वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ बातचीत को लेकर बड़ा बयान देते हुए कहा है कि फिलहाल दोनों देशों के बीच न तो कोई बातचीत चल रही है और न ही कोई वार्ता निर्धारित है। ट्रंप ने साथ ही दावा किया कि रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य खुला है, जबकि ईरान का कहना है कि जलडमरूमध्य अभी भी जहाजों के लिए बंद है। होर्मुज को लेकर अमेरिका और ईरान के दावे अलग ट्रंप के बयान के मुताबिक अमेरिका की नजर में होर्मुज जलडमरूमध्य नौवहन के लिए खुला है। वहीं ईरान ने इसके विपरीत रुख अपनाते हुए कहा है कि जब तक अमेरिका अंतरिम समझौते की शर्तों को पूरा नहीं करता, तब तक जलडमरूमध्य को फिर से पूरी तरह नहीं खोला जाएगा। ईरान की ओर से जिन शर्तों का उल्लेख किया गया है, उनमें बंदरगाहों की नाकेबंदी हटाना, तेल प्रतिबंधों में राहत और सैन्य धमकियों को रोकना शामिल है। ट्रंप ने होर्मुज को लेकर फिर अपनाया सख्त रुख ट्रंप ने सोशल मीडिया पर एक नक्शा भी साझा किया, जिसमें होर्मुज जलडमरूमध्य को अमेरिका के नए क्षेत्र के रूप में दर्शाया गया। इस कदम को ईरान के खिलाफ उनके सख्त रुख के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। इस बीच ईरान ने भी अमेरिका के रुख पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने से क्षेत्र में कूटनीतिक समाधान की संभावनाएं कमजोर होती दिखाई दे रही हैं। तेल बाजार पर भी बढ़ा दबाव होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर जारी अनिश्चितता का सीधा असर वैश्विक तेल बाजार पर पड़ रहा है। बुधवार को ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 91.28 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जबकि अमेरिकी WTI करीब 85.31 डॉलर प्रति बैरल रहा। यह लगातार चौथा दिन है जब तेल की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई। होर्मुज दुनिया के प्रमुख ऊर्जा मार्गों में से एक है। इसलिए यहां लंबे समय तक व्यवधान रहने की स्थिति में वैश्विक तेल आपूर्ति और महंगाई पर दबाव बढ़ने की आशंका है। बातचीत की उम्मीदों पर लगा झटका ट्रंप के ताजा बयान से अमेरिका और ईरान के बीच तत्काल बातचीत की उम्मीदों को झटका लगा है। दूसरी ओर, क्षेत्रीय देश होर्मुज के जरिए तेल और अन्य जहाजों की आवाजाही को सामान्य बनाने के प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में अमेरिका-ईरान संबंधों और होर्मुज संकट पर पूरी दुनिया की नजर बनी रहेगी।
वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिका और कनाडा के बीच चल रहे टैरिफ विवाद में फिलहाल तनाव कम होता दिखाई दे रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कनाडा से आने वाले करीब 20 अरब डॉलर के सामान पर प्रस्तावित 50% अतिरिक्त टैरिफ को तीन दिनों के लिए टाल दिया है। यह फैसला दोनों देशों के बीच अंतिम समय में हुई बातचीत और संभावित समझौते के बाद लिया गया है। 50% टैरिफ पर तीन दिन की रोक अमेरिका का प्रस्तावित 50% शुल्क बुधवार से लागू होना था। इसके दायरे में कनाडा से आने वाले कई उत्पाद शामिल थे। ट्रंप ने अब इसके क्रियान्वयन को तीन दिनों के लिए रोक दिया है, ताकि दोनों देश समझौते की शर्तों को अंतिम रूप दे सकें। किन उत्पादों पर पड़ सकता था असर प्रस्तावित शुल्क से शराब, डेयरी उत्पाद, फर्नीचर, कपड़े, सीमेंट, हॉकी उपकरण और कई अन्य कनाडाई उत्पाद प्रभावित हो सकते थे। कनाडाई कारोबारी संगठनों ने चेतावनी दी थी कि इतने ऊंचे शुल्क से कंपनियों की लागत बढ़ने के साथ रोजगार पर भी असर पड़ सकता है। ट्रंप और मार्क कार्नी के बीच बातचीत टैरिफ लागू होने से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के बीच बातचीत हुई। कनाडा ने अमेरिकी बाजार के साथ व्यापारिक संबंधों को सामान्य रखने के लिए कई मुद्दों पर रियायतों पर चर्चा की है। दोनों पक्ष व्यापक व्यापार समझौते की दिशा में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। कीस्टोन XL पाइपलाइन भी बनी अहम कड़ी ट्रंप ने संभावित समझौते के बीच कीस्टोन XL तेल पाइपलाइन परियोजना को फिर से शुरू करने का संकेत भी दिया है। यह परियोजना पहले रद्द हो चुकी थी। यदि दोनों देशों के बीच समझौता अंतिम रूप लेता है तो इससे ऊर्जा और व्यापार संबंधों में भी नई दिशा देखने को मिल सकती है। फिलहाल तीन दिन की रोक को अस्थायी राहत माना जा रहा है। अंतिम समझौता नहीं होने की स्थिति में 50% टैरिफ का मुद्दा फिर से सामने आ सकता है।
हेग, एजेंसियां। अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC) के खिलाफ अपना दबाव और बढ़ाते हुए ICC की अध्यक्ष टोमोको अकाने और वरिष्ठ ट्रायल वकील अब्दुलाये साये पर नए प्रतिबंध लगाए हैं। अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि ICC ऐसे देशों के अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है, जिन्होंने न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं किया है। टोमोको अकाने और अब्दुलाये साये पर कार्रवाई अमेरिकी प्रतिबंधों के तहत टोमोको अकाने और अब्दुलाये साये की अमेरिका के अधिकार क्षेत्र में मौजूद संपत्तियां फ्रीज की जा सकती हैं और अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था से जुड़े लेन-देन पर रोक लग जाती है। साये उन मामलों की जांच से जुड़े रहे हैं जिनमें इजरायल के अधिकारियों के खिलाफ ICC की कार्रवाई शामिल है। इजरायल से जुड़े मामलों पर अमेरिका नाराज अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने ICC की कार्रवाई का विरोध करते हुए कहा है कि न्यायालय ने अपनी अधिकार सीमा से आगे बढ़कर ऐसे अधिकारियों को निशाना बनाया है जिनके देशों ने ICC के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं किया है। अमेरिका और इजरायल दोनों रोम संविधि के पक्षकार नहीं हैं। ICC ने इससे पहले इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और पूर्व रक्षा मंत्री योआव गैलेंट के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। इसी मुद्दे को लेकर अमेरिका और ICC के बीच टकराव लगातार बढ़ता रहा है। ICC ने अमेरिकी कदम की निंदा की ICC ने अमेरिकी प्रतिबंधों की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि इस तरह की कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय कानून और न्यायिक स्वतंत्रता को कमजोर करती है। नीदरलैंड ने भी अमेरिकी कदम पर असहमति जताते हुए ICC के प्रति अपना समर्थन दोहराया है। अमेरिका का दबाव अभियान जारी यह कार्रवाई ICC के खिलाफ ट्रंप प्रशासन के व्यापक अभियान का हिस्सा है। अमेरिका ने पहले भी ICC के कई न्यायाधीशों और अभियोजकों पर प्रतिबंध लगाए हैं। वॉशिंगटन अब ICC के सदस्य देशों पर भी न्यायालय से बाहर निकलने के लिए कूटनीतिक दबाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिका की एक संघीय अदालत ने FBI मुख्यालय को मैरीलैंड के ग्रीनबेल्ट से हटाकर वॉशिंगटन डीसी के रोनाल्ड रीगन बिल्डिंग में स्थानांतरित करने की ट्रंप प्रशासन की योजना पर रोक लगा दी है। अदालत ने कहा कि प्रशासन ने