हाइपोथायरायडिज्म में आमतौर पर लेवोथायरोक्सिन दी जाती है। इसे नियमित समय पर खाली पेट, नाश्ते से करीब 30 से 60 मिनट पहले लेने की सलाह दी जाती है। भोजन के साथ लेने पर दवा का अवशोषण प्रभावित हो सकता है।
दवा लेने के बाद तुरंत इन चीजों का सेवन करने से बचने की सलाह दी जाती है:
विशेष रूप से कैल्शियम और आयरन सप्लीमेंट को लेवोथायरोक्सिन से अलग समय पर लेने की जरूरत पड़ सकती है। कई स्रोत इन्हें लगभग चार घंटे के अंतर से लेने की सलाह देते हैं, लेकिन व्यक्तिगत स्थिति के अनुसार डॉक्टर की सलाह सर्वोपरि है।
आमतौर पर दवा लेने के बाद कम से कम 30 मिनट और बेहतर अवशोषण के लिए करीब 60 मिनट बाद नाश्ता करने की सलाह दी जाती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रोजाना दवा लेने का तरीका और समय एक जैसा रखा जाए।
नहीं। थायरॉइड की दवा लेने वाले व्यक्ति को सामान्य रूप से ब्रेड खाने से परहेज करने की जरूरत नहीं होती। समस्या तब हो सकती है जब हाई-फाइबर ब्रेड या कैल्शियम वाले डेयरी उत्पाद दवा लेने के तुरंत बाद लिए जाएं।
दवा लेने के उचित अंतराल के बाद संतुलित नाश्ते में उबले अंडे या ऑमलेट, बेसन का चीला, ओट्स या दलिया, फल और सूखे मेवे जैसे विकल्प शामिल किए जा सकते हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
भारतीय रसोई में तिल यानी Sesame Seeds का इस्तेमाल सदियों से होता आया है। तिल के लड्डू, चिक्की, चटनी से लेकर रोटी और सब्जियों तक, इसका स्वाद और पोषण दोनों खास हैं। ये छोटे बीज प्रोटीन, फाइबर, हेल्दी फैट, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, जिंक और विटामिन ई जैसे पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। हालांकि, तिल को किसी बीमारी का इलाज समझने के बजाय संतुलित आहार का हिस्सा मानना चाहिए। तिल खाने के 7 बड़े फायदे 1. सूजन कम करने में मदद तिल में सेसमिन जैसे पौधों से मिलने वाले एंटीऑक्सीडेंट यौगिक पाए जाते हैं। ये शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन से निपटने में मदद कर सकते हैं। हालांकि, सिर्फ तिल खाने से गठिया या जोड़ों की समस्या का इलाज नहीं होता। 2. हड्डियों के लिए फायदेमंद तिल में कैल्शियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस और जिंक जैसे मिनरल होते हैं, जो हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। खासकर उम्र बढ़ने के साथ संतुलित डाइट में तिल को शामिल करना उपयोगी हो सकता है। 3. दिल की सेहत को सपोर्ट तिल में मौजूद अनसैचुरेटेड फैट और अन्य पोषक तत्व हृदय स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकते हैं। कुछ शोधों में तिल के सेवन के साथ LDL कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड में कमी देखी गई है, हालांकि इसके लिए और व्यापक शोध की जरूरत है। 4. ब्लड शुगर मैनेजमेंट में मदद तिल में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है और इनमें फैट, प्रोटीन और फाइबर का संयोजन होता है। यह भोजन के बाद ब्लड शुगर बढ़ने की गति को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, डायबिटीज में तिल दवा या उपचार का विकल्प नहीं है। 5. पाचन के लिए अच्छा तिल में मौजूद फाइबर पाचन और नियमित मल त्याग को सपोर्ट कर सकता है। तिल को पीसकर या ताहिनी के रूप में खाने से पोषक तत्वों का उपयोग पूरे बीज की तुलना में बेहतर हो सकता है, क्योंकि साबुत बीज का कुछ हिस्सा बिना पचे शरीर से बाहर निकल सकता है। 