लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि हर गांठ को बिना जांच के छोड़ दिया जाए। अगर कोई गांठ लगातार बनी हुई है, उसका आकार बढ़ रहा है, वह कठोर है और हिलती नहीं है या उसके ऊपर की त्वचा में असामान्य बदलाव नजर आ रहा है, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है। एनएचएस के अनुसार, दो सप्ताह से ज्यादा बनी रहने वाली या बढ़ती हुई गांठ को चिकित्सकीय सलाह के लिए दिखाना चाहिए।
शरीर में गांठ या सूजन कई वजहों से बन सकती है। उदाहरण के लिए, त्वचा के नीचे फैट जमा होने से लिपोमा हो सकता है, जो अक्सर नरम और आसानी से हिलने वाला होता है। त्वचा के नीचे सिस्ट भी गांठ की तरह महसूस हो सकती है। वहीं संक्रमण के दौरान गर्दन, बगल या जांघ के जोड़ के आसपास लिम्फ नोड्स सूज सकती हैं।
इसलिए केवल गांठ महसूस होने के आधार पर कैंसर का निष्कर्ष निकालना सही नहीं है। गांठ की जगह, आकार, बनावट, कितने समय से मौजूद है और समय के साथ उसमें क्या बदलाव हुए हैं—इन सभी बातों को देखकर डॉक्टर तय करते हैं कि आगे जांच की जरूरत है या नहीं।
हर गांठ का व्यवहार एक जैसा नहीं होता। कुछ गांठें धीरे-धीरे बढ़ती हैं और लंबे समय तक बिना किसी परेशानी के बनी रह सकती हैं। दूसरी ओर, कुछ गांठों में ऐसे बदलाव दिखाई दे सकते हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
खास तौर पर इन संकेतों पर ध्यान दें:
इनमें से कोई लक्षण होने का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति को कैंसर ही है। लेकिन इन स्थितियों में चिकित्सकीय जांच जरूरी हो सकती है।
किसी गांठ के ऊपर या आसपास की त्वचा का रंग, बनावट या रूप बदलना ध्यान देने योग्य संकेत हो सकता है। त्वचा लाल होना, घाव बनना, पपड़ी पड़ना, खून आना या किसी उभार का रंग अथवा आकार बदलना कई अलग-अलग कारणों से हो सकता है।
एनएचएस के अनुसार, त्वचा पर ऐसा उभार जो बढ़ रहा हो या जिसका रंग अथवा बनावट बदल रही हो, उसे डॉक्टर को दिखाना चाहिए। लंबे समय तक ठीक न होने वाला घाव या ऐसा क्षेत्र जिसमें दर्द, खुजली, रक्तस्राव या पपड़ी बनने जैसी समस्या बनी रहे, उसकी भी चिकित्सकीय जांच जरूरी है।
अगर बिना किसी स्पष्ट कारण के वजन लगातार कम हो रहा है, लंबे समय से बुखार बना हुआ है या रात में बहुत ज्यादा पसीना आता है, तो इन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ये लक्षण कई अलग-अलग बीमारियों में हो सकते हैं और अपने आप में कैंसर की पुष्टि नहीं करते। लेकिन यदि इनके साथ कोई लगातार बनी रहने वाली गांठ भी मौजूद है, तो डॉक्टर से सलाह लेना ज्यादा जरूरी हो जाता है।
संक्रमण के दौरान लिम्फ नोड्स यानी लसीका ग्रंथियां सूज सकती हैं और अक्सर संक्रमण ठीक होने के साथ इनकी सूजन कम हो जाती है। लेकिन अगर गर्दन, बगल या जांघ के जोड़ के आसपास सूजन लगातार बनी रहती है, बढ़ती जाती है या गांठ कठोर और स्थिर महसूस होती है, तो डॉक्टर से जांच करानी चाहिए।
अगर गांठ ऐसी जगह है जहां वह आसपास के अंगों पर दबाव डाल रही है और इसके कारण निगलने या सांस लेने में परेशानी होने लगी है, तो इसे सामान्य मानकर इंतजार नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में जल्द चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी है।
