दोहा: कतर के प्रमुख गैस निर्यात केंद्र रास लाफान इंडस्ट्रियल सिटी में सोमवार (22 जून) को हुए भीषण विस्फोट में भारतीय नागरिकों समेत कम से कम 13 लोगों की मौत हो गई, जबकि 66 लोग घायल हो गए। हादसे की पुष्टि कतर के ऊर्जा मंत्री साद शेरिदा अल-काबी ने की है। इस घटना ने न केवल कतर के ऊर्जा क्षेत्र को झटका दिया है, बल्कि वैश्विक गैस आपूर्ति को लेकर भी नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। दोहा में मीडिया को संबोधित करते हुए ऊर्जा मंत्री साद शेरिदा अल-काबी ने बताया कि रास लाफान औद्योगिक क्षेत्र स्थित गैस निर्यात टर्मिनल में हुए विस्फोट की प्रारंभिक जांच से यह एक औद्योगिक दुर्घटना प्रतीत होती है।हादसे के कारणों का पता लगाने के लिए विस्तृत जांच शुरू कर दी गई है। भारतीय दूतावास ने जताया शोक, सहायता का आश्वासन दोहा स्थित भारतीय दूतावास ने घटना पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि वह कतर सरकार और स्थानीय प्रशासन के लगातार संपर्क में है। दूतावास ने मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना प्रकट करते हुए कहा कि प्रभावित भारतीय नागरिकों और उनके परिवारों को हरसंभव सहायता प्रदान की जाएगी। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, घायलों में भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, तंजानिया, गिनी, केन्या, नाइजीरिया और कतर सहित कई देशों के नागरिक शामिल हैं। कतर के ऊर्जा क्षेत्र का सबसे अहम केंद्र है रास लाफान रास लाफान इंडस्ट्रियल सिटी कतर के प्राकृतिक गैस उत्पादन, प्रसंस्करण और निर्यात का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। यहां दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी (LNG) निर्यात टर्मिनलों में से एक संचालित होता है। इस क्षेत्र में हुई किसी भी बड़ी दुर्घटना का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ना स्वाभाविक माना जाता है। धमाके के बाद पूरे संयंत्र में आग लग गई, जिसके कारण राहत और बचाव कार्य में काफी मुश्किलें आईं। गैस निर्यात दोबारा शुरू करने की तैयारी के दौरान हुआ हादसा रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान और होर्मुज स्ट्रेट से जुड़े क्षेत्रीय तनाव के कारण कतर पिछले कुछ समय से अपने कई ग्राहकों को गैस की आपूर्ति नहीं कर पा रहा था। इसके चलते देश ने अस्थायी रूप से गैस उत्पादन भी सीमित कर दिया था। हाल ही में क्षेत्रीय तनाव में कमी आने के बाद सरकारी कंपनी कतरएनर्जी ने अपने निर्यात टर्मिनलों को दोबारा चालू करने की प्रक्रिया शुरू की थी। इसी दौरान बरजान गैस आपूर्ति संयंत्र में अचानक विस्फोट हुआ और भीषण आग लग गई। क्या बढ़ सकती है गैस की किल्लत? ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रास लाफान टर्मिनल लंबे समय तक प्रभावित रहता है, तो वैश्विक एलएनजी बाजार में आपूर्ति संबंधी दबाव बढ़ सकता है। एशियाई देशों, विशेषकर भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े आयातकों पर इसका असर पड़ने की आशंका है। कतर सरकार ने फिलहाल गैस आपूर्ति पर बड़े असर से इनकार किया है और कहा है कि स्थिति को सामान्य बनाने के लिए तेजी से कदम उठाए जा रहे हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच हुए 14 सूत्रीय समझौते (MoU) के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। समझौते के तहत अगले 60 दिनों तक व्यापारिक जहाजों को बिना किसी शुल्क के इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से गुजरने की अनुमति दी गई है, लेकिन ईरान ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि इसके बाद जहाजों से टोल (शुल्क) वसूला जा सकता है। ईरान ने क्या कहा? ईरानी संसद के स्पीकर और अमेरिका के साथ बातचीत में प्रमुख भूमिका निभाने वाले मोहम्मद बाकर गालिबाफ ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य अब युद्ध से पहले जैसी स्थिति में नहीं लौटेगा। उन्होंने कहा, "होर्मुज पर ईरान का संप्रभु अधिकार है और वहां दी जाने वाली सेवाओं के बदले शुल्क लेना स्वाभाविक है।" इस बयान को इस संकेत के रूप में देखा जा रहा है कि ईरान भविष्य में इस रणनीतिक समुद्री मार्ग से राजस्व कमाने की औपचारिक व्यवस्था लागू कर सकता है। समझौते में क्या प्रावधान है? अमेरिका-ईरान समझौते के पांचवें अनुच्छेद के अनुसार: • अगले 60 दिनों तक व्यापारिक जहाजों से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा। • ईरान समुद्री बारूदी सुरंगों और अन्य बाधाओं को हटाकर जहाजों की आवाजाही सामान्य करेगा। • 30 दिनों के भीतर युद्ध के दौरान प्रभावित समुद्री मार्गों को पूरी तरह बहाल करने का लक्ष्य रखा गया है। समझौते में 60 दिनों के बाद शुल्क व्यवस्था पर कोई स्थायी प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। तेल टैंकरों से अरबों डॉलर की कमाई की उम्मीद विश्लेषकों का मानना है कि यदि ईरान प्रति बैरल तेल पर लगभग 1 डॉलर के बराबर शुल्क भी लगाता है, तो उसे सालाना अरबों डॉलर का अतिरिक्त राजस्व मिल सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और बड़ी मात्रा में प्राकृतिक गैस की आपूर्ति गुजरती है। सऊदी अरब, इराक, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे प्रमुख ऊर्जा उत्पादकों का अधिकांश निर्यात इसी मार्ग पर निर्भर करता है। ट्रंप के रुख में आया बदलाव ईरान लंबे समय से होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर टोल लगाने की बात करता रहा है। पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस विचार का विरोध करते रहे थे और उन्होंने ईरान तथा ओमान दोनों को चेतावनी भी दी थी। लेकिन अब हुए समझौते में 60 दिनों बाद शुल्क लगाने पर कोई रोक नहीं होने से माना जा रहा है कि अमेरिका ने अप्रत्यक्ष रूप से ईरान के लिए यह विकल्प खुला छोड़ दिया है।
Iran 300 Billion Dollar Fund: अमेरिका और ईरान के बीच हुए 14 सूत्रीय समझौते में 300 अरब डॉलर (300 Billion Dollar) के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास फंड का प्रावधान सबसे अधिक चर्चा में है। यह फंड युद्ध से प्रभावित ईरान के पुनर्निर्माण, ऊर्जा, परिवहन, लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक परियोजनाओं को दोबारा खड़ा करने के लिए प्रस्तावित किया गया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी बड़ी रकम आएगी कहां से और इसे देगा कौन? समझौते में क्या है प्रावधान? समझौते के छठे बिंदु के अनुसार अमेरिका अपने क्षेत्रीय साझेदारों के साथ मिलकर ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर की योजना तैयार करेगा। इस योजना का विस्तृत ढांचा अगले 60 दिनों में अंतिम समझौते के दौरान तय किया जाएगा। क्या अमेरिका अपनी जेब से देगा पैसा? अब तक सामने आई जानकारी के मुताबिक इसका जवाब 'नहीं' है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन खबरों को खारिज किया है जिनमें कहा गया था कि अमेरिका सीधे ईरान को सैकड़ों अरब डॉलर देगा। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि अमेरिकी करदाताओं के पैसे से ईरान को कोई वित्तीय सहायता नहीं दी जाएगी। फिर पैसा देगा कौन? अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के मुताबिक, इस फंड का वित्तपोषण मुख्य रूप से खाड़ी देशों, क्षेत्रीय साझेदारों और वैश्विक निजी निवेशकों के जरिए किया जा सकता है। यानी वे खाड़ी देश, जिन्हें हालिया संघर्ष के दौरान ईरान के हमलों का सामना करना पड़ा, भविष्य में ईरान के पुनर्निर्माण में निवेश कर सकते हैं। आधे से ज्यादा फंड पहले ही जुटने का दावा रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार प्रस्तावित 300 अरब डॉलर के फंड का आधे से अधिक हिस्सा पहले ही कमिट किया जा चुका है। यह फंड किसी सरकारी राहत पैकेज की तरह नहीं, बल्कि एक प्राइवेट इन्वेस्टमेंट प्लेटफॉर्म के रूप में काम करेगा, जिसमें ऊर्जा, इंफ्रास्ट्रक्चर, परिवहन और विनिर्माण क्षेत्रों में निवेश किया जाएगा। ईरान पहले मांग रहा था 400 अरब डॉलर रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान ने शुरुआत में अमेरिका से 400 अरब डॉलर के मुआवजे की मांग की थी। अमेरिका की असहमति के बाद पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास फंड का विचार सामने आया। इसके तहत ऋण गारंटी, क्रेडिट लाइन और सीधे निवेश के जरिए ईरान की क्षतिग्रस्त परियोजनाओं को दोबारा खड़ा करने की योजना बनाई गई है। किन परियोजनाओं पर खर्च होगा पैसा? यह फंड ईरान के स्टील प्लांट, रिफाइनरी, एयरपोर्ट, परिवहन नेटवर्क, ऊर्जा परियोजनाओं और युद्ध में क्षतिग्रस्त अन्य बुनियादी ढांचों के पुनर्निर्माण में इस्तेमाल किया जा सकता है। सबसे बड़ा सवाल अभी भी बाकी 300 अरब डॉलर का यह फंड फिलहाल केवल प्रस्तावित स्तर पर है। इसके अस्तित्व में आने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच अंतिम और बाध्यकारी समझौते का होना जरूरी है। साथ ही यह भी देखना होगा कि क्या ईरान समझौते की सभी शर्तों का पालन कर पाएगा और क्या खाड़ी देश एवं वैश्विक निवेशक वास्तव में इतनी बड़ी राशि निवेश करने के लिए तैयार होंगे। यदि यह योजना सफल होती है, तो यह न केवल ईरान की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकती है, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की भू-राजनीति और ऊर्जा बाजार पर भी गहरा प्रभाव डाल सकती है।
अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने की दिशा में एक बड़ा कूटनीतिक कदम उठाया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने 14 सूत्रीय समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। समझौते के लागू होने के साथ ही दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव कम करने, होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने और आर्थिक एवं परमाणु मुद्दों पर व्यापक बातचीत शुरू करने का रास्ता साफ हो गया है। अमेरिकी प्रशासन ने इस दस्तावेज को ‘संयुक्त राज्य अमेरिका और इस्लामी गणराज्य ईरान के बीच इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन’ के रूप में जारी किया है। समझौते का उद्देश्य 60 दिनों के विस्तारित युद्धविराम को लागू करना और लंबित मुद्दों पर अंतिम समझौते की रूपरेखा तैयार करना है। होर्मुज जलडमरूमध्य तुरंत खोलने पर सहमति समझौते का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलना है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल का परिवहन इसी समुद्री मार्ग से होता है। समझौते के तहत ईरान ने 60 दिनों तक फारस की खाड़ी और ओमान सागर के बीच वाणिज्यिक जहाजों को सुरक्षित और निर्बाध मार्ग देने पर सहमति जताई है। प्रतिबंधों में चरणबद्ध राहत का रोडमैप अमेरिका ने ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों को चरणबद्ध तरीके से हटाने की प्रतिबद्धता जताई है। इसके तहत ईरानी तेल निर्यात, बैंकिंग, बीमा और परिवहन सेवाओं को तत्काल राहत देने का प्रावधान किया गया है। साथ ही अमेरिका ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों और धनराशि को भी जारी करने पर सहमत हुआ है। परमाणु कार्यक्रम पर आगे होगी विस्तृत बातचीत समझौते में ईरान ने एक बार फिर दोहराया है कि वह परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा और न ही उन्हें हासिल करने की कोशिश करेगा। दोनों देशों ने संवर्धित यूरेनियम भंडार, यूरेनियम संवर्धन और परमाणु कार्यक्रम से जुड़े अन्य मुद्दों पर अंतिम समझौते के तहत विस्तृत चर्चा करने पर सहमति जताई है। 14 सूत्रीय समझौते की प्रमुख बातें सभी सैन्य अभियानों और युद्ध गतिविधियों को तत्काल प्रभाव से रोकना। एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करना। 60 दिनों के भीतर अंतिम समझौते की दिशा में काम करना। अमेरिका द्वारा ईरान के खिलाफ नौसैनिक नाकेबंदी हटाने की प्रक्रिया शुरू करना। होर्मुज जलडमरूमध्य से वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षित और मुफ्त आवाजाही सुनिश्चित करना। ईरान के लिए 300 अरब डॉलर की आर्थिक पुनर्निर्माण योजना तैयार करना। संयुक्त राष्ट्र और अमेरिकी प्रतिबंधों को चरणबद्ध तरीके से हटाने का रोडमैप बनाना। ईरान द्वारा परमाणु हथियार नहीं बनाने की प्रतिबद्धता दोहराना। अंतिम समझौते तक दोनों देशों द्वारा यथास्थिति बनाए रखना। ईरानी तेल निर्यात, बैंकिंग और बीमा सेवाओं को तत्काल राहत देना। ईरान की जमी हुई संपत्तियों और धनराशि को जारी करना। समझौते के अनुपालन के लिए विशेष निगरानी तंत्र स्थापित करना। अंतिम समझौते के लिए औपचारिक वार्ता शुरू करना। अंतिम समझौते को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के बाध्यकारी प्रस्ताव के माध्यम से वैधता प्रदान करना। पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़ा मोड़ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह समझौता तय शर्तों के अनुसार लागू होता है, तो इससे न केवल अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा टकराव समाप्त होगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, तेल बाजार, क्षेत्रीय सुरक्षा और पश्चिम एशिया की भू-राजनीति पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। होर्मुज जलडमरूमध्य के दोबारा खुलने से वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार में स्थिरता आने की उम्मीद भी बढ़ गई है।
तेहरान/वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते पर हस्ताक्षर से पहले ईरानी मीडिया ने 14 सूत्रीय समझौता ज्ञापन (MoU) का कथित मसौदा सार्वजनिक करने का दावा किया है। ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी मेहर न्यूज के मुताबिक, प्रस्तावित समझौते में अमेरिका की ओर से ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों को जारी करने, होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने, प्रतिबंधों में राहत और क्षेत्र से अमेरिकी सैन्य मौजूदगी कम करने जैसे कई बड़े प्रावधान शामिल हैं। अमेरिकी अधिकारियों ने इन दावों के कुछ हिस्सों पर अलग रुख अपनाते हुए कहा है कि ईरान की अवरुद्ध संपत्तियां तभी जारी की जाएंगी, जब तेहरान समझौते के तहत अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करेगा। 24 अरब डॉलर जारी करने का दावा, 12 अरब डॉलर पहले देने की शर्त मेहर न्यूज एजेंसी के अनुसार, 60 दिन की प्रस्तावित वार्ता अवधि के दौरान ईरान की कुल 24 अरब डॉलर की अवरुद्ध संपत्तियां जारी की जाएंगी। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इसमें से आधी राशि यानी 12 अरब डॉलर बातचीत शुरू होने से पहले ही ईरान को उपलब्ध कराई जाएगी। अमेरिकी अधिकारियों ने इस दावे का खंडन करते हुए कहा है कि यह "प्रदर्शन के बदले भुगतान" (Payment for Performance) का मॉडल होगा और ईरान के दायित्वों के पालन के बाद ही वित्तीय रियायतें दी जाएंगी। प्रस्तावित 14 बिंदुओं में क्या-क्या शामिल? ईरानी मीडिया के मुताबिक, प्रस्तावित समझौते के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं: लेबनान सहित सभी मोर्चों पर सैन्य अभियान तत्काल और स्थायी रूप से समाप्त होंगे। अमेरिका ईरान की संप्रभुता और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की प्रतिबद्धता देगा। अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी 30 दिनों के भीतर समाप्त की जाएगी। अमेरिका ईरान के आसपास तैनात सैन्य बलों की वापसी शुरू करेगा। होर्मुज जलडमरूमध्य को 30 दिनों के भीतर फिर से खोला जाएगा। ईरानी तेल और पेट्रोकेमिकल निर्यात पर लगे प्रतिबंधों को निलंबित किया जाएगा। ईरान को अपने वित्तीय संसाधनों तक पूर्ण पहुंच दी जाएगी। अमेरिका और उसके सहयोगी देश ईरान के पुनर्निर्माण के लिए 300 अरब डॉलर तक की योजनाएं पेश करेंगे। परमाणु मुद्दों और प्रतिबंधों पर अंतिम समाधान के लिए 60 दिनों की वार्ता होगी। ईरान परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के तहत परमाणु हथियार विकसित नहीं करने की प्रतिबद्धता दोहराएगा। वार्ता अवधि में अमेरिका नए प्रतिबंध नहीं लगाएगा और अतिरिक्त सैन्य बल नहीं भेजेगा। 24 अरब डॉलर की अवरुद्ध संपत्तियां चरणबद्ध तरीके से जारी की जाएंगी। समझौते की निगरानी के लिए विशेष मॉनिटरिंग मैकेनिज्म बनाया जाएगा। ईरान के मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रतिरोधी समूहों को समर्थन जैसे मुद्दों को वार्ता के एजेंडे से बाहर रखा जाएगा। ट्रंप की घोषणा के बाद बढ़ी चर्चा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते पर सहमति बन गई है और होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोले जाने की दिशा में प्रगति हुई है। ट्रंप ने कहा कि यह समझौता पश्चिम एशिया में स्थिरता और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को सामान्य बनाने में मदद करेगा। ईरान ने रखी अपनी शर्तें ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने कहा है कि अंतिम समझौते की प्रक्रिया तभी आगे बढ़ेगी, जब अमेरिका युद्ध समाप्त करने, नाकेबंदी हटाने और फ्रीज की गई ईरानी संपत्तियों को जारी करने जैसे अपने वादों को पूरा करेगा। पाकिस्तान ने भी किया समझौते का दावा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी दावा किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता हो चुका है और उस पर औपचारिक हस्ताक्षर स्विट्जरलैंड में किए जाएंगे। उन्होंने इस प्रक्रिया में कतर, सऊदी अरब और तुर्किये की मध्यस्थता भूमिका की सराहना की। इजरायल की चुप्पी बनी चर्चा का विषय जहां कई देशों ने प्रस्तावित समझौते का स्वागत किया है, वहीं इजरायल की ओर से इस पर तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। इजरायल लंबे समय से ईरान और उसके समर्थित समूहों को लेकर अपनी सुरक्षा चिंताओं को प्रमुख मुद्दा बताता रहा है।
