वॉशिंगटन: अमेरिकी वायुसेना का एक B-52 स्ट्रैटोफोर्ट्रेस बॉम्बर विमान टेकऑफ के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें सवार सभी आठ क्रू मेंबर्स की मौत हो गई। हादसे के बाद अमेरिकी वायुसेना और संबंधित एजेंसियों ने जांच शुरू कर दी है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, मृतकों में विमान निर्माता कंपनी बोइंग के दो कर्मचारी भी शामिल हैं। अमेरिकी वायुसेना ने अभी तक मृतकों की पहचान सार्वजनिक नहीं की है। अधिकारियों ने कहा कि दुर्घटना के कारणों का पता लगाने के लिए विस्तृत जांच की जा रही है। हादसे के बाद सैन्य और नागरिक उड्डयन विशेषज्ञों की टीम को घटनास्थल पर भेजा गया है। बोइंग ने की कर्मचारियों की मौत की पुष्टि एयरोस्पेस कंपनी बोइंग ने एक बयान जारी कर पुष्टि की कि दुर्घटना में उसके दो कर्मचारियों की भी जान गई है। कंपनी ने मृतकों के परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि वह जांच एजेंसियों को हर संभव सहयोग देगी। अमेरिकी रणनीतिक शक्ति की रीढ़ है B-52 बॉम्बर B-52 स्ट्रैटोफोर्ट्रेस को अमेरिकी रणनीतिक बॉम्बर फोर्स की रीढ़ माना जाता है। यह दुनिया के सबसे शक्तिशाली और लंबे समय से सेवा में मौजूद सैन्य विमानों में से एक है। लंबी दूरी तक मार करने में सक्षम यह बॉम्बर पारंपरिक और परमाणु दोनों प्रकार के हथियार ले जा सकता है। B-52 बॉम्बर की प्रमुख विशेषताएं लगभग 70,000 पाउंड (करीब 31,750 किलोग्राम) तक हथियार ले जाने की क्षमता। क्लस्टर बम, गाइडेड मिसाइलें और परमाणु हथियारों से लैस होने में सक्षम। बिना ईंधन भरे 8,000 मील (करीब 12,875 किलोमीटर) से अधिक दूरी तय कर सकता है। लंबी दूरी के रणनीतिक हमलों और परमाणु प्रतिरोधक क्षमता के लिए अमेरिकी वायुसेना का प्रमुख प्लेटफॉर्म। जांच जारी अमेरिकी वायुसेना ने कहा है कि दुर्घटना के वास्तविक कारणों का पता लगाने के लिए तकनीकी और परिचालन दोनों पहलुओं की जांच की जा रही है। जांच पूरी होने तक दुर्घटना के कारणों पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की जाएगी। इस हादसे ने अमेरिकी सैन्य विमानन सुरक्षा और दुनिया के सबसे भरोसेमंद माने जाने वाले रणनीतिक बॉम्बरों में से एक B-52 की परिचालन सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी बातचीत अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है और दोनों देशों के बीच एक महत्वपूर्ण समझौते पर जल्द हस्ताक्षर हो सकते हैं। ईरान ने स्पष्ट किया है कि अभी अंतिम सहमति नहीं बनी है और कई मुद्दों पर बातचीत जारी है। ट्रंप बोले- औपचारिक प्रक्रिया बाकी व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि समझौते के अधिकांश बिंदुओं पर सहमति बन चुकी है और अब केवल कुछ औपचारिक दस्तावेजी प्रक्रियाएं पूरी की जानी हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि अगले कुछ दिनों में इन प्रक्रियाओं को अंतिम रूप देकर समझौते पर आधिकारिक हस्ताक्षर किए जा सकते हैं। ट्रंप के अनुसार, समझौते पर हस्ताक्षर का कार्यक्रम इसी सप्ताहांत यूरोप में आयोजित किया जा सकता है। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस कर सकते हैं अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व ट्रंप ने बताया कि यदि हस्ताक्षर समारोह आयोजित होता है तो वह स्वयं इसमें शामिल नहीं होंगे। उनकी जगह अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करेंगे। इस बयान को अमेरिका और ईरान के बीच कई महीनों से चल रही कूटनीतिक बातचीत में महत्वपूर्ण प्रगति के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी जताई उम्मीद ट्रंप ने कहा कि संभावित समझौते से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव कम करने का रास्ता खुल सकता है। उनका मानना है कि समझौते के बाद इस रणनीतिक समुद्री मार्ग पर सामान्य गतिविधियां बहाल होने में मदद मिलेगी। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माना जाता है और क्षेत्रीय तनाव के कारण यह लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय रहा है। ईरान ने कहा- अभी अंतिम समझौता नहीं दूसरी ओर, ईरान ने ट्रंप के दावों पर सावधानीपूर्ण प्रतिक्रिया दी है। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने सरकारी टेलीविजन से बातचीत में कहा कि वार्ता के कई पहलुओं पर प्रगति हुई है, लेकिन अभी अंतिम समझौता नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि बातचीत के दौरान अमेरिका की ओर से नई मांगें सामने रखी जा रही हैं, जिससे कुछ मुद्दों पर सहमति बनने में कठिनाई आ रही है। बघाई ने दोहराया कि ईरान अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और निर्धारित "रेड लाइन" से पीछे नहीं हटेगा। आगे की कूटनीतिक गतिविधियों पर नजर ट्रंप के आशावादी बयान और ईरान की सतर्क प्रतिक्रिया के बीच अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर आगामी कूटनीतिक गतिविधियों पर टिकी हुई है। यदि दोनों पक्ष शेष मतभेदों को दूर करने में सफल रहते हैं, तो यह समझौता पश्चिम एशिया की राजनीति और वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।
अमेरिका में भारतीय मूल के एक कारोबारी की नागरिकता खतरे में पड़ गई है। ट्रंप प्रशासन द्वारा शुरू किए गए व्यापक 'डी-नेचुरलाइजेशन' अभियान के तहत उन 17 अमेरिकी नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई है, जिन पर नागरिकता प्राप्त करने की प्रक्रिया के दौरान कथित रूप से गलत जानकारी देने, तथ्य छिपाने या धोखाधड़ी करने के आरोप हैं। इन 17 लोगों में भारतीय मूल के व्यवसायी नीरज शर्मा का नाम भी शामिल है। अमेरिकी न्याय विभाग ने उनके खिलाफ नागरिकता रद्द करने की कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी है। कौन हैं नीरज शर्मा? 50 वर्षीय नीरज शर्मा न्यू जर्सी स्थित स्टाफिंग कंपनी मैग्नाविजन एलएलसी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) रह चुके हैं। अमेरिकी न्याय विभाग के अनुसार, उन्होंने H-1B वीजा से जुड़े 11 कथित फर्जी आवेदन दाखिल किए थे। आरोप है कि इन आवेदनों में यह दिखाया गया था कि विदेशी कर्मचारियों को एक बड़ी वैश्विक वित्तीय संस्था में नियुक्त किया जाएगा, जबकि दस्तावेजों में कथित रूप से जाली हस्ताक्षर और भ्रामक जानकारियों का इस्तेमाल किया गया था। नागरिकता आवेदन में जानकारी छिपाने का आरोप अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि वर्ष 2017 में नागरिकता के लिए आवेदन करते समय नीरज शर्मा ने ऐसे किसी अपराध में शामिल होने से इनकार किया था, जिसके लिए उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया हो। उन्होंने यह भी कहा था कि उन्होंने कभी आव्रजन लाभ हासिल करने के लिए अमेरिकी अधिकारियों को गलत जानकारी नहीं दी। इसी आधार पर अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा (USCIS) ने उनका आवेदन मंजूर कर लिया था और दिसंबर 2017 में उन्हें अमेरिकी नागरिकता प्रदान कर दी गई थी। बाद में 2015 से 2017 के बीच की गतिविधियों से जुड़े वीजा धोखाधड़ी मामले में उन्हें दोषी ठहराया गया। अब न्याय विभाग का कहना है कि यदि नागरिकता आवेदन के दौरान महत्वपूर्ण जानकारी छिपाई गई थी, तो उनकी नागरिकता रद्द की जा सकती है। ट्रंप प्रशासन का बड़ा अभियान नीरज शर्मा का मामला ट्रंप प्रशासन की उस व्यापक कार्रवाई का हिस्सा है, जिसके तहत प्राकृतिक रूप से अमेरिकी नागरिक बने लोगों (Naturalized Citizens) की नागरिकता की समीक्षा की जा रही है। न्याय विभाग के अनुसार, जिन 17 लोगों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई है, उनमें ऐसे व्यक्ति शामिल हैं जिन पर आव्रजन धोखाधड़ी, वित्तीय अपराध, नाबालिगों के खिलाफ अपराध, मादक पदार्थों की तस्करी और अन्य गंभीर अपराधों के आरोप हैं या वे इन मामलों में दोषी ठहराए जा चुके हैं। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि यह अभियान उन मामलों पर केंद्रित है, जहां नागरिकता प्राप्त करने के लिए कथित रूप से झूठी जानकारी, फर्जी दस्तावेज या महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने का सहारा लिया गया था। क्या है डी-नेचुरलाइजेशन प्रक्रिया? डी-नेचुरलाइजेशन (Denaturalization) वह कानूनी प्रक्रिया है जिसके तहत किसी व्यक्ति की अमेरिकी नागरिकता रद्द की जा सकती है, यदि यह साबित हो जाए कि उसने नागरिकता प्राप्त करने के दौरान धोखाधड़ी की, महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए या गलत जानकारी दी। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे मामलों में अंतिम फैसला संघीय अदालतें करती हैं और सरकार को अपने आरोपों को कानूनी रूप से साबित करना होता है। फिलहाल नीरज शर्मा के मामले में कानूनी प्रक्रिया जारी है और अंतिम निर्णय अदालत द्वारा लिया जाएगा।
