NCPI

Members of Parliament arrive at the Parliament complex in New Delhi amid political developments over the formation of the NCPI parliamentary party ahead of the Monsoon Session.
टीएमसी बगावत के बाद दिल्ली में हलचल, एनसीपीआई को सर्वदलीय बैठक का न्योता मिल सकता है

नई दिल्ली: संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले दिल्ली की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में शामिल हुए सांसदों को लेकर नई राजनीतिक गतिविधियां सामने आ रही हैं। सूत्रों के अनुसार, 19 जुलाई को होने वाली सर्वदलीय बैठक में एनसीपीआई को आमंत्रित किए जाने की संभावना जताई जा रही है। सुदीप बंद्योपाध्याय बन सकते हैं सदन के नेता सूत्रों के मुताबिक, लोकसभा सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय को लोकसभा में एनसीपीआई का नेता चुना जा सकता है। वहीं शताब्दी रॉय को उपनेता और काकोली घोष दस्तीदार को मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) बनाए जाने की संभावना है। पार्टी अपने संसदीय दल के गठन को अंतिम रूप देने में जुटी है। लोकसभा अध्यक्ष से की मुलाकात जानकारी के अनुसार, सुदीप बंद्योपाध्याय और काकोली घोष दस्तीदार ने सोमवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की। इस दौरान एनसीपीआई के 20 सांसदों के लिए लोकसभा में बैठने की व्यवस्था और नए संसद भवन में पार्टी कार्यालय आवंटित करने जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। एनडीए को समर्थन पर भी चर्चा सूत्रों का कहना है कि एनसीपीआई के नेताओं की यह सक्रियता संसदीय मान्यता हासिल करने की प्रक्रिया का हिस्सा है। बताया जा रहा है कि सुदीप बंद्योपाध्याय ने हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से भी मुलाकात की थी। एनडीए का सहयोगी दल बनने की प्रक्रिया के तहत पार्टी से केंद्र सरकार को समर्थन संबंधी औपचारिक पत्र देने को कहा गया है। टीएमसी ने दायर की अयोग्यता याचिकाएं दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस ने पार्टी छोड़ने वाले 20 सांसदों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है। लोकसभा में टीएमसी के नेता अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष को संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत सभी 20 सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग करते हुए अलग-अलग याचिकाएं सौंपी हैं। टीएमसी का आरोप है कि इन सांसदों ने दूसरे दल में शामिल होकर स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ दी है। हालांकि, सूत्रों के मुताबिक सोमवार को लोकसभा अध्यक्ष के साथ हुई बैठक में इन अयोग्यता याचिकाओं पर चर्चा नहीं हुई। विधानसभा चुनाव के बाद शुरू हुई बगावत 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस में असंतोष बढ़ा और कई सांसदों एवं विधायकों ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। बागी सांसदों ने दावा किया कि उन्हें दो-तिहाई से अधिक समर्थन प्राप्त है और बाद में उन्होंने एनसीपीआई में विलय की घोषणा कर दी। अब संसद के मानसून सत्र से पहले एनसीपीआई की संसदीय मान्यता, सर्वदलीय बैठक में संभावित भागीदारी और टीएमसी की अयोग्यता याचिकाओं पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।  

Deepshikha जुलाई 15, 2026 0
Rebel TMC MPs speak to media after meeting Lok Sabha Speaker amid announcement of merger with NCPI.
टीएमसी के बागी सांसदों का बड़ा बयान, बोले- ममता बनर्जी का सम्मान हमेशा रहेगा, लेकिन बंगाल के विकास के लिए बदलाव जरूरी

