तेहरान/वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य टकराव को लेकर तेहरान की ओर से एक ऐसा बयान सामने आया है, जिसने संघर्ष के लंबा खिंचने की आशंका बढ़ा दी है। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के कमांडर-इन-चीफ के वरिष्ठ सलाहकार मोहम्मद रजा नकदी ने कहा है कि ईरान अमेरिका के साथ युद्ध को इतना लंबा खींच सकता है कि यह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के अंत तक जारी रहे। नकदी के मुताबिक, लंबी लड़ाई का उद्देश्य केवल मौजूदा सैन्य संघर्ष में टिके रहना नहीं, बल्कि भविष्य में ईरान पर हमला करने वाले किसी भी देश के लिए इसकी भारी कीमत तय करना है। उनका कहना है कि अगर दुश्मन को गंभीर नुकसान पहुंचाया जाए तो भविष्य में किसी भी हमले से पहले उसे उसके संभावित परिणामों के बारे में सोचना पड़ेगा। हालांकि, ये दावे ईरानी अधिकारी के बयान पर आधारित हैं और युद्ध के मैदान की स्वतंत्र स्थिति का पूर्ण आकलन नहीं माने जा सकते। ईरानी अधिकारी ने क्या कहा? मोहम्मद रजा नकदी ने एक इंटरव्यू में संकेत दिया कि ईरान के लिए संघर्ष को लंबा खींचना एक रणनीतिक विकल्प हो सकता है। उनके अनुसार, युद्ध को अगले अमेरिकी राष्ट्रपति के कार्यकाल की शुरुआत तक ले जाना और इस दौरान अमेरिका को भारी नुकसान पहुंचाना ईरान की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत कर सकता है। उनका तर्क है कि भविष्य में ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने वाला कोई भी देश यह समझे कि ऐसी कार्रवाई की कीमत बहुत ज्यादा हो सकती है। नकदी ने यह भी दावा किया कि ईरान फिलहाल युद्ध में जीत की स्थिति में है, हालांकि उन्होंने साथ ही कहा कि तेहरान ने अभी अपना अंतिम लक्ष्य हासिल नहीं किया है। ईरान की रणनीति: युद्ध को लंबा खींचना? ईरानी बयान से संकेत मिलता है कि तेहरान की रणनीति केवल तत्काल सैन्य जवाब देने तक सीमित नहीं हो सकती। लंबा संघर्ष ईरान के लिए एक तरह की प्रतिरोध रणनीति बन सकता है, जिसमें दुश्मन को लगातार आर्थिक और सैन्य लागत उठानी पड़े। हालांकि, लंबे युद्ध की रणनीति अपने साथ गंभीर जोखिम भी लेकर आती है। इससे सैन्य नुकसान के साथ-साथ अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढांचे और आम नागरिकों पर भी दबाव बढ़ सकता है। यही वजह है कि ईरानी नेतृत्व के बयानों को युद्ध की वास्तविक स्थिति से अलग करके देखना जरूरी है। ट्रंप का दावा: होर्मुज पर अमेरिका का पूरा नियंत्रण दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बड़ा दावा किया है। ट्रंप ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि अमेरिका का इस रणनीतिक जलमार्ग पर “पूरा नियंत्रण” है और संकेत दिया कि वॉशिंगटन इसे बनाए रखने की कोशिश करेगा। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ने वाला यह रास्ता अंतरराष्ट्रीय तेल और गैस व्यापार के लिहाज से रणनीतिक महत्व रखता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी सैन्य तनाव का असर केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजारों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ सकता है। ट्रंप ने ईरान की नौसैनिक नाकेबंदी को बताया ‘स्टील की दीवार’ ट्रंप ने अमेरिकी नौसैनिक घेराबंदी का जिक्र करते हुए दावा किया कि ईरान इसे चुनौती देने की स्थिति में नहीं है। उन्होंने इसे “स्टील की दीवार” के तौर पर पेश किया। हालांकि, ट्रंप ने इस कथित ऑपरेशन की अवधि, उसकी वास्तविक सैन्य तैनाती या उसे खत्म करने की संभावित शर्तों को लेकर विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की है। इससे यह स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका होर्मुज क्षेत्र में अपनी मौजूदा सैन्य स्थिति को कितने समय तक बनाए रखना चाहता है। ट्रंप का दावा: IRGC की क्षमता खत्म हो चुकी अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान की सैन्य क्षमता को लेकर भी बेहद कड़ा दावा किया है। ट्रंप के अनुसार, ईरान की नौसेना और वायुसेना की क्षमता बुरी तरह प्रभावित हो चुकी है और IRGC भी गंभीर स्थिति में है। उन्होंने ईरान की आर्थिक स्थिति पर भी निशाना साधते हुए कहा कि देश के पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं हैं और वहां महंगाई बहुत तेजी से बढ़ रही है। लेकिन इन दावों और ईरानी पक्ष की ओर से किए जा रहे दावों के बीच बड़ा अंतर है। एक तरफ वॉशिंगटन ईरान की सैन्य और आर्थिक क्षमता को कमजोर बताने की कोशिश कर रहा है, वहीं तेहरान अपने प्रतिरोध और युद्ध में बढ़त का दावा कर रहा है। दोनों पक्षों के दावों के बीच असली तस्वीर क्या? अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष में दोनों पक्ष अपनी-अपनी सैन्य स्थिति को मजबूत बताने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में किसी एक पक्ष के दावे को युद्ध की अंतिम और स्वतंत्र पुष्टि मानना उचित नहीं होगा। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि संघर्ष कितने समय तक चलता है और क्या दोनों पक्ष किसी राजनीतिक या कूटनीतिक समाधान की दिशा में बढ़ते हैं। अगर युद्ध लंबा खिंचता है और होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर तनाव बना रहता है, तो इसका असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, तेल की कीमतों, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ सकता है। फिलहाल ईरानी अधिकारी का बयान संघर्ष को लंबा खींचने की इच्छा का संकेत देता है, जबकि ट्रंप के बयान से अमेरिका की ओर से दबाव बनाए रखने की रणनीति सामने आती है। दोनों पक्षों के रुख में नरमी नहीं आने की स्थिति में आने वाले दिनों में यह संघर्ष और गंभीर रूप ले सकता है।
नई दिल्ली: लाल सागर के बेहद संवेदनशील बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य में एक कमर्शियल कार्गो जहाज पर हुए दोहरे हमले ने समुद्री सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता बढ़ा दी है। यमन सरकार के अनुसार, ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने खाद्य सामग्री ले जा रहे मालवाहक जहाज ‘तिहामा’ को दो बार निशाना बनाया। हमले में कम से कम छह लोगों की मौत हुई है, जबकि कई लोग घायल बताए जा रहे हैं। मृतकों में जहाज के चालक दल के चार सदस्य और बचाव अभियान में शामिल दो कर्मी शामिल हैं। चालक दल के मृतकों में तीन पाकिस्तानी और एक इंडोनेशियाई नागरिक बताए गए हैं। जहाज पर दागी गईं तीन बैलिस्टिक मिसाइलें यमन के परिवहन मंत्रालय के मुताबिक, हूती विद्रोहियों ने तिहामा जहाज पर तीन बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। हमले के बाद जहाज में भीषण आग लग गई और चालक दल के कई सदस्य इसकी चपेट में आ गए। पहले हमले में चार चालक दल सदस्यों की मौत हुई। इनमें तीन पाकिस्तान और एक इंडोनेशिया के नागरिक थे। चार अन्य चालक दल सदस्य और एक बचावकर्मी घायल हुए। हमले के बाद जहाज पर फंसे लोगों को बचाने के लिए खोज और बचाव अभियान शुरू किया गया था। बचाव अभियान के दौरान फिर हुआ हमला यमन के अधिकारियों के अनुसार, सबसे गंभीर चिंता की बात यह रही कि राहत और बचाव अभियान शुरू होने के दौरान ही जहाज को दोबारा निशाना बनाया गया। दूसरे हमले में बचाव अभियान में शामिल लोगों को भी नुकसान पहुंचा। यमनी तटरक्षक बल ने बाद में पुष्टि की कि मरने वालों में दो बचावकर्मी भी शामिल हैं। इसके बाद मृतकों की कुल संख्या छह हो गई। यह घटनाक्रम लाल सागर में काम कर रहे व्यापारिक जहाजों और अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर नई चिंता पैदा करता है। जाजान की अरामको रिफाइनरी को भी निशाना बनाने का दावा इसी बीच हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के जाजान स्थित अरामको रिफाइनरी पर भी ड्रोन हमले का दावा किया है। हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सरी के अनुसार, यह हमला सादा और हज्जा प्रांतों में कथित सऊदी ड्रोन हमलों के जवाब में किया गया। हूती पक्ष ने दावा किया कि हमले के बाद रिफाइनरी में आग लग गई। सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्रालय ने भी रिफाइनरी में आग लगने की पुष्टि की, हालांकि अधिकारियों के अनुसार आग पर बाद में काबू पा लिया गया। लाल सागर में क्यों बढ़ी चिंता? बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य दुनिया के महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल है। यहां किसी व्यावसायिक जहाज पर हमला केवल जहाज में मौजूद चालक दल की सुरक्षा का मामला नहीं है, बल्कि इसका असर वैश्विक समुद्री व्यापार, बीमा लागत और माल ढुलाई पर भी पड़ सकता है। लगातार हमलों के कारण इस क्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों के लिए सुरक्षा जोखिम बढ़ता है और कंपनियों को वैकल्पिक समुद्री मार्गों पर विचार करना पड़ सकता है। मक्का संयुक्त रक्षा समझौते की भी परीक्षा हूती हमलों के बीच हाल में पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, जाजान पर हमले के बाद इस समझौते की प्रभावशीलता को लेकर चर्चा तेज हुई है। हालांकि, किसी सैन्य समझौते की वास्तविक क्षमता का आकलन केवल एक घटना के आधार पर करना जल्दबाजी होगी। फिर भी लाल सागर और सऊदी क्षेत्र में लगातार सामने आ रहे हमले क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था के लिए चुनौती जरूर हैं। समुद्री सुरक्षा के सामने बड़ी चुनौती तिहामा जहाज पर दो बार हुआ हमला इस बात को रेखांकित करता है कि संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में राहत और बचाव अभियान भी जोखिम से मुक्त नहीं हैं। खासकर तब, जब हमलावर दूसरे हमले के जरिए बचाव अभियान को भी निशाना बनाने की क्षमता रखते हों। लाल सागर में बढ़ता तनाव आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों की आवाजाही और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बना रह सकता है।
