स्वास्थ्य

When Persistent Back Pain Needs an MRI Scan

लगातार कमर दर्द में कब जरूरी होता है MRI टेस्ट? डॉक्टर से जानिए क्यों नहीं करना चाहिए नजरअंदाज

surbhi जून 10, 2026 0
Doctor explaining MRI scan results to a patient suffering from persistent lower back pain.
When Is MRI Needed for Back Pain

आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली, घंटों बैठकर काम करने की आदत और शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण कमर और जोड़ों का दर्द आम समस्या बन गया है। अक्सर लोग दर्द निवारक दवाओं के सहारे अस्थायी राहत तो पा लेते हैं, लेकिन लगातार बने रहने वाले दर्द को नजरअंदाज करना कई बार गंभीर समस्याओं को जन्म दे सकता है। ऐसे मामलों में डॉक्टर MRI (मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग) कराने की सलाह दे सकते हैं, जिससे दर्द के वास्तविक कारण का पता लगाया जा सके।

MRI क्या है और यह कैसे काम करता है?

MRI एक नॉन-इनवेसिव स्कैनिंग तकनीक है, जिसमें शरीर के अंदर की विस्तृत तस्वीरें लेने के लिए मैग्नेटिक फील्ड और रेडियो वेव्स का उपयोग किया जाता है। यह रीढ़ की हड्डी, नसों, मांसपेशियों, लिगामेंट्स और अन्य सॉफ्ट टिश्यू की स्थिति को विस्तार से दिखाने में मदद करता है।

किन स्थितियों में कमर दर्द के लिए MRI की जरूरत पड़ती है?

1. इलाज के बाद भी दर्द बना रहे

अगर आराम, दवाओं, फिजियोथेरेपी और जीवनशैली में बदलाव के बावजूद दर्द लंबे समय तक बना रहे, तो डॉक्टर डिस्क की समस्या, नसों पर दबाव या सॉफ्ट टिश्यू की बीमारी का पता लगाने के लिए MRI कराने की सलाह दे सकते हैं।

2. दर्द के साथ नसों से जुड़े लक्षण दिखाई दें

यदि कमर दर्द के साथ निम्न समस्याएं भी हों, तो MRI जरूरी हो सकता है—

  • दर्द का हाथों या पैरों तक फैलना
  • सुन्नपन या झनझनाहट
  • कमजोरी महसूस होना
  • चलने-फिरने में परेशानी
  • हाथों की पकड़ कमजोर होना

ये लक्षण स्लिप डिस्क, स्पाइनल स्टेनोसिस या नसों पर दबाव जैसी गंभीर समस्याओं का संकेत हो सकते हैं।

3. चोट या अंदरूनी नुकसान की आशंका हो

यदि किसी दुर्घटना, खेल या अन्य कारणों से लिगामेंट, कार्टिलेज, मेनिस्कस या रोटेटर कफ को नुकसान पहुंचने की आशंका हो, तो MRI सबसे प्रभावी जांच मानी जाती है। X-ray केवल हड्डियों की स्थिति दिखाता है, जबकि MRI सॉफ्ट टिश्यू की विस्तृत जानकारी देता है।

4. गंभीर बीमारी के संकेत दिखाई दें

यदि कमर दर्द के साथ—

  • बुखार
  • अचानक वजन कम होना
  • कैंसर का पुराना इतिहास
  • संक्रमण की आशंका
  • ऑस्टियोपोरोसिस
  • लंबे समय तक स्टेरॉयड का उपयोग

जैसी स्थितियां मौजूद हों, तो MRI तुरंत करवाने की आवश्यकता पड़ सकती है।

MRI किन समस्याओं की पहचान में मदद करता है?

  • स्लिप्ड डिस्क और नसों पर दबाव
  • लिगामेंट और कार्टिलेज की चोट
  • घुटने और कंधे की स्पोर्ट्स इंजरी
  • स्पाइनल इंफेक्शन
  • ट्यूमर
  • इंफ्लेमेटरी अर्थराइटिस
  • अस्पष्ट और गंभीर दर्द के कारण

क्या हर कमर दर्द में MRI जरूरी है?