  नई दिल्ली: लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 20 सांसदों के बागी रुख अपनाने और नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय के ऐलान के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। इस बीच बागी सांसदों ने साफ किया है कि उनका संघर्ष ममता बनर्जी के खिलाफ नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर विकसित हुई कार्यशैली और नेतृत्व के तौर-तरीकों के खिलाफ है। 'ममता बनर्जी के प्रति सम्मान हमेशा रहेगा' लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात के बाद बागी गुट के एक वरिष्ठ सांसद ने कहा कि ममता बनर्जी उनके राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं और उनके प्रति सम्मान हमेशा बना रहेगा। उन्होंने कहा, "ममता बनर्जी हमारी नेता रही हैं। उन्होंने कई नेताओं को राजनीति में आगे बढ़ने का अवसर दिया। उनके प्रति हमारे मन में सम्मान हमेशा रहेगा, लेकिन अब बंगाल के विकास और नई दिशा के लिए काम करने का समय है।" 'बंगाल के विकास के लिए दिल्ली के साथ मिलकर काम करना होगा' बागी सांसद ने कहा कि वर्ष 2026 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद राज्य के विकास को प्राथमिकता देना जरूरी हो गया है। उनका दावा है कि कई केंद्रीय योजनाओं का लाभ राज्य के लोगों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाया। उन्होंने कहा कि बंगाल के विकास को गति देने के लिए केंद्र और राज्य के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है और अब दिल्ली के साथ मिलकर काम करने की जरूरत है। 'लड़ाई ममता से नहीं, पार्टी के भीतर के कॉर्पोरेट कल्चर से' बागी गुट के नेताओं का कहना है कि उनका विरोध ममता बनर्जी से नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर कथित तौर पर विकसित हुए केंद्रीकृत और कॉर्पोरेट शैली के प्रबंधन से है। उनका आरोप है कि पिछले कुछ वर्षों में पार्टी के सांसदों और विधायकों की भूमिका सीमित हो गई थी और फैसलों में उनकी भागीदारी कम हो गई थी। अभिषेक बनर्जी के करीबियों पर भी उठाए सवाल बागी नेताओं ने दावा किया कि पार्टी के भीतर कुछ नेताओं और प्रभावशाली समूहों के बढ़ते प्रभाव से पुराने और वरिष्ठ नेताओं में असंतोष बढ़ रहा था। उनका कहना है कि यही असंतोष धीरे-धीरे बड़े राजनीतिक बदलाव का कारण बना। इन आरोपों पर टीएमसी की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।  

Deepshikha जून 18, 2026 0
TMC rebel leader Ritabrata Banerjee attends assembly meeting as Bengal's political crisis deepens before the budget session.
बजट सत्र से पहले ममता गुट को बड़ा झटका, सर्वदलीय बैठक में शोभनदेव को नहीं बुलाया; बागी नेता रीतब्रत को मिला न्योता

  पश्चिम बंगाल विधानसभा के 18 जून से शुरू होने वाले बजट सत्र से पहले तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की आंतरिक कलह और गहरा गई है। विधानसभा की सर्वदलीय और कार्य मंत्रणा समिति की बैठक में पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार एवं ममता बनर्जी के करीबी नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय को आमंत्रित नहीं किया गया, जबकि बागी गुट के नेता रीतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के तौर पर बैठक में शामिल होने का निमंत्रण भेजा गया। इस घटनाक्रम को विधानसभा के भीतर बदलते सियासी समीकरणों और बागी गुट की बढ़ती ताकत के रूप में देखा जा रहा है। रीतब्रत को मिली मान्यता, शोभनदेव रहे बाहर विधानसभा सूत्रों के अनुसार, सर्वदलीय बैठक के लिए जारी सूची में शोभनदेव चट्टोपाध्याय और बेलेघाटा से विधायक कुणाल घोष का नाम शामिल नहीं था। इसके विपरीत, हाल ही में विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र नाथ बसु द्वारा विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता प्राप्त रीतब्रत बनर्जी को बैठक के लिए आमंत्रित किया गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम संकेत देता है कि विधानसभा प्रशासन सदन के भीतर उभरी नई संख्या-स्थिति को स्वीकार करने लगा है। बागी गुट के साथ 65 विधायक तृणमूल कांग्रेस के भीतर शुरू हुई बगावत अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। कुछ दिन पहले पार्टी के 80 में से 58 विधायकों ने पार्टी नेतृत्व के फैसले को खारिज करते हुए विपक्ष के नेता पद के लिए रीतब्रत बनर्जी के दावे का समर्थन किया था। अब बागी गुट का दावा है कि उसके समर्थन में 65 विधायक हैं, जिससे विधानसभा में रीतब्रत की स्थिति और मजबूत हुई है। सर्वदलीय बैठक में शामिल हुए अन्य विपक्षी नेता सर्वदलीय बैठक में विभिन्न विपक्षी दलों के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया। इनमें शामिल थे: नौशाद सिद्दीकी हुमायूं कबीर मुस्तफिजुर रहमान संसद से विधानसभा तक टीएमसी में संकट विधानसभा में बढ़ते संकट के बीच तृणमूल कांग्रेस को संसद में भी बड़ा झटका लग चुका है। हाल ही में पार्टी के 28 में से 20 लोकसभा सांसदों ने पार्टी से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय का फैसला किया और भाजपा नीत एनडीए को समर्थन देने की घोषणा की। बजट सत्र से पहले बढ़ा सियासी तापमान बंगाल विधानसभा का बजट सत्र 18 जून से शुरू हो रहा है। उससे पहले विपक्ष के नेतृत्व को लेकर छिड़ी लड़ाई ने राज्य की राजनीति को नई दिशा दे दी है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि विधानसभा के भीतर बदलते संख्या बल और टीएमसी की आंतरिक टूट का असर आगामी सत्र की कार्यवाही और पश्चिम बंगाल की राजनीति पर किस रूप में पड़ता है।  

