Legal News

Israeli Prime Minister Benjamin Netanyahu arrives for court proceedings linked to ongoing corruption allegations.Netanyahu Corruption Trial Hearing Delayed
करप्शन केस में फिर टली नेतन्याहू की गवाही, अदालत में सुरक्षा कारणों का हवाला

Benjamin Netanyahu की आपराधिक मामलों में चल रही सुनवाई के दौरान अदालत में होने वाली उनकी गवाही एक बार फिर स्थगित कर दी गई है। इजरायली मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रधानमंत्री के वकील ने अदालत को बताया कि नेतन्याहू पूरे दिन सुरक्षा और कूटनीतिक बैठकों में व्यस्त रहेंगे। बताया गया है कि बचाव पक्ष की ओर से यरुशलम जिला अदालत को एक गोपनीय कार्यक्रम भी सौंपा गया, जिसमें देर रात तक निर्धारित बैठकों का उल्लेख किया गया था। पहले भी टल चुकी है पेशी यह पहली बार नहीं है जब नेतन्याहू की अदालत में पेशी टाली गई हो। इससे पहले 27 अप्रैल को भी सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए उनकी गवाही अनिश्चित समय के लिए स्थगित कर दी गई थी। इसी वर्ष अदालत ने सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़ी जिम्मेदारियों को देखते हुए उनकी कुछ अन्य निर्धारित पेशियां भी रद्द कर दी थीं। सरकारी वकीलों ने जताई नाराजगी सरकारी वकीलों ने इस फैसले पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि प्रधानमंत्री को अदालत की कार्यवाही के अनुसार अपना कार्यक्रम तय करना चाहिए ताकि जिरह की प्रक्रिया समय पर पूरी हो सके। इसके बावजूद अदालत ने नेतन्याहू की अनुपस्थिति की अनुमति देते हुए दूसरे गवाह की गवाही सुनने का फैसला किया। अदालत ने दूसरे गवाह को बुलाया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह फैसला यरुशलम जिला अदालत के न्यायाधीशों: Rivka Friedman-Feldman Moshe Bar-Am Oded Shaham की पीठ ने लिया। अब अदालत नेतन्याहू के पूर्व सहयोगी और राज्य गवाह Shlomo Filber की पत्नी Ilanit Filber की गवाही सुनेगी। ‘केस 4000’ में गंभीर आरोप यह मामला चर्चित “केस 4000” से जुड़ा है, जिसे Bezeq-Walla प्रकरण भी कहा जाता है। इसे नेतन्याहू के खिलाफ चल रहे सबसे गंभीर मामलों में माना जाता है। आरोप है कि नेतन्याहू ने कारोबारी Shaul Elovitch की टेलीकॉम कंपनी Bezeq को सरकारी स्तर पर लाभ पहुंचाने वाले फैसलों को आगे बढ़ाया। इसके बदले उनसे जुड़े समाचार प्लेटफॉर्म Walla! पर प्रधानमंत्री के पक्ष में सकारात्मक कवरेज प्रकाशित किए जाने का आरोप है। नेतन्याहू ने आरोपों से किया इनकार नेतन्याहू लगातार इन सभी आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताते रहे हैं। उन्होंने कथित “डायरेक्टिव मीटिंग” समेत कई आरोपों को खारिज किया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, साल 2022 में श्लोमो फिलबर की गवाही में कई विरोधाभास सामने आए थे, जिसके बाद सरकारी वकीलों ने उनके साथ हुए स्टेट विटनेस समझौते को रद्द करने की मांग भी की थी। दिसंबर 2024 से जारी है ट्रायल नेतन्याहू ने पहली बार दिसंबर 2024 में अदालत में गवाही दी थी। जून 2025 से मामले में जिरह का चरण शुरू हुआ, जो अब भी जारी है। इजरायल की राजनीति और न्यायिक व्यवस्था के लिहाज से यह मामला बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि किसी मौजूदा प्रधानमंत्री के खिलाफ चल रहा यह सबसे चर्चित भ्रष्टाचार मुकदमों में शामिल है।  

surbhi मई 19, 2026 0
Supreme Court hearing on Sabarimala Temple case discussing women’s entry and religious freedom issues
सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, बोला- मासिक धर्म को कैसे देखते हैं, यह नजरिए की बात

