दिमाग हमारे पूरे शरीर का कंट्रोल सेंटर है। खाना खाने, चलने, बोलने, देखने, सोचने और रोजमर्रा के सामान्य काम करने से लेकर भावनाओं और व्यवहार तक, शरीर की तमाम गतिविधियां मस्तिष्क से जुड़ी होती हैं। यही वजह है कि दिमाग से संबंधित किसी भी असामान्य बदलाव को हल्के में लेना नुकसानदायक हो सकता है। कई न्यूरोलॉजिकल बीमारियां शुरुआत में बेहद सामान्य नजर आने वाले लक्षणों के साथ सामने आती हैं। बार-बार सिरदर्द होना, हाल की बातें भूल जाना, ध्यान केंद्रित करने में परेशानी, अचानक व्यवहार बदलना या चलते समय शरीर का संतुलन बिगड़ना ऐसे संकेत हो सकते हैं, जिन्हें लोग अक्सर थकान, तनाव या बढ़ती उम्र से जोड़कर नजरअंदाज कर देते हैं। हालांकि, हर सिरदर्द या भूलने की समस्या गंभीर बीमारी का संकेत नहीं होती, लेकिन जब ये परेशानियां बार-बार होने लगें, अचानक शुरू हों या इनके साथ दूसरे न्यूरोलॉजिकल लक्षण भी दिखाई दें, तो चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी हो जाता है। बार-बार सिरदर्द हो तो कब रहें सतर्क? कभी-कभार सिरदर्द होना सामान्य हो सकता है, लेकिन बार-बार होने वाला या अचानक बहुत तेज सिरदर्द ध्यान देने की मांग करता है। खासकर अगर सिरदर्द के साथ उल्टी, कमजोरी या देखने में परेशानी भी होने लगे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इन संकेतों पर विशेष ध्यान दें: अचानक बहुत तेज सिरदर्द शुरू होना सुबह उठते ही सिरदर्द होना सिरदर्द के साथ उल्टी होना धुंधला दिखाई देना शरीर में कमजोरी महसूस होना ऐसे लक्षण कुछ मामलों में स्ट्रोक, ब्रेन ट्यूमर, इंफेक्शन या अन्य न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से जुड़े हो सकते हैं। इसलिए लगातार या असामान्य सिरदर्द होने पर डॉक्टर से जांच कराना बेहतर है। पढ़ी हुई बातें बार-बार भूल रहे हैं? भूलने की समस्या को हमेशा सामान्य मानकर टालना सही नहीं है। सामान रखकर भूल जाना या कभी-कभार किसी का नाम याद न आना सामान्य हो सकता है, लेकिन अगर हाल की घटनाएं याद रखने, जरूरी काम याद रखने या रोजमर्रा की गतिविधियों पर ध्यान देने में लगातार परेशानी होने लगे, तो इस पर ध्यान देना चाहिए। याददाश्त से जुड़े कुछ संकेत हैं: लोगों के नाम बार-बार भूलना परिचित रास्ते भूल जाना हाल की घटनाओं को याद न रख पाना जरूरी काम भूल जाना किसी बात को समझने में परेशानी होना काम पर ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई लगातार ऐसी समस्याएं डिमेंशिया, अल्जाइमर या अन्य मस्तिष्क संबंधी परेशानियों के शुरुआती संकेतों से जुड़ी हो सकती हैं। हालांकि, सही कारण जानने के लिए चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी है। अचानक बदलने लगा है स्वभाव? दिमाग से जुड़ी परेशानी का असर केवल याददाश्त या सिरदर्द के रूप में ही नहीं दिखता। कई बार व्यक्ति के व्यवहार और मूड में अचानक बदलाव भी दिखाई दे सकता है। अगर कोई व्यक्ति पहले की तुलना में अचानक ज्यादा चिड़चिड़ा रहने लगे, बिना वजह गुस्सा करे, लगातार उदास रहे या निर्णय लेने और ध्यान केंद्रित करने में परेशानी महसूस करे, तो इसे भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ध्यान देने वाले बदलाव: अचानक चिड़चिड़ापन बढ़ना बिना स्पष्ट कारण गुस्सा आना लगातार उदास रहना किसी काम में रुचि न रहना निर्णय लेने में परेशानी ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई ऐसे बदलाव कई कारणों से हो सकते हैं, लेकिन कुछ मामलों में ये न्यूरोलॉजिकल समस्याओं के साथ भी जुड़े हो सकते हैं। बोलने, देखने या चलने में परेशानी को न करें नजरअंदाज न्यूरोलॉजिकल बीमारी के कुछ संकेत शरीर की सामान्य