6. प्रोटीन और हेल्दी फैट का स्रोत तिल पौधों से मिलने वाले प्रोटीन और असंतृप्त वसा का अच्छा स्रोत है। सीमित मात्रा में इन्हें रोजाना के भोजन में शामिल करने से डाइट की पोषण गुणवत्ता बढ़ाई जा सकती है। 7. एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर तिल में सेसमिन और अन्य लिग्नान पाए जाते हैं, जिनमें एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं। ये शरीर की कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव तनाव से बचाने में भूमिका निभा सकते हैं। रोज कितना तिल खाना ठीक है? विशेषज्ञों के अनुसार सामान्य तौर पर 1 से 2 चम्मच या लगभग 1-2 टेबलस्पून तिल संतुलित डाइट का हिस्सा बनाए जा सकते हैं। इन्हें हल्का भूनकर दाल, चटनी, रोटी, सलाद या चिक्की में शामिल किया जा सकता है। बहुत ज्यादा तिल खाना जरूरी नहीं है, क्योंकि इनमें कैलोरी और ओमेगा-6 फैट भी पर्याप्त मात्रा में होता है। काला या सफेद तिल, कौन बेहतर? काले और सफेद दोनों तिल पौष्टिक हैं। काले तिल में बाहरी छिलका मौजूद रहता है, इसलिए इनमें कुछ एंटीऑक्सीडेंट, लिग्नान, आयरन और जिंक अधिक हो सकते हैं। वहीं सफेद तिल का स्वाद अपेक्षाकृत हल्का और बनावट ज्यादा क्रीमी होती है। कौन सा तिल बेहतर है, यह मुख्य रूप से आपकी पसंद और इस्तेमाल के तरीके पर निर्भर करता है। तिल का तेल कितना फायदेमंद? तिल का तेल मुख्य रूप से वसा का स्रोत है और इसमें काफी मात्रा में असंतृप्त वसा होती है। लेकिन पूरे तिल और तिल के तेल की पोषण संरचना समान नहीं होती। पूरे तिल से प्रोटीन, फाइबर और मिनरल भी मिलते हैं। इसलिए सिर्फ तिल के तेल पर निर्भर रहने के बजाय डाइट में सीमित मात्रा में पूरे तिल भी शामिल करना बेहतर विकल्प हो सकता है। किन लोगों को सावधानी बरतनी चाहिए? जिन लोगों को तिल से एलर्जी है, उन्हें इसका सेवन पूरी तरह से बचना चाहिए। किडनी स्टोन की समस्या वाले लोगों को ज्यादा तिल लेने से पहले डॉक्टर या डाइटिशियन से सलाह लेनी चाहिए। डायबिटीज की दवा लेने वाले लोग तिल का बहुत ज्यादा सेवन एक साथ न करें और अपनी डाइट नियमित रखें।
नई दिल्ली, एजेंसियां। आज के डिजिटल दौर में मोबाइल, लैपटॉप और कंप्यूटर का इस्तेमाल रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गया है। लंबे समय तक लगातार स्क्रीन देखने से कुछ लोगों को सिरदर्द, आंखों में थकान और गर्दन-कंधों में दर्द जैसी परेशानियां हो सकती हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, इसके लिए केवल स्क्रीन ही नहीं, बल्कि खराब पोस्चर, कम पानी पीना, तनाव और नींद की कमी भी जिम्मेदार हो सकती है। लगातार स्क्रीन देखने से क्यों होता है सिरदर्द? लंबे समय तक स्क्रीन पर लगातार नजर टिकाए रखने से डिजिटल आई स्ट्रेन हो सकता है। स्क्रीन देखते समय पलकें कम झपकने के कारण आंखों में सूखापन और थकान बढ़ सकती है। इसके अलावा स्क्रीन की तेज रोशनी और ग्लेयर भी आंखों पर दबाव डाल सकते हैं, जिससे कुछ लोगों में सिरदर्द की समस्या हो सकती है। गर्दन और कंधों का तनाव भी बन सकता है वजह मोबाइल को लंबे समय तक नीचे झुककर देखने या लैपटॉप पर झुककर बैठने से गर्दन और कंधों की मांसपेशियों पर दबाव पड़ता है। यह मांसपेशियों का तनाव सिर और गर्दन