US Saudi Iraq Strike: इराक में अमेरिका और सऊदी अरब की संयुक्त सैन्य कार्रवाई के बाद पश्चिम एशिया में तनाव और गहरा गया है। समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, उत्तरी इराक के दियाला प्रांत में रातभर चली बमबारी में ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के कम से कम चार सदस्यों के मारे जाने का दावा किया गया है। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। ईरानी मीडिया ने 4 IRGC सदस्यों की मौत का किया दावा रिपोर्ट के मुताबिक, हमले में मारे गए IRGC सदस्यों की पहचान अली असगर अस्तानेह, अबोलफजल मोताकी, मुर्तजा अकबरी और अमीर अब्बास दरहमफोरूश के रूप में की गई है। बताया गया कि सभी ईरान के काशान शहर के रहने वाले थे। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं किया गया कि वे इराक में किस मिशन पर तैनात थे। अमेरिका का दावा- 20 ईरानी सलाहकार भी मारे गए अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक अमेरिकी अधिकारी के हवाले से दावा किया है कि इस सैन्य कार्रवाई में करीब 20 ईरानी सैन्य सलाहकार, तकनीकी विशेषज्ञ और IRGC से जुड़े सदस्य भी मारे गए। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, जिन ठिकानों पर हमला किया गया वहां ईरान समर्थित समूहों के मिसाइल और ड्रोन ऑपरेशन संचालित किए जा रहे थे। उनका कहना है कि इन ठिकानों को निशाना बनाकर ईरान समर्थित मिलिशिया की सैन्य क्षमता को कमजोर करने की कोशिश की गई। PMF ने भी 20 लड़ाकों की मौत की पुष्टि की इराक के पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज (PMF) ने बयान जारी कर कहा कि हमलों में उसके 20 लड़ाके मारे गए, जबकि 32 अन्य घायल हुए हैं। संगठन के अनुसार, हमले बगदाद, दियाला, किरकुक और बसरा समेत सात प्रांतों में किए गए। वहीं, अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने कहा कि कार्रवाई के दौरान पूर्वी इराक में स्थित लॉजिस्टिक और हथियारों से जुड़े कई ठिकानों को निशाना बनाया गया। अमेरिका का दावा है कि पिछले 72 घंटों में उसकी सेना और सऊदी अरब के ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर 30 से अधिक ड्रोन हमले हुए थे, जिनके पीछे ईरान समर्थित समूहों का हाथ था। सऊदी ने ड्रोन हमलों को बताया कार्रवाई की वजह सैन्य अभियान से पहले सऊदी अरब ने आरोप लगाया था कि उसकी एयर डिफेंस प्रणाली ने पूर्वी प्रांत में तेल प्रतिष्ठानों को निशाना बनाकर भेजे गए कई ड्रोन मार गिराए थे। सऊदी सरकार ने इन हमलों के लिए इराक में सक्रिय ईरान समर्थित संगठनों को जिम्मेदार ठहराया था। इसके बाद अमेरिका और सऊदी अरब ने संयुक्त सैन्य कार्रवाई की। इराक ने बताया संप्रभुता का उल्लंघन इस पूरे घटनाक्रम पर इराक सरकार ने कड़ी आपत्ति जताई है। इराक की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने अमेरिका और सऊदी अरब की सैन्य कार्रवाई को "अस्वीकार्य आक्रमण" बताते हुए कहा कि यह देश की संप्रभुता का उल्लंघन है। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि यह कार्रवाई इराकी अधिकारियों के समन्वय से की गई थी, लेकिन बगदाद ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि उसने इस तरह की किसी सैन्य कार्रवाई की अनुमति नहीं दी और देश की संप्रभुता से किसी भी तरह का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। लगातार बढ़ते सैन्य टकराव के बीच पश्चिम एशिया में सुरक्षा स्थिति और अस्थिर होती दिखाई दे रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कूटनीतिक प्रयास तेज नहीं हुए तो क्षेत्रीय तनाव और व्यापक संघर्ष में बदल सकता है।
US-Iran War: मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात में "जिहाद और प्रतिरोध के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है।" साथ ही उन्होंने लेबनान के सशस्त्र संगठन हिज्बुल्लाह के प्रति ईरान का समर्थन दोहराते हुए कहा कि उसकी रक्षा करना ईरान की रणनीतिक जिम्मेदारी है। इजराइल के हमले रुकने तक नहीं होगा कोई समझौता सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जारी अपने संदेश में खामेनेई ने कहा कि जब तक इजराइल लेबनान पर अपने सैन्य हमले पूरी तरह और बिना किसी शर्त के बंद नहीं करता, तब तक अमेरिका के साथ युद्ध समाप्त करने या किसी तरह के समझौते पर विचार नहीं किया जा सकता। उनके मुताबिक, लेबनान में सैन्य कार्रवाई का रुकना किसी भी संभावित शांति समझौते की पहली और सबसे अहम शर्त है। हिज्बुल्लाह की जमकर की तारीफ खामेनेई ने हिज्बुल्लाह प्रमुख शेख नईम कासिम और संगठन के लड़ाकों की ओर से मिले समर्थन संदेश का जवाब देते हुए उनके साहस और धैर्य की सराहना की। उन्होंने कहा कि हिज्बुल्लाह के लड़ाकों ने संघर्ष के दौरान जिस तरह दृढ़ता दिखाई है, वह पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणादायक है। उन्होंने अपने संदेश में कहा, "अब जिहाद और प्रतिरोध के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है। हमें विश्वास है कि सच की लड़ाई लड़ने वालों की जीत होकर रहेगी।" नसरल्लाह को दी श्रद्धांजलि मोजतबा खामेनेई ने दक्षिणी लेबनान के लोगों के धैर्य और हिज्बुल्लाह के प्रति उनके समर्थन की भी सराहना की। उन्होंने संगठन के दिवंगत प्रमुख सैयद हसन नसरल्लाह समेत संघर्ष में मारे गए अन्य कमांडरों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उन्होंने अपने उद्देश्य के लिए बड़ा बलिदान दिया है। 'छोटे पौधे से विशाल संगठन बना हिज्बुल्लाह' अपने बयान में खामेनेई ने दावा किया कि हिज्बुल्लाह आज इजराइल के खिलाफ सबसे मजबूत ताकतों में से एक बन चुका है। उन्होंने कहा कि संगठन के लड़ाकों ने इसे एक छोटे पौधे से मजबूत और विशाल वृक्ष की तरह खड़ा किया है। उनके अनुसार, हिज्बुल्लाह की वजह से लेबनान को पूरे इस्लामी जगत में सम्मान मिला है। मिडिल ईस्ट में बढ़ सकता है तनाव खामेनेई का यह बयान ऐसे समय आया है, जब मध्य पूर्व में पहले से ही तनाव चरम पर है। ईरान और इजराइल के बीच बढ़ती तनातनी तथा लेबनान में जारी सैन्य गतिविधियों के बीच इस बयान को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि ईरान ने एक बार फिर स्पष्ट संकेत दिया है कि वह हिज्बुल्लाह को राजनीतिक और वैचारिक समर्थन जारी रखेगा। उन्होंने यह भी कहा कि क्षेत्र में स्थायी शांति तभी संभव है, जब इजराइल लेबनान पर सैन्य कार्रवाई पूरी तरह बंद करे और उसकी संप्रभुता तथा सीमाओं का सम्मान करे।
अमेरिका ने बुधवार (भारतीय समयानुसार गुरुवार तड़के) लगातार 12वीं रात ईरान पर हवाई हमले किए। युद्धविराम टूटने के बाद दोनों देशों के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अमेरिकी सेना की सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर यह सैन्य अभियान जारी है। वहीं, ईरान ने चेतावनी दी है कि यदि हमले नहीं रुके तो वह क्षेत्र के तेल ठिकानों, ऊर्जा परियोजनाओं और अन्य रणनीतिक आर्थिक ढांचों को निशाना बना सकता है। CENTCOM ने क्या कहा? अमेरिकी सेना की सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने बताया कि ताजा हवाई हमले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर किए गए। अमेरिकी सेना का कहना है कि अभियान का उद्देश्य ईरान की उन सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना है, जिनका इस्तेमाल क्षेत्र से गुजरने वाले व्यावसायिक जहाजों को निशाना बनाने में किया जा रहा है। CENTCOM ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि यह अभियान फिलहाल जारी रहेगा और जरूरत पड़ने पर आगे भी सैन्य कार्रवाई की जाएगी। ट्रंप की सख्त चेतावनी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले किसी भी जहाज पर हमला हुआ, तो अमेरिका ईरान के पुलों, बिजलीघरों और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों को निशाना बनाएगा। उन्होंने कहा कि समुद्री व्यापार में बाधा डालने की हर कोशिश का जवाब सैन्य कार्रवाई से दिया जाएगा। ईरान का पलटवार का ऐलान अमेरिकी चेतावनी के बाद ईरान ने भी कड़ा रुख अपनाया है। ईरानी सेना और विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि यदि अमेरिका ने देश के रणनीतिक ठिकानों पर हमला किया, तो ईरान भी पूरी ताकत से जवाब देगा। ईरान ने यह भी चेतावनी दी कि जरूरत पड़ने पर वह तेल आपूर्ति बाधित कर सकता है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर गंभीर असर पड़ सकता है। वैश्विक चिंता बढ़ी लगातार हो रहे हमलों के बीच दुनिया के दो सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग—होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य (Bab-el-Mandeb Strait)—की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तनाव और बढ़ता है, तो इसका असर वैश्विक तेल आपूर्ति, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर पड़ सकता है।