गांठ की जांच के दौरान डॉक्टर उसके आकार, स्थान, बनावट और आसपास के हिस्से को देखते हैं। जरूरत पड़ने पर अल्ट्रासाउंड जैसे परीक्षण कराए जा सकते हैं और कुछ मामलों में आगे की जांच के लिए विशेषज्ञ के पास भेजा जा सकता है। गांठ की वास्तविक वजह जानने के लिए कभी-कभी बायोप्सी जैसी जांच की भी जरूरत पड़ सकती है।
इसलिए इंटरनेट पर लक्षण पढ़कर खुद से गांठ को कैंसर मान लेना भी सही नहीं है और उसे पूरी तरह नजरअंदाज करना भी ठीक नहीं है।
शरीर में गांठ होना कैंसर की पुष्टि नहीं करता। राष्ट्रीय कैंसर संस्थान के अनुसार, कैंसर से जुड़े कई लक्षण वास्तव में अन्य बीमारियों, चोट या सौम्य स्थितियों के कारण भी हो सकते हैं। लेकिन अगर कोई लक्षण कुछ हफ्तों तक बना रहता है या बिगड़ता जाता है, तो डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है ताकि सही कारण का पता लगाया जा सके।
इसलिए अगर शरीर में नई गांठ महसूस हुई है, वह बढ़ रही है, कठोर है, हिलती नहीं है, दो सप्ताह से ज्यादा बनी हुई है या उसके साथ त्वचा में बदलाव, लगातार बुखार, रात में पसीना या बिना वजह वजन कम होने जैसे लक्षण हैं, तो स्वयं निदान करने के बजाय डॉक्टर से जांच कराएं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
भारत में आंत के स्वास्थ्य पर नई खोज, आदिवासी समुदायों में मिलीं 14 नई बैक्टीरिया प्रजातियां पुणे, एजेंसियां। भारत में आंत के स्वास्थ्य और माइक्रोबायोम को लेकर वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता मिली है। पुणे स्थित BRIC-नेशनल सेंटर फॉर सेल साइंस (NCCS) के शोधकर्ताओं ने भारत के अलग-अलग आदिवासी समुदायों के आंत माइक्रोबायोम का अध्ययन किया। शोध में करीब 200 ऐसे माइक्रोबियल स्ट्रेन सामने आए, जिनका पहले दस्तावेजीकरण नहीं हुआ था। इनमें 14 नई बैक्टीरियल प्रजातियां भी शामिल हैं। आठ आदिवासी समुदायों पर किया गया अध्ययन शोधकर्ताओं ने भारत के चार अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में रहने वाले आठ आदिवासी समुदायों के 76 स्वस्थ वयस्कों के आहार और मल के नमूनों का अध्ययन किया। शोध का उद्देश्य यह समझना था कि पारंपरिक खान-पान और जीवनशैली आंत में मौजूद सूक्ष्मजीवों की संरचना को किस तरह प्रभावित करते हैं। अध्ययन से पता चला कि अलग-अलग समुदायों के पारंपरिक आहार के अनुसार उनके आंत माइक्रोबायोम में भी उल्लेखनीय अंतर पाया जाता है। पारंपरिक आहार का आंत के बैक्टीरिया पर असर वैज्ञानिकों के अनुसार लंबे समय से चले आ रहे पारंपरिक आहार का आंत के माइक्रोबायोम पर महत्वपूर्ण प्रभाव दिखाई देता है। अलग-अलग क्षेत्रों में दूध, अनाज, जड़ वाली सब्जियों, कंद और अन्य स्थानीय खाद्य पदार्थों की खपत के साथ आंत में मौजूद बैक्टीरिया की संरचना भी अलग पाई गई। शोध इस बात की ओर भी संकेत करता है कि आधुनिक और अत्यधिक प्रसंस्कृत भोजन से अलग पारंपरिक आहार मानव माइक्रोबायोम की विविधता को समझने