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Person experiencing balance problems while walking, highlighting possible neurological health concerns
चलते समय बार-बार बिगड़ रहा है बैलेंस? इसे नजरअंदाज न करें, ब्रेन ट्यूमर समेत इन बीमारियों का हो सकता है संकेत

चलते समय बार-बार लड़खड़ाना, शरीर का संतुलन बिगड़ना या बिना वजह गिर जाना कई बार सामान्य कमजोरी या थकान समझ लिया जाता है। लेकिन अगर यह समस्या लगातार बनी रहे, बढ़ती जाए या इसके साथ दूसरे न्यूरोलॉजिकल लक्षण भी दिखाई दें, तो इसे गंभीरता से लेना जरूरी है। कुछ मामलों में बैलेंस और चलने में परेशानी ब्रेन ट्यूमर का लक्षण भी हो सकती है। हालांकि, केवल चलने में परेशानी होने का मतलब ब्रेन ट्यूमर होना नहीं है। इसके पीछे कान से जुड़ी समस्या, न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर, मांसपेशियों की कमजोरी या दूसरी स्वास्थ्य स्थितियां भी जिम्मेदार हो सकती हैं। ब्रेन ट्यूमर से कैसे बिगड़ सकता है बैलेंस? हमारे शरीर का संतुलन बनाए रखने में दिमाग, आंखें, कान, मांसपेशियां और जोड़ मिलकर काम करते हैं। मस्तिष्क का कुछ हिस्सा शरीर की गतिविधियों और कॉर्डिनेशन को नियंत्रित करता है। अगर ब्रेन में मौजूद ट्यूमर इन हिस्सों को प्रभावित करता है या आसपास के टिशू पर दबाव डालता है, तो व्यक्ति के चलने और शरीर को स्थिर रखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। ऐसे में व्यक्ति को चलते समय एक तरफ झुकने, कदमों पर नियंत्रण न रहने या शरीर के डगमगाने जैसी परेशानी महसूस हो सकती है। नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट के अनुसार, ब्रेन ट्यूमर से जुड़ी चलने की समस्या में पैरों या टांगों में कमजोरी, सुन्नपन, संवेदनशीलता में बदलाव, बैलेंस की परेशानी और थकान जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं। इन संकेतों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें अगर चलने में परेशानी नई है या लगातार बढ़ रही है, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। खासतौर पर इन संकेतों पर ध्यान दें: चलते समय बार-बार लड़खड़ाना या डगमगाना बिना स्पष्ट कारण बार-बार गिरना सीधे रास्ते पर चलने में परेशानी पैर घसीटकर चलना चलते समय शरीर का एक तरफ झुकना सीढ़ियां चढ़ने या उतरने में अचानक दिक्कत खड़े रहने पर बैलेंस बनाने में परेशानी चलने की समस्या के साथ हाथ या पैर में कमजोरी हाथ-पैर में सुन्नपन या संवेदनशीलता में बदलाव समय के साथ बैलेंस और चलने की समस्या का बढ़ना कब तुरंत मेडिकल मदद लेनी चाहिए? अगर बैलेंस या चलने की समस्या अचानक शुरू हुई है या तेजी से बढ़ रही है, तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए। खासकर अगर इसके साथ चेहरे, हाथ या पैर में कमजोरी, बोलने में परेशानी, दोहरा दिखाई देना, तेज सिरदर्द, दौरे, भ्रम या निगलने में दिक्कत जैसे लक्षण मौजूद हों, तो तुरंत मेडिकल जांच की जरूरत हो सकती है। सिर्फ बैलेंस बिगड़ने से ब्रेन ट्यूमर का निष्कर्ष नहीं यह समझना बेहद जरूरी है कि चलते समय बैलेंस बिगड़ना अपने आप में ब्रेन ट्यूमर की पुष्टि नहीं करता। इसके कई दूसरे कारण हो सकते हैं। समस्या का वास्तविक कारण जानने के लिए डॉक्टर न्यूरोलॉजिकल जांच कर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर MRI या CT स्कैन जैसी जांच की सलाह दे सकते हैं। अगर चलने में परेशानी लगातार बढ़ रही है, बार-बार गिरने की स्थिति बन रही है या इसके साथ सिरदर्द, देखने-बोलने में बदलाव, कमजोरी या दौरे जैसे लक्षण हैं, तो जांच कराने में देरी नहीं करनी चाहिए।  

surbhi अगस्त 20, 2026 0
Brain small vessel disease linked with kidney dysfunction, with high blood pressure emerging as a possible shared factor
दिमाग की छोटी रक्त वाहिकाओं की बीमारी और किडनी की खराब सेहत के बीच मिला संबंध, हाई ब्लड प्रेशर हो सकता है अहम कारण

एक नए अध्ययन में मस्तिष्क की छोटी रक्त वाहिकाओं की बीमारी (Cerebral Small Vessel Disease) और किडनी की कार्यक्षमता के बीच संबंध सामने आया है। शोध के अनुसार, बुजुर्ग लोगों में मस्तिष्क की छोटी रक्त वाहिकाओं से जुड़ी क्षति जितनी अधिक थी, किडनी की कार्यक्षमता खराब होने और पेशाब में एल्ब्यूमिन बढ़ने के संकेत भी उतने अधिक पाए गए। हालांकि, यह अध्ययन यह साबित नहीं करता कि मस्तिष्क की रक्त वाहिकाओं की बीमारी सीधे किडनी की बीमारी का कारण बनती है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, इसके लिए लंबे समय तक किए जाने वाले अध्ययनों की जरूरत है। 239 लोगों पर किया गया अध्ययन अध्ययन में 239 प्रतिभागियों को शामिल किया गया। सभी प्रतिभागियों के मस्तिष्क की एमआरआई जांच और किडनी से संबंधित परीक्षण किए गए। मस्तिष्क की छोटी रक्त वाहिकाओं की बीमारी का आकलन 0 से 4 के स्कोर पर किया गया। इसमें सफेद पदार्थ में गंभीर बदलाव, छोटे स्ट्रोक जैसे घाव, मस्तिष्क में सूक्ष्म रक्तस्राव और रक्त वाहिकाओं के आसपास बढ़ी हुई जगह जैसे संकेतों को शामिल किया गया। किडनी की स्थिति जानने के लिए ईजीएफआर, सीरम क्रिएटिनिन, सिस्टेटिन-सी और यूरिन एल्ब्यूमिन-टू-क्रिएटिनिन अनुपात जैसे मानकों का इस्तेमाल किया गया। बीमारी का स्कोर बढ़ने पर किडनी की कार्यक्षमता कम मिली शोध में पाया गया कि सेरेब्रल स्मॉल वेसल डिजीज के स्कोर में हर एक अंक की वृद्धि ईजीएफआर में औसतन लगभग 2.98 की कमी से जुड़ी थी। इसके अलावा, बीमारी का अधिक स्कोर: सीरम क्रिएटिनिन के बढ़ने से जुड़ा था। सिस्टेटिन-सी के बढ़ने से संबंधित पाया गया। पेशाब में एल्ब्यूमिन की मात्रा बढ़ने से जुड़ा था। समग्र किडनी dysfunction की अधिक संभावना से संबंधित था। एल्ब्यूमिन्यूरिया की संभावना भी अधिक पाई गई। हालांकि, कम ईजीएफआर के साथ संबंध सांख्यिकीय रूप से निर्णायक नहीं था। हाई ब्लड प्रेशर की भूमिका महत्वपूर्ण अध्ययन का एक अहम निष्कर्ष हाइपरटेंशन यानी हाई ब्लड प्रेशर को लेकर सामने आया। जब शोधकर्ताओं ने हाई ब्लड प्रेशर को विश्लेषण में शामिल किया, तो मस्तिष्क और किडनी से जुड़े कई संबंध कमजोर हो गए। शुरुआती मध्यस्थता विश्लेषण के अनुसार, हाई ब्लड प्रेशर ने इन संबंधों में लगभग 32% से 36.7% तक योगदान दिया हो सकता है। इससे संकेत मिलता है कि लंबे समय तक बढ़ा हुआ रक्तचाप शरीर की छोटी रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाने वाली साझा प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, जिसका असर मस्तिष्क और किडनी दोनों पर पड़ सकता है। क्या दिमाग की बीमारी से किडनी खराब होती है? फिलहाल ऐसा कहना सही नहीं होगा। यह अध्ययन क्रॉस-सेक्शनल था, यानी प्रतिभागियों का आकलन एक समय बिंदु पर किया गया। इसलिए इससे यह निर्धारित नहीं किया जा सकता कि मस्तिष्क की छोटी रक्त वाहिकाओं की बीमारी पहले हुई या किडनी की समस्या, अथवा दोनों के पीछे कोई साझा जोखिम कारक है। शोधकर्ताओं ने भी स्पष्ट किया है कि इन निष्कर्षों की पुष्टि के लिए भविष्य में लंबे समय तक लोगों का अध्ययन करने वाले प्रॉस्पेक्टिव रिसर्च की आवश्यकता होगी। क्यों महत्वपूर्ण है यह शोध? मस्तिष्क और किडनी दोनों ही शरीर की छोटी रक्त वाहिकाओं और रक्तचाप से प्रभावित होने वाले महत्वपूर्ण अंग हैं। इसलिए अध्ययन के निष्कर्ष यह संकेत देते हैं कि दोनों अंगों के स्वास्थ्य को अलग-अलग देखने के बजाय रक्तचाप और रक्त वाहिका स्वास्थ्य को व्यापक रूप से नियंत्रित करना महत्वपूर्ण हो सकता है। फिर भी, इस अध्ययन के आधार पर किसी व्यक्ति को अपनी दवा या इलाज में बदलाव नहीं करना चाहिए। किडनी की कार्यक्षमता या रक्तचाप को लेकर चिंता होने पर चिकित्सकीय सलाह और उचित जांच जरूरी है।  

surbhi अगस्त 19, 2026 0
New Endoscopy-USG machine installed at a super specialty hospital for advanced gastrointestinal diagnosis
सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में लगी इंडोस्कोपी-यूएसजी मशीन, जल्द शुरू होगी मुफ्त जांच सुविधा

रांची: सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में मरीजों के लिए बड़ी स्वास्थ्य सुविधा शुरू होने जा रही है. अस्पताल में इंडोस्कोपी-यूएसजी मशीन का इंस्टॉलेशन पूरा हो गया है. आने वाले दिनों में गैस्ट्रोइंट्रोलॉजी विभाग में इस अत्याधुनिक मशीन से मरीजों की जांच शुरू की जायेगी. अस्पताल प्रबंधन के अनुसार, यह सुविधा मरीजों को नि:शुल्क उपलब्ध करायी जायेगी. नई मशीन के शुरू होने से पेट और पाचन तंत्र से जुड़ी गंभीर और जटिल बीमारियों की जांच में काफी मदद मिलेगी. खासकर आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को निजी अस्पतालों में होने वाले महंगे इलाज और जांच के खर्च से राहत मिलने की उम्मीद है. एंडोस्कोपी और अल्ट्रासाउंड दोनों की सुविधा इंडोस्कोपी-यूएसजी आधुनिक जांच तकनीक है, जिसमें एंडोस्कोपी और अल्ट्रासाउंड को एक साथ इस्तेमाल किया जाता है. इसमें एक पतली ट्यूब की मदद से शरीर के अंदरूनी हिस्सों की बारीकी से जांच की जाती है. इस तकनीक से पेट, पैंक्रियाज, लिवर, पित्ताशय और आंतों से जुड़ी समस्याओं की विस्तृत जानकारी प्राप्त की जा सकती है. इससे डॉक्टरों को बीमारी की सही स्थिति समझने और इलाज की दिशा तय करने में मदद मिलती है. कैंसर और ट्यूमर की शुरुआती पहचान में मदद नई तकनीक की मदद से कैंसर, ट्यूमर और अल्सर जैसी गंभीर बीमारियों की शुरुआती अवस्था में पहचान करने में सहायता मिलेगी. बीमारी का समय रहते पता चलने पर मरीज का इलाज जल्द शुरू किया जा सकता है. खासकर पैंक्रियाटिक कैंसर, लिवर से जुड़ी बीमारियों और पित्ताशय तथा पाचन तंत्र की जटिल समस्याओं की जांच में यह मशीन काफी उपयोगी मानी जाती है. जांच के साथ बायोप्सी की भी सुविधा इंडोस्कोपी-यूएसजी की एक खास सुविधा यह है कि जरूरत पड़ने पर डॉक्टर प्रभावित हिस्से से बायोप्सी के लिए सैंपल भी ले सकते हैं. इससे संदिग्ध बीमारी की पुष्टि करने में मदद मिलती है. एक ही प्रक्रिया के दौरान विस्तृत जांच और आवश्यकतानुसार सैंपल लेने की सुविधा मिलने से मरीजों को अलग-अलग जांच के लिए कई जगह जाने की जरूरत कम होगी. निजी अस्पतालों के महंगे खर्च से मिलेगी राहत सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में यह सुविधा नि:शुल्क उपलब्ध होने से आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को सबसे अधिक लाभ मिलने की उम्मीद है. निजी अस्पतालों में ऐसी आधुनिक जांच पर होने वाला भारी खर्च कई मरीजों के लिए परेशानी का कारण बनता है. मशीन के संचालन के साथ गैस्ट्रोइंट्रोलॉजी विभाग में पाचन तंत्र से जुड़ी गंभीर बीमारियों की आधुनिक जांच की सुविधा उपलब्ध हो जायेगी. अस्पताल प्रबंधन के अनुसार, आने वाले कुछ दिनों में मशीन से मरीजों की जांच शुरू करने की तैयारी है.  

kalpana अगस्त 19, 2026 0
Taking levothyroxine before breakfast helps improve medicine absorption and maintain stable thyroid hormone levels
थायरॉइड की दवा लेने के बाद तुरंत नाश्ता करना पड़ सकता है भारी, हार्मोन लेवल पर पड़ सकता है असर