विशेषज्ञों के अनुसार, नहीं। शुरुआती चरण में हर मरीज को MRI कराने की आवश्यकता नहीं होती। कई बार MRI में दिखाई देने वाले बदलाव वास्तविक दर्द का कारण नहीं होते, जिससे अनावश्यक भ्रम पैदा हो सकता है।

इसलिए डॉक्टर मरीज के लक्षण, शारीरिक जांच, उपचार के परिणाम और दर्द की गंभीरता को ध्यान में रखकर ही MRI की सलाह देते हैं।

कब नहीं करनी चाहिए लापरवाही?

यदि दर्द लगातार बढ़ रहा हो, लंबे समय तक बना रहे, चोट के बाद शुरू हुआ हो या अन्य गंभीर लक्षणों के साथ दिखाई दे रहा हो, तो डॉक्टर से तुरंत परामर्श लेना चाहिए। समय पर जांच और सही इलाज से गंभीर समस्याओं से बचा जा सकता है।

 

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लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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कमजोर इम्यूनिटी और ऑटोइम्यून बीमारी एक नहीं, जानिए दोनों में क्या है बड़ा अंतर

नई दिल्ली: बार-बार बीमार पड़ना, लगातार थकान रहना या शरीर में किसी तरह की परेशानी होना—इन स्थितियों में अक्सर लोग इसे सीधे ‘कमजोर इम्यूनिटी’ से जोड़ देते हैं। लेकिन हर बार ऐसा होना जरूरी नहीं है। कई बार समस्या कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली की होती है, जबकि कुछ मामलों में इम्यून सिस्टम जरूरत से ज्यादा सक्रिय होकर शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं और ऊतकों पर ही हमला करने लगता है। इसे ऑटोइम्यून बीमारी कहा जाता है। दोनों स्थितियां इम्यून सिस्टम से जुड़ी हैं, लेकिन इनके कारण, शरीर पर असर और उपचार का तरीका अलग होता है। पहले समझें, इम्यून सिस्टम कैसे काम करता है? इम्यून सिस्टम शरीर की प्राकृतिक सुरक्षा व्यवस्था है। यह वायरस, बैक्टीरिया, फंगस और दूसरे हानिकारक सूक्ष्मजीवों को पहचानने और उनसे बचाव करने में मदद करता है। श्वेत रक्त कोशिकाएं, एंटीबॉडी, लिम्फ नोड्स, बोन मैरो और प्लीहा इस सिस्टम के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। यही प्रतिरक्षा प्रणाली संक्रमण से लड़ने के साथ वैक्सीनेशन के बाद सुरक्षा विकसित करने और शरीर में असामान्य कोशिकाओं की पहचान करने में भी भूमिका निभाती है। कमजोर इम्यूनिटी क्या होती है? जब शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली संक्रमण से प्रभावी तरीके से लड़ नहीं पाती, तो इसे कमजोर इम्यूनिटी या इम्यूनोडेफिशिएंसी कहा जा सकता है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, जैसे पोषण की कमी, कुछ विटामिन और मिनरल्स की कमी, HIV संक्रमण, कुछ कैंसर उपचार, लंबे समय तक कुछ स्टेरॉयड या इम्यूनोसप्रेसेंट दवाओं का इस्तेमाल, जन्मजात प्रतिरक्षा संबंधी विकार और अनियंत्रित डायबिटीज। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को बार-बार संक्रमण हो सकता है या सामान्य संक्रमण भी अधिक गंभीर रूप ले सकते हैं। ऑटोइम्यून बीमारी क्या होती है? ऑटोइम्यून बीमारी में स्थिति इसके बिल्कुल उलट होती है। यहां इम्यून सिस्टम कमजोर नहीं पड़ता, बल्कि वह शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं, ऊतकों या अंगों को गलती से बाहरी खतरा समझकर उन पर हमला करने लगता है। रुमेटाइड अर्थराइटिस, ल्यूपस, हाशिमोटो थायरॉइडाइटिस, टाइप-1 डायबिटीज, मल्टीपल स्केलेरोसिस और सीलिएक डिजीज इसके कुछ उदाहरण हैं। इन बीमारियों का सटीक कारण हर मामले में स्पष्ट नहीं होता। आनुवंशिक प्रवृत्ति, हार्मोनल बदलाव और पर्यावरण से जुड़े कारक भूमिका निभा सकते हैं। दोनों में सबसे बड़ा अंतर क्या है? पहलू कमजोर इम्यूनिटी ऑटोइम्यून बीमारी इम्यून सिस्टम पर्याप्त प्रभावी तरीके से काम नहीं करता गलती से अपने शरीर पर हमला करता है मुख्य समस्या बार-बार या गंभीर संक्रमण सूजन और शरीर के ऊतकों/अंगों को नुकसान संभावित कारण संक्रमण, पोषण की कमी, दवाएं, आनुवंशिक कारण आदि आनुवंशिक, हार्मोनल और पर्यावरणीय कारक उदाहरण कुछ इम्यूनोडेफिशिएंसी, HIV आदि ल्यूपस, रुमेटाइड अर्थराइटिस, टाइप-1 डायबिटीज आदि उपचार मूल कारण के आधार पर असामान्य इम्यून प्रतिक्रिया को नियंत्रित करने पर केंद्रित कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए? बार-बार संक्रमण होना, लंबे समय तक असामान्य थकान, जोड़ों में लगातार दर्द, त्वचा पर बार-बार चकत्ते या अन्य लगातार बने रहने वाले असामान्य लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। हालांकि, केवल इन लक्षणों के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि किसी व्यक्ति की इम्यूनिटी कमजोर है या उसे ऑटोइम्यून बीमारी है। इसके लिए डॉक्टर की जांच और जरूरत के अनुसार टेस्ट जरूरी हो सकते हैं।  