के आसपास दर्द को बढ़ा सकता है। इसलिए लंबे समय तक काम करने वालों के लिए सही पोस्चर बनाए रखना जरूरी है। माइग्रेन वालों को अधिक सावधानी की जरूरत जिन लोगों को पहले से माइग्रेन की समस्या है, उनके लिए ज्यादा स्क्रीन एक्सपोजर परेशानी बढ़ाने वाला संभावित ट्रिगर हो सकता है। इसके साथ तनाव, पर्याप्त नींद न लेना, पानी की कमी और समय पर भोजन न करना भी सिरदर्द को बढ़ा सकता है। रात में फोन चलाने से बिगड़ सकती है नींद सोने से ठीक पहले मोबाइल पर वीडियो देखना या सोशल मीडिया स्क्रॉल करना नींद के समय को कम कर सकता है। नींद पूरी न होने पर अगले दिन थकान, चिड़चिड़ापन, एकाग्रता में कमी और मानसिक थकान महसूस हो सकती है। हालांकि, विशेषज्ञ के मुताबिक सामान्य स्क्रीन इस्तेमाल को सीधे तौर पर मस्तिष्क को नुकसान पहुंचाने या याददाश्त कमजोर होने का कारण मानना सही नहीं है। लगातार नोटिफिकेशन, बार-बार काम बदलना और नींद की कमी एकाग्रता को प्रभावित कर सकती है, जिससे व्यक्ति को याददाश्त कमजोर लग सकती है। स्क्रीन से होने वाली परेशानी से कैसे बचें? लगातार स्क्रीन देखने के बजाय बीच-बीच में छोटे ब्रेक लें। पर्याप्त पानी पीते रहें और समय पर भोजन करें। मोबाइल और लैपटॉप इस्तेमाल करते समय गर्दन को लंबे समय तक नीचे न झुकाएं। वर्कस्टेशन को इस तरह व्यवस्थित करें कि स्क्रीन आंखों के अनुकूल ऊंचाई पर हो। स्क्रीन की चमक और आसपास की रोशनी को संतुलित रखें। सोने से पहले कुछ समय स्क्रीन से दूरी बनाने की कोशिश करें। अगर माइग्रेन की समस्या है, तो अपने ट्रिगर्स को पहचानकर उनसे बचें। कब सिरदर्द को गंभीरता से लेना चाहिए? अगर सिरदर्द पहली बार हुआ है, बहुत तेज है, लगातार बढ़ रहा है या इसके साथ कमजोरी, सुन्नपन, भ्रम, दौरे, बेहोशी, बोलने में परेशानी या नजर में महत्वपूर्ण बदलाव जैसे लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। निष्कर्ष: स्क्रीन टाइम को केवल घंटों की संख्या से नहीं, बल्कि इस्तेमाल के तरीके से भी समझना जरूरी है। नियमित ब्रेक, सही पोस्चर, पर्याप्त नींद और हाइड्रेशन जैसी आदतें स्क्रीन से जुड़ी कई परेशानियों को कम करने में मदद कर सकती हैं।
गया, एजेंसियां। अनुग्रह नारायण मगध मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार की दिशा में नया ब्लॉक विकसित करने की योजना पर काम चल रहा है। अस्पताल में बढ़ाया जा रहा स्वास्थ्य ढांचा मगध मेडिकल अस्पताल गया समेत आसपास के कई जिलों के मरीजों के लिए प्रमुख सरकारी चिकित्सा केंद्र है। अस्पताल में सुपर स्पेशियलिटी सेवाओं को भी मजबूत किया जा रहा है। हाल ही में यहां कैथ लैब शुरू करने की तैयारी की जानकारी सामने आई थी। मरीजों का बढ़ता दबाव अस्पताल में बड़ी संख्या में मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। इसी वजह से अतिरिक्त भवन और सुविधाओं की जरूरत लगातार महसूस की जा रही है। जुलाई में डेंगू के बढ़ते खतरे को देखते हुए अस्पताल में 100 बेड का विशेष वार्ड भी तैयार किया गया था। नई सुविधाओं से इलाज की क्षमता बढ़ने की उम्मीद नए ब्लॉक के निर्माण से अस्पताल में मरीजों के लिए अतिरिक्त स्थान और आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने का रास्ता खुल सकता है। इससे गंभीर मरीजों को बेहतर उपचार मिलने और दूसरे बड़े शहरों में रेफर करने की जरूरत कम होने की उम्मीद है।