थायरॉइड की दवा रोजाना लेने वाले मरीजों के लिए सिर्फ दवा खाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसे सही समय और सही तरीके से लेना भी बेहद जरूरी है। खासकर लेवोथायरोक्सिन लेने के तुरंत बाद खाना-पीना शुरू कर देने से दवा के शरीर में अवशोषण पर असर पड़ सकता है और हार्मोन लेवल को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है। खाली पेट दवा लेने की सलाह क्यों? हाइपोथायरायडिज्म में आमतौर पर लेवोथायरोक्सिन दी जाती है। इसे नियमित समय पर खाली पेट, नाश्ते से करीब 30 से 60 मिनट पहले लेने की सलाह दी जाती है। भोजन के साथ लेने पर दवा का अवशोषण प्रभावित हो सकता है। दवा के तुरंत बाद किन चीजों से बचें? दवा लेने के बाद तुरंत इन चीजों का सेवन करने से बचने की सलाह दी जाती है: दूध और डेयरी उत्पाद कैल्शियम सप्लीमेंट आयरन सप्लीमेंट सोया और सोया मिल्क हाई-फाइबर भोजन कॉफी एंटासिड और कुछ एसिडिटी की दवाएं विशेष रूप से कैल्शियम और आयरन सप्लीमेंट को लेवोथायरोक्सिन से अलग समय पर लेने की जरूरत पड़ सकती है। कई स्रोत इन्हें लगभग चार घंटे के अंतर से लेने की सलाह देते हैं, लेकिन व्यक्तिगत स्थिति के अनुसार डॉक्टर की सलाह सर्वोपरि है। नाश्ता कब करें? आमतौर पर दवा लेने के बाद कम से कम 30 मिनट और बेहतर अवशोषण के लिए करीब 60 मिनट बाद नाश्ता करने की सलाह दी जाती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रोजाना दवा लेने का तरीका और समय एक जैसा रखा जाए। क्या ब्रेड पूरी तरह बंद करनी होगी? नहीं। थायरॉइड की दवा लेने वाले व्यक्ति को सामान्य रूप से ब्रेड खाने से परहेज करने की जरूरत नहीं होती। समस्या तब हो सकती है जब हाई-फाइबर ब्रेड या कैल्शियम वाले डेयरी उत्पाद दवा लेने के तुरंत बाद लिए जाएं। नाश्ते में क्या ले सकते हैं? दवा लेने के उचित अंतराल के बाद संतुलित नाश्ते में उबले अंडे या ऑमलेट, बेसन का चीला, ओट्स या दलिया, फल और सूखे मेवे जैसे विकल्प शामिल किए जा सकते हैं।  

surbhi अगस्त 18, 2026 0
Person with high fever, severe headache and stiff neck showing warning signs of possible meningitis infection
तेज बुखार के साथ उल्टी, सिरदर्द या गर्दन में अकड़न? इसे सामान्य वायरल फीवर न समझें, हो सकता है मेनिन्जाइटिस

तेज बुखार को अक्सर मौसम बदलने या वायरल संक्रमण से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन अगर बुखार के साथ लगातार तेज सिरदर्द, उल्टी, गर्दन में अकड़न, रोशनी से परेशानी या भ्रम जैसे लक्षण दिखाई दें, तो इसे नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। ये मेनिन्जाइटिस के संकेत हो सकते हैं। मेनिन्जाइटिस में मस्तिष्क और स्पाइनल कॉर्ड को ढकने वाली झिल्लियों में सूजन हो जाती है। यह वायरस, बैक्टीरिया, फंगस या अन्य संक्रमणों के कारण हो सकता है। इनमें बैक्टीरियल मेनिन्जाइटिस विशेष रूप से गंभीर माना जाता है और तेजी से बिगड़ सकता है। मेनिन्जाइटिस कितना खतरनाक है? मेनिन्जाइटिस के शुरुआती लक्षण कई बार सामान्य वायरल बुखार जैसे लगते हैं। यही वजह है कि लोग इलाज में देरी कर देते हैं। बैक्टीरियल मेनिन्जाइटिस तेजी से गंभीर स्थिति पैदा कर सकता है और इसके कारण दौरे, बेहोशी, सुनने की क्षमता प्रभावित होना, स्थायी न्यूरोलॉजिकल नुकसान और मृत्यु तक का खतरा हो सकता है। इसलिए संदिग्ध लक्षण दिखाई देने पर तत्काल चिकित्सकीय जांच जरूरी है। इन शुरुआती लक्षणों पर रखें नजर मेनिन्जाइटिस में शुरुआत में ये लक्षण दिखाई दे सकते हैं: तेज बुखार लगातार या बहुत तेज सिरदर्द उल्टी या मतली ठंड लगना शरीर में दर्द अत्यधिक थकान गर्दन में अकड़न अगर बुखार और सिरदर्द के साथ गर्दन अकड़ने लगे या तेज रोशनी सहन न हो, तो इसे सामान्य बुखार मानकर घर पर इलाज करते रहना उचित नहीं है। ये चेतावनी संकेत दिखें तो तुरंत अस्पताल जाएं कुछ लक्षण गंभीर संक्रमण की ओर इशारा कर सकते हैं: गर्दन में तेज अकड़न, असहनीय सिरदर्द, बार-बार उल्टी, रोशनी से परेशानी, भ्रम या बेहोशी, दौरे और त्वचा पर लाल-बैंगनी चकत्ते। विशेष रूप से मेनिंगोकोकल संक्रमण में त्वचा पर असामान्य चकत्ते गंभीर चेतावनी हो सकते हैं। वायरल और बैक्टीरियल मेनिन्जाइटिस में अंतर वायरल मेनिन्जाइटिस कई मामलों में अपेक्षाकृत कम गंभीर होता है और कुछ मरीज बिना विशेष उपचार के भी ठीक हो सकते हैं। इसके विपरीत बैक्टीरियल मेनिन्जाइटिस मेडिकल इमरजेंसी है। इसमें तत्काल चिकित्सकीय मूल्यांकन और उचित एंटीबायोटिक उपचार की जरूरत पड़ सकती है। इलाज में देरी होने पर गंभीर जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए घर पर केवल लक्षणों के आधार पर यह तय करना सही नहीं है कि संक्रमण वायरल है या बैक्टीरियल। किन लोगों में ज्यादा खतरा? मेनिन्जाइटिस का जोखिम कुछ समूहों में अधिक हो सकता है, जिनमें: नवजात और छोटे बच्चे किशोर और युवा बुजुर्ग कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोग कुछ गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोग भीड़भाड़ वाले स्थानों या हॉस्टल में रहने वाले लोग जिनका आवश्यक टीकाकरण पूरा नहीं हुआ है बचाव कैसे करें? मेनिन्जाइटिस से हर मामले में पूरी तरह बचाव संभव नहीं है, लेकिन जोखिम कम किया जा सकता है। समय पर टीकाकरण, हाथों की स्वच्छता, खांसते-छींकते समय मुंह ढकना और संक्रमित व्यक्ति के निकट संपर्क से बचना महत्वपूर्ण कदम हैं। सबसे जरूरी बात: समय बर्बाद न करें तेज बुखार के साथ सिर्फ उल्टी होना मेनिन्जाइटिस साबित नहीं करता, क्योंकि इसके कई अन्य कारण भी हो सकते हैं। लेकिन अगर बुखार के साथ तेज सिरदर्द, गर्दन में अकड़न, रोशनी से परेशानी, भ्रम, दौरे या असामान्य चकत्ते दिखाई दें, तो तुरंत अस्पताल जाना जरूरी है। खासकर बैक्टीरियल मेनिन्जाइटिस में बीमारी तेजी से गंभीर हो सकती है। इसलिए ऐसे लक्षणों में खुद से इलाज करने या इंतजार करने के बजाय डॉक्टर से तत्काल संपर्क करना सबसे सुरक्षित कदम है।  

surbhi अगस्त 17, 2026 0
Fenugreek seeds and water in a glass, commonly consumed as a home remedy for blood sugar management.
ब्लड शुगर कम करने में कितना असरदार है मेथी का पानी? रिसर्च में क्या आया सामने, जानें सेवन का सही तरीका

डायबिटीज को कंट्रोल करने के लिए खान-पान और लाइफस्टाइल में बदलाव के साथ लोग कई तरह के घरेलू उपाय भी अपनाते हैं। इनमें मेथी का पानी काफी लोकप्रिय है। माना जाता है कि सुबह खाली पेट मेथी के दानों का पानी पीने से ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है। लेकिन सवाल यह है कि इस दावे के पीछे कितनी वैज्ञानिक सच्चाई है? मेथी का इस्तेमाल भारतीय खान-पान और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में लंबे समय से किया जाता रहा है। आधुनिक शोध में भी मेथी के बीजों में मौजूद कुछ पोषक तत्वों और जैव सक्रिय यौगिकों का ब्लड ग्लूकोज पर संभावित प्रभाव देखा गया है। हालांकि, विशेषज्ञों के अनुसार मेथी के पानी को डायबिटीज का इलाज या दवाओं का विकल्प मानना सही नहीं होगा। मेथी का पानी क्यों माना जाता है फायदेमंद? मेथी के बीजों में घुलनशील फाइबर, प्रोटीन, आयरन, मैग्नीशियम और कई फाइटोकेमिकल्स पाए जाते हैं। इनमें मौजूद घुलनशील फाइबर कार्बोहाइड्रेट के पाचन और ग्लूकोज के अवशोषण की प्रक्रिया को धीमा करने में मदद कर सकता है। इससे भोजन के बाद ब्लड शुगर में अचानक बढ़ोतरी को कुछ हद तक कम करने की संभावना रहती है। मेथी में मौजूद कुछ जैव सक्रिय तत्व इंसुलिन के स्राव और इंसुलिन संवेदनशीलता से जुड़े संभावित प्रभावों के लिए भी अध्ययन किए गए हैं। हालांकि, इन प्रभावों को लेकर अभी बड़े और उच्च गुणवत्ता वाले मानव अध्ययनों की जरूरत है। मेथी में मौजूद कौन से तत्व कर सकते हैं असर? 1. घुलनशील फाइबर मेथी के बीजों में मौजूद घुलनशील फाइबर, खासकर गैलेक्टोमैनन, भोजन से ग्लूकोज के अवशोषण की गति को धीमा करने में भूमिका निभा सकता है। यही वजह है कि मेथी को भोजन के बाद ब्लड शुगर बढ़ने को नियंत्रित करने में संभावित रूप से उपयोगी माना जाता है। 2. 4-Hydroxyisoleucine यह मेथी में पाया जाने वाला एक विशेष अमीनो एसिड है। कुछ अध्ययनों में इसके इंसुलिन स्राव को प्रभावित करने की संभावनाओं का अध्ययन किया गया है। हालांकि, इसका वास्तविक चिकित्सकीय लाभ निर्धारित करने के लिए और शोध जरूरी है। 3. ट्राइगोनेलिन ट्राइगोनेलिन मेथी में पाया जाने वाला एक प्राकृतिक यौगिक है। इस पर भी ब्लड ग्लूकोज और इंसुलिन संवेदनशीलता से जुड़े संभावित प्रभावों को लेकर शोध हुआ है। रिसर्च में क्या सामने आया? उपलब्ध शोध में मेथी के नियमित सेवन से कुछ लोगों में फास्टिंग ब्लड शुगर और HbA1c में मामूली सुधार की संभावना सामने आई है। हालांकि, उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों की गुणवत्ता हर अध्ययन में समान नहीं है और परिणामों को सभी डायबिटीज मरीजों पर एक समान लागू नहीं किया जा सकता। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शोध में मेथी को डायबिटीज की निर्धारित दवाओं के विकल्प के रूप में स्थापित नहीं किया गया है। इसलिए केवल मेथी का पानी पीकर दवा बंद करना या डॉक्टर की सलाह के बिना इलाज में बदलाव करना जोखिमपूर्ण हो सकता है। मेथी का पानी कैसे तैयार करें? यदि डॉक्टर ने मेथी का सेवन करने की अनुमति दी है, तो इसे सामान्य तौर पर इस तरह तैयार किया जा सकता है: रात में करीब 1 से 2 चम्मच मेथी के बीज लें। इन्हें एक गिलास पानी में रातभर भिगो दें। सुबह पानी को छानकर पी सकते हैं। भीगे हुए मेथी के दानों को चबाकर खाने का विकल्प भी मौजूद है। हालांकि, कितनी मात्रा और किस समय मेथी का सेवन किया जाना चाहिए, यह व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति और दवाओं पर निर्भर कर सकता है। क्या खाली पेट मेथी का पानी पीना जरूरी है? मेथी का पानी सुबह खाली पेट पीने को लेकर काफी घरेलू दावे किए जाते हैं, लेकिन यह साबित नहीं हुआ है कि केवल खाली पेट लेने से इसका ब्लड शुगर पर प्रभाव निश्चित रूप से अधिक होगा। इसलिए इसे किसी विशेष समय पर लेने को डायबिटीज नियंत्रण का वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नियम नहीं माना जाना चाहिए। किन लोगों को सावधानी बरतनी चाहिए? डायबिटीज की दवा या इंसुलिन लेने वाले लोगों को मेथी का नियमित सेवन शुरू करने से पहले डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए, क्योंकि ब्लड शुगर कम करने वाली दवाओं के साथ इसका प्रभाव मिलकर शुगर को जरूरत से ज्यादा कम कर सकता है। इसके अलावा, किसी अन्य बीमारी से जूझ रहे लोगों, गर्भवती महिलाओं या नियमित रूप से कई दवाएं लेने वाले लोगों को भी बिना चिकित्सकीय सलाह के मेथी का सेवन अधिक मात्रा में नहीं करना चाहिए।  

surbhi अगस्त 12, 2026 0
Sarfaraz Khan
गॉल टेस्ट में सरफराज खान पर नजरें, 21 महीने बाद टेस्ट टीम में वापसी का मौका

