MeitY

Government takes action against illegal OTT platforms, blocking 50 services over obscene content and IT Act violations.
50 OTT प्लेटफॉर्म्स पर सरकार की बड़ी कार्रवाई, अश्लील कंटेंट के आरोप में किए ब्लॉक; जानिए क्या है पूरा मामला

केंद्र सरकार ने इंटरनेट पर अश्लील और गैर-कानूनी कंटेंट के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए पिछले दो वर्षों में 50 OTT प्लेटफॉर्म्स को ब्लॉक कर दिया है। लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, इन प्लेटफॉर्म्स पर सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम और अन्य लागू भारतीय कानूनों का उल्लंघन करने का आरोप था। सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य इंटरनेट को सभी नागरिकों, विशेषकर बच्चों के लिए अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और भरोसेमंद बनाना है। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने लोकसभा में लिखित जवाब के माध्यम से बताया कि सरकार डिजिटल सुरक्षा को मजबूत करने के लिए लगातार सख्त कदम उठा रही है। उन्होंने कहा कि सरकार की प्राथमिकता ऐसा डिजिटल इकोसिस्टम तैयार करना है, जहां बच्चों सहित सभी इंटरनेट उपयोगकर्ताओं को सुरक्षित और जिम्मेदार ऑनलाइन वातावरण मिल सके। अश्लील कंटेंट पर सरकार की सख्ती इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के अनुसार, जिन 50 OTT प्लेटफॉर्म्स को ब्लॉक किया गया, वे अश्लील सामग्री उपलब्ध कराने और आईटी कानूनों के उल्लंघन में शामिल पाए गए थे। इन प्लेटफॉर्म्स पर सार्वजनिक पहुंच पूरी तरह रोक दी गई है ताकि आम लोग अब इन्हें एक्सेस न कर सकें। सरकार ने स्पष्ट किया कि यह कार्रवाई सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000, भारतीय न्याय संहिता (BNS) तथा महिलाओं के अश्लील चित्रण (निषेध) अधिनियम, 1986 के तहत की गई है। किन कानूनों के तहत हुई कार्रवाई? MeitY के मुताबिक, इन OTT प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ मुख्य रूप से: IT Act की धारा 67 और 67A भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 294 अन्य लागू कानूनी प्रावधान के तहत कार्रवाई की गई। सरकार का कहना है कि इंटरनेट पर अवैध और अश्लील सामग्री के प्रसार को रोकना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है। नए IT Rules 2021 में क्या है प्रावधान? सरकार ने यह भी बताया कि आईटी नियम, 2021 के तहत यदि किसी अदालत या सरकार द्वारा किसी गैर-कानूनी कंटेंट को हटाने का आदेश जारी किया जाता है, तो संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म या डिजिटल सेवा प्रदाता को 3 घंटे के भीतर उस सामग्री को हटाना अनिवार्य होगा। इस नियम का उद्देश्य ऑनलाइन अवैध कंटेंट पर तेजी से कार्रवाई सुनिश्चित करना है। बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा पर विशेष जोर सरकार ने कहा कि बच्चों की डिजिटल सुरक्षा उसकी सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल है। इसी उद्देश्य से डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 लागू किया गया है। इस कानून के तहत: बच्चों का डेटा प्रोसेस करने के लिए माता-पिता की अनुमति जरूरी है। बच्चों की ऑनलाइन ट्रैकिंग पर रोक लगाई गई है। उनके व्यवहार की निगरानी और टारगेटेड विज्ञापन दिखाने जैसी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया गया है। सरकार का मानना है कि इससे बच्चों की ऑनलाइन गोपनीयता और सुरक्षा मजबूत होगी। डिजिटल लत और आर्थिक नुकसान पर भी सरकार की नजर सरकार ने यह भी कहा कि ऑनलाइन गेमिंग को नियंत्रित करने के लिए बनाए गए नए नियामक ढांचे का उद्देश्य युवाओं में बढ़ती डिजिटल लत और ऑनलाइन गेमिंग से होने वाले आर्थिक नुकसान को कम करना भी है। सरकार डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को अधिक जिम्मेदार और जवाबदेह बनाने की दिशा में लगातार काम कर रही है। सरकार का क्या है उद्देश्य? सरकार के अनुसार, इन सभी कदमों का मुख्य उद्देश्य ऐसा डिजिटल वातावरण तैयार करना है जहां: इंटरनेट सुरक्षित हो। अवैध और अश्लील सामग्री पर प्रभावी रोक लगे। बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित हो। नागरिकों के व्यक्तिगत डेटा की रक्षा की जा सके। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स कानूनों के प्रति जवाबदेह बने रहें।