वॉशिंगटन: अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए के एक पूर्व अधिकारी पर करोड़ों डॉलर की कथित धोखाधड़ी का आरोप लगा है। जांच एजेंसियों का दावा है कि पूर्व अधिकारी डेविड रश ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े एक गोपनीय कार्यक्रम का सहारा लेकर सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग किया और करीब 4 करोड़ डॉलर (लगभग 382 करोड़ रुपये) की संपत्ति जुटा ली। मामला तब सुर्खियों में आया जब संघीय जांच एजेंसियों ने उनके घर पर छापेमारी की। अधिकारियों के अनुसार, तलाशी के दौरान बड़ी मात्रा में नकदी, सैकड़ों सोने की ईंटें और कई लग्जरी घड़ियां बरामद की गईं। फर्जी गोपनीय मिशन बनाकर किया कथित खेल अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, डेविड रश पर आरोप है कि उन्होंने एक कथित फर्जी सरकारी कार्यक्रम तैयार किया और उसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अत्यंत संवेदनशील मिशन के रूप में प्रस्तुत किया। जांचकर्ताओं का कहना है कि इस कार्यक्रम को "कंटिन्यूटी ऑफ गवर्नमेंट ऑपरेशंस" से जुड़ा बताया गया था। आमतौर पर इस तरह की योजनाएं युद्ध, बड़े आतंकी हमले, प्राकृतिक आपदा या राष्ट्रीय आपातकाल जैसी परिस्थितियों में सरकार के कामकाज को जारी रखने के लिए बनाई जाती हैं। अधिकारियों का आरोप है कि इसी संवेदनशील व्यवस्था की आड़ लेकर रश ने लंबे समय तक सरकारी संसाधनों और विशेष सुविधाओं तक पहुंच बनाई। छापेमारी में मिला सोने और नकदी का जखीरा संघीय जांच ब्यूरो (FBI) द्वारा वर्जीनिया स्थित आवास पर की गई छापेमारी में चौंकाने वाले खुलासे सामने आए। जांच एजेंसियों के अनुसार, घर से 303 सोने की ईंटें बरामद की गईं। इसके अलावा लगभग 20 लाख डॉलर नकद और कई महंगी लग्जरी घड़ियां भी मिलीं। अधिकारियों का मानना है कि बरामद संपत्ति कथित तौर पर उसी फर्जी कार्यक्रम के जरिए अर्जित की गई हो सकती है। संपत्ति के स्रोत और उससे जुड़े वित्तीय लेनदेन की जांच अभी जारी है। अदालत में 'मास्टर मैनिपुलेटर' बताया गया मामले की सुनवाई के दौरान सरकारी वकीलों ने डेविड रश को "मास्टर मैनिपुलेटर" करार दिया। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि उन्होंने वर्षों तक अपने शैक्षणिक और पेशेवर रिकॉर्ड के बारे में भ्रामक जानकारी देकर विभिन्न सरकारी संस्थानों में प्रभावशाली पद हासिल किए। जांच एजेंसियों का दावा है कि रश ने अपने अनुभव और योग्यता को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया, जिससे उन्हें ऐसे संवेदनशील कार्यक्रमों तक पहुंच मिली जिनका दुरुपयोग बाद में किया गया। सहयोगियों की भूमिका की भी जांच अधिकारियों के अनुसार, यह भी जांच की जा रही है कि क्या इस कथित योजना में अन्य लोग भी शामिल थे। प्रारंभिक जांच में संकेत मिले हैं कि जिन सहयोगियों को इस कार्यक्रम से जोड़ा गया था, उन्हें कथित धोखाधड़ी की पूरी जानकारी नहीं थी। जांच एजेंसियां अब वित्तीय दस्तावेजों, ईमेल रिकॉर्ड और अन्य संचार माध्यमों की पड़ताल कर रही हैं। CIA की निगरानी व्यवस्था पर उठे सवाल मामले के सामने आने के बाद अमेरिकी खुफिया तंत्र की जवाबदेही और निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह एक गंभीर संस्थागत विफलता मानी जाएगी। आलोचकों के अनुसार, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गोपनीय ढांचे का उपयोग कथित तौर पर वर्षों तक निजी लाभ के लिए किया जाना चिंताजनक है और इससे निगरानी तंत्र की कमजोरियां उजागर होती हैं। फिलहाल हिरासत में हैं डेविड रश मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, डेविड रश वर्तमान में हिरासत में हैं। अदालत ने उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया है। न्यायाधीश का मानना है कि मामले की गंभीरता और उपलब्ध संसाधनों को देखते हुए उनके फरार होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर उन्हें फिलहाल हिरासत में रखने का आदेश दिया गया है। आगे और बढ़ सकती हैं मुश्किलें जांच एजेंसियों ने संकेत दिया है कि मामले की पड़ताल आगे बढ़ने के साथ डेविड रश पर अतिरिक्त आरोप भी लगाए जा सकते हैं। वित्तीय अनियमितताओं, धोखाधड़ी, सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े नियमों के उल्लंघन जैसे पहलुओं की अलग-अलग जांच की जा रही है। यदि आरोप अदालत में साबित होते हैं, तो यह हाल के वर्षों में अमेरिकी खुफिया तंत्र से जुड़े सबसे बड़े वित्तीय घोटालों में से एक माना जा सकता है।
वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सख्त आव्रजन नीतियों को एक और कानूनी झटका लगा है। अमेरिकी संघीय अदालत ने एच-1बी वीजा के तहत विदेशी कुशल कर्मचारियों को नियुक्त करने वाली कंपनियों पर 1 लाख डॉलर का अतिरिक्त शुल्क लगाने की योजना को अवैध घोषित कर दिया है। इस फैसले से अमेरिकी कंपनियों, विश्वविद्यालयों और विशेष रूप से भारतीय पेशेवरों को बड़ी राहत मिली है। अदालत के फैसले के बाद फिलहाल वह नियम लागू नहीं हो सकेगा, जिसके तहत नए एच-1बी वीजा आवेदन पर कंपनियों को भारी अतिरिक्त शुल्क चुकाना पड़ता। चूंकि एच-1बी वीजा धारकों में भारतीयों की हिस्सेदारी सबसे अधिक है, इसलिए इस निर्णय को भारत के हजारों आईटी पेशेवरों, इंजीनियरों, डॉक्टरों और अन्य कुशल कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने योजना को बताया संविधान के खिलाफ अमेरिकी जिला न्यायालय के न्यायाधीश ने अपने फैसले में कहा कि राष्ट्रपति के पास कांग्रेस की मंजूरी के बिना इस तरह का नया शुल्क लगाने का अधिकार नहीं है। अदालत ने माना कि यह कदम संविधान में निर्धारित शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत का उल्लंघन करता है। अपने आदेश में अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी प्रशासनिक निर्णय के जरिए इतनी बड़ी वित्तीय बाध्यता लागू नहीं की जा सकती, जब तक कि उसके लिए विधायी मंजूरी न हो। क्या था ट्रंप प्रशासन का प्रस्ताव? ट्रंप प्रशासन ने सितंबर 2025 में घोषणा की थी कि नए एच-1बी वीजा आवेदनों पर 1 लाख डॉलर का अतिरिक्त शुल्क लगाया जाएगा। प्रशासन का तर्क था कि इससे अमेरिकी कंपनियां विदेशी कर्मचारियों पर निर्भरता कम करेंगी और स्थानीय नागरिकों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। व्हाइट हाउस का दावा था कि एच-1बी कार्यक्रम का कुछ कंपनियों द्वारा दुरुपयोग किया जा रहा है और कम लागत पर विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त कर अमेरिकी नागरिकों के अवसर प्रभावित किए जा रहे हैं। कंपनियों पर कई गुना बढ़ जाता आर्थिक बोझ इस नियम के लागू होने से पहले एच-1बी वीजा से जुड़ी सामान्य फीस और अन्य शुल्क मिलाकर कंपनियों को लगभग 2,000 से 5,000 डॉलर तक खर्च करना पड़ता था। नया नियम लागू होने की स्थिति में यह लागत सीधे 1 लाख डॉलर से अधिक हो जाती, जिससे विदेशी प्रतिभाओं को नियुक्त करना अधिकांश कंपनियों के लिए बेहद महंगा हो जाता। विशेषज्ञों का मानना था कि इससे तकनीकी कंपनियों, विश्वविद्यालयों और स्वास्थ्य सेवा संस्थानों पर गंभीर असर पड़ सकता था। राज्यों और उद्योग संगठनों ने दी थी चुनौती इस नीति को कैलिफोर्निया सहित 20 डेमोक्रेटिक नेतृत्व वाले राज्यों ने अदालत में चुनौती दी थी। राज्यों का तर्क था कि राष्ट्रपति अकेले इस तरह का शुल्क नहीं लगा सकते और इसके लिए कांग्रेस की मंजूरी आवश्यक है। इसके अलावा कई उद्योग संगठनों, विश्वविद्यालयों और कारोबारी संस्थाओं ने भी इस फैसले का विरोध किया था। उनका कहना था कि इससे पहले से मौजूद कुशल कर्मचारियों की कमी और बढ़ सकती है। छह महीने पहले आया था