गॉल, एजेंसियां। श्रीलंका के खिलाफ 15 अगस्त से गॉल में शुरू होने वाले पहले टेस्ट से पहले भारतीय बल्लेबाजी क्रम में सरफराज खान को लेकर खास चर्चा है। साई सुदर्शन के पैर के अंगूठे की चोट के कारण सीरीज से बाहर होने के बाद BCCI ने सरफराज को उनके स्थान पर टीम में शामिल किया है।   21 महीने बाद टेस्ट टीम में वापसी   सरफराज ने अपना पिछला टेस्ट नवंबर 2024 में खेला था। अब करीब 21 महीने बाद उन्हें दोबारा भारतीय टेस्ट टीम में जगह मिली है। घरेलू क्रिकेट में लगातार रन बनाने वाले सरफराज के लिए यह वापसी खुद को फिर साबित करने का बड़ा मौका है।   नंबर-6 की जगह के लिए जुरेल से मुकाबला   सरफराज को सीधे प्लेइंग इलेवन में जगह मिलेगी या नहीं, यह अभी तय नहीं है। टीम मैनेजमेंट के सामने नंबर-6 बल्लेबाजी स्थान को लेकर सरफराज और ध्रुव जुरेल के बीच चयन का विकल्प है। गॉल की पिच पर स्पिन के खिलाफ बल्लेबाजी की क्षमता को देखते हुए सरफराज का दावा मजबूत माना जा रहा है।   गॉल की पिच पर सरफराज की तकनीक की होगी परीक्षा   गॉल में टेस्ट क्रिकेट के दौरान स्पिनरों को काफी मदद मिलने की संभावना रहती है। ऐसे में सरफराज की स्पिन के खिलाफ आक्रामक बल्लेबाजी और स्वीप जैसे शॉट खेलने की क्षमता भारत के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।   पहला टेस्ट 15 अगस्त से गॉल इंटरनेशनल स्टेडियम में शुरू होगा। इसलिए अगर सरफराज को अंतिम एकादश में मौका मिलता है, तो लंबे अंतराल के बाद अंतरराष्ट्रीय टेस्ट क्रिकेट में उनकी वापसी पर सभी की नजरें रहेंगी।

abhishek singh अगस्त 12, 2026 0
Woman experiencing chronic lower back pain and morning stiffness, possible signs of axial arthritis affecting spinal mobility.
लगातार कमर दर्द को सामान्य न समझें, एक्सियल अर्थराइटिस हो सकता है कारण; चलने-फिरने में भी आ सकती है परेशानी

लंबे समय तक बैठकर काम करने, गलत पोस्चर या शारीरिक गतिविधि की कमी के कारण कमर दर्द होना आम बात है। लेकिन अगर दर्द महीनों तक बना रहे, सुबह उठने पर लंबे समय तक कमर जकड़ी रहे और आराम करने के बजाय चलने-फिरने से राहत मिले, तो इसे केवल सामान्य कमर दर्द मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे लक्षण एक्सियल अर्थराइटिस या एक्सियल स्पॉन्डायलोआर्थराइटिस जैसी क्रॉनिक सूजन संबंधी बीमारी से जुड़े हो सकते हैं। यह मुख्य रूप से रीढ़ और सैक्रोइलियक जोड़ों को प्रभावित करती है। समय पर पहचान और उपचार न होने पर रीढ़ की लचक कम हो सकती है और रोजमर्रा की गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं। क्या है एक्सियल अर्थराइटिस? एक्सियल अर्थराइटिस एक लंबे समय तक चलने वाली सूजन संबंधी बीमारी है, जो रीढ़ की हड्डी और सैक्रोइलियक यानी रीढ़ तथा पेल्विस को जोड़ने वाले जोड़ों को प्रभावित करती है। यह स्पॉन्डायलोआर्थराइटिस नामक बीमारियों के समूह का हिस्सा है। इसकी शुरुआत अक्सर कम उम्र में होती है और कई मामलों में 45 वर्ष की उम्र से पहले लक्षण दिखाई देने लगते हैं। बीमारी के शुरुआती चरण में एक्स-रे सामान्य भी आ सकता है। ऐसे मामलों में डॉक्टर जरूरत के अनुसार एमआरआई जैसी जांच की सलाह दे सकते हैं, जिससे जोड़ों में मौजूद सूजन का पता लगाने में मदद मिल सकती है। रीढ़ को कैसे प्रभावित करती है यह बीमारी? एक्सियल अर्थराइटिस में सबसे पहले सैक्रोइलियक जोड़ों में सूजन हो सकती है। लगातार सूजन रहने पर यह समस्या रीढ़ के अन्य हिस्सों तक फैल सकती है। समय के साथ शरीर सूजन से प्रभावित हिस्सों में नई हड्डी बनाना शुरू कर सकता है। कुछ गंभीर मामलों में कशेरुकाएं आपस में जुड़ने लगती हैं, जिससे रीढ़ का लचीलापन कम हो सकता है। इसका असर झुकने, मुड़ने, सीढ़ियां चढ़ने और लंबे समय तक चलने जैसी रोजमर्रा की गतिविधियों पर पड़ सकता है। इन शुरुआती लक्षणों को पहचानें एक्सियल अर्थराइटिस की पहचान में कुछ खास लक्षण महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इनमें शामिल हैं: तीन महीने या उससे अधिक समय तक रहने वाला कमर दर्द सुबह उठने पर 30 मिनट या उससे ज्यादा समय तक जकड़न आराम करने पर दर्द का बढ़ना चलने या व्यायाम करने से दर्द में राहत मिलना रात में दर्द के कारण नींद खुलना कूल्हों के आसपास दर्द लंबे समय तक बैठने के बाद उठने में परेशानी कुछ मामलों में आंखों में लालिमा और दर्द हर व्यक्ति में सभी लक्षण दिखाई दें, यह जरूरी नहीं है। सामान्य कमर दर्द से कैसे अलग है? सामान्य कमर दर्द अक्सर मांसपेशियों में खिंचाव, भारी सामान उठाने, चोट या गलत पोस्चर से जुड़ा हो सकता है। ऐसे दर्द में आराम करने से अक्सर राहत मिलती है और समस्या कुछ समय में कम हो सकती है। इसके विपरीत, एक्सियल अर्थराइटिस में दर्द का संबंध सूजन से होता है। इसमें लंबे समय तक आराम करने से परेशानी बढ़ सकती है, जबकि हल्की शारीरिक गतिविधि या चलने से कुछ राहत महसूस हो सकती है। सुबह की लंबे समय तक रहने वाली जकड़न भी एक महत्वपूर्ण संकेत हो सकती है। केवल कमर ही नहीं, शरीर के दूसरे हिस्से भी हो सकते हैं प्रभावित एक्सियल अर्थराइटिस का प्रभाव केवल रीढ़ और सैक्रोइलियक जोड़ों तक सीमित नहीं रहता। कुछ मरीजों में आंखों में सूजन, त्वचा, आंतों या शरीर के दूसरे जोड़ों से जुड़ी समस्याएं भी देखी जा सकती हैं। इसी वजह से लंबे समय तक बने रहने वाले असामान्य लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। कब डॉक्टर से संपर्क करें? अगर कमर दर्द लगातार तीन महीने या उससे ज्यादा समय से बना हुआ है, सुबह लंबे समय तक जकड़न रहती है, रात में दर्द से नींद खुलती है या चलने-फिरने से आराम मिलता है, तो विशेषज्ञ से जांच कराने पर विचार करना चाहिए। सही निदान के लिए डॉक्टर लक्षणों, शारीरिक जांच और जरूरत पड़ने पर इमेजिंग तथा अन्य जांचों का सहारा ले सकते हैं। महत्वपूर्ण: हर लंबे समय तक रहने वाला कमर दर्द एक्सियल अर्थराइटिस नहीं होता। लेकिन लगातार या बढ़ते लक्षणों को नजरअंदाज करना सही नहीं है। समय पर विशेषज्ञ की सलाह मिलने से बीमारी को नियंत्रित करने और जीवन की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।  

surbhi अगस्त 12, 2026 0
Varicose veins and leg edema compared, showing swollen legs, prominent veins, symptoms, causes and health risks.
पैरों में सूजन या उभरी नसें? वैरिकोज वेन्स और लेग एडिमा में क्या अंतर, जानें कारण, लक्षण और खतरे

पैरों में सूजन, भारीपन या नसों का उभरना कई लोगों के लिए आम समस्या हो सकती है। खासकर लंबे समय तक खड़े रहने, लगातार बैठकर काम करने या दिनभर चलने-फिरने के बाद पैरों में ऐसी परेशानी महसूस हो सकती है। लेकिन हर बार इसे सामान्य थकान मानकर नजरअंदाज करना सही नहीं है। कई मामलों में पैरों की उभरी हुई नसें वैरिकोज वेन्स का संकेत हो सकती हैं, जबकि पैर, टखने या पंजे में आने वाली सूजन लेग एडिमा से जुड़ी हो सकती है। देखने में दोनों समस्याएं कुछ हद तक समान लग सकती हैं, लेकिन इनके कारण, लक्षण और उपचार अलग-अलग होते हैं। वैरिकोज वेन्स और लेग एडिमा क्या एक ही समस्या है? नहीं। वैरिकोज वेन्स और लेग एडिमा दो अलग-अलग स्वास्थ्य स्थितियां हैं। वैरिकोज वेन्स में पैरों की सतही नसों के अंदर मौजूद वाल्व ठीक से काम नहीं कर पाते। इससे रक्त पैरों से ऊपर की ओर लौटने के बजाय नसों में जमा होने लगता है। धीरे-धीरे नसें फैल जाती हैं और त्वचा के नीचे नीली, बैंगनी या टेढ़ी-मेढ़ी उभरी हुई दिखाई देने लगती हैं। वहीं लेग एडिमा में पैरों के ऊतकों में अतिरिक्त तरल पदार्थ जमा हो जाता है। इसके कारण पैर, टखने या पंजे में सूजन दिखाई देती है। एडिमा केवल लंबे समय तक बैठने या खड़े रहने से नहीं, बल्कि कुछ दवाओं, गर्भावस्था और हृदय, किडनी, लिवर या लसीका तंत्र से जुड़ी समस्याओं के कारण भी हो सकती है। वैरिकोज वेन्स के प्रमुख लक्षण वैरिकोज वेन्स का सबसे स्पष्ट संकेत पैरों की नसों का सामान्य से अधिक उभरकर दिखाई देना है। इसके साथ कई अन्य लक्षण भी हो सकते हैं: नीली या बैंगनी रंग की उभरी हुई नसें नसों का टेढ़ा-मेढ़ा या गुच्छेदार दिखाई देना पैरों में भारीपन या थकान लंबे समय तक खड़े रहने पर दर्द या असहजता पैरों में खुजली या जलन रात के समय पैरों में ऐंठन टखनों के आसपास हल्की सूजन कुछ लोगों में लंबे समय तक वैरिकोज वेन्स रहने पर त्वचा के रंग में बदलाव, त्वचा में कठोरता या घाव जैसी समस्याएं भी विकसित हो सकती हैं। इसलिए लगातार दिखाई देने वाली उभरी नसों को केवल कॉस्मेटिक समस्या मानना उचित नहीं है। लेग एडिमा क्यों होती है? लेग एडिमा का अर्थ है पैरों के ऊतकों में जरूरत से ज्यादा तरल पदार्थ जमा होना। यह एक लक्षण है, जिसके पीछे कई अलग-अलग कारण हो सकते हैं। संभावित कारणों में शामिल हैं: लंबे समय तक बैठना या खड़े रहना गर्भावस्था अधिक नमक का सेवन कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव किडनी से जुड़ी बीमारी लिवर संबंधी समस्या हृदय संबंधी बीमारी लसीका तंत्र की समस्या डीप वेन थ्रॉम्बोसिस यानी डीवीटी कई मामलों में सूजे हुए हिस्से को उंगली से दबाने पर कुछ समय के लिए गड्ढा दिखाई दे सकता है। इसे पिटिंग एडिमा कहा जाता है। हालांकि, हर तरह की एडिमा में ऐसा होना जरूरी नहीं है। एक पैर अचानक सूज जाए तो सावधान पैरों में सूजन होने पर यह देखना भी महत्वपूर्ण है कि सूजन एक पैर में है या दोनों पैरों में। अगर एक पैर में अचानक सूजन, दर्द, लालिमा या गर्माहट महसूस हो, तो इसे सामान्य समस्या मानकर इंतजार नहीं करना चाहिए। ऐसे लक्षण डीप वेन थ्रॉम्बोसिस जैसी गंभीर स्थिति से जुड़े हो सकते हैं और चिकित्सकीय जांच की जरूरत पड़ सकती है। अगर पैर की सूजन के साथ सांस लेने में परेशानी या सीने में दर्द हो, तो तत्काल चिकित्सा सहायता लेना जरूरी है। वैरिकोज वेन्स और लेग एडिमा में मुख्य अंतर विशेषता वैरिकोज वेन्स लेग एडिमा मुख्य समस्या नसों के वाल्व का कमजोर होना ऊतकों में अतिरिक्त तरल जमा होना प्रमुख पहचान नीली, बैंगनी, उभरी या टेढ़ी नसें पैर, टखने या पंजे में सूजन सामान्य लक्षण भारीपन, दर्द, जलन और ऐंठन सूजन, खिंचाव और भारीपन त्वचा पर असर नसें स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं त्वचा तनी हुई या चमकदार लग सकती है दबाने पर गड्ढा आमतौर पर प्रमुख संकेत नहीं कुछ प्रकार की एडिमा में हो सकता है संभावित कारण नसों में रक्त का जमा होना शरीर के ऊतकों में तरल पदार्थ का जमा होना उपचार स्थिति के अनुसार कंप्रेशन, जीवनशैली में बदलाव या अन्य चिकित्सा उपचार मूल कारण के अनुसार उपचार दोनों समस्याओं का इलाज अलग होता है वैरिकोज वेन्स के मामले में डॉक्टर समस्या की गंभीरता के अनुसार व्यायाम, पैरों को कुछ समय के लिए ऊंचा रखने, कंप्रेशन स्टॉकिंग या अन्य उपचार की सलाह दे सकते हैं। कुछ मामलों में नसों को बंद करने या हटाने से जुड़ी प्रक्रियाओं की आवश्यकता भी हो सकती है। लेग एडिमा में सबसे महत्वपूर्ण बात इसके मूल कारण का पता लगाना है। यदि सूजन किसी बीमारी या दवा के कारण है, तो उपचार उसी वजह के अनुसार किया जाता है। इसलिए केवल सूजन कम करने के लिए खुद से दवा लेना उचित नहीं है। कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए? यदि पैरों में लगातार सूजन, दर्द, भारीपन, उभरी हुई नसें, त्वचा के रंग में बदलाव या बार-बार ऐंठन जैसी समस्या हो रही है, तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है। खासकर अचानक एक पैर में सूजन आने, तेज दर्द होने, त्वचा लाल या गर्म होने अथवा इसके साथ सांस लेने में परेशानी या सीने में दर्द होने पर तुरंत चिकित्सकीय मदद लेनी चाहिए।      

surbhi अगस्त 11, 2026 0
Women with PCOS should not ignore loud snoring, as it may indicate sleep apnea and disrupted sleep quality.
पीएमओएस में खर्राटे को हल्के में न लें, स्लीप एपनिया का हो सकता है संकेत; डॉक्टर ने बताए ये जरूरी लक्षण