पहले से स्वीकृत ग्रीनबेल्ट परियोजना को रद्द करने और उसके लिए मंजूर धन को दूसरी जगह इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं होने के बावजूद यह फैसला लिया। ग्रीनबेल्ट परियोजना को रद्द करने पर विवाद अमेरिकी सरकार ने 2025 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में मैरीलैंड के ग्रीनबेल्ट में नया FBI मुख्यालय बनाने की योजना को बदल दिया था। इसके स्थान पर वॉशिंगटन डीसी स्थित रोनाल्ड रीगन बिल्डिंग को मुख्यालय बनाने के लिए चुना गया। सरकार का तर्क था कि मौजूदा इमारत के इस्तेमाल से निर्माण लागत और समय दोनों कम होंगे। अदालत ने 555 मिलियन डॉलर की फंडिंग पर भी रोक लगाई अमेरिकी जिला जज थियोडोर चुआंग ने कहा कि कांग्रेस ने 2022 और 2023 के कानूनों के तहत नए FBI मुख्यालय के लिए जिन स्थानों पर विचार करने का निर्देश दिया था, उनमें रोनाल्ड रीगन बिल्डिंग शामिल नहीं थी। अदालत ने प्रशासन को इस स्थान के लिए 555 मिलियन डॉलर की मंजूर राशि को स्थानांतरित करने से भी रोक दिया। FBI और मैरीलैंड की प्रतिक्रिया मैरीलैंड के अधिकारियों ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि इससे ग्रीनबेल्ट में प्रस्तावित मुख्यालय परियोजना को आगे बढ़ने का रास्ता साफ हुआ है। दूसरी ओर, FBI ने अदालत के फैसले को राजनीतिक हस्तक्षेप बताया और कहा कि वह कानून प्रवर्तन की जरूरतों के मुताबिक मुख्यालय के लिए सबसे बेहतर विकल्प तलाशना जारी रखेगा। FBI का मौजूदा मुख्यालय जे. एडगर हूवर बिल्डिंग में है, जिसे लंबे समय से पुराना और रखरखाव की समस्या से जूझता हुआ बताया जाता रहा है। नए मुख्यालय के स्थान को लेकर करीब 15 वर्षों से योजना और विवाद जारी है।
वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत की चुनावी व्यवस्था और मतदाता पहचान प्रणाली की सराहना करते हुए इसे अमेरिका में कड़े वोटर ID नियम लागू करने के पक्ष में उदाहरण के तौर पर पेश किया है। ट्रंप ने भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ हुई बातचीत का हवाला देते हुए अमेरिकी चुनावों में वैध फोटो पहचान पत्र की अनिवार्यता पर जोर दिया। ट्रंप ने भारत की चुनाव व्यवस्था का दिया उदाहरण ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर कहा कि भारत में हालिया आम चुनाव में करीब 64.6 करोड़ लोगों ने मतदान किया और एक प्रतिशत से भी कम लोगों ने डाक के जरिए मतदान किया। उन्होंने दावा किया कि भारत में प्रत्येक मतदाता के लिए वैध फोटो पहचान पत्र की आवश्यकता थी। ट्रंप ने इसी व्यवस्था का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि बिना अनिवार्य फोटो ID के अमेरिका में चुनाव कैसे कराए जा सकते हैं। उनके मुताबिक भारत का मॉडल चुनावी प्रक्रिया की सुरक्षा और पहचान सत्यापन के लिहाज से उपयोगी उदाहरण है। CEC ज्ञानेश कुमार की बातचीत का किया जिक्र ट्रंप ने दावा किया कि भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अमेरिकी प्रशासन से सवाल किया था कि अमेरिका में वैध फोटो पहचान पत्र के बिना चुनाव कैसे कराए जाते हैं। यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब ज्ञानेश कुमार ने हाल ही में भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर से मुलाकात की थी। दोनों पक्षों के बीच चुनाव प्रबंधन और निर्वाचन अधिकारियों के प्रशिक्षण में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हुई थी। SAVE America Act के समर्थन में ट्रंप का जोर ट्रंप ने भारत की चुनाव व्यवस्था का उदाहरण देते हुए अमेरिकी कांग्रेस से SAVE America Act पारित करने की अपील दोहराई है। प्रस्तावित कानून में अमेरिकी संघीय चुनावों में नागरिकता का प्रमाण और मतदाता पहचान की अनिवार्यता जैसे प्रावधान शामिल हैं। इसके अलावा डाक से मतदान पर भी कड़े प्रतिबंध प्रस्तावित हैं।
वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन को लेकर बड़ा बयान दिया है। ट्रंप ने कहा कि किम जोंग उन ने उनके हालिया संपर्क के प्रयासों का सकारात्मक जवाब दिया है। हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि किम की ओर से क्या संदेश आया है या दोनों देशों के बीच बातचीत किस स्तर पर पहुंची है। ट्रंप ने किम के साथ रिश्तों को बताया ‘बहुत अच्छा’ ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप से पूछा गया कि किम जोंग उन ने उनके बातचीत के प्रस्ताव का जवाब क्यों नहीं दिया। ट्रंप ने जवाब दिया कि किम ने जवाब दिया है। जब उनसे बातचीत की स्थिति के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मामला “बहुत सकारात्मक” है। ट्रंप ने किम के साथ अपने पुराने संबंधों का जिक्र करते हुए कहा कि किम ने उनके साथ हमेशा सम्मानजनक व्यवहार किया है। उन्होंने यह भी कहा कि वह किम को समझते हैं और किम भी उन्हें समझते हैं। दक्षिण कोरिया के साथ सैन्य अभ्यास घटाने का ऐलान ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब उन्होंने अमेरिका और दक्षिण कोरिया के बीच होने वाले संयुक्त सैन्य अभ्यासों में बड़ी कटौती का आदेश दिया है। ट्रंप ने इन अभ्यासों को महंगा और उत्तर कोरिया के लिए अनावश्यक रूप से उकसाने वाला बताया। उन्होंने कहा कि उत्तर कोरिया उनके राष्ट्रपति रहने के दौरान ‘गैर-खतरनाक और सम्मानजनक’ रहा है। ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि सैन्य अभ्यासों में कमी का फैसला उत्तर कोरिया के साथ तनाव कम करने और कूटनीतिक बातचीत के लिए माहौल बनाने में मदद कर सकता है। क्या फिर होगी ट्रंप-किम मुलाकात? ट्रंप और किम जोंग उन की पहली मुलाकात 2018 में सिंगापुर में हुई थी। इसके बाद दोनों नेताओं के बीच 2019 में भी मुलाकात हुई थी। ट्रंप अब अपने दूसरे कार्यकाल में एक बार फिर किम के साथ सीधे संवाद शुरू करने की कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं। हालांकि, उत्तर कोरिया की ओर से ट्रंप के ताजा प्रस्ताव पर विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया अभी सामने नहीं आई है। उत्तर कोरिया के सरकारी मीडिया ने भी मंगलवार को ट्रंप के संपर्क प्रयास का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं किया। अमेरिका-दक्षिण कोरिया रिश्तों पर भी असर ट्रंप के फैसले से दक्षिण कोरिया के साथ अमेरिका के सुरक्षा संबंधों को लेकर भी बहस तेज हो गई है। दक्षिण कोरिया ने उम्मीद जताई है कि ट्रंप और किम के बीच व्यक्तिगत संबंध भविष्य में अमेरिका-उत्तर कोरिया वार्ता दोबारा शुरू कराने में मदद कर सकते हैं। वहीं अमेरिकी सांसदों और कुछ विशेषज्ञों ने सैन्य अभ्यास घटाने के फैसले पर सुरक्षा संबंधी चिंताएं जताई हैं।
वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका और दक्षिण कोरिया के बीच होने वाले संयुक्त सैन्य अभ्यासों को काफी कम करने का निर्देश दिया है। ट्रंप ने इन अभ्यासों को महंगा और उत्तर कोरिया के लिए अनावश्यक रूप से उकसाने वाला बताया। यह फैसला ऐसे समय आया है जब ट्रंप उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन के साथ दोबारा बातचीत की कोशिश कर रहे हैं। ‘उकसाने वाला संकेत’ बताया सैन्य अभ्यास ट्रंप ने कहा कि अमेरिका-दक्षिण कोरिया के संयुक्त अभ्यासों पर काफी खर्च होता है और ये उत्तर कोरिया को शत्रुतापूर्ण संकेत देते हैं। उन्होंने किम जोंग उन के साथ अपने अच्छे संबंधों का भी हवाला दिया और कहा कि उनके राष्ट्रपति रहने के दौरान उत्तर कोरिया का व्यवहार अमेरिका के प्रति अपेक्षाकृत सम्मानजनक रहा है। अभ्यास फिर भी तय कार्यक्रम के अनुसार शुरू ट्रंप के निर्देश के बावजूद Ulchi Freedom Shield सैन्य अभ्यास 17 अगस्त को निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार शुरू हुआ। इस वर्ष के अभ्यास में करीब 18,000 दक्षिण कोरियाई सैनिक शामिल हैं और इसका कार्यक्रम 27 अगस्त तक चलना है। हालांकि, अमेरिकी निर्देश के बाद अभ्यास के कुछ हिस्सों के आकार में कटौती को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। ईरान मुद्दे ने भी बढ़ाई खटास ट्रंप ने सैन्य अभ्यासों में कटौती के पीछे लागत के अलावा ईरान को लेकर दक्षिण कोरिया के रुख को भी वजह बताया। ट्रंप के मुताबिक उन्होंने दक्षिण कोरिया से ईरान के खिलाफ अमेरिकी प्रयासों में सहयोग करने को कहा था, लेकिन सियोल ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। दक्षिण कोरिया को बातचीत की उम्मीद, सुरक्षा पर चिंता दक्षिण कोरिया की सरकार ने उम्मीद जताई है कि ट्रंप और किम के बीच बेहतर व्यक्तिगत संबंधों से अमेरिका-उत्तर कोरिया वार्ता दोबारा शुरू हो सकती है। हालांकि, दक्षिण कोरिया में इस फैसले को लेकर सुरक्षा चिंताएं भी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि संयुक्त अभ्यासों में कमी से लंबे समय में दोनों देशों की सैन्य तैयारी और उत्तर कोरिया के खिलाफ प्रतिरोध क्षमता प्रभावित हो सकती है।
वॉशिंगटन/तेहरान, एजेंसियां। अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध समाप्त करने और व्यापक शांति समझौते की दिशा में चल रही कोशिशों को बड़ा झटका लगा है। दोनों देशों के बीच 60 दिनों की बातचीत की समयसीमा पूरी हो गई, लेकिन कोई व्यापक समझौता नहीं हो सका। इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान से ‘सरेंडर’ करने की अपील की है और स्पष्ट किया कि अमेरिका मौजूदा समझौते को आगे बढ़ाने के लिए तैयार नहीं है। 60 दिन की बातचीत बेनतीजा अमेरिका और ईरान ने जून में एक समझौते के तहत 60 दिनों के भीतर व्यापक शांति समझौते पर पहुंचने की कोशिश करने पर सहमति जताई थी। इस अवधि में हॉर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने और ईरान की परमाणु गतिविधियों से जुड़े मुद्दों पर भी समाधान तलाशना था। लेकिन दोनों पक्षों के बीच अविश्वास और शर्तों को लेकर मतभेद बने रहे। ट्रंप ने कहा है कि ईरान वह समझौता करने को तैयार नहीं है जिसे अमेरिका जरूरी मानता है। उन्होंने अमेरिका के युद्ध में शामिल होने का मुख्य उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना बताया। ट्रंप ने ईरान से कहा- सफेद झंडा दिखाए ट्रंप ने ईरान के लिए अपनी भाषा और सख्त करते हुए उसे ‘सफेद झंडा दिखाने’ यानी आत्मसमर्पण करने को कहा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अमेरिका ईरान पर दबाव बनाए रखेगा। ट्रंप के मुताबिक, मौजूदा परिस्थितियों में अमेरिका युद्धविराम या समझौते की अवधि बढ़ाने के पक्ष में नहीं है। वहीं ईरान ने अमेरिकी दबाव को स्वीकार करने के संकेत नहीं दिए हैं। ईरानी पक्ष का कहना है कि मौजूदा स्थिति के लिए अमेरिका जिम्मेदार है और तेहरान अपनी प्रमुख मांगों से पीछे नहीं हटेगा। हॉर्मुज जलडमरूमध्य बना सबसे बड़ा मुद्दा अमेरिका और ईरान के बीच तनाव का एक बड़ा केंद्र हॉर्मुज जलडमरूमध्य है। यह दुनिया के प्रमुख तेल और LNG परिवहन मार्गों में से एक है। युद्ध और तनाव के कारण यहां से जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट आई है। Reuters के अनुसार, 16 अगस्त को कोई भी टैंकर हॉर्मुज से नहीं गुजरा, जबकि इससे पहले सामान्य परिस्थितियों में यहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में जहाज गुजरते थे। इसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ा है। मंगलवार को ब्रेंट क्रूड करीब 91 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, क्योंकि बाजार को आपूर्ति बाधित होने की आशंका है। आगे बढ़ सकता है सैन्य तनाव वार्ता में गतिरोध के बीच ईरान ने संकेत दिया है कि यदि कूटनीतिक प्रयास विफल रहते हैं तो वह हॉर्मुज क्षेत्र में और अधिक आक्रामक सैन्य रुख अपना सकता है। दूसरी ओर, अमेरिका ने ईरान पर नौसैनिक नाकाबंदी और आर्थिक दबाव जारी रखने की बात कही है। ऐसे में फिलहाल युद्धविराम की जगह सैन्य और आर्थिक दबाव बढ़ने का खतरा दिखाई दे रहा है। हालांकि, पर्दे के पीछे बातचीत की कुछ संभावनाएं अभी भी बनी हुई हैं।
वॉशिंगटन, एजेंसियां। स्ट्रैट ऑफ हॉर्मुज को दोबारा खोलने को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ओमान को कड़ी चेतावनी दी है। ट्रंप ने कहा कि अगर ओमान हॉर्मुज को लेकर अमेरिकी प्रयासों के रास्ते में आता है, तो अमेरिका उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई कर सकता है। यह बयान ऐसे समय आया है जब ओमान ईरान के साथ जलडमरूमध्य से वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही बहाल करने के लिए बातचीत कर रहा है। ईरान-ओमान के बीच चल रही है बातचीत ईरान और ओमान स्ट्रैट ऑफ हॉर्मुज में व्यापारिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही बहाल करने के लिए एक संभावित व्यवस्था पर बातचीत कर रहे हैं। रिपोर्टों के मुताबिक दोनों पक्षों के बीच कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर प्रगति हुई है, लेकिन समझौते की अंतिम शर्तों पर अभी सहमति नहीं बनी है। अमेरिका की मुख्य आपत्ति यह है कि हॉर्मुज में जहाजों की आवाजाही पर ईरान को नियंत्रण या शुल्क लगाने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए। प्रस्तावित व्यवस्था में ईरानी जलक्षेत्र से जहाजों के गुजरने और उसके बदले शुल्क लेने जैसे मुद्दे भी चर्चा में हैं। ट्रंप ने ओमान को क्यों चेताया? ट्रंप का कहना है कि अमेरिका ईरान के साथ ऐसा कोई समझौता स्वीकार नहीं करेगा जो उसकी नजर में अमेरिकी हितों और हॉर्मुज में स्वतंत्र नौवहन को नुकसान पहुंचाए। उन्होंने ओमान को चेतावनी दी कि अगर वह अमेरिकी प्रयासों में बाधा डालता है तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। ओमान अमेरिका का सहयोगी है, लेकिन ईरान के साथ उसके कूटनीतिक संबंध भी हैं। इसी वजह से मस्कट लंबे समय से अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है। हॉर्मुज पर पूरी दुनिया की नजर स्ट्रैट ऑफ हॉर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है। यहां से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल और LNG का वैश्विक परिवहन होता है। मौजूदा संघर्ष के कारण जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही सामान्य स्तर से काफी नीचे आ गई है। आवाजाही में कमी का असर पहले ही अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर दिखाई देने लगा है। 17 अगस्त को ब्रेंट क्रूड 90.87 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ, जबकि WTI करीब 84.50 डॉलर पर पहुंच गया। अमेरिका-ईरान वार्ता पर भी संकट ट्रंप की ओमान को चेतावनी ऐसे समय आई है जब अमेरिका और ईरान के बीच 60 दिनों की बातचीत की समयसीमा बिना व्यापक समझौते के समाप्त हो गई है। ट्रंप ने ईरान से ‘सरेंडर’ करने की मांग भी दोहराई है और कहा है कि तेहरान अभी उस तरह का समझौता करने के लिए तैयार नहीं है जिसे अमेरिका जरूरी मानता है।