Sabarimala Temple में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मामले में Supreme Court of India की नौ सदस्यीय संविधान पीठ में सोमवार को अहम सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान मासिक धर्म, धार्मिक आस्था और सामाजिक सुधार जैसे मुद्दों पर तीखी बहस देखने को मिली। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि मासिक धर्म को “वर्जना” या “कलंक” मानना इस बात पर निर्भर करता है कि कोई व्यक्ति उसे किस नजरिए से देखता है। जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणी बनी चर्चा का केंद्र मामले में एक हस्तक्षेपकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील Vijay Hansaria ने दलील दी कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक का आधार उनकी मासिक धर्म वाली उम्र है। उन्होंने कहा कि समाज में अक्सर मासिक धर्म को कलंक और वर्जना की तरह देखा जाता है। इस पर संविधान पीठ में शामिल जस्टिस B. V. Nagarathna ने टिप्पणी करते हुए कहा: “यह वर्जना तब है अगर आप इसे उसी नजरिए से देखते हैं। सवाल यह है कि एक भक्त इसे किस नजरिए से देखता है, न कि कोई गैर-भक्त।” उनकी यह टिप्पणी सुनवाई के दौरान चर्चा का प्रमुख विषय बन गई। कोर्ट बोला- सामाजिक सुधार के नाम पर धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं केरल सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Jaideep Gupta ने दलील दी कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म के मूल पहलुओं को समाप्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म में पवित्र स्थलों पर पूजा का अधिकार एक महत्वपूर्ण धार्मिक पहलू है और यदि उस व्यवस्था को बदला जाता है, तो यह श्रद्धालुओं के अधिकारों का उल्लंघन होगा। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25(1) के तहत मिलने वाली धार्मिक स्वतंत्रता को सामाजिक सुधार के नाम पर खत्म नहीं किया जा सकता। “अगर जनता चाहती है तो सामाजिक सुधार संभव” सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश Surya Kant ने कहा कि यदि देश के लोग अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से किसी सामाजिक सुधार की मांग करते हैं, तो अदालत उस पर विचार कर सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यदि लोगों की इच्छा और सहमति के खिलाफ कुछ थोपा जाता है, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है। नौ जजों की संविधान पीठ कर रही सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ धार्मिक स्वतंत्रता और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े कई मामलों की सुनवाई कर रही है। इस पीठ में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रशांत बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची भी शामिल हैं। दाऊदी बोहरा समेत कई धार्मिक मामलों पर भी सुनवाई संविधान पीठ सिर्फ सबरीमाला मामले ही नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी सुनवाई कर रही है। इनमें Dawoodi Bohra community से जुड़े मामलों समेत विभिन्न धार्मिक परंपराओं और अधिकारों के मुद्दे शामिल हैं।  

surbhi मई 13, 2026 0
Supreme Court of India building in New Delhi symbolizing increase in judges strength decision
कैबिनेट का बड़ा फैसला: सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करने को मंजूरी, संसद में आएगा बिल

