तेहरान: ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की तैयारियां तेज हो गई हैं। राजधानी तेहरान में जगह-जगह बैनर लगाकर लोगों से अंतिम यात्रा में शामिल होने की अपील की जा रही है। ईरानी सरकार का अनुमान है कि शनिवार से शुरू होने वाले अंतिम संस्कार कार्यक्रम में लाखों लोग शामिल होंगे। सरकारी अधिकारियों का मानना है कि यह जनसैलाब वर्ष 1989 में अयातुल्ला रूहुल्ला खुमैनी के अंतिम संस्कार की याद ताजा कर सकता है। ग्रैंड मोसल्ला में रखे गए ताबूत तेहरान के ग्रैंड मोसल्ला परिसर में अयातुल्ला अली खामेनेई का ताबूत ईरानी राष्ट्रीय ध्वज में लपेटकर रखा गया है। उनके साथ उन परिजनों के ताबूत भी रखे गए हैं, जिनकी हालिया संघर्ष के दौरान इजरायली हवाई हमलों में मौत हुई थी। इनमें उनके दामाद, सबसे बड़ी बेटी, 14 महीने की नातिन और नए सर्वोच्च नेता घोषित किए गए अयातुल्ला मुजतबा खामेनेई की पत्नी भी शामिल हैं। श्रद्धांजलि देने पहुंचे धार्मिक और विदेशी प्रतिनिधि देश-विदेश से पहुंचे धार्मिक नेताओं, सरकारी प्रतिनिधियों और विदेशी मेहमानों ने ताबूत के पास जाकर श्रद्धांजलि अर्पित की। सैन्य बैंड ने शोक धुन बजाई, जबकि कई श्रद्धालुओं ने परंपरा के अनुसार अपने स्कार्फ और अन्य वस्तुओं को ताबूत से स्पर्श कराकर श्रद्धा व्यक्त की। 'या हुसैन' वाला लाल झंडा बना आकर्षण खामेनेई के ताबूत पर लाल रंग का झंडा भी रखा गया है, जिस पर सफेद अक्षरों में "या हुसैन" लिखा हुआ है। शिया परंपरा में यह झंडा अन्याय के खिलाफ संघर्ष और बलिदान का प्रतीक माना जाता है। सरकार के लिए शक्ति प्रदर्शन का अवसर विश्लेषकों के अनुसार, यह अंतिम संस्कार केवल श्रद्धांजलि कार्यक्रम नहीं बल्कि हालिया संघर्ष के बाद सरकार के लिए जनसमर्थन दिखाने का बड़ा अवसर भी है। ईरान इस समय अमेरिका के साथ युद्धविराम और शांति वार्ता के दौर से गुजर रहा है। वहीं, इजरायल के साथ तनाव भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। ऐसे में यह आयोजन राजनीतिक और रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सैन्य नेतृत्व भी रहा मौजूद कार्यक्रम में ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड के प्रमुख जनरल अहमद वाहिदी समेत कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारी, सरकारी प्रतिनिधि, धार्मिक नेता और विभिन्न देशों के मेहमान शामिल हुए। मुजतबा खामेनेई की मौजूदगी पर सस्पेंस ईरान के नए सर्वोच्च नेता घोषित किए गए अयातुल्ला मुजतबा खामेनेई अब तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए हैं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, हालिया संघर्ष के दौरान उनके घायल होने की चर्चा है। हालांकि अब तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि वे अपने पिता के अंतिम संस्कार में सार्वजनिक रूप से शामिल होंगे या नहीं। ईरान की कड़ी चेतावनी मुजतबा खामेनेई को लेकर इजरायल की ओर से सामने आई कथित धमकियों के बाद ईरान की संयुक्त सैन्य कमान ने चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि यदि अमेरिका, इजरायल या उनके सहयोगियों ने ईरान के खिलाफ कोई सैन्य कार्रवाई की, तो उसका "कड़ा और निर्णायक जवाब" दिया जाएगा। 9 जुलाई को होगा अंतिम संस्कार ईरानी सरकार के अनुसार, अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की औपचारिक शुरुआत शनिवार से होगी। उनकी पार्थिव देह को श्रद्धांजलि के लिए ईरान और पड़ोसी इराक के विभिन्न शहरों में ले जाया जाएगा। इसके बाद 9 जुलाई 2026 को पूरे राजकीय सम्मान के साथ उन्हें उनकी 14 महीने की नातिन समेत अन्य दिवंगत परिजनों के साथ सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा।
तेहरान: ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन के बाद उनके अंतिम संस्कार को लेकर तैयारियां जारी हैं। इस बीच उनके बेटे मोजतबा खामेनेई के अंतिम संस्कार में शामिल होने को लेकर बड़ा बयान सामने आया है। ईरान के सुप्रीम लीडर के भारत स्थित प्रतिनिधि आयतुल्ला हकीम इलाही ने कहा है कि सुरक्षा कारणों से मोजतबा खामेनेई के सार्वजनिक रूप से अंतिम संस्कार में शामिल होने की संभावना बेहद कम है। सुरक्षा एजेंसियों ने सार्वजनिक उपस्थिति पर जताई चिंता इंडिया टुडे से बातचीत में आयतुल्ला हकीम इलाही ने बताया कि मौजूदा हालात में मोजतबा खामेनेई की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती है। इसी वजह से उन्हें सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूर रहने की सलाह दी गई है। उन्होंने कहा कि मोजतबा लोगों के बीच जाकर उनसे मिलना चाहते हैं, लेकिन सुरक्षा एजेंसियां इसकी अनुमति नहीं दे रही हैं। अधिकारियों का मानना है कि इस समय उनकी सार्वजनिक मौजूदगी सुरक्षा जोखिम पैदा कर सकती है। तेहरान रवाना होने से पहले दिया बयान नई दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से तेहरान रवाना होने से पहले इलाही ने कहा कि पिछले सप्ताह उनकी ईरान यात्रा के दौरान उन लोगों से मुलाकात हुई थी, जो मोजतबा खामेनेई के संपर्क में थे। उन्हीं से मिली जानकारी के आधार पर उन्होंने यह बात साझा की। ईरान में कई दिनों तक चलेगा राजकीय शोक आयतुल्ला हकीम इलाही के अनुसार, अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन के बाद ईरान में कई दिनों तक राजकीय शोक और अंतिम संस्कार से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इन आयोजनों का उद्देश्य इस्लामिक गणराज्य के प्रति जनता की एकजुटता और समर्थन को प्रदर्शित करना है। देशभर में शोक का माहौल उन्होंने कहा कि खामेनेई के निधन से पूरे ईरान में गहरा शोक है। बड़ी संख्या में लोग उन्हें