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को सख्त चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में किसी भी जहाज पर मिसाइल, ड्रोन या गोलीबारी से हमला किया गया, तो अमेरिका ईरान के भीतर पुलों, पावर प्लांट और अन्य रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाएगा। ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब दोनों देशों के बीच सैन्य और कूटनीतिक तनाव चरम पर है। ट्रंप की दो टूक चेतावनी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर लिखा कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले अमेरिकी या अन्य देशों के जहाजों पर ईरान की ओर से मिसाइल, ड्रोन या गोलीबारी की जाती है, तो अमेरिका इसका सीधा जवाब ईरान के महत्वपूर्ण रणनीतिक ठिकानों पर हमला करके देगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय नौवहन की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा। ईरान ने लगाए अंतरराष्ट्रीय कानून उल्लंघन के आरोप ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बगाई ने अमेरिका पर अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करने और ईरान की परमाणु सुविधाओं को निशाना बनाने की धमकी देने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि ईरान के शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी सभी जानकारियां पहले ही अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) को उपलब्ध कराई जा चुकी हैं। बगाई ने अमेरिकी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि कुछ स्थानों को लेकर लगाए जा रहे आरोप केवल सैन्य कार्रवाई का बहाना हैं। ईरान की पलटवार की चेतावनी ईरानी विदेश मंत्रालय ने कहा कि देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा पर किसी भी हमले का पूरी ताकत से जवाब दिया जाएगा। इस्माइल बगाई ने कहा कि ईरानी जनता किसी भी बाहरी आक्रामकता का सामना करने के लिए तैयार है और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। लारक द्वीप पर कथित हमले से बढ़ा तनाव तनाव के बीच ईरानी मीडिया ने दावा किया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में स्थित लारक द्वीप पर अमेरिकी मिसाइल हमला हुआ। ईरानी समाचार एजेंसी तसनीम के अनुसार, स्थानीय लोगों ने विस्फोट की आवाजें सुनीं और अधिकारी नुकसान का आकलन कर रहे हैं। हालांकि, अमेरिका ने इस कथित हमले की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, इसलिए इसकी स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल नहीं हो सकी है।
अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच ईरानी सरकारी मीडिया ने दावा किया है कि अमेरिकी सेना ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) के पास स्थित लारक द्वीप (Larak Island) पर मिसाइल हमला किया है। ईरानी मीडिया के अनुसार, हमले के बाद इलाके में जोरदार धमाकों की आवाजें सुनी गईं और स्थानीय प्रशासन नुकसान का आकलन कर रहा है। हालांकि, अमेरिका ने इस कथित हमले की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। लारक द्वीप पर हमले का दावा ईरानी सरकारी मीडिया के मुताबिक, बुधवार दोपहर लारक द्वीप पर मिसाइल हमला हुआ। स्थानीय लोगों ने तेज धमाकों की आवाजें सुनने की बात कही है, जबकि संबंधित एजेंसियां नुकसान का आकलन कर रही हैं। फिलहाल इस घटना की स्वतंत्र या आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। अमेरिकी सैन्य अभियान जारी इससे पहले अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने बताया था कि उसने लगातार कई रातों से ईरान से जुड़े सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। अमेरिका का कहना है कि इन अभियानों का उद्देश्य ईरान की उन सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना है, जिनसे होर्मुज जलडमरूमध्य में अंतरराष्ट्रीय जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है। तेल आपूर्ति पर मंडराया संकट होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल है। वैश्विक स्तर पर निर्यात होने वाले करीब 20 प्रतिशत कच्चे तेल की आवाजाही इसी मार्ग से होती है। ऐसे में क्षेत्र में किसी भी सैन्य तनाव का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय तेल और गैस बाजार पर पड़ सकता है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि यदि ईरान इस मार्ग पर नियंत्रण स्थापित करने या जहाजों से शुल्क वसूलने की कोशिश करता है, तो इसका असर पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ेगा। ट्रंप की चेतावनी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि यदि ईरान समर्थित हूती विद्रोही सऊदी अरब के समुद्री मार्गों को बाधित करने की कोशिश करते हैं, तो अमेरिका कड़ा सैन्य जवाब देगा। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान को अमेरिकी कार्रवाई से हुए नुकसान की भरपाई करने में कई वर्ष लग सकते हैं। वहीं, ईरान की ओर से दावा किया गया है कि उसने होर्मुज क्षेत्र में दो तेल टैंकरों को रोका है। हालांकि, इस दावे की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और तेल बाजार के लिए बड़ी चिंता बनता जा रहा है।
US-Iran War Updates: अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य संघर्ष लगातार तेज होता जा रहा है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, अमेरिकी सेना ने ईरान के खिलाफ लगातार 11वीं रात भी हवाई हमले किए। इस बीच अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने सीनेट में खुलासा किया कि अब तक इस सैन्य अभियान पर 37.5 अरब डॉलर (करीब 3.6 लाख करोड़ रुपये) खर्च हो चुके हैं। बढ़ते युद्ध खर्च को देखते हुए ट्रंप प्रशासन ने अब अतिरिक्त 70 अरब डॉलर के आपातकालीन रक्षा फंड की मांग की है, जिस पर अमेरिकी संसद में तीखी बहस छिड़ गई है। 11वीं रात भी जारी रहे अमेरिकी हमले CENTCOM ने सोशल मीडिया पर जानकारी दी कि अमेरिकी सेना ने ईरान के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए लगातार 11वीं रात ऑपरेशन जारी रखा। अमेरिका का कहना है कि इन हमलों का उद्देश्य ईरान की उन सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना है, जिनका इस्तेमाल होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों के लिए खतरा पैदा करने में किया जा रहा है। 3.6 लाख करोड़ रुपये पहुंचा युद्ध का खर्च सीनेट एप्रोप्रिएशन कमिटी की सुनवाई के दौरान रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने बताया कि ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान पर अब तक 37.5 अरब डॉलर खर्च हो चुके हैं। अप्रैल के अंत में यह अनुमान करीब 25 अरब डॉलर था, लेकिन लगातार बढ़ते सैन्य अभियानों के कारण खर्च में लगभग 12 अरब डॉलर की अतिरिक्त बढ़ोतरी हुई है। 70 अरब डॉलर के नए फंड की मांग रिपोर्टों के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन अब कांग्रेस से 70 अरब डॉलर के अतिरिक्त रक्षा बजट की मंजूरी चाहता है। इसमें से करीब 46 अरब डॉलर अत्याधुनिक हथियारों के उत्पादन और आपूर्ति बढ़ाने पर खर्च किए जाने का प्रस्ताव है। इसमें प्रिसिजन बम, हाइपरसोनिक मिसाइल, काउंटर-ड्रोन सिस्टम और अन्य आधुनिक रक्षा तकनीकों को प्राथमिकता दी गई है। रक्षा मंत्री हेगसेथ ने कहा कि मौजूदा वैश्विक सुरक्षा हालात को देखते हुए अमेरिकी सेना को आधुनिक हथियारों और संसाधनों से लैस करना आवश्यक है। सीनेट में सरकार से तीखे सवाल ट्रंप सरकार की अतिरिक्त फंडिंग मांग पर डेमोक्रेट सांसदों के साथ कुछ रिपब्लिकन नेताओं ने भी सवाल उठाए। सीनेट एप्रोप्रिएशन कमिटी की वरिष्ठ डेमोक्रेट सदस्य पैटी मरे ने कहा कि सरकार आपातकालीन बजट के नाम पर सामान्य संसदीय प्रक्रिया से बचने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि समस्या धन की कमी नहीं, बल्कि रक्षा विभाग की योजना और संसाधनों के प्रबंधन में खामियां हैं। बाइडेन प्रशासन पर साधा निशाना आलोचनाओं का जवाब देते हुए रक्षा मंत्री हेगसेथ ने पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया। उनका आरोप था कि पिछली सरकार की लापरवाही और रक्षा तैयारियों में कमी के कारण अब अतिरिक्त निवेश की जरूरत पड़ रही है। उन्होंने कहा कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन और नई सैन्य तकनीकों के बढ़ते इस्तेमाल को देखते हुए रक्षा व्यवस्था को तेजी से अपग्रेड करना जरूरी है।