गतिविधियों में सीधे दिखाई दे सकते हैं। अचानक बोलने में दिक्कत होना, देखने में बदलाव आना या चलते समय शरीर का संतुलन बिगड़ना खास तौर पर महत्वपूर्ण संकेत हैं। इन लक्षणों पर नजर रखें: चलते समय शरीर का संतुलन बिगड़ना बोलने में परेशानी होना अचानक देखने में दिक्कत होना डबल विजन या धुंधला दिखाई देना ऐसे लक्षण स्ट्रोक, मल्टीपल स्क्लेरोसिस, ब्रेन ट्यूमर या अन्य न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से जुड़े हो सकते हैं। खासकर यदि ये लक्षण अचानक शुरू हुए हों, तो तत्काल चिकित्सकीय सहायता लेना जरूरी है। इन लक्षणों पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें अगर इनमें से कोई गंभीर लक्षण अचानक दिखाई देता है, तो इसे सामान्य परेशानी समझकर इंतजार नहीं करना चाहिए: बोलने या समझने में परेशानी अचानक बहुत तेज सिरदर्द बेहोशी या दौरा पड़ना शरीर में अचानक कमजोरी शरीर का कोई हिस्सा सुन्न पड़ना अचानक दिखाई देने में परेशानी शरीर का संतुलन बिगड़ना भ्रम की स्थिति व्यवहार में अचानक बदलाव असामान्य या अत्यधिक नींद आना हर लक्षण का मतलब गंभीर बीमारी नहीं सिरदर्द, भूलने की समस्या, मूड में बदलाव या चक्कर जैसी परेशानियां कई अलग-अलग कारणों से हो सकती हैं। इसलिए केवल इन लक्षणों के आधार पर किसी बीमारी का निष्कर्ष निकालना सही नहीं है। लेकिन अगर कोई लक्षण बार-बार हो रहा है, अचानक शुरू हुआ है, लगातार बढ़ रहा है या उसके साथ बोलने, देखने, चलने, समझने अथवा शरीर में कमजोरी जैसे दूसरे संकेत भी मौजूद हैं, तो डॉक्टर से समय पर सलाह लेना बेहद जरूरी है। दिमाग से जुड़े मामलों में समय पर पहचान और उचित चिकित्सकीय जांच महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। किसी भी गंभीर या अचानक लक्षण की स्थिति में खुद से इलाज करने के बजाय योग्य डॉक्टर से संपर्क करें।
आज के समय में मोबाइल, लैपटॉप और टैबलेट हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। काम, पढ़ाई और मनोरंजन के लिए स्क्रीन का इस्तेमाल करना आम बात है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि केवल स्क्रीन के सामने बिताया गया समय ही नहीं, बल्कि उसका इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है, यह भी मानसिक स्वास्थ्य और याददाश्त पर बड़ा असर डालता है। क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट के अनुसार, स्क्रीन टाइम को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जा सकता है—Passive Screen Time और Active Screen Time। इनमें से पैसिव स्क्रीन टाइम दिमाग के लिए अधिक नुकसानदायक माना जाता है। क्या होता है Passive Screen Time? Passive Screen Time वह होता है, जिसमें व्यक्ति बिना किसी उद्देश्य के लगातार स्क्रीन पर समय बिताता रहता है। इसमें सोशल मीडिया पर लगातार स्क्रॉल करना, ऑटो-प्ले वीडियो देखते रहना या बैकग्राउंड में वीडियो चलाकर अन्य काम करना शामिल है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह का स्क्रीन इस्तेमाल दिमाग पर बहुत कम मानसिक दबाव डालता है, लेकिन धीरे-धीरे यह याददाश्त, एकाग्रता और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। कैसे प्रभावित होती है याददाश्त और फोकस? विशेषज्ञों का कहना है कि एक वयस्क व्यक्ति औसतन रोजाना 6 से 7 घंटे स्क्रीन पर बिताता है, जिसमें बड़ा हिस्सा पैसिव स्क्रीन टाइम का होता है। लगातार बिना सोचे-समझे कंटेंट देखने की आदत से कई समस्याएं हो सकती हैं, जैसे— ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई वर्किंग मेमोरी कमजोर होना मानसिक थकान बढ़ना किसी काम पर लंबे समय तक टिके रहने में