वॉशिंगटन/तेहरान: पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की खबरों ने वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजारों में हलचल बढ़ा दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दावा किया है कि दोनों देशों के बीच शांति समझौते पर सहमति बन गई है। वहीं, ईरान की ओर से भी इस दिशा में सकारात्मक संकेत दिए गए हैं। ट्रंप ने होर्मुज स्ट्रेट खोलने का किया ऐलान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर लिखा कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता पूरा हो चुका है। उन्होंने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) को फिर से खोलने और अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी हटाने की घोषणा की। ट्रंप ने लिखा, "इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के साथ समझौता अब पूरा हो चुका है। सभी को बधाई। दुनिया के जहाज अब अपने इंजन शुरू करें, तेल का प्रवाह जारी रहने दें।" ईरान ने रखी अपनी शर्तें ईरान के कानूनी एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने कहा कि तेहरान प्रस्तावित 60 दिन की वार्ता प्रक्रिया में तभी शामिल होगा, जब अमेरिका युद्ध समाप्त करने, नाकेबंदी हटाने और ईरानी संपत्तियों को मुक्त करने जैसे अपने वादों को पूरा करेगा। उन्होंने कहा कि समझौते का अर्थ यह नहीं है कि ईरान अमेरिका पर पूरी तरह भरोसा कर रहा है। तेहरान अमेरिकी प्रतिबद्धताओं के क्रियान्वयन की लगातार निगरानी करेगा। शहबाज शरीफ ने भी किया समझौते का दावा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर दावा किया कि लंबी बातचीत और गहन वार्ताओं के बाद अमेरिका और ईरान शांति समझौते पर सहमत हो गए हैं। उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों ने लेबनान समेत विभिन्न मोर्चों पर सैन्य गतिविधियों को तत्काल और स्थायी रूप से समाप्त करने का निर्णय लिया है। शरीफ के अनुसार, समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर 19 जून को स्विट्जरलैंड में किए जा सकते हैं। कतर, सऊदी अरब और तुर्किये की भूमिका अहम शहबाज शरीफ ने इस मध्यस्थता प्रक्रिया में कतर, सऊदी अरब और तुर्किये की भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा कि इन देशों के कूटनीतिक प्रयासों ने दोनों पक्षों को बातचीत की मेज तक लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। परमाणु कार्यक्रम पर भी रहेगा फोकस डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि प्रस्तावित समझौते के तहत ईरान के परमाणु कार्यक्रम की निगरानी को और मजबूत किया जाएगा। इसमें निरीक्षण व्यवस्था को सख्त करने तथा परमाणु सामग्री के प्रबंधन से जुड़े प्रावधान शामिल किए जा सकते हैं। वैश्विक ऊर्जा बाजार की नजरें समझौते पर यदि 19 जून को प्रस्तावित हस्ताक्षर होते हैं और होर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह खुलता है, तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल आपूर्ति और ऊर्जा बाजारों पर पड़ सकता है। पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की स्थिति में कच्चे तेल की कीमतों में भी राहत देखने को मिल सकती है। अमेरिका, ईरान और अन्य संबंधित पक्षों की ओर से समझौते के अंतिम दस्तावेज और आधिकारिक विवरण सार्वजनिक होने का इंतजार किया जा रहा है।
अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को लेकर बढ़ती अटकलों के बीच तेहरान ने स्पष्ट किया है कि अभी किसी अंतिम समझौते पर सहमति नहीं बनी है। ईरान के विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस दावे को खारिज किया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि दोनों देशों के बीच समझौता लगभग तय हो चुका है और जल्द ही उस पर हस्ताक्षर हो सकते हैं। ईरान बोला- समझौते की खबरें अटकलों पर आधारित ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने सरकारी समाचार एजेंसी आईआरएनए से बातचीत में कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच किसी अंतिम समझौते को लेकर सामने आ रही खबरें केवल अटकलें हैं। उन्होंने कहा कि वार्ता के कई पहलुओं पर प्रगति हुई है और मसौदे का बड़ा हिस्सा पहले ही तैयार किया जा चुका है, लेकिन अभी तक किसी समझौते को अंतिम रूप नहीं दिया गया है। बघाई के अनुसार, कतर और पाकिस्तान इस प्रक्रिया में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। अमेरिकी रुख पर जताई नाराजगी बघाई ने आरोप लगाया कि वार्ता के दौरान अमेरिकी पक्ष लगातार अपना रुख बदलता रहा है, जिससे बातचीत की प्रक्रिया प्रभावित हुई है। उन्होंने कहा कि ईरान अपनी निर्धारित "रेड लाइन्स" से पीछे नहीं हटेगा और राष्ट्रीय हितों से जुड़े मुद्दों पर कोई समझौता नहीं करेगा। उनका कहना था कि वार्ता जारी है, लेकिन अंतिम निर्णय अभी शेष है। होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा पर चिंता ईरानी प्रवक्ता ने होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा को लेकर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने आरोप लगाया कि क्षेत्र में अमेरिकी गतिविधियों के कारण इस रणनीतिक समुद्री मार्ग की सुरक्षा स्थिति प्रभावित हुई है। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है, जहां किसी भी तनाव का असर वैश्विक तेल बाजारों पर पड़ सकता है। ट्रंप ने किया था समझौते का दावा इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान दावा किया था कि अमेरिका और ईरान के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता लगभग तैयार है। ट्रंप ने कहा था कि अब केवल दस्तावेजों को अंतिम रूप दिया जाना बाकी है और आने वाले दिनों में समझौते पर हस्ताक्षर हो सकते हैं। उन्होंने यह भी संकेत दिया था कि हस्ताक्षर समारोह यूरोप में आयोजित किया जा सकता है और इसमें अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस अमेरिका का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। ट्रंप ने दावा किया था कि प्रस्तावित समझौते का प्रमुख उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ईरान भविष्य में परमाणु हथियार विकसित न कर सके। भारतीय जहाज पर हमले को लेकर अमेरिका पर आरोप इस बीच ओमान के तट के निकट एक वाणिज्यिक जहाज पर हुए हमले और उसमें भारतीय नागरिकों की मौत के मुद्दे पर भी ईरान ने अमेरिका की आलोचना की है। इस्माइल बघाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जारी बयान में अमेरिकी कार्रवाई को "राज्य प्रायोजित समुद्री डकैती" और "सशस्त्र लूट" करार दिया। उन्होंने कहा कि इस घटना ने क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। आगे क्या? अमेरिका और ईरान के बयानों में स्पष्ट अंतर दिखाई दे रहा है। जहां वॉशिंगटन समझौते को अंतिम चरण में बता रहा है, वहीं तेहरान का कहना है कि बातचीत जारी है और अभी किसी अंतिम निर्णय पर पहुंचना बाकी है। ऐसे में आने वाले दिनों की कूटनीतिक गतिविधियां यह तय करेंगी कि दोनों देश वास्तव में किसी व्यापक समझौते के करीब हैं या नहीं।
