ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकेर गालिबफ ने अमेरिका पर आर्थिक दबाव और मीडिया प्रचार के जरिए देश को कमजोर करने की कोशिश करने का आरोप लगाया है. उन्होंने कहा कि ईरान अपने अधिकारों और राष्ट्रीय हितों से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेगा. गालिबफ ने दावा किया कि तेहरान को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करने की अमेरिकी रणनीति कभी सफल नहीं होगी. आर्थिक दबाव और प्रचार के जरिए फूट डालने का आरोप रविवार को संसद के नए सत्र को संबोधित करते हुए गालिबफ ने कहा कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश सैन्य मोर्चे पर मिली असफलताओं की भरपाई आर्थिक प्रतिबंधों और मीडिया अभियान के जरिए करना चाहते हैं. उनका उद्देश्य ईरान की राष्ट्रीय एकता को कमजोर करना और देश के भीतर विभाजन पैदा करना है. उन्होंने कहा कि युद्ध के नए दौर में विरोधी ताकतें आर्थिक दबाव और प्रचार तंत्र के सहारे ईरान को झुकाने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन यह उनका भ्रम है और यह रणनीति सफल नहीं होगी. 'ईरान और इस्लाम को कमजोर करने की कोशिश' गालिबफ ने कहा कि देश एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील दौर से गुजर रहा है. उन्होंने दावा किया कि ईरानी जनता उन ताकतों का मजबूती से सामना कर रही है, जो ईरान और इस्लाम को कमजोर करने का प्रयास कर रही हैं. उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियां इस दौर को देश की संप्रभुता और अधिकारों की रक्षा के संघर्ष के रूप में याद रखेंगी. उनके अनुसार, यह समय राष्ट्रीय एकता और दृढ़ संकल्प का प्रतीक बनकर इतिहास में दर्ज होगा. संघर्ष के चार मोर्चों का किया जिक्र ईरानी संसद अध्यक्ष ने मौजूदा हालात को व्यापक संघर्ष बताते हुए चार प्रमुख मोर्चों का उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि सैन्य, कूटनीतिक, जनसहभागिता और जनसेवा के क्षेत्र में समन्वित प्रयासों से ही देश अपने लक्ष्यों को हासिल कर सकता है. गालिबफ ने दावा किया कि मिसाइल कार्यक्रम समेत ईरान की सैन्य उपलब्धियां जनता के समर्थन और सहयोग का परिणाम हैं. उन्होंने कहा कि अब इन उपलब्धियों को राजनीतिक और कूटनीतिक सफलता में बदलने की जिम्मेदारी नीति निर्माताओं की है. समझौते पर रखा स्पष्ट रुख विदेशी शक्तियों के साथ संभावित समझौतों पर गालिबफ ने कहा कि ईरान केवल उन्हीं प्रस्तावों को स्वीकार करेगा, जिनसे देश के अधिकार और जनता के हित सुरक्षित रहें. उन्होंने कहा कि केवल आश्वासनों या बयानों के आधार पर कोई फैसला नहीं लिया जाएगा. ईरान ठोस और व्यावहारिक परिणामों को प्राथमिकता देता है और ऐसा कोई समझौता स्वीकार नहीं करेगा, जिससे राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचे. संसद के नए सत्र में दिया संबोधन गालिबफ ने ये टिप्पणियां ईरान की 12वीं संसद के तीसरे वर्ष के पहले सत्र के दौरान कीं. यह बैठक वर्चुअल माध्यम से आयोजित की गई, जिसमें बड़ी संख्या में सांसदों ने भाग लिया. उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब ईरान और अमेरिका के बीच तनाव लगातार बना हुआ है और क्षेत्रीय सुरक्षा, प्रतिबंधों तथा रणनीतिक मुद्दों को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद कायम हैं.