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने देश की न्यायिक व्यवस्था को और प्रभावी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने Supreme Court of India में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इस फैसले के तहत अब सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश सहित कुल जजों की संख्या 34 से बढ़ाकर 38 की जाएगी। सरकार इस बदलाव को लागू करने के लिए संसद के आगामी सत्र में एक संशोधन विधेयक पेश करेगी। केंद्रीय मंत्री Ashwini Vaishnaw ने कैबिनेट बैठक के बाद जानकारी देते हुए बताया कि वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में एक मुख्य न्यायाधीश और 33 अन्य जज कार्यरत हैं। प्रस्तावित संशोधन के लागू होने के बाद चार नए न्यायाधीशों की नियुक्ति का रास्ता साफ हो जाएगा, जिससे अदालत की कुल क्षमता बढ़ेगी और मामलों की सुनवाई में तेजी आएगी। दरअसल, देश की शीर्ष अदालत पर लगातार बढ़ते मामलों का दबाव लंबे समय से चिंता का विषय बना हुआ है। हजारों की संख्या में लंबित मामलों के कारण कई महत्वपूर्ण मामलों में सुनवाई में देरी होती रही है। जजों की संख्या बढ़ने से न केवल अधिक बेंच गठित की जा सकेंगी, बल्कि संवैधानिक और जटिल मामलों की सुनवाई भी तेज़ गति से संभव हो सकेगी। इससे न्याय वितरण प्रणाली में सुधार आने की उम्मीद जताई जा रही है। क्यों जरूरी है यह फैसला? भारत में न्यायिक प्रक्रिया की सबसे बड़ी चुनौती मामलों का लंबित रहना है। सुप्रीम कोर्ट में कई ऐसे केस हैं, जो वर्षों से विचाराधीन हैं। जजों की संख्या बढ़ने से केसों के निपटारे की रफ्तार बढ़ेगी, जिससे आम नागरिकों को समय पर न्याय मिल सकेगा। इसके अलावा, बड़ी संवैधानिक पीठों के गठन में भी आसानी होगी, जिससे महत्वपूर्ण फैसलों में देरी नहीं होगी। इतिहास में कई बार बढ़ी संख्या सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या समय-समय पर बढ़ाई जाती रही है। 1956 के अधिनियम के तहत शुरुआत में जजों की संख्या सीमित थी। इसके बाद 1960 में इसे बढ़ाकर 13 किया गया, फिर 1986 में 25 तक पहुंचाया गया। 2009 में यह संख्या 30 और 2019 में बढ़ाकर 34 कर दी गई थी। अब एक बार फिर न्यायिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए इसमें बढ़ोतरी की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से सुप्रीम कोर्ट की कार्यक्षमता में सुधार होगा। अधिक जज होने से मामलों की सुनवाई में तेजी आएगी, लंबित मामलों का बोझ कम होगा और न्याय प्रणाली अधिक सुलभ व प्रभावी बनेगी। साथ ही, यह कदम देश में कानून के शासन को मजबूत करने की दिशा में भी अहम माना जा रहा है।

surbhi मई 6, 2026 0
Delhi High Court delivers key ruling on corporate tax and shareholder income
टैक्स पर दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: कंपनी की कमाई को शेयरधारकों की आय नहीं माना जा सकता

टैक्स व्यवस्था को लेकर एक अहम कानूनी स्पष्टता देते हुए Delhi High Court ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि किसी कंपनी की कमाई को उसके शेयरधारकों की व्यक्तिगत आय नहीं माना जा सकता। यह निर्णय कॉर्पोरेट टैक्सेशन के सिद्धांतों को और मजबूत करता है और निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शन भी प्रदान करता है। कंपनी और शेयरधारक अलग-अलग इकाइयां Delhi High Court ने अपने फैसले में कहा कि कानून की नजर में कंपनी एक स्वतंत्र कानूनी इकाई होती है, जो अपने शेयरधारकों से अलग होती है। भले ही किसी व्यक्ति के पास कंपनी के 100% शेयर क्यों न हों, वह कंपनी की संपत्तियों का मालिक नहीं माना जाएगा, बल्कि केवल शेयरों का मालिक होगा। कंपनी की आय पर शेयरधारकों से टैक्स नहीं कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर कंपनी कोई मुनाफा कमाती है या अपनी संपत्ति बेचकर आय अर्जित करती है, तो उस पर सीधे तौर पर शेयरधारकों से टैक्स नहीं वसूला जा सकता। यह आय कंपनी की मानी जाएगी, न कि उसके निवेशकों की। डिविडेंड पर लगेगा टैक्स हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया कि यदि शेयरधारकों को कंपनी से डिविडेंड प्राप्त होता है, तो उस आय पर लागू कानून के तहत टैक्स लगाया जा सकता है। यानी निवेशकों की टैक्स देनदारी केवल उस लाभ तक सीमित होगी, जो उन्हें कंपनी से प्रत्यक्ष रूप से मिलता है। इनकम टैक्स विभाग की अपील खारिज मामले में Income Tax Department की ओर से शेयरधारकों पर टैक्स लगाने की मांग की गई थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। अदालत ने ट्रिब्यूनल के पहले के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि टैक्स केवल शेयरों से मिलने वाली आय पर ही लगाया जा सकता है, न कि कंपनी की कुल कमाई पर। यह फैसला कॉर्पोरेट सेक्टर और निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे टैक्स से जुड़ी कई जटिलताओं पर स्पष्टता मिलती है और कानूनी विवादों की संभावना भी कम हो सकती है।  

surbhi मई 1, 2026 0
Allahabad High Court rules transgender community has no legal right to demand traditional badhai or neg
इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: किन्नरों को 'बधाई' मांगने का कानूनी अधिकार नहीं