अंकारा, एजेंसियां। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव और हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर जारी गतिरोध के बीच तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन ने मध्यस्थता की पेशकश की है। एर्दोगन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से फोन पर बातचीत के दौरान ईरान के साथ वार्ता जारी रखने और तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक रास्ता अपनाने की अपील की। तुर्की ने शांति प्रयासों में सहयोग देने की पेशकश भी की है। ट्रंप से फोन पर हुई बातचीत तुर्की के राष्ट्रपति कार्यालय के अनुसार, एर्दोगन ने ट्रंप के साथ फोन पर बातचीत में कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत को जारी रखना क्षेत्रीय तनाव कम करने के लिए जरूरी है। उन्होंने तुर्की की ओर से शांति प्रयासों में सहयोग देने की बात कही। यह पहल ऐसे समय हुई है जब अमेरिका और ईरान के बीच अस्थायी युद्धविराम की अवधि खत्म होने के बाद दोनों देशों के बीच तनाव फिर बढ़ गया है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य खोलने पर भी चर्चा एर्दोगन और ट्रंप की बातचीत में स्ट्रैट ऑफ हॉर्मुज को दोबारा खोलने का मुद्दा भी अहम रहा। हॉर्मुज से जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ा दी है। तुर्की पहले ही कह चुका है कि जलडमरूमध्य को खोलना क्षेत्रीय और वैश्विक अर्थव्यवस्था के हित में प्राथमिकता होनी चाहिए। तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने भी ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से फोन पर बातचीत की है। दोनों के बीच युद्धविराम बढ़ाने और हॉर्मुज में जहाजों की आवाजाही बहाल करने के प्रयासों पर चर्चा हुई। ईरान के साथ मध्यस्थता में तुर्की की भूमिका तुर्की पहले से ही अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक संपर्क बनाए रखने वाले देशों में शामिल है। मौजूदा संकट में पाकिस्तान और कतर भी मध्यस्थता के प्रयासों में सक्रिय रहे हैं। एर्दोगन की ताजा पहल से संकेत मिलता है कि क्षेत्रीय देश सैन्य टकराव को और बढ़ने से रोकने के लिए कूटनीतिक रास्ता तलाश रहे हैं। हालांकि, फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच किसी नए स्थायी समझौते की घोषणा नहीं हुई है। ईरान ने वार्ता विफल होने की स्थिति में हॉर्मुज में अपना रुख और आक्रामक करने की चेतावनी दी है, जबकि ट्रंप ने ईरान पर दबाव बनाए रखने की बात कही है। वैश्विक बाजार पर भी असर अमेरिका-ईरान तनाव और हॉर्मुज में घटती जहाज आवाजाही का असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर दिखाई दे रहा है। मंगलवार को ब्रेंट क्रूड 91 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया। बाजार में आशंका है कि यदि हॉर्मुज लंबे समय तक बाधित रहा तो वैश्विक तेल आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है।
गाजा, एजेंसियां। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत जेरेड कुश्नर ने गाजा में युद्ध समाप्त करने की अमेरिकी शांति योजना को आगे बढ़ाने के लिए हमास और इजरायली नेतृत्व के साथ अलग-अलग बातचीत की। कुश्नर ने पहले मिस्र में हमास के राजनीतिक नेताओं से मुलाकात की और उसके बाद यरुशलम में इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से लंबी बैठक की। हालांकि, दो दिनों की बातचीत के बाद भी दोनों पक्षों के बीच कोई निर्णायक समझौता नहीं हो सका। हमास के निरस्त्रीकरण पर सबसे ज्यादा जोर कुश्नर की बातचीत का मुख्य मुद्दा हमास का निरस्त्रीकरण और गाजा का पूर्ण सैन्यीकरण समाप्त करना रहा। अमेरिकी योजना में हमास से हथियार छोड़ने और गाजा के शासन से पीछे हटने की अपेक्षा की गई है। कुश्नर ने संकेत दिया कि यदि प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो 30 दिनों के भीतर हथियार सौंपने और सुरंगों को निष्क्रिय करने की दिशा में प्रगति दिखाई दे सकती है। नेतन्याहू की शर्त- पहले हमास हथियार छोड़े इजरायल की ओर से प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने स्पष्ट किया कि हमास के पूरी तरह निरस्त्रीकरण से पहले इजरायली सेना की वापसी या गाजा का पुनर्निर्माण शुरू नहीं किया जाएगा। बैठक में कथित तौर पर इस बात पर भी चर्चा हुई कि हमास के हथियार छोड़ने की प्रक्रिया की निगरानी के लिए एक अमेरिकी जनरल की भूमिका तय की जा सकती है। शांति योजना में बनी हुई है बड़ी अड़चन ट्रंप की योजना में हमास के निरस्त्रीकरण के बदले चरणबद्ध तरीके से इजरायली सैन्य वापसी और गाजा के पुनर्निर्माण का रोडमैप शामिल है। लेकिन दोनों पक्ष योजना के क्रम को लेकर अलग-अलग रुख पर हैं। इजरायल पहले पूर्ण निरस्त्रीकरण चाहता है, जबकि हमास इजरायली हमले रोकने और सैन्य वापसी को प्राथमिकता दे रहा है। कुश्नर की बैठकों के बाद दो कार्य समूह बनाने पर चर्चा हुई है, जिनमें निरस्त्रीकरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर काम किया जाना है। इसके बावजूद फिलहाल अमेरिकी शांति योजना पर कोई अंतिम सहमति नहीं बनी है। ट्रंप प्रशासन के लिए बड़ी कूटनीतिक चुनौती कुश्नर की यह पहल ट्रंप प्रशासन के उस प्रयास का हिस्सा है, जिसके जरिए गाजा में संघर्ष समाप्त कर निरस्त्रीकरण, सैन्य वापसी और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया शुरू करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन इजरायल और हमास के बीच सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर मतभेद बरकरार रहने से तत्काल समझौते की संभावना फिलहाल सीमित दिखाई दे रही है।
