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CEO Faces Citizenship Review

भारतीय मूल के CEO पर अमेरिकी नागरिकता खोने का खतरा, ट्रंप प्रशासन के 'डी-नेचुरलाइजेशन' अभियान में शामिल नाम

Deepshikha जून 10, 2026 0
Indian-origin businessman facing US denaturalization proceedings amid immigration fraud investigation.
Indian-Origin CEO Faces US Citizenship Review

 

अमेरिका में भारतीय मूल के एक कारोबारी की नागरिकता खतरे में पड़ गई है। ट्रंप प्रशासन द्वारा शुरू किए गए व्यापक 'डी-नेचुरलाइजेशन' अभियान के तहत उन 17 अमेरिकी नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई है, जिन पर नागरिकता प्राप्त करने की प्रक्रिया के दौरान कथित रूप से गलत जानकारी देने, तथ्य छिपाने या धोखाधड़ी करने के आरोप हैं।

इन 17 लोगों में भारतीय मूल के व्यवसायी नीरज शर्मा का नाम भी शामिल है। अमेरिकी न्याय विभाग ने उनके खिलाफ नागरिकता रद्द करने की कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी है।

कौन हैं नीरज शर्मा?

50 वर्षीय नीरज शर्मा न्यू जर्सी स्थित स्टाफिंग कंपनी मैग्नाविजन एलएलसी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) रह चुके हैं। अमेरिकी न्याय विभाग के अनुसार, उन्होंने H-1B वीजा से जुड़े 11 कथित फर्जी आवेदन दाखिल किए थे।

आरोप है कि इन आवेदनों में यह दिखाया गया था कि विदेशी कर्मचारियों को एक बड़ी वैश्विक वित्तीय संस्था में नियुक्त किया जाएगा, जबकि दस्तावेजों में कथित रूप से जाली हस्ताक्षर और भ्रामक जानकारियों का इस्तेमाल किया गया था।

नागरिकता आवेदन में जानकारी छिपाने का आरोप

अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि वर्ष 2017 में नागरिकता के लिए आवेदन करते समय नीरज शर्मा ने ऐसे किसी अपराध में शामिल होने से इनकार किया था, जिसके लिए उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया हो। उन्होंने यह भी कहा था कि उन्होंने कभी आव्रजन लाभ हासिल करने के लिए अमेरिकी अधिकारियों को गलत जानकारी नहीं दी।

इसी आधार पर अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा (USCIS) ने उनका आवेदन मंजूर कर लिया था और दिसंबर 2017 में उन्हें अमेरिकी नागरिकता प्रदान कर दी गई थी।

बाद में 2015 से 2017 के बीच की गतिविधियों से जुड़े वीजा धोखाधड़ी मामले में उन्हें दोषी ठहराया गया। अब न्याय विभाग का कहना है कि यदि नागरिकता आवेदन के दौरान महत्वपूर्ण जानकारी छिपाई गई थी, तो उनकी नागरिकता रद्द की जा सकती है।

ट्रंप प्रशासन का बड़ा अभियान

नीरज शर्मा का मामला ट्रंप प्रशासन की उस व्यापक कार्रवाई का हिस्सा है, जिसके तहत प्राकृतिक रूप से अमेरिकी नागरिक बने लोगों (Naturalized Citizens) की नागरिकता की समीक्षा की जा रही है।

न्याय विभाग के अनुसार, जिन 17 लोगों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई है, उनमें ऐसे व्यक्ति शामिल हैं जिन पर आव्रजन धोखाधड़ी, वित्तीय अपराध, नाबालिगों के खिलाफ अपराध, मादक पदार्थों की तस्करी और अन्य गंभीर अपराधों के आरोप हैं या वे इन मामलों में दोषी ठहराए जा चुके हैं।

अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि यह अभियान उन मामलों पर केंद्रित है, जहां नागरिकता प्राप्त करने के लिए कथित रूप से झूठी जानकारी, फर्जी दस्तावेज या महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने का सहारा लिया गया था।

क्या है डी-नेचुरलाइजेशन प्रक्रिया?