'नेग' वसूली को कानूनी मान्यता नहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक अहम फैसले में कहा है कि किन्नर समुदाय को पारंपरिक 'बधाई' या 'नेग' मांगने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति से जबरन धन वसूलना कानूनन अपराध की श्रेणी में आ सकता है। क्षेत्र तय करने की मांग अदालत ने ठुकराई यह फैसला गोंडा जिले की रेखा देवी नामक ट्रांसजेंडर द्वारा दायर याचिका पर सुनाया गया। याचिका में उन्होंने जरवल कस्बे के कटी का पुल से घाघरा घाट और कर्नलगंज के सरयू पुल तक के इलाके को 'बधाई' संग्रह के लिए उनके विशेष क्षेत्र के रूप में घोषित करने की मांग की थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि वह वर्षों से इस इलाके में नेग लेती आ रही हैं और अन्य लोगों के आने से विवाद की स्थिति पैदा हो जाती है। कोर्ट ने क्या कहा? न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने कहा कि किसी भी प्रकार का टैक्स, शुल्क या धनराशि केवल कानून के तहत ही वसूली जा सकती है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि "किसी भी नागरिक से उसकी इच्छा से या दबाव बनाकर धन लेना स्वीकार्य नहीं है। केवल वही भुगतान वैध है, जिसे कानून की अनुमति हो।" ट्रांसजेंडर कानून में भी नहीं है ऐसा प्रावधान कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 में भी 'बधाई' या 'नेग' मांगने का कोई कानूनी अधिकार नहीं दिया गया है। जबरन वसूली पर लग सकती हैं आपराधिक धाराएं अदालत ने चेतावनी दी कि यदि किसी से जबरन धन वसूला जाता है, तो यह भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत दंडनीय अपराध हो सकता है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी मांग को मान्यता देना अवैध वसूली को वैध ठहराने जैसा होगा, जिससे आपराधिक गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है। सामाजिक परंपरा और कानून अलग-अलग यह फैसला स्पष्ट करता है कि सामाजिक परंपराओं और कानूनी अधिकारों में अंतर होता है। किसी परंपरा के लंबे समय से चले आने मात्र से उसे कानूनी संरक्षण नहीं मिल जाता।  

surbhi अप्रैल 29, 2026 0
Congress leader Pawan Khera speaking at a press conference amid anticipatory bail controversy.
अग्रिम जमानत पर Pawan Khera: क्या है पूरा विवाद?

कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को तेलंगाना हाईकोर्ट ने एक हफ्ते की अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) दी है। इसका मतलब है कि अगर असम पुलिस उन्हें गिरफ्तार करना चाहे, तो इस अवधि में उन्हें तुरंत गिरफ्तार नहीं किया जा सकेगा। अग्रिम जमानत क्या होती है? यह गिरफ्तारी से पहले मिलने वाली राहत होती है कोर्ट कहता है कि आरोपी को सीधे जेल न भेजा जाए लेकिन आरोपी को जांच में पूरा सहयोग करना पड़ता है पूरा मामला क्या है? 5 अप्रैल को पवन खेड़ा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी इसमें उन्होंने असम के CM हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा पर आरोप लगाए: एक से ज्यादा पासपोर्ट होने का दावा विदेशों में संपत्ति होने का आरोप चुनावी हलफनामे में जानकारी न देने की बात इन बयानों के बाद असम में उनके खिलाफ केस दर्ज किया गया कोर्ट ने क्या शर्तें रखीं? जमानत सिर्फ 7 दिन के लिए वैध है इस दौरान: खेड़ा को असम की संबंधित कोर्ट/जांच एजेंसी के सामने पेश होना होगा जांच में सहयोग करना होगा इसके बाद उन्हें रेगुलर बेल (स्थायी जमानत) के लिए आवेदन करना पड़ेगा

surbhi अप्रैल 10, 2026 0
Mehul Choksi in Belgium court as extradition to India clears major legal hurdle
मेहुल चोकसी प्रत्यर्पण केस: भारत वापसी का रास्ता हुआ साफ, बेल्जियम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

