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Alcohol Can Damage Your Digestive System

Alcohol Side Effects: मुंह से आंत तक शरीर के इन अंगों को नुकसान पहुंचा सकती है शराब, जानें कैसे बिगड़ती है सेहत

surbhi अगस्त 1, 2026 0
Alcohol can damage the digestive system from the mouth and throat to the stomach, intestines, pancreas and colon
Alcohol Side Effects on Digestive Health

अक्सर शराब के नुकसान की बात होती है तो सबसे पहले लिवर का नाम सामने आता है। लेकिन शराब का असर सिर्फ लिवर तक सीमित नहीं रहता। शराब पीने के बाद इसका संपर्क मुंह, गले और खाने की नली से होता है, जबकि इसके घटक और शरीर में बनने वाले विषैले पदार्थ पाचन तंत्र के दूसरे हिस्सों को भी प्रभावित कर सकते हैं।

National Institute on Alcohol Abuse and Alcoholism (NIAAA) के अनुसार, शराब का अत्यधिक या लंबे समय तक सेवन शरीर के कई अंगों और सिस्टम को प्रभावित कर सकता है। इसका संबंध गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सूजन और ब्लीडिंग, पैंक्रियाटाइटिस तथा कई तरह के कैंसर के बढ़े हुए जोखिम से भी है।

आइए समझते हैं कि शराब शरीर के पाचन तंत्र में किस तरह नुकसान पहुंचा सकती है।

मुंह और गले से शुरू हो सकता है नुकसान

शराब का संपर्क सबसे पहले मुंह और गले की अंदरूनी सतह से होता है। लंबे समय तक शराब का सेवन मुंह और गले की सेहत पर प्रतिकूल असर डाल सकता है।

National Cancer Institute के अनुसार शराब का सेवन मुंह, गले और स्वरयंत्र समेत कई हिस्सों के कैंसर के बढ़े हुए जोखिम से जुड़ा है। शराब की मात्रा बढ़ने के साथ कुछ कैंसर का जोखिम भी बढ़ता है।

शराब के साथ तंबाकू का सेवन स्थिति को और गंभीर बना सकता है। NCI के मुताबिक शराब और तंबाकू दोनों का इस्तेमाल करने वालों में मुंह, गले, स्वरयंत्र और एसोफैगस के कैंसर का जोखिम अकेले शराब या तंबाकू की तुलना में काफी अधिक हो सकता है।

खाने की नली पर भी पड़ सकता है असर

मुंह से शराब खाने की नली यानी एसोफैगस के रास्ते पेट तक पहुंचती है। शराब का सेवन गैस्ट्रोएसोफेजियल रिफ्लक्स डिजीज यानी GERD के बढ़े हुए जोखिम से जुड़ा है। इससे सीने में जलन और एसिड रिफ्लक्स जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

इससे भी गंभीर चिंता कैंसर के जोखिम को लेकर है। NCI के अनुसार शराब एसोफैगस कैंसर के जोखिम को बढ़ाने वाले ज्ञात कारकों में शामिल है। शराब की मात्रा बढ़ने पर जोखिम भी बढ़ सकता है।

पेट में बढ़ सकती है जलन और सूजन

शराब पेट और पूरे GI tract की अंदरूनी परत को नुकसान पहुंचा सकती है। NIAAA के अनुसार शराब पाचन तंत्र की epithelial lining को नुकसान पहुंचाने, सूजन बढ़ाने और GI bleeding से जुड़ी समस्याओं का कारण बन सकती है।

इसी वजह से कुछ लोगों में पेट की जलन, दर्द, उल्टी या पाचन संबंधी परेशानी देखने को मिल सकती है। शराब का सेवन GERD के जोखिम से भी जुड़ा है।

छोटी आंत और गट हेल्थ पर असर

शराब का असर छोटी आंत और आंतों की अंदरूनी सुरक्षा व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। NIAAA के अनुसार शराब intestinal barrier को प्रभावित कर सकती है और आंतों में मौजूद माइक्रोबायोटा की संरचना में बदलाव से जुड़ी है। इसे आम भाषा में गट हेल्थ बिगड़ना कहा जा सकता है।

लंबे समय तक अत्यधिक शराब का सेवन पाचन तंत्र में सूजन और पोषक तत्वों के इस्तेमाल से जुड़ी परेशानियों को बढ़ा सकता है। ऐसे में व्यक्ति के पोषण और सामान्य स्वास्थ्य पर भी असर पड़ सकता है।

