मीदवार भी आवेदन के पात्र हैं। अभ्यर्थी की आयु 18 से 35 वर्ष के बीच होनी चाहिए। आयु की गणना 1 जुलाई 2026 के आधार पर की जाएगी। ग्रामीण क्षेत्र की उम्मीदवार संबंधित ग्राम सभा और शहरी क्षेत्र की उम्मीदवार संबंधित वार्ड की निवासी होनी चाहिए। कैसे होगा चयन? इस भर्ती में किसी प्रकार की लिखित परीक्षा नहीं होगी। उम्मीदवारों का चयन शैक्षणिक योग्यता के आधार पर तैयार की जाने वाली मेरिट लिस्ट से किया जाएगा। मेरिट 12वीं, समकक्ष योग्यता, स्नातक या स्नातकोत्तर में प्राप्त अंकों के आधार पर बनेगी। 10वीं के अंक मेरिट में शामिल नहीं किए जाएंगे। CGPA या ग्रेडिंग सिस्टम से प्राप्त अंकों को निर्धारित नियमों के अनुसार प्रतिशत में बदला जाएगा। आवेदन कैसे करें? उम्मीदवार नीचे दिए गए आसान चरणों का पालन करके आवेदन कर सकते हैं- आधिकारिक वेबसाइट upanganwadibharti.in पर जाएं। अपने जिले की भर्ती अधिसूचना चुनें। Apply Online/New Registration पर क्लिक करें। आधार नंबर और मोबाइल नंबर से पंजीकरण करें। आवेदन फॉर्म में सभी आवश्यक जानकारी भरें। फोटो, हस्ताक्षर और जरूरी दस्तावेज अपलोड करें। सभी विवरण जांचकर फॉर्म सबमिट करें। भविष्य के लिए आवेदन पत्र का प्रिंट या PDF सुरक्षित रखें। समय रहते करें आवेदन हर जिले के लिए आवेदन की अंतिम तिथि अलग-अलग तय की गई है। ऐसे में उम्मीदवारों को सलाह दी जाती है कि अंतिम तिथि का इंतजार न करें और सभी आवश्यक दस्तावेज तैयार रखकर समय पर आवेदन प्रक्रिया पूरी करें।
नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने 12 प्रतिशत से अधिक इथाइल अल्कोहल वाली दवाओं की बिना डॉक्टर की पर्ची बिक्री पर रोक लगा दी है। इस फैसले का चिकित्सा विशेषज्ञों ने स्वागत किया है। हालांकि, डॉक्टरों का कहना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से फर्जी प्रिस्क्रिप्शन तैयार किए जाने की संभावना नए नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए चुनौती बन सकती है। डॉक्टर ने बताया AI से बढ़ी नई चुनौती दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. धीरन गुप्ता ने कहा कि ऑनलाइन फार्मेसी के बढ़ते चलन के बीच AI का दुरुपयोग भी चिंता का विषय है। उनके अनुसार, अब AI की मदद से नकली डॉक्टर की पर्चियां तैयार करना पहले की तुलना में आसान हो गया है। ऐसे में केवल नियम बनाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि ऑनलाइन दवा बिक्री की प्रभावी निगरानी और सत्यापन व्यवस्था भी जरूरी होगी। बच्चों पर पड़ सकता है गंभीर असर डॉ. गुप्ता ने कहा कि अल्कोहल युक्त दवाओं का असर हमेशा तुरंत दिखाई नहीं देता, लेकिन बच्चों में इसका प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि कई बार माता-पिता अनजाने में ऐसी दवाएं बच्चों को दे देते हैं, जिससे भविष्य में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। उन्होंने बच्चों के लिए शुगर-फ्री और कम जोखिम वाले विकल्पों को प्राथमिकता देने की सलाह दी। नए नियमों का स्वागत, लेकिन लागू करना चुनौती डॉ. गुप्ता का कहना है कि सरकार का फैसला सही दिशा में उठाया गया कदम है, लेकिन इसका प्रभावी पालन सुनिश्चित करना आसान नहीं होगा। उन्होंने कहा कि इसके लिए सरकार, दवा विक्रेताओं, ऑनलाइन फार्मेसी प्लेटफॉर्म और अभिभावकों सभी को जिम्मेदारी के साथ नियमों का पालन करना होगा। क्या है सरकार का नया नियम? स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने 12 प्रतिशत से अधिक इथाइल अल्कोहल वाली दवाओं की बिक्री पर नए प्रतिबंध लागू किए हैं। नए नियमों के तहत: 12% से अधिक इथाइल अल्कोहल वाली दवाएं अब बिना डॉक्टर की पर्ची नहीं बेची जा सकेंगी। ऐसी दवाओं की बिक्री केवल वैध प्रिस्क्रिप्शन के आधार पर होगी। बिना लाइसेंस या निर्धारित प्रक्रिया के इन दवाओं की बिक्री पर रोक रहेगी। क्यों लिया गया यह फैसला? सरकार का कहना है कि कुछ अल्कोहल युक्त दवाओं का दुरुपयोग नशे के उद्देश्य से किए जाने की शिकायतें सामने आ रही थीं। इसी वजह से इन दवाओं की बिक्री को अधिक नियंत्रित करने का निर्णय लिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऑनलाइन प्रिस्क्रिप्शन की डिजिटल जांच और सत्यापन प्रणाली मजबूत नहीं की गई, तो AI से तैयार फर्जी पर्चियां इस व्यवस्था के लिए नई चुनौती बन सकती हैं।