अमेरिका में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की संभावित गिरफ्तारी को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी के बयान के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट कहा है कि नेतन्याहू को अमेरिका में किसी भी परिस्थिति में गिरफ्तार नहीं किया जाएगा। ट्रंप ने क्या कहा? डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए नेतन्याहू का समर्थन किया। उन्होंने लिखा कि इजरायल के प्रधानमंत्री ईरान के खिलाफ लड़ रहे हैं और उन्हें किसी भी हाल में गिरफ्तार नहीं किया जाएगा। ट्रंप ने कहा कि कार्रवाई उन लोगों के खिलाफ होनी चाहिए जिन्होंने क्षेत्र को हिंसा और संघर्ष की स्थिति में पहुंचाया है। उनके इस बयान को नेतन्याहू के प्रति अमेरिका के मजबूत समर्थन के रूप में देखा जा रहा है। ममदानी के बयान से शुरू हुआ विवाद विवाद की शुरुआत तब हुई जब न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने एक इंटरव्यू में कहा कि यदि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में शामिल होने न्यूयॉर्क आते हैं, तो उन्हें अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC) के वारंट के आधार पर गिरफ्तार किया जाना चाहिए। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि वह ऐसा करने के लिए मौजूदा कानूनों में बदलाव की कोशिश नहीं करेंगे। ICC वारंट का दिया हवाला ममदानी ने कहा कि उनके अनुसार नेतन्याहू को हेग में होना चाहिए, क्योंकि उन पर अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय ने युद्ध अपराधों के आरोप लगाए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने न्यूयॉर्क पुलिस विभाग से आईसीसी द्वारा वांछित नेताओं के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट लागू कराने की बात कही थी। इस सूची में नेतन्याहू के साथ रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भी नाम शामिल है। इजरायल के राजदूत ने किया पलटवार अमेरिका में इजरायल के राजदूत माइक वॉल्ट्ज ने ममदानी के बयान की कड़ी आलोचना की। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि नेतन्याहू की गिरफ्तारी की यह मांग कभी पूरी नहीं हो सकती। उन्होंने इसके पीछे चार प्रमुख कारण बताए: अमेरिका रोम स्टैच्यूट का सदस्य नहीं है, इसलिए वह आईसीसी के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय समझौते के तहत यूएन महासभा में आने वाले राष्ट्राध्यक्षों और सरकार प्रमुखों को राजनयिक सुरक्षा प्राप्त होती है। राष्ट्राध्यक्षों को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत विशेष प्रतिरक्षा (Head of State Immunity) हासिल होती है। किसी स्थानीय मेयर के अधिकार से ऊपर संघीय सरकार (Federal Authority) का अधिकार लागू होता है। क्यों अहम है यह मामला? यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब इजरायल और ईरान के बीच तनाव चरम पर है। ऐसे में नेतन्याहू को लेकर अमेरिका के भीतर भी राजनीतिक बहस तेज हो गई है। ट्रंप के बयान से साफ संकेत मिलता है कि यदि नेतन्याहू अमेरिका आते हैं, तो उन्हें अमेरिकी प्रशासन का पूरा समर्थन मिलेगा, जबकि ममदानी का बयान घरेलू और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस का कारण बन गया है।
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है। अमेरिकी सेना की नई सैन्य तैयारियों, ताजा हवाई हमलों और ईरान के जवाबी एक्शन के बाद पूरे मिडिल ईस्ट में बड़े सैन्य संघर्ष की आशंका गहरा गई है। इस टकराव का असर अब वैश्विक तेल बाजार और समुद्री व्यापार पर भी दिखाई देने लगा है। CENTCOM ने दिखाई सैन्य ताकत अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने सोमवार को मिडिल ईस्ट में तैनात अपनी सेना की ऑपरेशनल तैयारियों का प्रदर्शन करते हुए कहा कि उसके सभी हथियार और सैन्य सिस्टम हर समय मिशन के लिए पूरी तरह तैयार हैं। एएनआई के मुताबिक, अमेरिकी मरीन सैनिक हाई मोबिलिटी आर्टिलरी रॉकेट सिस्टम (HIMARS) सहित कई सैन्य उपकरणों के रखरखाव और तकनीकी तैयारियों में जुटे हैं, ताकि जरूरत पड़ने पर तुरंत कार्रवाई की जा सके। ईरान ने अमेरिका पर साधा निशाना CENTCOM के बयान के कुछ ही देर बाद ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने अमेरिका पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका एक ओर शांति की बात करता है, जबकि दूसरी ओर मिडिल ईस्ट में लगातार सैन्य उपकरण और हथियार भेज रहा है। गालिबाफ ने कहा कि ईरान अब अमेरिकी रणनीति को अच्छी तरह समझ चुका है और उसी के अनुरूप अपनी तैयारी कर चुका है। अमेरिका के नए हवाई हमले अमेरिकी सेना ने सोमवार तड़के ईरान के कई ठिकानों पर नए हवाई हमले किए। इससे पहले अमेरिका ने पुष्टि की थी कि इराक में एक अमेरिकी सैनिक की मौत हो गई। सेना के अनुसार, यह सैनिक एक ईरानी ड्रोन को निष्क्रिय करने की कार्रवाई के दौरान घायल हुआ था और बाद में उसकी मौत हो गई। ईरान का जवाबी हमला अमेरिकी कार्रवाई के जवाब में ईरान ने अमेरिका के सहयोगी देशों बहरीन और कुवैत को निशाना बनाया। बहरीन में अमेरिकी नौसेना का पांचवां बेड़ा (5th Fleet) तैनात है, इसलिए इस हमले को रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसके बाद पूरे खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा अलर्ट बढ़ा दिया गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ा संकट अमेरिका-ईरान संघर्ष का असर दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर भी पड़ने लगा है। समुद्री आवाजाही प्रभावित होने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है। इस तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई, जिससे वैश्विक ऊर्जा संकट गहराने की आशंका बढ़ गई है। ट्रंप का सख्त संदेश अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सैन्य कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा, "हमने उन्हें आज रात फिर बहुत जोरदार जवाब दिया।" उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई उन अमेरिकी सैनिकों के सम्मान में की गई है जिन्होंने हाल की घटनाओं में अपनी जान गंवाई। ट्रंप के बयान से संकेत मिलता है कि अमेरिका फिलहाल अपना सैन्य अभियान जारी रख सकता है। बढ़ सकती है क्षेत्रीय अस्थिरता विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य कार्रवाई इसी तरह जारी रही, तो इसका असर सिर्फ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक तेल आपूर्ति, समुद्री व्यापार, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में दुनिया की नजरें अब दोनों देशों के अगले कदम पर टिकी हैं।
वॉशिंगटन, एजेंसियां। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच जॉर्डन में तैनात अमेरिकी सैन्य ठिकाने पर ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमले में दो अमेरिकी सैनिकों की मौत हो गई है, जबकि एक अन्य सैनिक लापता बताया गया है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने आधिकारिक बयान जारी कर घटना की पुष्टि की है। यह हालिया संघर्ष में अमेरिकी सेना को हुआ सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है। हमले के दौरान मारे गए सैनिक CENTCOM के अनुसार, हमला उस समय हुआ जब अमेरिकी और सहयोगी सेनाएं ईरान की ओर से दागी गई मिसाइलों और ड्रोन को रोकने की कोशिश कर रही थीं। दो सैनिकों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि एक सैनिक अब भी लापता है। इसके अलावा चार अन्य अमेरिकी सैनिक घायल हुए थे, जिन्हें इलाज के बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है। अमेरिका ने ईरान को ठहराया जिम्मेदार अमेरिकी प्रशासन ने इस हमले के लिए सीधे तौर पर ईरान को जिम्मेदार ठहराया है। राष्ट्रपति प्रशासन ने कहा कि अमेरिकी सैनिकों पर हमला "बर्दाश्त नहीं किया जाएगा" और इसका उचित जवाब दिया जाएगा। पेंटागन ने क्षेत्र में अतिरिक्त सैन्य संसाधन भेजने की तैयारी भी शुरू कर दी है। पश्चिम एशिया में और बढ़ा तनाव इस घटना के बाद पूरे पश्चिम एशिया में तनाव और गहरा गया है। जॉर्डन, कुवैत, बहरीन और अन्य अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। क्षेत्र में मिसाइल रक्षा प्रणाली को हाई अलर्ट पर रखा गया है। संघर्ष और तेज होने की आशंका विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी सैनिकों की मौत के बाद अमेरिका की जवाबी कार्रवाई और तेज हो सकती है। इससे ईरान और अमेरिका के बीच चल रहा सैन्य टकराव और व्यापक होने की आशंका बढ़ गई है। संयुक्त राष्ट्र समेत कई देशों ने दोनों पक्षों से संयम बरतने और कूटनीतिक समाधान की अपील की है।