पैंक्रियाज के लिए भी खतरनाक हो सकती है शराब

पैंक्रियाज पाचन एंजाइम और ब्लड शुगर को नियंत्रित करने वाले हार्मोन से जुड़ा महत्वपूर्ण अंग है। लंबे समय तक शराब का अत्यधिक सेवन पैंक्रियाटाइटिस यानी पैंक्रियाज में सूजन का कारण बन सकता है।

एक्यूट पैंक्रियाटाइटिस अचानक शुरू हो सकता है, जबकि बार-बार होने वाली सूजन क्रोनिक पैंक्रियाटाइटिस में बदल सकती है। क्रोनिक पैंक्रियाटाइटिस से पाचन और ब्लड शुगर नियंत्रण जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

बड़ी आंत और कोलोरेक्टल कैंसर का जोखिम

शराब का संबंध कोलोरेक्टल यानी बड़ी आंत और मलाशय के कैंसर के बढ़े हुए जोखिम से भी पाया गया है। NCI के अनुसार मध्यम से अधिक मात्रा में शराब पीने वालों में कोलोरेक्टल कैंसर का जोखिम शराब न पीने वालों की तुलना में बढ़ सकता है।

यानी शराब का असर सिर्फ पेट या लिवर तक सीमित समझना सही नहीं है। इसके प्रभाव पाचन तंत्र के कई हिस्सों तक पहुंच सकते हैं।

शराब शरीर को नुकसान कैसे पहुंचाती है?

शराब शरीर में पहुंचने के बाद कई रासायनिक प्रक्रियाओं से गुजरती है। NIAAA के अनुसार शराब के metabolism के दौरान acetaldehyde नाम का एक विषैला और carcinogenic पदार्थ बनता है। यह DNA और कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है।

यही कारण है कि शराब से जुड़े स्वास्थ्य जोखिम को केवल नशे या लिवर की समस्या तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए।

इन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें

अगर शराब का सेवन करने वाले व्यक्ति को लगातार इनमें से कोई समस्या हो रही है, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है:

  • लगातार पेट दर्द या जलन
  • बार-बार सीने में जलन या एसिड रिफ्लक्स
  • लगातार उल्टी
  • उल्टी या मल में खून
  • काला मल
  • बिना वजह वजन कम होना
  • लगातार कमजोरी या थकान
  • लंबे समय से दस्त या कब्ज
  • बार-बार पाचन संबंधी परेशानी

खास तौर पर खून की उल्टी, काला मल, तेज पेट दर्द या अचानक गंभीर कमजोरी जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और तत्काल चिकित्सकीय मदद लेनी चाहिए।

शराब छोड़ने से क्या फायदा हो सकता है?

शराब का सेवन बंद करना स्वास्थ्य जोखिम कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। NCI के अनुसार शराब छोड़ने के बाद समय के साथ मुंह और एसोफैगस के कैंसर का जोखिम कम हो सकता है, हालांकि जोखिम को कभी-कभी सामान्य स्तर तक आने में वर्षों लग सकते हैं।

अगर कोई व्यक्ति लंबे समय से नियमित या ज्यादा मात्रा में शराब पी रहा है, तो अचानक बंद करने से पहले डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है, क्योंकि कुछ लोगों में withdrawal गंभीर हो सकता है।

 

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यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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बार-बार सिरदर्द, याददाश्त कमजोर या चलने में लड़खड़ाहट? दिमाग के ये संकेत न करें नजरअंदाज, हो सकती है न्यूरोलॉजिकल बीमारी