तेहरान। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच ईरान की ओर से एक विवादित इनाम योजना का दावा सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरानी सेना प्रमुख अमीर हातिमी ने अमेरिकी सैनिक को पकड़ने या मारने वाले व्यक्ति को 30 हजार डॉलर (करीब 28.6 लाख रुपये) इनाम देने की बात कही है। वहीं, अगर यह कार्रवाई कोई ईरानी महिला करती है तो इनाम की राशि दोगुनी यानी 60 हजार डॉलर (करीब 57.2 लाख रुपये) होगी। महिलाओं के लिए दोगुना इनाम रिपोर्ट के अनुसार, अमीर हातिमी ने कहा कि बड़ी संख्या में लोगों से मिले अनुरोध और समर्थन के बाद यह घोषणा की गई है। हालांकि, इस कथित इनाम योजना को कब और कहां लागू किया जाएगा, इसकी स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ईरान के भीतर अमेरिकी जमीनी सैनिकों की कोई बड़ी तैनाती नहीं है। ऐसे में इस घोषणा के व्यावहारिक प्रभाव को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। अमेरिका-ईरान तनाव के बीच आया बयान यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बना हुआ है। दोनों देशों के बीच सैन्य कार्रवाई और क्षेत्रीय तनाव का असर पश्चिम एशिया के साथ-साथ वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी पड़ा है। ईरानी सैन्य नेतृत्व की ओर से अमेरिका की मध्य पूर्व में मौजूदगी को लेकर पहले भी कड़े बयान दिए जाते रहे हैं। ईरान ने फारस की खाड़ी, ओमान की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों पर भी आपत्ति जताई है। युद्धविराम के बावजूद तनाव बरकरार रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों देशों के बीच संघर्ष के बाद अस्थायी युद्धविराम और आगे बातचीत की कोशिशें हुई थीं। हालांकि, तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ और दोनों पक्षों के बीच समय-समय पर हमले जारी रहने की बात सामने आई है। अमेरिकी सैन्यकर्मियों के हताहत होने और क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों के बीच ईरान की यह कथित इनाम घोषणा दोनों देशों के बीच तनाव को और बढ़ाने वाली मानी जा रही है। नोट: अमेरिकी सैनिकों को नुकसान पहुंचाने या पकड़ने के लिए इनाम की यह जानकारी आपके दिए गए स्रोत के अनुसार है; ऐसी संवेदनशील युद्ध-संबंधी घोषणाओं की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि के बिना इसे निश्चित तथ्य के रूप में नहीं माना जाना चाहिए।
वॉशिंगटन। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुए त्रिपक्षीय रक्षा समझौते को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। ट्रंप ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते को क्षेत्रीय सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा, साहसी और महत्वपूर्ण पहला कदम बताया है। ट्रंप ने कहा- बहुत खुश हूं डोनाल्ड ट्रंप ने रविवार को अपने ‘ट्रुथ सोशल’ अकाउंट पर पोस्ट करते हुए कहा कि वह इस बात से बहुत खुश हैं कि सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने आखिरकार रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। उन्होंने कहा कि यह समझौता दिखाता है कि मध्य पूर्व किस तरह एकजुट हो रहा है और क्षेत्रीय देश अपनी सुरक्षा के लिए अधिक प्रभावी तरीके से कदम उठा रहे हैं। ट्रंप ने इसे “बड़ा, साहसी और महत्वपूर्ण पहला कदम” बताया। तीनों देशों में से किसी एक पर हमला माना जाएगा साझा हमला मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर 7 अगस्त को सऊदी अरब के मक्का में सऊदी क्राउन प्रिंस और प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हस्ताक्षर किए थे। समझौते के तहत तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति में उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। इसके अलावा सैन्य समन्वय बढ़ाने, संयुक्त सामरिक अभ्यास करने और रक्षा तकनीक तथा सैन्य औद्योगिक क्षमताओं में सहयोग का प्रावधान किया गया है। ईरान-अमेरिका तनाव के बीच समझौता अहम यह रक्षा समझौता ऐसे समय हुआ है जब ईरान और अमेरिका के बीच तनाव को लेकर क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताएं बढ़ी हुई हैं। हालांकि, सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने स्पष्ट किया है कि यह समझौता रक्षात्मक प्रकृति का है और इसका उद्देश्य किसी सैन्य या सांप्रदायिक गुट का गठन करना नहीं है। समझौते के तहत तीनों देशों ने ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम करने तथा कूटनीतिक समाधान की कोशिशों में मदद करने की प्रतिबद्धता भी जताई है। एर्दोगन ने मिस्र के शामिल होने के दिए संकेत तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने इस सुरक्षा व्यवस्था के विस्तार की संभावना के भी संकेत दिए हैं। उन्होंने कहा कि मिस्र का इस व्यवस्था में शामिल होना संभव है और भविष्य में अन्य देश भी इसका हिस्सा बन सकते हैं। एर्दोगन के मुताबिक, समझौते ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है और यह क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग को नई दिशा दे सकता है।
तेहरान, एजेंसियां। ईरान और अमेरिका के बीच हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के यह दावा करने के बाद कि अमेरिका का इस रणनीतिक समुद्री मार्ग पर “पूर्ण नियंत्रण” है, ईरान ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। ईरानी अधिकारियों ने कहा कि हॉर्मुज पर नियंत्रण अब भी ईरान के पास है। ट्रंप के दावे पर ईरान का पलटवार ईरान के नवनियुक्त बसीज प्रमुख हुसैन ताएब ने कहा कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह ईरान के नियंत्रण और प्रबंधन में है। ईरानी सैन्य कमान ने भी अमेरिका के सामान्य समुद्री आवागमन सुनिश्चित करने के दावे को खारिज किया है। ईरान का कहना है कि किसी भी जहाज को जलडमरूमध्य से गुजरने के लिए उसकी अनुमति जरूरी है। दूसरी ओर, अमेरिका का कहना है कि उसकी नौसैनिक नाकेबंदी और सैन्य मौजूदगी के कारण वह समुद्री मार्ग पर नियंत्रण बनाए हुए है। अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी बढ़ाई हॉर्मुज को लेकर दोनों देशों के दावों के बीच अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों के आसपास नौसैनिक नाकेबंदी जारी रखी है। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के मुताबिक, अमेरिकी नौसेना इस नाकेबंदी को लंबे समय तक बनाए रखने में सक्षम है। वहीं, ईरान ने अमेरिका की कार्रवाई को अपने खिलाफ दबाव बढ़ाने की कोशिश बताया है। दोनों देशों के बीच तनाव कम करने के लिए चल रही बातचीत में भी अभी तक कोई निर्णायक समाधान सामने नहीं आया है। वैश्विक तेल आपूर्ति पर बढ़ी चिंता हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के महत्वपूर्ण तेल और गैस परिवहन मार्गों में से एक है। यहां लंबे समय से जारी तनाव के कारण समुद्री यातायात प्रभावित हुआ है और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबाव बना हुआ है। गुरुवार को ब्रेंट क्रूड करीब 1.7 प्रतिशत गिरकर 87.44 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया, हालांकि बाजार में भू-राजनीतिक जोखिम बना हुआ है। अमेरिका-ईरान टकराव से बढ़ी क्षेत्रीय चिंता हॉर्मुज को लेकर अमेरिका और ईरान के दावे बिल्कुल विपरीत हैं। ट्रंप अमेरिका के नियंत्रण की बात कर रहे हैं, जबकि ईरान का कहना है कि जलडमरूमध्य उसके नियंत्रण में है। ऐसे में आने वाले दिनों में समुद्री यातायात, तेल की कीमतों और पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति पर दुनिया की नजर बनी रहेगी।
