ईरान की संसद में एक ऐसे प्रस्तावित कानून पर चर्चा की खबर सामने आई है, जिसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस बिल में अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और इजरायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu की हत्या करने वाले को 50 मिलियन यूरो यानी करीब 560 करोड़ रुपये तक का इनाम देने का प्रावधान शामिल हो सकता है। क्या है पूरा मामला? ब्रिटिश मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति इस प्रस्ताव पर विचार कर रही है। बताया जा रहा है कि प्रस्तावित बिल का नाम “इस्लामिक रिपब्लिक की सैन्य और सुरक्षा बलों द्वारा जवाबी कार्रवाई” रखा गया है। रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि ईरान के सांसद Ebrahim Azizi ने कहा कि ईरान अपने शीर्ष नेतृत्व पर हुए हमलों के लिए अमेरिका और इजरायल को जिम्मेदार मानता है। ट्रंप और नेतन्याहू पर गंभीर आरोप ईरानी नेताओं का आरोप है कि फरवरी में हुए हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei की मौत के पीछे अमेरिका और इजरायल की भूमिका थी। प्रस्तावित बिल में अमेरिकी सैन्य अधिकारी एडमिरल Brad Cooper का नाम भी शामिल बताया जा रहा है। संसद में क्या कहा गया? ईरानी सांसद Mahmoud Nabavian ने कथित तौर पर कहा कि संसद जल्द ही ऐसे प्रस्ताव पर मतदान कर सकती है, जिसमें “ट्रंप और नेतन्याहू को खत्म करने” वाले को इनाम देने की बात शामिल होगी। इस बयान के बाद पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ गया है। पहले भी मिल चुकी हैं धमकियां ईरान में इससे पहले भी अमेरिकी नेताओं के खिलाफ कड़े बयान दिए जाते रहे हैं, खासकर ईरानी जनरल Qasem Soleimani की हत्या के बाद। कई ईरान समर्थक समूह पहले भी ट्रंप के खिलाफ इनाम घोषित करने जैसे अभियान चला चुके हैं। रिपोर्ट्स में “ब्लड कोवेनेंट” नामक अभियान का जिक्र किया गया है, जिसने कथित तौर पर करोड़ों डॉलर जुटाने का दावा किया था। अमेरिका की क्या प्रतिक्रिया? इससे पहले ट्रंप प्रशासन साफ कह चुका है कि अगर अमेरिकी नेताओं के खिलाफ किसी भी तरह की कार्रवाई की कोशिश हुई तो उसका बेहद कड़ा जवाब दिया जाएगा। अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय संघर्ष और पश्चिम एशिया में सैन्य तनाव को लेकर पहले से ही टकराव बना हुआ है। ऐसे में इस तरह की रिपोर्ट्स ने वैश्विक सुरक्षा चिंताओं को और बढ़ा दिया है।
Benjamin Netanyahu की आपराधिक मामलों में चल रही सुनवाई के दौरान अदालत में होने वाली उनकी गवाही एक बार फिर स्थगित कर दी गई है। इजरायली मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रधानमंत्री के वकील ने अदालत को बताया कि नेतन्याहू पूरे दिन सुरक्षा और कूटनीतिक बैठकों में व्यस्त रहेंगे। बताया गया है कि बचाव पक्ष की ओर से यरुशलम जिला अदालत को एक गोपनीय कार्यक्रम भी सौंपा गया, जिसमें देर रात तक निर्धारित बैठकों का उल्लेख किया गया था। पहले भी टल चुकी है पेशी यह पहली बार नहीं है जब नेतन्याहू की अदालत में पेशी टाली गई हो। इससे पहले 27 अप्रैल को भी सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए उनकी गवाही अनिश्चित समय के लिए स्थगित कर दी गई थी। इसी वर्ष अदालत ने सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़ी जिम्मेदारियों को देखते हुए उनकी कुछ अन्य निर्धारित पेशियां भी रद्द कर दी थीं। सरकारी वकीलों ने जताई नाराजगी सरकारी वकीलों ने इस फैसले पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि प्रधानमंत्री को अदालत की कार्यवाही के अनुसार अपना कार्यक्रम तय करना चाहिए ताकि जिरह की प्रक्रिया समय पर पूरी हो सके। इसके बावजूद अदालत ने नेतन्याहू की अनुपस्थिति की अनुमति देते हुए दूसरे गवाह की गवाही सुनने का फैसला किया। अदालत ने दूसरे गवाह को बुलाया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह फैसला यरुशलम जिला अदालत के न्यायाधीशों: Rivka Friedman-Feldman Moshe Bar-Am Oded Shaham की पीठ ने लिया। अब अदालत नेतन्याहू के पूर्व सहयोगी और राज्य गवाह Shlomo Filber की पत्नी Ilanit Filber की गवाही सुनेगी। ‘केस 4000’ में गंभीर आरोप यह मामला चर्चित “केस 4000” से जुड़ा है, जिसे Bezeq-Walla प्रकरण भी कहा जाता है। इसे नेतन्याहू के खिलाफ चल रहे सबसे गंभीर मामलों में माना जाता है। आरोप है कि नेतन्याहू ने कारोबारी Shaul Elovitch की टेलीकॉम कंपनी Bezeq को सरकारी स्तर पर लाभ पहुंचाने वाले फैसलों को आगे बढ़ाया। इसके बदले उनसे जुड़े समाचार प्लेटफॉर्म Walla! पर प्रधानमंत्री के पक्ष में सकारात्मक कवरेज प्रकाशित किए जाने का आरोप है। नेतन्याहू ने आरोपों से किया इनकार नेतन्याहू लगातार इन सभी आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताते रहे हैं। उन्होंने कथित “डायरेक्टिव मीटिंग” समेत कई आरोपों को खारिज किया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, साल 2022 में श्लोमो फिलबर की गवाही में कई विरोधाभास सामने आए थे, जिसके बाद सरकारी वकीलों ने उनके साथ हुए स्टेट विटनेस समझौते को रद्द करने की मांग भी की थी। दिसंबर 2024 से जारी है ट्रायल नेतन्याहू ने पहली बार दिसंबर 2024 में अदालत में गवाही दी थी। जून 2025 से मामले में जिरह का चरण शुरू हुआ, जो अब भी जारी है। इजरायल की राजनीति और न्यायिक व्यवस्था के लिहाज से यह मामला बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि किसी मौजूदा प्रधानमंत्री के खिलाफ चल रहा यह सबसे चर्चित भ्रष्टाचार मुकदमों में शामिल है।
वॉशिंगटन में दो दिन तक चलेगी अहम बैठक Lebanon और Israel के बीच जारी तनाव को कम करने के लिए गुरुवार से अमेरिका में नई शांति वार्ता शुरू होने जा रही है। वॉशिंगटन में होने वाली इस बातचीत को बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि दोनों देशों के बीच लागू युद्धविराम (Ceasefire) अब समाप्ति के करीब पहुंच चुका है। हालांकि सीजफायर औपचारिक रूप से अभी लागू माना जा रहा है, लेकिन इस दौरान भी इजरायली हवाई हमलों में सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है। इजरायली हमलों में 22 लोगों की मौत लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, बुधवार को इजरायल ने दक्षिण और पूर्वी लेबनान में करीब 40 स्थानों पर हवाई हमले किए। इन हमलों में कम से कम 22 लोगों की जान गई, जिनमें 8 बच्चे भी शामिल हैं। राजधानी Beirut सहित कई शिया बहुल इलाकों में भारी तबाही की खबरें सामने आई हैं। लगातार हो रहे हमलों से आम नागरिकों में भय और गुस्सा बढ़ता जा रहा है। ट्रंप ने जताई थी ऐतिहासिक समझौते की उम्मीद पिछले महीने 23 अप्रैल को दोनों देशों के प्रतिनिधि व्हाइट हाउस में मिले थे। उस दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने सीजफायर को तीन सप्ताह के लिए बढ़ाने की घोषणा की थी और उम्मीद जताई थी कि जल्द ही इजरायल और लेबनान के नेताओं के बीच ऐतिहासिक शिखर बैठक होगी। हालांकि लेबनान के राष्ट्रपति Joseph Aoun ने साफ कहा था कि जब तक इजरायली हमले बंद नहीं होते और सुरक्षा समझौता नहीं बनता, तब तक ऐसी बैठक संभव नहीं है। हिज्बुल्लाह पर