दिमाग हमारे पूरे शरीर का कंट्रोल सेंटर है। खाना खाने, चलने, बोलने, देखने, सोचने और रोजमर्रा के सामान्य काम करने से लेकर भावनाओं और व्यवहार तक, शरीर की तमाम गतिविधियां मस्तिष्क से जुड़ी होती हैं। यही वजह है कि दिमाग से संबंधित किसी भी असामान्य बदलाव को हल्के में लेना नुकसानदायक हो सकता है। कई न्यूरोलॉजिकल बीमारियां शुरुआत में बेहद सामान्य नजर आने वाले लक्षणों के साथ सामने आती हैं। बार-बार सिरदर्द होना, हाल की बातें भूल जाना, ध्यान केंद्रित करने में परेशानी, अचानक व्यवहार बदलना या चलते समय शरीर का संतुलन बिगड़ना ऐसे संकेत हो सकते हैं, जिन्हें लोग अक्सर थकान, तनाव या बढ़ती उम्र से जोड़कर नजरअंदाज कर देते हैं। हालांकि, हर सिरदर्द या भूलने की समस्या गंभीर बीमारी का संकेत नहीं होती, लेकिन जब ये परेशानियां बार-बार होने लगें, अचानक शुरू हों या इनके साथ दूसरे न्यूरोलॉजिकल लक्षण भी दिखाई दें, तो चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी हो जाता है। बार-बार सिरदर्द हो तो कब रहें सतर्क? कभी-कभार सिरदर्द होना सामान्य हो सकता है, लेकिन बार-बार होने वाला या अचानक बहुत तेज सिरदर्द ध्यान देने की मांग करता है। खासकर अगर सिरदर्द के साथ उल्टी, कमजोरी या देखने में परेशानी भी होने लगे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इन संकेतों पर विशेष ध्यान दें: अचानक बहुत तेज सिरदर्द शुरू होना सुबह उठते ही सिरदर्द होना सिरदर्द के साथ उल्टी होना धुंधला दिखाई देना शरीर में कमजोरी महसूस होना ऐसे लक्षण कुछ मामलों में स्ट्रोक, ब्रेन ट्यूमर, इंफेक्शन या अन्य न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से जुड़े हो सकते हैं। इसलिए लगातार या असामान्य सिरदर्द होने पर डॉक्टर से जांच कराना बेहतर है। पढ़ी हुई बातें बार-बार भूल रहे हैं? भूलने की समस्या को हमेशा सामान्य मानकर टालना सही नहीं है। सामान रखकर भूल जाना या कभी-कभार किसी का नाम याद न आना सामान्य हो सकता है, लेकिन अगर हाल की घटनाएं याद रखने, जरूरी काम याद रखने या रोजमर्रा की गतिविधियों पर ध्यान देने में लगातार परेशानी होने लगे, तो इस पर ध्यान देना चाहिए। याददाश्त से जुड़े कुछ संकेत हैं: लोगों के नाम बार-बार भूलना परिचित रास्ते भूल जाना हाल की घटनाओं को याद न रख पाना जरूरी काम भूल जाना किसी बात को समझने में परेशानी होना काम पर ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई लगातार ऐसी समस्याएं डिमेंशिया, अल्जाइमर या अन्य मस्तिष्क संबंधी परेशानियों के शुरुआती संकेतों से जुड़ी हो सकती हैं। हालांकि, सही कारण जानने के लिए चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी है। अचानक बदलने लगा है स्वभाव? दिमाग से जुड़ी परेशानी का असर केवल याददाश्त या सिरदर्द के रूप में ही नहीं दिखता। कई बार व्यक्ति के व्यवहार और मूड में अचानक बदलाव भी दिखाई दे सकता है। अगर कोई व्यक्ति पहले की तुलना में अचानक ज्यादा चिड़चिड़ा रहने लगे, बिना वजह गुस्सा करे, लगातार उदास रहे या निर्णय लेने और ध्यान केंद्रित करने में परेशानी महसूस करे, तो इसे भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ध्यान देने वाले बदलाव: अचानक चिड़चिड़ापन बढ़ना बिना स्पष्ट कारण गुस्सा आना लगातार उदास रहना किसी काम में रुचि न रहना निर्णय लेने में परेशानी ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई ऐसे बदलाव कई कारणों से हो सकते हैं, लेकिन कुछ मामलों में ये न्यूरोलॉजिकल समस्याओं के साथ भी जुड़े हो सकते हैं। बोलने, देखने या चलने में परेशानी को न करें नजरअंदाज न्यूरोलॉजिकल बीमारी के कुछ संकेत शरीर की सामान्य गतिविधियों में सीधे दिखाई दे सकते हैं। अचानक बोलने में दिक्कत होना, देखने में बदलाव आना या चलते समय शरीर का संतुलन बिगड़ना खास तौर पर महत्वपूर्ण संकेत हैं। इन लक्षणों पर नजर रखें: चलते समय शरीर का संतुलन बिगड़ना बोलने में परेशानी होना अचानक देखने में दिक्कत होना डबल विजन या धुंधला दिखाई देना ऐसे लक्षण स्ट्रोक, मल्टीपल स्क्लेरोसिस, ब्रेन ट्यूमर या अन्य न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से जुड़े हो सकते हैं। खासकर यदि ये लक्षण अचानक शुरू हुए हों, तो तत्काल चिकित्सकीय सहायता लेना जरूरी है। इन लक्षणों पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें अगर इनमें से कोई गंभीर लक्षण अचानक दिखाई देता है, तो इसे सामान्य परेशानी समझकर इंतजार नहीं करना चाहिए: बोलने या समझने में परेशानी अचानक बहुत तेज सिरदर्द बेहोशी या दौरा पड़ना शरीर में अचानक कमजोरी शरीर का कोई हिस्सा सुन्न पड़ना अचानक दिखाई देने में परेशानी शरीर का संतुलन बिगड़ना भ्रम की स्थिति व्यवहार में अचानक बदलाव असामान्य या अत्यधिक नींद आना हर लक्षण का मतलब गंभीर बीमारी नहीं सिरदर्द, भूलने की समस्या, मूड में बदलाव या चक्कर जैसी परेशानियां कई अलग-अलग कारणों से हो सकती हैं। इसलिए केवल इन लक्षणों के आधार पर किसी बीमारी का निष्कर्ष निकालना सही नहीं है। लेकिन अगर कोई लक्षण बार-बार हो रहा है, अचानक शुरू हुआ है, लगातार बढ़ रहा है या उसके साथ बोलने, देखने, चलने, समझने अथवा शरीर में कमजोरी जैसे दूसरे संकेत भी मौजूद हैं, तो डॉक्टर से समय पर सलाह लेना बेहद जरूरी है। दिमाग से जुड़े मामलों में समय पर पहचान और उचित चिकित्सकीय जांच महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। किसी भी गंभीर या अचानक लक्षण की स्थिति में खुद से इलाज करने के बजाय योग्य डॉक्टर से संपर्क करें।  