के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। भविष्य में स्वास्थ्य अनुसंधान के लिए महत्वपूर्ण वैज्ञानिकों का मानना है कि भारत के विभिन्न समुदायों के माइक्रोबायोम को समझना भविष्य में पोषण, प्रोबायोटिक्स और व्यक्तिगत स्वास्थ्य देखभाल से जुड़े शोध के लिए उपयोगी हो सकता है। हालांकि, नई बैक्टीरिया प्रजातियों की खोज का मतलब यह नहीं है कि वे सभी सीधे तौर पर स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हैं। उनके स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों को समझने के लिए आगे विस्तृत प्रयोगशाला और चिकित्सकीय शोध की जरूरत होगी। भारत सरकार की Indian Human Microbiome Initiative भी विभिन्न भारतीय समुदायों के माइक्रोबायोम का डेटाबेस तैयार करने की दिशा में काम कर रही है।
नई दिल्ली: क्या कोई व्यक्ति बाहर से बिल्कुल पतला और सामान्य दिखने के बावजूद मोटापे से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं के जोखिम में हो सकता है? जवाब है—हां। शरीर का वजन या बाहर दिखाई देने वाली चर्बी हमेशा पूरी तस्वीर नहीं बताती। कुछ लोगों में पेट के अंदर महत्वपूर्ण अंगों के आसपास अतिरिक्त चर्बी जमा हो सकती है, जिसे विसरल फैट कहा जाता है। यह चर्बी त्वचा के ठीक नीचे जमा होने वाली सामान्य चर्बी से अलग होती है। अधिक मात्रा में विसरल फैट शरीर के मेटाबॉलिज्म, इंसुलिन संवेदनशीलता और सूजन से जुड़े बदलावों के साथ जुड़ा हुआ है। यही वजह है कि सामान्य BMI वाले व्यक्ति में भी कमर के आसपास अधिक फैट होने पर स्वास्थ्य जोखिमों का आकलन करना जरूरी हो सकता है। क्या होता है विसरल फैट? शरीर में मौजूद फैट को मोटे तौर पर सबक्यूटेनियस और विसरल फैट में समझा जा सकता है। सबक्यूटेनियस फैट त्वचा के नीचे होती है, इसलिए यह पेट, कमर, हाथ या जांघों पर दिखाई दे सकती है। इसके विपरीत, विसरल फैट पेट की गुहा के अंदर लिवर, आंत और अन्य महत्वपूर्ण अंगों के आसपास जमा होती है। यह बाहर से आसानी से नजर नहीं आती। इसी कारण किसी व्यक्ति का शरीर पतला दिखने के बावजूद उसके शरीर में अंदरूनी फैट अधिक हो सकता है। पतले लोगों में भी क्यों जमा हो सकता है अंदरूनी फैट? विसरल फैट बढ़ने का कारण केवल ज्यादा खाना या अधिक वजन होना नहीं है। इसकी मात्रा पर कई चीजों का प्रभाव पड़ सकता है, जिनमें शामिल हैं: लंबे समय तक शारीरिक गतिविधि की कमी कैलोरी और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का अधिक सेवन अधिक चीनी और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट लगातार तनाव खराब या अपर्याप्त नींद बढ़ती उम्र हार्मोनल बदलाव आनुवंशिक कारण इसलिए केवल वजन देखकर यह तय करना सही नहीं है कि कोई व्यक्ति मेटाबॉलिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ है। ज्यादा विसरल फैट से किन बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है? 1. टाइप-2 डायबिटीज अधिक विसरल फैट इंसुलिन रेजिस्टेंस से जुड़ा हो सकता है। जब शरीर इंसुलिन का प्रभाव ठीक से इस्तेमाल नहीं कर पाता, तो ब्लड शुगर बढ़ने लगता है। लंबे समय में इससे टाइप-2 डायबिटीज का खतरा बढ़ सकता है। 2. हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोग अधिक अंदरूनी फैट शरीर में मेटाबॉलिक बदलाव और सूजन से जुड़ा हो सकता है। इससे हाई ब्लड प्रेशर, खराब कोलेस्ट्रॉल और हृदय संबंधी बीमारियों के जोखिम पर असर पड़ सकता है। इसलिए पतला दिखने वाले व्यक्ति को भी अगर पेट के आसपास अतिरिक्त चर्बी है, तो ब्लड प्रेशर और अन्य मेटाबॉलिक स्वास्थ्य संकेतकों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। 3. फैटी लिवर अधिक विसरल फैट का संबंध मेटाबॉलिक डिसफंक्शन और फैटी लिवर से भी हो सकता है। कुछ लोगों में लिवर में अतिरिक्त फैट जमा होने से सूजन और आगे चलकर लिवर को नुकसान पहुंचने का जोखिम बढ़ सकता है। 4. स्लीप एपनिया पेट और शरीर के आसपास अधिक फैट, खासकर मोटापे की स्थिति में, ऑब्स्ट्रक्टिव स्लीप एपनिया के जोखिम से जुड़ा हो सकता है। इसमें सोते समय सांस बार-बार रुक सकती है, जिससे दिन में थकान, नींद और ध्यान लगाने में परेशानी हो सकती है। 5. कुछ कैंसर का बढ़ा हुआ जोखिम मोटापा और अधिक शरीर में फैट कुछ प्रकार के कैंसर के जोखिम से जुड़े पाए गए हैं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि विसरल फैट वाले हर व्यक्ति को कैंसर होगा। यह केवल कई संभावित जोखिम कारकों में से एक हो सकता है। विसरल फैट कम कैसे करें? विसरल फैट को कम करने के लिए किसी एक खास डाइट या घरेलू नुस्खे पर निर्भर रहने के बजाय लंबे समय तक टिकने वाली स्वस्थ जीवनशैली अपनाना अधिक महत्वपूर्ण है। संतुलित डाइट अपनाएं सब्जियां, फल, साबुत अनाज, दालें, बीन्स और पर्याप्त प्रोटीन को भोजन में शामिल करें। अत्यधिक कैलोरी, मीठे पेय और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का सेवन कम करें। वजन कम करने की जरूरत होने पर बहुत कम कैलोरी वाली क्रैश डाइट अपनाने के बजाय डॉक्टर या योग्य डाइटिशियन की सलाह लेना बेहतर है। नियमित एक्सरसाइज करें तेज चलना, साइकिल चलाना, तैरना, जॉगिंग या अन्य एरोबिक गतिविधियां शरीर की अतिरिक्त चर्बी कम करने में मदद कर सकती हैं। आमतौर पर वयस्कों के लिए सप्ताह में कम से कम 150 मिनट की मध्यम तीव्रता वाली शारीरिक गतिविधि की सलाह दी जाती है। अपनी उम्र और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार व्यायाम का स्तर तय करें। स्ट्रेंथ ट्रेनिंग को भी जगह दें सिर्फ कार्डियो ही पर्याप्त नहीं है। सप्ताह में कम से कम दो दिन मांसपेशियों को मजबूत करने वाली एक्सरसाइज करना भी फायदेमंद हो सकता है। इसमें वेट ट्रेनिंग, रेजिस्टेंस बैंड या बॉडी-वेट एक्सरसाइज शामिल हो सकती हैं। प्रोटीन और फाइबर का सेवन बढ़ाएं दाल, चना, बीन्स, अंडा, मछली, चिकन, सोया और अन्य पौष्टिक प्रोटीन स्रोत भोजन का हिस्सा बनाए जा सकते हैं। वहीं, सब्जियां, फल, साबुत अनाज और दालों से मिलने वाला फाइबर पेट भरा रखने और संतुलित खानपान बनाए रखने में मदद कर सकता है। चीनी और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड कम करें मीठे पेय, अत्यधिक मिठाइयां, पैकेज्ड स्नैक्स, चिप्स, बिस्कुट और फास्ट फूड का नियमित सेवन कम करना वजन और