तेहरान/वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य टकराव को लेकर तेहरान की ओर से एक ऐसा बयान सामने आया है, जिसने संघर्ष के लंबा खिंचने की आशंका बढ़ा दी है। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के कमांडर-इन-चीफ के वरिष्ठ सलाहकार मोहम्मद रजा नकदी ने कहा है कि ईरान अमेरिका के साथ युद्ध को इतना लंबा खींच सकता है कि यह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के अंत तक जारी रहे। नकदी के मुताबिक, लंबी लड़ाई का उद्देश्य केवल मौजूदा सैन्य संघर्ष में टिके रहना नहीं, बल्कि भविष्य में ईरान पर हमला करने वाले किसी भी देश के लिए इसकी भारी कीमत तय करना है। उनका कहना है कि अगर दुश्मन को गंभीर नुकसान पहुंचाया जाए तो भविष्य में किसी भी हमले से पहले उसे उसके संभावित परिणामों के बारे में सोचना पड़ेगा। हालांकि, ये दावे ईरानी अधिकारी के बयान पर आधारित हैं और युद्ध के मैदान की स्वतंत्र स्थिति का पूर्ण आकलन नहीं माने जा सकते। ईरानी अधिकारी ने क्या कहा? मोहम्मद रजा नकदी ने एक इंटरव्यू में संकेत दिया कि ईरान के लिए संघर्ष को लंबा खींचना एक रणनीतिक विकल्प हो सकता है। उनके अनुसार, युद्ध को अगले अमेरिकी राष्ट्रपति के कार्यकाल की शुरुआत तक ले जाना और इस दौरान अमेरिका को भारी नुकसान पहुंचाना ईरान की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत कर सकता है। उनका तर्क है कि भविष्य में ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने वाला कोई भी देश यह समझे कि ऐसी कार्रवाई की कीमत बहुत ज्यादा हो सकती है। नकदी ने यह भी दावा किया कि ईरान फिलहाल युद्ध में जीत की स्थिति में है, हालांकि उन्होंने साथ ही कहा कि तेहरान ने अभी अपना अंतिम लक्ष्य हासिल नहीं किया है। ईरान की रणनीति: युद्ध को लंबा खींचना? ईरानी बयान से संकेत मिलता है कि तेहरान की रणनीति केवल तत्काल सैन्य जवाब देने तक सीमित नहीं हो सकती। लंबा संघर्ष ईरान के लिए एक तरह की प्रतिरोध रणनीति बन सकता है, जिसमें दुश्मन को लगातार आर्थिक और सैन्य लागत उठानी पड़े। हालांकि, लंबे युद्ध की रणनीति अपने साथ गंभीर जोखिम भी लेकर आती है। इससे सैन्य नुकसान के साथ-साथ अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढांचे और आम नागरिकों पर भी दबाव बढ़ सकता है। यही वजह है कि ईरानी नेतृत्व के बयानों को युद्ध की वास्तविक स्थिति से अलग करके देखना जरूरी है। ट्रंप का दावा: होर्मुज पर अमेरिका का पूरा नियंत्रण दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बड़ा दावा किया है। ट्रंप ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि अमेरिका का इस रणनीतिक जलमार्ग पर “पूरा नियंत्रण” है और संकेत दिया कि वॉशिंगटन इसे बनाए रखने की कोशिश करेगा। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ने वाला यह रास्ता अंतरराष्ट्रीय तेल और गैस व्यापार के लिहाज से रणनीतिक महत्व रखता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी सैन्य तनाव का असर केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजारों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ सकता है। ट्रंप ने ईरान की नौसैनिक नाकेबंदी को बताया ‘स्टील की दीवार’ ट्रंप ने अमेरिकी नौसैनिक घेराबंदी का जिक्र करते हुए दावा किया कि ईरान इसे चुनौती देने की स्थिति में नहीं है। उन्होंने इसे “स्टील की दीवार” के तौर पर पेश किया। हालांकि, ट्रंप ने इस कथित ऑपरेशन की अवधि, उसकी वास्तविक सैन्य तैनाती या उसे खत्म करने की संभावित शर्तों को लेकर विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की है। इससे यह स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका होर्मुज क्षेत्र में अपनी मौजूदा सैन्य स्थिति को कितने समय तक बनाए रखना चाहता है। ट्रंप का दावा: IRGC की क्षमता खत्म हो चुकी अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान की सैन्य क्षमता को लेकर भी बेहद कड़ा दावा किया है। ट्रंप के अनुसार, ईरान की नौसेना और वायुसेना की क्षमता बुरी तरह प्रभावित हो चुकी है और IRGC भी गंभीर स्थिति में है। उन्होंने ईरान की आर्थिक स्थिति पर भी निशाना साधते हुए कहा कि देश के पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं हैं और वहां महंगाई बहुत तेजी से बढ़ रही है। लेकिन इन दावों और ईरानी पक्ष की ओर से किए जा रहे दावों के बीच बड़ा अंतर है। एक तरफ वॉशिंगटन ईरान की सैन्य और आर्थिक क्षमता को कमजोर बताने की कोशिश कर रहा है, वहीं तेहरान अपने प्रतिरोध और युद्ध में बढ़त का दावा कर रहा है। दोनों पक्षों के दावों के बीच असली तस्वीर क्या? अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष में दोनों पक्ष अपनी-अपनी सैन्य स्थिति को मजबूत बताने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में किसी एक पक्ष के दावे को युद्ध की अंतिम और स्वतंत्र पुष्टि मानना उचित नहीं होगा। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि संघर्ष कितने समय तक चलता है और क्या दोनों पक्ष किसी राजनीतिक या कूटनीतिक समाधान की दिशा में बढ़ते हैं। अगर युद्ध लंबा खिंचता है और होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर तनाव बना रहता है, तो इसका असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, तेल की कीमतों, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ सकता है। फिलहाल ईरानी अधिकारी का बयान संघर्ष को लंबा खींचने की इच्छा का संकेत देता है, जबकि ट्रंप के बयान से अमेरिका की ओर से दबाव बनाए रखने की रणनीति सामने आती है। दोनों पक्षों के रुख में नरमी नहीं आने की स्थिति में आने वाले दिनों में यह संघर्ष और गंभीर रूप ले सकता है।
वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलीन लेविट अगस्त 2026 के अंत में अपना पद छोड़ देंगी। ट्रंप ने 12 अगस्त को इसकी घोषणा की। लेविट इसके बाद ट्रंप के लिए बाहरी संचार सलाहकार के रूप में काम करेंगी और उनके Make America Great Again आंदोलन को समर्थन देती रहेंगी। परिवार के साथ ज्यादा समय बिताना चाहती हैं लेविट ट्रंप के अनुसार, लेविट ने पद छोड़ने का फैसला अपने परिवार और छोटे बच्चों के साथ ज्यादा समय बिताने के लिए लिया है। वह हाल ही में अपने दूसरे बच्चे के जन्म के बाद मातृत्व अवकाश से वापस लौटी थीं। ट्रंप की करीबी सहयोगियों में रही हैं शामिल कैरोलीन लेविट ट्रंप प्रशासन की प्रमुख संचार चेहरों में रही हैं। ट्रंप ने उन्हें अपनी सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में से एक बताया है और उनके काम की प्रशंसा की है। लेविट ने 2024 के राष्ट्रपति चुनाव अभियान के दौरान भी ट्रंप के लिए संचार संबंधी भूमिका निभाई थी। सबसे कम उम्र में बनी थीं व्हाइट हाउस प्रेस सेक्रेटरी लेविट ने 2025 में 28 वर्ष की उम्र में व्हाइट हाउस प्रेस सेक्रेटरी का पद संभाला था और इस पद पर नियुक्त होने वाली अमेरिकी इतिहास की सबसे कम उम्र की व्यक्ति बनी थीं। उनके उत्तराधिकारी के नाम की अभी आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जुलाई में तुर्की की यात्रा के दौरान एक गंभीर सुरक्षा खतरे के चलते अपना विमान गुप्त रूप से बदल लिया था। अब सामने आई जानकारी के मुताबिक, अमेरिकी अधिकारियों को आशंका थी कि ईरान से जुड़ा कोई समूह एयर फोर्स वन को कंधे से दागी जाने वाली मिसाइल से निशाना बना सकता है। इस खतरे के बाद ट्रंप को एक