यरुशलम/बेरूत: मध्य पूर्व में लंबे समय से जारी संघर्ष को खत्म करने की दिशा में अमेरिका की मध्यस्थता से इजरायल और लेबनान के बीच एक महत्वपूर्ण फ्रेमवर्क समझौता तैयार किया गया है। इस समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच स्थायी शांति और सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था बहाल करना है। समझौते की घोषणा के तुरंत बाद हिज्बुल्लाह ने इसका कड़ा विरोध करते हुए चेतावनी दी है कि यदि इसे लागू करने की कोशिश की गई तो लेबनान गृहयुद्ध जैसी स्थिति की ओर बढ़ सकता है। अमेरिका ने किया समझौते का ऐलान अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने शुक्रवार को इस फ्रेमवर्क समझौते की घोषणा करते हुए कहा कि यह इजरायल और लेबनान के बीच स्थायी शांति की दिशा में पहला बड़ा कदम है। उन्होंने बताया कि अमेरिका ने पूरे समझौते में मध्यस्थ और सहयोगी की भूमिका निभाई है। इस समझौते पर लेबनान की राजदूत नादा हमादेह, इजरायल के राजदूत येचिएल लेइटर और अमेरिकी विदेश विभाग के अधिकारियों ने हस्ताक्षर किए। क्या हैं समझौते की प्रमुख शर्तें? समझौते के तहत दक्षिणी लेबनान में तत्काल युद्धविराम लागू करने और हिज्बुल्लाह द्वारा सभी तरह की सैन्य गतिविधियां एवं रॉकेट हमले रोकने की शर्त रखी गई है। इसके साथ ही संगठन को दक्षिणी लेबनान से पीछे हटना होगा। जिन इलाकों से इजरायली सेना और हिज्बुल्लाह पीछे हटेंगे, वहां लेबनानी सेना की तैनाती की जाएगी ताकि सीमा क्षेत्र में स्थायी सुरक्षा व्यवस्था स्थापित की जा सके। अमेरिका करेगा निगरानी, लेबनान को मिलेगी आर्थिक सहायता मार्को रुबियो ने बताया कि समझौते के क्रियान्वयन की निगरानी अमेरिका की अगुवाई में बनाए गए त्रिपक्षीय सैन्य समन्वय समूह द्वारा की जाएगी। इसके अलावा अमेरिका ने लेबनान के लिए तत्काल 10 करोड़ डॉलर की मानवीय सहायता देने की घोषणा की है। साथ ही लेबनानी सशस्त्र बलों को मजबूत करने और सरकारी नियंत्रण बढ़ाने के लिए 3 करोड़ डॉलर से अधिक की अतिरिक्त सहायता भी उपलब्ध कराई जाएगी। दक्षिणी लेबनान में बनाए जाएंगे दो पायलट जोन समझौते के तहत दक्षिणी लेबनान में दो पायलट सुरक्षा क्षेत्र विकसित किए जाएंगे। इन क्षेत्रों से इजरायली सेना चरणबद्ध तरीके से पीछे हटेगी और उनकी जगह लेबनानी सेना तैनात होगी। इजरायल ने स्पष्ट किया है कि सेना की पूरी वापसी तभी होगी जब हिज्बुल्लाह अपने हथियार छोड़ेगा और उसका सैन्य ढांचा पूरी तरह समाप्त होगा। लेबनान ने बताया संप्रभुता बहाल करने की दिशा में बड़ा कदम अमेरिका में लेबनान की राजदूत नादा हमादेह ने इस समझौते का स्वागत करते हुए कहा कि इससे लेबनान की संप्रभुता मजबूत होगी, सीमा पर संघर्ष समाप्त होगा और विस्थापित नागरिक अपने घर लौट सकेंगे। उन्होंने इस पहल का श्रेय लेबनान के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सशस्त्र बलों के सहयोग को दिया। नेतन्याहू बोले- हिज्बुल्लाह के निरस्त्रीकरण पर निर्भर करेगी आगे की कार्रवाई इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि लेबनानी सेना जल्द ही सीमावर्ती इलाकों का नियंत्रण संभालेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि इजरायली सेना की आगे की वापसी पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगी कि लेबनानी सेना हिज्बुल्लाह को हथियार छोड़ने और उसके सैन्य ढांचे को खत्म करने में कितनी सफल रहती है। इजरायल के राजदूत येचिएल लेइटर ने भी इस समझौते को "परफॉर्मेंस आधारित" बताते हुए कहा कि इसकी सफलता पूरी तरह जमीनी स्तर पर लागू होने वाले कदमों पर निर्भर करेगी। हिज्बुल्लाह ने किया समझौते का विरोध समझौते की घोषणा के तुरंत बाद हिज्बुल्लाह ने इसका कड़ा विरोध किया। संगठन के वरिष्ठ सांसद हसन फदलल्लाह ने कहा कि यदि लेबनानी सरकार अमेरिकी समर्थन के साथ इस समझौते को लागू करने की कोशिश करती है तो देश गृहयुद्ध जैसी स्थिति में पहुंच सकता है। उन्होंने कहा कि हिज्बुल्लाह किसी भी कीमत पर अपने हथियार नहीं छोड़ेगा और इस दिशा में किए जाने वाले हर प्रयास का विरोध करेगा। हजारों लोगों की जान ले चुका है संघर्ष इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच मौजूदा संघर्ष में अब तक भारी जनहानि हो चुकी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इजरायली सैन्य कार्रवाई में 4,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 10 लाख से ज्यादा लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं। वहीं संघर्ष के दौरान 37 इजरायली सैनिकों के भी मारे जाने की जानकारी सामने आई है। ऐसे में यह समझौता क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने की दिशा में एक अहम पहल माना जा रहा है, हालांकि हिज्बुल्लाह के विरोध के चलते इसके सफल क्रियान्वयन को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है।
Israel-Lebanon Conflict: दक्षिणी लेबनान में इज़राइल की सैन्य मौजूदगी को लेकर एक नया दावा सामने आने के बाद क्षेत्र में हलचल तेज हो गई है। एक अमेरिकी अधिकारी ने दावा किया है कि इज़राइल ने दक्षिणी लेबनान के कुछ कब्जे वाले इलाकों से अपनी सेना हटा ली है। लेबनान के अधिकारियों ने इस दावे की पुष्टि करने से इनकार किया है। ऐसे में सीमा पर हालात अब भी तनावपूर्ण बने हुए हैं और विस्थापित नागरिक अपने घर लौटने का इंतजार कर रहे हैं। अमेरिकी अधिकारी का दावा, लेबनान ने नहीं की पुष्टि मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि इज़राइली सेना दक्षिणी लेबनान के कुछ इलाकों से पीछे हट चुकी है और अब वहां सुरक्षा की जिम्मेदारी लेबनानी सेना को संभालनी चाहिए। यह दावा ऐसे समय सामने आया है, जब अमेरिका क्षेत्रीय तनाव कम करने के लिए लगातार कूटनीतिक प्रयास कर रहा है। लेबनान के एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि दक्षिणी लेबनान में इज़राइल द्वारा बनाए गए तथाकथित "बफर जोन" से सेना हटने की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। युद्धविराम के बावजूद सीमा पर तनाव कायम इज़राइल और हिज्बुल्लाह के बीच लंबे समय से जारी संघर्ष के बीच कई बार युद्धविराम की घोषणा की गई, लेकिन सीमा पर तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। हाल के महीनों में छिटपुट घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। फिलहाल अमेरिका की मध्यस्थता से क्षेत्र में तनाव कम करने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात अब भी सामान्य नहीं हो पाए हैं। ईरान और हिज्बुल्लाह की स्पष्ट शर्त ईरान ने कहा है कि किसी भी व्यापक शांति समझौते में लेबनान की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और इज़राइल को दक्षिणी लेबनान से पूरी तरह सेना हटानी होगी। वहीं, हिज्बुल्लाह ने भी स्पष्ट किया है कि वह अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में किसी भी तरह की इज़राइली सैन्य मौजूदगी स्वीकार नहीं करेगा और कब्जे का विरोध जारी रखेगा। घर लौटने का इंतजार कर रहे हजारों विस्थापित दक्षिणी लेबनान के कई गांव युद्ध के दौरान भारी तबाही का शिकार हुए हैं। बड़ी संख्या में लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए थे और अब भी सुरक्षित वापसी का इंतजार कर रहे हैं। दिब्बीन गांव की निवासी मिलिया अल-शेख ने बताया कि उनका घर अब भी बंद सैन्य क्षेत्र में है। गांव तक जाने वाले रास्तों पर कंटीले तार लगे हैं और आम नागरिकों की आवाजाही प्रतिबंधित है। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि उन्हें अपने घर की मौजूदा स्थिति तक की जानकारी नहीं है। स्थायी शांति पर टिकी दुनिया की नजर दक्षिणी लेबनान में हालात को लेकर अब भी असमंजस बना हुआ है। एक ओर सेना हटने के दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर स्थानीय प्रशासन इसकी पुष्टि नहीं कर रहा। ऐसे में क्षेत्र के हजारों विस्थापित लोगों की सुरक्षित वापसी और स्थायी शांति को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर आने वाले घटनाक्रम पर टिकी हुई है।