ईरान की संसद ने एक बार फिर Mohammad Bagher Ghalibaf पर भरोसा जताया है। गलीबाफ को लगातार सातवीं बार संसद का स्पीकर चुना गया है। सरकारी मीडिया के मुताबिक उन्हें 271 में से 235 वोट मिले। अमेरिका से बातचीत के बीच बढ़ी गलीबाफ की अहमियत गलीबाफ की दोबारा ताजपोशी ऐसे समय हुई है, जब Iran और United States के बीच युद्ध समाप्ति और परमाणु मुद्दों पर बातचीत जारी है। माना जा रहा है कि अमेरिका के साथ चल रही वार्ता में गलीबाफ की भूमिका काफी अहम रहने वाली है। ईरान के सत्ता ढांचे में उन्हें मजबूत रणनीतिक चेहरों में गिना जाता है और विदेश नीति से जुड़े मुद्दों पर उनका प्रभाव लगातार बढ़ा है। सुरक्षा और राजनीति दोनों में मजबूत पकड़ 64 वर्षीय गलीबाफ पहले ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड में कमांडर रह चुके हैं। इसके अलावा वह पायलट और तेहरान के मेयर की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। उन्हें पूर्व संसद स्पीकर Ali Larijani की तरह प्रभावशाली और व्यवहारिक नेता माना जाता है। कट्टरपंथी माने जाने के बावजूद गलीबाफ कई बार पश्चिमी देशों के साथ बातचीत की जरूरत पर जोर दे चुके हैं। ईरान की राजनीति में क्यों अहम हैं गलीबाफ? विशेषज्ञों के मुताबिक गलीबाफ की दोबारा नियुक्ति इस बात का संकेत है कि ईरान फिलहाल बातचीत और रणनीतिक संतुलन दोनों पर साथ-साथ आगे बढ़ना चाहता है। ऐसे समय में जब परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंध और क्षेत्रीय तनाव जैसे मुद्दे चर्चा में हैं, गलीबाफ की भूमिका और महत्वपूर्ण हो सकती है।
Donald Trump ने ईरान को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि अगर परमाणु समझौता करना है तो Iran को अपने संवर्धित यूरेनियम का भंडार या तो अमेरिका को सौंपना होगा या अंतरराष्ट्रीय निगरानी में नष्ट करना होगा। ट्रंप ने साफ कहा कि अमेरिका “आधा-अधूरा समझौता” नहीं करेगा। ट्रंप ने क्या कहा? ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि ईरान के “एनरिच्ड यूरेनियम” को तुरंत अमेरिका को सौंपा जा सकता है, जहां उसे नष्ट किया जाएगा। दूसरा विकल्प यह है कि ईरान की सहमति से किसी तय स्थान पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी में उसे खत्म किया जाए। उन्होंने यूरेनियम को “न्यूक्लियर डस्ट” बताते हुए कहा कि पूरी प्रक्रिया की निगरानी परमाणु एजेंसियां करेंगी। परमाणु मुद्दे पर बढ़ी बातचीत अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से परमाणु कार्यक्रम को लेकर तनाव बना हुआ है। माना जा रहा है कि यह मुद्दा दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा विवाद रहा है। अब रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि ईरान सिद्धांत रूप में अपने उच्च स्तर पर संवर्धित यूरेनियम के भंडार को छोड़ने पर सहमत हो सकता है। इसे संभावित परमाणु समझौते की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। कतर में हुई अहम बैठक रिपोर्ट्स के मुताबिक, Qatar में ईरानी प्रतिनिधिमंडल और मध्यस्थों के बीच बातचीत हुई। ईरान की तरफ से वरिष्ठ नेता Mohammad Bagher Ghalibaf और विदेश मंत्री Abbas Araghchi मौजूद रहे। बताया जा रहा है कि कतर दोनों देशों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। बातचीत में ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों को खोलने का मुद्दा भी शामिल है। ट्रंप बोले- या शानदार समझौता होगा, या कुछ नहीं ट्रंप ने कहा कि अमेरिका केवल ऐसा समझौता स्वीकार करेगा जो “बेहद अहम और सार्थक” हो। उन्होंने लिखा, “ईरान के साथ डील या तो शानदार होगी, या फिर कोई डील नहीं होगी।” ईरान ने क्या कहा? ईरान ने संकेत दिए हैं कि कई मुद्दों पर बातचीत आगे बढ़ी है, लेकिन उसने अमेरिकी अधिकारियों के बदलते बयानों पर चिंता भी जताई है। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Esmail Baghaei ने कहा कि कई मामलों में प्रगति हुई है, लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि समझौता तुरंत हो जाएगा। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका के बदलते रुख से बातचीत जटिल हो रही है।