surbhi जुलाई 26, 2026 0
WhatsApp logo displayed on a smartphone as the Indian government seeks clarification from Meta over the upcoming username feature.
WhatsApp के यूजरनेम फीचर पर सरकार सख्त, जवाब देने के लिए Meta को 9 जुलाई तक की मोहलत

नई दिल्ली: मैसेजिंग प्लेटफॉर्म WhatsApp के नए यूजरनेम फीचर को लेकर केंद्र सरकार ने अपनी चिंता जताई है। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने इस मामले में Meta को विस्तृत जवाब देने के लिए 9 जुलाई तक का समय दिया है। पहले कंपनी से 6 जुलाई तक जवाब मांगा गया था, लेकिन अब तीन दिन की अतिरिक्त मोहलत दी गई है। सरकार का कहना है कि मोबाइल नंबर की जगह यूजरनेम से पहचान होने की सुविधा का गलत इस्तेमाल साइबर अपराधी कर सकते हैं। ऐसे में इस फीचर के सुरक्षा पहलुओं और संभावित जोखिमों पर स्पष्ट जानकारी मांगी गई है। क्या है WhatsApp का नया यूजरनेम फीचर? WhatsApp अपने प्लेटफॉर्म पर ऐसा फीचर ला रहा है, जिसके तहत यूजर अपना मोबाइल नंबर साझा किए बिना दूसरे लोगों से चैट कर सकेंगे। कंपनी के अनुसार— हर यूजर के लिए एक यूनिक यूजरनेम होगा। डिस्प्ले नेम और यूजरनेम अलग-अलग होंगे। डिस्प्ले नेम एक जैसा हो सकता है, लेकिन यूजरनेम प्रत्येक अकाउंट के लिए अलग होगा। इसका उद्देश्य यूजर्स की प्राइवेसी को बेहतर बनाना है। सरकार को क्यों है चिंता? MeitY का मानना है कि यदि मोबाइल नंबर दिखाई नहीं देगा तो इससे कानून-व्यवस्था और साइबर सुरक्षा से जुड़े नए खतरे पैदा हो सकते हैं। सरकार की प्रमुख चिंताएं हैं— अपराधी फर्जी यूजरनेम बनाकर लोगों को निशाना बना सकते हैं। किसी की पहचान छिपाकर धोखाधड़ी और साइबर अपराध को अंजाम देना आसान हो सकता है। फर्जी प्रोफाइल और तस्वीरों का दुरुपयोग बढ़ सकता है। कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए अपराधियों की पहचान करना अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। Meta से क्या जानकारी मांगी गई है? सरकार ने Meta से यूजरनेम फीचर के कई तकनीकी और सुरक्षा संबंधी पहलुओं पर स्पष्टीकरण मांगा है। इनमें शामिल हैं— फीचर का तकनीकी ढांचा। यूजर की पहचान सत्यापित करने की प्रक्रिया। फर्जी अकाउंट और दुरुपयोग रोकने के उपाय। साइबर अपराध की स्थिति में जांच एजेंसियों को मिलने वाली सहायता। प्राइवेसी और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखने की व्यवस्था। फिलहाल फीचर लागू न करने की सलाह सरकार ने Meta से कहा है कि जब तक इस फीचर पर समीक्षा और आवश्यक चर्चा पूरी नहीं हो जाती, तब तक भारत में इसे व्यापक स्तर पर लागू करने से बचा जाए। सरकार पहले यह सुनिश्चित करना चाहती है कि नया फीचर उपयोगकर्ताओं की गोपनीयता की रक्षा करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर भी प्रभावी समाधान उपलब्ध कराए। अब इस मामले में सभी की नजर Meta के जवाब पर है, जिसे कंपनी को 9 जुलाई तक केंद्र सरकार के समक्ष प्रस्तुत करना होगा।  