छोटे और बिना पहचान वाले सैन्य विमान में स्थानांतरित किया गया। कैटरिंग ट्रक की मदद से बदला विमान रिपोर्ट के मुताबिक, तुर्की के अंकारा में ट्रंप को सार्वजनिक रूप से एयर फोर्स वन पर सवार होते हुए दिखाया गया था। इसके बाद एक कैटरिंग ट्रक के जरिए उन्हें चुपचाप विमान से बाहर निकालकर दूसरे विमान तक पहुंचाया गया। ट्रंप को कुछ वरिष्ठ सहयोगियों के साथ छोटे C-32A सैन्य विमान में बैठाया गया। वहीं एयर फोर्स वन को एक तरह के डिकॉय यानी भटकाने वाले विमान के तौर पर रवाना किया गया। खुफिया सूचना में मिसाइल हमले की आशंका रॉयटर्स के मुताबिक, यह फैसला उस समय लिया गया जब ट्रंप अंकारा में NATO शिखर सम्मेलन में हिस्सा ले रहे थे। अधिकारियों को ऐसी खुफिया जानकारी मिली थी जिसे तत्काल और विश्वसनीय खतरे के तौर पर देखा गया। आशंका थी कि एयर फोर्स वन को कंधे से दागी जाने वाली मिसाइल से निशाना बनाया जा सकता है। CIA को खुफिया सूचना पर था संदेह इस मामले में एक नया पहलू भी सामने आया है। Washington Post की 12 अगस्त की रिपोर्ट के अनुसार, CIA के कुछ विश्लेषकों को ईरानी खतरे से जुड़ी खुफिया सूचना पर कम भरोसा था। रिपोर्ट के मुताबिक, यह जानकारी इजरायल की ओर से आई थी और अमेरिकी खुफिया अधिकारियों के एक हिस्से ने इसे कम विश्वसनीय माना था। इसके बावजूद राष्ट्रपति की सुरक्षा को देखते हुए प्रशासन ने विमान बदलने का फैसला किया। ट्रंप की सुरक्षा को लेकर उठे गंभीर सवाल इस गुप्त ऑपरेशन ने अमेरिकी राष्ट्रपति की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। खास बात यह रही कि कुछ पत्रकार और व्हाइट हाउस के कर्मचारी भी कथित तौर पर इस बात से अनजान थे कि ट्रंप असल में दूसरे विमान में जा चुके हैं। पूर्व सीक्रेट सर्विस अधिकारियों ने इस तरह के विमान बदलने के तरीके को असामान्य लेकिन अभूतपूर्व नहीं बताया है।
नई दिल्ली: रूस से कच्चा तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर संभावित अमेरिकी प्रतिबंधों और भारी टैरिफ के बीच भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर एक अहम बयान सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से भारत पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाए जाने की आशंका के बीच व्हाइट हाउस के ट्रेड एडवाइजर पीटर नवारो ने भरोसा जताया है कि ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मुद्दे को आपसी बातचीत से सुलझा सकते हैं। नवारो का यह बयान ऐसे समय आया है जब रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने से संबंधित विधेयक को अमेरिकी सीनेट से मंजूरी मिल चुकी है। प्रस्तावित कानून में भारत और चीन समेत रूस से ऊर्जा खरीदने वाले प्रमुख देशों पर भारी टैरिफ लगाने का प्रावधान किया गया है। ट्रंप-मोदी के रिश्तों पर नवारो को भरोसा भारत पर संभावित टैरिफ को लेकर पूछे गए सवाल पर पीटर नवारो ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच अच्छे कामकाजी संबंध हैं और दोनों नेता इस मुद्दे को मिलकर सुलझा लेंगे। नवारो ने इस मामले में खुद हस्तक्षेप करने से भी दूरी बनाई। उनके बयान को भारत-अमेरिका के बीच जारी व्यापारिक तनाव के बावजूद शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर बातचीत की गुंजाइश के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। रूस से तेल खरीदने पर क्यों बढ़ा टैरिफ का खतरा? अमेरिका रूस पर दबाव बढ़ाने के लिए उसकी ऊर्जा अर्थव्यवस्था को निशाना बनाने की कोशिश कर रहा है। प्रस्तावित प्रतिबंध कानून के तहत रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने का रास्ता तैयार किया गया है। भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता रहा है। ऐसे में प्रस्तावित अमेरिकी कार्रवाई का सीधा असर भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर पड़ सकता है। भारत के लिए चुनौती यह है कि रूस से मिलने वाला कच्चा तेल उसकी ऊर्जा जरूरतों और आयात लागत के लिहाज से महत्वपूर्ण है। वहीं अमेरिका रूस के साथ कारोबार करने वाले देशों पर दबाव बढ़ाकर मॉस्को की ऊर्जा आय को प्रभावित करना चाहता है। 100% टैरिफ की चर्चा, लेकिन अभी लागू नहीं हुआ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिकी सीनेट से विधेयक पारित होने का मतलब यह नहीं है कि भारत पर तुरंत 100 प्रतिशत टैरिफ लागू हो गया है। विधेयक को कानून बनने के लिए अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से भी मंजूरी मिलनी होगी। इसके बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर और अन्य कानूनी एवं प्रशासनिक प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। इसलिए फिलहाल इसे संभावित टैरिफ का खतरा कहना ज्यादा उचित है, न कि लागू हो चुका शुल्क। भारत और चीन समेत कई देश निशाने पर प्रस्तावित व्यवस्था का असर केवल भारत तक सीमित नहीं होगा। रूस से ऊर्जा खरीदने वाले प्रमुख देशों में चीन भी शामिल है। यदि अतिरिक्त शुल्क का प्रावधान आगे बढ़ता है, तो इससे अमेरिका और इन देशों के बीच व्यापारिक संबंधों पर व्यापक असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों की नजर अब इस बात पर रहेगी कि अमेरिकी प्रशासन प्रस्तावित कानून को किस तरह आगे बढ़ाता है और भारत के साथ बातचीत में क्या विकल्प निकलते हैं। आगे क्या होगा? फिलहाल भारत के सामने तीन महत्वपूर्ण मोर्चे हैं—रूस से ऊर्जा आयात, अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंध और संभावित अतिरिक्त टैरिफ से घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला असर। पीटर नवारो का बयान ऐसे समय में आया है जब दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते और टैरिफ को लेकर बातचीत पहले से ही महत्वपूर्ण दौर में है। इसलिए ट्रंप और मोदी के बीच सीधी बातचीत आने वाले समय में इस विवाद की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि प्रस्तावित अमेरिकी प्रतिबंध कानून अंतिम रूप में किस तरह लागू होगा और भारत पर इसका वास्तविक प्रभाव कितना होगा। इसलिए फिलहाल 100 प्रतिशत टैरिफ को संभावित जोखिम के रूप में देखना चाहिए, न कि अंतिम फैसला।