Iran और United States के बीच तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा ईरान के ताजा शांति प्रस्ताव को खारिज किए जाने के बाद तेहरान ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। ईरान ने साफ चेतावनी दी है कि अगर उस पर हमला हुआ, तो उसके सशस्त्र बल “हमलावर को सबक सिखाने” के लिए पूरी तरह तैयार हैं। ट्रंप ने क्या कहा? वॉशिंगटन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने ईरान के प्रस्ताव को “अस्वीकार्य” बताते हुए खारिज कर दिया। उन्होंने कहा: “यह युद्धविराम गंभीर लाइफ सपोर्ट पर है।” ट्रंप ने हालात की तुलना ऐसे मरीज से की जिसकी “जीवित रहने की संभावना सिर्फ एक प्रतिशत” बची हो। अमेरिकी राष्ट्रपति के इस बयान के बाद मिडिल ईस्ट में तनाव और बढ़ गया है। ईरान ने दी जवाबी चेतावनी ट्रंप की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए ईरानी संसद के स्पीकर Mohammad Bagher Ghalibaf ने कहा कि ईरान किसी भी संघर्ष के लिए तैयार है। उन्होंने X पर लिखा: “हमारे सशस्त्र बल किसी भी हमले का जवाब देने और हमलावर को सबक सिखाने के लिए तैयार हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि “खराब रणनीति और गलत फैसलों का परिणाम हमेशा बुरा ही होता है।” ईरान के प्रस्ताव में क्या था? ईरानी विदेश मंत्रालय के मुताबिक, तेहरान ने जो प्रस्ताव दिया था उसमें: ईरानी बंदरगाहों की अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी खत्म करने पूरे क्षेत्र में सैन्य अभियान रोकने लेबनान में Hezbollah को निशाना बनाने वाले हमलों पर रोक विदेशों में फ्रीज ईरानी संपत्तियों को जारी करने जैसी मांगें शामिल थीं। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Esmail Baghaei ने कहा: “हमने किसी तरह की रियायत नहीं मांगी, सिर्फ ईरान के वैध अधिकारों की मांग की है।” होर्मुज स्ट्रेट पर बढ़ा दबाव तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर भी दिखाई देने लगा है। Strait of Hormuz में पहले से चल रही रुकावटों के कारण तेल बाजार दबाव में हैं। अगर स्थिति और बिगड़ती है, तो: कच्चे तेल की कीमतों में बड़ा उछाल वैश्विक सप्लाई चेन पर असर पेट्रोल-डीजल महंगा होना खाद्य और परिवहन लागत बढ़ना जैसे असर देखने को मिल सकते हैं। क्यों बढ़ रहा है तनाव? विशेषज्ञों के मुताबिक दोनों देशों के बीच मुख्य विवाद: ईरान के परमाणु कार्यक्रम अमेरिकी प्रतिबंध मिडिल ईस्ट में सैन्य मौजूदगी इजरायल और हिजबुल्ला को लेकर टकराव को लेकर है। हालिया बयानबाजी से साफ है कि फिलहाल दोनों पक्ष पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रहे हैं। ऐसे में मिडिल ईस्ट में अस्थिरता और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