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान उस समय असामान्य स्थिति पैदा हो गई, जब एक याचिकाकर्ता ने कथित तौर पर अदालत में अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया और अपने दस्तावेज हवा में उछाल दिए। स्थिति बिगड़ने पर कोर्ट के निर्देश पर सुरक्षाकर्मियों ने उसे कोर्टरूम से बाहर निकाल दिया। सुनवाई के दौरान बढ़ा विवाद यह मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका से जुड़ा था। सुनवाई न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ के समक्ष चल रही थी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, याचिकाकर्ता काला कोट पहनकर अदालत पहुंचा था, हालांकि उसने अधिवक्ताओं वाला बैंड नहीं पहना था। सुनवाई के दौरान उसने अदालत के प्रति आक्रामक रुख अपनाया। जज से कहा- "मैं आपको आदेश देता हूं" सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने कथित तौर पर कहा, "न्यायिक सेवक महोदय, मैं आपको आदेश देता हूं कि आप लखनऊ के एसीपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दें।" इस पर न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा, "क्या आप हमें आदेश दे रहे हैं?" अभद्र भाषा और दस्तावेज फेंकने का आरोप बताया गया कि इसके बाद याचिकाकर्ता ने कहा कि उसकी ओर से सब कुछ रिकॉर्ड पर है। आरोप है कि उसने इसके बाद अभद्र भाषा का प्रयोग किया और अपने मामले से जुड़े दस्तावेज अदालत कक्ष में हवा में उछाल दिए। स्थिति बिगड़ते देख कोर्ट की सुरक्षा में तैनात कर्मी तुरंत आगे आए और अदालत के निर्देश पर याचिकाकर्ता को कोर्टरूम से बाहर ले गए। सुनवाई सामान्य रूप से जारी रही याचिकाकर्ता को बाहर ले जाने के बाद अदालत की कार्यवाही सामान्य रूप से जारी रही। फिलहाल इस घटना को लेकर पीठ की ओर से खुली अदालत में कोई अलग आदेश पारित नहीं किया गया है। हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने पहुंचा था याचिकाकर्ता इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने आया था। हालांकि सुनवाई के दौरान उसके व्यवहार के कारण कुछ समय के लिए अदालत का माहौल तनावपूर्ण हो गया। घटना के बाद कोर्ट की कार्यवाही बिना किसी अन्य व्यवधान के आगे बढ़ाई गई।
मुंबई, एजेंसियां। बॉलीवुड अभिनेता राजपाल यादव को 9 करोड़ रुपये के चेक बाउंस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शुक्रवार को अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए उनकी अपील खारिज कर दी। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने अभिनेता को तीन महीने की जेल की सजा कायम रखते हुए सात शिकायतों में शिकायतकर्ता को एक-एक करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान करने का निर्देश दिया। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि अभिनेता द्वारा पहले जमा किए जा चुके करीब दो करोड़ रुपये इस राशि में समायोजित किए जाएंगे। साथ ही उन्हें उच्च अदालत में अपील दायर करने के लिए दो महीने का समय भी दिया गया है। 2019 के फैसले को दी थी चुनौती राजपाल यादव और उनकी पत्नी ने वर्ष 2019 में सेशंस कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सेशंस कोर्ट ने अप्रैल 2018 में मजिस्ट्रेट कोर्ट द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि को बरकरार रखा था। शुरुआती फैसले में अभिनेता को छह महीने की सजा सुनाई गई थी। जून 2024 में हाई कोर्ट ने समझौते की संभावना तलाशने की शर्त पर उनकी सजा पर अंतरिम रोक लगाई थी, लेकिन अदालत ने बाद में पाया कि भुगतान को लेकर किए गए कई वादे पूरे नहीं किए गए। फिल्म के लिए लिया था कर्ज मामला वर्ष 2010 का है, जब राजपाल यादव ने अपनी निर्देशकीय पहली फिल्म 'अता पता लापता' के निर्माण के लिए एक निजी कंपनी से पांच करोड़ रुपये का ऋण लिया था। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर असफल रही, जिसके बाद अभिनेता कथित तौर पर कर्ज नहीं चुका सके। ऋण चुकाने के लिए जारी किए गए कई चेक बाउंस होने पर कंपनी ने उनके खिलाफ मामला दर्ज कराया। फरवरी 2026 में अदालत की सख्ती के बाद राजपाल यादव ने तिहाड़ जेल में आत्मसमर्पण किया था। बाद में उन्हें अंतरिम जमानत मिली थी। अब हाई कोर्ट द्वारा सजा बरकरार रखे जाने के बाद अभिनेता के सामने एक बार फिर कानूनी चुनौती खड़ी हो गई है। यदि उन्हें किसी उच्च अदालत से राहत नहीं मिलती, तो उन्हें दोबारा जेल जाना पड़ सकता है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया में हो रही देरी पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा है कि यदि 2015 में दायर मुकदमे में 2026 तक भी साक्ष्य दर्ज किए जा रहे हैं, तो उसकी धीमी रफ्तार पर "घोंघा भी सवाल उठा सकता है।" अदालत ने यह टिप्पणी एक निजी कंपनी की