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FSSAI के निर्देश के बाद एनर्जी ड्रिंक की पैकेजिंग और लेबलिंग में बदलाव
FSSAI का बड़ा फैसला, Sting समेत कई ब्रांड 90 दिनों में हटाएंगे 'Energy Drink' लेबल

खाद्य नियामक की सख्ती, कंपनियों को पैकेजिंग बदलने का निर्देश   नई दिल्ली, एजेंसियां। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने हाई-कैफीन पेय बनाने वाली कंपनियों को बड़ा निर्देश जारी किया है। नियामक ने Sting, Red Bull, Monster, Campa Energy, Hell Energy समेत कई ब्रांडों को अपने उत्पादों से 'Energy Drink' शब्द हटाने के लिए 90 दिनों का समय दिया है। FSSAI का कहना है कि भारत में 'Energy Drink' श्रेणी के लिए कोई अलग आधिकारिक मानक मौजूद नहीं है, इसलिए इस तरह की लेबलिंग भ्रामक मानी जाएगी।   इन कंपनियों पर पड़ेगा असर   इस फैसले का असर PepsiCo (Sting, Adrenaline Rush), Red Bull, Monster Beverage, Reliance Consumer Products (Campa Energy) और Hell Energy जैसे बड़े ब्रांडों पर पड़ेगा। कंपनियों को पैकेजिंग और लेबलिंग में बदलाव कर निर्धारित समय सीमा के भीतर नए नियमों का पालन करना होगा।   FSSAI ने क्यों उठाया कदम?   FSSAI का कहना है कि "Energy Drink" नाम और "शरीर व दिमाग को ऊर्जा देता है" जैसे दावे उपभोक्ताओं को गुमराह कर सकते हैं, क्योंकि इनके समर्थन में कोई स्वीकृत भारतीय मानक नहीं है। नियामक ने स्पष्ट किया कि कंपनियां चाहें तो इस फैसले को अदालत में चुनौती दे सकती हैं, लेकिन फिलहाल 90 दिनों के भीतर नियमों का पालन करना होगा।   बाजार और सप्लाई चेन पर असर   नए आदेश के बाद कई वितरकों ने पुराने लेबल वाले उत्पादों का स्टॉक लेने में सतर्कता बरतनी शुरू कर दी है। इससे कुछ क्षेत्रों में Sting, Red Bull और अन्य लोकप्रिय पेयों की आपूर्ति प्रभावित होने लगी है। उद्योग जगत का कहना है कि पैकेजिंग बदलने और नए लेबल तैयार करने में समय और अतिरिक्त लागत लगेगी।  

ranjan kumar tiwari जुलाई 30, 2026 0
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कमजोर इम्यूनिटी और ऑटोइम्यून बीमारी एक नहीं, जानिए दोनों में क्या है बड़ा अंतर