पंजाब नेशनल बैंक घोटाले के मुख्य आरोपी और भगोड़े हीरा कारोबारी मेहुल चोकसी को भारत लाने की प्रक्रिया अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिख रही है। बेल्जियम की एंटवर्प कोर्ट ऑफ अपील ने स्पष्ट संकेत दिया है कि चोकसी को भारत प्रत्यर्पित किया जा सकता है। एंटवर्प कोर्ट ने क्या कहा? बेल्जियम के एंटवर्प कोर्ट ऑफ अपील ने 3 अप्रैल को दिए अपने फैसले में: चोकसी के भारत प्रत्यर्पण की सिफारिश न्याय मंत्रालय से की कहा कि उस पर धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश जैसे आरोप प्रथम दृष्टया सही बनते हैं उसके “अपहरण” के दावे को खारिज कर दिया हालांकि, सबूत नष्ट करने से जुड़े एक आरोप को स्थानीय कानून के आधार पर हटा दिया गया। शरण की मांग भी ठुकराई गई चोकसी ने बेल्जियम में शरण लेने की कोशिश की थी, लेकिन अदालत ने उसकी इस याचिका को भी खारिज कर दिया। इससे उसके बचाव के विकल्प और सीमित हो गए हैं। अब आगे क्या? अब अंतिम फैसला बेल्जियम के न्याय मंत्रालय को लेना है। मंत्रालय आने वाले महीनों में तय करेगा कि चोकसी को भारत भेजा जाए या नहीं भारत सरकार पहले से ही उसके प्रत्यर्पण के लिए प्रयासरत है गिरफ्तारी और कानूनी प्रक्रिया अप्रैल 2025 में बेल्जियम पुलिस ने चोकसी को एंटवर्प में गिरफ्तार किया था दिसंबर 2025 में बेल्जियम की शीर्ष अदालत ने भी उसकी याचिका खारिज कर दी थी नीरव मोदी को भी झटका इस केस से जुड़े एक और आरोपी नीरव मोदी को भी हाल ही में बड़ा झटका लगा है। ब्रिटेन की अदालत ने उसकी प्रत्यर्पण प्रक्रिया को चुनौती देने वाली अपील खारिज कर दी। क्या मतलब है इस फैसले का? यह फैसला भारत के लिए बड़ी कानूनी जीत माना जा रहा है। अगर अंतिम मंजूरी मिलती है, तो चोकसी को भारत लाकर PNB घोटाले में कानूनी कार्रवाई तेज हो सकती है।  

surbhi अप्रैल 8, 2026 0
Arvind Kejriwal at Delhi High Court hearing in excise policy case amid judge recusal controversy
शराब नीति मामला: हाईकोर्ट में आज खुद पक्ष रखेंगे केजरीवाल, जज बदलने की मांग पर भी विवाद