परेशानी छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन विशेषज्ञ बताते हैं कि छोटे-छोटे वीडियो और लगातार मिलने वाली तुरंत संतुष्टि (Instant Gratification) दिमाग को इसी तरह के कंटेंट का आदी बना सकती है, जिससे ध्यान अवधि (Attention Span) धीरे-धीरे कम होने लगती है। Active Screen Time क्यों है बेहतर? Active Screen Time में व्यक्ति स्क्रीन का इस्तेमाल किसी उद्देश्य के साथ करता है। जैसे— नई स्किल सीखना ऑनलाइन कोर्स करना किताब पढ़ना नई भाषा सीखना पजल या ब्रेन गेम खेलना डिजिटल जर्नलिंग ऑनलाइन फिटनेस क्लास लेना क्रिएटिव कंटेंट बनाना ऐसी गतिविधियां दिमाग को सक्रिय रखती हैं और सोचने, समझने तथा समस्या सुलझाने की क्षमता को बेहतर बनाने में मदद कर सकती हैं। क्या स्क्रीन टाइम से बढ़ सकता है डिमेंशिया का खतरा? विशेषज्ञों के अनुसार, केवल स्क्रीन टाइम को डिमेंशिया का सीधा कारण नहीं माना जा सकता। हालांकि लंबे समय तक दिमाग को पर्याप्त मानसिक चुनौती न मिलने पर याददाश्त, ध्यान और सोचने की क्षमता कमजोर हो सकती है। दूसरी ओर, सीखने और दिमाग को सक्रिय रखने वाली गतिविधियां "कॉग्निटिव रिजर्व" को मजबूत बनाने में मदद करती हैं, जिससे उम्र बढ़ने के साथ मानसिक कार्यक्षमता को बनाए रखने में सहायता मिल सकती है। कैसे करें स्क्रीन का सही इस्तेमाल? अगर आप स्क्रीन का उपयोग करते हैं, तो इन बातों का ध्यान रखें— बिना उद्देश्य के लगातार स्क्रॉल करने से बचें। सोशल मीडिया इस्तेमाल के लिए समय सीमा तय करें। हर 30–45 मिनट बाद स्क्रीन से ब्रेक लें। स्क्रीन का उपयोग सीखने और नई स्किल विकसित करने के लिए करें। सोने से कम से कम एक घंटा पहले स्क्रीन का इस्तेमाल कम करें। निष्कर्ष स्क्रीन अपने आप में नुकसानदायक नहीं है। असली फर्क इस बात से पड़ता है कि आप उसका इस्तेमाल किस तरह करते हैं। यदि स्क्रीन का उपयोग केवल मनोरंजन और लगातार स्क्रॉलिंग तक सीमित है, तो यह आपकी याददाश्त, ध्यान और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल सकता है। वहीं, सीखने और रचनात्मक कार्यों के लिए किया गया स्क्रीन इस्तेमाल दिमाग को सक्रिय और स्वस्थ बनाए रखने में मदद कर सकता है। नोट: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। यदि आपको याददाश्त, ध्यान या मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी लगातार समस्या हो रही है, तो किसी योग्य डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में नींद से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। कई लोग रात में बार-बार नींद टूटने, खर्राटे आने या सुबह उठने के बाद भी थकान महसूस करने जैसी समस्याओं से जूझते हैं। अक्सर लोग इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यह ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया (OSA) जैसी गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है। स्लीप एपनिया केवल नींद की गुणवत्ता को प्रभावित नहीं करता, बल्कि धीरे-धीरे दिमाग की कार्यक्षमता, याददाश्त और मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर डाल सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते इसका इलाज नहीं किया गया, तो यह ब्रेन टिश्यू को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ स्ट्रोक और डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ा सकता है। क्या है स्लीप एपनिया? ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें सोते समय श्वसन मार्ग बार-बार आंशिक या पूरी तरह बंद हो जाता है। इसके कारण सांस लेने में रुकावट आती है और व्यक्ति की नींद बार-बार टूटती रहती है। कई बार मरीज को इसका एहसास भी नहीं होता, लेकिन उसका शरीर पूरी रात इस समस्या से जूझता रहता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह रुकावट एक रात में दर्जनों या यहां तक कि सैकड़ों बार भी हो सकती है। दिमाग को कैसे पहुंचता है नुकसान? ऑक्सीजन की कमी बनती है सबसे बड़ा खतरा स्लीप एपनिया के दौरान शरीर और दिमाग को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती। इस स्थिति को "इंटरमिटेंट हाइपोक्सिया" कहा जाता है। दिमाग को लगातार ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। जब बार-बार ऑक्सीजन की कमी होती है, तो मस्तिष्क की कोशिकाएं प्रभावित होने लगती हैं। खासकर वे हिस्से जो याददाश्त, ध्यान और निर्णय लेने की क्षमता को नियंत्रित करते हैं। रिसर्च में पाया गया है कि लंबे समय तक बिना इलाज वाले स्लीप एपनिया से हिप्पोकैम्पस और फ्रंटल कॉर्टेक्स जैसे महत्वपूर्ण ब्रेन क्षेत्रों में बदलाव हो सकते हैं। याददाश्त और सोचने की क्षमता पर असर स्लीप एपनिया से पीड़ित लोगों में अक्सर ये समस्याएं देखी जाती हैं— चीजें भूलना ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई निर्णय लेने में परेशानी मानसिक प्रतिक्रिया की गति धीमी होना पढ़ाई और काम में प्रदर्शन प्रभावित होना नींद की रिकवरी प्रक्रिया हो जाती है प्रभावित हर बार सांस रुकने पर शरीर हल्की अवस्था में जाग जाता है, जिसे मेडिकल भाषा में "अराउजल" कहा जाता है। इससे गहरी नींद और REM Sleep बार-बार बाधित होती है। यही वे चरण हैं जिनमें— दिमाग खुद की मरम्मत करता है यादें मजबूत होती हैं भावनात्मक संतुलन बनता है सीखने की क्षमता बेहतर होती है जब ये प्रक्रियाएं पूरी नहीं हो पातीं, तो व्यक्ति दिनभर थकान, चिड़चिड़ापन और सुस्ती महसूस करता है। बढ़ सकता है स्ट्रोक का खतरा विशेषज्ञों के अनुसार स्लीप एपनिया केवल नींद की बीमारी नहीं है, बल्कि यह रक्त वाहिकाओं को भी प्रभावित करता है। बार-बार ऑक्सीजन की कमी और फिर अचानक ऑक्सीजन मिलने की प्रक्रिया से— सूजन बढ़ती है ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ता है हाई ब्लड प्रेशर का खतरा बढ़ता है हृदय रोगों की संभावना बढ़ती है इन सभी कारणों से स्ट्रोक और मस्तिष्क संबंधी गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है। अल्जाइमर और डिमेंशिया से भी जुड़ सकता है संबंध हाल के शोध बताते हैं कि लंबे समय तक अनुपचारित स्लीप एपनिया अल्जाइमर और अन्य न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों के जोखिम को बढ़ा सकता है। नींद में लगातार व्यवधान आने से दिमाग में जमा होने वाले हानिकारक प्रोटीन, जैसे बीटा-एमिलॉयड, ठीक तरह से साफ नहीं हो पाते। यही प्रोटीन आगे चलकर डिमेंशिया और अल्जाइमर से जुड़े पाए गए हैं। किन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें? यदि आपको इनमें से कोई लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है— तेज खर्राटे आना रात में बार-बार नींद खुलना सोते समय सांस रुकने जैसा महसूस होना सुबह सिरदर्द होना दिनभर अत्यधिक नींद आना लगातार थकान महसूस होना ध्यान और याददाश्त कमजोर होना क्या है इसका इलाज? अच्छी बात यह है कि स्लीप एपनिया का इलाज संभव है। विशेषज्ञ इसके लिए कई उपाय सुझाते हैं— CPAP (Continuous Positive Airway Pressure) थेरेपी वजन नियंत्रित करना नियमित व्यायाम धूम्रपान और शराब से दूरी ओरल डिवाइस का उपयोग सोने की सही पोजीशन अपनाना समय पर पहचान और उपचार से न केवल नींद की गुणवत्ता बेहतर होती है, बल्कि दिमाग को होने वाले लंबे समय के नुकसान से भी बचा जा सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।