देश का मजबूत नेतृत्वकर्ता और प्रेरणा का स्रोत मानते थे। उनके समर्थकों का मानना है कि उनकी कमी की भरपाई करना आसान नहीं होगा। इलाही ने कहा कि ईरान के विभिन्न प्रांतों के अलावा कई अन्य देशों से भी लोग तेहरान पहुंच रहे हैं, ताकि दिवंगत नेता को अंतिम श्रद्धांजलि अर्पित कर सकें। अंतिम संस्कार में अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों के पहुंचने की उम्मीद सूत्रों के अनुसार, अंतिम संस्कार में कई देशों के प्रतिनिधियों और धार्मिक नेताओं के शामिल होने की संभावना है। वहीं, सुरक्षा एजेंसियां पूरे कार्यक्रम के दौरान व्यापक सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने में जुटी हुई हैं। फिलहाल मोजतबा खामेनेई की सार्वजनिक मौजूदगी को लेकर अंतिम निर्णय सुरक्षा एजेंसियों की सलाह के आधार पर लिया जाएगा।
तेहरान/वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर होने के एक दिन बाद ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने पहली बार अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने दावा किया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस समझौते को लेकर “बेहद बेताब” थे और इसे अंतिम रूप देने के लिए उन्होंने हर संभव दबाव और प्रभाव का इस्तेमाल किया। खामेनेई ने कहा कि उन्होंने शुरुआत में सिद्धांत के तौर पर इस समझौते का विरोध किया था, लेकिन बाद में राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा देशहित और क्षेत्रीय हितों की सुरक्षा का भरोसा दिए जाने के बाद ही इस समझौते को मंजूरी दी। ‘देश के हितों और रेजिस्टेंस फ्रंट की रक्षा का मिला भरोसा’ अपने लिखित बयान में मोजतबा खामेनेई ने कहा कि ईरानी अधिकारियों ने उन्हें आश्वस्त किया था कि समझौते में देश के रणनीतिक हितों, राष्ट्रीय सुरक्षा और तथाकथित ‘रेजिस्टेंस फ्रंट’ के अधिकारों की पूरी तरह रक्षा की जाएगी। उन्होंने कहा, “ईरानी अधिकारियों ने नेक इरादे और देश की चिंता को ध्यान में रखते हुए इस समझौते के लिए कड़ी मेहनत की। मुझे भरोसा दिलाया गया कि ईरान के हितों से कोई समझौता नहीं होगा।” 18 जून को हुआ था समझौते पर हस्ताक्षर 18 जून को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने कई महीनों से जारी तनाव को समाप्त करने और बातचीत की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के उद्देश्य से समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर किए थे। इससे पहले अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी वार्ताकार मोहम्मद बाकेर कालीबाफ ने समझौते के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए, जिसके बाद दोनों देशों के राष्ट्रपतियों ने वर्चुअल माध्यम से इसे अंतिम मंजूरी प्रदान की। ‘ईरान अपने राष्ट्रीय हितों से कोई समझौता नहीं करेगा’ खामेनेई ने कहा कि राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने उन्हें स्पष्ट रूप से आश्वस्त किया था कि यदि भविष्य में अमेरिका की ओर से कोई ऐसी मांग रखी जाती है जो ईरान के राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध या अत्यधिक हो, तो तेहरान उसे स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने कहा, “ईरान अपने राष्ट्रीय हितों, संप्रभुता और रणनीतिक प्राथमिकताओं से कोई समझौता नहीं करेगा।” बातचीत का मतलब अमेरिकी नीतियों से सहमति नहीं समझौते का समर्थन करते हुए भी खामेनेई ने स्पष्ट किया कि भविष्य में अमेरिका के साथ होने वाली प्रत्यक्ष बातचीत को अमेरिकी नीतियों या दृष्टिकोण की स्वीकृति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बातचीत का उद्देश्य केवल अपने हितों की रक्षा करना और विवादों का समाधान तलाशना है, न कि किसी दबाव के सामने झुकना। समझौते पर ईरान के भीतर भी हुई व्यापक चर्चा खामेनेई के बयान से यह संकेत मिला है कि अमेरिका-ईरान समझौते को लेकर ईरान के शीर्ष नेतृत्व के भीतर व्यापक विचार-विमर्श हुआ था। सर्वोच्च नेता ने स्वयं स्वीकार किया कि उन्होंने प्रारंभ में इस समझौते का विरोध किया था, लेकिन राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के आश्वासन के बाद ही इसे मंजूरी दी। विश्लेषकों का मानना है कि खामेनेई का बयान एक ओर घरेलू राजनीतिक वर्ग को संदेश देने की कोशिश है, वहीं दूसरी ओर यह संकेत भी है कि ईरान भविष्य में अमेरिका के साथ बातचीत जारी रखेगा, लेकिन अपने रणनीतिक हितों पर किसी प्रकार का समझौता नहीं करेगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान के साथ जारी तनाव और वार्ता को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे टकराव का अंत चाहे कूटनीतिक समझौते से हो या सैन्य ताकत के जरिए, नतीजा अमेरिका के पक्ष में ही रहेगा। व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि वॉशिंगटन और तेहरान के बीच जारी बातचीत का उद्देश्य कई महीनों से चल रहे संकट को समाप्त करना है। खामेनेई से मुलाकात के संकेत ट्रंप ने ईरान के सर्वोच्च नेता Mojtaba Khamenei से संभावित मुलाकात को लेकर भी सकारात्मक संकेत दिए। उन्होंने कहा, "अगर समझौता होता है और मुलाकात का अवसर मिलता है तो मुझे उनसे मिलकर खुशी होगी। मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं है।" ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी मुलाकात किसी संभावित समझौते की स्थिति में ही संभव हो सकती है। एनरिच्ड यूरेनियम पर अमेरिका की नजर अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान के संवर्धित यूरेनियम भंडार का उल्लेख करते हुए दावा किया कि अमेरिका उस पर लगातार नजर रखे हुए है। उन्होंने कहा कि यदि अमेरिका चाहे तो उस सामग्री पर नियंत्रण हासिल कर सकता है, लेकिन फिलहाल ऐसी किसी कार्रवाई की आवश्यकता नहीं है। ट्रंप के अनुसार यूरेनियम सुरक्षित स्थान पर है और उसकी गतिविधियों पर निगरानी रखी जा रही है। समझौते के लिए अमेरिका की दो प्रमुख शर्तें ट्रंप ने संभावित समझौते की दो मुख्य शर्तें भी सामने रखीं। ईरान कभी भी परमाणु हथियार हासिल न कर सके। Strait of Hormuz को पूरी तरह से खोला जाए। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख समुद्री मार्ग माना जाता है और दुनिया के तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। तेहरान का जवाब- मसौदे में कई बातें अब भी अस्पष्ट ईरान की ओर से बातचीत को लेकर सतर्क रुख अपनाया गया है। खामेनेई के सलाहकार Mohsen Rezaee ने कहा कि प्रस्तावित समझौते में कई महत्वपूर्ण बिंदु अब भी स्पष्ट नहीं हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका अपनी शर्तों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, जबकि ईरान की चिंताओं और मांगों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा। ईरान की प्रमुख मांगें क्या हैं? तेहरान ने स्थायी शांति समझौते के लिए कई शर्तें रखी हैं, जिनमें शामिल हैं: अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी समाप्त करना। तेल और गैस निर्यात पर लगे प्रतिबंध हटाना। विदेशों में जमी ईरानी संपत्तियों को जारी करना। भविष्य में सैन्य हमलों के खिलाफ सुरक्षा गारंटी देना। युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई के लिए मुआवजा तंत्र बनाना। क्षेत्र से अमेरिकी सैन्य उपस्थिति कम करना। ईरान का कहना है कि परमाणु कार्यक्रम और यूरेनियम संवर्धन पर चर्चा तभी होगी जब युद्ध और नाकाबंदी से जुड़े मुद्दों का समाधान हो जाएगा। संघर्षविराम के बावजूद पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हालात दोनों देशों के बीच 8 अप्रैल से संघर्षविराम लागू है, लेकिन क्षेत्रीय तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। मध्य पूर्व के कई हिस्सों में अस्थिरता बनी हुई है और समय-समय पर सैन्य गतिविधियों की खबरें सामने आती रहती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान वार्ता प्रक्रिया में प्रगति हुई है, लेकिन परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर मतभेद अभी भी गहरे हैं। कूटनीति और दबाव की दोहरी रणनीति ट्रंप के हालिया बयान से यह संकेत मिलता है कि अमेरिका एक ओर वार्ता और समझौते की संभावना खुली रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर ईरान पर दबाव बनाए रखने की रणनीति भी जारी रखे हुए है। ऐसे में आने वाले हफ्तों में वॉशिंगटन और तेहरान के बीच होने वाली बातचीत इस बात का फैसला कर सकती है कि संकट का समाधान कूटनीतिक रास्ते से निकलता है या तनाव एक बार फिर बढ़ता है।
Mojtaba Khamenei को लेकर अमेरिकी मीडिया में बड़ा दावा किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के शीर्ष नेता इस समय बेहद गोपनीय तरीके से एक अज्ञात स्थान पर रह रहे हैं और बाहरी दुनिया से उनका संपर्क लगभग सीमित कर दिया गया है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के हवाले से आई रिपोर्ट में कहा गया है कि मोजतबा खामेनेई तक सीधे पहुंचना लगभग असंभव हो गया है। उनसे संपर्क केवल विशेष दूतों और गुप्त कुरियर नेटवर्क के जरिए किया जा रहा है। यही वजह है कि Iran और United States के बीच चल रही शांति वार्ता और संभावित पीस डील की प्रक्रिया धीमी पड़ गई है। ट्रंप प्रशासन के साथ बातचीत में देरी रिपोर्ट के अनुसार, Donald Trump प्रशासन के साथ बातचीत कर रहे ईरानी अधिकारियों को भी अपने ही सिस्टम के भीतर संवाद स्थापित करने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। बताया गया कि अमेरिका की ओर से भेजे गए किसी भी प्रस्ताव या समझौते के मसौदे को मोजतबा खामेनेई तक पहुंचाने और वहां से जवाब वापस आने में काफी समय लग रहा है। इसका कारण यह है कि उनके पास सीधे संपर्क का सामान्य माध्यम अब मौजूद नहीं है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मोजतबा खामेनेई ने अपने करीबी अधिकारियों को पहले से निर्देश दे रखे हैं कि किन मुद्दों पर बातचीत की जा सकती है और किन विषयों से बचना है। शीर्ष अधिकारियों को भी नहीं पता लोकेशन अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सुरक्षा कारणों से ईरानी सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारियों को भी मोजतबा खामेनेई की वास्तविक लोकेशन की जानकारी नहीं है। संदेशों के आदान-प्रदान के लिए विशेष कुरियर नेटवर्क बनाया गया है, जिसका मुख्य उद्देश्य उनकी लोकेशन को पूरी तरह गुप्त रखना है। एक अमेरिकी अधिकारी के हवाले से कहा गया कि जवाब आने में काफी देर हो रही है और इससे वार्ता प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। अमेरिकी-इजरायली ऑपरेशन के बाद बढ़ी सुरक्षा रिपोर्ट में दावा किया गया है कि हाल के अमेरिकी और इजरायली सैन्य अभियानों के दौरान ईरानी सरकारी तंत्र से मिली खुफिया जानकारी के आधार पर कई वरिष्ठ नेताओं की पहचान की गई थी। इसी क्रम में “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” के दौरान हुए हमलों में मोजतबा खामेनेई के घायल होने का भी दावा किया गया है। हालांकि, इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। बताया जा रहा है कि इन घटनाओं के बाद उनकी सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह बदल दी गई है और उनकी सार्वजनिक मौजूदगी लगभग समाप्त हो गई है। पिता अली खामेनेई के बाद और बढ़ी सतर्कता रिपोर्ट के मुताबिक, Ali Khamenei की मौत के बाद सुरक्षा को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही है। इसी कारण मोजतबा खामेनेई अब सार्वजनिक कार्यक्रमों से लगभग दूर हैं। ईरानी मीडिया में समय-समय पर उनके नाम से जारी संदेश प्रसारित किए जा रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ईरान के कई अधिकारी फिलहाल भूमिगत बंकरों से काम कर रहे हैं और सीधे संवाद से बच रहे हैं, जिससे अमेरिका के साथ बातचीत की गति और धीमी हो गई है।