Deepshikha जून 17, 2026 0
TMC leader Sougata Roy addresses media, calling rebel MPs who joined NCPI a group of traitors amid Bengal political crisis.
टीएमसी के बागी सांसदों पर सौगत रॉय का हमला, बोले- पार्टी छोड़ने वाले ‘गद्दार’; ममता ही असली तृणमूल की नेता

  तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में मचे सियासी घमासान के बीच पार्टी के वरिष्ठ सांसद सौगत रॉय ने बागी सांसदों पर तीखा हमला बोला है। मंगलवार को उन्होंने एनसीपीआई (नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया) में विलय करने वाले 20 सांसदों को ‘गद्दारों का समूह’ करार देते हुए कहा कि असली तृणमूल कांग्रेस का नेतृत्व ममता बनर्जी कर रही हैं और बागी गुट भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के इशारे पर काम कर रहा है। ‘दो टीमें हैं- एक तृणमूल की, दूसरी गद्दारों की’ सौगत रॉय ने कहा कि वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति में दो अलग-अलग टीमें दिखाई दे रही हैं। एक टीम तृणमूल कांग्रेस की है, जिसका नेतृत्व ममता बनर्जी कर रही हैं, जबकि दूसरी ‘गद्दारों की टीम’ है, जो एनडीए के साथ खड़ी है। उन्होंने कहा, “तृणमूल कांग्रेस विपक्षी इंडिया गठबंधन का हिस्सा है। हमारी पार्टी का चुनाव चिह्न ‘जोड़ा फूल’ है, जबकि गद्दारों की टीम का नेतृत्व नरेंद्र मोदी कर रहे हैं।” एनसीपीआई में विलय के दावे पर बरसे रॉय टीएमसी के बागी गुट ने दावा किया है कि उसे लोकसभा में पार्टी के दो-तिहाई सांसदों का समर्थन प्राप्त है और उसने एनसीपीआई में विलय का फैसला किया है। इसी दावे पर प्रतिक्रिया देते हुए सौगत रॉय ने कहा कि पार्टी छोड़ने वाले सांसद जनादेश और पार्टी की विचारधारा से विश्वासघात कर रहे हैं। ‘एजेंसियों के दुरुपयोग के बावजूद टीएमसी को मिला 41 फीसदी वोट’ वरिष्ठ टीएमसी नेता ने कहा कि हालिया पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा द्वारा केंद्रीय एजेंसियों के कथित दुरुपयोग और राजनीतिक दबाव के बावजूद तृणमूल कांग्रेस को करीब 41 प्रतिशत वोट मिले। उन्होंने कहा, “भाजपा ने सभी एजेंसियों का इस्तेमाल किया, लेकिन इसके बावजूद जनता ने तृणमूल कांग्रेस पर भरोसा जताया और हमें लगभग 41 फीसदी मत मिले।” क्या है एनसीपीआई? नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) एक अपेक्षाकृत नया राजनीतिक दल है, जिसे वर्ष 2023 में निर्वाचन आयोग में पंजीकृत किया गया था। टीएमसी के बागी सांसदों द्वारा इसी पार्टी में विलय की घोषणा के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है।  

Deepshikha जून 17, 2026 0
TMC rebel MPs submit memorandum to Lok Sabha Speaker Om Birla seeking recognition as a separate group and merger with NCPI.
TMC में घमासान: बागी सांसदों के दावों पर फैसला लेने से पहले दोनों पक्षों को सुनेंगे लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला

  तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में जारी सियासी संकट के बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला बागी सांसदों और ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले टीएमसी गुट, दोनों पक्षों को सुनने के बाद ही कोई फैसला लेंगे। सूत्रों के अनुसार, टीएमसी से अलग हुए 20 सांसदों ने खुद को अलग समूह के रूप में मान्यता देने और नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय का दावा करते हुए लोकसभा में अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की है। बागी सांसदों ने किया एनसीपीआई में विलय का दावा बागी गुट की नेता काकोली घोष दस्तीदार ने बताया कि लोकसभा अध्यक्ष को सौंपे गए ज्ञापन पर 20 सांसदों के हस्ताक्षर हैं। उन्होंने दावा किया कि सांसदों ने एनसीपीआई में विलय का फैसला किया है और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को समर्थन देने का निर्णय लिया है। टीएमसी का आरोप- केवल दो घंटे पहले दी गई मुलाकात की सूचना ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी ने आरोप लगाया कि पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात की सूचना केवल दो घंटे पहले दी गई। टीएमसी सूत्रों के मुताबिक, सोमवार दोपहर करीब दो बजे लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय की ओर से ई-मेल भेजकर शाम चार बजे मुलाकात के लिए कहा गया था। उस समय अभिषेक बनर्जी कोलकाता स्थित ईडी कार्यालय में पूछताछ में सहयोग कर रहे थे। कीर्ति आजाद ने स्पीकर कार्यालय को दी जानकारी सूत्रों के अनुसार, टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद ने लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय को सूचित किया कि अभिषेक बनर्जी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच में शामिल हैं और निर्धारित समय पर उपस्थित नहीं हो पाएंगे। बाद में आजाद ने स्वयं स्पीकर से मुलाकात कर स्थिति से अवगत कराया। कानूनी राय ले सकते हैं लोकसभा अध्यक्ष संसद से जुड़े सूत्रों का कहना है कि लोकसभा अध्यक्ष इस पूरे मामले पर केंद्रीय विधि मंत्रालय और संवैधानिक विशेषज्ञों की राय ले सकते हैं। इस मुद्दे पर कोई भी निर्णय संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले लिया जा सकता है, जो आमतौर पर जुलाई के तीसरे सप्ताह में शुरू होता है। संविधान विशेषज्ञों ने उठाए सवाल लोकसभा के पूर्व महासचिव और संविधान विशेषज्ञ पीडीटी आचारी का कहना है कि संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुसार किसी राजनीतिक दल का विलय केवल राजनीतिक संगठन स्तर पर हो सकता है। सांसद या विधायक अपने स्तर पर किसी दूसरी पार्टी में विलय नहीं कर सकते। वहीं, निर्वाचन आयोग के एक पूर्व अधिकारी ने टीएमसी के बागी सांसदों द्वारा एनसीपीआई में विलय की योजना को "असामान्य और कानूनी रूप से जटिल" बताया है। उनका कहना है कि ऐसी स्थिति का स्पष्ट उल्लेख न तो दलबदल विरोधी कानून में है और न ही जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में मिलता है। क्या है एनसीपीआई? नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) ने जनवरी 2023 में खुद को एक राजनीतिक दल के रूप में पंजीकृत कराया था। निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार, इसका मुख्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के संकराईल में स्थित है और राष्ट्रीय राजनीति में इसकी मौजूदगी अब तक सीमित रही है। क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला? अगर बागी सांसदों को अलग समूह के रूप में मान्यता मिलती है, तो यह पश्चिम बंगाल की राजनीति और लोकसभा में टीएमसी की स्थिति पर बड़ा असर डाल सकता है। वहीं, स्पीकर का फैसला दलबदल विरोधी कानून की व्याख्या और संसदीय परंपराओं के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है।  

Deepshikha जून 17, 2026 0
NCPI, once left with only ₹75 in its bank account, is now in the spotlight after 20 rebel TMC MPs announced their merger with the party.
75 रुपए वाली गुमनाम पार्टी रातोंरात बन सकती है NDA की दूसरी सबसे बड़ी ताकत! जानिए NCPI का पूरा सच