मध्य-पूर्व में जारी तनाव के बीच ईरान के भीतर ही सत्ता के शीर्ष स्तर पर मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। अमेरिका के साथ संभावित वार्ता को लेकर ईरानी नेतृत्व दो धड़ों में बंटा दिख रहा है–एक पक्ष बातचीत के जरिए समाधान चाहता है, जबकि दूसरा टकराव के रास्ते पर अडिग है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम भूमिका Ahmad Vahidi की मानी जा रही है, जिन पर यह तय करने की जिम्मेदारी आ टिकी है कि ईरान शांति की राह चुनेगा या संघर्ष को आगे बढ़ाएगा। IRGC बनाम सिविल नेतृत्व: बढ़ती खींचतान रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरानी संसद के स्पीकर Mohammad Bagher Ghalibaf और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) के प्रमुख अहमद वाहिदी के बीच गंभीर मतभेद उभर आए हैं। जहां गालिबाफ जैसे नागरिक नेता अमेरिका के साथ वार्ता के जरिए तनाव कम करने के पक्ष में हैं, वहीं IRGC के कई वरिष्ठ अधिकारी बातचीत का विरोध कर रहे हैं। मौजूदा संकेतों से यह भी लग रहा है कि इस समय सत्ता संतुलन में वाहिदी का प्रभाव ज्यादा मजबूत है। कौन हैं अहमद वाहिदी? अहमद वाहिदी को ईरान के सबसे प्रभावशाली और कठोर रुख वाले नेताओं में गिना जाता है। मार्च 2026 में उन्हें IRGC का कमांडर-इन-चीफ बनाया गया। इससे पहले वे गृह मंत्री और रक्षा मंत्री जैसे अहम पदों पर भी रह चुके हैं। उनका नाम 1994 के अर्जेंटीना AMIA बम धमाके में भी सामने आया था, जिसके चलते इंटरपोल ने उन्हें वांटेड घोषित किया था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन पर कई प्रतिबंध भी लगाए गए हैं। विश्लेषकों का मानना है कि वाहिदी का रुख हमेशा से आक्रामक रहा है और वे “अमेरिका विरोधी” रणनीति के मजबूत समर्थक हैं। ईरान के प्रॉक्सी संगठनों पर भी उनकी गहरी पकड़ मानी जाती है। वार्ता पर सस्पेंस, इस्लामाबाद बैठक अनिश्चित अमेरिका के साथ दूसरे दौर की वार्ता के लिए ईरानी प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद जाएगा या नहीं, इस पर अभी भी संशय बना हुआ है। जहां अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल रवाना हो चुका है, वहीं ईरान की ओर से स्पष्ट संकेत नहीं मिले हैं। सूत्रों के मुताबिक, यदि ईरान बातचीत के लिए सहमत भी होता है, तो उसकी शर्तें पहले जैसी ही सख्त रह सकती हैं। समुद्री तनाव और बढ़ती सख्ती इस बीच अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों के आसपास अपनी नौसैनिक गतिविधियां और नाकेबंदी जारी रखी है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अब तक कई जहाजों को अपना मार्ग बदलने के निर्देश दिए गए हैं और एक ईरानी जहाज को जब्त भी किया गया है। वहीं ईरानी संसद होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण को लेकर एक नया विधेयक तैयार कर रही है। इसके तहत ‘शत्रु देशों’ के जहाजों पर सख्त प्रतिबंध और टोल वसूली जैसे प्रावधान शामिल किए जा सकते हैं। यह कदम वैश्विक व्यापार और तेल आपूर्ति पर भी असर डाल सकता है। आगे क्या? मौजूदा हालात में यह स्पष्ट है कि ईरान के भीतर सत्ता संघर्ष ही यह तय करेगा कि देश अमेरिका के साथ टकराव बढ़ाएगा या कूटनीतिक रास्ता अपनाएगा।
Iran US Tension: ईरान और अमेरिका के बीच संभावित बातचीत की अटकलों के बीच तेहरान ने सख्त रुख अपनाया है। ईरान ने साफ कर दिया है कि वह अमेरिकी दबाव और धमकियों के बीच किसी भी वार्ता को स्वीकार नहीं करेगा। ईरान का तीखा बयान ईरानी संसद (मजलिस) के स्पीकर Mohammad Bagher Ghalibaf ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अमेरिका पर तीखा हमला बोला। उन्होंने लिखा: “ट्रंप घेराबंदी और युद्धविराम तोड़कर बातचीत की मेज़ को आत्मसमर्पण की मेज़ बनाना चाहते हैं या फिर युद्ध को सही ठहराना चाहते हैं।” ग़ालिबाफ़ ने साफ कहा कि ईरान “धमकियों के साये में बातचीत” नहीं करेगा। ‘मैदान-ए-जंग में नए पत्ते खोलने की तैयारी’ ग़ालिबाफ़ ने अपने बयान में संकेत दिया कि ईरान सैन्य विकल्पों के लिए भी तैयार है। उन्होंने कहा: “पिछले दो हफ्तों से हमने मैदान-ए-जंग में नए पत्ते खोलने की तैयारी कर ली है।” यह बयान ऐसे समय आया है जब क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ रहा है। ट्रंप की रणनीति पर सवाल अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump लगातार ईरान पर दबाव बना रहे हैं और समझौते की बात कर रहे हैं। लेकिन ईरान का आरोप है कि: अमेरिका एक तरफ बातचीत की बात करता है दूसरी तरफ सैन्य दबाव और नाकेबंदी जारी रखता है पाकिस्तान में वार्ता पर अनिश्चितता Islamabad में दूसरे दौर की बातचीत की तैयारियां चल रही हैं। अमेरिका ने अपना प्रतिनिधिमंडल भेजने की बात कही है। हालांकि, ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Esmail Baghaei ने कहा: अभी तक वार्ता को लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है ईरान फिलहाल स्थिति का आकलन कर रहा है पहले दौर की बातचीत का संदर्भ ईरान और अमेरिका के बीच पहले दौर की बातचीत पहले ही हो चुकी है, जिसमें Mohammad Bagher Ghalibaf ने ईरान का नेतृत्व किया था। हालांकि, वह वार्ता किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी।
अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति वार्ता से ठीक पहले एक भावनात्मक और तनावपूर्ण दृश्य सामने आया, जिसने पूरे कूटनीतिक माहौल को और अधिक संवेदनशील बना दिया। ईरान के संसद अध्यक्ष Mohammad Bagher Ghalibaf जब इस्लामाबाद पहुंचे, तो वे केवल वार्ता के एजेंडे के साथ नहीं, बल्कि मीनाब हमले में मारे गए मासूम बच्चों की यादों को भी अपने साथ लेकर आए। मीनाब हमले का दर्द फिर आया सामने फरवरी में ईरान के मीनाब शहर के एक गर्ल्स स्कूल पर हुए भीषण हमले में 165 से अधिक बच्चियों की मौत हो गई थी। इस हमले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। अब, जब शांति वार्ता की कोशिशें तेज हुई हैं, ईरान ने इस दर्दनाक घटना को फिर से दुनिया के सामने रखा है। इस्लामाबाद की यात्रा के दौरान गालिबाफ अपने साथ उन बच्चों की तस्वीरें, खून से सने स्कूल बैग और जूते लेकर पहुंचे। विमान में इन सामानों को सीटों पर रखकर वे उन्हें लगातार निहारते रहे। यह दृश्य न केवल व्यक्तिगत शोक का प्रतीक था, बल्कि एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश भी था कि ईरान इस त्रासदी को भूला नहीं है। वार्ता से पहले भावनात्मक संदेश या रणनीतिक संकेत? विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम केवल संवेदनाओं का प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संकेत भी हो सकता है। ईरान यह दिखाना चाहता है कि शांति वार्ता सिर्फ राजनीतिक समझौता नहीं, बल्कि उन जख्मों को भी संबोधित करने की प्रक्रिया है, जो युद्ध ने छोड़े हैं। ईरान ने इस हमले के लिए अमेरिका और इजरायल को जिम्मेदार ठहराया है, जबकि अमेरिका की ओर से इस दावे को खारिज करते हुए कहा गया कि निशाना सैन्य ठिकाने थे, न कि स्कूल। क्या आसान होगी शांति की राह? इस बीच, Donald Trump प्रशासन की ओर से लगातार दबाव बनाया जा रहा है कि ईरान जल्द से जल्द समझौते की दिशा में आगे बढ़े। लेकिन गालिबाफ की यह पहल साफ संकेत देती है कि तेहरान बिना ठोस आश्वासन और न्याय के किसी भी समझौते के लिए तैयार नहीं होगा। क्षेत्रीय तनाव और वैश्विक असर ईरान-अमेरिका के बीच जारी यह टकराव केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं रह गया है। इसका असर वैश्विक राजनीति, ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक स्थिरता पर भी पड़ रहा है। ऐसे में इस्लामाबाद में हो रही वार्ता बेहद अहम मानी जा रही है। हालांकि, मीनाब हमले की यादें और उससे जुड़ा दर्द यह साफ कर रहा है कि शांति की राह आसान नहीं होगी। यह वार्ता केवल कूटनीति नहीं, बल्कि भावनाओं, विश्वास और न्याय के बीच संतुलन की परीक्षा भी है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।