वॉशिंगटन, एजेंसियां। भारत और अमेरिका के बीच व्यापार शुल्क को लेकर तनाव एक बार फिर बढ़ता दिख रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने भारत पर अमेरिकी टैरिफ को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच शुल्क विवाद में भारत को अमेरिकी चिंताओं को गंभीरता से लेना होगा। उन्होंने भारत के रूसी तेल आयात को भी अमेरिका की व्यापार नीति से जोड़कर सवाल उठाए हैं। भारत के रूसी तेल आयात पर अमेरिका की नाराजगी पीटर नवारो लंबे समय से भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल की खरीद की आलोचना करते रहे हैं। उनका तर्क है कि रूस से तेल खरीदकर भारत अप्रत्यक्ष रूप से मॉस्को की अर्थव्यवस्था और यूक्रेन युद्ध को समर्थन दे रहा है। नवारो ने भारत पर रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीदने के साथ-साथ अमेरिकी उत्पादों पर अपेक्षाकृत ऊंचे शुल्क लगाने का आरोप लगाया है। अमेरिका इसी आधार पर भारत के साथ व्यापार संतुलन और टैरिफ को लेकर दबाव बढ़ा रहा है। ट्रंप प्रशासन ने टैरिफ बढ़ाने की दी चेतावनी ट्रंप प्रशासन भारत पर पहले ही अतिरिक्त शुल्क लगाने की दिशा में कदम उठा चुका है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि भारत की व्यापार नीतियों और रूसी तेल खरीद को लेकर वॉशिंगटन की चिंताएं दूर नहीं हुईं तो अमेरिकी टैरिफ का दबाव और बढ़ सकता है। भारत की ओर से हालांकि यह स्पष्ट किया गया है कि उसकी ऊर्जा जरूरतों और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए तेल खरीद के फैसले लिए जाते हैं। भारत रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिकी दबाव के बावजूद अपने हितों के अनुसार ऊर्जा नीति जारी रखने की बात कहता रहा है। भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर नजर टैरिफ विवाद के बीच दोनों देशों के बीच संभावित व्यापार समझौते को लेकर भी बातचीत महत्वपूर्ण हो गई है। भारत चाहता है कि अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों के लिए बेहतर पहुंच मिले, जबकि अमेरिका भारत से अपने उत्पादों के लिए अधिक बाजार पहुंच और शुल्क में कमी की मांग कर रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर दोनों देशों के बीच टैरिफ विवाद जल्द नहीं सुलझता है तो इसका असर भारतीय निर्यातकों, टेक्सटाइल, ऑटोमोबाइल, फार्मा और अन्य उद्योगों पर पड़ सकता है। अमेरिका-भारत व्यापार संबंधों में यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों देश रणनीतिक साझेदार हैं और व्यापार बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। अब नजर इस बात पर है कि नई टैरिफ नीति और रूसी तेल के मुद्दे पर दोनों देश किस तरह समझौते तक पहुंचते हैं।
वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने विदेशी नागरिकों के खिलाफ वीजा कार्रवाई तेज कर दी है। अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से अब तक 1.75 लाख से अधिक वीजा रद्द किए जा चुके हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे मामलों की है, जिनमें विदेशी नागरिकों का अमेरिकी कानून प्रवर्तन एजेंसियों से सामना हुआ था। आपराधिक मामलों और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार वीजा रद्द किए जाने के प्रमुख कारणों में आपराधिक गतिविधियों में शामिल होना, शराब के नशे में वाहन चलाना, वीजा की शर्तों का उल्लंघन, धोखाधड़ी और आव्रजन व्यवस्था का दुरुपयोग शामिल हैं। कुछ मामलों में अमेरिकी नागरिकों के खिलाफ हिंसा का समर्थन करने या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा माने जाने पर भी वीजा रद्द किया गया है। विदेश विभाग ने बताया कि बड़ी संख्या में वीजा रद्द करने की कार्रवाई कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ विदेशी नागरिकों के संपर्क में आने के बाद की गई। प्रशासन का कहना है कि लगातार जांच और निगरानी के जरिए यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि अमेरिका आने वाले विदेशी नागरिक वीजा नियमों का पालन करें। 2026 में वीजा रद्द करने की रफ्तार बढ़ी अमेरिकी अधिकारियों के आंकड़ों के अनुसार 2025 में भी 1 लाख से अधिक वीजा रद्द किए गए थे। मौजूदा रफ्तार को देखते हुए 2026 में यह संख्या पिछले साल के आंकड़े से आगे निकल सकती है। रिपोर्टों के मुताबिक इस साल हर महीने औसतन 10 हजार से अधिक वीजा रद्द किए जा रहे हैं। ट्रंप प्रशासन लगातार आव्रजन और वीजा व्यवस्था में सख्ती पर जोर दे रहा है। प्रशासन का तर्क है कि अमेरिका में प्रवेश की अनुमति पाने वाले विदेशी नागरिकों को अमेरिकी कानूनों और वीजा की शर्तों का सख्ती से पालन करना होगा। भारतीयों के लिए क्या मायने हैं? अमेरिका की इस कार्रवाई को लेकर भारतीय छात्रों, कामगारों और अन्य वीजा धारकों के बीच भी चिंता बढ़ सकती है। हालांकि उपलब्ध ताजा आंकड़ों में 1.75 लाख से अधिक रद्द किए गए वीजा में भारतीय नागरिकों की अलग संख्या सार्वजनिक नहीं की गई है। इसलिए इसे भारत के वीजा धारकों पर केंद्रित कार्रवाई बताना अभी सही नहीं होगा। अमेरिकी प्रशासन की सख्त वीजा नीति के बीच विदेशी नागरिकों को अपने वीजा की शर्तों, आव्रजन नियमों और अमेरिका में रहने की वैध स्थिति का पालन करने पर विशेष ध्यान देना होगा।
वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध समाप्त करने और रणनीतिक होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने को लेकर चल रही बातचीत में नया विवाद खड़ा हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका ईरान से युद्ध, हमलों और लंबे समय से चले आ रहे संघर्षों में हुई मौतों और नुकसान के लिए मुआवजे की मांग करेगा। ट्रंप की इस मांग से दोनों देशों के बीच समझौते की राह और मुश्किल होती दिखाई दे रही है। ईरान ने भी रखी मुआवजे की मांग ईरान की ओर से अमेरिका और इजरायल के हमलों से हुए नुकसान के लिए मुआवजे की मांग की गई है। इसके अलावा तेहरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने के लिए कुछ शर्तें रखी हैं। इनमें प्रतिबंधों में राहत और ईरान की कुछ जब्त संपत्तियों को जारी करने जैसी मांगें शामिल हैं। ट्रंप ने ईरान की इस मांग को स्वीकार करने के बजाय जवाबी तौर पर कहा है कि ईरान को भी अमेरिकी सैनिकों की मौत और ईरान समर्थित समूहों से जुड़े पुराने हमलों के लिए मुआवजा देना चाहिए। ट्रंप ने यह मांग कई दशकों में हुई घटनाओं को आधार बनाकर रखी है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर समझौता अटका होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलना अमेरिका-ईरान वार्ता का सबसे अहम मुद्दा बना हुआ है। ईरान का कहना है कि जब तक अमेरिका उसकी शर्तों को पूरा नहीं करता, तब तक जलडमरूमध्य को पूरी तरह खोलने पर सहमति नहीं बन सकती। इसके जवाब में अमेरिका भी ईरान से कई मांगें कर रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। यहां लंबे समय से जारी तनाव के कारण तेल और गैस की आपूर्ति को लेकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में चिंता बढ़ी है। तेल की कीमतों पर भी पड़ा असर अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में गतिरोध का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर दिखाई दे रहा है। 11 अगस्त को कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी गई और बाजार में यह चिंता बढ़ी कि यदि होर्मुज को लेकर जल्द समझौता नहीं हुआ तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। रॉयटर्स के मुताबिक ब्रेंट क्रूड 88 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया, जबकि अमेरिकी क्रूड 82 डॉलर से ऊपर रहा। फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, लेकिन दोनों पक्षों की मुआवजे संबंधी मांगों ने समझौते को जटिल बना दिया है। आने वाले दिनों में होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने को लेकर होने वाली बातचीत पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।