अपील खारिज करते हुए की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि मुकदमे की कार्यवाही बेहद धीमी गति से आगे बढ़ रही है। पीठ ने कहा, "मुकदमा 2015 में दायर हुआ था और 2026 तक भी वादी के साक्ष्य दर्ज किए जा रहे हैं। हम इतना ही कह सकते हैं कि मुकदमे की रफ्तार पर तो घोंघा भी सवाल उठा सकता है।" अतिरिक्त दस्तावेजों की मांग खारिज सुप्रीम कोर्ट ने उस निजी कंपनी की दलील भी खारिज कर दी, जिसमें लंबित मुकदमे के दौरान कुछ अतिरिक्त दस्तावेज रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति मांगी गई थी। अदालत ने कहा कि जिन दस्तावेजों को पेश करने की मांग की गई, वे कंपनी के पास मुकदमा दायर होने के समय से ही मौजूद थे। ऐसे में उन्हें शुरुआती चरण में या पहले अतिरिक्त साक्ष्य पेश करते समय रिकॉर्ड पर लाया जाना चाहिए था। 'टुकड़ों-टुकड़ों में मुकदमा नहीं चल सकता' पीठ ने कहा कि यदि इस तरह बार-बार अतिरिक्त दस्तावेज पेश करने की अनुमति दी जाती है, तो इससे वाणिज्यिक मुकदमों में "टुकड़ों-टुकड़ों में सुनवाई" की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा, जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि जनवरी 2018 में कंपनी को एक बार अतिरिक्त दस्तावेज रिकॉर्ड पर लाने की अनुमति मिल चुकी थी। इसके बावजूद नवंबर 2023 में उसी आधार पर दूसरा आवेदन दायर किया गया, जो उचित नहीं है। दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2025 में दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश को सही ठहराते हुए कंपनी की अपील खारिज कर दी। दिल्ली हाई कोर्ट ने लंबित वाणिज्यिक मुकदमे में अतिरिक्त दस्तावेज रिकॉर्ड पर लेने और एक गवाह को दोबारा जिरह के लिए बुलाने की कंपनी की याचिका खारिज कर दी थी। जल्द फैसला करने का निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत को निर्देश दिया कि मामले की सुनवाई में और देरी न हो तथा यथाशीघ्र मुकदमे का अंतिम निर्णय किया जाए। 2015 से लंबित है मामला यह मुकदमा मई 2015 में दायर किया गया था। बाद में जनवरी 2018 में इसे वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 के तहत वाणिज्यिक मुकदमे के रूप में दर्ज किया गया। अब सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने एक बार फिर न्यायालयों में लंबित मामलों और सुनवाई में हो रही देरी के मुद्दे को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
नई दिल्ली: Raghav Chadha को सोशल मीडिया पर कथित रूप से चलाए जा रहे मानहानिकारक अभियान के मामले में राहत मिली है। Delhi High Court ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए उनके खिलाफ प्रसारित किए जा रहे कथित अपमानजनक और भ्रामक कंटेंट को हटाने का निर्देश दिया है। क्या है मामला? राघव चड्ढा ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दावा किया था कि सोशल मीडिया पर झूठे पोस्ट और वीडियो प्रसारित किए जा रहे हैं, जिनमें यह दिखाने की कोशिश की गई कि उन्होंने अपनी राजनीतिक निष्ठा बदल ली है। याचिका में इन पोस्टों को उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला बताया गया। कोर्ट ने क्या कहा? सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तर्क रखा गया कि सुनियोजित तरीके से कई सोशल मीडिया अकाउंट्स और कथित पेड इन्फ्लुएंसर्स के माध्यम से एक जैसा कंटेंट एक साथ प्रसारित किया गया, जिससे उनकी सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई। प्रथम दृष्टया प्रस्तुत सामग्री को देखते हुए हाई कोर्ट ने संबंधित अपमानजनक और भ्रामक कंटेंट को हटाने का अंतरिम आदेश जारी किया। याचिकाकर्ता की ओर से क्या दलील दी गई? राघव चड्ढा की ओर से पेश वकीलों ने अदालत में दावा किया कि: कई सोशल मीडिया अकाउंट्स ने एक ही तरह का कंटेंट लगभग एक ही समय पर साझा किया। यह अभियान कथित रूप से समन्वित और भुगतान आधारित (पेड) था। इसका उद्देश्य उनकी सार्वजनिक छवि और राजनीतिक साख को नुकसान पहुंचाना था। वकीलों की प्रतिक्रिया चड्ढा की कानूनी टीम ने अदालत के आदेश का स्वागत करते हुए कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार किसी व्यक्ति के खिलाफ सुनियोजित मानहानि या चरित्र हनन का माध्यम नहीं बन सकता। उनके अनुसार, यह आदेश ऑनलाइन मानहानि से जुड़े मामलों में सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्तियों की प्रतिष्ठा की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump को नागरिकता नीति के मुद्दे पर बड़ा कानूनी झटका