महिलाओं में होने वाला पीएमओएस यानी पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (पहले पीसीओएस के नाम से जाना जाता था) आमतौर पर अनियमित पीरियड्स, मुंहासे, वजन बढ़ने और गर्भधारण से जुड़ी परेशानियों के लिए जाना जाता है। हालांकि, इसका प्रभाव केवल प्रजनन स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। पीएमओएस से जुड़ी महिलाओं में नींद की गुणवत्ता प्रभावित होने और ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया (OSA) जैसी समस्या का जोखिम बढ़ने की बात कई अध्ययनों में सामने आई है। अगर पीएमओएस के साथ किसी महिला को लगातार तेज खर्राटे आते हैं, रात में सांस रुकने या घुटन महसूस होने जैसी समस्या होती है, बार-बार नींद खुलती है या पर्याप्त नींद के बाद भी सुबह थकान रहती है, तो इन संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। हालांकि, केवल खर्राटे आने का मतलब स्लीप एपनिया होना नहीं है। इन लक्षणों का सही कारण जानने के लिए चिकित्सकीय जांच जरूरी है। पीएमओएस और नींद के बीच क्या संबंध है? पीएमओएस एक हार्मोनल और मेटाबोलिक स्थिति है, जिसमें एंड्रोजन हार्मोन, इंसुलिन संवेदनशीलता और शरीर के वजन में बदलाव देखने को मिल सकते हैं। ये कारक नींद की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं। उपलब्ध शोध के अनुसार, पीएमओएस से प्रभावित महिलाओं में अनिद्रा, रात में बार-बार नींद टूटना, दिन में अत्यधिक नींद आना और स्लीप एपनिया जैसी नींद संबंधी समस्याएं अधिक देखने को मिल सकती हैं। अधिक वजन या मोटापा होने पर स्लीप एपनिया का जोखिम बढ़ सकता है, लेकिन सामान्य वजन वाली महिलाओं में भी यह समस्या संभव है। क्या पीएमओएस में बढ़ सकता है स्लीप एपनिया का खतरा? ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें सोते समय ऊपरी वायुमार्ग बार-बार संकरा या बंद हो जाता है। इसके कारण कुछ समय के लिए सांस रुक सकती है और व्यक्ति की नींद बार-बार बाधित होती है। पीएमओएस के साथ स्लीप एपनिया के बढ़े हुए जोखिम के पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं, जिनमें शामिल हैं: शरीर का बढ़ा हुआ वजन, खासकर पेट के आसपास जमा चर्बी इंसुलिन रेजिस्टेंस एंड्रोजन हार्मोन का बढ़ा हुआ स्तर गर्दन और ऊपरी वायुमार्ग के आसपास अतिरिक्त फैट स्लीप एपनिया में बार-बार सांस रुकने से शरीर में ऑक्सीजन का स्तर प्रभावित हो सकता है। लंबे समय तक अनुपचारित रहने पर यह हाई ब्लड प्रेशर, हृदय संबंधी समस्याओं और मेटाबोलिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों के जोखिम को बढ़ा सकता है। किन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें? हर खर्राटा स्लीप एपनिया नहीं होता। लेकिन अगर खर्राटों के साथ दूसरे लक्षण भी मौजूद हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी हो सकता है। खास तौर पर इन संकेतों पर ध्यान दें: सोते समय सांस रुकने की शिकायत रात में अचानक घुटन या सांस लेने में परेशानी के साथ जागना सुबह उठने पर सिरदर्द दिनभर अत्यधिक नींद या थकान ध्यान केंद्रित करने में परेशानी चिड़चिड़ापन या मूड में बदलाव पर्याप्त समय सोने के बावजूद तरोताजा महसूस न होना कई बार सोने वाले व्यक्ति को खुद इन लक्षणों का पता नहीं चलता। ऐसे में परिवार का कोई सदस्य रात में सांस रुकने या बहुत तेज खर्राटों जैसी समस्या नोटिस कर सकता है। खराब नींद पीएमओएस में समस्या को कैसे बढ़ा सकती है? नींद की कमी और खराब नींद का असर शरीर के हार्मोन और मेटाबोलिक सिस्टम पर पड़ सकता है। पीएमओएस से प्रभावित महिलाओं में यह स्थिति पहले से मौजूद कुछ समस्याओं को और प्रभावित कर सकती है। इंसुलिन रेजिस्टेंस पर असर लगातार कम या खराब नींद से शरीर की इंसुलिन के प्रति संवेदनशीलता प्रभावित हो सकती है। पीएमओएस में पहले से मौजूद इंसुलिन रेजिस्टेंस के कारण यह स्थिति और महत्वपूर्ण हो जाती है। कोर्टिसोल का स्तर प्रभावित हो सकता है खराब नींद शरीर के तनाव से जुड़े हार्मोन कोर्टिसोल को प्रभावित कर सकती है। इसका संबंध वजन, तनाव और मेटाबोलिक स्वास्थ्य से जोड़ा जाता है। भूख नियंत्रित करने वाले हार्मोन में बदलाव नींद की कमी भूख और पेट भरे होने के संकेत देने वाले हार्मोन के संतुलन को प्रभावित कर सकती है। इससे भूख बढ़ने और अधिक खाने की इच्छा हो सकती है, जो वजन प्रबंधन को मुश्किल बना सकती है। पीएमओएस में खर्राटे आएं तो क्या करें? पीएमओएस के साथ लगातार खर्राटे, दिनभर असामान्य नींद, सुबह सिरदर्द या रात में सांस रुकने जैसे लक्षण दिखाई देते हैं, तो इसे केवल सामान्य थकान या खर्राटे मानकर टालना उचित नहीं है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर से सलाह लेकर लक्षणों का मूल्यांकन कराया जा सकता है। जरूरत पड़ने पर चिकित्सक स्लीप स्टडी या अन्य जांच की सलाह दे सकते हैं, जिससे यह पता लगाया जा सके कि स्लीप एपनिया जैसी समस्या मौजूद है या नहीं। समय पर पहचान और उपचार से नींद की गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है और इससे जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों को नियंत्रित करने में भी मदद मिल सकती है।  

surbhi अगस्त 11, 2026 0
Over 100 people fall ill after consuming Satyanarayan Puja prasad in Khagaria, Bihar, with children and women affected.
सत्यनारायण पूजा के प्रसाद से 100 से अधिक लोग बीमार, बच्चों-महिलाओं की संख्या ज्यादा; नदी पार कर नाव से अस्पताल पहुंचे मरीज

खगड़िया: बिहार के खगड़िया जिले में सत्यनारायण पूजा के बाद प्रसाद खाने से 100 से अधिक लोगों की तबीयत बिगड़ने का मामला सामने आया है। अचानक बड़ी संख्या में लोगों के बीमार पड़ने से हियादतपुर गांव में अफरा-तफरी मच गई। प्रभावित लोगों में बच्चों और महिलाओं की संख्या अधिक बताई जा रही है। पेट दर्द, उल्टी और सिर दर्द की शिकायत के बाद मरीजों को इलाज के लिए पहले नाव से नदी पार कराया गया और फिर एंबुलेंस के जरिए खगड़िया सदर अस्पताल पहुंचाया गया। पूजा के बाद प्रसाद खाने से बिगड़ी तबीयत मामला मानसी थाना क्षेत्र के नदी पार स्थित हियादतपुर गांव का है। जानकारी के अनुसार, सोमवार देर शाम गांव में सुबोध चौधरी के घर सत्यनारायण भगवान की पूजा आयोजित की गई थी। पूजा समाप्त होने के बाद बड़ी संख्या में ग्रामीणों के बीच प्रसाद वितरित किया गया। ग्रामीणों के मुताबिक, 100 से अधिक लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया था। प्रसाद खाने के कुछ समय बाद सुबोध चौधरी के परिवार के कुछ सदस्यों की तबीयत बिगड़ने लगी। उन्हें पेट दर्द, उल्टी और सिर दर्द की शिकायत हुई। इसके बाद धीरे-धीरे अन्य लोगों में भी इसी तरह के लक्षण दिखाई देने लगे। एक साथ कई लोगों के बीमार पड़ने से मचा हड़कंप जब गांव में एक के बाद एक लोगों की तबीयत खराब होने लगी तो ग्रामीणों में चिंता बढ़ गई। देखते ही देखते बीमार लोगों की संख्या बढ़ गई। इसके बाद देर रात मरीजों को अस्पताल पहुंचाने की कवायद शुरू की गई। हियादतपुर गांव नदी के दूसरी ओर स्थित होने के कारण मरीजों को सीधे सड़क मार्ग से अस्पताल ले जाना संभव नहीं था। ऐसे में ग्रामीणों ने बीमार लोगों को नाव के जरिए नदी पार कराने का फैसला किया। पहले नाव, फिर एंबुलेंस से अस्पताल पहुंचे मरीज बड़ी संख्या में मरीजों को नाव से नदी पार कर अमनी लाया गया। इसके बाद वहां से एंबुलेंस की मदद से उन्हें खगड़िया सदर अस्पताल पहुंचाया गया। देर रात एक साथ बड़ी संख्या में मरीजों के अस्पताल पहुंचने से वहां भी उपचार की व्यवस्था को लेकर हलचल बढ़ गई। डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों ने मरीजों का उपचार शुरू किया और उनकी स्थिति पर नजर रखी। बच्चों और महिलाओं की संख्या ज्यादा बीमार लोगों में बच्चों और महिलाओं की संख्या अधिक बताई जा रही है। मरीजों में मुख्य रूप से उल्टी, पेट दर्द और सिर दर्द जैसी शिकायतें सामने आई हैं। इलाज कर रहे चिकित्सकों के अनुसार, शुरुआती तौर पर मामला फूड प्वाइजनिंग जैसा प्रतीत हो रहा है। हालांकि, बीमारी की वास्तविक वजह जांच के बाद ही स्पष्ट होगी। फिलहाल अधिकांश मरीजों की स्थिति खतरे से बाहर बताई जा रही है। वहीं, सुबोध चौधरी के परिवार के कुछ सदस्यों की हालत गंभीर बताई गई है। उनका अस्पताल में इलाज जारी है और डॉक्टरों की टीम लगातार उनकी स्थिति पर निगरानी रख रही है। प्रसाद में क्या गड़बड़ी हुई? जांच के बाद खुलेगा राज एक ही जगह का प्रसाद खाने के बाद बड़ी संख्या में लोगों के बीमार पड़ने से प्रसाद की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि प्रसाद में किस वजह से खराबी आई और उसके सेवन के बाद इतने लोगों की तबीयत क्यों बिगड़ी। प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग मामले की जांच कर रहे हैं। जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि लोगों के बीमार पड़ने की वास्तविक वजह क्या थी। फिलहाल प्राथमिकता सभी प्रभावित लोगों को बेहतर चिकित्सा उपलब्ध कराना है। घटना ने सामूहिक धार्मिक आयोजनों में खाद्य सामग्री की स्वच्छता, सुरक्षित रखरखाव और गुणवत्ता सुनिश्चित करने की जरूरत को भी सामने ला दिया है।  

surbhi अगस्त 11, 2026 0
Abdominal pain moving from the navel to the lower right side may indicate appendicitis and require medical evaluation.
नाभि से शुरू होकर पेट के दाईं तरफ खिसक रहा है दर्द? इसे गैस समझकर न करें नजरअंदाज, हो सकता है अपेंडिसाइटिस