कार्रवाई को लेकर दबाव इजरायल लगातार यह कहता रहा है कि वह ईरान समर्थित संगठन Hezbollah के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रखेगा। इजरायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने हाल ही में कहा था कि “जो भी इजरायल को धमकी देगा, उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।” रिपोर्ट्स के मुताबिक, मार्च से अब तक लेबनान में इजरायली हमलों में 2800 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें बड़ी संख्या में बच्चे शामिल हैं। अमेरिका की मध्यस्थता में होगी बातचीत इस बार होने वाली वार्ता में अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio शामिल नहीं होंगे, क्योंकि राष्ट्रपति ट्रंप चीन दौरे पर हैं। हालांकि अमेरिकी मध्यस्थों की टीम दोनों देशों के प्रतिनिधियों के साथ दो दिनों तक बातचीत करेगी। लेबनान की ओर से विशेष दूत Simon Karam हिस्सा लेंगे, जबकि इजरायल का प्रतिनिधित्व उसके अमेरिका स्थित राजदूत Yechiel Leiter करेंगे। क्षेत्रीय तनाव से वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित ईरान-इजरायल संघर्ष और लेबनान में जारी हिंसा का असर अब पूरे पश्चिम एशिया क्षेत्र पर दिखाई दे रहा है। तेल आपूर्ति, व्यापार और वैश्विक बाजारों पर भी इसका दबाव बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह वार्ता सफल नहीं होती, तो आने वाले दिनों में संघर्ष और गंभीर रूप ले सकता है।
Iran और United States के बीच तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा ईरान के ताजा शांति प्रस्ताव को खारिज किए जाने के बाद तेहरान ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। ईरान ने साफ चेतावनी दी है कि अगर उस पर हमला हुआ, तो उसके सशस्त्र बल “हमलावर को सबक सिखाने” के लिए पूरी तरह तैयार हैं। ट्रंप ने क्या कहा? वॉशिंगटन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने ईरान के प्रस्ताव को “अस्वीकार्य” बताते हुए खारिज कर दिया। उन्होंने कहा: “यह युद्धविराम गंभीर लाइफ सपोर्ट पर है।” ट्रंप ने हालात की तुलना ऐसे मरीज से की जिसकी “जीवित रहने की संभावना सिर्फ एक प्रतिशत” बची हो। अमेरिकी राष्ट्रपति के इस बयान के बाद मिडिल ईस्ट में तनाव और बढ़ गया है। ईरान ने दी जवाबी चेतावनी ट्रंप की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए ईरानी संसद के स्पीकर Mohammad Bagher Ghalibaf ने कहा कि ईरान किसी भी संघर्ष के लिए तैयार है। उन्होंने X पर लिखा: “हमारे सशस्त्र बल किसी भी हमले का जवाब देने और हमलावर को सबक सिखाने के लिए तैयार हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि “खराब रणनीति और गलत फैसलों का परिणाम हमेशा बुरा ही होता है।” ईरान के प्रस्ताव में क्या था? ईरानी विदेश मंत्रालय के मुताबिक, तेहरान ने जो प्रस्ताव दिया था उसमें: ईरानी बंदरगाहों की अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी खत्म करने पूरे क्षेत्र में सैन्य अभियान रोकने लेबनान में Hezbollah को निशाना बनाने वाले हमलों पर रोक विदेशों में फ्रीज ईरानी संपत्तियों को जारी करने जैसी मांगें शामिल थीं। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Esmail Baghaei ने कहा: “हमने किसी तरह की रियायत नहीं मांगी, सिर्फ ईरान के वैध अधिकारों की मांग की है।” होर्मुज स्ट्रेट पर बढ़ा दबाव तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर भी दिखाई देने लगा है। Strait of Hormuz में पहले से चल रही रुकावटों के कारण तेल बाजार दबाव में हैं। अगर स्थिति और बिगड़ती है, तो: कच्चे तेल की कीमतों में बड़ा उछाल वैश्विक सप्लाई चेन पर असर पेट्रोल-डीजल महंगा होना खाद्य और परिवहन लागत बढ़ना जैसे असर देखने को मिल सकते हैं। क्यों बढ़ रहा है तनाव? विशेषज्ञों के मुताबिक दोनों देशों के बीच मुख्य विवाद: ईरान के परमाणु कार्यक्रम अमेरिकी प्रतिबंध मिडिल ईस्ट में सैन्य मौजूदगी इजरायल और हिजबुल्ला को लेकर टकराव को लेकर है। हालिया बयानबाजी से साफ है कि फिलहाल दोनों पक्ष पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रहे हैं। ऐसे में मिडिल ईस्ट में अस्थिरता और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
अमेरिका ने ईरान पर दबाव बढ़ाते हुए इराक के उप तेल मंत्री अली मारिज अल-बहादली और ईरान समर्थक मिलिशिया नेताओं पर नए प्रतिबंध (सैंक्शन) लगा दिए हैं. अमेरिकी वित्त मंत्रालय का आरोप है कि ये लोग अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन कर ईरान को तेल बेचने और अवैध नेटवर्क चलाने में मदद कर रहे थे. अमेरिकी ट्रेजरी सचिव Scott Bessent ने कहा कि ईरानी शासन इराक के संसाधनों का इस्तेमाल अपने हितों और आतंकवादी गतिविधियों के वित्तपोषण के लिए कर रहा है. हालांकि, इस पूरे मामले पर अब तक न तो इराक और न ही ईरान की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई है. किन लोगों पर लगे प्रतिबंध? प्रतिबंधों की सूची में इराक के उप तेल मंत्री अली मारिज अल-बहादली सबसे बड़ा नाम हैं. अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, उन्होंने इराकी तेल प्रशासन में लंबे समय तक महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं और कथित तौर पर ईरानी तेल नेटवर्क से जुड़े रहे. इसके अलावा अमेरिका ने ईरान समर्थक संगठनों से जुड़े कई अन्य लोगों पर भी कार्रवाई की है, जिनमें: मुस्तफा हाशिम लाजिम अल-बेहादिली अहमद खुदेर मकसूस मोहम्मद ईसा काज़िम अल-शुवैली शामिल हैं. अमेरिका का आरोप है कि ये लोग ईरान समर्थित मिलिशिया नेटवर्क और हथियार खरीद गतिविधियों में शामिल थे. ईरान पर क्या है आरोप? अमेरिका का दावा है कि ईरान इराक के जरिए तेल तस्करी का नेटवर्क चला रहा था. आरोप है कि ईरानी तेल को इराकी तेल बताकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचा जाता था, ताकि अमेरिकी प्रतिबंधों से बचा जा सके. रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान इस नेटवर्क से हर साल अरबों डॉलर की कमाई करता है. अमेरिकी एजेंसियों का मानना है कि इसी पैसे का इस्तेमाल ईरान अपने क्षेत्रीय प्रभाव और सहयोगी मिलिशिया संगठनों को मजबूत करने में करता है. क्यों अहम है यह कार्रवाई? यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब United States और Iran के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है. खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य और तेल व्यापार को लेकर दोनों देशों के रिश्ते बेहद संवेदनशील बने हुए हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump पहले ही ईरान के खिलाफ “मैक्सिमम प्रेशर” नीति अपना चुके हैं. ट्रंप प्रशासन का मानना है कि ईरान को आर्थिक रूप से कमजोर किए बिना उसके परमाणु और सैन्य कार्यक्रमों पर रोक लगाना मुश्किल होगा. इराक के लिए बढ़ सकती है मुश्किल विशेषज्ञों का कहना है कि इस कार्रवाई से इराक पर भी दबाव बढ़ सकता है. एक तरफ इराक के ईरान के साथ करीबी संबंध हैं, वहीं दूसरी ओर उसे अमेरिका से सैन्य और आर्थिक सहयोग भी मिलता है. ऐसे में बगदाद सरकार के सामने संतुलन बनाए रखना बड़ी चुनौती बन सकता है.
डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ चल रही बातचीत में प्रगति का हवाला देते हुए ‘Project Freedom’ को अस्थायी रूप से रोकने का ऐलान किया है। हालांकि उन्होंने साफ कर दिया कि ईरान पर दबाव बनाए रखने के लिए अमेरिका की रणनीति में कोई ढील नहीं दी जाएगी। बातचीत में प्रगति, ऑपरेशन पर ब्रेक ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ वार्ता में “अच्छी प्रोग्रेस” देखने को मिल रही है, जिसके चलते इस सैन्य परियोजना को फिलहाल रोक दिया गया है। ‘Project Freedom’ का उद्देश्य समुद्री मार्गों में जहाजों की आवाजाही सुनिश्चित करना और रणनीतिक नियंत्रण बनाए रखना था, लेकिन संभावित समझौते को ध्यान में रखते हुए इसे अस्थायी रूप से स्थगित किया गया है। अंतरराष्ट्रीय दबाव और सहमति का संकेत ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर बताया कि यह फैसला पाकिस्तान समेत कई देशों के सुझाव के बाद लिया गया है। उन्होंने इसे “बड़ी सैन्य सफलता” के बाद उठाया गया संतुलित कदम बताया, जिससे कूटनीतिक रास्ता खुल सके। ‘हालात पहले से बेहतर’ अमेरिकी राष्ट्रपति के अनुसार, हालिया सैन्य कार्रवाई के बाद अब हालात पहले से बेहतर हो गए हैं और ईरान के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत अंतिम चरण के करीब पहुंच चुकी है। उन्होंने कहा कि समझौते की दिशा में तेजी से प्रगति हो रही है और यह सही समय है जब कूटनीति को मौका दिया जाए। नाकेबंदी जारी, दबाव कायम ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि ‘Project Freedom’ को भले ही रोका गया हो, लेकिन ईरान के खिलाफ अमेरिकी नाकेबंदी और दबाव पूरी तरह जारी रहेगा। उनका कहना है कि यह रणनीति इसलिए जरूरी है ताकि ईरान समझौते के लिए गंभीर बना रहे और बातचीत का परिणाम सकारात्मक दिशा में जाए। क्यों लगाई गई अस्थायी रोक? ट्रंप के मुताबिक, यह फैसला इसलिए लिया गया है ताकि यह परखा जा सके कि कूटनीतिक प्रयास कितने प्रभावी साबित होते हैं। अब यह देखा जाएगा कि क्या बातचीत सफल होकर अंतिम समझौते तक पहुंचती है या नहीं। कूटनीति बनाम सैन्य दबाव विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका इस समय “डुअल स्ट्रेटेजी” अपना रहा है–एक तरफ सैन्य दबाव बनाए रखना और दूसरी ओर बातचीत के जरिए समाधान निकालना। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह रणनीति ईरान के साथ समझौते तक पहुंचती है या फिर तनाव एक बार फिर बढ़ता है।
मस्कट/तेहरान, 4 मई: दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री मार्गों में शामिल Strait of Hormuz में एक बार फिर सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। ब्रिटेन की समुद्री निगरानी एजेंसी United Kingdom Maritime Trade Operations ने जानकारी दी है कि ईरान के सिरिक तट के पास एक मालवाहक जहाज पर कई छोटी नौकाओं के जरिए हमला किया गया। कैसे हुआ हमला? रिपोर्ट के मुताबिक, अज्ञात हमलावरों ने छोटी-छोटी तेज गति वाली नौकाओं का इस्तेमाल करते हुए कार्गो शिप को निशाना बनाया। इस तरह के हमले आमतौर पर ‘स्वार्म टैक्टिक्स’ के रूप में देखे जाते हैं, जिसमें कई नावें एक साथ हमला कर जहाज को घेर लेती हैं। हालांकि, अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि हमले के पीछे कौन था और इसका मकसद क्या था। चालक दल सुरक्षित, लेकिन खतरा बरकरार सबसे राहत की बात यह है कि जहाज पर मौजूद सभी चालक दल के सदस्य सुरक्षित बताए गए हैं। United Kingdom Maritime Trade Operations ने क्षेत्र से गुजरने वाले अन्य जहाजों को हाई अलर्ट पर रहने और सावधानीपूर्वक मार्ग तय करने की सलाह दी है। ईरान का दावा– ‘हमारा नियंत्रण कायम’ घटना के बाद ईरानी अधिकारियों ने बयान जारी कर कहा कि Strait of Hormuz पर उनका नियंत्रण पूरी तरह बना हुआ है। उन्होंने यह भी कहा कि जो जहाज अमेरिका या इजराइल से जुड़े नहीं हैं, वे निर्धारित शुल्क देकर सुरक्षित तरीके से इस मार्ग से गुजर सकते हैं। यह बयान ऐसे समय में आया है जब क्षेत्र में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर है। अमेरिका-ईरान टकराव की पृष्ठभूमि Donald Trump प्रशासन द्वारा ईरानी बंदरगाहों पर नाकेबंदी जारी रखी गई है। अमेरिकी नौसेना इस इलाके में सक्रिय है और हर आने-जाने वाले जहाज पर नजर रख रही है। दूसरी ओर, ईरान ने अमेरिका को एक नया प्रस्ताव भेजा है, जिसमें 30 दिनों के भीतर विवाद सुलझाने की बात कही गई है। हालांकि Donald Trump ने इस प्रस्ताव को लेकर संदेह जताया है और किसी ठोस समझौते की संभावना को लेकर स्पष्ट संकेत नहीं दिए हैं। क्यों बेहद अहम है होर्मुज? Strait of Hormuz वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। दुनिया के करीब 20% तेल की सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है खाड़ी देशों से एशिया, यूरोप और अमेरिका तक ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख मार्ग यहां किसी भी तरह की अस्थिरता का सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ता है बढ़ती घटनाएं और सुरक्षा चिंता पिछले कुछ समय में इस क्षेत्र में जहाजों पर हमले, जब्ती और सैन्य गतिविधियां बढ़ी हैं। इस ताजा घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री सुरक्षा कमजोर हो रही है।
युद्धविराम के बावजूद ईरान में खतरे पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। उत्तर-पश्चिमी जंजान में शुक्रवार को हुए एक भीषण विस्फोट ने यह साफ कर दिया कि युद्ध के अवशेष कितने घातक हो सकते हैं। इस हादसे में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के 14 जवानों की मौत हो गई, जबकि दो अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। बम निष्क्रिय करने के दौरान हुआ हादसा ईरान की सरकारी एजेंसी IRNA के मुताबिक, यह विस्फोट उस समय हुआ जब IRGC की एक विशेष बम निरोधक टीम इलाके में सफाई अभियान चला रही थी। यह टीम हालिया हवाई हमलों के बाद बचे हुए गोला-बारूद को खोजकर निष्क्रिय कर रही थी अचानक एक अज्ञात विस्फोटक सक्रिय हो गया धमाका इतना शक्तिशाली था कि कई जवान मौके पर ही मारे गए मारे गए जवान “अंसार अल-महदी” यूनिट के अनुभवी सदस्य थे, जिन्हें ऐसे जोखिम भरे अभियानों