Deepshikha जुलाई 6, 2026 0
Zoho founder Sridhar Vembu announces Arattai will remove username accounts following India’s messaging platform security concerns.
Arattai में भी बंद होगा यूजरनेम फीचर, WhatsApp पर सरकार की सख्ती के बाद Zoho के श्रीधर वेम्बु का बड़ा फैसला

नई दिल्ली: भारत सरकार द्वारा WhatsApp के प्रस्तावित यूजरनेम फीचर पर रोक लगाए जाने के बाद स्वदेशी टेक कंपनी Zoho ने भी बड़ा फैसला लिया है। कंपनी के संस्थापक श्रीधर वेम्बु ने घोषणा की है कि उनका मैसेजिंग प्लेटफॉर्म Arattai भी यूजरनेम आधारित अकाउंट फीचर को बंद करेगा। इस कदम के साथ Arattai सरकार के निर्देशों का समर्थन करने वाला पहला भारतीय मैसेजिंग ऐप बन गया है। श्रीधर वेम्बु ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा कि सरकार के नए दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए Arattai में यूजरनेम आधारित अकाउंट की सुविधा समाप्त की जाएगी। हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि यह बदलाव कब तक लागू होगा, लेकिन स्पष्ट किया कि कंपनी नियामकीय नियमों का पूरी तरह पालन करेगी। पहले से मौजूद था यूजरनेम फीचर Arattai में यूजरनेम के आधार पर अकाउंट बनाने और इस्तेमाल करने की सुविधा पहले से उपलब्ध थी। इस फीचर के जरिए यूजर बिना मोबाइल नंबर साझा किए दूसरे लोगों से जुड़ सकते थे। लेकिन अब कंपनी इसे चरणबद्ध तरीके से हटाने की तैयारी कर रही है। वेम्बु के इस फैसले को भारत सरकार की डिजिटल सुरक्षा और साइबर फ्रॉड रोकने की नीति के समर्थन के रूप में देखा जा रहा है। WhatsApp को सरकार ने क्यों रोका? हाल ही में Meta ने WhatsApp के लिए यूजरनेम फीचर पेश करने की घोषणा की थी। इस फीचर का उद्देश्य यूजर्स को अपना मोबाइल नंबर साझा किए बिना चैट करने की सुविधा देना था। कंपनी का दावा था कि इससे प्राइवेसी और सुरक्षा बेहतर होगी। हालांकि, केंद्र सरकार ने इस फीचर को लेकर गंभीर सुरक्षा चिंताएं जताईं। सरकार का मानना है कि यदि यूजरनेम सिस्टम बिना पर्याप्त सुरक्षा उपायों के लागू किया गया, तो साइबर अपराधी बैंक, सरकारी संस्थानों, कंपनियों और प्रसिद्ध हस्तियों के नाम से फर्जी यूजरनेम बनाकर लोगों को धोखा दे सकते हैं। इससे फिशिंग, डिजिटल अरेस्ट, वित्तीय धोखाधड़ी और ऑनलाइन स्कैम जैसे मामलों में बढ़ोतरी की आशंका जताई गई है। Meta से मांगी गई तकनीकी जानकारी रिपोर्ट्स के अनुसार, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने Meta से इस फीचर की विस्तृत तकनीकी जानकारी मांगी है। इसमें यूजरनेम सिस्टम का आर्किटेक्चर, सुरक्षा व्यवस्था, पहचान सत्यापन और धोखाधड़ी रोकने के उपायों की जानकारी शामिल है। जब तक सरकार और Meta के बीच इस विषय पर चर्चा पूरी नहीं हो जाती और सुरक्षा संबंधी चिंताओं का समाधान नहीं हो जाता, तब तक भारत में WhatsApp के यूजरनेम फीचर के रोलआउट पर रोक रहेगी। Meta ने क्या दी सफाई? Meta का कहना है कि उसने कई महत्वपूर्ण यूजरनेम पहले से ही सुरक्षित (Reserved) रखे हैं। इनमें सरकारी संस्थान, प्रमुख कंपनियां, मशहूर हस्तियां और Meta Verified अकाउंट शामिल हैं। यदि कोई सामान्य यूजर ऐसे नाम से यूजरनेम बनाने की कोशिश करता है, तो सिस्टम उसे बताएगा कि वह नाम उपलब्ध नहीं है। कंपनी का दावा है कि इस व्यवस्था का उद्देश्य फर्जी अकाउंट और पहचान की चोरी को रोकना है। डिजिटल सुरक्षा पर बढ़ा फोकस WhatsApp और Arattai से जुड़े हालिया घटनाक्रम यह संकेत देते हैं कि भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए सुरक्षा और पहचान सत्यापन से जुड़े नियम लगातार सख्त हो रहे हैं। सरकार चाहती है कि नए फीचर्स लॉन्च करने से पहले कंपनियां पर्याप्त सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करें, ताकि ऑनलाइन धोखाधड़ी और साइबर अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण रखा जा सके।  