तेहरान/वॉशिंगटन: पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ की चेतावनी के बाद अमेरिका ने गुरुवार तड़के ईरान के कई ठिकानों पर हवाई हमले किए। इसके जवाब में ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया है कि उसने खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। IRGC के अनुसार, उसकी एयरोस्पेस फोर्स और नौसेना ने संयुक्त अभियान चलाकर कुवैत और बहरीन में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों पर हमले किए। ईरान का दावा है कि कुवैत के अली अल सलेम और अहमद अल जाबेर एयरबेस के अलावा बहरीन के शेख ईसा एयरबेस समेत कुल 18 महत्वपूर्ण अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। कुवैत ने बंद किया अपना हवाई क्षेत्र क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच कुवैत ने एहतियातन अपना हवाई क्षेत्र अस्थायी रूप से बंद कर दिया है। कुवैत के नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) ने बताया कि सुरक्षा कारणों से उड़ानों का मार्ग बदला जा रहा है और कई विमानों को वैकल्पिक हवाई अड्डों की ओर भेजा गया है। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, आधिकारिक घोषणा से पहले कई विमान कुवैत के हवाई क्षेत्र के बाहर मंडराते देखे गए थे। दूसरे दिन भी जारी रही अमेरिकी सैन्य कार्रवाई अमेरिका ने लगातार दूसरे दिन भी ईरान के विभिन्न क्षेत्रों में हवाई हमले किए। रिपोर्टों के मुताबिक तेहरान समेत कई शहरों के आसपास सैन्य गतिविधियां तेज हो गई हैं। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि यह कार्रवाई क्षेत्र में अमेरिकी हितों और सैन्य प्रतिष्ठानों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए की गई है। विश्लेषकों का मानना है कि ताजा घटनाक्रम के बाद दोनों देशों के बीच तनाव कम होने की संभावना फिलहाल कमजोर पड़ गई है और कूटनीतिक समाधान की कोशिशों को भी झटका लगा है। होर्मुज स्ट्रेट को लेकर बढ़ी वैश्विक चिंता इस बीच ईरान ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपना नियंत्रण बनाए रखेगा। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल इसी रास्ते से होकर गुजरता है। तनाव बढ़ने के बाद अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में भी हलचल देखी गई है। निवेशकों की चिंता के बीच कच्चे तेल की कीमतों में तेजी दर्ज की गई, जबकि वैश्विक व्यापार और समुद्री परिवहन पर संभावित असर को लेकर भी आशंकाएं बढ़ गई हैं। क्षेत्रीय स्थिरता पर मंडराया संकट अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता सैन्य टकराव पूरे खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता के लिए चुनौती बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों पक्षों के बीच संघर्ष और बढ़ता है तो इसका प्रभाव केवल क्षेत्रीय सुरक्षा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजारों पर भी व्यापक असर पड़ सकता है। फिलहाल दुनिया की नजरें पश्चिम एशिया के घटनाक्रम पर टिकी हैं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय दोनों देशों से संयम बरतने की अपील कर रहा है।
न्यूयॉर्क, एजेंसियां। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच एक मजबूत और प्रभावशाली समझौता होने की संभावना काफी बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि वॉशिंगटन और तेहरान के बीच जारी बातचीत निर्णायक चरण में पहुंच चुकी है और जल्द ही ऐसा समझौता हो सकता है जो सैन्य कार्रवाई से भी अधिक प्रभावी साबित होगा। न्यूयॉर्क में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि अमेरिका के पास सैन्य विकल्प मौजूद हैं, लेकिन उनकी प्राथमिकता कूटनीतिक समाधान है। उन्होंने कहा कि यदि अमेरिका चाहे तो ईरान के खिलाफ व्यापक बमबारी अभियान चला सकता है, लेकिन इससे क्षेत्रीय स्थिरता और समुद्री व्यापार मार्गों पर गंभीर असर पड़ेगा। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि युद्ध की तुलना में हस्ताक्षरित समझौता अधिक स्थायी और मजबूत परिणाम देगा। ‘बमबारी नहीं, समझौता बेहतर विकल्प’ ट्रंप ने कहा कि किसी भी सैन्य अभियान में बड़ी संख्या में लोगों की जान जा सकती है, जिसे वे टालना चाहते हैं। उनका मानना है कि एक औपचारिक समझौता ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियों पर अधिक प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर सकता है। नाकेबंदी को बताया सबसे प्रभावी हथियार अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया कि आर्थिक प्रतिबंधों और समुद्री नाकेबंदी ने ईरान की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डाला है। उनके अनुसार, यही दबाव तेहरान को बातचीत की मेज पर लाने में सफल रहा है। ट्रंप ने कहा कि नाकेबंदी कई मामलों में बमबारी से भी अधिक प्रभावशाली साबित हुई है और ईरान अब समझौते के लिए मजबूर होता दिख रहा है। मध्य पूर्व में बढ़ा तनाव हाल के दिनों में ईरान और इजराइल के बीच मिसाइल हमलों और जवाबी सैन्य कार्रवाइयों से क्षेत्र में तनाव बढ़ा है। ट्रंप ने बताया कि उन्होंने इजराइली प्रधानमंत्री से भी बातचीत कर संयम बरतने की सलाह दी है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि संघर्ष बढ़ता है तो क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर व्यापक असर पड़ सकता है।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिका-इजरायल संघर्ष के दौरान हुए एक बड़े हमले को लेकर चौंकाने वाला खुलासा किया है। उन्होंने दावा किया कि संघर्ष के शुरुआती दिनों में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के कार्यालय पर हुए हमले के समय वह उसी इमारत में मौजूद थे और मलबे के बीच से निकलकर अपनी जान बचाने में सफल रहे। अराघची के अनुसार, हमले के बाद दो दिनों तक उन्हें यह भी नहीं पता था कि खामेनेई किस स्थिति में हैं। हमले के वक्त खामेनेई के कार्यालय में मौजूद थे अराघची लेबनान के टीवी चैनल अल-मयादीन को दिए इंटरव्यू में अराघची ने बताया कि संघर्ष के शुरुआती घंटों में खामेनेई के कार्यालय को निशाना बनाया गया था। उस समय वे भी वहां मौजूद थे। उन्होंने कहा, “विस्फोट के बाद मेरी पहली चिंता अपनी सुरक्षा नहीं, बल्कि सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की स्थिति को लेकर थी। उस समय हालात बेहद अराजक थे और इमारत के कई हिस्से क्षतिग्रस्त हो गए थे।” दो दिन तक नहीं मिली खामेनेई की जानकारी अराघची ने बताया कि हमले के बाद लगातार दो दिनों तक उन्हें खामेनेई के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिल सकी। इस दौरान पूरा ध्यान राहत, बचाव और सुरक्षा व्यवस्थाओं पर केंद्रित रहा। उनके मुताबिक, सुरक्षा एजेंसियों ने कई बार खामेनेई को सुरक्षित बंकर या विशेष स्थान पर जाने की सलाह दी थी, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया। ‘जब तक जनता सुरक्षित नहीं, मैं भी नहीं’ विदेश मंत्री के अनुसार, खामेनेई का मानना था कि यदि आम ईरानी नागरिकों को सुरक्षित आश्रय उपलब्ध नहीं है, तो वे भी किसी विशेष सुरक्षा सुविधा का लाभ नहीं लेंगे। अराघची ने दावा किया कि खामेनेई ने कहा था कि देश की जनता जिस स्थिति का सामना करेगी, वही स्थिति वे भी स्वीकार करेंगे। उन्होंने युद्ध के दौरान खामेनेई के नेतृत्व और फैसलों की भी सराहना की। खाड़ी देशों को पहले ही दी गई थी चेतावनी इंटरव्यू में अराघची ने कहा कि संघर्ष शुरू होने से पहले उन्होंने कई खाड़ी देशों का दौरा किया था और स्पष्ट चेतावनी दी थी कि यदि ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियानों में क्षेत्रीय सैन्य अड्डों का उपयोग किया गया, तो जवाबी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने आरोप लगाया कि क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति ही तनाव बढ़ाने का एक प्रमुख कारण रही है। ईरान की प्रतिक्रिया ने विरोधियों को चौंकाया अराघची ने दावा किया कि अमेरिका और इजरायल ने ईरान की जवाबी क्षमता को कम आंका था। उनके अनुसार, बड़े पैमाने पर हमलों के बावजूद ईरान ने बहुत कम समय में जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी, जिससे विरोधी पक्ष की रणनीतिक गणनाएं प्रभावित हुईं। उन्होंने कहा कि ईरान की सैन्य प्रतिक्रिया की तीव्रता ने कई देशों को आश्चर्य में डाल दिया। नेतृत्व परिवर्तन पर भी दिया बयान ईरानी विदेश मंत्री ने देश के नेतृत्व को लेकर चल रही चर्चाओं पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि मोजतबा खामेनेई राष्ट्रीय मामलों और शासन व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं तथा सरकारी संस्थानों के साथ उनका नियमित संवाद बना हुआ है। ईरान की आधिकारिक व्यवस्था में सर्वोच्च नेतृत्व से जुड़े किसी भी बदलाव पर अंतिम पुष्टि केवल संबंधित संवैधानिक संस्थाओं द्वारा ही की जा सकती है। कैसे शुरू हुआ था 2026 का संघर्ष? 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ संयुक्त सैन्य अभियान शुरू किया था। इस अभियान में परमाणु ठिकानों, मिसाइल अड्डों, वायु रक्षा प्रणालियों और सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया। इसके जवाब में ईरान ने ‘ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस-IV’ के तहत मिसाइल और ड्रोन हमले किए। संघर्ष का प्रभाव पूरे पश्चिम एशिया में देखा गया और वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर भी इसका असर पड़ा। फिलहाल अप्रैल 2026 से संघर्षविराम लागू है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप और तनावपूर्ण बयानबाजी जारी है। ऐसे में क्षेत्र में स्थायी शांति को लेकर अब भी अनिश्चितता बनी हुई है।
ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकेर गालिबफ ने अमेरिका पर आर्थिक दबाव और मीडिया प्रचार के जरिए देश को कमजोर करने की कोशिश करने का आरोप लगाया है. उन्होंने कहा कि ईरान अपने अधिकारों और राष्ट्रीय हितों से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेगा. गालिबफ ने दावा किया कि तेहरान को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करने की अमेरिकी रणनीति कभी सफल नहीं होगी. आर्थिक दबाव और प्रचार के जरिए फूट डालने का आरोप रविवार को संसद के नए सत्र को संबोधित करते हुए गालिबफ ने कहा कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश सैन्य मोर्चे पर मिली असफलताओं की भरपाई आर्थिक प्रतिबंधों और मीडिया अभियान के जरिए करना चाहते हैं. उनका उद्देश्य ईरान की राष्ट्रीय एकता को कमजोर करना और देश के भीतर विभाजन पैदा करना है. उन्होंने कहा कि युद्ध के नए दौर में विरोधी ताकतें आर्थिक दबाव और प्रचार तंत्र के सहारे ईरान को झुकाने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन यह उनका भ्रम है और यह रणनीति सफल नहीं होगी. 'ईरान और इस्लाम को कमजोर करने की कोशिश' गालिबफ ने कहा कि देश एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील दौर से गुजर रहा है. उन्होंने दावा किया कि ईरानी जनता उन ताकतों का मजबूती से सामना कर रही है, जो ईरान और इस्लाम को कमजोर करने का प्रयास कर रही हैं. उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियां इस दौर को देश की संप्रभुता और अधिकारों की रक्षा के संघर्ष के रूप में याद रखेंगी. उनके अनुसार, यह समय राष्ट्रीय एकता और दृढ़ संकल्प का प्रतीक बनकर इतिहास में दर्ज होगा. संघर्ष के चार मोर्चों का किया जिक्र ईरानी संसद अध्यक्ष ने मौजूदा हालात को व्यापक संघर्ष बताते हुए चार प्रमुख मोर्चों का उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि सैन्य, कूटनीतिक, जनसहभागिता और जनसेवा के क्षेत्र में समन्वित प्रयासों से ही देश अपने लक्ष्यों को हासिल कर सकता है. गालिबफ ने दावा किया कि मिसाइल कार्यक्रम समेत ईरान की सैन्य उपलब्धियां जनता के समर्थन और सहयोग का परिणाम हैं. उन्होंने कहा कि अब इन उपलब्धियों को राजनीतिक और कूटनीतिक सफलता में बदलने की जिम्मेदारी नीति निर्माताओं की है. समझौते पर रखा स्पष्ट रुख विदेशी शक्तियों के साथ संभावित समझौतों पर गालिबफ ने कहा कि ईरान केवल उन्हीं प्रस्तावों को स्वीकार करेगा, जिनसे देश के अधिकार और जनता के हित सुरक्षित रहें. उन्होंने कहा कि केवल आश्वासनों या बयानों के आधार पर कोई फैसला नहीं लिया जाएगा. ईरान ठोस और व्यावहारिक परिणामों को प्राथमिकता देता है और ऐसा कोई समझौता स्वीकार नहीं करेगा, जिससे राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचे. संसद के नए सत्र में दिया संबोधन गालिबफ ने ये टिप्पणियां ईरान की 12वीं संसद के तीसरे वर्ष के पहले सत्र के दौरान कीं. यह बैठक वर्चुअल माध्यम से आयोजित की गई, जिसमें बड़ी संख्या में सांसदों ने भाग लिया. उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब ईरान और अमेरिका के बीच तनाव लगातार बना हुआ है और क्षेत्रीय सुरक्षा, प्रतिबंधों तथा रणनीतिक मुद्दों को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद कायम हैं.
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के इस्तीफे की खबरों ने राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज कर दी है। कुछ विदेशी मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि देश की निर्णय प्रक्रिया में बढ़ते सैन्य प्रभाव और सरकार की सीमित भूमिका से नाराज होकर उन्होंने इस्तीफा देने की पेशकश की है। ईरानी सरकार और राष्ट्रपति कार्यालय ने इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। रिपोर्ट में क्या किया गया दावा? ब्रिटिश-ईरानी मीडिया संस्थान 'ईरान इंटरनेशनल' की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने दावा किया कि राष्ट्रपति पेजेशकियन ने सर्वोच्च नेतृत्व को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। रिपोर्ट में कहा गया कि महत्वपूर्ण राष्ट्रीय फैसलों में सरकार की भूमिका कम होने से वह असंतुष्ट थे। राष्ट्रपति कार्यालय ने बताया निराधार राष्ट्रपति कार्यालय के अधिकारियों ने इन खबरों को अफवाह करार देते हुए कहा कि पेजेशकियन सामान्य रूप से अपने सभी सरकारी दायित्व निभा रहे हैं। राष्ट्रपति कार्यालय के संचार विभाग ने कहा कि विदेशी मीडिया द्वारा फैलाई जा रही खबरों का वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। तस्नीम एजेंसी ने भी किया खंडन आईआरजीसी से संबद्ध तस्नीम न्यूज एजेंसी ने सरकारी सूत्रों के हवाले से कहा कि राष्ट्रपति ने इस्तीफा नहीं दिया है और सरकार अपना कामकाज सामान्य रूप से चला रही है। सरकार और सुरक्षा संस्थाओं के रिश्तों पर चर्चा पिछले कुछ महीनों से ईरान की निर्वाचित सरकार और सैन्य-सुरक्षा संस्थाओं के बीच मतभेदों की खबरें सामने आती रही हैं। इसी पृष्ठभूमि में इस्तीफे की अटकलों को बल मिला। हालांकि, सरकार का कहना है कि देश की एकता और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर फैलाई जा रही ऐसी खबरों का कोई आधार नहीं है। सत्ता के केंद्र को लेकर बहस जारी विश्लेषकों का मानना है कि ईरान की नीतिगत निर्णय प्रक्रिया में कई प्रभावशाली संस्थाओं और वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका रहती है। लेकिन फिलहाल राष्ट्रपति के इस्तीफे को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और सरकार लगातार इन दावों को भ्रामक प्रचार बता रही है।
अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर नए विवाद की स्थिति बन गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के उस दावे को ईरान ने खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि तेहरान बिना किसी शुल्क के होर्मुज स्ट्रेट खोलने पर सहमत हो गया है। ईरान का कहना है कि मौजूदा वार्ता के मसौदे में ऐसी कोई शर्त शामिल नहीं है। ईरान बोला- ट्रंप के बयान में सच कम, दावे ज्यादा ईरान की सैन्य प्रतिष्ठान से जुड़े मीडिया संस्थान Fars News Agency ने वरिष्ठ अधिकारियों के हवाले से कहा कि ट्रंप के हालिया बयान वास्तविक बातचीत से मेल नहीं खाते। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति ऐसे दावे कर रहे हैं जो अभी तक किसी अंतिम समझौते का हिस्सा नहीं हैं। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि वार्ता अभी जारी है और किसी भी प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी नहीं दी गई है। किस मसौदे पर चल रही है चर्चा? रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों देशों के बीच "कमिटमेंट के बदले कमिटमेंट" के सिद्धांत पर आधारित एक प्रस्तावित समझौते पर चर्चा हो रही है। तेहरान ने अभी तक इस मसौदे को अंतिम स्वीकृति नहीं दी है। ईरानी पक्ष का दावा है कि ट्रंप जिन शर्तों का सार्वजनिक रूप से उल्लेख कर रहे हैं, वे वर्तमान ड्राफ्ट डील का हिस्सा नहीं हैं। ट्रंप ने क्या कहा था? व्हाइट हाउस में पश्चिम एशिया की स्थिति पर एक महत्वपूर्ण बैठक से पहले ट्रंप ने दावा किया था कि होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री यातायात सामान्य होने की दिशा में तेजी से प्रगति हो रही है। उन्होंने कहा था कि ईरान जल्द ही समुद्री मार्ग में मौजूद बारूदी सुरंगों को हटाएगा या निष्क्रिय करेगा। ट्रंप ने यह भी दावा किया कि जहाजों की आवाजाही पर लगी बाधाएं लगभग समाप्त हो चुकी हैं और क्षेत्र में फंसे जहाज अब सुरक्षित रूप से अपने गंतव्य तक लौट सकेंगे। होर्मुज स्ट्रेट क्यों है अहम? Strait of Hormuz दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। इसलिए इस क्षेत्र में किसी भी तनाव या समझौते का असर सीधे अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों पर पड़ता है। अभी भी जारी है वार्ता दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है, लेकिन ईरान और अमेरिका के बयानों में अंतर यह संकेत देता है कि कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अभी भी सहमति बनना बाकी है। ऐसे में संभावित शांति समझौते को लेकर अंतिम घोषणा का इंतजार किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक दोनों पक्ष आधिकारिक रूप से समझौते की पुष्टि नहीं करते, तब तक होर्मुज स्ट्रेट, क्षेत्रीय सुरक्षा और परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दों पर अनिश्चितता बनी रह सकती है।