दिल्ली के चर्चित शराब नीति मामले में आज बड़ा घटनाक्रम देखने को मिल सकता है। आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रमुख अरविंद केजरीवाल दिल्ली हाईकोर्ट में खुद अपना पक्ष रख सकते हैं। यह मामला CBI की उस याचिका से जुड़ा है, जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा केजरीवाल, मनीष सिसोदिया समेत 23 आरोपियों को दी गई राहत को चुनौती दी गई है। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को हटाने की मांग सुनवाई से पहले केजरीवाल और अन्य आरोपियों ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से मामले से अलग होने (रिक्यूज) की मांग की। उनका कहना है कि निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं, इसलिए केस को किसी दूसरी बेंच को ट्रांसफर किया जाए। हालांकि, यह मांग खारिज कर दी गई। कोर्ट ने साफ किया कि किसी जज के खुद को मामले से अलग करने का फैसला वही जज लेते हैं। क्या होता है ‘रिक्यूजल’? रिक्यूजल का मतलब होता है कि अगर किसी जज पर पक्षपात या हितों के टकराव का शक हो, तो वह खुद ही मामले की सुनवाई से अलग हो सकते हैं, ताकि न्याय प्रक्रिया निष्पक्ष बनी रहे। ट्रायल कोर्ट ने दी थी राहत 27 फरवरी को ट्रायल कोर्ट ने केजरीवाल, मनीष सिसोदिया समेत सभी 23 आरोपियों को इस मामले में राहत दी थी। कोर्ट ने CBI की जांच पर भी सवाल उठाए थे और उसकी आलोचना की थी। हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी CBI की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस शर्मा ने 9 मार्च को कहा था कि पहली नजर में (प्राइमा फेसी) ट्रायल कोर्ट की टिप्पणियां सही नहीं लगतीं और इस पर दोबारा विचार जरूरी है। साथ ही, उन्होंने CBI जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश पर भी रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला केजरीवाल पहले ही हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से जज बदलने की मांग कर चुके हैं, लेकिन यह मांग खारिज हो चुकी है। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) भी दाखिल की है। जेल में रहे केजरीवाल और सिसोदिया इस मामले में केजरीवाल को 2024 लोकसभा चुनाव के दौरान गिरफ्तार किया गया था और वे 156 दिन तक हिरासत में रहे। बाद में उन्हें सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली। वहीं, मनीष सिसोदिया इस केस में करीब 530 दिन तक जेल में रहे थे। क्या है पूरा मामला? दिल्ली सरकार ने 2021 में नई आबकारी (शराब) नीति लागू की थी, जिसका उद्देश्य राजस्व बढ़ाना और शराब व्यापार में सुधार करना था। बाद में अनियमितताओं के आरोप लगने पर इस नीति को वापस ले लिया गया। इसके बाद उपराज्यपाल विनय सक्सेना के आदेश पर CBI और ED ने जांच शुरू की। जांच एजेंसियों का आरोप है कि इस नीति के जरिए निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाया गया और भ्रष्टाचार हुआ। भावुक हुए थे केजरीवाल 27 फरवरी को ट्रायल कोर्ट से राहत मिलने के बाद केजरीवाल भावुक हो गए थे। उन्होंने कहा था, “मैंने जिंदगी में सिर्फ ईमानदारी कमाई है।” वहीं मनीष सिसोदिया ने इसे “सच की जीत” बताया था।  

surbhi अप्रैल 6, 2026 0
Allahabad High Court granting anticipatory bail in Shankaracharya case with legal scrutiny
प्रयागराज से बड़ी खबर: शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को अग्रिम जमानत, अदालत के आदेश में उठे कई अहम सवाल