के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। बिना फटे बम बने सबसे बड़ा खतरा प्रारंभिक जांच में यह आशंका जताई गई है कि विस्फोट का कारण क्लस्टर बम या बारूदी सुरंग हो सकता है, जो हवाई हमलों के दौरान गिराए गए थे लेकिन फटे नहीं थे। ऐसे बम जमीन में छिपे रहते हैं और लंबे समय तक सक्रिय रहते हैं इन्हें निष्क्रिय करना बेहद कठिन और खतरनाक होता है जरा सी चूक जानलेवा साबित हो सकती है युद्ध खत्म होने के बाद भी ये ‘अनएक्सप्लोडेड ऑर्डनेंस’ (UXO) वर्षों तक खतरा बने रहते हैं। सीजफायर के बाद सबसे बड़ी सैन्य क्षति 8 अप्रैल को लागू हुए युद्धविराम के बाद यह IRGC के लिए अब तक की सबसे बड़ी जनहानि बताई जा रही है। यह घटना इस बात की गंभीर याद दिलाती है कि युद्ध के प्रभाव सिर्फ लड़ाई तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उसके बाद भी जानलेवा खतरे बने रहते हैं। IRGC के मुताबिक: अब तक 15,000 से ज्यादा बिना फटे गोला-बारूद की पहचान की जा चुकी है इनको निष्क्रिय करने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया जा रहा है कई इलाके अभी भी ‘हाई रिस्क जोन’ बने हुए हैं आम नागरिक और खेती भी खतरे में अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यह खतरा सिर्फ सैन्य बलों तक सीमित नहीं है। कई बम रिहायशी इलाकों और गांवों के पास पड़े हैं कृषि भूमि में भी भारी मात्रा में विस्फोटक मौजूद हैं फार्स न्यूज एजेंसी के अनुसार, लगभग 1,200 हेक्टेयर कृषि क्षेत्र अभी भी जोखिम में है, जिससे किसानों की आजीविका प्रभावित हो रही है और खाद्य उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है। युद्ध की पृष्ठभूमि और बढ़ता वैश्विक तनाव इस हादसे की पृष्ठभूमि हालिया संघर्ष से जुड़ी है, जिसमें अमेरिका और इजरायल ने फरवरी में ईरान के कई सैन्य और रणनीतिक ठिकानों पर संयुक्त हमले किए थे। जवाब में ईरान ने मिसाइल और ड्रोन हमले किए इस संघर्ष में 4000 से अधिक लोगों की जान गई वैश्विक दबाव और बढ़ते नुकसान के बाद 8 अप्रैल को सीजफायर लागू हुआ होर्मुज जलडमरूमध्य और ऊर्जा संकट होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट गहरा गया है। यह दुनिया के सबसे अहम तेल आपूर्ति मार्गों में से एक है जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से तेल और गैस की सप्लाई पर असर पड़ा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला सीजफायर के बाद भी इस क्षेत्र में स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाई है। अमेरिका-ईरान वार्ता में जारी गतिरोध इसी बीच डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के नए प्रस्ताव पर असंतोष जताया है। उन्होंने कहा कि प्रस्ताव “पर्याप्त नहीं” है परमाणु कार्यक्रम को लेकर दोनों देशों में मतभेद बरकरार हैं बातचीत जारी है, लेकिन ठोस समाधान अभी दूर नजर आ रहा है ईरान ने युद्ध समाप्त करने और आर्थिक प्रतिबंधों में राहत के लिए बातचीत की इच्छा जताई है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच भरोसे की कमी साफ दिखती है।
मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर बढ़ता दिख रहा है। लेबनान के शक्तिशाली सशस्त्र समूह Hezbollah ने साफ कर दिया है कि वह न तो अपने हथियार छोड़ेगा और न ही Israel के साथ सीधे बातचीत करेगा। नईम कासिम का दोटूक संदेश Naim Qassem ने कहा कि मौजूदा हालात में इजराइल से किसी भी तरह की प्रत्यक्ष वार्ता संभव नहीं है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा: "हम अपने हथियार नहीं छोड़ेंगे।" यह बयान ऐसे समय आया है जब क्षेत्र में युद्धविराम को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। लेबनान सरकार को भी चेतावनी कासिम ने Lebanon की सरकार पर भी निशाना साधा। उनका आरोप है कि सरकार ने इजराइल के सामने जरूरत से ज्यादा रियायतें दी हैं। हिजबुल्लाह चाहता है कि यदि कोई वार्ता हो भी, तो वह केवल अप्रत्यक्ष माध्यमों से हो, सीधे नहीं। दक्षिणी लेबनान में इजराइली कार्रवाई Israel Defense Forces ने बताया कि दक्षिणी लेबनान में उसके सैनिकों ने संदिग्ध गतिविधियां देखीं। इसके बाद वायुसेना ने कार्रवाई करते हुए तीन आतंकवादियों को मार गिराया। आईडीएफ ने हिजबुल्लाह के कई ठिकानों और सैन्य ढांचे को भी निशाना बनाने का दावा किया है। नेतन्याहू का आरोप इजराइली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने हिजबुल्लाह पर युद्धविराम समझौते को कमजोर करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि उत्तरी सीमा की सुरक्षा के लिए लेबनान में सैन्य अभियान जारी रहेगा। क्या युद्धविराम खतरे में है? हालात संकेत दे रहे हैं कि संघर्ष फिर भड़क सकता है। हिजबुल्लाह के सख्त रुख और इजराइल की लगातार सैन्य कार्रवाई से युद्धविराम पर खतरा मंडरा रहा है। अमेरिका की भूमिका अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने हाल ही में इजराइल-लेबनान युद्धविराम को तीन सप्ताह बढ़ाने की घोषणा की थी। साथ ही, अमेरिका ने लेबनान को हिजबुल्लाह से निपटने में सहयोग का आश्वासन भी दिया है। मध्य पूर्व की स्थिति फिलहाल बेहद नाजुक बनी हुई है। आने वाले दिनों में घटनाक्रम पूरे क्षेत्र की दिशा तय कर सकता है।
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच Donald Trump ने ईरान को कड़ा संदेश दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने साफ चेतावनी दी है कि अगर तेहरान ने जल्द समझौता नहीं किया, तो उसकी तेल आपूर्ति व्यवस्था गंभीर संकट में पड़ सकती है। “तीन दिन का समय, नहीं तो बड़ा नुकसान” फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में Donald Trump ने कहा कि ईरान के पास समझौते के लिए केवल तीन दिन हैं। उनका दावा है कि अगर ईरान तेल निर्यात जारी नहीं रख पाया, तो उसकी पाइपलाइनें तकनीकी और प्राकृतिक कारणों से खराब होकर फट सकती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि एक बार नुकसान होने के बाद ईरान अपनी पाइपलाइन क्षमता को पूरी तरह बहाल नहीं कर पाएगा और उत्पादन करीब 50% तक सीमित हो सकता है। बातचीत के लिए अमेरिका की शर्त Donald Trump ने दोहराया कि अगर ईरान बातचीत करना चाहता है, तो उसे खुद पहल करनी होगी। उन्होंने कहा कि तेहरान सीधे वॉशिंगटन से संपर्क कर सकता है—“फोन मौजूद हैं और सुरक्षित लाइनें भी।” पाकिस्तान में बढ़ी कूटनीतिक हलचल इस बीच अब्बास अराघची एक बार फिर पाकिस्तान पहुंचे हैं। तीन दिनों में यह उनका दूसरा दौरा है, जहां उन्होंने आर्मी चीफ असीम मुनीर और अन्य अधिकारियों से मुलाकात की। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने पाकिस्तान के जरिए अमेरिका को कुछ अहम मुद्दों पर लिखित संदेश भी भेजा है, जिससे संकेत मिलता है कि बैक-चैनल डिप्लोमेसी जारी है। रूस भी बना अहम खिलाड़ी कूटनीतिक प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए अब्बास अराघची अब रूस के दौरे पर जा रहे हैं, जहां उनकी मुलाकात राष्ट्रपति Vladimir Putin से होने वाली है। क्या बढ़ेगा टकराव या बनेगी डील? एक तरफ Donald Trump का सख्त अल्टीमेटम है, तो दूसरी ओर ईरान लगातार कूटनीतिक रास्ते तलाश रहा है। ऐसे में सवाल यही है कि क्या दोनों देशों के बीच समझौता होगा या तनाव और गहराएगा।
इस्लामाबाद पहुंचा ईरानी प्रतिनिधिमंडल ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच कूटनीतिक हल तलाशने की कोशिशें तेज हो गई हैं। ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi शुक्रवार को एक वरिष्ठ प्रतिनिधिमंडल के साथ इस्लामाबाद पहुंचे। हालांकि, तेहरान ने स्पष्ट कर दिया है कि इस बार अमेरिका के साथ कोई सीधी बातचीत नहीं होगी। अराघची अपने दौरे के दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif, सेना प्रमुख Asim Munir और विदेश मंत्री Ishaq Dar से मुलाकात करेंगे। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Esmaeil Baqaei ने कहा कि पाकिस्तान ही तेहरान की चिंताओं और प्रस्तावों को वॉशिंगटन तक पहुंचाएगा। हॉर्मुज और परमाणु मुद्दे पर टिकी निगाहें दूसरी ओर, अमेरिका भी वार्ता को फिर से शुरू करने की तैयारी कर रहा है। अमेरिकी विशेष दूत Steve Witkoff और Jared Kushner के जल्द इस्लामाबाद पहुंचने की संभावना है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कहा है कि ईरान अमेरिकी मांगों को ध्यान में रखते हुए एक नया प्रस्ताव तैयार कर रहा है। अमेरिका की प्रमुख शर्तों में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर नियंत्रण और Strait of Hormuz में जहाजों की निर्बाध आवाजाही शामिल है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य में जारी तनाव ने वैश्विक तेल बाजारों और समुद्री व्यापार को प्रभावित किया है। ऐसे में पाकिस्तान की मध्यस्थता से दोनों देशों के बीच जमी बर्फ पिघलने की उम्मीद बढ़ गई है।
सेना का बढ़ता प्रभाव, सत्ता पर पकड़ मजबूत ईरान में सत्ता के समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) पर आरोप है कि वह देश की राजनीतिक व्यवस्था में अपनी पकड़ लगातार मजबूत कर रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, IRGC ने राष्ट्रपति के कई अहम फैसलों में हस्तक्षेप करते हुए सरकार की कार्यप्रणाली पर प्रभाव बढ़ा दिया है। राष्ट्रपति की नियुक्तियों पर रोक Masoud Pezeshkian द्वारा किए गए महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति के प्रयासों को कथित तौर पर रोक दिया गया। खासकर खुफिया मंत्री की नियुक्ति को लेकर राष्ट्रपति और सैन्य नेतृत्व के बीच टकराव सामने आया है। बताया जा रहा है कि IRGC के दबाव के चलते प्रस्तावित सभी नामों को खारिज कर दिया गया। सुप्रीम लीडर तक पहुंच भी सीमित रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि Mojtaba Khamenei के आसपास सुरक्षा घेरा कड़ा कर दिया गया है और उनकी पहुंच को सीमित किया गया है। सूत्रों के अनुसार, अब शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच और संवाद को सैन्य अधिकारियों की एक परिषद नियंत्रित कर रही है, जिससे सरकार और नेतृत्व के बीच दूरी बढ़ गई है। क्या यह तख्तापलट है? विशेषज्ञ इसे अचानक हुआ सत्ता परिवर्तन नहीं मानते, बल्कि इसे लंबे समय से चल रही प्रक्रिया का हिस्सा बताते हैं। उनका कहना है कि IRGC का प्रभाव पहले से ही बढ़ रहा था और अब वह खुलकर सामने आ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर IRGC का दबदबा और बढ़ता है, तो ईरान की विदेश नीति और अधिक सख्त हो सकती है। इससे अमेरिका जैसे देशों के साथ बातचीत में तनाव बढ़ने की संभावना है। राजनीतिक संकट गहराने के संकेत ईरान के भीतर सत्ता संघर्ष और बढ़ते तनाव से राजनीतिक संकट गहराता दिख रहा है। राष्ट्रपति पेजेशकियन के लिए यह स्थिति बड़ी चुनौती बन गई है, जहां उन्हें एक ऐसे सिस्टम में काम करना पड़ रहा है, जहां वास्तविक नियंत्रण धीरे-धीरे सैन्य संस्थाओं के हाथ में जाता नजर आ रहा है।
पाकिस्तान को बड़ी आर्थिक राहत मिलने जा रही है। सऊदी अरब और कतर मिलकर उसे 5 अरब डॉलर (करीब ₹46,500 करोड़) की वित्तीय मदद देंगे। यह सहायता ऐसे समय पर मिल रही है, जब पाकिस्तान पर UAE का 3.5 अरब डॉलर (करीब ₹29,000 करोड़) का कर्ज चुकाने का दबाव है। सिर्फ 11 दिन में चुकाना है कर्ज रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान को 23 अप्रैल तक UAE का पूरा कर्ज चुकाना है। तय शेड्यूल के अनुसार 11, 17 और 23 अप्रैल को किस्तों में भुगतान किया जाएगा। यानी देश के पास कर्ज चुकाने के लिए बहुत कम समय बचा है। विदेशी मुद्रा संकट में राहत पाकिस्तान की कमजोर विदेशी मुद्रा स्थिति को देखते हुए यह मदद बेहद अहम मानी जा रही है। देश को अप्रैल में कुल करीब 4.8 अरब डॉलर का भुगतान करना है, जिसमें एक बड़ा इंटरनेशनल बॉन्ड भी शामिल है। IMF की शर्तें भी अहम International Monetary Fund (IMF) ने पाकिस्तान के लिए 7 अरब डॉलर का 3 साल का राहत पैकेज शुरू किया है। इसके तहत शर्त रखी गई है कि बड़े कर्जदाता–जैसे चीन, सऊदी अरब और UAE–अपना पैसा कम से कम 3 साल तक पाकिस्तान में ही बनाए रखें। UAE की नई नीति से बढ़ा दबाव हाल ही में UAE ने कर्ज रोलओवर पॉलिसी में बदलाव कर शॉर्ट-टर्म एक्सटेंशन लागू किया है, जिससे पाकिस्तान पर जल्दी भुगतान का दबाव बढ़ गया। इसके बाद पाकिस्तान ने तय समय में कर्ज चुकाने का फैसला लिया। सऊदी-पाक रिश्ते और मजबूत सऊदी अरब पहले भी पाकिस्तान को आर्थिक मदद देता रहा है और 5 अरब डॉलर तक के डिपॉजिट को आगे बढ़ा चुका है। दोनों देशों के बीच आर्थिक और रक्षा सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है। IMF मीटिंग के लिए वॉशिंगटन दौरा पाकिस्तान के वित्त मंत्री Muhammad Aurangzeb 13–18 अप्रैल तक Washington, D.C. में होने वाली IMF और वर्ल्ड बैंक की स्प्रिंग मीटिंग में हिस्सा ले रहे हैं। इस दौरान वे कई देशों और निवेशकों के साथ अहम बैठकों में शामिल होंगे।