लगा है। Supreme Court of the United States ने ट्रंप प्रशासन के उस कार्यकारी आदेश पर रोक को बरकरार रखा है, जिसके तहत अमेरिका में जन्म लेने वाले कुछ बच्चों को जन्मसिद्ध नागरिकता (Birthright Citizenship) से वंचित करने का प्रयास किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि इस मामले में कार्यकारी आदेश को लागू नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही अमेरिका में जन्मे बच्चों को फिलहाल पहले की तरह नागरिकता मिलती रहेगी। क्या था ट्रंप प्रशासन का आदेश? ट्रंप प्रशासन ने एक कार्यकारी आदेश जारी कर कहा था कि यदि किसी बच्चे के माता-पिता अमेरिकी नागरिक या वैध स्थायी निवासी (ग्रीन कार्ड धारक) नहीं हैं, तो केवल अमेरिका में जन्म लेने के आधार पर उस बच्चे को स्वतः अमेरिकी नागरिकता नहीं मिलेगी। इस आदेश को कई राज्यों, नागरिक अधिकार संगठनों और प्रभावित परिवारों ने अदालत में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मामले पर अंतिम संवैधानिक फैसला अभी शेष हो सकता है, लेकिन फिलहाल निचली अदालत द्वारा लगाई गई रोक जारी रहेगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिकी संविधान का 14वां संशोधन जन्मसिद्ध नागरिकता से जुड़े अधिकारों की महत्वपूर्ण संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करता है। सामूहिक याचिका के बाद शुरू हुई कानूनी लड़ाई यह मामला New Hampshire की एक अदालत में दायर सामूहिक (Class Action) याचिका से शुरू हुआ था। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि ट्रंप प्रशासन का आदेश हजारों परिवारों और अमेरिका में जन्म लेने वाले बच्चों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। क्या कहता है 14वां संशोधन? अमेरिकी संविधान के 14वें संशोधन के Citizenship Clause के अनुसार: "संयुक्त राज्य अमेरिका में जन्मे या प्राकृतिक रूप से नागरिक बने तथा उसके अधिकार क्षेत्र के अधीन आने वाले सभी व्यक्ति संयुक्त राज्य अमेरिका और उस राज्य के नागरिक हैं, जहां वे निवास करते हैं।" इसी प्रावधान के आधार पर अमेरिका में जन्मसिद्ध नागरिकता (Birthright Citizenship) का सिद्धांत लंबे समय से लागू है। ट्रंप प्रशासन को लगातार कानूनी चुनौतियां यह हाल के महीनों में ट्रंप प्रशासन की नीतियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सामने आए प्रमुख मामलों में से एक है। नागरिकता नीति पर आया यह फैसला प्रशासन की आव्रजन (इमिग्रेशन) नीति के लिए महत्वपूर्ण झटका माना जा रहा है।
बेंगलुरु: साउथ सिनेमा के दिग्गज अभिनेता प्रकाश राज कानूनी मुश्किलों में घिरते नजर आ रहे हैं। बेंगलुरु की एक अदालत ने उनके खिलाफ तीसरी बार गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी किया है। मामला कर्नाटक समेत तीन राज्यों की चार अलग-अलग मतदाता सूचियों में उनके नाम दर्ज होने के आरोप से जुड़ा है। 17 फरवरी को जारी हुआ था समन बेंगलुरु के वकील के. दिलीप कुमार द्वारा दायर याचिका के आधार पर अदालत ने पहले 17 फरवरी 2026 को पुलिस आयुक्त के माध्यम से समन जारी किया था। हालांकि, दिए गए पते पर अभिनेता उपलब्ध नहीं मिले। इसके बाद 17 मार्च को अदालत ने पहला गैर-जमानती वारंट जारी करते हुए कहा कि आरोपी अपने पते पर नहीं मिला और घर खाली करने की सूचना प्राप्त हुई है। दो बार पहले भी जारी हो चुका है NBW मामले की अगली सुनवाई 17 अप्रैल 2026 को हुई, लेकिन उस दिन भी प्रकाश राज अदालत में पेश नहीं हुए। इसके बाद दूसरा गैर-जमानती वारंट जारी किया गया। 12 जून 2026 को तीसरी बार उनके खिलाफ एनबीडब्ल्यू जारी किया गया। अब इस मामले की अगली सुनवाई 25 जुलाई 2026 को होगी। चार अलग-अलग मतदाता सूचियों में नाम होने का आरोप यह विवाद 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान शुरू हुआ, जब प्रकाश राज ने बेंगलुरु सेंट्रल सीट से चुनाव लड़ा था। शिकायतकर्ता के अनुसार, शांतिनगर विधानसभा क्षेत्र (कर्नाटक) के अलावा अभिनेता का नाम तमिलनाडु के वेलाचेरी विधानसभा क्षेत्र और तेलंगाना के सेरिलिंगमपल्ली क्षेत्र की मतदाता सूची में भी दर्ज है। आरोप है कि कुल चार अलग-अलग मतदाता सूचियों में उनका नाम मौजूद है। भारतीय चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार, कोई भी नागरिक केवल एक ही स्थान पर मतदाता के रूप में पंजीकृत हो सकता है। प्रकाश राज ने आरोपों को बताया गलत प्रकाश राज पहले भी इन आरोपों को खारिज कर चुके हैं। उनका कहना है कि वह केवल तमिलनाडु में अपने मतदान अधिकार का इस्तेमाल करते हैं और अन्य