Washington: ईरान के मिनाब स्कूल पर हुए घातक मिसाइल हमले को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बड़ा बयान दिया है। ट्रंप ने कहा कि अब तक ऐसा कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है, जिससे यह साबित हो सके कि स्कूल पर हमला अमेरिकी मिसाइल से किया गया था। उन्होंने कहा कि युद्ध के दौरान कई पक्षों की ओर से लगातार मिसाइलें दागी जा रही थीं, इसलिए हमले के लिए जिम्मेदार पक्ष की पहचान करना आसान नहीं है। 'हमारी मिसाइल थी, इसका कोई प्रमाण नहीं' हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने कहा कि कुछ लोगों ने दावा किया कि मिनाब स्कूल पर अमेरिकी मिसाइल से हमला हुआ, लेकिन उनके पास इस दावे की पुष्टि करने वाला कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं है। उन्होंने कहा, "युद्ध के दौरान हर दिशा से मिसाइलें दागी जा रही थीं। ऐसे में यह तय करना बेहद मुश्किल है कि किस मिसाइल ने हमला किया। मुझे ऐसा कोई सबूत नहीं दिखा जिससे यह कहा जा सके कि वह हमारी मिसाइल थी।" 28 फरवरी को हुआ था भीषण हमला ईरान-अमेरिका संघर्ष के पहले दिन यानी 28 फरवरी को मिनाब स्थित एक स्कूल पर मिसाइल हमला हुआ था। इस हमले में 150 से अधिक लोगों की मौत हुई थी, जिनमें बड़ी संख्या में स्कूली छात्राएं शामिल थीं। घटना के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली और हमले की निष्पक्ष जांच की मांग उठी। अमेरिका पर लगे थे गंभीर आरोप हमले के तुरंत बाद कई मीडिया रिपोर्टों और विश्लेषकों ने आशंका जताई थी कि इसके पीछे अमेरिकी सैन्य कार्रवाई हो सकती है। अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) ने अब तक इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की है और मामले की जांच जारी होने की बात कही है। ट्रंप ने जांच पर भी जताया संदेह डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि इतने बड़े सैन्य संघर्ष के दौरान यह तय करना बेहद कठिन है कि किसी विशेष हमले के लिए कौन जिम्मेदार था। उन्होंने यह भी कहा कि संभव है कि इस मामले की पूरी सच्चाई कभी सामने ही न आ सके। उनके मुताबिक, युद्ध क्षेत्र में लगातार हो रहे हमलों और अलग-अलग पक्षों की सैन्य गतिविधियों के कारण जांच एजेंसियों के सामने भी बड़ी चुनौती है। दुनिया की नजर जांच रिपोर्ट पर मिनाब स्कूल पर हुआ हमला ईरान-अमेरिका संघर्ष की सबसे दर्दनाक घटनाओं में गिना जा रहा है। बड़ी संख्या में बच्चों और नागरिकों की मौत के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस मामले की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है। अब दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि जांच एजेंसियां इस हमले के लिए जिम्मेदार पक्ष की पहचान कर पाती हैं या नहीं।
नई दिल्ली/वर्साय: ईरान से जुड़े क्षेत्रीय संघर्ष और मध्य-पूर्व में कई महीनों तक बनी अस्थिरता ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को गहरे संकट में डाल दिया है। एनालिटिक्स फर्म केपलर (Kpler) की एक रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध के लगभग चार महीनों के दौरान वैश्विक बाजार से करीब 115 करोड़ बैरल (1.15 बिलियन बैरल) तेल की सप्लाई प्रभावित हुई, जिसका असर आने वाले महीनों तक बना रह सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, संघर्ष के दौरान मध्य-पूर्व से तेल आपूर्ति में भारी बाधा आई, जिसके कारण दुनिया भर के रणनीतिक (Strategic) और वाणिज्यिक (Commercial) तेल भंडार तेजी से घटे हैं। पिछले कुछ महीनों में वैश्विक भंडार से करीब 19 करोड़ बैरल तेल निकाला जा चुका है। रणनीतिक तेल भंडार कई दशकों के निचले स्तर पर रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) से जुड़े देशों के रणनीतिक तेल भंडार 1990 के बाद के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं। वहीं, अमेरिका का आपातकालीन तेल भंडार भी कई दशकों के निचले स्तर पर बताया जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वर्साय में आयोजित जी7 बैठक के दौरान कहा कि यदि संघर्ष लंबा खिंचता, तो अमेरिकी तेल भंडार पर गंभीर दबाव पड़ सकता था। उन्होंने दावा किया कि मौजूदा परिस्थितियों में भंडार कुछ ही हफ्तों में समाप्त होने की स्थिति तक पहुंच सकते थे। युद्धविराम के बाद कच्चे तेल की कीमतों में राहत अमेरिका और ईरान के बीच प्रारंभिक समझौते तथा होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) के दोबारा खुलने की खबरों के बाद वैश्विक तेल बाजार को राहत मिली है। युद्ध के दौरान ब्रेंट क्रूड की कीमत 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी, जो अब घटकर 80 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि कीमतों में गिरावट के बावजूद सप्लाई पूरी तरह सामान्य होने में अभी समय लगेगा। सप्लाई चेन बहाली में लग सकते हैं कई महीने ऊर्जा विशेषज्ञों के मुताबिक, होर्मुज जलडमरूमध्य खुलने के बाद भी तेल आपूर्ति तुरंत सामान्य नहीं हो सकती। समुद्री मार्गों की सुरक्षा, टैंकरों की उपलब्धता, उत्पादन बढ़ाने और लॉजिस्टिक नेटवर्क को फिर से पटरी पर लाने में कई महीने लग सकते हैं। RBC कैपिटल मार्केट्स की ऊर्जा विशेषज्ञ हेलिमा क्रॉफ्ट का कहना है कि बाजार जरूरत से ज्यादा आशावादी नजर आ रहा है। उनके अनुसार, संकट पूरी तरह समाप्त मान लेना जल्दबाजी होगी क्योंकि तेल आपूर्ति तंत्र के सामने अभी भी कई चुनौतियां मौजूद हैं। OPEC उत्पादन बढ़ा सकता है इंफ्रास्ट्रक्चर कैपिटल एडवाइजर्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जे हैटफील्ड का मानना है कि आर्थिक दबाव का सामना कर रहे कई OPEC सदस्य देश उत्पादन बढ़ाने के पक्ष में हो सकते हैं। इससे बाजार में अतिरिक्त सप्लाई आएगी और कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। मैक्वेरी ग्रुप के ग्लोबल ऑयल एंड गैस रणनीतिकार विकास द्विवेदी का कहना है कि युद्ध से पहले दुनिया के पास पर्याप्त तेल भंडार मौजूद था, जिससे बाजार पूरी तरह अस्थिर नहीं हुआ। उनका मानना है कि युद्ध के दौरान गायब हुई 115 करोड़ बैरल तेल आपूर्ति की भरपाई आसान नहीं होगी। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि दुनिया मांग से प्रतिदिन 50 लाख बैरल अधिक तेल का उत्पादन भी करे, तब भी इस कमी को पूरा करने में लगभग एक वर्ष लग सकता है। दुनिया में रोजाना 10.3 करोड़ बैरल तेल उत्पादन अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) और अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया में वर्तमान में प्रतिदिन औसतन 10.3 करोड़ बैरल कच्चे तेल का उत्पादन हो रहा है। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है और वैश्विक उत्पादन का लगभग 13 प्रतिशत हिस्सा अकेले देता है। इसके बाद सऊदी अरब, रूस, कनाडा और इराक का स्थान है। ये पांच देश मिलकर दुनिया की कुल तेल आपूर्ति का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा उपलब्ध कराते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन प्रमुख उत्पादक देशों में किसी भी प्रकार का युद्ध, प्रतिबंध या उत्पादन संकट सीधे वैश्विक ऊर्जा बाजार और पेट्रोल-डीजल की कीमतों को प्रभावित करता है।
नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है। इसके बावजूद भारत समेत कई एशियाई देशों तक कच्चे तेल और LNG की आपूर्ति पूरी तरह बंद नहीं हुई है, बल्कि अब यह अधिक गोपनीय तरीके से की जा रही है। विश्लेषकों के अनुसार, युद्ध से पहले की तुलना में होर्मुज मार्ग से टैंकर ट्रैफिक 90 से 95 प्रतिशत तक घट चुका है। इसके चलते वैश्विक तेल और गैस सप्लाई को ट्रैक करना पहले की तुलना में कहीं अधिक कठिन हो गया है। क्या है 'डार्क मोड' रणनीति? शिपिंग डेटा के अनुसार, बड़ी संख्या में तेल टैंकर अब 'डार्क मोड' में संचालन कर रहे हैं। इसका मतलब है कि जहाज होर्मुज जलडमरूमध्य या फारस की खाड़ी में प्रवेश करते समय अपने AIS (ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम) ट्रांसपोंडर बंद कर देते हैं। पहले इस रणनीति का इस्तेमाल मुख्य रूप से प्रतिबंधों से बचने के लिए ईरान से जुड़े जहाज करते थे, लेकिन अब सामान्य वाणिज्यिक जहाज भी सुरक्षा कारणों और परिचालन जोखिमों के चलते ऐसा कर रहे हैं। वोर्टेक्सा (Vortexa) के आंकड़ों के मुताबिक, इस क्षेत्र से गुजरने वाले 57 प्रतिशत जहाजों ने अपने ट्रांसपोंडर बंद रखे, जबकि मई में यह आंकड़ा बढ़कर रिकॉर्ड 65.2 प्रतिशत तक पहुंच गया। भारत, चीन और पाकिस्तान तक जारी है सप्लाई मौजूदा संकट के बावजूद भारत, चीन और पाकिस्तान जैसे देशों को तेल और LNG की आपूर्ति जारी है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इसके लिए वैकल्पिक समुद्री कॉरिडोर और विशेष मार्गों का उपयोग किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र में ईरान का प्रभाव बढ़ने के कारण कई जहाज सुरक्षित मार्गों के जरिए अपनी खेप गंतव्य देशों तक पहुंचा रहे हैं। सामान्य स्थिति लौटने की उम्मीदें कमजोर शुरुआती अनुमान यह था कि युद्ध कुछ महीनों में समाप्त हो जाएगा और जून से होर्मुज जलडमरूमध्य में सामान्य गतिविधियां बहाल होने लगेंगी। लेकिन संघर्ष अब चौथे महीने में पहुंच चुका है और स्थिति अभी भी अनिश्चित बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में किसी समझौते के बाद भी इस मार्ग को पूरी तरह जोखिम-मुक्त नहीं माना जा सकेगा, क्योंकि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में बदलाव आ चुका है। वैश्विक ऊर्जा बाजार पर बना रहेगा असर होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक माना जाता है। वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में यहां जारी तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय बाजार, शिपिंग लागत और ऊर्जा कीमतों पर लंबे समय तक दिखाई दे सकता है।