मिडिल ईस्ट अपडेट: ईरान और अमेरिका के बीच दो हफ्तों के सीजफायर के बावजूद होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तनाव बना हुआ है। ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने इस अहम समुद्री मार्ग से गुजरने वाले जहाजों की संख्या सीमित कर दी है। हर दिन सिर्फ 15 जहाजों को अनुमति हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान अब रोजाना केवल 15 जहाजों को ही होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने की इजाजत देगा। ईरान के उप विदेश मंत्री सईद खतीबजादा ने साफ किया है कि: हर जहाज को ईरानी अथॉरिटी से मंजूरी लेनी होगी सुरक्षित मार्ग के लिए सेना के साथ तालमेल जरूरी होगा जमीनी हकीकत: लगभग ठप पड़ा ट्रैफिक रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 24 घंटों में: सिर्फ 1 ऑयल टैंकर 5 ड्राई बल्क कैरियर और 2 ईरानी टैंकर ही इस रास्ते से गुजर पाए हैं। अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (ADNOC) के प्रमुख सुल्तान अल जाबेर ने कहा कि इस तरह की शर्तों के साथ दी गई अनुमति को “फ्री पैसेज” नहीं कहा जा सकता, यानी रास्ता लगभग बंद जैसा ही है। इस्लामाबाद में होगी अहम वार्ता सीजफायर के बाद अब ईरान और अमेरिका के बीच इस्लामाबाद में शांति वार्ता होने जा रही है। ईरान ने 10 शर्तें रखी हैं (जैसे प्रतिबंधों में ढील, होर्मुज पर नियंत्रण) अमेरिका ने 15 पॉइंट प्लान पेश किया है दोनों के बीच मतभेद अभी भी बने हुए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान भविष्य में जहाजों से उनके प्रकार और कार्गो के आधार पर फीस वसूलने की योजना बना रहा है। ट्रंप की चेतावनी, सेना तैनात अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान होर्मुज को खोलने पर सहमत हो गया है। हालांकि उन्होंने चेतावनी दी कि: जब तक ठोस समझौता नहीं होता, अमेरिकी सेना क्षेत्र में तैनात रहेगी वहीं ईरान की सुप्रीम काउंसिल ने इस दावे को गलत बताते हुए कहा कि अमेरिका ने होर्मुज पर ईरान के नियंत्रण को स्वीकार किया है। तेल बाजार पर असर इस पूरे तनाव का असर ग्लोबल मार्केट पर भी दिख रहा है। कच्चे तेल की कीमतें 3.6% बढ़कर 98.16 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई हैं सीजफायर पर खतरा ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर सीजफायर का उल्लंघन हुआ तो कड़ा जवाब दिया जाएगा। विवाद की एक बड़ी वजह यह है कि: ईरान चाहता है कि लेबनान में इजरायल के हमले भी रोके जाएं लेकिन इजरायल ने साफ कर दिया है कि वह हिजबुल्लाह पर कार्रवाई जारी रखेगा अमेरिका भी इजरायल के इस रुख का समर्थन कर रहा है, जिससे शांति समझौता कमजोर पड़ता दिख रहा है।
US-Iran Ceasefire: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले तेल टैंकरों पर कथित शुल्क वसूली को लेकर ईरान पर कड़ा रुख अपनाया है। ट्रंप ने साफ कहा है कि यदि ईरान इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से गुजरने वाले जहाजों से फीस वसूल रहा है, तो उसे तुरंत बंद करना होगा। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर पोस्ट करते हुए कहा कि ऐसी रिपोर्ट्स सामने आ रही हैं, जिनमें ईरान द्वारा टैंकरों से शुल्क लेने की बात कही गई है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यह कदम पूरी तरह अस्वीकार्य है और इसे तुरंत रोका जाना चाहिए। उन्होंने यह भी दोहराया कि होर्मुज स्ट्रेट को खुला रखना अमेरिका-ईरान के बीच हुए दो हफ्तों के युद्धविराम समझौते की अहम शर्त है। ट्रंप के मुताबिक, इस मार्ग से तेल की आपूर्ति हर हाल में जारी रहेगी - चाहे ईरान की मदद से या उसके बिना। ‘ईरान कर रहा बेहद खराब काम’ ट्रंप ने ईरान के व्यवहार पर सवाल उठाते हुए कहा कि वह समझौते के अनुरूप काम नहीं कर रहा है। उन्होंने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट से तेल की आवाजाही को संभालने में ईरान विफल रहा है और उसका रवैया “बेहद खराब” है। उन्होंने इस स्थिति को “शर्मनाक” बताते हुए कहा कि अगर ईरान समझौते का पालन नहीं करता है, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। क्या टैंकरों से वसूला जा रहा टोल? दरअसल, कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि ईरान होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों से उनकी श्रेणी और सामान के आधार पर शुल्क लेने की योजना बना रहा है। इसी मुद्दे पर ट्रंप ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है और इसे तुरंत बंद करने की मांग की है। अमेरिकी सेना रहेगी तैनात ट्रंप ने पहले ही चेतावनी दी थी कि जब तक स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो जाती, तब तक अमेरिकी सेना क्षेत्र में तैनात रहेगी। उन्होंने कहा कि ईरान को समझौता तोड़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए और स्ट्रेट को पूरी तरह सुरक्षित और खुला रखना होगा। इस्लामाबाद में शांति वार्ता की तैयारी इसी बीच, पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता की तैयारी चल रही है। दोनों देशों ने फिलहाल दो हफ्तों के अस्थायी सीजफायर पर सहमति जताई है, लेकिन शर्तों को लेकर मतभेद अभी भी बने हुए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने प्रतिबंधों में राहत समेत 10 मांगें रखी हैं, जबकि अमेरिका ने 15 बिंदुओं वाला प्रस्ताव दिया है। होर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण और संभावित शुल्क वसूली इस वार्ता का सबसे बड़ा विवादित मुद्दा बना हुआ है।