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके सह-आरोपी स्वामी प्रत्यक्चैतन्य मुकुंदानंद गिरि को अग्रिम जमानत प्रदान की है। यह मामला दो लड़कों, जिनमें एक नाबालिग भी शामिल है, के साथ कथित यौन उत्पीड़न से जुड़ा है, जिसमें POCSO Act के तहत केस दर्ज किया गया था। यह आदेश जस्टिस जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ द्वारा दिया गया, जिसमें अदालत ने केवल जमानत ही नहीं दी बल्कि एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया और मामले के कई पहलुओं पर गंभीर सवाल भी खड़े किए। अदालत ने किन बिंदुओं पर उठाए सवाल? अदालत ने अपने विस्तृत आदेश में कई महत्वपूर्ण तथ्यों पर ध्यान दिलाया: 1. शिकायत दर्ज करने में देरी और प्रक्रिया पर सवाल एफआईआर 21 फरवरी 2026 को दर्ज की गई, जबकि कथित घटना की जानकारी 18 जनवरी को मिलने की बात कही गई। शिकायतकर्ता आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज ने पुलिस को जानकारी देने में देरी का कारण पूजा-पाठ में व्यस्तता बताया, जिसे अदालत ने संदिग्ध माना। 2. पीड़ितों का व्यवहार ‘सामान्य नहीं’ कोर्ट ने यह भी कहा कि पीड़ितों ने अपने अभिभावकों के बजाय एक बाहरी व्यक्ति को घटना की जानकारी दी, जो सामान्य मानवीय व्यवहार के अनुरूप नहीं है। 3. मेडिकल जांच और साक्ष्यों की कमी पीड़ितों का समय पर मेडिकल परीक्षण नहीं कराया गया। डॉक्टर की रिपोर्ट में किसी बाहरी चोट का उल्लेख नहीं है और यौन उत्पीड़न की पुष्टि भी स्पष्ट रूप से नहीं की गई। एफएसएल रिपोर्ट भी लंबित है। 4. घटनास्थल और समय में विरोधाभास एफआईआर में घटना की अवधि जनवरी 2025 से फरवरी 2026 बताई गई, जबकि एक पीड़ित ने जून 2024 में अलग-अलग स्थानों पर घटना होने का दावा किया। इससे मामले की विश्वसनीयता पर सवाल उठे। 5. पीड़ित की उम्र को लेकर भ्रम अदालत ने पाया कि एक पीड़ित कथित अवधि में वयस्क था, जबकि दूसरी अवधि में नाबालिग, जिससे आरोपों की प्रकृति पर असर पड़ता है। 6. आश्रम से संबंध पर सवाल कोर्ट ने कहा कि संबंधित पीड़ित आश्रम का छात्र नहीं है, बल्कि हरदोई के एक संस्कृत विद्यालय का छात्र है। 7. विवाद और शिकायत की तारीख एक ही कोर्ट ने यह भी नोट किया कि कथित अपराध की जानकारी मिलने और संगम स्नान को लेकर विवाद की तारीख (18 जनवरी 2026) एक ही है, जिससे मामले में और जांच की आवश्यकता बताई गई।   किन शर्तों पर मिली अग्रिम जमानत? अदालत ने दोनों आरोपियों को 50,000 रुपये के निजी मुचलके और दो जमानतदारों के साथ जमानत दी, साथ ही पांच सख्त शर्तें लगाईं: साक्ष्यों से छेड़छाड़ नहीं करेंगे गवाहों को प्रभावित नहीं करेंगे ट्रायल में सहयोग करेंगे बिना अनुमति देश नहीं छोड़ेंगे मामले पर मीडिया से बातचीत नहीं करेंगे कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी शर्त के उल्लंघन पर जमानत रद्द की जा सकती है।  

kalpana मार्च 26, 2026 0
Supreme Court verdict on SC status ending after religious conversion, impacting reservation and legal rights
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: धर्म बदलते ही खत्म होगा SC का दर्जा

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि अगर कोई दलित व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म छोड़कर किसी अन्य धर्म-जैसे ईसाई-को अपनाता है, तो उसका अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा समाप्त हो जाएगा। जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने स्पष्ट किया कि SC कैटेगरी का लाभ केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अनुयायियों को ही मिल सकता है। क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने? कोर्ट ने अपने फैसले में कहा- धर्म परिवर्तन के बाद व्यक्ति SC कैटेगरी में नहीं रहेगा ऐसे व्यक्ति को SC से जुड़े कानूनी और आरक्षण लाभ नहीं मिलेंगे SC/ST अत्याचार निवारण कानून का लाभ भी लागू नहीं होगा कोर्ट के मुताबिक, किसी अन्य धर्म को अपनाने के साथ ही SC का दर्जा स्वतः समाप्त हो जाता है। हाई कोर्ट के फैसले पर मुहर सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के पहले दिए गए फैसले को सही ठहराया। हाई कोर्ट ने कहा था कि जो व्यक्ति ईसाई धर्म अपनाता है और उसका पालन करता है, वह SC स्टेटस बरकरार नहीं रख सकता। कानूनी आधार क्या है? भारत में SC का दर्जा संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के तहत दिया जाता है, जिसमें शुरू में केवल हिंदुओं को शामिल किया गया था। बाद में इसमें सिख (1956) और बौद्ध (1990) धर्म को भी जोड़ा गया।

surbhi मार्च 24, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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surbhi मई 15, 2026 0