अमेरिका और ईरान के बीच जारी बातचीत के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने होर्मुज स्ट्रेट को लेकर बड़ा दावा किया है। ट्रंप ने कहा कि क्षेत्र में लगी नौसैनिक नाकेबंदी हटाई जा रही है और ईरान के साथ संभावित समझौते पर जल्द फैसला लिया जा सकता है। ईरान ने उनके दावों पर पूरी तरह सहमति नहीं जताई है और कहा है कि बातचीत अभी जारी है। शांति समझौते पर चल रही है बातचीत पश्चिम एशिया में तनाव कम करने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच कई दौर की बातचीत हो रही है। दोनों देशों के बीच होर्मुज स्ट्रेट, क्षेत्रीय सुरक्षा और परमाणु कार्यक्रम जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा जारी है। रिपोर्टों के मुताबिक, दोनों पक्षों के बीच शुरुआती स्तर पर कुछ सहमति बनी है और मौजूदा युद्धविराम को 60 दिनों तक बढ़ाने के प्रस्ताव पर भी विचार किया जा रहा है। हालांकि अंतिम समझौते की घोषणा अभी नहीं हुई है। व्हाइट हाउस में हुई उच्चस्तरीय बैठक ट्रंप ने शुक्रवार को कहा कि वह ईरान के साथ प्रस्तावित समझौते पर जल्द निर्णय लेंगे। इसके लिए व्हाइट हाउस के सिचुएशन रूम में करीब दो घंटे तक एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें समझौते से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हुई। बैठक के बाद व्हाइट हाउस के अधिकारियों ने इसकी पुष्टि की, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि किसी अंतिम फैसले पर सहमति बनी है या नहीं। ईरान के सामने रखीं ये प्रमुख शर्तें ट्रंप ने कहा कि किसी भी संभावित समझौते के लिए ईरान को कुछ महत्वपूर्ण शर्तें स्वीकार करनी होंगी। इनमें सबसे प्रमुख शर्त यह है कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार या परमाणु बम विकसित नहीं करेगा। इसके अलावा उन्होंने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट को सभी देशों के जहाजों के लिए बिना किसी शुल्क और बाधा के खोलना होगा। ट्रंप ने यह भी दावा किया कि समुद्र में बिछाई गई बारूदी सुरंगों को हटाया या निष्क्रिय किया जाएगा ताकि समुद्री यातायात सामान्य हो सके। होर्मुज में फंसे जहाजों को लेकर ट्रंप का बयान ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी नौसैनिक कार्रवाई के कारण प्रभावित जहाज अब जल्द अपने गंतव्य तक पहुंच सकेंगे। इसी दौरान उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि जहाजों के चालक दल अपने परिवारों तक लौट सकते हैं और "अपनी पत्नी को मेरी तरफ से हैलो कहना।" उनकी यह टिप्पणी सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में चर्चा का विषय बन गई। व्हाइट हाउस ने क्या कहा? व्हाइट हाउस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि अमेरिका तभी किसी शांति समझौते को अंतिम रूप देगा, जब ईरान सभी आवश्यक शर्तों को स्वीकार करेगा। अधिकारी के अनुसार, बातचीत जारी है और अभी किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। वैश्विक ऊर्जा बाजार की नजर समझौते पर होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते पर दुनिया भर के ऊर्जा बाजारों और व्यापारिक समुदाय की नजर बनी हुई है। यदि समझौता सफल होता है, तो इससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार में स्थिरता आने की उम्मीद की जा रही है।
मिडिल ईस्ट यानी पश्चिम एशिया में हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। गाजा में इजरायल और हमास के बीच जंग तेज है, वहीं लेबनान सीमा पर हिजबुल्लाह और इजरायल के बीच भी हमले बढ़ गए हैं। दूसरी तरफ ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव पूरे क्षेत्र में नए संकट का संकेत दे रहा है। इन हालातों से भारत की चिंता भी बढ़ गई है। गाजा में इजरायल का बड़ा हमला इजरायल ने गाजा में हमास के सैन्य प्रमुख मोहम्मद ओदेह को निशाना बनाकर बड़ा हमला किया है। इजरायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने कहा कि 7 अक्टूबर हमले में शामिल लोगों को छोड़ा नहीं जाएगा। इजरायल का दावा है कि यह कार्रवाई आतंकवाद के खिलाफ अभियान का हिस्सा है। इस हमले के बाद गाजा में आम लोगों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। लगातार बमबारी से कई इलाकों में भारी नुकसान हुआ है और मानवीय संकट गहरा रहा है। लेबनान सीमा पर भी बढ़ा तनाव इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच लेबनान सीमा पर भी हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं। लेबनान से रॉकेट और ड्रोन हमलों के बाद इजरायल ने कई इलाकों में जवाबी कार्रवाई की है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, हाल के महीनों में लेबनान में हजारों लोगों की मौत हो चुकी है। सीमा पर लगातार हो रहे हमलों से पूरे इलाके में डर का माहौल है। ईरान और अमेरिका के बीच टकराव अमेरिका ने हाल ही में ईरान के कुछ सैन्य ठिकानों और जहाजों पर हमला किया। अमेरिकी सेना का कहना है कि यह कार्रवाई अपने सैनिकों की सुरक्षा के लिए की गई थी। वहीं ईरान ने इसे उकसावे वाली कार्रवाई बताते हुए जवाब देने की चेतावनी दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कहा कि ईरान के साथ समझौते की कोशिश जारी है, लेकिन अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है। दूसरी तरफ ईरान का कहना है कि बातचीत जारी है, लेकिन जल्द समझौते की उम्मीद नहीं है। तेल और व्यापार पर पड़ सकता है असर मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर दुनिया की अर्थव्यवस्था पर भी दिख सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में शामिल है। अगर यहां हालात और खराब होते हैं तो तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं और समुद्री व्यापार प्रभावित हो सकता है। भारत क्यों है चिंतित? भारत के लिए मिडिल ईस्ट बेहद अहम क्षेत्र है। भारत अपने तेल का बड़ा हिस्सा इसी इलाके से खरीदता है। इसके अलावा लाखों भारतीय वहां काम करते हैं। ऐसे में युद्ध बढ़ने का असर भारत की अर्थव्यवस्था और नागरिकों पर भी पड़ सकता है। भारत ने सभी पक्षों से शांति बनाए रखने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की है। भारतीय विदेश मंत्रालय लगातार हालात पर नजर बनाए हुए है। शांति की राह अभी मुश्किल गाजा, लेबनान और ईरान से जुड़े अलग-अलग मोर्चों पर बढ़ते तनाव ने पूरे मिडिल ईस्ट को अस्थिर बना दिया है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ती टकराहट के कारण आने वाले दिनों में हालात और गंभीर हो सकते हैं। फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या बातचीत से हालात संभलेंगे या संघर्ष और बढ़ेगा।
United States और Iran के बीच जारी तनाव के बीच दक्षिणी ईरान में सोमवार को बड़ा सैन्य घटनाक्रम सामने आया। अमेरिकी सेना ने होर्मुज जलडमरूमध्य के पास “सेल्फ-डिफेंस स्ट्राइक” करते हुए मिसाइल लॉन्च साइट्स और Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) की नौकाओं को निशाना बनाया। अमेरिका ने दावा किया कि ईरानी नौकाएं रणनीतिक रूप से अहम होर्मुज जलडमरूमध्य में बारूदी सुरंगें बिछाने की कोशिश कर रही थीं। अमेरिकी सेना ने क्या कहा? अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रवक्ता Tim Hawkins ने कहा कि कार्रवाई अमेरिकी सैनिकों की सुरक्षा के लिए की गई। उनके मुताबिक, अमेरिकी बलों ने दक्षिणी ईरान के उन ठिकानों पर हमला किया जहां से अमेरिकी सेना के लिए खतरा पैदा हो रहा था। कार्रवाई के दौरान मिसाइल लॉन्च साइट्स और ईरानी नौकाओं को निशाना बनाया गया। IRGC की नावों पर कार्रवाई एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी के अनुसार, ऑपरेशन से पहले अमेरिकी सेना ने IRGC की दो नौकाओं को जलडमरूमध्य में माइन बिछाते हुए देखा था। इसके बाद अमेरिकी सेना ने जवाबी कार्रवाई करते हुए उन नौकाओं को नष्ट कर दिया। अधिकारी ने दावा किया कि बंदर अब्बास में मौजूद एक सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली ने अमेरिकी लड़ाकू विमानों को निशाना बनाने की कोशिश की थी, जिसके बाद उस मिसाइल सिस्टम पर भी हमला किया गया। ईरान का दावा- कई लोगों की मौत ईरानी मीडिया के मुताबिक, लारक द्वीप पर हुए हमले में कई लोगों की मौत हुई है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं किया गया कि मृतक सैन्यकर्मी थे या आम नागरिक। इसके अलावा बंदर अब्बास, सिरिक और जास्क इलाकों में भी धमाकों की खबरें सामने आईं। युद्धविराम के बीच बढ़ा तनाव यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब दोनों देशों के बीच युद्धविराम और शांति वार्ता को लेकर बातचीत जारी है। अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि यह सीमित कार्रवाई थी और इसका मतलब युद्धविराम खत्म होना नहीं है। ट्रंप ने फिर उठाया यूरेनियम मुद्दा इस बीच Donald Trump ने एक बार फिर ईरान के संवर्धित यूरेनियम को नष्ट करने की मांग दोहराई। ट्रंप ने कहा कि ईरान के “न्यूक्लियर डस्ट” को या तो अमेरिका को सौंपा जाए या अंतरराष्ट्रीय निगरानी में नष्ट किया जाए। उन्होंने कहा कि अमेरिका किसी भी “आधा-अधूरा” समझौते को स्वीकार नहीं करेगा। अब्राहम अकॉर्ड्स का भी जिक्र ट्रंप ने मध्य पूर्व में Abraham Accords के विस्तार की बात भी दोहराई। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय शांति व्यवस्था के तहत भविष्य में ईरान को भी इस ढांचे में शामिल किया जा सकता है।