करीब 39 दिनों तक चले तनाव और हमलों के बाद आखिरकार अमेरिका और ईरान के बीच संघर्षविराम पर सहमति बन गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दो हफ्तों के अस्थायी सीजफायर का ऐलान किया, जिस पर ईरान ने भी सहमति जताई है। इस फैसले से पूरे मिडिल ईस्ट और वैश्विक स्तर पर राहत की सांस ली जा रही है। होर्मुज खोलने पर बनी सहमति सीजफायर की सबसे अहम शर्त स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर रही। ईरान ने इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को जहाजों की आवाजाही के लिए खोलने पर सहमति दे दी है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति पर मंडरा रहा खतरा फिलहाल टल गया है। ट्रंप का बयान डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जानकारी देते हुए कहा: अमेरिका दो हफ्तों के लिए सैन्य कार्रवाई रोक रहा है अधिकांश सैन्य लक्ष्य हासिल कर लिए गए हैं अब दोनों देश स्थायी शांति समझौते की दिशा में आगे बढ़ेंगे ट्रंप के अनुसार यह फैसला शहबाज शरीफ और पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व के साथ बातचीत के बाद लिया गया। ईरान का रुख ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने स्पष्ट किया: अगर अमेरिका हमले रोकता है, तो ईरान भी पलटवार नहीं करेगा 14 दिनों तक होर्मुज से जहाजों की सुरक्षित आवाजाही जारी रहेगी आगे की बातचीत साझा प्रस्तावों के आधार पर होगी 14 दिन क्यों अहम? यह संघर्षविराम सिर्फ अस्थायी है, लेकिन बेहद महत्वपूर्ण: इस दौरान स्थायी शांति समझौते पर बातचीत होगी क्षेत्रीय तनाव कम करने की कोशिश होगी वैश्विक बाजार और तेल आपूर्ति स्थिर रह सकती है आगे की राह सीजफायर के बाद अब नजरें आने वाले 14 दिनों पर टिकी हैं। अगर बातचीत सफल रहती है, तो यह समझौता मिडिल ईस्ट में लंबे समय की शांति का रास्ता खोल सकता है।
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते टकराव के बीच एक नया और चौंकाने वाला घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों के बीच ईरान ने अपने नागरिकों से पावर प्लांट्स के आसपास इकट्ठा होने की अपील की है। पावर प्लांट्स के बाहर बनेंगी ह्यूमन चेन अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान सरकार ने- यूनिवर्सिटी छात्रों कलाकारों खिलाड़ियों युवा संगठनों से अपील की है कि वे 7 अप्रैल को देशभर के पावर प्लांट्स के आसपास मानव श्रृंखला (Human Chain) बनाकर खड़े हों। इसका मकसद सार्वजनिक ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) पर संभावित अमेरिकी हमलों का विरोध करना बताया गया है। ट्रंप का अल्टीमेटम खत्म होने के करीब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को- होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने और सीजफायर मानने के लिए 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया था, जो आज रात 8 बजे तक खत्म हो रहा है (भारतीय समय अनुसार सुबह 5:30 बजे)। “4 घंटे में तबाह कर सकते हैं ईरान” ट्रंप ने सख्त चेतावनी देते हुए कहा- अमेरिका के पास ईरान को “एक ही रात में तबाह” करने की योजना है सभी पुल और पावर प्लांट निशाने पर हो सकते हैं यह कार्रवाई सिर्फ 4 घंटे में पूरी की जा सकती है उन्होंने दावा किया कि मंगलवार रात तक ईरान के प्रमुख ढांचे पूरी तरह नष्ट किए जा सकते हैं। बढ़ता खतरा और वैश्विक चिंता ईरान का नागरिकों को पावर प्लांट्स के पास इकट्ठा करना एक असामान्य कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे- आम लोगों की सुरक्षा पर खतरा बढ़ सकता है अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव और गहरा सकता है
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच कतर ने पाकिस्तान को बड़ा झटका देते हुए पाकिस्तानी नागरिकों के लिए वीजा ऑन अराइवल (VoA) सुविधा को अस्थायी रूप से बंद कर दिया है। इस फैसले से कतर जाने वाले पाकिस्तानियों को अब पहले से वीजा लेना अनिवार्य हो गया है। पाकिस्तान को क्यों लगा झटका? कतर में स्थित पाकिस्तानी दूतावास ने अपने नागरिकों को जारी एडवाइजरी में कहा है कि: बिना पूर्व वीजा के कतर पहुंचने पर एंट्री रोकी जा सकती है एयरपोर्ट पर यात्रियों को वापस भेजा भी जा सकता है मौजूदा हालात को देखते हुए यह सुविधा फिलहाल निलंबित है विशेषज्ञ मानते हैं कि क्षेत्रीय तनाव और कूटनीतिक संतुलन की कोशिशों के बीच पाकिस्तान की स्थिति कमजोर पड़ती दिख रही है। भारत को मिल रही राहत जहां पाकिस्तान के लिए नियम सख्त हुए हैं, वहीं भारत के साथ कतर के मजबूत संबंधों का असर साफ दिख रहा है। भारतीय नागरिकों के लिए: वीजा ऑन अराइवल सुविधा जारी 30 दिन का फ्री वीजा मिल रहा है जरूरत पड़ने पर वीजा अवधि बढ़ाई भी जा सकती है यह फैसला ऐसे समय में भी बरकरार है जब पूरे मध्य पूर्व में तनाव का माहौल बना हुआ है। भारतीय यात्रियों के लिए जरूरी शर्तें कतर जाने वाले भारतीयों को कुछ नियमों का पालन करना होगा: पासपोर्ट कम से कम 6 महीने वैध हो रिटर्न या आगे की यात्रा का टिकट होना जरूरी होटल बुकिंग या रहने की व्यवस्था का प्रमाण हेल्थ इंश्योरेंस अनिवार्य क्षेत्रीय तनाव का असर अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी संघर्ष का असर अब खाड़ी देशों की नीतियों पर भी दिखने लगा है। कतर का यह फैसला सुरक्षा और कूटनीतिक समीकरणों से जुड़ा माना जा रहा है।
तेहरान/वॉशिंगटन: ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने अमेरिकी नागरिकों को संबोधित करते हुए एक खुला पत्र लिखा है, जिसे उन्होंने बुधवार को सोशल मीडिया पर साझा किया। इस पत्र में उन्होंने युद्धविराम का कोई उल्लेख नहीं किया, जबकि इससे कुछ ही घंटे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि ईरान की ओर से सीजफायर की मांग की गई है। “ईरान ने कभी युद्ध शुरू नहीं किया” अपने पत्र में पेज़ेश्कियान ने कहा कि ईरान ने “कभी कोई युद्ध शुरू नहीं किया” और देश लंबे समय से “हमलों और कब्ज़े” का सामना करता रहा है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ईरानी जनता का अमेरिका, यूरोप या पड़ोसी देशों के लोगों के प्रति कोई दुर्भावना नहीं है। ट्रंप के दावे से अलग संदेश ईरानी राष्ट्रपति का यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर दावा किया था कि ईरान के “नए शासन” ने युद्धविराम की अपील की है। हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि यह अपील किसने की। ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका युद्धविराम पर तभी विचार करेगा जब होर्मुज़ जलडमरूमध्य पूरी तरह सुरक्षित और खुला होगा। उन्होंने ईरान के खिलाफ कड़ी चेतावनी देते हुए सख्त कार्रवाई की बात भी कही। संवाद बनाम टकराव की अपील पेज़ेश्कियान ने अपने पत्र के अंत में कहा कि दुनिया के सामने आज सबसे बड़ा विकल्प “टकराव और संवाद” के बीच है। उन्होंने चेतावनी दी कि आज लिया गया फैसला आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को तय करेगा। बढ़ते तनाव के बीच कूटनीतिक संदेश विशेषज्ञों के मुताबिक, यह पत्र सीधे अमेरिकी सरकार की बजाय वहां के नागरिकों को संबोधित कर एक कूटनीतिक संदेश देने की कोशिश है। इसमें शांति और संवाद की बात तो की गई है, लेकिन औपचारिक रूप से युद्धविराम का प्रस्ताव नहीं रखा गया।