मेटाबॉलिक स्वास्थ्य के लिए बेहतर विकल्प है। नींद और तनाव पर ध्यान दें लगातार कम नींद और लंबे समय तक तनाव स्वस्थ वजन बनाए रखने में बाधा डाल सकते हैं। नियमित नींद का समय तय करें और तनाव कम करने के लिए योग, मेडिटेशन, गहरी सांस लेने की एक्सरसाइज या अन्य स्वस्थ गतिविधियों को दिनचर्या में शामिल करें। सिर्फ पतला दिखना ही पर्याप्त नहीं स्वास्थ्य का आकलन केवल वजन या शरीर के आकार से नहीं किया जा सकता। कमर की परिधि, ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर, कोलेस्ट्रॉल, शारीरिक सक्रियता और पारिवारिक इतिहास जैसे कारक भी महत्वपूर्ण हैं। अगर आपका वजन सामान्य है लेकिन पेट के आसपास चर्बी अधिक है, ब्लड प्रेशर या ब्लड शुगर बढ़ा हुआ है, या परिवार में डायबिटीज और हृदय रोग का इतिहास है, तो नियमित स्वास्थ्य जांच कराना समझदारी है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। राजधानी दिल्ली में इबोला संक्रमण के संदिग्ध मामले को लेकर स्वास्थ्य अधिकारियों की सतर्कता बढ़ गई है। डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) में संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन से लौटे 52 वर्षीय BSF कांस्टेबल को बुखार आने के बाद डॉ. राम मनोहर लोहिया (RML) अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड में भर्ती कराया गया है। डॉक्टरों ने एहतियात के तौर पर उसका सैंपल इबोला की जांच के लिए भेजा है। फिलहाल संक्रमण की पुष्टि नहीं हुई है। क्वारंटीन के दौरान आया बुखार रिपोर्ट के अनुसार, BSF जवान कांगो में संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशन से लौटने के बाद अनिवार्य क्वारंटीन में था। इसी दौरान उसे बुखार आया, जिसके बाद इबोला निगरानी प्रोटोकॉल सक्रिय किए गए। स्वास्थ्य अधिकारियों ने किसी भी संभावित जोखिम को देखते हुए उसे अलग रखा है और उसकी चिकित्सकीय निगरानी की जा रही है। सैंपल जांच के बाद स्थिति होगी साफ जवान के नमूने प्रयोगशाला जांच के लिए भेजे गए हैं। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि बुखार का कारण इबोला वायरस है या कोई अन्य संक्रमण। अधिकारियों ने फिलहाल इसे संदिग्ध मामला माना है और संक्रमण की पुष्टि नहीं की है। कांगो में इबोला प्रकोप के कारण बढ़ी सतर्कता डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में इबोला के प्रकोप को देखते हुए भारत पहले से ही निगरानी और स्क्रीनिंग बढ़ा चुका है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 23 मई से इबोला प्रभावित देशों से भारत पहुंचे करीब 10,974 अंतरराष्ट्रीय यात्रियों की स्क्रीनिंग की जा चुकी है और अब तक भारत में इबोला का कोई मामला सामने नहीं आया है। स्वास्थ्य विभाग की स्थिति पर लगातार नजर दिल्ली में सामने आए संदिग्ध मामले के बाद स्वास्थ्य अधिकारी स्थिति पर लगातार नजर रख रहे हैं। जवान की जांच रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है। अधिकारियों का जोर संभावित संक्रमण की समय रहते पहचान करने और जरूरत पड़ने पर तत्काल स्वास्थ्य सुरक्षा उपाय लागू करने पर है।