Donald Trump की अपील के बावजूद Pakistan ने साफ कर दिया है कि वह फिलहाल Abraham Accords का हिस्सा नहीं बनेगा। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री Khawaja Asif ने कहा कि इस्लामाबाद ऐसा कोई समझौता स्वीकार नहीं करेगा, जो देश की “मूल विचारधारा” के खिलाफ हो। ट्रंप ने मुस्लिम देशों से की थी अपील मिडिल ईस्ट में नए कूटनीतिक समीकरण बनाने की कोशिश कर रहे ट्रंप ने हाल ही में कई मुस्लिम और अरब देशों से अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होने की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि ईरान के साथ संभावित समझौते के बाद मध्य पूर्व में स्थायी शांति का नया दौर शुरू हो सकता है। ट्रंप ने Saudi Arabia, Qatar, पाकिस्तान, Turkey, Egypt, Jordan और Bahrain जैसे देशों से इस समझौते में शामिल होने की अपील की थी। पाकिस्तान ने क्या कहा? पाकिस्तानी चैनल समा टीवी को दिए इंटरव्यू में ख्वाजा आसिफ ने कहा कि पाकिस्तान ऐसे किसी समझौते में शामिल नहीं होगा, जो उसकी बुनियादी विचारधारा से टकराता हो। उन्होंने कहा, “हमारा रुख पूरी तरह साफ है। यह हमारे लिए स्वीकार्य नहीं है।” आसिफ ने इजरायल के साथ किसी संभावित समझौते पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि “आप उन लोगों के साथ कैसे बैठ सकते हैं, जिनकी बात पर एक दिन के लिए भी भरोसा नहीं किया जा सकता?” उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान दुनिया के उन गिने-चुने देशों में है, जिसके पासपोर्ट पर इजरायल का नाम तक नहीं लिखा जाता। सऊदी अरब भी अपने रुख पर कायम सऊदी अरब ने भी अपने पुराने रुख को दोहराते हुए कहा है कि जब तक फिलिस्तीन को मान्यता नहीं मिलती, वह इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने पर आगे नहीं बढ़ेगा। रिपोर्टों के मुताबिक, रियाद का कहना है कि फिलिस्तीन मुद्दे का समाधान उसकी पहली प्राथमिकता है। ट्रंप ने दी थी चेतावनी ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा था कि अगर ईरान के साथ समझौता सफल नहीं हुआ तो क्षेत्र फिर बड़े संघर्ष की ओर बढ़ सकता है। उन्होंने इसे “मध्य पूर्व के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण समझौता” बताते हुए कहा कि अमेरिका अब्राहम अकॉर्ड्स का दायरा और बढ़ाना चाहता है। ट्रंप ने यहां तक संकेत दिया कि भविष्य में ईरान भी इस ढांचे का हिस्सा बन सकता है। क्या है अब्राहम अकॉर्ड्स? अब्राहम अकॉर्ड्स 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता में हुए समझौते हैं, जिनके तहत कई अरब देशों ने इजरायल के साथ राजनयिक और आर्थिक संबंध सामान्य किए थे। United Arab Emirates और बहरीन इस समझौते को स्वीकार करने वाले पहले देश थे। बाद में मोरक्को और सूडान जैसे देश भी इससे जुड़े। ट्रंप का दावा है कि इससे क्षेत्रीय व्यापार, निवेश और सुरक्षा सहयोग को बढ़ावा मिला है।
Donald Trump ने कहा है कि अगर उनकी सरकार के दौरान Iran के साथ कोई नया समझौता होता है, तो वह पूर्व राष्ट्रपति Barack Obama के दौर की परमाणु डील से पूरी तरह अलग होगा। ट्रंप ने साफ कहा कि उनकी संभावित डील में ईरान को किसी तरह की आर्थिक राहत या नकद सहायता नहीं दी जाएगी। उन्होंने एक बार फिर ओबामा प्रशासन की परमाणु नीति पर निशाना साधते हुए कहा कि पुराना समझौता कमजोर था। “हमारी डील मजबूत होगी” सोशल मीडिया पर जारी बयान में ट्रंप ने कहा, “अगर मैं ईरान के साथ कोई समझौता करता हूं, तो वह मजबूत और सही होगा। यह ओबामा की डील जैसा नहीं होगा, जिसमें ईरान को भारी मात्रा में कैश मिला था और परमाणु हथियार की दिशा में खुला रास्ता दिया गया था।” उन्होंने आगे कहा कि अभी तक प्रस्तावित समझौते की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं है और कई लोग बिना तथ्य जाने आलोचना कर रहे हैं। ट्रंप के मुताबिक, “मैंने हमेशा खराब समझौतों से बचने की कोशिश की है।” क्या थी ओबामा की न्यूक्लियर डील? साल 2015 में ओबामा प्रशासन के दौरान ईरान और विश्व शक्तियों के बीच एक ऐतिहासिक परमाणु समझौता हुआ था, जिसे Joint Comprehensive Plan of Action (JCPOA) कहा जाता है। इस समझौते में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन और जर्मनी शामिल थे। डील के तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर कई प्रतिबंध स्वीकार किए थे। उसने संवर्धित यूरेनियम का भंडार काफी घटाने और बड़ी संख्या में सेंट्रीफ्यूज हटाने पर सहमति दी थी। साथ ही International Atomic Energy Agency (IAEA) को ईरान के परमाणु ठिकानों की निगरानी की अनुमति दी गई थी। इसके बदले पश्चिमी देशों ने ईरान पर लगे कई आर्थिक प्रतिबंधों में राहत दी थी। 2018 में ट्रंप ने तोड़ी थी डील ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में साल 2018 में अमेरिका को JCPOA से बाहर कर लिया था। उनका आरोप था कि यह समझौता ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए पर्याप्त सख्त नहीं था। इसके बाद अमेरिका ने ईरान पर दोबारा कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए। 2025 से बढ़ा तनाव रिपोर्ट्स के अनुसार, जून 2025 में अमेरिका ने Natanz Nuclear Facility, Isfahan Nuclear Technology Center और Fordow Fuel Enrichment Plant पर बड़े हमले किए थे। बताया गया कि इन हमलों में बी-2 बॉम्बर विमानों का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद इजरायल और ईरान के बीच चला 12 दिन का संघर्ष समाप्त हुआ था। बाद में यह दावा सामने आया कि ईरान के पास अब भी लगभग 400 किलोग्राम तक संवर्धित यूरेनियम मौजूद है। 2026 में और बिगड़े हालात रिपोर्ट्स के मुताबिक, फरवरी 2026 में अमेरिका और Israel ने ईरान के खिलाफ संयुक्त सैन्य कार्रवाई की। इसमें ईरान के कई वरिष्ठ नेताओं के मारे जाने का दावा किया गया, जिनमें Ali Khamenei का नाम भी शामिल रहा। इसके बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई में पश्चिम एशिया के कई हिस्सों को निशाना बनाया और Strait of Hormuz की नाकेबंदी कर दी, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हुई। समझौते की ओर बढ़ रहे दोनों देश? तनाव बढ़ने के बाद अप्रैल 2026 में अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष विराम लागू हुआ। इसके बाद से दोनों देशों के बीच लगातार बातचीत जारी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, संभावित समझौते में ईरान अपने यूरेनियम संवर्धन स्तर को कम करने, स्टॉक नष्ट करने या किसी तीसरे देश को सौंपने पर विचार कर सकता है। ईरान के सत्ता प्रतिष्ठान के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने अब भी ऐसी किसी डील पर सहमति से इनकार किया है।