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच ईरान का रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण Kharg Island एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में आ गया है। विश्लेषकों का मानना है कि अगर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump और इज़राइल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ईरान पर दबाव बढ़ाने के लिए इस द्वीप को निशाना बनाते हैं, तो यह कदम आसान नहीं होगा। इसकी वजह यहां की मजबूत सुरक्षा व्यवस्था और वैश्विक ऊर्जा बाजार में इसकी अहम भूमिका है। ईरान के तेल निर्यात का मुख्य केंद्र फारस की खाड़ी में स्थित खर्ग द्वीप ईरान के तेल निर्यात का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है। अनुमान के मुताबिक ईरान के अधिकांश कच्चे तेल का निर्यात यहीं से होता है। द्वीप पर विशाल तेल भंडारण टैंक, पाइपलाइन नेटवर्क और बड़े ऑयल टैंकरों के लिए गहरे पानी के टर्मिनल मौजूद हैं, जिससे यह देश की ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख आधार बन गया है। भारी सैन्य सुरक्षा में घिरा इलाका खर्ग द्वीप को ईरान ने कड़ी सैन्य सुरक्षा से घेर रखा है। यहां एयर डिफेंस सिस्टम, रडार नेटवर्क और मिसाइल सुरक्षा तैनात है। साथ ही Islamic Revolutionary Guard Corps और ईरानी नौसेना की इकाइयां आसपास के समुद्री क्षेत्र में लगातार गश्त करती हैं। यही वजह है कि किसी भी बाहरी सैन्य कार्रवाई को यहां अंजाम देना बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता है। मुख्य भूमि के करीब होने से रणनीतिक बढ़त खर्ग द्वीप ईरान की मुख्य भूमि से करीब 25 से 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ऐसे में अगर यहां किसी तरह का हमला होता है तो ईरान अपनी मिसाइल, ड्रोन और नौसैनिक ताकत के जरिए तुरंत जवाबी कार्रवाई कर सकता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ इसे सैन्य दृष्टि से बेहद संवेदनशील क्षेत्र मानते हैं। वैश्विक तेल बाजार पर पड़ सकता है असर ऊर्जा विशेषज्ञों के मुताबिक यदि खर्ग द्वीप पर हमला होता है या यहां की तेल सुविधाएं बाधित होती हैं, तो इसका असर वैश्विक तेल बाजार पर भी पड़ सकता है। इससे कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आने की आशंका रहती है और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है। रणनीतिक रूप से बेहद अहम ठिकाना छोटे आकार के बावजूद खर्ग द्वीप ईरान की अर्थव्यवस्था और सैन्य रणनीति दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि किसी भी संभावित संघर्ष में यह द्वीप निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने 2500 मरीन सैनिकों को तैनात करने का आदेश दिया है। इस फैसले के बाद रणनीतिक रूप से बेहद अहम जलमार्ग Strait of Hormuz को लेकर अमेरिका की संभावित सैन्य योजना पर चर्चा तेज हो गई है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह योजना बेहद जोखिम भरी हो सकती है। ट्रंप ने शुक्रवार को कहा कि अमेरिकी सेना ने ईरान के तेल निर्यात के प्रमुख केंद्र Kharg Island पर हमला किया है। इसके बाद यह अटकलें तेज हो गई हैं कि अमेरिका होर्मुज स्ट्रेट के आसपास स्थित द्वीपों पर कब्जा करने की रणनीति पर काम कर रहा है। अमेरिकी नौसेना के पूर्व अधिकारी और रक्षा विशेषज्ञ Malcolm Nance ने इस संभावित योजना को “खतरनाक” बताते हुए कहा कि इसका विश्लेषण अमेरिकी सैन्य कमांडरों ने करीब 40 साल पहले ही किया था। उनके मुताबिक, उस समय अनुमान लगाया गया था कि इस तरह के ऑपरेशन के लिए कम से कम 6000 मरीन सैनिकों और भारी सैन्य उपकरणों की जरूरत होगी। पहले द्वीपों पर कब्जे की रणनीति नैंस के अनुसार, उस योजना के तहत सबसे पहले Larak Island, Hormuz Island और Qeshm Island पर कब्जा कर Bandar Abbas को चारों तरफ से घेरने की रणनीति थी। इसके बाद प्रतिबंधित समुद्री क्षेत्र को पार कर आगे बढ़ने की योजना बनाई गई थी। हालांकि उन्होंने यह भी बताया कि 1988 में जब ईरानी बारूदी सुरंगों से अमेरिकी जहाजों को खतरा हुआ था, तब भी अमेरिका ने इस तरह की कार्रवाई नहीं की थी। ईरान की जवाबी कार्रवाई का खतरा नैंस के मुताबिक अगर अमेरिका ऐसा कदम उठाता है तो Islamic Revolutionary Guard Corps और बासिज बल पहाड़ी इलाकों से द्वीपों पर मिसाइल और आत्मघाती हमले कर सकते हैं। इसके अलावा ईरान पनडुब्बी ड्रोन, सुसाइड बोट और समुद्री बारूदी सुरंगों का इस्तेमाल भी कर सकता है। रसद सप्लाई भी बड़ी चुनौती विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस अभियान की सप्लाई लाइन भी बड़ी समस्या बन सकती है। अमेरिकी सेना को अपने ठिकानों United Arab Emirates और Qatar से रसद सप्लाई करनी होगी, जो संभावित हमलों के निशाने पर आ सकते हैं। नैंस ने कहा कि इस तरह के विवादित और खतरनाक जलमार्ग से सप्लाई भेजना “पागलपन” जैसा कदम होगा। होर्मुज स्ट्रेट में बारूदी सुरंगों की आशंका हालिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि ईरान Strait of Hormuz में बारूदी सुरंगें बिछा रहा है। हालांकि अगर पेंटागन इटली से एक्सपेडिशनरी सी बेस जहाज हिंद महासागर में तैनात करता है तो अमेरिका को कुछ रणनीतिक बढ़त मिल सकती है। फिलहाल इस दिशा में कोई ठोस प्रगति सामने नहीं आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह योजना जल्दबाजी में बनाई गई प्रतीत होती है और इससे पूरे क्षेत्र में बड़ा सैन्य टकराव हो सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।