नई दिल्ली/तेहरान, एजेंसियां। मुजतबा खामेनेई की सेहत और ईरान की सत्ता संरचना को लेकर चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। रिपोर्ट्स के अनुसार, 28 फरवरी को हुए हमलों के बाद वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे और अब भी छिपकर इलाज करा रहे हैं। उनके चेहरे और होंठ जल गए हैं, एक पैर कई ऑपरेशन के बाद काटने की नौबत तक पहुंच गया है और भविष्य में कृत्रिम पैर लगाने की संभावना जताई जा रही है। हमले के बाद बदली स्थिति बताया जा रहा है कि अयातुल्ला अली खामेनेई के ठिकाने पर हुए हमले में भारी नुकसान हुआ था। इसी हमले के बाद से मुजतबा सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए हैं। उनकी ओर से केवल लिखित संदेश जारी किए जा रहे हैं और सुरक्षा कारणों से उनसे मिलना बेहद कठिन बताया जा रहा है। सेना के जनरलों के हाथ में फैसले मौजूदा हालात में ईरान की सत्ता का संतुलन बदलता दिख रहा है। देश के अहम फैसले अब Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) और उसके वरिष्ठ जनरल ले रहे हैं। सुरक्षा, विदेश नीति और युद्ध जैसे मुद्दों पर सेना का प्रभाव बढ़ गया है, जबकि राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका सीमित होती नजर आ रही है। राष्ट्रपति और सरकार की भूमिका कमजोर रिपोर्ट्स के मुताबिक, राष्ट्रपति मसूद पजशकियान और विदेश मंत्रालय की भूमिका भी सीमित हो गई है। उन्हें आंतरिक व्यवस्थाओं जैसे खाद्य आपूर्ति और आवश्यक सेवाओं तक सीमित कर दिया गया है। वहीं, अंतरराष्ट्रीय बातचीत में भी सैन्य नेतृत्व की भूमिका बढ़ गई है। विशेषज्ञों की राय विशेषज्ञों का मानना है कि मुजतबा खामेनेई औपचारिक रूप से शीर्ष पद पर जरूर हैं, लेकिन वास्तविक निर्णय सामूहिक रूप से सेना के शीर्ष अधिकारी ले रहे हैं। इससे साफ संकेत मिलते हैं कि ईरान में सत्ता का केंद्र धीरे-धीरे धार्मिक नेतृत्व से हटकर सैन्य ढांचे की ओर शिफ्ट हो रहा है। आगे क्या? ईरान में जारी तनाव, अंतरराष्ट्रीय दबाव और आंतरिक शक्ति संघर्ष के बीच यह बदलाव भविष्य की राजनीति और वैश्विक समीकरणों पर बड़ा असर डाल सकता है। फिलहाल, देश की दिशा काफी हद तक सैन्य नेतृत्व के फैसलों पर निर्भर नजर आ रही है।
देश की कमान अब जनरलों के नेटवर्क के इर्द-गिर्द ईरान की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां सर्वोच्च नेतृत्व से जुड़े मोजतबा खामेनेई की गंभीर चोटों के बाद देश की निर्णय प्रक्रिया पर सेना का प्रभाव तेजी से बढ़ गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब महत्वपूर्ण फैसले सीधे तौर पर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के शीर्ष जनरलों की सलाह और सहमति से लिए जा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, मौजूदा हालात में सरकार का मुख्य काम केवल आंतरिक स्थिरता बनाए रखना, आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सुनिश्चित करना और रोजमर्रा के प्रशासन को सुचारू रूप से चलाना रह गया है। गंभीर चोटों के बाद इलाज जारी, कई सर्जरी हो चुकी हैं रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मोजतबा खामेनेई को पहले हुए हमलों में गंभीर चोटें आई हैं। उनकी एक टांग पर अब तक तीन बार सर्जरी हो चुकी है और आगे चलकर उन्हें कृत्रिम पैर (prosthetic leg) की जरूरत पड़ सकती है। इसके अलावा, उनके हाथ की भी सर्जरी की गई है और उसमें धीरे-धीरे सुधार देखा जा रहा है। चेहरे और होंठों पर गंभीर जलन के निशान बताए गए हैं, जिससे बोलने में कठिनाई हो रही है। डॉक्टरों का कहना है कि भविष्य में उन्हें प्लास्टिक सर्जरी की आवश्यकता भी पड़ सकती है। देश से अलग-थलग, सिर्फ मेडिकल टीम से संपर्क जानकारी के अनुसार, सुरक्षा कारणों से वरिष्ठ सैन्य और राजनीतिक नेता अब सीधे मोजतबा से मुलाकात नहीं कर रहे हैं। उनका इलाज स्वास्थ्य मंत्रालय और विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में चल रहा है। ईरान के राष्ट्रपति, जो स्वयं एक डॉक्टर हैं, भी उनकी देखभाल प्रक्रिया से जुड़े बताए जा रहे हैं। रिपोर्ट यह भी बताती है कि वे सार्वजनिक रूप से बोलने से बच रहे हैं और केवल लिखित संदेशों के जरिए ही संवाद कर रहे हैं। सैन्य नेतृत्व के हाथ में सत्ता का संतुलन ईरान की सत्ता संरचना में इस समय बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स देश की सुरक्षा, विदेश नीति और रणनीतिक फैसलों में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। विदेश नीति से जुड़े कई महत्वपूर्ण अधिकार पहले के मुकाबले अब अलग नेताओं के पास स्थानांतरित हो गए हैं। संसद प्रमुख और कुछ वरिष्ठ सैन्य अधिकारी अंतरराष्ट्रीय रणनीति में ज्यादा प्रभावशाली भूमिका निभा रहे हैं। सरकार सीमित भूमिका में, जनरल्स का बढ़ता प्रभाव ईरान की निर्वाचित सरकार फिलहाल केवल प्रशासनिक कार्यों तक सीमित नजर आ रही है। खाद्य आपूर्ति, ईंधन व्यवस्था और घरेलू स्थिरता जैसे कार्य सरकार के मुख्य दायित्व बने हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा स्थिति में देश के भीतर शक्ति का संतुलन स्पष्ट रूप से सैन्य नेतृत्व की ओर झुका हुआ है। हालांकि, ईरानी व्यवस्था में अलग-अलग शक्ति केंद्रों का अस्तित्व पहले से ही रहा है। अस्थिर समय में सत्ता का बदलता ढांचा ईरान की वर्तमान राजनीतिक स्थिति एक असाधारण मोड़ पर दिखाई दे रही है, जहां घायल नेतृत्व, सीमित प्रशासनिक भूमिका और मजबूत सैन्य प्रभाव मिलकर एक नया शक्ति समीकरण बना रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि देश का राजनीतिक ढांचा किस दिशा में आगे बढ़ता है।