राज्यों की मतदाता सूची में नाम होने के दावे गलत हैं। हाल ही में एक और विवाद में फंसे थे अभिनेता हाल ही में आंध्र प्रदेश के तिरुपति में भी उनके खिलाफ एक आपराधिक शिकायत दर्ज की गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि अभिनेता के कुछ सार्वजनिक बयानों से हिंदू देवी-देवताओं और रामायण से जुड़ी धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं। यह शिकायत भाजपा नेता और तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) ट्रस्ट बोर्ड के सदस्य जी. भानुप्रकाश रेड्डी द्वारा दर्ज कराई गई थी। आने वाली फिल्में वर्क फ्रंट की बात करें तो प्रकाश राज हाल ही में तमिल फिल्म 'कालिदास 2' और तेलुगु फिल्मों 'सीता पायनम', 'एस सरस्वती' तथा 'डकैत: ए लव स्टोरी' में नजर आए थे। आने वाले समय में वह हिंदी फिल्म 'दृश्यम 3', तेलुगु फिल्म 'स्पिरिट', 'वाराणसी' और तमिल फिल्म 'जना नायगन' में दिखाई देंगे।
अमेरिका में भारतीय मूल के एक कारोबारी की नागरिकता खतरे में पड़ गई है। ट्रंप प्रशासन द्वारा शुरू किए गए व्यापक 'डी-नेचुरलाइजेशन' अभियान के तहत उन 17 अमेरिकी नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई है, जिन पर नागरिकता प्राप्त करने की प्रक्रिया के दौरान कथित रूप से गलत जानकारी देने, तथ्य छिपाने या धोखाधड़ी करने के आरोप हैं। इन 17 लोगों में भारतीय मूल के व्यवसायी नीरज शर्मा का नाम भी शामिल है। अमेरिकी न्याय विभाग ने उनके खिलाफ नागरिकता रद्द करने की कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी है। कौन हैं नीरज शर्मा? 50 वर्षीय नीरज शर्मा न्यू जर्सी स्थित स्टाफिंग कंपनी मैग्नाविजन एलएलसी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) रह चुके हैं। अमेरिकी न्याय विभाग के अनुसार, उन्होंने H-1B वीजा से जुड़े 11 कथित फर्जी आवेदन दाखिल किए थे। आरोप है कि इन आवेदनों में यह दिखाया गया था कि विदेशी कर्मचारियों को एक बड़ी वैश्विक वित्तीय संस्था में नियुक्त किया जाएगा, जबकि दस्तावेजों में कथित रूप से जाली हस्ताक्षर और भ्रामक जानकारियों का इस्तेमाल किया गया था। नागरिकता आवेदन में जानकारी छिपाने का आरोप अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि वर्ष 2017 में नागरिकता के लिए आवेदन करते समय नीरज शर्मा ने ऐसे किसी अपराध में शामिल होने से इनकार किया था, जिसके लिए उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया हो। उन्होंने यह भी कहा था कि उन्होंने कभी आव्रजन लाभ हासिल करने के लिए अमेरिकी अधिकारियों को गलत जानकारी नहीं दी। इसी आधार पर अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा (USCIS) ने उनका आवेदन मंजूर कर लिया था और दिसंबर 2017 में उन्हें अमेरिकी नागरिकता प्रदान कर दी गई थी। बाद में 2015 से 2017 के बीच की गतिविधियों से जुड़े वीजा धोखाधड़ी मामले में उन्हें दोषी ठहराया गया। अब न्याय विभाग का कहना है कि यदि नागरिकता आवेदन के दौरान महत्वपूर्ण जानकारी छिपाई गई थी, तो उनकी नागरिकता रद्द की जा सकती है। ट्रंप प्रशासन का बड़ा अभियान नीरज शर्मा का मामला ट्रंप प्रशासन की उस व्यापक कार्रवाई का हिस्सा है, जिसके तहत प्राकृतिक रूप से अमेरिकी नागरिक बने लोगों (Naturalized Citizens) की नागरिकता की समीक्षा की जा रही है। न्याय विभाग के अनुसार, जिन 17 लोगों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई है, उनमें ऐसे व्यक्ति शामिल हैं जिन पर आव्रजन धोखाधड़ी, वित्तीय अपराध, नाबालिगों के खिलाफ अपराध, मादक पदार्थों की तस्करी और अन्य गंभीर अपराधों के आरोप हैं या वे इन मामलों में दोषी ठहराए जा चुके हैं। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि यह अभियान उन मामलों पर केंद्रित है, जहां नागरिकता प्राप्त करने के लिए कथित रूप से झूठी जानकारी, फर्जी दस्तावेज या महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने का सहारा लिया गया था। क्या है डी-नेचुरलाइजेशन प्रक्रिया? डी-नेचुरलाइजेशन (Denaturalization) वह कानूनी प्रक्रिया है जिसके तहत किसी व्यक्ति की अमेरिकी नागरिकता रद्द की जा सकती है, यदि यह साबित हो जाए कि उसने नागरिकता प्राप्त करने के दौरान धोखाधड़ी की, महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए या गलत जानकारी दी। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे मामलों में अंतिम फैसला संघीय अदालतें करती हैं और सरकार को अपने आरोपों को कानूनी रूप से साबित करना होता है। फिलहाल नीरज शर्मा के मामले में कानूनी प्रक्रिया जारी है और अंतिम निर्णय अदालत द्वारा लिया जाएगा।