डी-नेचुरलाइजेशन (Denaturalization) वह कानूनी प्रक्रिया है जिसके तहत किसी व्यक्ति की अमेरिकी नागरिकता रद्द की जा सकती है, यदि यह साबित हो जाए कि उसने नागरिकता प्राप्त करने के दौरान धोखाधड़ी की, महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए या गलत जानकारी दी।

विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे मामलों में अंतिम फैसला संघीय अदालतें करती हैं और सरकार को अपने आरोपों को कानूनी रूप से साबित करना होता है।

फिलहाल नीरज शर्मा के मामले में कानूनी प्रक्रिया जारी है और अंतिम निर्णय अदालत द्वारा लिया जाएगा।

 

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

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हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

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लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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वेस्ट बैंक में सैन्य कार्रवाई तेज करने के नेतन्याहू के आदेश, नाबलुस हिंसा के बाद इज़रायल का बड़ा कदम

यरुशलम, एजेंसियां। इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कब्जे वाले वेस्ट बैंक में सैन्य कार्रवाई तेज करने के आदेश दिए हैं। यह फैसला नाबलुस के पास स्थित तल (Tell) गांव में हुई हिंसक झड़प और उसके बाद बढ़ते तनाव के मद्देनज़र लिया गया है। इज़रायली सरकार ने सेना को व्यापक अभियान चलाने, संदिग्धों की गिरफ्तारी और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के निर्देश दिए हैं।   हिंसक झड़प के बाद बढ़ा तनाव   इज़रायली सेना के अनुसार, नाबलुस के निकट एक इलाके में हुई झड़प में चार फिलिस्तीनी और दो इज़रायली सैनिकों की मौत हुई। घटना के बाद वेस्ट बैंक के कई हिस्सों में हालात तनावपूर्ण हो गए। इसके बाद सेना ने अतिरिक्त बल तैनात किए और कई क्षेत्रों में आवाजाही पर प्रतिबंध लगा दिया।   नेतन्याहू ने दिए सख्त निर्देश   प्रधानमंत्री नेतन्याहू और रक्षा मंत्री इज़रायल कैट्ज़ ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि सेना "व्यापक सैन्य अभियान" चलाएगी। आदेशों में संदिग्ध हमलावरों की तलाश, आतंकवादी ढांचे को नष्ट करने और सुरक्षा बलों की मौजूदगी बढ़ाने पर जोर दिया गया है। साथ ही, कथित हमलावर के घर को ध्वस्त करने की प्रक्रिया भी शुरू करने के निर्देश दिए गए हैं।   नई बस्तियों की स्थापना को भी मंजूरी   सुरक्षा कार्रवाई के साथ-साथ नेतन्याहू ने वेस्ट बैंक में नई यहूदी बस्तियों की स्थापना को भी मंजूरी दी है। इज़रायल का कहना है कि यह कदम सुरक्षा मजबूत करने के लिए उठाया गया है, जबकि फिलिस्तीन और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के कई देशों ने इसे विवादित और अंतरराष्ट्रीय कानून के विरुद्ध बताया है।   संयुक्त राष्ट्र ने जताई चिंता   संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों ने वेस्ट बैंक में बढ़ती हिंसा पर चिंता व्यक्त की है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, इस वर्ष क्षेत्र में बसने वालों और सुरक्षा बलों से जुड़ी हिंसक घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिससे नागरिकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।   क्षेत्रीय तनाव और बढ़ने की आशंका   विशेषज्ञों का मानना है कि वेस्ट बैंक में सैन्य अभियान तेज होने से पहले से तनावग्रस्त मध्य पूर्व की स्थिति और जटिल हो सकती है। फिलिस्तीनी अधिकारियों ने इस कार्रवाई की आलोचना करते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से हस्तक्षेप की मांग की है।

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फ्रांस और स्पेन में जंगल की आग विकराल, दो लाख से अधिक लोग सुरक्षित स्थानों पर पहुंचे; दोनों देशों में राष्ट्रीय आपात कदम