surbhi जुलाई 3, 2026 0
Illustration showing internet root servers and India's push for stronger digital infrastructure and cyber security.
इंटरनेट संप्रभुता की दिशा में बड़ा कदम, भारत में रूट सर्वर लगाने की मांग; ICANN ले सकता है अहम फैसला

ICANN Domestic Root Servers: डिजिटल क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को मजबूत करने की दिशा में भारत सरकार ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, केंद्र सरकार ने वैश्विक इंटरनेट संस्था ICANN (Internet Corporation for Assigned Names and Numbers) से भारत में मुख्य रूट सर्वर स्थापित करने की मांग की है। इस कदम का उद्देश्य देश की इंटरनेट सुरक्षा को मजबूत करना और विदेशी नेटवर्क पर निर्भरता को कम करना है। भारत ने क्यों उठाई रूट सर्वर की मांग? इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव एस. कृष्णन के अनुसार, दुनिया के सबसे बड़े इंटरनेट उपयोगकर्ता आधार वाले देशों में शामिल भारत के पास अपना मजबूत और सुरक्षित इंटरनेट इंफ्रास्ट्रक्चर होना चाहिए। उनका मानना है कि घरेलू रूट सर्वर से देश की डिजिटल संप्रभुता को और मजबूती मिलेगी। क्या होते हैं रूट सर्वर? रूट सर्वर इंटरनेट की बुनियादी संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। जब कोई यूजर किसी वेबसाइट को खोलता है या ईमेल भेजता है, तो डोमेन नेम सिस्टम (DNS) के जरिए रूट सर्वर उस वेबसाइट का सही पता खोजने में मदद करते हैं। सरल शब्दों में कहें तो रूट सर्वर इंटरनेट की "डायरेक्टरी" की तरह काम करते हैं, जो यूजर्स को सही वेबसाइट तक पहुंचाने में सहायता करते हैं। फिलहाल कहां मौजूद हैं ये सर्वर? वर्तमान में ICANN के नेटवर्क से जुड़े प्रमुख रूट सर्वरों की मौजूदगी अमेरिका, यूरोप, सिंगापुर, मिस्र और केन्या जैसे देशों में है। रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत और ICANN के बीच इस विषय पर बातचीत जारी है। बताया जा रहा है कि भारत को सभी 13 मुख्य रूट सर्वरों को मिरर करने वाले करीब 18 सर्वरों का एक पूरा क्लस्टर मिल सकता है। हालांकि, यह प्रक्रिया तकनीकी रूप से जटिल और लंबी मानी जा रही है। क्या होंगे इसके फायदे? यदि भारत में रूट सर्वर स्थापित होते हैं, तो इसके कई महत्वपूर्ण लाभ सामने आ सकते हैं: इंटरनेट इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए विदेशी नेटवर्क पर निर्भरता कम होगी। साइबर हमलों और मैलवेयर खतरों से निपटने में तेजी आएगी। इंटरनेट सेवा प्रदाताओं के स्तर पर ही संभावित खतरों को रोका जा सकेगा। देश के महत्वपूर्ण डिजिटल ढांचे को अतिरिक्त सुरक्षा मिलेगी। तकनीकी निवेश और डिजिटल इकोसिस्टम को बढ़ावा मिलेगा। भारत डिजिटल रूप से अधिक आत्मनिर्भर बन सकेगा। वैश्विक स्तर पर संतुलित इंटरनेट ढांचे की जरूरत रिपोर्ट्स के मुताबिक, सचिव एस. कृष्णन ने इस बात पर भी जोर दिया है कि इंटरनेट का बुनियादी ढांचा दुनिया भर में संतुलित तरीके से वितरित होना चाहिए। उनका मानना है कि भारत में रूट सर्वर स्थापित होने से न केवल देश की सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि तकनीकी नवाचार और निवेश के नए अवसर भी पैदा होंगे। अगर यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है, तो इसे भारत की डिजिटल संप्रभुता और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा सकता है।  