पटना, एजेंसियां। पटना में चर्चित फायरिंग मामले को लेकर शिक्षक और कोचिंग संचालक Khan Sir ने सिविल कोर्ट में अग्रिम जमानत (एंटीसिपेटरी बेल) याचिका दायर की है। अपनी याचिका में उन्होंने दावा किया है कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप पूरी तरह निराधार हैं और गोलीबारी की घटना से उनका कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। मामले में अब मंगलवार को सुनवाई होगी। वकील ने सरेंडर की अटकलों पर लगाया विराम एफआईआर दर्ज होने के बाद यह चर्चा तेज थी कि खान सर अदालत में आत्मसमर्पण कर सकते हैं। हालांकि उनके अधिवक्ता अरविंद कुमार महुआर ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि वे सरेंडर नहीं करेंगे, बल्कि कानूनी प्रक्रिया के तहत अग्रिम जमानत की मांग करेंगे। इसी क्रम में सोमवार को पटना सिविल कोर्ट में जमानत याचिका दाखिल की गई। गार्ड्स की जमानत पर फैसला सुरक्षित मामले में गिरफ्तार दोनों सुरक्षा गार्डों की जमानत याचिका पर भी अदालत में सुनवाई हुई। सुनवाई पूरी होने के बाद कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। दूसरी ओर, ज्ञान बिंदु कोचिंग के संचालक रोशन आनंद की रिहाई को लेकर भी अदालत में बहस हुई, लेकिन इस मामले में भी फैसला सुरक्षित रखा गया है। 2 जून की रात हुई थी फायरिंग पूरा मामला 2 जून की रात का है, जब खान सर की कोचिंग के बाहर फायरिंग, पथराव और मारपीट की घटना सामने आई थी। जांच के दौरान पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज के आधार पर रोशन आनंद को गिरफ्तार किया था। बाद में एक वीडियो सामने आया, जिसमें खान सर के दो गार्ड कथित तौर पर फायरिंग करते दिखाई दिए। गार्ड्स के बयान के बाद बढ़ीं मुश्किलें पुलिस पूछताछ में दोनों गार्डों ने कथित रूप से कहा कि उन्होंने खान सर के निर्देश पर गोली चलाई थी। इसी आधार पर पुलिस ने खान सर के खिलाफ हत्या के प्रयास और आर्म्स एक्ट के तहत मामला दर्ज किया। हालांकि खान सर ने इन आरोपों को खारिज करते हुए खुद को निर्दोष बताया है।
पटना, एजेंसियां। पटना हाईकोर्ट को नई मुख्य न्यायाधीश मिल गई हैं। न्यायमूर्ति Meenakshi M. Rai ने शुक्रवार को पटना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस पद की शपथ ली। यह शपथ समारोह पटना के राजभवन में आयोजित किया गया, जहां बिहार के राज्यपाल सैयद अता हसनैन ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। इस अवसर पर मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री सहित कई वरिष्ठ अधिकारी और गणमान्य लोग मौजूद रहे। न्यायमूर्ति संगम कुमार साहू की जगह ली जिम्मेदारी न्यायमूर्ति मीनाक्षी राय ने इस पद पर न्यायमूर्ति संगम कुमार साहू का स्थान लिया है, जो 4 जून को सेवानिवृत्त हुए थे। अब पटना हाईकोर्ट की कमान उनके हाथों में आ गई है। उम्मीद जताई जा रही है कि उनके लंबे न्यायिक अनुभव से बिहार की न्यायिक व्यवस्था और अधिक मजबूत होगी तथा लंबित मामलों के निपटारे में तेजी आएगी। 30 वर्षों से अधिक का समृद्ध न्यायिक अनुभव न्यायमूर्ति मीनाक्षी एम. राय के पास 30 साल से अधिक का न्यायिक अनुभव है। उन्होंने अपने करियर में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया है और न्यायपालिका में अपनी अलग पहचान बनाई है। उन्हें एक ईमानदार, अनुभवी और दक्ष न्यायिक अधिकारी के रूप में जाना जाता है। उनका प्रशासनिक और न्यायिक दोनों क्षेत्रों में योगदान उल्लेखनीय रहा है। शिक्षा और शुरुआती करियर मीनाक्षी राय का जन्म 12 जुलाई 1964 को सिक्किम में हुआ था। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्री राम कॉलेज से राजनीति विज्ञान में स्नातक किया और इसके बाद कैंपस लॉ सेंटर से एलएलबी की डिग्री प्राप्त की। वर्ष 1990 में उन्होंने दिल्ली बार काउंसिल में अधिवक्ता के रूप में पंजीकरण कराया और दिल्ली हाईकोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट में वकालत शुरू की। न्यायिक सेवा में ऐतिहासिक उपलब्धियां उसी वर्ष उन्हें सिक्किम न्यायिक सेवा में न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी सह सिविल जज के रूप में नियुक्त किया गया। वह सिक्किम की पहली महिला बनीं जिन्हें इस पद पर नियुक्त किया गया था, जो उनके करियर की एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कार्य अपने लंबे करियर में उन्होंने जिला एवं सत्र न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट जज, रजिस्ट्रार जनरल, एनडीपीएस मामलों की विशेष न्यायाधीश और भ्रष्टाचार निरोधक मामलों की जज जैसे कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया है। न्यायपालिका में उनकी प्रशासनिक क्षमता और निर्णय लेने की दक्षता की व्यापक सराहना होती रही है। 