पेरिस/मैड्रिड, एजेंसियां। फ्रांस और स्पेन इस समय वर्षों की सबसे भीषण जंगल की आग (Wildfire) से जूझ रहे हैं। तेज गर्मी, सूखी हवाओं और कम आर्द्रता के कारण आग तेजी से फैल रही है। हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि दोनों देशों में मिलाकर दो लाख से अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है, जबकि कई इलाकों में राष्ट्रीय स्तर पर आपात कदम उठाए गए हैं।   फ्रांस में बोर्डो के बाहरी इलाके तक पहुंची आग   दक्षिण-पश्चिमी फ्रांस के गिरोंद (Gironde) क्षेत्र और कैप फेरे (Cap Ferret) प्रायद्वीप में लगी आग तेजी से फैलते हुए बोर्डो के बाहरी हिस्सों तक पहुंच गई है। अब तक 1.10 लाख से अधिक लोगों को निकाला गया है। कई पर्यटकों को सड़क मार्ग बंद होने के कारण नौकाओं के जरिए सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया गया। आग में दर्जनों घर, एक कैंपसाइट और हजारों हेक्टेयर जंगल जल चुके हैं।   स्पेन ने पहली बार घोषित किया राष्ट्रीय आपातकाल   स्पेन ने जंगल की आग की गंभीरता को देखते हुए इतिहास में पहली बार वाइल्डफायर के कारण राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किया है। मैड्रिड और आविला (Ávila) के आसपास दो बड़ी आग एक-दूसरे से मिल गई हैं, जिससे स्थिति और खतरनाक हो गई है। हजारों दमकलकर्मी, सैनिक और विमान आग पर काबू पाने में जुटे हैं।   यूरोपीय संघ से मांगी गई मदद   फ्रांस और स्पेन दोनों ने यूरोपीय संघ (EU) से अतिरिक्त अग्निशमन विमान और हेलीकॉप्टर भेजने का अनुरोध किया है। क्रोएशिया, पुर्तगाल, इटली और अन्य देशों ने राहत एवं अग्निशमन सहायता उपलब्ध करानी शुरू कर दी है।   भीषण गर्मी बनी सबसे बड़ी वजह   विशेषज्ञों का कहना है कि यूरोप इस वर्ष की तीसरी बड़ी हीटवेव का सामना कर रहा है। रिकॉर्ड तापमान, सूखे जंगल और तेज हवाओं ने आग को तेजी से फैलने में मदद की है। वैज्ञानिक इसे जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों से भी जोड़ रहे हैं।   स्थिति पर लगातार नजर   दोनों देशों की सरकारों ने प्रभावित इलाकों में लोगों से यात्रा से बचने और प्रशासन के निर्देशों का पालन करने की अपील की है। दमकलकर्मी लगातार आग पर काबू पाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन कई क्षेत्रों में स्थिति अब भी बेहद गंभीर बनी हुई है।

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US imposes 10% forced labour tariff on Indian imports after Section 301 investigation
US ने भारत पर लगाया 10% 'फोर्स्ड लेबर' टैरिफ, सेक्शन 301 जांच के बाद बड़ा फैसला