पेट में दर्द होना आम समस्या है। कई बार गैस, कब्ज, अपच या एसिडिटी की वजह से होने वाला दर्द कुछ समय बाद अपने आप ठीक हो जाता है। लेकिन अगर दर्द पहले नाभि के आसपास शुरू हो और कुछ घंटों के भीतर पेट के निचले दाहिने हिस्से में पहुंचकर लगातार तेज होने लगे, तो इसे सामान्य गैस समझकर नजरअंदाज करना सही नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, दर्द का इस तरह नाभि से पेट के निचले दाहिने हिस्से की ओर जाना अपेंडिसाइटिस का एक महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है। अपेंडिसाइटिस में अपेंडिक्स में सूजन आ जाती है और समय पर उपचार नहीं मिलने पर यह फट भी सकता है। ऐसी स्थिति गंभीर संक्रमण का कारण बन सकती है। नाभि से दाईं तरफ क्यों खिसकता है दर्द? अपेंडिक्स बड़ी आंत से जुड़ी एक छोटी, उंगली जैसी संरचना होती है और आमतौर पर पेट के निचले दाहिने हिस्से में स्थित रहती है। अपेंडिक्स में सूजन की शुरुआत होने पर दर्द कई बार नाभि के आसपास महसूस होता है। शुरुआती चरण में यह दर्द आंतों से जुड़ी नसों के जरिए महसूस होता है। जैसे-जैसे सूजन बढ़ती है और पेट की अंदरूनी परत प्रभावित होती है, दर्द अपेंडिक्स की वास्तविक जगह यानी पेट के निचले दाहिने हिस्से में अधिक स्पष्ट और तेज महसूस होने लगता है। दर्द के इस स्थान बदलने को चिकित्सकीय भाषा में दर्द का स्थानांतरण कहा जाता है। हालांकि, हर व्यक्ति में अपेंडिसाइटिस के लक्षण बिल्कुल एक जैसे हों, यह जरूरी नहीं है। किन लक्षणों के साथ बढ़ सकती है अपेंडिसाइटिस की आशंका? अगर पेट दर्द के साथ कुछ अन्य लक्षण भी दिखाई दें, तो चिकित्सकीय जांच जरूरी हो जाती है। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं: 1. नाभि से दाईं तरफ जाता दर्द शुरुआत में दर्द नाभि के आसपास हो सकता है और कुछ घंटों के भीतर पेट के निचले दाहिने हिस्से में पहुंच सकता है। समय के साथ दर्द अधिक तेज और लगातार हो सकता है। 2. चलने या खांसने पर दर्द बढ़ना अपेंडिसाइटिस में पेट की हल्की गतिविधि भी दर्द बढ़ा सकती है। खांसने, चलने, शरीर को हिलाने या अचानक झटका लगने पर दर्द ज्यादा महसूस हो सकता है। 3. भूख कम लगना अपेंडिसाइटिस के दौरान अचानक खाने की इच्छा कम हो सकती है। इसके साथ कमजोरी या असहज महसूस होना भी हो सकता है। 4. मतली और उल्टी पेट दर्द के साथ जी मिचलाना या उल्टी होना भी अपेंडिसाइटिस के संभावित लक्षणों में शामिल है। 5. बुखार अपेंडिक्स में सूजन या संक्रमण बढ़ने पर हल्का बुखार हो सकता है। गंभीर स्थिति में बुखार अधिक भी हो सकता है। हर दाईं तरफ का दर्द अपेंडिसाइटिस नहीं होता यह समझना भी जरूरी है कि पेट के निचले दाहिने हिस्से में दर्द होने का मतलब हमेशा अपेंडिसाइटिस नहीं होता। गैस, आंतों से जुड़ी दूसरी समस्याएं, मूत्र संबंधी परेशानी और महिलाओं में कुछ स्त्री रोग संबंधी स्थितियां भी इसी क्षेत्र में दर्द का कारण बन सकती हैं। इसीलिए केवल लक्षणों के आधार पर खुद से बीमारी तय करना उचित नहीं है। खासकर बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं में लक्षण अलग तरीके से दिखाई दे सकते हैं। समय पर इलाज क्यों जरूरी है? अपेंडिसाइटिस का समय पर उपचार न होने पर अपेंडिक्स फट सकता है। इसके बाद संक्रमण पेट के अंदर फैल सकता है और पेरिटोनाइटिस जैसी गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है। कुछ मामलों में पेट के अंदर पस जमा हो सकती है और संक्रमण खून तक फैलने पर सेप्सिस का खतरा भी पैदा हो सकता है। इसी वजह से लगातार बढ़ते पेट दर्द को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। चिकित्सकीय जांच के बाद डॉक्टर स्थिति के अनुसार सर्जरी या अन्य उपचार की सलाह दे सकते हैं। कब तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें? अगर पेट का दर्द नाभि से शुरू होकर निचले दाहिने हिस्से में पहुंच रहा है और लगातार बढ़ रहा है, तो जल्द चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी है। खासतौर पर दर्द के साथ बुखार, उल्टी, भूख न लगना, पेट में अत्यधिक संवेदनशीलता या चलने-खांसने पर तेज दर्द हो तो देरी नहीं करनी चाहिए।  

surbhi अगस्त 10, 2026 0
Bihar Cabinet meeting chaired by Samrat Choudhary approving 17 major decisions including PPP medical colleges and Har Ghar Tiranga funding.
बिहार कैबिनेट के 17 बड़े फैसले: 16 मेडिकल कॉलेज PPP मॉडल पर चलेंगे, 'हर घर तिरंगा' अभियान के लिए ₹6.12 करोड़ मंजूर

पटना: मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अध्यक्षता में हुई बिहार कैबिनेट की बैठक में कुल 17 महत्वपूर्ण प्रस्तावों को मंजूरी दी गई। बैठक में स्वास्थ्य, शिक्षा, खेल, पर्यटन, न्यायिक व्यवस्था, जलापूर्ति, उद्योग और प्रशासनिक सुधार से जुड़े कई बड़े फैसले लिए गए। सरकार का कहना है कि इन निर्णयों का उद्देश्य राज्य में बुनियादी ढांचे को मजबूत करना और सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार करना है। 16 मेडिकल कॉलेज और अस्पताल PPP मॉडल पर संचालित होंगे कैबिनेट का सबसे बड़ा फैसला 'सात निश्चय-3' के तहत राज्य के 16 ब्राउनफील्ड मेडिकल कॉलेज एवं अस्पतालों (डेंटल कॉलेज सहित) को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल पर विकसित और संचालित करने का है। इसके लिए PricewaterhouseCoopers (PwC) को ट्रांजैक्शन एडवाइजर नियुक्त किया गया है और ₹8.27 करोड़ की प्रशासनिक स्वीकृति दी गई है। राजगीर में बनेगा स्पोर्ट्स साइंस सेंटर खेल प्रतिभाओं को आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए राजगीर स्थित राज्य खेल अकादमी में स्पोर्ट्स साइंस सेंटर की स्थापना को मंजूरी दी गई। इस परियोजना पर करीब ₹25 करोड़ खर्च किए जाएंगे। वहीं ज्ञान भारतम मिशन के तहत प्राचीन पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण और मेटाडाटा निर्माण के लिए ₹6.23 करोड़ की स्वीकृति भी दी गई। जलापूर्ति और MSME को बढ़ावा कैबिनेट ने अमृत 2.0 योजना के तहत जमालपुर जलापूर्ति परियोजना के लिए ₹102.22 करोड़ और मुंगेर जलापूर्ति परियोजना (फेज-1) के लिए ₹177.72 करोड़ मंजूर किए। साथ ही MSME निदेशालय के पुनर्गठन और पुरातत्व निदेशालय में तकनीकी पदों पर संविदा नियुक्तियों को भी मंजूरी दी गई। न्यायिक व्यवस्था होगी मजबूत राज्य सरकार ने पूर्णिया, भागलपुर और गया में NDPS मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों के गठन हेतु 27 नए पदों के सृजन को मंजूरी दी। इसके अलावा SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम से जुड़े मामलों के त्वरित निपटारे के लिए 19 अतिरिक्त विशेष न्यायालय स्थापित किए जाएंगे, जिनके लिए 171 नए पद स्वीकृत किए गए हैं। 330 गृह रक्षकों की होगी तैनाती बाल गृह, बालिका गृह और अन्य संरक्षण संस्थानों की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए 330 गृह रक्षकों की तैनाती को मंजूरी दी गई। इस पर सरकार का वार्षिक खर्च करीब ₹14.53 करोड़ होगा। स्वास्थ्य और पर्यटन क्षेत्र में भी अहम फैसले कैबिनेट ने बिहार आयुष चिकित्सा सेवा नियमावली-2026 में संशोधन को मंजूरी दी। इसके साथ ही बिहार स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के लिए 6 नए प्रशासनिक पद और राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज, पटना में 2 सुपरन्यूमरेरी पद सृजित किए गए। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए मुख्यमंत्री बिहार हेली-टूरिज्म एवं एयर टूरिज्म सेवा योजना-2026 को भी मंजूरी दी गई। 'हर घर तिरंगा' अभियान के लिए ₹6.12 करोड़ मंजूर कैबिनेट ने 'हर घर तिरंगा अभियान-2026' के सफल आयोजन के लिए ₹6.12 करोड़ की स्वीकृति दी। इसके अलावा पूर्वी चंपारण में केंद्रीय विद्यालय के लिए राज्य सरकार की भूमि 30 वर्ष की लीज पर उपलब्ध कराने और नवादा में बिहार औद्योगिक सुरक्षा बल (BISF) की स्थापना हेतु करीब 44 एकड़ सरकारी भूमि नि:शुल्क हस्तांतरित करने के प्रस्ताव को भी मंजूरी मिली।  

surbhi अगस्त 6, 2026 0
Persistent lumps may have various causes, but growing or hard lumps should be evaluated by a doctor
शरीर में हर गांठ कैंसर नहीं, लेकिन इन बदलावों को बिल्कुल न करें नजरअंदाज; कब डॉक्टर को दिखाना जरूरी?

नई दिल्ली: शरीर के किसी हिस्से में अचानक गांठ महसूस हो जाए तो चिंता होना स्वाभाविक है। कई लोग गांठ को तुरंत कैंसर से जोड़ लेते हैं, जबकि दूसरी तरफ कुछ लोग इसे मामूली समझकर लंबे समय तक नजरअंदाज कर देते हैं। सच यह है कि शरीर में बनने वाली हर गांठ कैंसर नहीं होती। गांठ के पीछे सिस्ट, लिपोमा, संक्रमण, सूजी हुई लिम्फ नोड्स और कई अन्य कारण हो सकते हैं। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि हर गांठ को बिना जांच के छोड़ दिया जाए। अगर कोई गांठ लगातार बनी हुई है, उसका आकार बढ़ रहा है, वह कठोर है और हिलती नहीं है या उसके ऊपर की त्वचा में असामान्य बदलाव नजर आ रहा है, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है। एनएचएस के अनुसार, दो सप्ताह से ज्यादा बनी रहने वाली या बढ़ती हुई गांठ को चिकित्सकीय सलाह के लिए दिखाना चाहिए। गांठ बनने के कई कारण हो सकते हैं शरीर में गांठ या सूजन कई वजहों से बन सकती है। उदाहरण के लिए, त्वचा के नीचे फैट जमा होने से लिपोमा हो सकता है, जो अक्सर नरम और आसानी से हिलने वाला होता है। त्वचा के नीचे सिस्ट भी गांठ की तरह महसूस हो सकती है। वहीं संक्रमण के दौरान गर्दन, बगल या जांघ के जोड़ के आसपास लिम्फ नोड्स सूज सकती हैं। इसलिए केवल गांठ महसूस होने के आधार पर कैंसर का निष्कर्ष निकालना सही नहीं है। गांठ की जगह, आकार, बनावट, कितने समय से मौजूद है और समय के साथ उसमें क्या बदलाव हुए हैं—इन सभी बातों को देखकर डॉक्टर तय करते हैं कि आगे जांच की जरूरत है या नहीं। कौन-सी गांठ ज्यादा चिंता की वजह हो सकती है? हर गांठ का व्यवहार एक जैसा नहीं होता। कुछ गांठें धीरे-धीरे बढ़ती हैं और लंबे समय तक बिना किसी परेशानी के बनी रह सकती हैं। दूसरी ओर, कुछ गांठों में ऐसे बदलाव दिखाई दे सकते हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। खास तौर पर इन संकेतों पर ध्यान दें: गांठ का आकार लगातार बढ़ रहा हो। गांठ बहुत कठोर महसूस हो। दबाने पर गांठ अपनी जगह से न हिले। गांठ दो सप्ताह से ज्यादा समय तक बनी रहे। गांठ में लगातार बदलाव दिखाई दे। गांठ के आसपास दर्द, लालिमा या गर्माहट हो। गांठ के ऊपर की त्वचा में असामान्य बदलाव हो। इनमें से कोई लक्षण होने का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति को कैंसर ही है। लेकिन इन स्थितियों में चिकित्सकीय जांच जरूरी हो सकती है। त्वचा का रंग या रूप बदलना क्यों महत्वपूर्ण है? किसी गांठ के ऊपर या आसपास की त्वचा का रंग, बनावट या रूप बदलना ध्यान देने योग्य संकेत हो सकता है। त्वचा लाल होना, घाव बनना, पपड़ी पड़ना, खून आना या किसी उभार का रंग अथवा आकार बदलना कई अलग-अलग कारणों से हो सकता है। एनएचएस के अनुसार, त्वचा पर ऐसा उभार जो बढ़ रहा हो या जिसका रंग अथवा बनावट बदल रही हो, उसे डॉक्टर को दिखाना चाहिए। लंबे समय तक ठीक न होने वाला घाव या ऐसा क्षेत्र जिसमें दर्द, खुजली, रक्तस्राव या पपड़ी बनने जैसी समस्या बनी रहे, उसकी भी चिकित्सकीय जांच जरूरी है। गांठ के साथ वजन कम हो रहा है तो भी ध्यान दें अगर बिना किसी स्पष्ट कारण के वजन लगातार कम हो रहा है, लंबे समय से बुखार बना हुआ है या रात में बहुत ज्यादा पसीना आता है, तो इन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ये लक्षण कई अलग-अलग बीमारियों में हो सकते हैं और अपने आप में कैंसर की पुष्टि नहीं करते। लेकिन यदि इनके साथ कोई लगातार बनी रहने वाली गांठ भी मौजूद है, तो डॉक्टर से सलाह लेना ज्यादा जरूरी हो जाता है। गर्दन, बगल या जांघ के जोड़ में सूजन को कब दिखाएं? संक्रमण के दौरान लिम्फ नोड्स यानी लसीका ग्रंथियां सूज सकती हैं और अक्सर संक्रमण ठीक होने के साथ इनकी सूजन कम हो जाती है। लेकिन अगर गर्दन, बगल या जांघ के जोड़ के आसपास सूजन लगातार बनी रहती है, बढ़ती जाती है या गांठ कठोर और स्थिर महसूस होती है, तो डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। सांस लेने या निगलने में दिक्कत हो तो तुरंत ध्यान दें अगर गांठ ऐसी जगह है जहां वह आसपास के अंगों पर दबाव डाल रही है और इसके कारण निगलने या सांस लेने में परेशानी होने लगी है, तो इसे सामान्य मानकर इंतजार नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में जल्द चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी है। डॉक्टर जांच में क्या कर सकते हैं? गांठ की जांच के दौरान डॉक्टर उसके आकार, स्थान, बनावट और आसपास के हिस्से को देखते हैं। जरूरत पड़ने पर अल्ट्रासाउंड जैसे परीक्षण कराए जा सकते हैं और कुछ मामलों में आगे की जांच के लिए विशेषज्ञ के पास भेजा जा सकता है। गांठ की वास्तविक वजह जानने के लिए कभी-कभी बायोप्सी जैसी जांच की भी जरूरत पड़ सकती है। इसलिए इंटरनेट पर लक्षण पढ़कर खुद से गांठ को कैंसर मान लेना भी सही नहीं है और उसे पूरी तरह नजरअंदाज करना भी ठीक नहीं है। सबसे जरूरी बात: डरें नहीं, लेकिन जांच जरूर कराएं शरीर में गांठ होना कैंसर की पुष्टि नहीं करता। राष्ट्रीय कैंसर संस्थान के अनुसार, कैंसर से जुड़े कई लक्षण वास्तव में अन्य बीमारियों, चोट या सौम्य स्थितियों के कारण भी हो सकते हैं। लेकिन अगर कोई लक्षण कुछ हफ्तों तक बना रहता है या बिगड़ता जाता है, तो डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है ताकि सही कारण का पता लगाया जा सके। इसलिए अगर शरीर में नई गांठ महसूस हुई है, वह बढ़ रही है, कठोर है, हिलती नहीं है, दो सप्ताह से ज्यादा बनी हुई है या उसके साथ त्वचा में बदलाव, लगातार बुखार, रात में पसीना या बिना वजह वजन कम होने जैसे लक्षण हैं, तो स्वयं निदान करने के बजाय डॉक्टर से जांच कराएं।  