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। अमेरिकी सेना ने दावा किया है कि उसने ईरान के गोरुक और केशम द्वीप पर स्थित ड्रोन कमांड और रडार ठिकानों पर हमला किया है। वाशिंगटन का कहना है कि यह कार्रवाई आत्मरक्षा में की गई, क्योंकि ईरान ने अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र के ऊपर उड़ रहे एक अमेरिकी ड्रोन को मार गिराया था। अमेरिकी ड्रोन गिराए जाने के बाद की कार्रवाई अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, ईरान ने एक अमेरिकी MQ-1 ड्रोन को निशाना बनाया था। इसके जवाब में अमेरिकी लड़ाकू विमानों ने ईरानी हवाई सुरक्षा प्रणालियों, एक ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन और दो हमलावर ड्रोन को नष्ट कर दिया। अमेरिकी सेना ने कहा कि कार्रवाई के दौरान उसके किसी भी सैनिक या सैन्य उपकरण को नुकसान नहीं पहुंचा। वाशिंगटन ने इसे क्षेत्र में अपनी सुरक्षा और सैन्य हितों की रक्षा के लिए उठाया गया कदम बताया है। ईरान ने भी किया जवाबी हमला अमेरिकी हमले के बाद ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई का दावा किया है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने कहा कि उसकी एयरोस्पेस फोर्स ने उस एयरबेस को निशाना बनाया, जिसका इस्तेमाल कथित तौर पर सिरिक द्वीप पर एक दूरसंचार टावर पर अमेरिकी हमले के लिए किया गया था। ईरान ने यह नहीं बताया कि संबंधित एयरबेस कहां स्थित है और हमले में कितना नुकसान हुआ। पिछले सप्ताह भी हुई थी सैन्य कार्रवाई दोनों देशों के बीच यह टकराव नया नहीं है। पिछले सप्ताह भी अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य के पास संचालित एक ईरानी ड्रोन अभियान को निशाना बनाया था। इसके बाद ईरान ने भी अमेरिकी हितों से जुड़े एक ठिकाने पर हमला करने का दावा किया था। लगातार हो रही सैन्य कार्रवाइयों ने क्षेत्र में तनाव को और बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के बीच प्रत्यक्ष टकराव का खतरा अभी पूरी तरह टला नहीं है। समझौते की बात, लेकिन जारी है तनाव दिलचस्प बात यह है कि एक ओर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ संभावित समझौते की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर दोनों देशों के बीच सैन्य कार्रवाई का सिलसिला जारी है। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने चेतावनी दी है कि यदि भविष्य में होने वाला कोई समझौता अमेरिका की सुरक्षा संबंधी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता है, तो सैन्य कार्रवाई दोबारा शुरू की जा सकती है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी सेना हर परिस्थिति के लिए तैयार है। ट्रंप ने समझौते के मसौदे में मांगे बदलाव मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के साथ प्रस्तावित समझौते के मसौदे को संशोधन के लिए वापस भेज दिया है। बताया जा रहा है कि उन्होंने कई अहम बदलाव सुझाए हैं और समझौते को अंतिम रूप देने में जल्दबाजी नहीं दिखा रहे हैं। ऐसे में कूटनीतिक बातचीत और सैन्य तनाव साथ-साथ चलते दिखाई दे रहे हैं, जिससे पश्चिम एशिया की स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।
Reserve Bank of India की ताजा वार्षिक रिपोर्ट में भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर एक अहम संकेत दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार देश की आर्थिक स्थिति फिलहाल मजबूत बनी हुई है, लेकिन आने वाले समय में सबसे बड़ा खतरा घरेलू नहीं बल्कि वैश्विक परिस्थितियों से पैदा हो सकता है। रिजर्व बैंक ने साफ कहा है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, बढ़ती तेल कीमतें, वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता और सप्लाई चेन में बाधाएं भारत की विकास रफ्तार पर असर डाल सकती हैं। मजबूत अर्थव्यवस्था के बावजूद बढ़ी चिंता आरबीआई ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था अभी मजबूत उपभोक्ता मांग, सरकारी निवेश और स्वस्थ बैंकिंग सिस्टम के सहारे आगे बढ़ रही है। कॉरपोरेट और बैंकों की बैलेंस शीट पहले की तुलना में बेहतर स्थिति में हैं। इसके बावजूद केंद्रीय बैंक का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय हालात तेजी से बदल रहे हैं और उनका सीधा असर भारत पर पड़ सकता है। पश्चिम एशिया का तनाव बना सबसे बड़ा जोखिम रिपोर्ट में पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष को वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया गया है। आरबीआई के मुताबिक इस तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने वैश्विक विकास दर के अनुमान घटा दिए हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि यदि यह संघर्ष और बढ़ता है या लंबे समय तक जारी रहता है, तो इसका असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा। भारत जैसे देशों के लिए यह चिंता और अधिक गंभीर है क्योंकि देश कच्चे तेल के आयात पर काफी निर्भर है। महंगा तेल बढ़ा सकता है महंगाई आरबीआई ने चेतावनी दी है कि तेल की कीमतों में बढ़ोतरी भारत में महंगाई को फिर से बढ़ा सकती है। पेट्रोल-डीजल महंगे होने का असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि ट्रांसपोर्ट, खाद्य पदार्थ, लॉजिस्टिक्स और रोजमर्रा के सामानों की कीमतों पर भी पड़ता है। यानी पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव आम लोगों की जेब पर सीधा असर डाल सकता है। शिपिंग संकट से उद्योगों पर दबाव केंद्रीय बैंक ने वैश्विक शिपिंग रूट्स में आ रही बाधाओं को भी बड़ी चिंता बताया है। रिपोर्ट के अनुसार यदि समुद्री व्यापार प्रभावित होता है तो भारत में कच्चे माल और जरूरी उत्पादों की लागत बढ़ सकती है। भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन से जुड़ा हुआ है। इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, केमिकल और कई औद्योगिक उत्पाद विदेशों से आने वाले कच्चे माल पर निर्भर करते हैं। ऐसे में शिपिंग लागत बढ़ने का असर उत्पादन और कीमतों दोनों पर पड़ सकता है। वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता का असर आरबीआई ने यह भी कहा कि दुनिया में बढ़ता संरक्षणवाद और बदलती व्यापार नीतियां भारत के निर्यात क्षेत्र के लिए चुनौती बन सकती हैं। भारत इस समय खुद को एक बड़े मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट हब के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में यदि वैश्विक व्यापार धीमा पड़ता है तो इंजीनियरिंग, फार्मा और आईटी सेवाओं जैसे सेक्टर प्रभावित हो सकते हैं। शेयर बाजार में बढ़ सकती है हलचल रिपोर्ट में शेयर बाजार को लेकर भी सावधानी जताई गई है। आरबीआई का कहना है कि वैश्विक अनिश्चितता बढ़ने पर निवेशक जोखिम लेने से बचते हैं, जिससे बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है। खासतौर पर टेक्नोलॉजी सेक्टर के ऊंचे वैल्यूएशन में सुधार देखने को मिल सकता है। हालांकि आरबीआई ने किसी बड़े बाजार संकट की भविष्यवाणी नहीं की है, लेकिन निवेशकों को सतर्क रहने की सलाह जरूर दी है। फिर भी भारत की ग्रोथ पर भरोसा कायम इन सभी चुनौतियों के बावजूद आरबीआई ने भारत की आर्थिक स्थिति को मजबूत बताया है। रिपोर्ट के अनुसार सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च, निजी निवेश और नए व्यापार समझौते आने वाले वर्षों में विकास को समर्थन देंगे। केंद्रीय बैंक का मानना है कि भारत पहले की तुलना में कहीं ज्यादा मजबूत अर्थव्यवस्था बन चुका है, लेकिन अब देश की अर्थव्यवस्था वैश्विक घटनाओं से पहले से अधिक जुड़ चुकी है।