नई दिल्ली: बार-बार बीमार पड़ना, लगातार थकान रहना या शरीर में किसी तरह की परेशानी होना—इन स्थितियों में अक्सर लोग इसे सीधे ‘कमजोर इम्यूनिटी’ से जोड़ देते हैं। लेकिन हर बार ऐसा होना जरूरी नहीं है। कई बार समस्या कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली की होती है, जबकि कुछ मामलों में इम्यून सिस्टम जरूरत से ज्यादा सक्रिय होकर शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं और ऊतकों पर ही हमला करने लगता है। इसे ऑटोइम्यून बीमारी कहा जाता है। दोनों स्थितियां इम्यून सिस्टम से जुड़ी हैं, लेकिन इनके कारण, शरीर पर असर और उपचार का तरीका अलग होता है। पहले समझें, इम्यून सिस्टम कैसे काम करता है? इम्यून सिस्टम शरीर की प्राकृतिक सुरक्षा व्यवस्था है। यह वायरस, बैक्टीरिया, फंगस और दूसरे हानिकारक सूक्ष्मजीवों को पहचानने और उनसे बचाव करने में मदद करता है। श्वेत रक्त कोशिकाएं, एंटीबॉडी, लिम्फ नोड्स, बोन मैरो और प्लीहा इस सिस्टम के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। यही प्रतिरक्षा प्रणाली संक्रमण से लड़ने के साथ वैक्सीनेशन के बाद सुरक्षा विकसित करने और शरीर में असामान्य कोशिकाओं की पहचान करने में भी भूमिका निभाती है। कमजोर इम्यूनिटी क्या होती है? जब शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली संक्रमण से प्रभावी तरीके से लड़ नहीं पाती, तो इसे कमजोर इम्यूनिटी या इम्यूनोडेफिशिएंसी कहा जा सकता है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, जैसे पोषण की कमी, कुछ विटामिन और मिनरल्स की कमी, HIV संक्रमण, कुछ कैंसर उपचार, लंबे समय तक कुछ स्टेरॉयड या इम्यूनोसप्रेसेंट दवाओं का इस्तेमाल, जन्मजात प्रतिरक्षा संबंधी विकार और अनियंत्रित डायबिटीज। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को बार-बार संक्रमण हो सकता है या सामान्य संक्रमण भी अधिक गंभीर रूप ले सकते हैं। ऑटोइम्यून बीमारी क्या होती है? ऑटोइम्यून बीमारी में स्थिति इसके बिल्कुल उलट होती है। यहां इम्यून सिस्टम कमजोर नहीं पड़ता, बल्कि वह शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं, ऊतकों या अंगों को गलती से बाहरी खतरा समझकर उन पर हमला करने लगता है। रुमेटाइड अर्थराइटिस, ल्यूपस, हाशिमोटो थायरॉइडाइटिस, टाइप-1 डायबिटीज, मल्टीपल स्केलेरोसिस और सीलिएक डिजीज इसके कुछ उदाहरण हैं। इन बीमारियों का सटीक कारण हर मामले में स्पष्ट नहीं होता। आनुवंशिक प्रवृत्ति, हार्मोनल बदलाव और पर्यावरण से जुड़े कारक भूमिका निभा सकते हैं। दोनों में सबसे बड़ा अंतर क्या है? पहलू कमजोर इम्यूनिटी ऑटोइम्यून बीमारी इम्यून सिस्टम पर्याप्त प्रभावी तरीके से काम नहीं करता गलती से अपने शरीर पर हमला करता है मुख्य समस्या बार-बार या गंभीर संक्रमण सूजन और शरीर के ऊतकों/अंगों को नुकसान संभावित कारण संक्रमण, पोषण की कमी, दवाएं, आनुवंशिक कारण आदि आनुवंशिक, हार्मोनल और पर्यावरणीय कारक उदाहरण कुछ इम्यूनोडेफिशिएंसी, HIV आदि ल्यूपस, रुमेटाइड अर्थराइटिस, टाइप-1 डायबिटीज आदि उपचार मूल कारण के आधार पर असामान्य इम्यून प्रतिक्रिया को नियंत्रित करने पर केंद्रित कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए? बार-बार संक्रमण होना, लंबे समय तक असामान्य थकान, जोड़ों में लगातार दर्द, त्वचा पर बार-बार चकत्ते या अन्य लगातार बने रहने वाले असामान्य लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। हालांकि, केवल इन लक्षणों के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि किसी व्यक्ति की इम्यूनिटी कमजोर है या उसे ऑटोइम्यून बीमारी है। इसके लिए डॉक्टर की जांच और जरूरत के अनुसार टेस्ट जरूरी हो सकते हैं।  

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