2015 में बनीं हाईकोर्ट जज 15 अप्रैल 2015 को उन्हें सिक्किम हाईकोर्ट का स्थायी न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। लगभग एक दशक तक वहां सेवाएं देने के बाद अब उन्हें पटना हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश की जिम्मेदारी सौंपी गई है। उनके अनुभव और नेतृत्व क्षमता को देखते हुए न्यायिक व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव की उम्मीद जताई जा रही है।
रांची। रांची के डोरंडा थाना क्षेत्र स्थित बुलकामन टोली में जमीन विवाद से जुड़े मारपीट मामले में अदालत ने नौ आरोपियों को दोषी करार दिया है। न्यायिक दंडाधिकारी मनीष कुमार सिंह की अदालत ने मामले की सुनवाई पूरी करने के बाद सभी आरोपियों के खिलाफ आरोपों को सिद्ध माना। हालांकि अदालत ने दोषियों को प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट का लाभ देते हुए चेतावनी के साथ रिहा कर दिया। नौ लोगों को ठहराया गया दोषी अदालत ने परमेश कुमार गुप्ता, राजेश कुमार गुप्ता, प्रमोद कुमार गुप्ता, अनिल कुमार गुप्ता, रुपेश गुप्ता, सुनील कुमार गुप्ता, सुधीर कुमार गुप्ता, अभिषेक गुप्ता और रामचंद्र साहू को दोषी करार दिया। मामले में प्रस्तुत साक्ष्यों और गवाहों के बयानों के आधार पर अदालत ने यह फैसला सुनाया। वर्ष 2019 की घटना पर आया फैसला डोरंडा थाना में दर्ज प्राथमिकी के अनुसार, 13 फरवरी 2019 की रात करीब 10:30 बजे सुधा गुप्ता अपने घर के पास स्थित जमीन पर बोरिंग का कार्य करा रही थीं। इसी दौरान आरोपी वहां पहुंचे और बोरिंग का काम रुकवा दिया। शिकायत के अनुसार, जमीन को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद चल रहा था। विरोध करने पर हमला करने का आरोप प्राथमिकी में कहा गया कि जब सुधा गुप्ता के पुत्र राहुल गुप्ता और विकास गुप्ता ने इसका विरोध किया तो आरोपियों ने उनके साथ मारपीट की। विकास गुप्ता पर धारदार हथियार से हमला करने का भी आरोप लगाया गया था। विवाद के दौरान बीच-बचाव करने पहुंचीं सुधा गुप्ता को भी धक्का देकर गिरा दिया गया। प्रोबेशन एक्ट का मिला लाभ मामले में दोष सिद्ध होने के बाद अदालत ने सभी आरोपियों को प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट का लाभ दिया। इसके तहत उन्हें भविष्य में कानून का पालन करने और इस तरह की घटनाओं से दूर रहने की चेतावनी देकर रिहा कर दिया गया। अदालत के इस फैसले के साथ सात वर्ष पुराने मामले का निपटारा हो गया।
Benjamin Netanyahu की आपराधिक मामलों में चल रही सुनवाई के दौरान अदालत में होने वाली उनकी गवाही एक बार फिर स्थगित कर दी गई है। इजरायली मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रधानमंत्री के वकील ने अदालत को बताया कि नेतन्याहू पूरे दिन सुरक्षा और कूटनीतिक बैठकों में व्यस्त रहेंगे। बताया गया है कि बचाव पक्ष की ओर से यरुशलम जिला अदालत को एक गोपनीय कार्यक्रम भी सौंपा गया, जिसमें देर रात तक निर्धारित बैठकों का उल्लेख किया गया था। पहले भी टल चुकी है पेशी यह पहली बार नहीं है जब नेतन्याहू की अदालत में पेशी टाली गई हो। इससे पहले 27 अप्रैल को भी सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए उनकी गवाही अनिश्चित समय के लिए स्थगित कर दी गई थी। इसी वर्ष अदालत ने सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़ी जिम्मेदारियों को देखते हुए उनकी कुछ अन्य निर्धारित पेशियां भी रद्द कर दी थीं। सरकारी वकीलों ने जताई नाराजगी सरकारी वकीलों ने इस फैसले पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि प्रधानमंत्री को अदालत की कार्यवाही के अनुसार अपना कार्यक्रम तय करना चाहिए ताकि जिरह की प्रक्रिया समय पर पूरी हो सके। इसके बावजूद अदालत ने नेतन्याहू की अनुपस्थिति की अनुमति देते हुए दूसरे गवाह की गवाही सुनने का फैसला किया। अदालत ने दूसरे गवाह को बुलाया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह फैसला यरुशलम जिला अदालत के न्यायाधीशों: Rivka Friedman-Feldman Moshe Bar-Am Oded Shaham की पीठ ने लिया। अब अदालत नेतन्याहू के पूर्व सहयोगी और राज्य गवाह Shlomo Filber की पत्नी Ilanit Filber की गवाही सुनेगी। ‘केस 4000’ में गंभीर आरोप यह मामला चर्चित “केस 4000” से जुड़ा है, जिसे Bezeq-Walla