अमेरिकी सीनेटर Lindsey Graham ने ईरान-इजराइल तनाव के बीच पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान खुद को मध्यस्थ बताता है, लेकिन उसका इजराइल के प्रति रवैया हमेशा विरोधी रहा है। ग्राहम ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए पाकिस्तान से अब्राहम समझौते को लेकर स्पष्ट जवाब देने की मांग की। ईरानी सैन्य विमानों को लेकर भी किया दावा लिंडसे ग्राहम ने दावा किया कि ईरानी सैन्य विमान पाकिस्तान के एयरबेस पर मौजूद हैं। हालांकि उन्होंने अपने दावे के समर्थन में कोई आधिकारिक सबूत सार्वजनिक नहीं किया। उनका बयान ऐसे समय आया है जब मध्य पूर्व में ईरान और इजराइल के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। पाकिस्तान के पुराने बयान का किया जिक्र ग्राहम ने पाकिस्तान के रक्षा मंत्री के एक पुराने बयान का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि पाकिस्तान कभी अब्राहम समझौते का हिस्सा नहीं बनेगा क्योंकि उसे इजराइल पर भरोसा नहीं है। अमेरिकी सांसद ने कहा कि भले यह बयान पुराना हो, लेकिन पाकिस्तान की सोच आज भी वैसी ही दिखाई देती है। ट्रम्प की अपील का जवाब देने को कहा ग्राहम ने कहा कि अब पाकिस्तान को Donald Trump की उस अपील पर जवाब देना चाहिए, जिसमें मुस्लिम देशों से इजराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने की बात कही गई थी। उन्होंने कहा कि यदि पाकिस्तान खुद को क्षेत्र में शांति का समर्थक बताता है, तो उसे अपने रुख को साफ करना चाहिए। क्या है अब्राहम समझौता? Abraham Accords के तहत कुछ अरब देशों ने इजराइल के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए थे और इजराइल को आधिकारिक मान्यता दी थी। इस समझौते के जरिए मध्य पूर्व में नए राजनीतिक और आर्थिक सहयोग की शुरुआत हुई थी। अमेरिका चाहता है कि और मुस्लिम देश भी इसमें शामिल हों। पाकिस्तान अब तक समझौते से दूर पाकिस्तान अब तक अब्राहम समझौते का हिस्सा नहीं बना है। पाकिस्तान लंबे समय से कहता आया है कि फिलिस्तीन मुद्दे का समाधान हुए बिना वह इजराइल को मान्यता नहीं देगा। पाकिस्तान की आधिकारिक नीति यही रही है कि स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य बनने के बाद ही इजराइल के साथ संबंधों पर विचार किया जाएगा। मध्य पूर्व तनाव के बीच बढ़ी कूटनीतिक चर्चा ईरान-इजराइल तनाव बढ़ने के बीच अमेरिका, पाकिस्तान और अन्य मुस्लिम देशों की भूमिका को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में मध्य पूर्व की राजनीति और कूटनीतिक समीकरणों में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
इजरायल ने दावा किया है कि गाजा पट्टी में चलाए गए एक बड़े सैन्य अभियान में हमास के नए सैन्य प्रमुख मोहम्मद ओदेह को मार गिराया गया है। इजरायल डिफेंस फोर्स (IDF) के मुताबिक, गाजा के रिमाल इलाके में की गई एयरस्ट्राइक में ओदेह की मौत हुई। इजरायली सेना का कहना है कि मोहम्मद ओदेह 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल पर हुए हमले के प्रमुख योजनाकारों में शामिल था। एक हफ्ते पहले ही बना था हमास का नया सैन्य प्रमुख इजरायल के अनुसार, मोहम्मद ओदेह को करीब एक सप्ताह पहले ही हमास की सैन्य शाखा की कमान सौंपी गई थी। उसने एज्जेदीन अल-हद्दाद की जगह ली थी। इजरायल ने दावा किया था कि एज्जेदीन अल-हद्दाद की भी 15 मई को गाजा में किए गए एक हमले में मौत हो गई थी। नेतन्याहू बोले- सभी जिम्मेदार लोगों तक पहुंचेंगे इजरायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने इस कार्रवाई की पुष्टि करते हुए कहा कि 7 अक्टूबर हमले में शामिल हर व्यक्ति को निशाना बनाया जाएगा। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि इजरायल हमले के सभी जिम्मेदार लोगों तक पहुंचेगा और कार्रवाई जारी रहेगी। ओदेह पर हत्या और अपहरण की साजिश का आरोप इजरायली सेना ने मोहम्मद ओदेह पर कई इजरायली नागरिकों और सैनिकों की हत्या, अपहरण और हमलों की साजिश रचने का आरोप लगाया है। IDF के मुताबिक, 7 अक्टूबर हमले के दौरान वह हमास के इंटेलिजेंस स्टाफ का प्रमुख था और हमले की योजना तैयार करने में उसकी अहम भूमिका थी। दक्षिण लेबनान में भी बढ़े इजरायली हमले गाजा के साथ-साथ इजरायल ने दक्षिण लेबनान में भी अपने हवाई हमले तेज कर दिए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, टायर और मरजायौन जिलों समेत कई इलाकों में लगातार एयरस्ट्राइक की गईं। बुर्ज रहाल, सरीफा, अस-सवाना और कबरिखा जैसे इलाकों को भी निशाना बनाया गया। अरबी मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि मंगलवार को हुए हमलों में 31 लोगों की मौत हुई, जबकि करीब 40 लोग घायल हुए हैं। हिजबुल्लाह पर दबाव बढ़ा रहा इजरायल प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने हाल ही में सेना को हिजबुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई और तेज करने के निर्देश दिए थे। उन्होंने कहा था कि इजरायल हिजबुल्लाह के साथ युद्ध जैसी स्थिति में है और हाल के हफ्तों में उसके 600 से ज्यादा लड़ाकों को मार गिराया गया है। इजरायल ने कहा- कार्रवाई और तेज होगी नेतन्याहू ने अपने वीडियो संदेश में कहा कि इजरायल अपनी सैन्य कार्रवाई धीमी नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि सेना को और अधिक तेज और सख्त अभियान चलाने के निर्देश दिए गए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ड्रोन हमलों में बढ़ोतरी के बाद इजरायल ने अपनी सैन्य रणनीति और ज्यादा आक्रामक कर दी है।
Donald Trump प्रशासन एक बार फिर ईरान के खिलाफ बड़े सैन्य कदम की तैयारी में जुटा दिखाई दे रहा है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक व्हाइट हाउस, पेंटागन और खुफिया एजेंसियों में हाई अलर्ट जैसी स्थिति बना दी गई है। इसी बीच ट्रंप ने अपने निजी कार्यक्रम और छुट्टियां भी रद्द कर दी हैं, जिससे अटकलें और तेज हो गई हैं। बेटे की शादी में भी नहीं जाएंगे ट्रंप अमेरिका में 25 मई को मेमोरियल डे के चलते लंबा वीकेंड है। ट्रंप पहले न्यू जर्सी स्थित अपने गोल्फ क्लब में समय बिताने वाले थे, लेकिन उन्होंने अचानक कार्यक्रम बदल दिया। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर जानकारी दी कि वह अपने बेटे डोनाल्ड ट्रंप जूनियर और बेटिना एंडरसन की शादी में शामिल नहीं हो पाएंगे। उन्होंने इसकी वजह “सरकारी परिस्थितियां” बताई। इसके बाद उनका काफिला वॉशिंगटन डीसी में तेजी से व्हाइट हाउस लौटता देखा गया। अमेरिकी सेना और खुफिया एजेंसियां अलर्ट पर रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी सेना और इंटेलिजेंस एजेंसियों के कई अधिकारियों ने भी अपनी छुट्टियां रद्द कर दी हैं। विदेशों में तैनात अमेरिकी सैन्य ठिकानों के लिए “रिकॉल रोस्टर” अपडेट किए जा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार मध्य पूर्व में मौजूद कुछ अमेरिकी सैनिकों को संवेदनशील इलाकों से हटाया भी जा रहा है। माना जा रहा है कि अमेरिका संभावित जवाबी हमले की आशंका को देखते हुए अपनी तैयारियां मजबूत कर रहा है। ईरान के IRGC की बड़ी चेतावनी Islamic Revolutionary Guard Corps यानी IRGC ने अमेरिका और इजरायल को खुली चेतावनी दी है। IRGC ने कहा कि अगर ईरान पर फिर हमला हुआ तो जवाब सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। ईरान ने अपने पश्चिमी हवाई क्षेत्र में NOTAM जारी कर सोमवार तक उड़ानों पर रोक लगा दी है। इसे संभावित सैन्य गतिविधियों से जोड़कर देखा जा रहा है। अमेरिका ने दिया “फाइनल ऑफर” रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका ने ईरान को एक “अंतिम प्रस्ताव” दिया है। कहा जा रहा है कि अगर तेहरान इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करता, तो अगले 24 घंटे में सैन्य कार्रवाई दोबारा शुरू हो सकती है। ट्रंप ने हाल ही में बयान दिया कि “ईरान समझौता करना चाहता है” और अमेरिका हालात पर नजर बनाए हुए है। असली विवाद क्या है? अमेरिका और ईरान के बीच सबसे बड़ा विवाद परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज स्ट्रेट को लेकर है। अमेरिका चाहता है कि ईरान यूरेनियम एनरिचमेंट पूरी तरह बंद करे ईरान इस मांग को मानने को तैयार नहीं है तेहरान अपने विदेशी फ्रीज एसेट्स जारी करने और युद्ध नुकसान की भरपाई की मांग कर रहा है ईरान होर्मुज स्ट्रेट पर टोल व्यवस्था की भी बात कर रहा है विशेषज्ञ मानते हैं कि दोनों देशों के बीच तनाव की जड़ यही मुद्दे हैं। पाकिस्तान और कतर निभा रहे मध्यस्थ की भूमिका रिपोर्ट्स के अनुसार Asim Munir इस समय तेहरान में मौजूद हैं। वहीं कतर का प्रतिनिधिमंडल भी ईरान पहुंचा हुआ है। दोनों देश अमेरिका और ईरान के बीच बैक-चैनल बातचीत कराने की कोशिश कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि पाकिस्तान सेना प्रमुख की मुलाकात IRGC के वरिष्ठ अधिकारियों से हो सकती है। फरवरी में शुरू हुआ था संघर्ष 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर संयुक्त हवाई हमले किए थे। इसके बाद दोनों पक्षों में जवाबी कार्रवाई का दौर शुरू हुआ। 8 अप्रैल को सीजफायर पर सहमति बनी, लेकिन उसके बाद भी धमकियों, प्रतिबंधों और सैन्य तैयारियों का सिलसिला जारी है। अब ट्रंप प्रशासन की गतिविधियों से यह आशंका बढ़ गई है कि हालात फिर से बड़े टकराव की ओर बढ़ सकते हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।