surbhi अगस्त 5, 2026 0
Woman drinking aloe vera juice daily while learning about potential health benefits and safety precautions
30 दिन रोज एलोवेरा जूस पीने से क्या होगा? फायदे से ज्यादा जरूरी है ये सावधानी

एलोवेरा को आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा में लंबे समय से इस्तेमाल किया जाता रहा है। आजकल इसे लेकर सोशल मीडिया और हेल्थ कंटेंट में कई तरह के दावे किए जाते हैं। वजन घटाने से लेकर पाचन सुधारने, त्वचा में निखार लाने और इम्यूनिटी मजबूत करने तक, एलोवेरा जूस को कई फायदे से जोड़ा जाता है। लेकिन सवाल है कि अगर कोई व्यक्ति लगातार 30 दिनों तक रोज एलोवेरा जूस पीता है, तो वास्तव में शरीर पर क्या असर पड़ सकता है? इसका जवाब इतना सीधा नहीं है। एलोवेरा के कुछ मौखिक उपयोगों पर सीमित वैज्ञानिक शोध उपलब्ध है, लेकिन त्वचा चमकाने, शरीर से 'टॉक्सिन' निकालने या तेजी से फैट कम करने जैसे लोकप्रिय दावों के लिए पर्याप्त मजबूत प्रमाण नहीं हैं। इसलिए एलोवेरा जूस को किसी बीमारी का इलाज या वजन घटाने का शॉर्टकट मानना सही नहीं होगा। एलोवेरा जूस में क्या पाया जाता है? एलोवेरा के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग यौगिक पाए जाते हैं। इसके अंदरूनी जेल और पत्ते की बाहरी परत से मिलने वाला लेटेक्स एक जैसे नहीं होते। यही वजह है कि किसी एलोवेरा ड्रिंक की सुरक्षा इस बात पर भी निर्भर करती है कि उसे किस हिस्से से तैयार किया गया है और उसमें एलोइन जैसे एंथ्राक्विनोन यौगिक कितनी मात्रा में मौजूद हैं। NCCIH के अनुसार बाजार में मिलने वाले एलो उत्पादों में जेल, लेटेक्स या पूरे पत्ते के अर्क का इस्तेमाल हो सकता है। इसलिए सिर्फ 'एलोवेरा जूस' लिखा होना उसकी गुणवत्ता और सुरक्षा की गारंटी नहीं है। 30 दिन पीने पर पाचन में क्या असर हो सकता है? कुछ लोगों को एलोवेरा जूस लेने के बाद पाचन बेहतर महसूस हो सकता है। लेकिन इसे कब्ज, गैस या IBS का पक्का इलाज मानने के लिए पर्याप्त विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसके उलट, अगर किसी उत्पाद में एलो लेटेक्स मौजूद है, तो पेट में दर्द, ऐंठन और दस्त जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए पेट साफ करने के लिए एलोवेरा जूस का ज्यादा सेवन करना उल्टा नुकसान पहुंचा सकता है। क्या एलोवेरा जूस से त्वचा चमक सकती है? एलोवेरा में मौजूद कुछ यौगिकों में एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि देखी गई है। लेकिन रोज एलोवेरा जूस पीने से एक महीने में त्वचा चमकने लगेगी या मुंहासे खत्म हो जाएंगे, ऐसा दावा करने के लिए पर्याप्त मजबूत मानव-आधारित प्रमाण नहीं हैं। एलोवेरा के त्वचा संबंधी संभावित फायदे पर शोध मुख्य रूप से इसके बाहरी इस्तेमाल को लेकर भी हुआ है। इसलिए जूस को 'स्किन ग्लो' का निश्चित उपाय बताना सही नहीं होगा। क्या इम्यूनिटी मजबूत करता है? एलोवेरा में मौजूद कुछ जैव सक्रिय यौगिकों को लेकर रिसर्च जरूर हुई है, लेकिन रोज एलोवेरा जूस पीने से इम्यूनिटी में निश्चित और बड़ा सुधार होगा, यह साबित नहीं हुआ है। इम्यून सिस्टम को मजबूत रखने के लिए पर्याप्त नींद, संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि और आवश्यक टीकाकरण जैसी चीजों की भूमिका कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। क्या वजन तेजी से कम होगा? एलोवेरा जूस को वजन घटाने वाले पेय के तौर पर काफी प्रचारित किया जाता है, लेकिन इसे फैट बर्नर या 'डिटॉक्स ड्रिंक' मानना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है। कुछ सीमित शोध में खास एलो उत्पादों के सेवन के बाद वजन या फैट मास में मामूली बदलाव देखे गए हैं, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सामान्य एलोवेरा जूस 30 दिनों में वजन तेजी से कम कर देगा। वजन घटाने के लिए कैलोरी संतुलन, पौष्टिक भोजन और नियमित व्यायाम ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। सबसे जरूरी बात: हर एलोवेरा जूस सुरक्षित नहीं एलोवेरा का सेवन करते समय सबसे महत्वपूर्ण बात उत्पाद की गुणवत्ता और उसकी संरचना है। एलो लेटेक्स मुंह से लेने पर दस्त और पेट में ऐंठन पैदा कर सकता है। इसके अलावा, लंबे समय तक कुछ एलो लीफ एक्सट्रैक्ट के सेवन को लिवर की चोट के मामलों से भी जोड़ा गया है। Mayo Clinic भी एलोवेरा को उन हर्बल सप्लीमेंट्स में शामिल करता है जो कुछ परिस्थितियों में लिवर को नुकसान पहुंचा सकते हैं। गर्भावस्था और दवाइयां लेने वालों को विशेष सावधानी गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान मुंह से एलोवेरा लेना सुरक्षित नहीं माना जाता है और ऐसे समय में डॉक्टर से सलाह जरूरी है। इसी तरह यदि आप नियमित रूप से कोई दवा लेते हैं, तो एलोवेरा जूस या किसी हर्बल सप्लीमेंट को शुरू करने से पहले डॉक्टर या फार्मासिस्ट से सलाह लेना बेहतर है, क्योंकि हर्बल उत्पाद कुछ दवाओं के साथ इंटरैक्ट कर सकते हैं। तो क्या 30 दिन रोज एलोवेरा जूस पीना चाहिए? सिर्फ 30 दिन लगातार पीने से शरीर 'डिटॉक्स' हो जाएगा, खून साफ हो जाएगा या तेजी से वजन कम हो जाएगा, ऐसा मानना सही नहीं है। कुछ लोगों को सीमित लाभ महसूस हो सकते हैं, लेकिन इसके फायदे व्यक्ति, उत्पाद और उसकी मात्रा पर निर्भर करते हैं। अगर आप एलोवेरा जूस लेना चाहते हैं, तो लेबल पर सामग्री और एलोइन की जानकारी जरूर देखें और बिना सलाह के ज्यादा मात्रा में सेवन न करें। किसी बीमारी का इलाज चल रहा है, गर्भावस्था या स्तनपान की स्थिति है, या नियमित दवाएं चल रही हैं तो पहले डॉक्टर से सलाह लें।  

surbhi अगस्त 3, 2026 0
Neurological warning signs including headache, memory loss, balance problems, vision changes and speech difficulties
बार-बार सिरदर्द, याददाश्त कमजोर या चलने में लड़खड़ाहट? दिमाग के ये संकेत न करें नजरअंदाज, हो सकती है न्यूरोलॉजिकल बीमारी

दिमाग हमारे पूरे शरीर का कंट्रोल सेंटर है। खाना खाने, चलने, बोलने, देखने, सोचने और रोजमर्रा के सामान्य काम करने से लेकर भावनाओं और व्यवहार तक, शरीर की तमाम गतिविधियां मस्तिष्क से जुड़ी होती हैं। यही वजह है कि दिमाग से संबंधित किसी भी असामान्य बदलाव को हल्के में लेना नुकसानदायक हो सकता है। कई न्यूरोलॉजिकल बीमारियां शुरुआत में बेहद सामान्य नजर आने वाले लक्षणों के साथ सामने आती हैं। बार-बार सिरदर्द होना, हाल की बातें भूल जाना, ध्यान केंद्रित करने में परेशानी, अचानक व्यवहार बदलना या चलते समय शरीर का संतुलन बिगड़ना ऐसे संकेत हो सकते हैं, जिन्हें लोग अक्सर थकान, तनाव या बढ़ती उम्र से जोड़कर नजरअंदाज कर देते हैं। हालांकि, हर सिरदर्द या भूलने की समस्या गंभीर बीमारी का संकेत नहीं होती, लेकिन जब ये परेशानियां बार-बार होने लगें, अचानक शुरू हों या इनके साथ दूसरे न्यूरोलॉजिकल लक्षण भी दिखाई दें, तो चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी हो जाता है। बार-बार सिरदर्द हो तो कब रहें सतर्क? कभी-कभार सिरदर्द होना सामान्य हो सकता है, लेकिन बार-बार होने वाला या अचानक बहुत तेज सिरदर्द ध्यान देने की मांग करता है। खासकर अगर सिरदर्द के साथ उल्टी, कमजोरी या देखने में परेशानी भी होने लगे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इन संकेतों पर विशेष ध्यान दें: अचानक बहुत तेज सिरदर्द शुरू होना सुबह उठते ही सिरदर्द होना सिरदर्द के साथ उल्टी होना धुंधला दिखाई देना शरीर में कमजोरी महसूस होना ऐसे लक्षण कुछ मामलों में स्ट्रोक, ब्रेन ट्यूमर, इंफेक्शन या अन्य न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से जुड़े हो सकते हैं। इसलिए लगातार या असामान्य सिरदर्द होने पर डॉक्टर से जांच कराना बेहतर है। पढ़ी हुई बातें बार-बार भूल रहे हैं? भूलने की समस्या को हमेशा सामान्य मानकर टालना सही नहीं है। सामान रखकर भूल जाना या कभी-कभार किसी का नाम याद न आना सामान्य हो सकता है, लेकिन अगर हाल की घटनाएं याद रखने, जरूरी काम याद रखने या रोजमर्रा की गतिविधियों पर ध्यान देने में लगातार परेशानी होने लगे, तो इस पर ध्यान देना चाहिए। याददाश्त से जुड़े कुछ संकेत हैं: लोगों के नाम बार-बार भूलना परिचित रास्ते भूल जाना हाल की घटनाओं को याद न रख पाना जरूरी काम भूल जाना किसी बात को समझने में परेशानी होना काम पर ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई लगातार ऐसी समस्याएं डिमेंशिया, अल्जाइमर या अन्य मस्तिष्क संबंधी परेशानियों के शुरुआती संकेतों से जुड़ी हो सकती हैं। हालांकि, सही कारण जानने के लिए चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी है। अचानक बदलने लगा है स्वभाव? दिमाग से जुड़ी परेशानी का असर केवल याददाश्त या सिरदर्द के रूप में ही नहीं दिखता। कई बार व्यक्ति के व्यवहार और मूड में अचानक बदलाव भी दिखाई दे सकता है। अगर कोई व्यक्ति पहले की तुलना में अचानक ज्यादा चिड़चिड़ा रहने लगे, बिना वजह गुस्सा करे, लगातार उदास रहे या निर्णय लेने और ध्यान केंद्रित करने में परेशानी महसूस करे, तो इसे भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ध्यान देने वाले बदलाव: अचानक चिड़चिड़ापन बढ़ना बिना स्पष्ट कारण गुस्सा आना लगातार उदास रहना किसी काम में रुचि न रहना निर्णय लेने में परेशानी ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई ऐसे बदलाव कई कारणों से हो सकते हैं, लेकिन कुछ मामलों में ये न्यूरोलॉजिकल समस्याओं के साथ भी जुड़े हो सकते हैं। बोलने, देखने या चलने में परेशानी को न करें नजरअंदाज न्यूरोलॉजिकल बीमारी के कुछ संकेत शरीर की सामान्य गतिविधियों में सीधे दिखाई दे सकते हैं। अचानक बोलने में दिक्कत होना, देखने में बदलाव आना या चलते समय शरीर का संतुलन बिगड़ना खास तौर पर महत्वपूर्ण संकेत हैं। इन लक्षणों पर नजर रखें: चलते समय शरीर का संतुलन बिगड़ना बोलने में परेशानी होना अचानक देखने में दिक्कत होना डबल विजन या धुंधला दिखाई देना ऐसे लक्षण स्ट्रोक, मल्टीपल स्क्लेरोसिस, ब्रेन ट्यूमर या अन्य न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से जुड़े हो सकते हैं। खासकर यदि ये लक्षण अचानक शुरू हुए हों, तो तत्काल चिकित्सकीय सहायता लेना जरूरी है। इन लक्षणों पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें अगर इनमें से कोई गंभीर लक्षण अचानक दिखाई देता है, तो इसे सामान्य परेशानी समझकर इंतजार नहीं करना चाहिए: बोलने या समझने में परेशानी अचानक बहुत तेज सिरदर्द बेहोशी या दौरा पड़ना शरीर में अचानक कमजोरी शरीर का कोई हिस्सा सुन्न पड़ना अचानक दिखाई देने में परेशानी शरीर का संतुलन बिगड़ना भ्रम की स्थिति व्यवहार में अचानक बदलाव असामान्य या अत्यधिक नींद आना हर लक्षण का मतलब गंभीर बीमारी नहीं सिरदर्द, भूलने की समस्या, मूड में बदलाव या चक्कर जैसी परेशानियां कई अलग-अलग कारणों से हो सकती हैं। इसलिए केवल इन लक्षणों के आधार पर किसी बीमारी का निष्कर्ष निकालना सही नहीं है। लेकिन अगर कोई लक्षण बार-बार हो रहा है, अचानक शुरू हुआ है, लगातार बढ़ रहा है या उसके साथ बोलने, देखने, चलने, समझने अथवा शरीर में कमजोरी जैसे दूसरे संकेत भी मौजूद हैं, तो डॉक्टर से समय पर सलाह लेना बेहद जरूरी है। दिमाग से जुड़े मामलों में समय पर पहचान और उचित चिकित्सकीय जांच महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। किसी भी गंभीर या अचानक लक्षण की स्थिति में खुद से इलाज करने के बजाय योग्य डॉक्टर से संपर्क करें।  