प्रकरण भी कहा जाता है। इसे नेतन्याहू के खिलाफ चल रहे सबसे गंभीर मामलों में माना जाता है। आरोप है कि नेतन्याहू ने कारोबारी Shaul Elovitch की टेलीकॉम कंपनी Bezeq को सरकारी स्तर पर लाभ पहुंचाने वाले फैसलों को आगे बढ़ाया। इसके बदले उनसे जुड़े समाचार प्लेटफॉर्म Walla! पर प्रधानमंत्री के पक्ष में सकारात्मक कवरेज प्रकाशित किए जाने का आरोप है। नेतन्याहू ने आरोपों से किया इनकार नेतन्याहू लगातार इन सभी आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताते रहे हैं। उन्होंने कथित “डायरेक्टिव मीटिंग” समेत कई आरोपों को खारिज किया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, साल 2022 में श्लोमो फिलबर की गवाही में कई विरोधाभास सामने आए थे, जिसके बाद सरकारी वकीलों ने उनके साथ हुए स्टेट विटनेस समझौते को रद्द करने की मांग भी की थी। दिसंबर 2024 से जारी है ट्रायल नेतन्याहू ने पहली बार दिसंबर 2024 में अदालत में गवाही दी थी। जून 2025 से मामले में जिरह का चरण शुरू हुआ, जो अब भी जारी है। इजरायल की राजनीति और न्यायिक व्यवस्था के लिहाज से यह मामला बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि किसी मौजूदा प्रधानमंत्री के खिलाफ चल रहा यह सबसे चर्चित भ्रष्टाचार मुकदमों में शामिल है।
Sabarimala Temple में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मामले में Supreme Court of India की नौ सदस्यीय संविधान पीठ में सोमवार को अहम सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान मासिक धर्म, धार्मिक आस्था और सामाजिक सुधार जैसे मुद्दों पर तीखी बहस देखने को मिली। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि मासिक धर्म को “वर्जना” या “कलंक” मानना इस बात पर निर्भर करता है कि कोई व्यक्ति उसे किस नजरिए से देखता है। जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणी बनी चर्चा का केंद्र मामले में एक हस्तक्षेपकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील Vijay Hansaria ने दलील दी कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक का आधार उनकी मासिक धर्म वाली उम्र है। उन्होंने कहा कि समाज में अक्सर मासिक धर्म को कलंक और वर्जना की तरह देखा जाता है। इस पर संविधान पीठ में शामिल जस्टिस B. V. Nagarathna ने टिप्पणी करते हुए कहा: “यह वर्जना तब है अगर आप इसे उसी नजरिए से देखते हैं। सवाल यह है कि एक भक्त इसे किस नजरिए से देखता है, न कि कोई गैर-भक्त।” उनकी यह टिप्पणी सुनवाई के दौरान चर्चा का प्रमुख विषय बन गई। कोर्ट बोला- सामाजिक सुधार के नाम पर धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं केरल सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Jaideep Gupta ने दलील दी कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म के मूल पहलुओं को समाप्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म में पवित्र स्थलों पर पूजा का अधिकार एक महत्वपूर्ण धार्मिक पहलू है और यदि उस व्यवस्था को बदला जाता है, तो यह श्रद्धालुओं के अधिकारों का उल्लंघन होगा। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25(1) के तहत मिलने वाली धार्मिक स्वतंत्रता को सामाजिक सुधार के नाम पर खत्म नहीं किया जा सकता। “अगर जनता चाहती है तो सामाजिक सुधार संभव” सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश Surya Kant ने कहा कि यदि देश के लोग अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से किसी सामाजिक सुधार की मांग करते हैं, तो अदालत उस पर विचार कर सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यदि लोगों की इच्छा और सहमति के खिलाफ कुछ थोपा जाता है, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है। नौ जजों की संविधान पीठ कर रही सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ धार्मिक स्वतंत्रता और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े कई मामलों की सुनवाई कर रही है। इस पीठ में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रशांत बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची भी शामिल हैं। दाऊदी बोहरा समेत कई धार्मिक मामलों पर भी सुनवाई संविधान पीठ सिर्फ सबरीमाला मामले ही नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी सुनवाई कर रही है। इनमें Dawoodi Bohra community से जुड़े मामलों समेत विभिन्न धार्मिक परंपराओं और अधिकारों के मुद्दे शामिल हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।