surbhi जून 23, 2026 0
Indian delegation at international cyber security meeting after India assumed CCDB chairmanship role
भारत को मिली बड़ी अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी, संभाला CCDB के अध्यक्ष का पद

भारत को वैश्विक आईटी सुरक्षा क्षेत्र में बड़ी जिम्मेदारी मिली है। India ने कॉमन क्राइटेरिया डेवलपमेंट बोर्ड (CCDB) का अध्यक्ष पद संभाल लिया है। यह जिम्मेदारी अप्रैल 2026 से अप्रैल 2028 तक के लिए भारत को सौंपी गई है। इसे अंतरराष्ट्रीय सूचना प्रौद्योगिकी सुरक्षा मानकों के क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका और तकनीकी क्षमता का बड़ा संकेत माना जा रहा है। यह फैसला 14 से 16 अप्रैल 2026 के बीच जापान की राजधानी Tokyo में आयोजित कॉमन क्राइटेरिया रिकॉग्निशन अरेंजमेंट (CCRA) की पहली तिमाही बैठक में लिया गया। क्या है CCRA? कॉमन क्राइटेरिया रिकॉग्निशन अरेंजमेंट (CCRA) एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जिसके तहत आईटी सुरक्षा प्रमाणपत्रों को सदस्य देशों के बीच आपसी मान्यता दी जाती है। इसका उद्देश्य सुरक्षित आईटी उत्पादों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार को आसान बनाना और वैश्विक सुरक्षा मानकों को मजबूत करना है। CCRA के तहत मूल्यांकित और प्रमाणित उत्पादों को सदस्य देशों में दोबारा प्रमाणन की जरूरत नहीं पड़ती। इससे टेक्नोलॉजी कंपनियों और आईटी उद्योग को बड़ा फायदा मिलता है। CCDB की क्या है भूमिका? कॉमन क्राइटेरिया डेवलपमेंट बोर्ड यानी CCDB, CCRA का तकनीकी केंद्र माना जाता है। यह बोर्ड आईटी सुरक्षा मूल्यांकन से जुड़े अंतरराष्ट्रीय तकनीकी मानकों और मूल्यांकन प्रक्रिया को संचालित करता है। CCDB का मुख्य काम कॉमन क्राइटेरिया (CC) और कॉमन इवैल्यूएशन मेथडोलॉजी (CEM) के लिए वैश्विक तकनीकी कार्यक्रम तैयार करना और उन्हें अपडेट करना है। यह संस्था दुनिया भर में सुरक्षित आईटी उत्पादों के लिए मानक तय करने में अहम भूमिका निभाती है। 2013 से सक्रिय सदस्य है भारत भारत 16 सितंबर 2013 से CCRA का सक्रिय सदस्य रहा है। देश में यह काम Ministry of Electronics and Information Technology और STQC महानिदेशालय के जरिए किया जाता है, जो आईटी सुरक्षा मूल्यांकन के लिए अधिकृत प्रमाणन संस्था है। फिलहाल CCRA में 20 सर्टिफिकेट-अथॉराइजिंग देश और 18 सर्टिफिकेट-कंज्यूमिंग देश शामिल हैं। ये सभी मिलकर वैश्विक आईटी सुरक्षा मानकों और प्रमाणन प्रणाली को मजबूत बनाने का काम करते हैं। भारत के लिए क्यों अहम है यह जिम्मेदारी? विशेषज्ञों के मुताबिक, CCDB की अध्यक्षता मिलने से भारत अब वैश्विक साइबर सुरक्षा और आईटी सुरक्षा मानकों को तय करने में अहम भूमिका निभाएगा। इससे भारत को उभरती तकनीकों के लिए अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा फ्रेमवर्क तैयार करने में प्रभाव बढ़ाने का मौका मिलेगा। दो साल की इस अवधि में भारत वैश्विक आईटी सुरक्षा प्रमाणन व्यवस्था के भविष्य से जुड़े महत्वपूर्ण फैसलों में निर्णायक भूमिका निभा सकेगा। इसे डिजिटल और साइबर सुरक्षा क्षेत्र में भारत की बड़ी कूटनीतिक और तकनीकी उपलब्धि माना जा रहा है।  