surbhi अगस्त 1, 2026 0
Alcohol can damage the digestive system from the mouth and throat to the stomach, intestines, pancreas and colon
Alcohol Side Effects: मुंह से आंत तक शरीर के इन अंगों को नुकसान पहुंचा सकती है शराब, जानें कैसे बिगड़ती है सेहत

अक्सर शराब के नुकसान की बात होती है तो सबसे पहले लिवर का नाम सामने आता है। लेकिन शराब का असर सिर्फ लिवर तक सीमित नहीं रहता। शराब पीने के बाद इसका संपर्क मुंह, गले और खाने की नली से होता है, जबकि इसके घटक और शरीर में बनने वाले विषैले पदार्थ पाचन तंत्र के दूसरे हिस्सों को भी प्रभावित कर सकते हैं। National Institute on Alcohol Abuse and Alcoholism (NIAAA) के अनुसार, शराब का अत्यधिक या लंबे समय तक सेवन शरीर के कई अंगों और सिस्टम को प्रभावित कर सकता है। इसका संबंध गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सूजन और ब्लीडिंग, पैंक्रियाटाइटिस तथा कई तरह के कैंसर के बढ़े हुए जोखिम से भी है। आइए समझते हैं कि शराब शरीर के पाचन तंत्र में किस तरह नुकसान पहुंचा सकती है। मुंह और गले से शुरू हो सकता है नुकसान शराब का संपर्क सबसे पहले मुंह और गले की अंदरूनी सतह से होता है। लंबे समय तक शराब का सेवन मुंह और गले की सेहत पर प्रतिकूल असर डाल सकता है। National Cancer Institute के अनुसार शराब का सेवन मुंह, गले और स्वरयंत्र समेत कई हिस्सों के कैंसर के बढ़े हुए जोखिम से जुड़ा है। शराब की मात्रा बढ़ने के साथ कुछ कैंसर का जोखिम भी बढ़ता है। शराब के साथ तंबाकू का सेवन स्थिति को और गंभीर बना सकता है। NCI के मुताबिक शराब और तंबाकू दोनों का इस्तेमाल करने वालों में मुंह, गले, स्वरयंत्र और एसोफैगस के कैंसर का जोखिम अकेले शराब या तंबाकू की तुलना में काफी अधिक हो सकता है। खाने की नली पर भी पड़ सकता है असर मुंह से शराब खाने की नली यानी एसोफैगस के रास्ते पेट तक पहुंचती है। शराब का सेवन गैस्ट्रोएसोफेजियल रिफ्लक्स डिजीज यानी GERD के बढ़े हुए जोखिम से जुड़ा है। इससे सीने में जलन और एसिड रिफ्लक्स जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इससे भी गंभीर चिंता कैंसर के जोखिम को लेकर है। NCI के अनुसार शराब एसोफैगस कैंसर के जोखिम को बढ़ाने वाले ज्ञात कारकों में शामिल है। शराब की मात्रा बढ़ने पर जोखिम भी बढ़ सकता है। पेट में बढ़ सकती है जलन और सूजन शराब पेट और पूरे GI tract की अंदरूनी परत को नुकसान पहुंचा सकती है। NIAAA के अनुसार शराब पाचन तंत्र की epithelial lining को नुकसान पहुंचाने, सूजन बढ़ाने और GI bleeding से जुड़ी समस्याओं का कारण बन सकती है। इसी वजह से कुछ लोगों में पेट की जलन, दर्द, उल्टी या पाचन संबंधी परेशानी देखने को मिल सकती है। शराब का सेवन GERD के जोखिम से भी जुड़ा है। छोटी आंत और गट हेल्थ पर असर शराब का असर छोटी आंत और आंतों की अंदरूनी सुरक्षा व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। NIAAA के अनुसार शराब intestinal barrier को प्रभावित कर सकती है और आंतों में मौजूद माइक्रोबायोटा की संरचना में बदलाव से जुड़ी है। इसे आम भाषा में गट हेल्थ बिगड़ना कहा जा सकता है। लंबे समय तक अत्यधिक शराब का सेवन पाचन तंत्र में सूजन और पोषक तत्वों के इस्तेमाल से जुड़ी परेशानियों को बढ़ा सकता है। ऐसे में व्यक्ति के पोषण और सामान्य स्वास्थ्य पर भी असर पड़ सकता है। पैंक्रियाज के लिए भी खतरनाक हो सकती है शराब पैंक्रियाज पाचन एंजाइम और ब्लड शुगर को नियंत्रित करने वाले हार्मोन से जुड़ा महत्वपूर्ण अंग है। लंबे समय तक शराब का अत्यधिक सेवन पैंक्रियाटाइटिस यानी पैंक्रियाज में सूजन का कारण बन सकता है। एक्यूट पैंक्रियाटाइटिस अचानक शुरू हो सकता है, जबकि बार-बार होने वाली सूजन क्रोनिक पैंक्रियाटाइटिस में बदल सकती है। क्रोनिक पैंक्रियाटाइटिस से पाचन और ब्लड शुगर नियंत्रण जैसी समस्याएं हो सकती हैं। बड़ी आंत और कोलोरेक्टल कैंसर का जोखिम शराब का संबंध कोलोरेक्टल यानी बड़ी आंत और मलाशय के कैंसर के बढ़े हुए जोखिम से भी पाया गया है। NCI के अनुसार मध्यम से अधिक मात्रा में शराब पीने वालों में कोलोरेक्टल कैंसर का जोखिम शराब न पीने वालों की तुलना में बढ़ सकता है। यानी शराब का असर सिर्फ पेट या लिवर तक सीमित समझना सही नहीं है। इसके प्रभाव पाचन तंत्र के कई हिस्सों तक पहुंच सकते हैं। शराब शरीर को नुकसान कैसे पहुंचाती है? शराब शरीर में पहुंचने के बाद कई रासायनिक प्रक्रियाओं से गुजरती है। NIAAA के अनुसार शराब के metabolism के दौरान acetaldehyde नाम का एक विषैला और carcinogenic पदार्थ बनता है। यह DNA और कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है। यही कारण है कि शराब से जुड़े स्वास्थ्य जोखिम को केवल नशे या लिवर की समस्या तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। इन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें अगर शराब का सेवन करने वाले व्यक्ति को लगातार इनमें से कोई समस्या हो रही है, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है: लगातार पेट दर्द या जलन बार-बार सीने में जलन या एसिड रिफ्लक्स लगातार उल्टी उल्टी या मल में खून काला मल बिना वजह वजन कम होना लगातार कमजोरी या थकान लंबे समय से दस्त या कब्ज बार-बार पाचन संबंधी परेशानी खास तौर पर खून की उल्टी, काला मल, तेज पेट दर्द या अचानक गंभीर कमजोरी जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और तत्काल चिकित्सकीय मदद लेनी चाहिए। शराब छोड़ने से क्या फायदा हो सकता है? शराब का सेवन बंद करना स्वास्थ्य जोखिम कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। NCI के अनुसार शराब छोड़ने के बाद समय के साथ मुंह और एसोफैगस के कैंसर का जोखिम कम हो सकता है, हालांकि जोखिम को कभी-कभी सामान्य स्तर तक आने में वर्षों लग सकते हैं। अगर कोई व्यक्ति लंबे समय से नियमित या ज्यादा मात्रा में शराब पी रहा है, तो अचानक बंद करने से पहले डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है, क्योंकि कुछ लोगों में withdrawal गंभीर हो सकता है।  

surbhi अगस्त 1, 2026 0
Asthma patient managing breathing problems during rainy season amid humidity, mold, allergens and changing weather
Rainy Season Asthma: सिर्फ धूल नहीं, बारिश की बूंदें भी बढ़ा सकती हैं अस्थमा की परेशानी; जानें किन चीजों से रहें सावधान