अलग फैसला दिलचस्प बात यह है कि कुछ महीने पहले इसी मुद्दे पर एक अन्य संघीय अदालत ने ट्रंप प्रशासन के पक्ष में फैसला दिया था। उस समय अदालत ने माना था कि राष्ट्रपति को ऐसे कदम उठाने का अधिकार प्राप्त है। बाद में अमेरिकी न्यायपालिका के अन्य फैसलों और संवैधानिक व्याख्याओं के आधार पर अदालत ने इस मामले में अलग दृष्टिकोण अपनाया और अतिरिक्त शुल्क को अवैध करार दिया। भारतीय पेशेवरों के लिए क्यों अहम है फैसला? एच-1बी वीजा अमेरिका में रोजगार पाने के इच्छुक भारतीय पेशेवरों के लिए सबसे महत्वपूर्ण कार्य वीजा माना जाता है। हर साल जारी होने वाले एच-1बी वीजा में सबसे बड़ी संख्या भारतीय नागरिकों की होती है। भारत के आईटी क्षेत्र की कई बड़ी कंपनियां इसी कार्यक्रम के माध्यम से अपने कर्मचारियों को अमेरिका भेजती हैं। इसके अलावा हजारों भारतीय इंजीनियर, डेटा साइंटिस्ट, डॉक्टर, वित्त विशेषज्ञ और शोधकर्ता भी इसी वीजा के जरिए अमेरिका में काम करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि 1 लाख डॉलर का अतिरिक्त शुल्क लागू हो जाता, तो भारतीय पेशेवरों की भर्ती पर सीधा असर पड़ता और कई कंपनियां नए आवेदनों से बचतीं। अमेरिका में कितने लोग H-1B पर काम कर रहे हैं? उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में अमेरिका में लगभग 7.30 लाख एच-1बी वीजा धारक कार्यरत हैं। इनके अलावा करीब 5.50 लाख आश्रित सदस्य, जिनमें पति-पत्नी और बच्चे शामिल हैं, भी अमेरिका में रह रहे हैं। अमेरिकी कानून के तहत निजी क्षेत्र के लिए हर वर्ष 65,000 एच-1बी वीजा जारी किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त अमेरिकी विश्वविद्यालयों से मास्टर या उससे उच्च डिग्री प्राप्त करने वाले आवेदकों के लिए 20,000 अतिरिक्त वीजा निर्धारित हैं। आगे क्या होगा? अदालत के इस फैसले के बाद ट्रंप प्रशासन की योजना पर तत्काल प्रभाव से रोक लग गई है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशासन इस फैसले को उच्च अदालत में चुनौती दे सकता है। यदि मामला अपील में जाता है, तो एच-1बी वीजा को लेकर कानूनी लड़ाई आगे भी जारी रह सकती है। फिलहाल अदालत के फैसले ने विदेशी कुशल कर्मचारियों को नियुक्त करने वाली कंपनियों और अमेरिका में अवसर तलाश रहे हजारों भारतीय पेशेवरों को बड़ी राहत दी है।
अमेरिका और इजरायल के बीच दशकों पुराने रणनीतिक संबंधों को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी रक्षा प्रतिष्ठान में इजरायल की कथित खुफिया गतिविधियों को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं। इसी बीच पश्चिम एशिया की नीतियों और ईरान संकट को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और इजरायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu के बीच मतभेदों की खबरें भी सामने आई हैं। पेंटागन में बढ़ी सतर्कता रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिकी रक्षा विभाग के भीतर इजरायल से जुड़े काउंटर-इंटेलिजेंस जोखिमों को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही है। बताया जा रहा है कि कुछ अमेरिकी अधिकारी विदेश यात्राओं के दौरान अस्थायी संचार उपकरणों और कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल का उपयोग कर रहे हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और अमेरिकी प्रशासन ने सार्वजनिक रूप से ऐसी किसी गंभीर सुरक्षा स्थिति की पुष्टि नहीं की है। खुफिया गतिविधियों को लेकर पुरानी चिंताएं फिर चर्चा में अमेरिका और इजरायल करीबी सहयोगी माने जाते हैं, लेकिन अतीत में भी दोनों देशों के बीच खुफिया गतिविधियों को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सहयोगी देशों के बीच भी संवेदनशील सूचनाओं की सुरक्षा हमेशा एक महत्वपूर्ण विषय रहती है। इसी संदर्भ में कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि अमेरिकी अधिकारियों को गोपनीय चर्चाओं के दौरान अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। ट्रंप और नेतन्याहू के बीच मतभेदों की चर्चा रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि ईरान, लेबनान और व्यापक पश्चिम एशिया नीति को लेकर ट्रंप और नेतन्याहू के बीच हाल के महीनों में कुछ रणनीतिक मतभेद उभरे हैं। बताया गया कि दोनों नेताओं के बीच हुई एक बातचीत के दौरान क्षेत्रीय सुरक्षा और सैन्य कार्रवाइयों को लेकर तीखी चर्चा हुई। इस संबंध में दोनों पक्षों की ओर से आधिकारिक विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया है। इजरायल ने आरोपों को किया खारिज वॉशिंगटन स्थित इजरायली अधिकारियों ने जासूसी संबंधी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि इजरायल अपने सहयोगी देशों के खिलाफ ऐसी गतिविधियों में शामिल नहीं है। दूसरी ओर, अमेरिकी प्रशासन के कुछ अधिकारियों ने भी इन रिपोर्टों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया बताया है और कहा है कि अमेरिका-इजरायल सुरक्षा सहयोग पहले की तरह मजबूत बना हुआ है। पश्चिम एशिया संकट ने बढ़ाई संवेदनशीलता विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान, लेबनान और क्षेत्रीय संघर्षों से जुड़े मुद्दों ने अमेरिका और इजरायल के संबंधों को अधिक संवेदनशील बना दिया है। दोनों देशों के बीच सैन्य और खुफिया सहयोग जारी है, लेकिन क्षेत्रीय रणनीति को लेकर मतभेद समय-समय पर सामने आते रहे हैं। फिलहाल, जासूसी गतिविधियों और सुरक्षा चिंताओं से जुड़े कई दावे मीडिया रिपोर्टों पर आधारित हैं। आधिकारिक स्तर पर इनकी पुष्टि सीमित है, इसलिए इन्हें सावधानी के साथ देखने की आवश्यकता है।
ईरान के साथ जारी सैन्य तनाव को लेकर अमेरिकी राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की युद्ध संबंधी शक्तियों को सीमित करने वाला प्रस्ताव पारित कर दिया है। खास बात यह रही कि इस प्रस्ताव को पारित कराने में कुछ रिपब्लिकन सांसदों ने भी डेमोक्रेट्स का साथ दिया। 215-208 वोटों से पास हुआ प्रस्ताव बुधवार को हुए मतदान में प्रस्ताव 215 के मुकाबले 208 मतों से पारित हुआ। मतदान के दौरान रिपब्लिकन सांसद थॉमस मैसी, ब्रायन फिट्जपैट्रिक, टॉम बैरेट और वॉरेन डेविडसन ने पार्टी लाइन से हटकर प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया। इस नतीजे ने संकेत दिया है कि ईरान नीति को लेकर रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी मतभेद बढ़ रहे हैं। कांग्रेस की मंजूरी बिना युद्ध पर उठे सवाल विवाद की जड़ अमेरिकी सैन्य अभियान ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ है, जिसकी शुरुआत 28 फरवरी को हुई थी। आलोचकों का आरोप है कि व्हाइट हाउस ने इस सैन्य कार्रवाई के लिए कांग्रेस से औपचारिक मंजूरी नहीं ली। डेमोक्रेट सांसदों का कहना है कि अमेरिकी संविधान के अनुसार लंबे सैन्य अभियान के लिए कांग्रेस की स्वीकृति आवश्यक है। क्या है वॉर पावर्स रिजॉल्यूशन? प्रतिनिधि सभा द्वारा पारित यह प्रस्ताव ‘वॉर पावर्स रिजॉल्यूशन’ के तहत लाया गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राष्ट्रपति कांग्रेस की अनुमति के बिना लंबे समय तक किसी सैन्य संघर्ष में अमेरिका को शामिल न रख सकें। यह प्रस्ताव सीधे कानून नहीं बनता, लेकिन इसके जरिए राष्ट्रपति पर राजनीतिक और संवैधानिक दबाव बढ़ाया जा सकता है। अब सीनेट में होगी अगली परीक्षा हाउस से पारित होने के बाद यह प्रस्ताव अब सीनेट के पास जाएगा। वहां भी मंजूरी मिलने पर ट्रंप प्रशासन पर दबाव और बढ़ सकता है। अंतिम रूप से यह प्रस्ताव राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए नहीं भेजा जाता और सामान्य परिस्थितियों में इसे कानून का दर्जा नहीं मिलता। डेमोक्रेट सांसद बोले- संविधान की रक्षा जरूरी प्रस्ताव पेश करने वाले न्यूयॉर्क के डेमोक्रेट सांसद ग्रेगरी मीक्स ने कहा कि कांग्रेस अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभा रही है। उन्होंने कहा कि जब कार्यपालिका संविधान के अनुरूप काम नहीं करती, तब विधायिका का दायित्व है कि वह नियंत्रण और संतुलन की भूमिका निभाए। पहले टल गया था मतदान, अब बदल गए हालात इस प्रस्ताव पर मतदान मई में होना था, लेकिन उस समय इसे टाल दिया गया था। डेमोक्रेट नेताओं ने आरोप