Benjamin Netanyahu ने अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के साथ हुई अहम बातचीत में साफ संकेत दिया है कि Israel अपनी सुरक्षा नीति में किसी तरह की नरमी नहीं बरतेगा। अमेरिका और Iran के बीच संभावित शांति समझौते की चर्चाओं के बीच नेतन्याहू ने कहा कि इजरायल को Lebanon समेत हर मोर्चे पर सैन्य कार्रवाई करने की पूरी स्वतंत्रता चाहिए। लेबनान में कार्रवाई जारी रखने पर जोर रिपोर्ट्स के मुताबिक, नेतन्याहू ने ट्रंप से फोन पर बातचीत के दौरान कहा कि इजरायल अपने खिलाफ किसी भी खतरे पर कार्रवाई करने की आजादी बनाए रखेगा। इसमें लेबनान में चल रहे अभियान भी शामिल हैं, जहां इजरायली सेना ईरान समर्थित Hezbollah के खिलाफ लगातार ऑपरेशन चला रही है। बताया गया कि ट्रंप ने भी इजरायल के इस रुख का समर्थन किया। ईरानी परमाणु कार्यक्रम पर ट्रंप सख्त रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने बातचीत में दोहराया कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने और ईरानी क्षेत्र से समृद्ध यूरेनियम हटाने की मांग पर अमेरिका कायम रहेगा। उन्होंने साफ किया कि इन शर्तों के बिना किसी अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए जाएंगे। बातचीत के बाद ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखा कि नेतन्याहू के साथ उनकी बातचीत “बेहद अच्छी” रही। नेतन्याहू ने किया बातचीत का खुलासा नेतन्याहू ने भी सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए बताया कि उन्होंने ट्रंप के साथ ईरान के परमाणु कार्यक्रम और Strait of Hormuz को दोबारा खोलने से जुड़े समझौते पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि “ऑपरेशन रोअरिंग लायन” और “एपिक फ्यूरी” के दौरान अमेरिकी और इजरायली सेनाओं ने मिलकर ईरानी खतरे के खिलाफ काम किया। साथ ही उन्होंने इजरायल की सुरक्षा के प्रति ट्रंप की प्रतिबद्धता की भी सराहना की। होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने पर बन रहा समझौता इस बीच अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को लेकर बातचीत तेज हो गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) पर काफी हद तक चर्चा पूरी हो चुकी है, जिसका उद्देश्य होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलना है। फरवरी में अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाई के बाद यह समुद्री मार्ग लगभग बंद हो गया था, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हुई। रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि Pakistan की मध्यस्थता से वार्ता आगे बढ़ रही है। ड्राफ्ट समझौते में क्या शर्तें? ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रस्तावित मसौदे में यह शर्त शामिल है कि अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान या उसके समर्थक समूहों पर हमला नहीं करेंगे। बदले में ईरान भी पहले हमला न करने का आश्वासन देगा। इजरायल के भीतर इस संभावित समझौते को लेकर मतभेद दिखाई दे रहे हैं। Benny Gantz ने चेतावनी दी है कि यदि समझौते के हिस्से के रूप में लेबनान में युद्धविराम लागू किया गया, तो यह इजरायल के लिए रणनीतिक गलती साबित हो सकती है।
संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव अब बेहद निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बातचीत और संभावित समझौते की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने चेतावनी दी है कि कूटनीति का रास्ता बहुत जल्द बंद हो सकता है। इसी बीच अमेरिकी नौसेना द्वारा ईरानी झंडे वाले एक तेल टैंकर की जांच किए जाने से हालात और संवेदनशील हो गए हैं। दुनिया की नजर अब इस बात पर टिकी है कि आने वाले दिनों में शांति समझौता होगा या फिर मध्य पूर्व में नया सैन्य टकराव शुरू होगा। ट्रंप बोले- “फैसला बेहद करीब” वॉशिंगटन के पास जॉइंट बेस एंड्रयूज में पत्रकारों से बातचीत करते हुए ट्रंप ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत “अंतिम चरण” में है। उन्होंने कहा, “मामला बिल्कुल आखिरी मोड़ पर है। अगर हमें सही जवाब नहीं मिले तो हालात बहुत तेजी से बदलेंगे। हम पूरी तरह तैयार हैं।” ट्रंप ने यह भी कहा कि समझौता “बहुत जल्दी” या “कुछ दिनों में” हो सकता है, लेकिन इसके लिए तेहरान को “100 प्रतिशत सही जवाब” देना होगा। ईरान ने कहा- अमेरिकी प्रस्ताव की जांच जारी इस्माइल बघाई ने कहा कि ईरान को अमेरिका की ओर से नए प्रस्ताव मिले हैं और तेहरान उनके सभी पहलुओं की समीक्षा कर रहा है। उन्होंने दोहराया कि ईरान चाहता है कि उसके फ्रीज किए गए विदेशी फंड जारी किए जाएं और ईरानी बंदरगाहों पर लगी अमेरिकी नाकेबंदी हटाई जाए। इससे पहले ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने अमेरिका पर युद्ध फिर शुरू करने की तैयारी का आरोप लगाया था। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि हमला हुआ तो ईरान “कड़ा जवाब” देगा। ईरानी जहाज पर चढ़ी अमेरिकी सेना यूएस सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के मुताबिक, बुधवार को ओमान की खाड़ी में अमेरिकी सैनिकों ने हेलीकॉप्टर के जरिए ईरानी झंडे वाले एक तेल टैंकर पर चढ़कर जांच की। अमेरिका को शक था कि जहाज प्रतिबंधों का उल्लंघन कर रहा है। तलाशी के बाद जहाज को छोड़ दिया गया, लेकिन उसका रास्ता बदलने का आदेश दिया गया। CENTCOM ने दावा किया कि नाकेबंदी शुरू होने के बाद अमेरिकी सेना अब तक 91 व्यावसायिक जहाजों का मार्ग बदलवा चुकी है। होर्मुज जलडमरूमध्य बना सबसे बड़ा विवाद होर्मुज जलडमरूमध्य इस पूरे संकट का सबसे संवेदनशील केंद्र बना हुआ है। दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल और बड़ी मात्रा में तरलीकृत प्राकृतिक गैस इसी समुद्री रास्ते से गुजरती है। ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने दावा किया कि उसने पिछले 24 घंटों में 26 जहाजों को सुरक्षा देते हुए होर्मुज से गुजरने दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह मार्ग लंबे समय तक प्रभावित रहा तो दुनिया भर में तेल, गैस, खाद और खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हो सकती है। अमेरिका पर भी बढ़ रहा आर्थिक दबाव अमेरिका में बढ़ती तेल और गैस कीमतों की वजह से ट्रंप प्रशासन पर घरेलू राजनीतिक दबाव भी बढ़ रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि यही कारण है कि वॉशिंगटन एक तरफ सैन्य दबाव बनाए रखना चाहता है, लेकिन दूसरी तरफ समझौते की संभावना भी खुली रखना चाहता है। फिलहाल दुनिया की नजर आने वाले कुछ दिनों पर टिकी है, क्योंकि यही तय करेगा कि मध्य पूर्व में शांति कायम होगी या नया संघर्ष शुरू होगा।
डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू के बीच ईरान को लेकर रणनीति पर मतभेद सामने आने की खबर है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों नेताओं के बीच फोन पर हुई बातचीत काफी तनावपूर्ण रही और ईरान पर आगे की कार्रवाई को लेकर दोनों की राय अलग-अलग नजर आई। रिपोर्ट के अनुसार, जहां इजराइल ईरान के खिलाफ दोबारा सैन्य अभियान शुरू करने के पक्ष में है, वहीं अमेरिका फिलहाल बातचीत और संभावित समझौते के रास्ते पर जोर देता दिखाई दे रहा है। ‘एक्सियोस’ की रिपोर्ट में बड़ा दावा अमेरिकी मीडिया संस्थान Axios की रिपोर्ट के मुताबिक, मंगलवार को ट्रंप से बातचीत के बाद नेतन्याहू “बेहद नाराज” थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि इजराइली नेतृत्व ईरान की सैन्य क्षमता को और कमजोर करने तथा उसके अहम बुनियादी ढांचे को निशाना बनाकर दबाव बढ़ाने के पक्ष में है। बताया गया कि नेतन्याहू का मानना है कि मौजूदा हालात में सैन्य दबाव कम करना इजराइल की रणनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकता है। ट्रंप ने टाली हमले की योजना ट्रंप ने हाल ही में कहा था कि ईरान पर प्रस्तावित हमले की योजना को फिलहाल टाल दिया गया है। उन्होंने बताया कि कतर और संयुक्त अरब अमीरात समेत कई अरब देशों के अनुरोध के बाद यह फैसला लिया गया। अमेरिकी राष्ट्रपति ने संकेत दिए कि वह अब भी कूटनीतिक समाधान की संभावना देख रहे हैं। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि यदि बातचीत असफल रहती है तो अमेरिका सैन्य विकल्प अपनाने के लिए तैयार रहेगा। नया शांति प्रस्ताव तैयार रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान और कतर सहित कुछ क्षेत्रीय मध्यस्थों ने अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के उद्देश्य से नया शांति प्रस्ताव तैयार किया है। सूत्रों के अनुसार, इस प्रस्ताव का मकसद दोनों देशों के बीच संवाद बहाल करना और संभावित सैन्य टकराव को टालना है। हालांकि नेतन्याहू इस प्रक्रिया को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं बताए जा रहे हैं। “समझौते और युद्ध के बीच खड़ी है दुनिया” ट्रंप ने बुधवार को कनेक्टिकट स्थित कोस्ट गार्ड अकादमी में संबोधन के दौरान कहा कि अमेरिका और ईरान फिलहाल “समझौते और युद्ध के बीच की सीमा” पर खड़े हैं। उन्होंने पत्रकारों से कहा, “स्थिति बेहद निर्णायक मोड़ पर है। अगर हमें संतोषजनक जवाब नहीं मिले तो हालात तेजी से बदल सकते हैं। हम हर स्थिति के लिए तैयार हैं।” क्षेत्रीय तनाव पर बढ़ी वैश्विक नजर ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच बढ़ते तनाव पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कूटनीतिक प्रयास सफल नहीं होते तो मध्य पूर्व में बड़े सैन्य संघर्ष की आशंका बढ़ सकती है। वहीं अरब देशों की कोशिश है कि बातचीत के जरिए स्थिति को नियंत्रित रखा जाए।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।