surbhi मई 15, 2026 0
Official NIC Scientist-B recruitment notification showing 243 vacancies, eligibility and application details
NIC में साइंटिस्ट बनने का सुनहरा मौका: 1 लाख+ सैलरी, 243 पदों पर भर्ती शुरू

अगर आप आईटी सेक्टर में सरकारी नौकरी का सपना देख रहे हैं, तो National Informatics Centre (NIC) आपके लिए शानदार अवसर लेकर आया है। इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय Ministry of Electronics and Information Technology के तहत आने वाले इस प्रतिष्ठित संस्थान ने Scientist-B (ग्रुप-A, गजेटेड) पदों पर भर्ती का नोटिफिकेशन जारी किया है। इस भर्ती अभियान के तहत कुल 243 पदों को भरा जाएगा और आवेदन करने की अंतिम तिथि 24 अप्रैल 2026 निर्धारित की गई है। कैसे करें आवेदन? इच्छुक उम्मीदवार ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं: NIC की आधिकारिक वेबसाइट nic.gov.in या recruitment.nic.in पर जाएं “Scientist-B Recruitment 2026” लिंक पर क्लिक करें नया रजिस्ट्रेशन करें लॉगिन करके आवेदन फॉर्म भरें फीस का भुगतान करें फॉर्म सबमिट कर प्रिंटआउट सुरक्षित रखें योग्यता (Eligibility Criteria) BTech / MTech / MCA डिग्री अनिवार्य कंप्यूटर साइंस, IT या इलेक्ट्रॉनिक्स बैकग्राउंड कुछ पदों के लिए अनुभव आवश्यक हो सकता है अधिकतम आयु सीमा: 30 वर्ष आरक्षित वर्गों को नियमानुसार छूट मिलेगी सैलरी और फायदे Scientist-B पद पर चयनित उम्मीदवारों को पे लेवल-10 के तहत आकर्षक सैलरी मिलेगी: ₹56,100 से ₹1,77,500 प्रति माह HRA, DA और अन्य सरकारी भत्ते स्थिर करियर और प्रोफेशनल ग्रोथ के शानदार अवसर क्यों खास है यह नौकरी? NIC भारत के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाता है। यहां काम करने का मतलब है: बड़े सरकारी टेक प्रोजेक्ट्स पर काम करने का मौका देश की डिजिटल सेवाओं को बेहतर बनाने में योगदान सुरक्षित और प्रतिष्ठित करियर

surbhi अप्रैल 10, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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kalpana जुलाई 21, 2026 0