लगाया था कि रिपब्लिकन नेतृत्व प्रस्ताव की संभावित सफलता से चिंतित था। अब कुछ रिपब्लिकन सांसदों के समर्थन के साथ प्रस्ताव पारित होने से राजनीतिक समीकरण बदलते दिखाई दे रहे हैं। रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी बढ़ रही असहमति ईरान नीति के अलावा हाल के महीनों में ट्रंप प्रशासन के कई प्रस्तावों पर रिपब्लिकन सांसदों के बीच मतभेद सामने आए हैं। विश्लेषकों का मानना है कि विदेश नीति और सरकारी खर्चों को लेकर पार्टी के भीतर अलग-अलग धड़े खुलकर सामने आने लगे हैं। स्पीकर माइक जॉनसन ने किया विरोध प्रतिनिधि सभा के स्पीकर माइक जॉनसन ने प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा कि राष्ट्रपति की शक्तियों पर इस तरह के प्रतिबंध अमेरिका की कूटनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकते हैं। उनका तर्क था कि ईरान में सैन्य अभियान के उद्देश्य पूरे किए जा चुके हैं और अब शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए राष्ट्रपति को पर्याप्त स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। सैन्य अभियान की वैधानिक जांच भी शुरू इसी बीच पेंटागन, विदेश विभाग और यूएसएआईडी के महानिरीक्षकों ने ईरान से जुड़े सैन्य अभियान की संयुक्त समीक्षा शुरू कर दी है। निगरानी एजेंसियों का कहना है कि कानून के तहत 60 दिनों से अधिक समय तक चलने वाले सैन्य अभियानों की समीक्षा अनिवार्य होती है। इससे व्हाइट हाउस और कांग्रेस के बीच टकराव और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।
अमेरिकी अधिकारियों ने ईरान को संवेदनशील तकनीकी उपकरण उपलब्ध कराने के आरोप में अमेरिकी-ईरानी कारोबारी जमशीद घोमी को गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसियों का दावा है कि उन्होंने वर्षों तक अमेरिकी निर्यात प्रतिबंधों को दरकिनार करते हुए नेटवर्किंग और साइबर सुरक्षा से जुड़े उपकरण ईरान तक पहुंचाए। संघीय अधिकारियों के अनुसार, 63 वर्षीय घोमी कैलिफोर्निया के न्यूपोर्ट कोस्ट के निवासी हैं और तेहरान स्थित तकनीकी कंपनी फराज परदाज रायानेह (FPR) के संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं। निर्यात प्रतिबंधों को दरकिनार करने का आरोप अमेरिकी न्याय विभाग के मुताबिक, घोमी पर इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) समेत कई संघीय कानूनों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है। जांचकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने बिना आवश्यक सरकारी अनुमति के संवेदनशील अमेरिकी तकनीक ईरान भेजने के लिए एक संगठित तंत्र तैयार किया था। यूएई बना कथित ट्रांजिट हब अभियोजन पक्ष के अनुसार, उपकरणों को सीधे ईरान भेजने के बजाय पहले संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) स्थित कंपनियों और बिचौलियों तक पहुंचाया जाता था। वहां से उन्हें आगे ईरान भेजा जाता था। अधिकारियों का मानना है कि इस तरीके का इस्तेमाल वास्तविक खरीदारों और अंतिम उपयोगकर्ताओं की पहचान छिपाने के लिए किया गया। ऑनलाइन खरीदारी से शुरू हुआ ऑपरेशन जांच में सामने आया है कि शुरुआती दौर में कथित तौर पर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और डिजिटल भुगतान सेवाओं के माध्यम से बड़ी मात्रा में तकनीकी उपकरण खरीदे गए। बाद में अमेरिकी सप्लायरों से सीधे खरीदारी की गई और कई कंपनियों का उपयोग कर लेनदेन की वास्तविक प्रकृति को छिपाने का प्रयास किया गया। भारी मात्रा में हार्डवेयर भेजने का दावा संघीय जांच एजेंसियों का आरोप है कि कई वर्षों के दौरान बड़ी मात्रा में तकनीकी हार्डवेयर दुबई के रास्ते ईरान पहुंचाया गया। जांचकर्ताओं के अनुसार, शिपिंग रिकॉर्ड और दस्तावेजों में कथित रूप से गलत जानकारी दर्ज कर अंतिम गंतव्य को छिपाया गया। रक्षा और परमाणु संस्थानों तक पहुंचे उपकरण अदालती दस्तावेजों में दावा किया गया है कि भेजे गए कुछ उपकरण ईरान के परमाणु और रक्षा क्षेत्र से जुड़े संगठनों तक पहुंचे। अभियोजकों के अनुसार, इन संस्थाओं को नेटवर्किंग, संचार और एन्क्रिप्शन तकनीक उपलब्ध कराई गई हो सकती है। इन आरोपों की पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही होगी। पैसों के लेनदेन की भी जांच अमेरिकी एजेंसियां इस मामले से जुड़े वित्तीय लेनदेन की भी जांच कर रही हैं। आरोप है कि धन के प्रवाह को छिपाने के लिए शेल कंपनियों, जटिल कारोबारी संरचनाओं और कथित फर्जी दस्तावेजों का उपयोग किया गया। साथ ही आय और कारोबारी गतिविधियों से जुड़ी जानकारी को लेकर भी जांच जारी है। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला अमेरिकी न्याय विभाग ने इस मामले को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा विषय बताया है। विभाग का कहना है कि संवेदनशील तकनीक को प्रतिबंधित देशों तक पहुंचने से रोकना उसकी प्राथमिकता है। अधिकारियों ने संकेत दिया है कि ऐसे मामलों में आगे भी सख्त कार्रवाई की जाएगी। अदालत में साबित होंगे आरोप जमशीद घोमी के खिलाफ आरोपों की जांच और कानूनी प्रक्रिया जारी है। यदि अदालत में आरोप सिद्ध हो जाते हैं, तो उन्हें अमेरिकी संघीय कानूनों के तहत लंबी जेल की सजा हो सकती है। कानूनी सिद्धांतों के अनुसार अदालत में दोष साबित होने तक उन्हें निर्दोष माना जाएगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump की ताजा मेडिकल रिपोर्ट सार्वजनिक कर दी गई है। व्हाइट हाउस द्वारा जारी स्वास्थ्य रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रंप शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ हैं और राष्ट्रपति के रूप में अपनी सभी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में सक्षम हैं। हालांकि डॉक्टरों ने उन्हें वजन कम करने, नियमित व्यायाम करने और खान-पान में सुधार करने की सलाह भी दी है। व्हाइट हाउस ने जारी की मेडिकल रिपोर्ट व्हाइट हाउस ने शुक्रवार (29 मई) को राष्ट्रपति की वार्षिक स्वास्थ्य जांच से जुड़ी मेडिकल रिपोर्ट जारी की। राष्ट्रपति के चिकित्सक Sean Barbabella ने एक आधिकारिक मेमो में ट्रंप की स्वास्थ्य स्थिति की जानकारी दी। रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप के हृदय, फेफड़ों और मस्तिष्क की कार्यप्रणाली सामान्य पाई गई है। डॉक्टरों ने उनकी मानसिक क्षमता और संज्ञानात्मक स्थिति को भी संतोषजनक बताया है। राष्ट्रपति पद की जिम्मेदारियों के लिए पूरी तरह फिट मेडिकल रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ट्रंप राष्ट्रपति और कमांडर-इन-चीफ के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभाने के लिए पूरी तरह सक्षम हैं। डॉक्टरों का कहना है कि उनकी उम्र को देखते हुए स्वास्थ्य स्थिति अच्छी है और किसी गंभीर बीमारी या ऐसी समस्या के संकेत नहीं मिले हैं जो उनके सार्वजनिक दायित्वों को प्रभावित कर सके। वजन घटाने की सलाह रिपोर्ट में उनकी समग्र स्वास्थ्य स्थिति को सकारात्मक बताया गया है, लेकिन डॉक्टरों ने ट्रंप को वजन नियंत्रित करने की सलाह दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती उम्र में वजन कम करने से हृदय संबंधी जोखिम घट सकते हैं और शारीरिक क्षमता को लंबे समय तक बेहतर बनाए रखा जा सकता है। इसी वजह से उन्हें नियमित व्यायाम और संतुलित आहार अपनाने की सिफारिश की गई है। खान-पान और जीवनशैली में सुधार की जरूरत मेडिकल टीम ने ट्रंप को अपनी डाइट में सुधार करने और शारीरिक गतिविधियां बढ़ाने की सलाह दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, स्वस्थ जीवनशैली अपनाने से उनकी फिटनेस और बेहतर हो सकती है। डॉक्टरों ने यह भी कहा कि नियमित स्वास्थ्य जांच और सक्रिय दिनचर्या उनके दीर्घकालिक स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद रहेगी। 14 जून को 80 वर्ष के होंगे ट्रंप डोनाल्ड ट्रंप 14 जून को 80 वर्ष के हो जाएंगे। उनकी उम्र को लेकर अक्सर राजनीतिक और सार्वजनिक बहस होती रही है, खासकर तब जब वे अमेरिका के सबसे वरिष्ठ उम्र वाले नेताओं में शामिल हैं। ऐसे में व्हाइट हाउस की ओर से जारी यह मेडिकल रिपोर्ट उनकी स्वास्थ्य स्थिति को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब मानी जा रही है। उम्र को लेकर चर्चा के बीच आई रिपोर्ट अमेरिका में शीर्ष राजनीतिक नेताओं की उम्र और स्वास्थ्य पिछले कुछ वर्षों से महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दा बने हुए हैं। इसी संदर्भ में ट्रंप की स्वास्थ्य रिपोर्ट पर भी व्यापक नजर रखी जा रही थी। व्हाइट हाउस का कहना है कि मेडिकल जांच के निष्कर्ष बताते हैं कि राष्ट्रपति की शारीरिक और मानसिक स्थिति स्थिर है तथा वे अपने कार्यकाल की जिम्मेदारियों को प्रभावी ढंग से निभाने में सक्षम हैं।
अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump के जन्मदिन पर व्हाइट हाउस में बड़ा UFC फाइट इवेंट आयोजित किया जाएगा। इसके लिए व्हाइट हाउस के साउथ लॉन में विशाल फाइटिंग एरीना तैयार किया जा रहा है। मंगलवार को वहां बड़े क्रेन और लोहे के ढांचे लगाते हुए देखा गया। यह मुकाबला 14 जून को होगा, जो ट्रंप का 80वां जन्मदिन भी है। हजारों लोग लाइव देखेंगे मुकाबला ट्रंप ने बताया कि इस इवेंट में करीब 4,500 लोग सीधे व्हाइट हाउस लॉन में बैठकर मुकाबला देख सकेंगे। इसके अलावा व्हाइट हाउस के बाहर बड़ी स्क्रीन लगाई जाएंगी, जहां करीब 1 लाख लोग मुफ्त में मैच देख पाएंगे। ट्रंप बोले- ऐसा इवेंट पहले कभी नहीं हुआ इस महीने ओवल ऑफिस में हुए एक कार्यक्रम के दौरान ट्रंप ने कहा था कि यह बेहद बड़ा फाइट इवेंट होगा और ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। उन्होंने UFC के मशहूर ऑक्टागन रिंग की तस्वीर भी दिखाई थी, जिसके पीछे व्हाइट हाउस नजर आ रहा था। UFC फाइटिंग के बड़े फैन हैं ट्रंप डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से UFC मुकाबलों के समर्थक रहे हैं। वह कई बड़े फाइट इवेंट्स में हिस्सा लेते रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि UFC जैसे खेलों के जरिए ट्रंप युवा पुरुष वोटर्स के बीच अपनी लोकप्रियता बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। ‘UFC Freedom 250’ रखा गया इवेंट का नाम इस खास मुकाबले का नाम “UFC Freedom 250” रखा गया है। ट्रंप ने इसे अमेरिका की स्थापना की 250वीं वर्षगांठ से जुड़ा कार्यक्रम बताया है। UFC की ओर से पहले ही घोषणा की जा चुकी है कि मुख्य मुकाबले में Ilia Topuria और Justin Gaethje आमने-सामने होंगे। इस इवेंट पर खर्च होंगे करोड़ों डॉलर रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस आयोजन पर करीब 6 करोड़ डॉलर खर्च हो सकते हैं। व्हाइट हाउस का कहना है कि इस कार्यक्रम का पूरा खर्च UFC कंपनी उठाएगी और अमेरिकी टैक्सपेयर्स का पैसा इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। व्हाइट हाउस में पहले भी कर चुके हैं बड़े बदलाव यह आयोजन ट्रंप द्वारा व्हाइट हाउस में किए जा रहे बड़े बदलावों का हिस्सा माना जा रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इससे पहले रोज गार्डन की घास हटाई जा चुकी है और ईस्ट विंग में बड़ा बॉलरूम बनाने की योजना पर भी काम चल रहा है। युद्ध और महंगाई के बीच हो रहा बड़ा आयोजन यह इवेंट ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिका ईरान के साथ बढ़ते तनाव और महंगाई जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। इसी वजह से विपक्षी दल और कई विश्लेषक इस आयोजन को लेकर सवाल भी उठा रहे हैं।
Iran और United States के बीच कथित युद्ध को लेकर एक बड़ा दावा सामने आया है। अमेरिकी संसद से जुड़ी एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा जा रहा है कि ईरान पर 40 दिनों तक चले सैन्य अभियान के दौरान अमेरिका के 42 विमान या तो नष्ट हो गए या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुए। इस दावे के बाद वैश्विक स्तर पर अमेरिका की सैन्य क्षमता, युद्ध रणनीति और अभियान की वास्तविक कीमत को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। क्या कहा गया रिपोर्ट में? रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका और Israel ने मिलकर ईरान के खिलाफ कथित “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” चलाया था। इस अभियान के तहत हवाई, समुद्री और मिसाइल हमले किए गए। बताया गया कि इस संघर्ष में अमेरिका को भारी सैन्य नुकसान उठाना पड़ा। रिपोर्ट में जिन सैन्य संसाधनों के नुकसान का दावा किया गया, उनमें शामिल हैं: चार F-15E स्ट्राइक ईगल लड़ाकू विमान, एक F-35A लाइटनिंग द्वितीय लड़ाकू विमान, एक ए-10 थंडरबोल्ट द्वितीय हमला विमान, सात KC-135 स्ट्रैटोटैंकर ईंधन भरने वाले विमान, एक E-3 सेंट्री एडब्ल्यूएसीएस विमान, दो एमसी-130जे कमांडो द्वितीय विशेष अभियान विमान, एक एचएच-60डब्ल्यू जॉली ग्रीन द्वितीय हेलीकॉप्टर, 24 एमक्यू-9 रीपर ड्रोन और एक एमक्यू-4सी ट्राइटन ड्रोन शामिल हैं. रिपोर्ट में कहा गया कि आंकड़े आगे बदल सकते हैं क्योंकि कई सूचनाएं अब भी गोपनीय हैं। 29 अरब डॉलर तक पहुंची युद्ध लागत रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी रक्षा विभाग की सुनवाई में पेंटागन के कार्यवाहक कंट्रोलर Jules W. Hurst III ने कहा कि ईरान में सैन्य अभियान की लागत लगभग 29 अरब डॉलर तक पहुंच गई। ईरान ने क्या कहा? ईरान के विदेश मंत्री Seyed Abbas Araghchi ने इस रिपोर्ट को लेकर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अमेरिका ने खुद अपने भारी नुकसान को स्वीकार किया है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि: “ईरान की सेना दुनिया की पहली सेना बनी जिसने F-35 लड़ाकू विमान को मार गिराया।” अराघची ने दावा किया कि ईरान ने इस युद्ध से कई रणनीतिक सबक सीखे हैं और भविष्य में दुनिया को “और बड़े सरप्राइज” देखने को मिल सकते हैं। F-35 को गिराने का दावा कितना बड़ा? F-35 Lightning II को दुनिया के सबसे उन्नत स्टेल्थ फाइटर जेट्स में गिना जाता है। यदि किसी देश द्वारा इसे मार गिराने का दावा सही साबित होता है, तो यह आधुनिक सैन्य इतिहास की बड़ी घटनाओं में शामिल हो सकता है। हालांकि अमेरिका की ओर से अब तक सार्वजनिक रूप से ऐसे किसी नुकसान की विस्तृत पुष्टि नहीं की गई है। वैश्विक स्तर पर बढ़ी चिंता विश्लेषकों का मानना है कि यदि रिपोर्ट में किए गए दावे सही हैं, तो यह मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन और आधुनिक हवाई युद्ध की रणनीतियों पर बड़ा असर डाल सकता है। ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच बढ़ता तनाव पहले ही वैश्विक ऊर्जा बाजार, समुद्री सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित कर रहा है।
अमेरिका के San Diego में स्थित सबसे बड़ी मस्जिद Islamic Center of San Diego के बाहर हुई गोलीबारी की घटना में कुल पांच लोगों की मौत हो गई। घटना के बाद पूरे इलाके में अफरा-तफरी और दहशत का माहौल है। स्थानीय पुलिस और Federal Bureau of Investigation (FBI) मामले की संयुक्त जांच कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मस्जिद के पास हुई फायरिंग में तीन लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। बाद में पुलिस को घटनास्थल के करीब खड़े एक वाहन में दो किशोर संदिग्ध मृत अवस्था में मिले। शुरुआती जांच में माना जा रहा है कि दोनों ने खुद को गोली मारी। 17 और 19 साल के थे संदिग्ध सैन डिएगो पुलिस प्रमुख Scott Wahl ने बताया कि मृत पाए गए दोनों युवकों की उम्र 17 और 19 वर्ष थी। उन्होंने कहा कि मस्जिद परिसर में मौजूद बच्चे और अन्य लोग पूरी तरह सुरक्षित हैं। पुलिस के अनुसार, दोनों संदिग्धों की मौत संभवतः आत्मघाती गोलीबारी के कारण हुई है। अधिकारियों ने अभी तक उनकी पहचान सार्वजनिक नहीं की है। FBI ने शुरू की गहन जांच FBI के सैन डिएगो कार्यालय के विशेष एजेंट Mark Remley ने कहा कि घटना के हर पहलू की जांच की जा रही है। उन्होंने बताया कि यह पता लगाया जा रहा है कि हमले के पीछे कोई व्यापक साजिश या अन्य लोग शामिल थे या नहीं। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मारे गए तीन लोगों में मस्जिद का एक सिक्योरिटी गार्ड भी शामिल है। हथियार पर मिले घृणास्पद संदेश जांच एजेंसियों के मुताबिक, संदिग्धों में से एक युवक अपने माता-पिता के घर से हथियार लेकर निकला था। अधिकारियों को एक कथित सुसाइड नोट भी मिला है, जिसमें नस्लीय श्रेष्ठता और घृणा से जुड़े विचार लिखे गए थे। इसके अलावा घटना में इस्तेमाल किए गए एक हथियार पर आपत्तिजनक और नफरत फैलाने वाले शब्द लिखे मिले हैं। इसी वजह से जांच एजेंसियां इस घटना को संभावित “हेट क्राइम” के तौर पर भी देख रही हैं। मस्जिद और आसपास बढ़ाई गई सुरक्षा घटना के बाद मस्जिद और आसपास के क्षेत्रों में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। पुलिस इलाके की निगरानी कर रही है और लोगों से अफवाहों से बचने की अपील की गई है। अधिकारियों का कहना है कि जांच अभी शुरुआती चरण में है और आने वाले दिनों में मामले से जुड़े और खुलासे हो सकते हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने दावा किया है कि आतंकवादी संगठन Islamic State के वैश्विक स्तर के दूसरे सबसे बड़े कमांडर अबू-बिलाल अल-मिनुकी को अमेरिकी और नाइजीरियाई सेनाओं के संयुक्त ऑपरेशन में मार गिराया गया है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘Truth Social’ पर इस ऑपरेशन की जानकारी देते हुए कहा कि यह मिशन उनके निर्देश पर बेहद गुप्त और जटिल तरीके से अंजाम दिया गया। ‘अफ्रीका में छिपने की कोशिश कर रहा था’ ट्रंप ने कहा कि अबू-बिलाल अल-मिनुकी अफ्रीका में छिपकर ISIS के वैश्विक नेटवर्क को संचालित करने की कोशिश कर रहा था, लेकिन अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने उसकी गतिविधियों और लोकेशन को ट्रैक कर लिया। उन्होंने लिखा, “दुनिया के सबसे सक्रिय आतंकवादियों में से एक को खत्म करने के लिए अमेरिकी सेना और नाइजीरिया की सशस्त्र सेनाओं ने बेहद सटीक और कठिन मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया।” ISIS के ग्लोबल ऑपरेशन को बड़ा झटका ट्रंप के अनुसार, अबू-बिलाल अल-मिनुकी ISIS के वैश्विक संचालन में अहम भूमिका निभा रहा था और वह अमेरिकी हितों को निशाना बनाने की साजिशों में भी शामिल था। उन्होंने कहा, “उसकी मौत के बाद ISIS के वैश्विक ऑपरेशन को बड़ा नुकसान पहुंचा है।” नाइजीरिया सरकार को दिया धन्यवाद ट्रंप ने इस अभियान में सहयोग के लिए Nigeria सरकार और वहां की सेना का धन्यवाद भी किया। उन्होंने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की साझेदारी लगातार मजबूत हो रही है। लंबे समय से तलाश में था आतंकी रिपोर्ट्स के मुताबिक, अबू-बिलाल अल-मिनुकी लंबे समय से अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की निगरानी में था। वह अफ्रीका के विभिन्न हिस्सों में लगातार अपना ठिकाना बदल रहा था। अमेरिकी अधिकारियों का मानना था कि वह ISIS के नेटवर्क को फिर से संगठित करने और नए हमलों की योजना बनाने में जुटा हुआ था। वैश्विक आतंकवाद पर अमेरिका का बड़ा संदेश विशेषज्ञों का मानना है कि यह ऑपरेशन अमेरिका की आतंकवाद विरोधी नीति के तहत एक बड़ा संदेश माना जा रहा है। मध्य पूर्व और अफ्रीका में ISIS की गतिविधियों को लेकर हाल के महीनों में चिंता बढ़ी थी। ऐसे में इस कार्रवाई को आतंकवादी नेटवर्क के खिलाफ बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने एक बार फिर पूर्व राष्ट्रपति Joe Biden पर निशाना साधते हुए दावा किया कि उनके कार्यकाल में अमेरिका ने तेज़ प्रगति की, जबकि देश की गिरावट बाइडेन प्रशासन के दौरान हुई। ट्रंप ने चीन के राष्ट्रपति Xi Jinping के उस बयान का जिक्र किया जिसमें अमेरिका को “गिरावट की ओर बढ़ता देश” बताया गया था। ट्रंप ने कहा कि वह शी जिनपिंग की बात से “100 फीसदी सहमत” हैं, लेकिन यह टिप्पणी उनके कार्यकाल पर नहीं बल्कि बाइडेन सरकार के दौर पर लागू होती है। ‘बाइडेन के समय देश कमजोर हुआ’ ट्रंप ने कहा कि बाइडेन प्रशासन के चार वर्षों में अमेरिका को आर्थिक और सामाजिक स्तर पर काफी नुकसान हुआ। उन्होंने आरोप लगाया कि खुली सीमाओं, ज्यादा टैक्स, गलत व्यापार समझौतों और बढ़ते अपराध ने देश को कमजोर किया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर किए गए पोस्ट में ट्रंप ने ट्रांसजेंडर नीतियों, महिलाओं के खेलों में पुरुषों की भागीदारी और DEI (डाइवर्सिटी, इक्विटी और इन्क्लूजन) नीतियों की भी आलोचना की। ‘मेरे नेतृत्व में अमेरिका ने जबरदस्त उछाल देखा’ ट्रंप ने दावा किया कि उनके नेतृत्व में अमेरिका ने केवल 16 महीनों में बड़ी आर्थिक सफलता हासिल की। उन्होंने कहा कि शेयर बाजार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा, 401K निवेश मजबूत हुए और अमेरिका फिर से आर्थिक ताकत के रूप में उभरा। उन्होंने यह भी कहा कि उनके कार्यकाल में अमेरिकी सेना दुनिया की सबसे शक्तिशाली बनी रही और ईरान के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया गया। ट्रंप ने वेनेजुएला के साथ रिश्तों में सुधार और रिकॉर्ड निवेश आने का भी दावा किया। ‘शी जिनपिंग ने दी थी बधाई’ ट्रंप ने अपने बयान में दावा किया कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने खुद उनकी उपलब्धियों के लिए उन्हें बधाई दी थी। उन्होंने कहा कि उनके शासनकाल में रोजगार के अवसर बढ़े और कई नीतिगत बदलावों ने अमेरिका को मजबूत बनाया। हालांकि ट्रंप के इन दावों पर विपक्षी डेमोक्रेटिक नेताओं की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
अमेरिका में Donald Trump प्रशासन ने एक बड़ा और सख्त कदम उठाने का फैसला किया है. अब उन अमेरिकी नागरिकों के पासपोर्ट रद्द किए जाएंगे, जिन पर बच्चों की देखभाल के लिए दिए जाने वाले “चाइल्ड सपोर्ट” का भारी बकाया है. अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने साफ किया है कि यह कार्रवाई उन लोगों पर केंद्रित होगी जो लंबे समय से भुगतान नहीं कर रहे हैं. क्या है नया नियम? अमेरिकी विदेश मंत्रालय के अनुसार, जिन माता-पिता पर 2,500 डॉलर (करीब 2.36 लाख रुपये) से ज्यादा का चाइल्ड सपोर्ट बकाया है, उनका पासपोर्ट रद्द किया जा सकता है. यह कार्रवाई अमेरिकी स्वास्थ्य एवं मानव सेवा विभाग (HHS) के साथ मिलकर की जाएगी. रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह प्रक्रिया जल्द शुरू हो सकती है और हजारों लोग इसकी चपेट में आ सकते हैं. क्या होता है चाइल्ड सपोर्ट? अमेरिका में तलाक या अलग रहने की स्थिति में अदालत यह तय करती है कि बच्चे की पढ़ाई, इलाज, खाना, कपड़े और दूसरी जरूरतों के लिए माता-पिता में से किसे कितनी आर्थिक सहायता देनी होगी. इसी भुगतान को “चाइल्ड सपोर्ट” कहा जाता है. अगर कोई अभिभावक लंबे समय तक यह राशि नहीं देता, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है. विदेश मंत्रालय ने क्या कहा? अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने कहा कि अमेरिकी कानून के तहत पासपोर्ट पाने या बनाए रखने के लिए चाइल्ड सपोर्ट से जुड़े दायित्वों का पालन करना जरूरी है. मंत्रालय के मुताबिक: 2,500 डॉलर से ज्यादा बकाया होने पर पासपोर्ट रद्द किया जा सकता है बकाया चुकाए बिना नया पासपोर्ट जारी नहीं होगा रद्द पासपोर्ट यात्रा के लिए मान्य नहीं रहेगा सरकार का कहना है कि यह कदम माता-पिता को बच्चों के प्रति अपनी “कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी” निभाने के लिए प्रेरित करेगा. विदेश में फंसे लोगों के साथ क्या होगा? अगर किसी व्यक्ति का पासपोर्ट उस समय रद्द किया जाता है जब वह अमेरिका से बाहर हो, तो उसे अमेरिकी दूतावास या वाणिज्य दूतावास से संपर्क करना होगा. वहां से उसे केवल अमेरिका लौटने के लिए एक इमरजेंसी ट्रैवल डॉक्युमेंट दिया जाएगा. पहले क्या नियम था? अब तक आमतौर पर यह कार्रवाई केवल तब होती थी जब कोई व्यक्ति अपना पासपोर्ट रिन्यू कराने की कोशिश करता था. लेकिन नए फैसले के बाद सरकार सीधे सक्रिय होकर ऐसे लोगों के पासपोर्ट रद्द कर सकती है, जिन पर बड़ा बकाया है. लोगों को क्या सलाह दी गई? अमेरिकी अधिकारियों ने प्रभावित लोगों को सलाह दी है कि वे संबंधित एजेंसियों से संपर्क कर जल्द भुगतान व्यवस्था तय करें, ताकि पासपोर्ट रद्द होने जैसी कार्रवाई से बचा जा सके. विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन का यह कदम बच्चों के आर्थिक अधिकारों को मजबूत करने और बकाया भुगतान वसूलने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ जारी तनाव के बीच अपने ही सहयोगी देशों पर सख्त रुख अपना लिया है। ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि वे इटली और स्पेन में तैनात अमेरिकी सैनिकों की संख्या कम कर सकते हैं। इस बयान के बाद नाटो के भीतर हलचल तेज हो गई है। “साथ नहीं देंगे तो क्यों रखें फौज?” ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने साफ कहा कि अगर सहयोगी देश ईरान मुद्दे पर अमेरिका का साथ नहीं देते, तो वहां अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी पर सवाल उठना लाजिमी है। उन्होंने कहा, “शायद मैं ऐसा करूंगा… आखिर क्यों नहीं?” ट्रंप का आरोप है कि: इटली ने ईरान संकट में कोई खास सहयोग नहीं किया स्पेन का रवैया “बहुत खराब” रहा ईरान जंग से बढ़ी दरार यह विवाद तब गहराया जब अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया। नाटो के कई सदस्य देश इस युद्ध में सीधे शामिल होने से बच रहे हैं, जिससे ट्रंप नाराज हैं। ट्रंप चाहते हैं कि सहयोगी देश खासतौर पर: होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने में मदद करें समुद्री सुरक्षा और तेल सप्लाई बहाल करने में भूमिका निभाएं यूरोप में अमेरिकी सेना की मौजूदगी ताजा आंकड़ों (31 दिसंबर 2025) के अनुसार: जर्मनी: 36,436 अमेरिकी सैनिक इटली: 12,662 सैनिक स्पेन: 3,814 सैनिक ट्रंप का कहना है कि ये देश अपनी रक्षा पर पर्याप्त खर्च नहीं कर रहे और अमेरिका पर निर्भर हैं। मेलोनी पर सीधा हमला ट्रंप ने जॉर्जिया मेलोनी को भी निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि मेलोनी में ईरान मामले पर “साहस की कमी” है। वहीं, स्पेन को लेकर नाराजगी इतनी ज्यादा बताई जा रही है कि कुछ रिपोर्ट्स में अमेरिका द्वारा उसे नाटो से बाहर करने के विकल्पों पर विचार की बात कही गई है (हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं है)। जर्मनी से भी टकराव ट्रंप ने फ्रेडरिक मर्ज पर भी सोशल मीडिया के जरिए निशाना साधा। उन्होंने कहा कि जर्मनी को दूसरे देशों के मामलों में टिप्पणी करने के बजाय अपने देश की ऊर्जा और इमिग्रेशन समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए। जर्मन नेतृत्व ने हालांकि साफ किया है कि: वे अमेरिका के साथ साझेदारी बनाए रखना चाहते हैं लेकिन सैन्य कार्रवाई के तरीके पर उनके अलग विचार हो सकते हैं यूरोप की प्रतिक्रिया जोहान वेडफुल ने कहा कि वे अमेरिकी सैनिकों की संभावित कटौती के लिए तैयार हैं और इस मुद्दे पर नाटो के भीतर चर्चा जारी है। यूरोपीय देशों का रुख फिलहाल संतुलन बनाए रखने का है–वे अमेरिका से दूरी भी नहीं बनाना चाहते और युद्ध में सीधे कूदने से भी बच रहे हैं। वैश्विक असर: तेल और बाजार पर दबाव ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई और होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा के कारण: वैश्विक तेल सप्लाई प्रभावित हुई है कीमतों में तेजी देखी जा रही है ऊर्जा संकट गहराने की आशंका बढ़ी है इसके अलावा स्पेन ने गाजा के लिए जा रहे सहायता जहाजों को रोकने पर इजरायल की आलोचना भी की है, जिससे अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच मतभेद और बढ़ गए हैं। क्या बदल सकता है NATO समीकरण? यह पूरा घटनाक्रम नाटो के अंदर नई दरारों की ओर इशारा करता है। अगर अमेरिका सच में यूरोप से अपनी सैन्य मौजूदगी कम करता है, तो: यूरोप को अपनी सुरक्षा रणनीति बदलनी पड़ेगी नाटो की एकजुटता पर असर पड़ सकता है वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव आ सकता है
बंद कमरे की बैठकों में उठाए गंभीर सवाल अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ईरान युद्ध को लेकर ट्रंप प्रशासन के भीतर नई बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वेंस को आशंका है कि रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को युद्ध की वास्तविक स्थिति से अलग तस्वीर दिखा रहे हैं। बताया जा रहा है कि निजी बैठकों में वेंस ने सवाल उठाया कि क्या पेंटागन ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान की वास्तविक स्थिति बता रहा है या केवल सकारात्मक तस्वीर पेश की जा रही है। मिसाइल भंडार को लेकर बढ़ी चिंता वेंस की सबसे बड़ी चिंता अमेरिकी मिसाइल भंडार को लेकर है। उनका मानना है कि ईरान युद्ध में बड़ी मात्रा में हथियार खर्च हो रहे हैं, जिससे भविष्य में चीन, रूस या उत्तर कोरिया जैसे देशों के साथ संभावित संघर्ष की स्थिति में अमेरिका कमजोर पड़ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, वेंस ने यह चिंता सीधे राष्ट्रपति ट्रंप के सामने भी रखी है। हेगसेथ पर सीधे आरोप से बच रहे वेंस हालांकि, जेडी वेंस ने अब तक सार्वजनिक रूप से पीट हेगसेथ की आलोचना नहीं की है। उन्होंने कई मौकों पर रक्षा मंत्री की तारीफ भी की है। सूत्रों का कहना है कि वेंस इस मुद्दे को व्यक्तिगत टकराव में बदलने से बचना चाहते हैं। लेकिन उनके करीबी मानते हैं कि पेंटागन की तरफ से पेश की जा रही तस्वीर जरूरत से ज्यादा आशावादी है। खुफिया रिपोर्ट और दावों में अंतर पीट हेगसेथ लगातार दावा कर रहे हैं कि अमेरिका ने ईरान की वायुसेना, नौसेना और रक्षा ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया है। लेकिन आंतरिक खुफिया आकलनों में तस्वीर कुछ अलग बताई जा रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान अब भी अपनी वायुसेना और मिसाइल क्षमता का बड़ा हिस्सा बचाने में सफल रहा है। 2028 की राजनीति पर भी असर विश्लेषकों का मानना है कि जेडी वेंस का राजनीतिक भविष्य भी इस युद्ध के नतीजों से जुड़ा हुआ है। यदि ईरान युद्ध लंबा खिंचता है या अमेरिका को भारी नुकसान उठाना पड़ता है, तो इसका असर 2028 के राष्ट्रपति चुनाव में वेंस की संभावनाओं पर पड़ सकता है। ट्रंप प्रशासन में बढ़ सकती है खींचतान ईरान युद्ध को लेकर व्हाइट हाउस के भीतर मतभेद सामने आने से साफ है कि ट्रंप प्रशासन के शीर्ष स्तर पर रणनीति को लेकर एकराय नहीं है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि ट्रंप अपने उपराष्ट्रपति की चिंताओं को कितना महत्व देते हैं और पेंटागन की रणनीति में कोई बदलाव करते हैं या नहीं।
ब्रिटेन के सम्राट Charles III और महारानी Camilla चार दिवसीय राजकीय यात्रा पर अमेरिका पहुंच गए हैं। यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब हाल ही में व्हाइट हाउस संवाददाता डिनर में गोलीबारी हुई और ईरान को लेकर अमेरिका-ब्रिटेन के रिश्तों में तनाव देखा जा रहा है। ऐतिहासिक दौरा यह किंग चार्ल्स के शासनकाल का अब तक का सबसे महत्वपूर्ण विदेशी दौरा माना जा रहा है। यह यात्रा अमेरिका की स्वतंत्रता की 250वीं वर्षगांठ के अवसर पर हो रही है। ब्रिटिश सम्राट की यह अमेरिका यात्रा पिछले दो दशकों में पहली है। ट्रंप से निजी मुलाकात वॉशिंगटन पहुंचने के बाद किंग चार्ल्स और क्वीन कैमिला ने राष्ट्रपति Donald Trump और प्रथम महिला Melania Trump से निजी मुलाकात की। ट्रंप लंबे समय से ब्रिटिश शाही परिवार के प्रशंसक रहे हैं। कार्यक्रम में क्या खास? अमेरिकी कांग्रेस को संबोधित करेंगे व्हाइट हाउस में भव्य राजकीय भोज न्यूयॉर्क में 9/11 स्मारक पर श्रद्धांजलि वर्जीनिया में पर्यावरण संरक्षण परियोजनाओं का दौरा किंग चार्ल्स अमेरिकी कांग्रेस को संबोधित करने वाले इतिहास के केवल दूसरे ब्रिटिश सम्राट बनेंगे। सुरक्षा के बीच जारी दौरा हाल ही में White House Correspondents' Association Dinner में हुई गोलीबारी के बाद सुरक्षा बढ़ा दी गई है। Buckingham Palace ने अमेरिकी अधिकारियों के साथ समीक्षा के बाद यात्रा को तय कार्यक्रम के अनुसार जारी रखने का फैसला किया। ईरान मुद्दे पर तनाव ईरान को लेकर अमेरिका और ब्रिटेन के बीच हालिया मतभेदों ने इस यात्रा को और महत्वपूर्ण बना दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ब्रिटेन के रुख पर सार्वजनिक नाराजगी जताई थी, हालांकि हाल के दिनों में उनके बयान कुछ नरम पड़े हैं। कैंसर उपचार के बीच सक्रियता 77 वर्षीय किंग चार्ल्स कैंसर का इलाज करा रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद वे अपने सार्वजनिक दायित्वों को निभा रहे हैं। "स्पेशल रिलेशनशिप" की परीक्षा ब्रिटिश प्रधानमंत्री Keir Starmer की सरकार इस दौरे को अमेरिका और ब्रिटेन के बीच "स्पेशल रिलेशनशिप" को मजबूत करने के अवसर के रूप में देख रही है। यह दौरा दोनों देशों के रिश्तों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