आखिरी समय में बदला फैसला, सीजफायर बढ़ाया अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान के साथ जारी तनाव के बीच दो हफ्ते के सीजफायर को खत्म होने से ठीक पहले बढ़ाने का ऐलान कर दिया। यह फैसला ऐसे समय आया जब ट्रंप पहले साफ कह चुके थे कि वे सीजफायर बढ़ाने के पक्ष में नहीं हैं और जरूरत पड़ने पर सैन्य कार्रवाई के लिए तैयार हैं। लेकिन अचानक लिए गए इस फैसले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। ट्रंप ने कहा कि ईरान को एक “एकजुट प्रस्ताव” तैयार करने के लिए और समय चाहिए, इसलिए फिलहाल हमले को टाल दिया गया है। पाकिस्तान की मध्यस्थता और कूटनीतिक दबाव इस फैसले के पीछे Shehbaz Sharif और Asim Munir की भूमिका भी अहम बताई जा रही है। ट्रंप ने खुद स्वीकार किया कि पाकिस्तान के अनुरोध पर अमेरिका ने कूटनीति को मौका देने के लिए यह कदम उठाया। हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि प्रस्तावित शांति वार्ता के लिए अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का पाकिस्तान दौरा भी आखिरी समय में टाल दिया गया, जिससे बातचीत की प्रक्रिया पर अनिश्चितता बनी हुई है। ईरान का आरोप–“यह सिर्फ समय खरीदने की रणनीति” वहीं Iran इस फैसले को पूरी तरह अलग नजरिए से देख रहा है। ईरानी अधिकारियों का मानना है कि अमेरिका का सीजफायर बढ़ाना असल में एक रणनीतिक कदम है, ताकि वह आगे किसी संभावित सैन्य कार्रवाई की तैयारी कर सके। इसके अलावा, अमेरिका द्वारा ईरानी बंदरगाहों पर जारी नाकेबंदी को भी तेहरान “युद्ध जैसी कार्रवाई” मान रहा है, जिससे दोनों देशों के बीच अविश्वास और गहरा गया है। अंदरूनी मतभेद और अधूरी वार्ता बना बड़ा कारण अमेरिकी रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान की नेतृत्व व्यवस्था इस समय अंदरूनी मतभेदों से जूझ रही है। बताया जा रहा है कि Mojtaba Khamenei से जुड़े निर्णयों पर सहमति नहीं बन पा रही है, जिसके चलते वार्ता प्रक्रिया धीमी हो गई है। सबसे बड़ा विवाद यूरेनियम संवर्धन और आर्थिक प्रतिबंधों को लेकर है–अमेरिका प्रतिबंधों में ढील से पहले परमाणु कार्यक्रम पर नियंत्रण चाहता है, जबकि ईरान पहले नाकेबंदी हटाने की शर्त रख रहा है। ऐसे में यह सीजफायर भले ही अस्थायी राहत दे, लेकिन स्थायी समाधान अभी दूर नजर आ रहा है और हालात कभी भी फिर से युद्ध की ओर बढ़ सकते हैं।
सेना का बढ़ता प्रभाव, सत्ता पर पकड़ मजबूत ईरान में सत्ता के समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) पर आरोप है कि वह देश की राजनीतिक व्यवस्था में अपनी पकड़ लगातार मजबूत कर रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, IRGC ने राष्ट्रपति के कई अहम फैसलों में हस्तक्षेप करते हुए सरकार की कार्यप्रणाली पर प्रभाव बढ़ा दिया है। राष्ट्रपति की नियुक्तियों पर रोक Masoud Pezeshkian द्वारा किए गए महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति के प्रयासों को कथित तौर पर रोक दिया गया। खासकर खुफिया मंत्री की नियुक्ति को लेकर राष्ट्रपति और सैन्य नेतृत्व के बीच टकराव सामने आया है। बताया जा रहा है कि IRGC के दबाव के चलते प्रस्तावित सभी नामों को खारिज कर दिया गया। सुप्रीम लीडर तक पहुंच भी सीमित रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि Mojtaba Khamenei के आसपास सुरक्षा घेरा कड़ा कर दिया गया है और उनकी पहुंच को सीमित किया गया है। सूत्रों के अनुसार, अब शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच और संवाद को सैन्य अधिकारियों की एक परिषद नियंत्रित कर रही है, जिससे सरकार और नेतृत्व के बीच दूरी बढ़ गई है। क्या यह तख्तापलट है? विशेषज्ञ इसे अचानक हुआ सत्ता परिवर्तन नहीं मानते, बल्कि इसे लंबे समय से चल रही प्रक्रिया का हिस्सा बताते हैं। उनका कहना है कि IRGC का प्रभाव पहले से ही बढ़ रहा था और अब वह खुलकर सामने आ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर IRGC का दबदबा और बढ़ता है, तो ईरान की विदेश नीति और अधिक सख्त हो सकती है। इससे अमेरिका जैसे देशों के साथ बातचीत में तनाव बढ़ने की संभावना है। राजनीतिक संकट गहराने के संकेत ईरान के भीतर सत्ता संघर्ष और बढ़ते तनाव से राजनीतिक संकट गहराता दिख रहा है। राष्ट्रपति पेजेशकियन के लिए यह स्थिति बड़ी चुनौती बन गई है, जहां उन्हें एक ऐसे सिस्टम में काम करना पड़ रहा है, जहां वास्तविक नियंत्रण धीरे-धीरे सैन्य संस्थाओं के हाथ में जाता नजर आ रहा है।