US Forced Labour Tariff on India: अमेरिका ने भारत समेत 60 देशों से आयात होने वाले उत्पादों पर 'फोर्स्ड लेबर' (जबरन मजदूरी) से जुड़े मामलों को लेकर नया टैरिफ लगाने का फैसला किया है। सेक्शन 301 जांच पूरी होने के बाद अमेरिका ने भारत पर 10% अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणा की है। पहले भारत पर 12.5% शुल्क लगाने का प्रस्ताव था, लेकिन अंतिम निर्णय में इसे घटाकर 10% कर दिया गया। यह फैसला ऐसे समय आया है, जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापक व्यापार समझौते (Trade Deal) को लेकर बातचीत भी जारी है। सेक्शन 301 जांच के बाद लिया गया फैसला अमेरिकी प्रशासन ने कहा कि यह कार्रवाई अमेरिकी ट्रेड एक्ट 1974 के सेक्शन 301 के तहत की गई जांच के आधार पर हुई है। अमेरिका का आरोप है कि कई देशों ने जबरन मजदूरी से बने उत्पादों के आयात और व्यापार को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए हैं। इसी वजह से भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका समेत 60 देशों पर नया टैरिफ लागू किया गया है। यह नया शुल्क फरवरी में लगाए गए अस्थायी 10% वैश्विक टैरिफ की जगह लेगा। क्या है सेक्शन 301? सेक्शन 301 अमेरिकी ट्रेड एक्ट का ऐसा प्रावधान है, जिसके तहत अमेरिका उन देशों के खिलाफ व्यापारिक कार्रवाई कर सकता है, जिनकी नीतियों को वह अनुचित, भेदभावपूर्ण या अमेरिकी व्यापार हितों के खिलाफ मानता है। ट्रंप प्रशासन ने मार्च में भारत के खिलाफ दो अलग-अलग जांच शुरू की थीं। पहली जांच फोर्स्ड लेबर से जुड़ी थी, जबकि दूसरी अतिरिक्त मैन्युफैक्चरिंग क्षमता (Excess Manufacturing Capacity) को लेकर है। फिलहाल फोर्स्ड लेबर वाली जांच पूरी हो चुकी है, जबकि दूसरी जांच अभी जारी है। भारत ने रखा अपना पक्ष जांच के दौरान भारत सरकार और उद्योग संगठनों ने अमेरिका के आरोपों को खारिज किया। भारत ने कहा कि देश में जबरन मजदूरी रोकने के लिए संविधान, श्रम कानूनों और कई कानूनी प्रावधान पहले से लागू हैं। सरकार का कहना है कि भारतीय उद्योग अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों का पालन करते हैं और फोर्स्ड लेबर को रोकने के लिए पर्याप्त व्यवस्था मौजूद है। व्यापार समझौते पर भी जारी है बातचीत भारत और अमेरिका के बीच व्यापक व्यापार समझौते को लेकर बातचीत भी जारी है। फरवरी में दोनों देशों ने एक प्रारंभिक ढांचे पर सहमति बनाई थी, जिसके तहत भारतीय निर्यात पर कुल टैरिफ 50% से घटाकर 18% करने का प्रस्ताव रखा गया था। इसके बदले भारत ने अगले पांच वर्षों में अमेरिका से लगभग 500 अरब डॉलर के उत्पाद खरीदने और अमेरिकी कंपनियों को भारतीय बाजार में अधिक अवसर देने का प्रस्ताव दिया था। दूसरी जांच बनी बड़ी चिंता विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उस पर सेक्शन 301 के तहत दो अलग-अलग जांच चल रही हैं, जबकि पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे कई प्रतिस्पर्धी देशों पर केवल फोर्स्ड लेबर से जुड़ी जांच हुई है। यदि भविष्य में इन देशों पर भारत की तुलना में कम टैरिफ लागू होता है, तो अमेरिकी बाजार में भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों की राय व्यापार विशेषज्ञों का कहना है कि भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम व्यापार समझौते को लेकर काफी प्रगति हुई है, लेकिन भारत चाहता है कि उसे अन्य प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में बेहतर टैरिफ रियायत मिले। वहीं, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रंप प्रशासन के कुछ वैश्विक रेसिप्रोकल टैरिफ को रद्द किए जाने के बाद व्यापारिक नीति को लेकर नई अनिश्चितता भी पैदा हो गई है। क्या होगा असर? 10% टैरिफ लागू होने से भारतीय निर्यातकों पर अतिरिक्त लागत का दबाव बढ़ सकता है। हालांकि अंतिम प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौता कब तक अंतिम रूप लेता है और सेक्शन 301 की दूसरी जांच का क्या निष्कर्ष निकलता है। फिलहाल दोनों देश व्यापार वार्ता जारी रखे हुए हैं और उद्योग जगत की नजर आने वाले फैसलों पर टिकी हुई है।  

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