ट्रंप प्रशासन ने बदली मृत्युदंड नीति United States में संघीय स्तर पर मृत्युदंड को लेकर बड़ा फैसला लिया गया है। अमेरिकी न्याय विभाग ने अब फायरिंग स्क्वॉड, गैस एस्फिक्सिएशन और इलेक्ट्रोक्यूशन को भी फेडरल एक्जीक्यूशन के वैकल्पिक तरीकों में शामिल करने का निर्देश दिया है। न्याय विभाग ने जारी किया नया मेमो 48 पन्नों के आधिकारिक मेमो में कहा गया है कि इस कदम से मृत्युदंड प्रणाली और मजबूत होगी। सरकार का मानना है कि इससे जघन्य अपराधों पर अंकुश लगेगा, पीड़ितों को न्याय मिलेगा और उनके परिवारों को लंबे समय से प्रतीक्षित संतोष प्राप्त होगा। United States Department of Justice ने स्पष्ट किया कि यह बदलाव भविष्य में किसी एक विशेष दवा की अनुपलब्धता की स्थिति से निपटने के लिए भी जरूरी है। बाइडेन ने लगाई थी रोक पूर्व राष्ट्रपति Joe Biden ने अपने कार्यकाल में अधिकांश संघीय फांसियों पर रोक लगा दी थी। पद छोड़ने से पहले उन्होंने 40 में से 37 संघीय मौत की सजा पाए कैदियों की सजा को कम कर दिया था। ट्रंप ने लौटते ही बदला फैसला राष्ट्रपति Donald Trump लंबे समय से मृत्युदंड के समर्थक रहे हैं। जनवरी 2025 में सत्ता में वापसी के पहले ही दिन उन्होंने न्याय विभाग को फिर से संघीय स्तर पर मृत्युदंड लागू करने का निर्देश दिया था। उनका आदेश विशेष रूप से आतंकवादियों, बच्चों के हत्यारों और पुलिसकर्मियों की हत्या करने वालों पर केंद्रित है। लीथल इंजेक्शन रहेगा मुख्य तरीका हालांकि, पेंटोबार्बिटल के जरिए लीथल इंजेक्शन अब भी प्राथमिक तरीका बना रहेगा। न्याय विभाग ने इसे "गोल्ड स्टैंडर्ड" बताया है। लेकिन दवा की उपलब्धता और इसकी मानवीयता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। डेमोक्रेटिक सीनेटर Dick Durbin ने इस फैसले को क्रूर, अनैतिक और भेदभावपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि यह अमेरिका के इतिहास पर एक काला धब्बा साबित होगा। कई राज्यों में पहले से लागू अमेरिका के कई राज्यों में पहले से वैकल्पिक मृत्युदंड के तरीके अपनाए जा रहे हैं। 2024 में Alabama नाइट्रोजन गैस से फांसी देने वाला पहला राज्य बना था। वहीं, पांच राज्यों में फायरिंग स्क्वॉड की व्यवस्था पहले से मौजूद है। यह फैसला अमेरिका में मृत्युदंड पर जारी बहस को और तेज कर सकता है।
अमेरिका और ईरान के बीच लंबे तनाव और हालिया संघर्षविराम के बाद अब अमेरिकी राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर विपक्षी दबाव तेजी से बढ़ रहा है, जहां 85 से अधिक सांसदों ने उनके इस्तीफे की मांग कर दी है। क्यों उठी इस्तीफे की मांग? रिपोर्ट्स के अनुसार, डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों का आरोप है कि: ट्रंप ने ईरान युद्ध को लेकर बार-बार अपनी रणनीति बदली उनकी भाषा और सार्वजनिक बयानबाजी पर सवाल उठे हालिया सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर भी विवाद बढ़ा सांसदों का कहना है कि इन परिस्थितियों में राष्ट्रपति की निर्णय लेने की क्षमता पर सवाल खड़े होते हैं। 40 दिन के युद्ध के बाद सीजफायर अमेरिका-ईरान के बीच करीब 40 दिन तक चले तनाव के बाद संघर्षविराम हुआ। हालांकि इस दौरान: अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा वैश्विक स्तर पर तेल और सुरक्षा को लेकर चिंता बनी रही युद्ध खत्म होने के बाद भी अमेरिका के भीतर राजनीतिक माहौल शांत नहीं हुआ है। क्या है 25वां संशोधन? ट्रंप को हटाने के लिए अमेरिकी संविधान के 25वां संशोधन की चर्चा तेज हो गई है। इसकी धारा-4 के तहत: उपराष्ट्रपति और कैबिनेट के बहुमत राष्ट्रपति को “असमर्थ” घोषित कर सकते हैं इसके बाद उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति बन सकता है अंतिम निर्णय के लिए कांग्रेस में दो-तिहाई बहुमत जरूरी होता है क्या सच में जा सकती है कुर्सी? विशेषज्ञों के अनुसार: सिर्फ 85 सांसदों की मांग से राष्ट्रपति को हटाना आसान नहीं है इसके लिए उपराष्ट्रपति और कैबिनेट का समर्थन जरूरी है साथ ही कांग्रेस में भारी बहुमत चाहिए इसलिए फिलहाल ट्रंप की कुर्सी पर तत्काल खतरा नहीं माना जा रहा, लेकिन राजनीतिक दबाव जरूर बढ़ गया है। आगे क्या? आने वाले दिनों में अमेरिकी राजनीति में टकराव बढ़ सकता है अगर विपक्ष और मजबूत होता है, तो संवैधानिक प्रक्रिया तेज हो सकती है फिलहाल यह मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बना हुआ है
न्यूयॉर्क कोर्ट में गवाही, कहा– ‘परिवार को धमकी मिली, मजबूरी में माना काम’ अमेरिका की एक संघीय अदालत में चल रहे आतंकी साजिश के मामले में बड़ा खुलासा हुआ है। पाकिस्तान के एक कारोबारी ने दावा किया है कि उसे ईरान की अर्धसैनिक संस्था Islamic Revolutionary Guard Corps (आईआरजीसी) के एक हैंडलर ने वर्ष 2024 में अमेरिका के शीर्ष नेताओं की हत्या की साजिश के लिए भर्ती किया था। आरोपी आसिफ मर्चेंट ने अदालत में कहा कि उसका परिवार खतरे में था और उसके पास इस काम को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। किन नेताओं को बनाया गया निशाना? अदालत में दी गई गवाही के अनुसार, साजिश के निशाने पर अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति Donald Trump, तत्कालीन राष्ट्रपति Joe Biden और पूर्व संयुक्त राष्ट्र राजदूत Nikki Haley थे। गौरतलब है कि आईआरजीसी को अमेरिका पहले ही “विदेशी आतंकी संगठन” घोषित कर चुका है। यह संगठन ईरान के सर्वोच्च नेता रहे Ayatollah Ali Khamenei के कार्यकाल में काफी प्रभावशाली बना। हाल ही में अमेरिका-इजराइल हमलों में खामेनेई की मौत की खबरों के बीच यह मामला और संवेदनशील हो गया है। अदालत में क्या बोला आरोपी? 47 वर्षीय आसिफ मर्चेंट ने न्यूयॉर्क की अदालत में उर्दू दुभाषिए के माध्यम से जूरी के सामने बयान दिया। उसने कहा, “मेरे परिवार को धमकी दी गई थी, इसलिए मुझे यह करना पड़ा।” मर्चेंट को 12 जुलाई 2024 को गिरफ्तार किया गया था। उसने अदालत में यह भी दावा किया कि उसे पहले से अंदेशा था कि वह पकड़ा जाएगा और वह बाद में अमेरिकी एजेंसियों के साथ सहयोग करने की योजना बना चुका था। एफबीआई के अंडरकवर एजेंट बने ‘सुपारी किलर’ मर्चेंट ने खुद किसी नेता की हत्या करने की योजना नहीं बनाई थी, बल्कि वह कथित रूप से योजना तैयार करने और गतिविधियों की जानकारी जुटाने का काम कर रहा था। उसने ट्रंप की रैलियों और उनकी आवाजाही की जानकारी जुटाई थी। रिपोर्ट के अनुसार, उसने दो ‘सुपारी किलर’ तय किए थे और उन्हें 5,000 डॉलर देने की व्यवस्था भी की थी। लेकिन जिन लोगों को वह हत्यारा समझ रहा था, वे वास्तव में Federal Bureau of Investigation (एफबीआई) के अंडरकवर एजेंट निकले। इसी वजह से पूरी साजिश नाकाम हो गई। अभियोजन पक्ष का तर्क सरकारी वकील नीना गुप्ता ने जिरह के दौरान मर्चेंट से सीधे सवाल किया कि क्या वह अमेरिका किसी राजनेता की हत्या के लिए माफिया से संपर्क करने आया था। इस पर मर्चेंट ने “हां” में जवाब दिया। हालांकि अभियोजन पक्ष का कहना है कि अगर मर्चेंट सचमुच मजबूर था, तो उसने गिरफ्तारी से पहले कानून प्रवर्तन एजेंसियों से संपर्क क्यों नहीं किया। इस पर आरोपी ने कहा कि उसे लगा एजेंसियां उसकी बात पर विश्वास नहीं करेंगी, क्योंकि उन्हें शक था कि वह “कोई सुपर जासूस” है। दो देशों में परिवार, लंबा कारोबारी करियर अदालत में बताया गया कि मर्चेंट का पाकिस्तान में 20 साल का बैंकिंग करियर रहा है। वह कपड़ा कारोबार, कार बिक्री, केला निर्यात और इंसुलेशन आयात जैसे कई व्यवसायों से जुड़ा रहा है। उसके दो परिवार हैं-एक पाकिस्तान में और दूसरा ईरान में। मर्चेंट का दावा है कि ईरान में उसके परिवार को खतरे में डालकर उस पर दबाव बनाया गया। अमेरिका-ईरान तनाव के बीच बढ़ी गंभीरता यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर है। मध्य पूर्व के कई देशों में हमलों और जवाबी कार्रवाई की खबरें आ रही हैं। ऐसे में यह साजिश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक और सुरक्षा चिंताओं को और बढ़ा सकती है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।