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच मोजतबा खामेनेई की सेहत को लेकर बड़ी खबर सामने आई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान के नए सुप्रीम लीडर एक घातक एयरस्ट्राइक में गंभीर रूप से घायल हो गए थे और अब भी उनका इलाज जारी है। इसके बावजूद वह देश के अहम फैसलों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। एयरस्ट्राइक में लगीं गंभीर चोटें सूत्रों के अनुसार, 28 फरवरी को तेहरान में सुप्रीम लीडर के परिसर पर हुए हमले में मोजतबा खामेनेई बुरी तरह घायल हो गए थे। इस हमले में उनके पिता अयातुल्ला खामेनेई की मौत हो गई थी, जबकि परिवार के कई अन्य सदस्य भी मारे गए। रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि: उनके चेहरे पर गंभीर चोटें आई हैं, जिससे चेहरा विकृत हो गया एक या दोनों पैरों में गंभीर चोट लगी, यहां तक कि एक पैर खोने की आशंका जताई गई वह अभी भी रिकवरी के दौर में हैं पर्दे के पीछे से संभाल रहे कमान शारीरिक रूप से कमजोर होने के बावजूद मोजतबा खामेनेई मानसिक रूप से सक्रिय बताए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि वह: ऑडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए बैठकों में हिस्सा ले रहे हैं युद्ध और कूटनीतिक फैसलों में भागीदारी कर रहे हैं अमेरिका के साथ वार्ता जैसे अहम मुद्दों पर अपनी राय दे रहे हैं हालांकि, 8 मार्च को सुप्रीम लीडर बनने के बाद से अब तक उनकी कोई सार्वजनिक तस्वीर या वीडियो सामने नहीं आया है, जिससे उनकी स्थिति को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। सत्ता संतुलन में बदलाव के संकेत विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की सत्ता संरचना में इस समय बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। देश में रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की भूमिका और प्रभाव पहले से ज्यादा मजबूत होता दिख रहा है। विश्लेषकों के मुताबिक, मोजतबा खामेनेई को अपने पिता जैसी पकड़ बनाने में समय लग सकता है और फिलहाल सत्ता कई केंद्रों में बंटी हुई नजर आ रही है। वार्ता पर भी असर यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता चल रही है। ऐसे में ईरान के शीर्ष नेतृत्व की स्थिति वार्ता के परिणाम को भी प्रभावित कर सकती है। अनिश्चितता और सवाल सरकारी स्तर पर अब तक उनकी सेहत को लेकर कोई विस्तृत आधिकारिक बयान नहीं आया है। वहीं, सोशल मीडिया पर उनकी स्थिति को लेकर कई तरह की अटकलें और सवाल उठ रहे हैं।
US–Iran–Israel War Update: इजरायल के लेबनान पर हमले जारी रहने के बीच ईरान के नए सर्वोच्च नेता मुज्तबा खामेनेई का अहम बयान सामने आया है। उन्होंने साफ किया कि ईरान युद्ध नहीं चाहता, लेकिन अपने अधिकारों से पीछे भी नहीं हटेगा। क्या बोले खामेनेई? “हमने युद्ध नहीं चाहा और हम इसे नहीं चाहते…” “लेकिन किसी भी परिस्थिति में अपने अधिकार नहीं छोड़ेंगे” “इस संघर्ष में शामिल सभी पक्षों को हम एक ही मानते हैं” उनके इस बयान को सीधे तौर पर लेबनान में इजरायल के हमलों से जोड़कर देखा जा रहा है। इजरायल का रुख अब भी सख्त इजरायली पीएम पहले ही कह चुके हैं: “लेबनान में कोई सीजफायर लागू नहीं” हिज़्बुल्लाह के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जारी होर्मुज स्ट्रेट पर चेतावनी खामेनेई ने बड़ा संकेत देते हुए कहा: ईरान होर्मुज स्ट्रेट को संभालने का तरीका बदल सकता है जनता से अपील: सड़कों पर आकर अपनी आवाज उठाएं इसका सीधा असर वैश्विक तेल सप्लाई पर पड़ सकता है। बैकग्राउंड क्या है? 28 फरवरी को युद्ध की शुरुआत के दिन ही अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत इसके बाद मुज्तबा खामेनेई बने नए सुप्रीम लीडर अभी तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए, सिर्फ लिखित संदेशों के जरिए संवाद हेल्थ को लेकर भी अटकलें कुछ रिपोर्ट्स में दावा: खामेनेई कोमा जैसी स्थिति में है ईरान के कोम शहर में इलाज जारी हालांकि, सरकार की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है
ईरान में जारी तनाव के बीच एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें दावा किया गया है कि देश के नए सर्वोच्च नेता अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई गंभीर रूप से घायल हैं और कोमा में हैं। बताया जा रहा है कि उनका इलाज फिलहाल कोम (Qom) शहर में चल रहा है। खुफिया रिपोर्ट में क्या दावा? ब्रिटेन के अखबार The Times की रिपोर्ट के मुताबिक- मोजतबा खामेनेई अचेत अवस्था (कोमा) में हैं उनकी हालत गंभीर बनी हुई है वे किसी भी सरकारी या सैन्य फैसले में हिस्सा लेने की स्थिति में नहीं हैं यह जानकारी कथित तौर पर अमेरिकी और इजरायली खुफिया एजेंसियों द्वारा साझा किए गए कूटनीतिक मेमो पर आधारित बताई गई है। सार्वजनिक तौर पर न दिखने से बढ़ी अटकलें पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने के बाद से मोजतबा खामेनेई सार्वजनिक रूप से नजर नहीं आए उनके नाम से संदेश जरूर जारी हो रहे हैं, लेकिन उन्हें ईरानी सरकारी मीडिया प्रसारित कर रहा है इससे उनके गंभीर रूप से घायल होने की खबरों को और बल मिला है। अलग-अलग रिपोर्ट्स में अलग दावे मोजतबा खामेनेई की हालत को लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं- कुछ रिपोर्ट्स: वे कोमा में हैं और इलाज चल रहा है अन्य रिपोर्ट्स (जैसे The Sun): हमलों में एक हाथ और एक पैर गंवाने का दावा हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो पाई है। ईरान सरकार का क्या कहना है? ईरानी अधिकारियों ने इन अटकलों के बीच कहा है कि- देश की कमान पूरी तरह नियंत्रण में है सर्वोच्च नेतृत्व सक्रिय है लेकिन उन्होंने खामेनेई की सेहत को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं दी है। ट्रंप की चेतावनी से बढ़ा तनाव इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने- ईरान को तय समय सीमा तक समझौता करने का अल्टीमेटम दिया चेतावनी दी कि डेडलाइन के बाद पुल और पावर प्लांट तबाह किए जा सकते हैं ट्रंप ने कहा- “ईरान पहले शक्तिशाली था, लेकिन अब हमने उसका सिर काट दिया है।” क्या हो सकता है असर? विशेषज्ञों के मुताबिक- अगर खामेनेई वाकई गंभीर हालत में हैं, तो ईरान में नेतृत्व संकट पैदा हो सकता है इससे युद्ध और कूटनीतिक स्थिति पर बड़ा असर पड़ सकता है मिडिल ईस्ट में अस्थिरता और बढ़ सकती है