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नौणी यूनिवर्सिटी सोलन में एपिथेरेपी और बी-वेनम थेरेपी कोर्स की शुरुआत
Bee Venom Therapy: मधुमक्खी के डंक से गठिया और साइटिका के इलाज की तैयारी, नौणी यूनिवर्सिटी शुरू करेगी खास कोर्स

शिमला, एजेंसियां। प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में मधुमक्खी से जुड़ी थेरेपी को लेकर नई पहल शुरू होने जा रही है। हिमाचल प्रदेश की नौणी यूनिवर्सिटी सोलन मधुमक्खी पालन और एपिथेरेपी (Apitherapy) में एक वर्षीय पीजी डिप्लोमा कोर्स शुरू करने की तैयारी कर रही है।   25 सीटों वाले कोर्स में मिलेगी विशेष ट्रेनिंग   विश्वविद्यालय के कीट विज्ञान विभाग की ओर से शुरू किए जाने वाले इस कोर्स में छात्रों को मधुमक्खी पालन, शहद उत्पादन, मोम, रॉयल जेली, बी-पोलन, प्रोपोलिस और बी-वेनम थेरेपी के वैज्ञानिक उपयोग की जानकारी दी जाएगी। इस पाठ्यक्रम में कुल 25 सीटें होंगी।   गठिया और साइटिका में उपयोग का दावा   एपिथेरेपी में मधुमक्खी के विष का इस्तेमाल कई स्वास्थ्य समस्याओं के उपचार के लिए किया जाता है। मधुमक्खी के डंक में मौजूद मेलिटिन तत्व में सूजन कम करने वाले गुण पाए जाते हैं, जिसके आधार पर इसे गठिया, साइटिका, जोड़ों के दर्द और पीठ दर्द जैसी समस्याओं में उपयोग किया जाता है।   त्वचा और इम्यूनिटी से जुड़े फायदे भी बताए गए   मधुमक्खी से मिलने वाले शहद और प्रोपोलिस में एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-ऑक्सीडेंट गुण पाए जाते हैं। इनका इस्तेमाल त्वचा की देखभाल, घाव भरने और एंटी-एजिंग उत्पादों में भी किया जाता है। वहीं बी-पोलन और रॉयल जेली को शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक माना जाता है।   स्वरोजगार के अवसर बढ़ाने की पहल   विश्वविद्यालय का कहना है कि यह कोर्स युवाओं को मधुमक्खी पालन और इससे जुड़े उत्पादों के क्षेत्र में स्वरोजगार के नए अवसर उपलब्ध करा सकता है। इससे कृषि आधारित उद्यमों को भी बढ़ावा मिलेगा।   विशेषज्ञों की निगरानी जरूरी   हालांकि, बी-वेनम थेरेपी हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित नहीं होती। मधुमक्खी के विष से एलर्जी या अन्य स्वास्थ्य जोखिम हो सकते हैं, इसलिए इसे केवल प्रशिक्षित विशेषज्ञों की देखरेख में ही कराया जाना चाहिए।  

ranjan kumar tiwari जुलाई 27, 2026 0
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