बारिश का मौसम गर्मी से राहत जरूर देता है, लेकिन अस्थमा और एलर्जी से जूझ रहे लोगों के लिए यह मौसम कई बार मुश्किलें बढ़ा सकता है। बारिश के दौरान वातावरण में नमी बढ़ने, फंगस और एलर्जेन के संपर्क में आने तथा मौसम में अचानक बदलाव के कारण कुछ लोगों में सांस से जुड़ी तकलीफ बढ़ सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, अस्थमा के मरीजों को सिर्फ धूल और प्रदूषण से ही नहीं, बल्कि अपने व्यक्तिगत ट्रिगर्स से भी सावधान रहने की जरूरत होती है। बारिश के मौसम में घर के अंदर बिताया जाने वाला ज्यादा समय भी धूल, धूल-कण, पालतू जानवरों की रूसी और फफूंदी जैसे ट्रिगर्स के संपर्क को बढ़ा सकता है। बारिश में क्यों बढ़ सकती है सांस की परेशानी? मॉनसून के दौरान वातावरण में नमी बढ़ने से फफूंदी और अन्य एलर्जेन के पनपने की संभावना बढ़ सकती है। वहीं, तापमान और मौसम में बदलाव कुछ लोगों की सांस की नलियों को अधिक संवेदनशील बना सकता है। बारिश के दौरान घरों में नमी बढ़ने और पानी जमा होने से फंगस या मोल्ड की समस्या भी पैदा हो सकती है। इसके अलावा, घर के अंदर ज्यादा समय बिताने के कारण धूल-कण और पालतू जानवरों की रूसी जैसे एलर्जेन के संपर्क में आने की संभावना बढ़ सकती है। जिन लोगों को पहले से अस्थमा या एलर्जी है, उनमें ये कारक खांसी, सीने में जकड़न, सांस फूलने या घरघराहट जैसे लक्षणों को ट्रिगर कर सकते हैं। Thunderstorm Asthma क्या है? बारिश के साथ आने वाले तेज आंधी-तूफान यानी Thunderstorm भी कुछ लोगों के लिए परेशानी बढ़ा सकते हैं। इसे Thunderstorm Asthma कहा जाता है। इस दौरान हवा में मौजूद परागकण और अन्य एलर्जेन वातावरण में फैल सकते हैं और संवेदनशील लोगों में सांस से जुड़ी परेशानी बढ़ा सकते हैं। ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में 2016 के एक बड़े Thunderstorm Asthma episode में बड़ी संख्या में लोगों को सांस लेने में गंभीर परेशानी हुई थी और अस्पतालों में मरीजों की संख्या अचानक बढ़ गई थी। इसलिए अस्थमा के मरीजों को मौसम विभाग की चेतावनियों और अपने डॉक्टर की सलाह को गंभीरता से लेना चाहिए, खासकर जब तेज आंधी-तूफान की संभावना हो। मॉनसून में किन लक्षणों को नजरअंदाज न करें? अस्थमा के मरीजों को बारिश के मौसम में अपने शरीर के संकेतों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। अगर सामान्य से ज्यादा खांसी हो, सांस लेने में परेशानी बढ़े, सीने में जकड़न महसूस हो या सांस लेते समय घरघराहट सुनाई दे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। सर्दी-जुकाम और वायरल इंफेक्शन भी कुछ अस्थमा मरीजों में लक्षणों को बढ़ा सकते हैं। इसलिए लगातार बने रहने वाले या बढ़ते लक्षणों पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। बारिश में अस्थमा को कंट्रोल रखने के लिए क्या करें? अस्थमा को नियंत्रित रखने के लिए सबसे जरूरी है कि मरीज अपने डॉक्टर द्वारा बताए गए उपचार और दवाओं की योजना का पालन करें। डॉक्टर द्वारा निर्धारित इनहेलर और दवाएं समय पर लें। अपने व्यक्तिगत अस्थमा ट्रिगर्स की पहचान करें और उनसे बचने की कोशिश करें। घर में नमी और फफूंदी को बढ़ने न दें। घर की नियमित सफाई रखें और धूल जमा न होने दें। तेज आंधी-तूफान के दौरान बाहर जाने से बचें, खासकर अगर परागकण आपके लिए ट्रिगर हैं। बाहर निकलते समय अपनी व्यक्तिगत जरूरत के अनुसार मास्क का इस्तेमाल किया जा सकता है। धूम्रपान और धुएं से दूर रहें। ठंडी हवा या अन्य चीजों से अगर आपके लक्षण बढ़ते हैं, तो उनसे बचाव करें। पर्याप्त आराम और संतुलित खान-पान पर ध्यान दें। इनहेलर को लेकर लापरवाही न करें अस्थमा के मरीजों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि डॉक्टर ने जो दवाएं या इनहेलर निर्धारित किए हैं, उन्हें अपनी मर्जी से बंद या कम नहीं करना चाहिए। दवा की खुराक में बदलाव डॉक्टर की सलाह से ही किया जाना चाहिए। अगर सांस फूलने की समस्या अचानक बहुत ज्यादा बढ़ जाए, बोलने या चलने में परेशानी हो, होंठ या चेहरा नीला पड़ने लगे या डॉक्टर द्वारा दिए गए रिलीवर उपचार से राहत न मिले, तो तत्काल चिकित्सा सहायता लेना जरूरी है। बारिश में सिर्फ अस्थमा मरीज ही नहीं, एलर्जी वाले भी रहें सतर्क मॉनसून में बढ़ी नमी, फंगस, परागकण और वायरल संक्रमण कुछ लोगों में एलर्जी या सांस से जुड़ी समस्या बढ़ा सकते हैं। इसलिए अस्थमा और एलर्जी से पीड़ित लोगों को इस मौसम में अपने ट्रिगर्स पहचानकर सावधानी बरतनी चाहिए। हालांकि, हर व्यक्ति के ट्रिगर्स अलग हो सकते हैं। इसलिए किसी एक चीज को सभी अस्थमा मरीजों के लिए सार्वभौमिक ट्रिगर मानने के बजाय अपने लक्षणों और डॉक्टर की सलाह के आधार पर सावधानी बरतना बेहतर है।  

surbhi जुलाई 31, 2026 0
भारत में ऑर्गन ट्रांसप्लांट और अंगदान की स्थिति पर रिपोर्ट
भारत में ऑर्गन ट्रांसप्लांट की संख्या बढ़ी, लेकिन जरूरत और उपलब्धता के बीच बड़ा अंतर बरकरार

भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर, फिर भी लाखों मरीजों को नहीं मिल पाता समय पर अंग   नई दिल्ली, एजेंसियां। भारत में अंग प्रत्यारोपण (Organ Transplant) की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन जरूरतमंद मरीजों की संख्या और उपलब्ध अंगों के बीच बड़ा अंतर अभी भी बना हुआ है। नई रिपोर्ट के अनुसार, भारत दुनिया में सबसे ज्यादा ऑर्गन ट्रांसप्लांट करने वाले देशों में तीसरे स्थान पर पहुंच गया है, लेकिन मांग के मुकाबले उपलब्धता काफी कम है।   2025 में हुए 20 हजार से ज्यादा ट्रांसप्लांट   स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, भारत में वर्ष 2025 में 20,019 ऑर्गन ट्रांसप्लांट किए गए। वहीं, मार्च 2026 तक देश में करीब 89,839 मरीज अंग प्रत्यारोपण के इंतजार की सूची में थे।   किडनी और लिवर ट्रांसप्लांट की सबसे ज्यादा मांग   भारत में सबसे ज्यादा जरूरत किडनी ट्रांसप्लांट की होती है। इसके बाद लिवर, हृदय और फेफड़ों के प्रत्यारोपण की मांग रहती है। विशेषज्ञों के अनुसार, उपलब्ध अंगों की कमी के कारण कई मरीजों को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है।   अंगदान की कमी बड़ी चुनौती   स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में ट्रांसप्लांट सुविधाएं और डॉक्टरों की संख्या बढ़ी है, लेकिन मृत्यु के बाद अंगदान (Deceased Organ Donation) की दर अभी भी कम है। जागरूकता की कमी, अंगदान को लेकर झिझक और अस्पतालों में समन्वय की चुनौतियां इस अंतर को बढ़ाती हैं।   सरकार ने बढ़ाई निगरानी और जागरूकता   सरकार और NOTTO (National Organ and Tissue Transplant Organisation) अंगदान को बढ़ावा देने, ट्रांसप्लांट नेटवर्क मजबूत करने और अस्पतालों की पारदर्शिता बढ़ाने पर काम कर रहे हैं। हाल ही में ट्रांसप्लांट केंद्रों को अपनी सफलता दर और मरीजों से जुड़े आंकड़े सार्वजनिक करने के निर्देश भी दिए गए हैं।  

ranjan kumar tiwari जुलाई 30, 2026 0
एम्स देवघर में बिना ऑपरेशन कैथेटर तकनीक से दिल की बीमारी का इलाज करते डॉक्टर
एम्स देवघर में बिना ऑपरेशन दिल की सर्जरी, किशोर के दिल की गंभीर बीमारी का सफल इलाज

पहली बार नॉन-सर्जिकल PDA क्लोजर प्रक्रिया सफल, कैथेटर तकनीक से हुआ इलाज   देवघर, एजेंसियां। झारखंड के एम्स देवघर के डॉक्टरों ने चिकित्सा क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए एक किशोर मरीज के दिल की बीमारी का बिना ओपन हार्ट ऑपरेशन के सफल इलाज किया है। अस्पताल में पहली बार पेटेंट डक्टस आर्टेरियोसस (PDA) क्लोजर की नॉन-सर्जिकल प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा किया गया।   कैथेटर तकनीक से किया गया इलाज   PDA दिल से जुड़ी एक जन्मजात बीमारी है, जिसमें हृदय की एक रक्त वाहिका (डक्टस आर्टेरियोसस) जन्म के बाद भी बंद नहीं होती। पहले कई मामलों में इसके लिए सर्जरी की जरूरत पड़ती थी, लेकिन अब इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी की मदद से कैथेटर आधारित प्रक्रिया के जरिए इसका इलाज संभव है।   मरीज को नहीं खोलना पड़ा सीना   इस आधुनिक तकनीक में बड़े चीरे या ओपन हार्ट सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती। डॉक्टरों ने एक छोटे रास्ते से कैथेटर डालकर डिवाइस की मदद से समस्या को ठीक किया। इससे मरीज को कम दर्द, कम जोखिम और जल्दी रिकवरी का फायदा मिलता है।   एम्स देवघर में बढ़ रही अत्याधुनिक हृदय सेवाएं   एम्स देवघर में कार्डियोलॉजी और कार्डियोथोरेसिक एवं वैस्कुलर सर्जरी विभाग के जरिए हृदय रोगों के इलाज की सुविधाओं को लगातार मजबूत किया जा रहा है। संस्थान का लक्ष्य क्षेत्र के मरीजों को बेहतर और आधुनिक चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना है।   स्वास्थ्य क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि   एम्स देवघर की इस उपलब्धि से झारखंड और आसपास के राज्यों के मरीजों को फायदा मिलने की उम्मीद है। इससे गंभीर हृदय रोगों के इलाज के लिए दूसरे बड़े शहरों पर निर्भरता कम हो सकती है।  

ranjan kumar tiwari जुलाई 30, 2026 0
Thyroid gland illustration showing common thyroid diseases and their effects on the human body
Thyroid Disease: एक नहीं, 5 तरह की होती हैं थायरॉइड की बीमारियां, सिर्फ वजन बढ़ना-घटना ही नहीं है संकेत

थायरॉइड को लेकर आमतौर पर लोगों के मन में सबसे पहले वजन बढ़ने या घटने की बात आती है। लेकिन थायरॉइड से जुड़ी समस्याएं सिर्फ वजन तक सीमित नहीं हैं। गर्दन के सामने मौजूद तितली के आकार की यह ग्रंथि शरीर के मेटाबॉलिज्म, ऊर्जा, हृदय गति और शरीर के तापमान समेत कई जरूरी प्रक्रियाओं को प्रभावित करती है। इसके काम में गड़बड़ी होने पर अलग-अलग तरह की बीमारियां हो सकती हैं। थायरॉइड ग्रंथि मुख्य रूप से T3 और T4 हार्मोन बनाती है। इन हार्मोन्स का असंतुलन शरीर में कई तरह के बदलाव पैदा कर सकता है। थायरॉइड से जुड़ी प्रमुख समस्याओं में हाइपोथायरायडिज्म, हाइपरथायरायडिज्म, थायरॉइडाइटिस, घेंघा और थायरॉइड कैंसर शामिल हैं। 1. हाइपोथायरायडिज्म जब थायरॉइड ग्रंथि पर्याप्त मात्रा में हार्मोन नहीं बना पाती, तो इसे हाइपोथायरायडिज्म कहा जाता है। इसमें शरीर की कई प्रक्रियाएं धीमी पड़ सकती हैं। इसके संभावित लक्षणों में लगातार थकान, वजन बढ़ना, ठंड ज्यादा लगना, कब्ज, त्वचा का रूखा होना और बाल झड़ना शामिल हो सकते हैं। 2. हाइपरथायरायडिज्म हाइपोथायरायडिज्म के उलट हाइपरथायरायडिज्म में थायरॉइड ग्रंथि जरूरत से ज्यादा हार्मोन बनाने लगती है। इससे शरीर का मेटाबॉलिज्म तेज हो सकता है। तेजी से वजन कम होना, दिल की धड़कन बढ़ना, घबराहट या बेचैनी, ज्यादा पसीना आना, हाथ कांपना और नींद में परेशानी इसके संभावित लक्षण हैं। Graves' disease हाइपरथायरायडिज्म का एक प्रमुख कारण है। 3. थायरॉइडाइटिस थायरॉइडाइटिस का अर्थ थायरॉइड ग्रंथि में सूजन से है। इसके पीछे संक्रमण, ऑटोइम्यून प्रतिक्रिया या प्रसव के बाद होने वाले हार्मोनल बदलाव जैसे कारण हो सकते हैं। इस स्थिति में गर्दन में दर्द या संवेदनशीलता, थकान और हार्मोन स्तर में बदलाव के साथ वजन में उतार-चढ़ाव हो सकता है। थायरॉइडाइटिस के कुछ प्रकार अस्थायी होते हैं, जबकि कुछ लंबे समय तक बने रह सकते हैं। 4. घेंघा (Goiter) जब थायरॉइड ग्रंथि असामान्य रूप से बढ़ जाती है, तो इसे घेंघा कहा जाता है। इसके कारण गर्दन के सामने सूजन या उभार दिखाई दे सकता है। आयोडीन की कमी, हार्मोन असंतुलन और थायरॉइड की अन्य समस्याएं इसके संभावित कारण हो सकते हैं। कुछ मामलों में निगलने में परेशानी, सांस लेने में दिक्कत या गले में दबाव महसूस हो सकता है। 5. थायरॉइड कैंसर थायरॉइड कैंसर तब विकसित होता है जब थायरॉइड की कोशिकाएं अनियंत्रित तरीके से बढ़ने लगती हैं। गर्दन में गांठ या सूजन, आवाज में बदलाव, निगलने में परेशानी और लगातार खांसी जैसे संकेत दिखाई दे सकते हैं। हालांकि थायरॉइड कैंसर के कई मामलों का उपचार प्रभावी तरीके से किया जा सकता है, लेकिन गर्दन में नई गांठ या लगातार बने रहने वाले असामान्य लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। थायरॉइड की समस्या क्यों होती है? थायरॉइड की गड़बड़ी के पीछे कई कारण हो सकते हैं। ऑटोइम्यून बीमारी, आयोडीन की कमी या अधिकता, कुछ संक्रमण, आनुवंशिक कारण, रेडिएशन का संपर्क और कुछ दवाएं थायरॉइड को प्रभावित कर सकती हैं। यही वजह है कि सिर्फ वजन बढ़ने या घटने को थायरॉइड का संकेत मानना सही नहीं है। अलग-अलग थायरॉइड बीमारियों के लक्षण भी अलग हो सकते हैं। कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए? अगर लगातार थकान, वजन में असामान्य बदलाव, दिल की धड़कन में बदलाव, गर्दन में सूजन या गांठ, निगलने में परेशानी, आवाज में बदलाव अथवा अन्य लगातार बने रहने वाले लक्षण दिखाई दें, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। थायरॉइड की बीमारी का पता लगाने के लिए डॉक्टर लक्षणों के आधार पर जांच और आवश्यक टेस्ट की सलाह दे सकते हैं। समय पर पहचान होने पर कई थायरॉइड समस्याओं को प्रभावी तरीके से नियंत्रित या उपचारित किया जा सकता है।  

surbhi जुलाई 30, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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kalpana अगस्त 14, 2026 0