तेहरान, एजेंसियां। ईरान के नए सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई को लगभग एक महीने हो गए हैं, लेकिन अब तक उन्हें सार्वजनिक रूप से देखा नहीं गया। उनकी गैरमौजूदगी को लेकर अफवाहें और अटकलें तेज हो गई थीं। हाल ही में, रूस के राजदूत एलेक्सी डेडोव ने इस पर स्पष्ट जानकारी दी कि मुज्तबा खामेनेई ईरान में ही हैं, हालांकि किसी विशेष कारण से सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आ रहे हैं। पिता की जगह संभाली सत्ता मुज्तबा खामेनेई ने अपने पिता, अयातुल्ला अली खामेनेई की जगह ली है, जिनकी 28 फरवरी को अमेरिका-इज़राइल के हमलों के दौरान मृत्यु हो गई थी। अमेरिका ने यह दावा किया था कि नए सुप्रीम लीडर घायल हैं। वहीं, रूस के राजदूत ने कहा कि यह अटकलें सही नहीं हैं और खामेनेई देश में ही हैं। अफवाहों पर विराम कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया था कि उन्हें रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के निमंत्रण पर मॉस्को इलाज के लिए ले जाया गया था। रूस और ईरान के बीच घनिष्ठ संबंध हैं, और पिछले साल दोनों देशों ने रणनीतिक साझेदारी संधि पर हस्ताक्षर किए थे। जनता की प्रतिक्रिया और प्रभाव खामेनेई की गैरमौजूदगी के दौरान, हजारों लोग सड़कों पर उतरकर उनके प्रति वफादारी जताते नजर आए। हालांकि, लगातार गैरमौजूदगी ने सवाल खड़े किए कि युद्ध के समय देश का संचालन वास्तव में किसके हाथ में है। 56 वर्षीय मुज्तबा खामेनेई अपने पिता के शासनकाल में पर्दे के पीछे प्रभावशाली रहे हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से कम दिखाई देते थे। अब सुप्रीम लीडर बनने के बाद भी उनकी गैरमौजूदगी चिंता और चर्चा का विषय बनी हुई है।
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच एक बड़ा विरोधाभास सामने आया है। एक तरफ अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने दावा किया कि ईरान के नए सुप्रीम लीडर Mojtaba Khamenei मारे जा चुके हैं, वहीं दूसरी ओर ईरानी मीडिया में उनके नाम से लगातार नए संदेश सामने आ रहे हैं। इस घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई बहस और अनिश्चितता पैदा कर दी है। ट्रंप का बड़ा दावा, लेकिन सवाल बरकरार रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप ने 27 मार्च को कहा था कि ईरान का शीर्ष नेतृत्व खत्म हो चुका है और देश में कोई सक्रिय सुप्रीम लीडर नहीं है। उन्होंने यहां तक संकेत दिया कि मोजतबा खामेनेई या तो मारे गए हैं या गंभीर रूप से घायल हैं। हालांकि, इस दावे की अब तक स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो पाई है। दूसरी तरफ जारी हो रहे संदेश ट्रंप के दावे के विपरीत, ईरान की तरफ से मोजतबा खामेनेई के नाम से लिखित संदेश जारी किए जा रहे हैं। एक हालिया संदेश में उन्होंने: अमेरिका और इजरायल के खिलाफ संघर्ष में समर्थन के लिए इराक की जनता का धन्यवाद किया खास तौर पर Ali al-Sistani का उल्लेख किया यह संदेश बगदाद में हुई एक बैठक के बाद सामने आया, जिससे यह संकेत मिलता है कि ईरानी नेतृत्व सक्रिय है। सार्वजनिक रूप से नहीं आए सामने मोजतबा खामेनेई अब तक सार्वजनिक रूप से नजर नहीं आए हैं। केवल लिखित बयान जारी किए जा रहे हैं उनके बयान टीवी पर दूसरे लोग पढ़कर सुनाते हैं उनकी ताजा तस्वीरों को लेकर भी संशय बना हुआ है इससे उनकी स्थिति और लोकेशन को लेकर अटकलें और तेज हो गई हैं। पृष्ठभूमि: युद्ध और सत्ता का संकट ईरान-इजरायल-अमेरिका के बीच जारी यह संघर्ष अब एक महीने से ज्यादा समय से चल रहा है। पूर्व सुप्रीम लीडर Ali Khamenei की युद्ध की शुरुआत में ही मौत हो चुकी है इसके बाद मोजतबा खामेनेई को नया सुप्रीम लीडर बनाया गया लेकिन उनकी गैर-मौजूदगी और विरोधाभासी खबरें सत्ता को लेकर असमंजस पैदा कर रही हैं क्या है इसका वैश्विक असर? यह घटनाक्रम कई बड़े सवाल खड़े करता है: क्या ट्रंप का दावा सही है या यह रणनीतिक बयान है? क्या ईरान में नेतृत्व संकट गहराता जा रहा है? क्या इससे युद्ध और भड़क सकता है? विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की विरोधाभासी सूचनाएं वैश्विक बाजार, कूटनीति और सुरक्षा स्थिति पर बड़ा असर डाल सकती हैं।
तेहरान/प्योंगयांग: मध्य पूर्व में जारी युद्ध के बीच ईरान के नए सर्वोच्च नेता Mojtaba Khamenei को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति और भी तेज हो गई है। अब North Korea ने भी खुले तौर पर उनके नेतृत्व का समर्थन किया है और अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों को “अवैध सैन्य कार्रवाई” बताया है। उत्तर कोरिया की सरकारी समाचार एजेंसी KCNA के मुताबिक, देश के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि ईरान के लोगों को अपने सर्वोच्च नेता चुनने का पूरा अधिकार है और प्योंगयांग तेहरान के इस फैसले का सम्मान करता है। 28 फरवरी के हमले के बाद बदला नेतृत्व मध्य पूर्व में मौजूदा संकट की शुरुआत तब हुई जब 28 फरवरी को अमेरिका और इज़राइल ने संयुक्त हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei को निशाना बनाया, जिसमें उनकी मौत हो गई। इसके बाद ईरान की सर्वोच्च धार्मिक परिषद, Assembly of Experts ने उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को नया सुप्रीम लीडर चुना। इस फैसले के बाद दुनिया के कई देशों की प्रतिक्रियाएं सामने आईं, जो स्पष्ट रूप से अलग-अलग खेमों में बंटी दिखाई दे रही हैं। इन देशों और संगठनों ने किया समर्थन मोजतबा खामेनेई के नेतृत्व का समर्थन करने वालों में कई देश और संगठन शामिल हैं। Vladimir Putin की अगुवाई वाला Russia ईरान के साथ “अटूट साझेदारी” की बात कह चुका है। China ने भी कहा कि यह फैसला ईरान के संविधान के तहत लिया गया है और बाहरी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। Haitham bin Tariq के नेतृत्व वाला Oman भी नए नेतृत्व को बधाई दे चुका है। Mohammed Shia al-Sudani की सरकार वाले Iraq ने भी मोजतबा खामेनेई पर भरोसा जताया है। यमन के Houthi Movement ने इसे “इस्लामिक क्रांति की नई जीत” बताया। अब North Korea ने भी खुलकर समर्थन कर दिया है। इन देशों ने जताया विरोध दूसरी ओर कई देशों ने नए नेतृत्व की आलोचना की है। Donald Trump ने मोजतबा खामेनेई को “कमजोर नेता” बताते हुए कहा कि उनके पास ईरान के लिए अलग विकल्प हो सकता है। Israel के विदेश मंत्रालय ने उन्हें “एक और तानाशाह” बताया और कहा कि उनकी नीतियां भी उनके पिता की तरह हिंसक होंगी। रिपोर्टों के मुताबिक इज़राइली सेना ने मोजतबा खामेनेई को भी निशाना बनाने की चेतावनी दी है। उत्तर कोरिया की कड़ी प्रतिक्रिया उत्तर कोरिया ने अमेरिका और इज़राइल के हमलों को अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ बताते हुए कहा कि यह कार्रवाई क्षेत्रीय शांति और वैश्विक स्थिरता को कमजोर करती है। प्योंगयांग ने कहा कि किसी भी देश की राजनीतिक व्यवस्था और क्षेत्रीय अखंडता पर हमला पूरी दुनिया द्वारा निंदा किए जाने योग्य है। किम जोंग उन ने कराया मिसाइल परीक्षण इसी बीच उत्तर कोरिया के नेता Kim Jong Un ने देश के सबसे बड़े युद्धपोत से रणनीतिक क्रूज मिसाइल का परीक्षण भी करवाया। KCNA के अनुसार यह परीक्षण Choe Hyon नाम के नए विध्वंसक युद्धपोत से किया गया। किम जोंग उन ने इस दौरान कहा कि देश के लिए “मजबूत और विश्वसनीय परमाणु प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखना बेहद जरूरी है।” वैश्विक राजनीति में बढ़ता तनाव विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान-अमेरिका संघर्ष में उत्तर कोरिया जैसे परमाणु हथियार संपन्न देश की खुली भागीदारी से स्थिति और जटिल हो सकती है। यह भी माना जा रहा है कि अगर यह टकराव और बढ़ता है, तो इसका असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर भी पड़ सकता है। कुल मिलाकर, ईरान के नए सुप्रीम लीडर को लेकर दुनिया साफ तौर पर दो खेमों में बंटती दिखाई दे रही है-एक तरफ ईरान के सहयोगी देश हैं, जबकि दूसरी ओर अमेरिका और उसके करीबी सहयोगी इस बदलाव को चुनौती दे रहे हैं।
ईरान में सत्ता परिवर्तन के बाद पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता दिखाई दे रहा है। देश के पूर्व सुप्रीम लीडर Ali Khamenei के निधन के बाद उनके बेटे Mojtaba Khamenei को नया सुप्रीम लीडर चुना गया है। नए नेतृत्व के सामने आते ही ईरान ने क्षेत्रीय मोर्चों पर आक्रामक रुख अपनाया है। इसी बीच कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि मौजूदा संघर्ष के दौरान मोजतबा खामेनेई घायल भी हुए हैं, हालांकि इस बारे में आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। नए सुप्रीम लीडर के चयन के बाद सत्ता में एकजुटता ईरान की धार्मिक और राजनीतिक संस्था Assembly of Experts ने औपचारिक प्रक्रिया के बाद मोजतबा खामेनेई को देश का नया सुप्रीम लीडर घोषित किया। इस फैसले के बाद ईरान के राजनीतिक और सैन्य प्रतिष्ठान ने उनके प्रति समर्थन जताया। ईरान की सबसे शक्तिशाली सैन्य संस्था Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) ने बयान जारी कर कहा कि वह नए सुप्रीम लीडर के आदेशों का पूरी निष्ठा से पालन करेगी। संगठन ने यह भी कहा कि देश की रक्षा और दुश्मनों के खिलाफ लड़ाई में जरूरत पड़ने पर सैनिक अपनी जान तक कुर्बान करने के लिए तैयार हैं। इजरायल के खिलाफ तेज हुए हमले नए सुप्रीम लीडर की घोषणा के कुछ ही घंटों बाद ईरान ने युद्ध के मोर्चे पर सक्रियता बढ़ा दी। IRGC ने दावा किया कि उसने Israel और क्षेत्रीय ठिकानों की ओर कई मिसाइलें दागी हैं। इन हमलों में खोर्रमशहर, फतह, खैबर और कद्र जैसी लंबी दूरी की मिसाइलों का इस्तेमाल किए जाने की बात कही गई है। ईरान की तरफ से लगातार हो रहे हमलों के बाद अमेरिका ने भी अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा दी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक United States ने अपना तीसरा विमानवाहक पोत USS George H.W. Bush (CVN‑77) खाड़ी क्षेत्र की ओर भेज दिया है। खाड़ी देशों में भी बढ़ा तनाव इस बीच खाड़ी क्षेत्र के कई देशों ने भी हवाई हमलों और ड्रोन गतिविधियों की सूचना दी है। Bahrain में ड्रोन हमलों के बाद कम से कम 32 लोगों के घायल होने की खबर है। वहीं Kuwait ने एक संदिग्ध ड्रोन को मार गिराने का दावा किया है। इसके अलावा Qatar की सेना ने कहा कि उसने अपने एयर डिफेंस सिस्टम की मदद से एक मिसाइल हमले को नाकाम कर दिया। कठोर नीति की ओर बढ़ सकता है ईरान राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मोजतबा खामेनेई का सुप्रीम लीडर बनना इस बात का संकेत हो सकता है कि ईरान की सत्ता में कठोर रुख रखने वाला धड़ा और मजबूत हो गया है। माना जा रहा है कि नए नेता के नेतृत्व में ईरान अपने पूर्व नेता अली खामेनेई की विदेश नीति को आगे बढ़ाएगा और अमेरिका तथा इजरायल के खिलाफ अपने रुख को और सख्त बना सकता है। फिलहाल पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच यह घटनाक्रम पूरे क्षेत्र की सुरक्षा और स्थिरता के लिए एक बड़ा संकेत माना जा रहा है। आने वाले दिनों में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच तनाव किस दिशा में जाएगा, इस पर दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।