  नई दिल्ली/कोलकाता: भारतीय राजनीति में एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने राजनीतिक गलियारों से लेकर आम लोगों तक को हैरान कर दिया है। जिस पार्टी के बैंक खाते में एक साल पहले केवल 75 रुपए बचे थे, वही पार्टी अब संसद में सत्तारूढ़ गठबंधन एनडीए (NDA) की दूसरी सबसे बड़ी ताकत बनने की दहलीज पर खड़ी दिखाई दे रही है। यह पार्टी है नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI)। पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों द्वारा इस पार्टी में विलय की घोषणा के बाद अचानक यह छोटा-सा दल राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। 75 रुपए से संसद की ताकत बनने तक का सफर निर्वाचन आयोग को सौंपी गई एनसीपीआई की ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2022-23 में पार्टी को चंदे के रूप में कुल 1,13,075 रुपए मिले थे। पार्टी ने लगभग पूरी राशि संगठनात्मक गतिविधियों और चुनावी खर्चों में खर्च कर दी। त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में चार उम्मीदवारों को मैदान में उतारने पर पार्टी ने करीब 49,400 रुपए खर्च किए थे। चुनाव और अन्य खर्चों के बाद पार्टी के बैंक खाते में मात्र 75 रुपए बचे थे। पति-पत्नी के चंदे से चलती थी पार्टी रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी को दान देने वालों में प्रमुख रूप से पार्टी अध्यक्ष शिउली कुंडू और उनके पति उत्तीय कुंडू शामिल थे। शिउली कुंडू ने 15,000 रुपए का योगदान दिया था। उत्तीय कुंडू ने 18,000 रुपए का चंदा दिया था। यानी जिस पार्टी का अस्तित्व कुछ समर्थकों और परिवार के योगदान पर टिका था, वही आज राष्ट्रीय राजनीति की सुर्खियों में है। त्रिपुरा में नहीं मिला था जनसमर्थन एनसीपीआई ने वर्ष 2023 में त्रिपुरा विधानसभा चुनाव की चार सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। लेकिन पार्टी का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। अधिकांश सीटों पर पार्टी के उम्मीदवारों को NOTA (नोटा) के आसपास ही वोट मिले। पार्टी न तो कोई सीट जीत सकी और न ही कोई बड़ा जनाधार बना पाई। विडंबना: 'दलबदलुओं को नकारें' का नारा, लेकिन दलबदल से मिली पहचान जनवरी 2023 में पंजीकरण के समय एनसीपीआई ने अपना प्रमुख नारा दिया था— "अपने अधिकारों की रक्षा के लिए राजनीतिक दलबदलुओं को नकारें।" लेकिन राजनीतिक विडंबना देखिए कि आज इसी पार्टी की पहचान और राष्ट्रीय महत्व तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों के दलबदल के कारण बनी है। 20 सांसदों के आने से कैसे बदल जाएगा समीकरण? यदि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला बागी सांसदों के विलय को मान्यता दे देते हैं, तो एनसीपीआई रातोंरात लोकसभा की सबसे बड़ी पार्टियों में शामिल हो सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार: पार्टी सीधे देश की प्रमुख संसदीय ताकतों में शामिल हो जाएगी। एनडीए के भीतर इसका आकार कई पुराने सहयोगी दलों से बड़ा हो सकता है। इससे संसद में सीटों का गणित और गठबंधन की राजनीति दोनों प्रभावित हो सकते हैं। यह सब लोकसभा अध्यक्ष और कानूनी प्रक्रियाओं के फैसलों पर निर्भर करेगा। जमीन पर कोई जनप्रतिनिधि नहीं, फिर भी राष्ट्रीय चर्चा में सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि एनसीपीआई के पास अब तक किसी बड़े स्तर का जनाधार नहीं रहा है। पार्टी का कोई विधायक नहीं। कोई सांसद नहीं था। किसी बड़े नगर निकाय में भी उल्लेखनीय प्रतिनिधित्व नहीं रहा। इसके बावजूद, बागी सांसदों के विलय के बाद यह पार्टी राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गई है। कौन हैं शिउली और उत्तीय कुंडू? एनसीपीआई की पूर्व अध्यक्ष शिउली कुंडू की शैक्षणिक योग्यता काफी चर्चित रही है। वे: कलकत्ता हाईकोर्ट की वकील हैं। गणित में एमएससी हैं। एमबीए और एलएलएम की डिग्री रखती हैं। लैंड सर्वेइंग का प्रमाणपत्र भी उनके पास है। वहीं उनके पति उत्तीय कुंडू स्वयं को: बांग्ला अखबार के संपादक, गणित शिक्षक, मोटिवेशनल स्पीकर, आईएसओ ऑडिटर, योग स्वयंसेवक बताते हैं। आगे क्या? एनसीपीआई की कहानी भारतीय लोकतंत्र के सबसे अनोखे राजनीतिक घटनाक्रमों में शामिल हो सकती है। एक ऐसी पार्टी, जिसके खाते में कभी केवल 75 रुपए बचे थे, अब संसद की सत्ता समीकरण को प्रभावित करने की स्थिति में पहुंच गई है। बागी सांसदों के विलय, दलबदल विरोधी कानून, पार्टी की मान्यता और चुनाव चिह्न को लेकर अंतिम फैसला संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं के बाद ही सामने आएगा। लेकिन फिलहाल, एनसीपीआई भारतीय राजनीति का सबसे चर्चित और रहस्यमय राजनीतिक नाम बन चुकी है।  

Deepshikha जून 16, 2026 0
Rebel TMC MPs announce merger with NCPI and prepare legal battle over Trinamool Congress's ‘Jora Phool’ election symbol.
ममता बनर्जी से छिन सकता है तृणमूल का चुनाव चिह्न, दीदी के करीबी अरूप बोले- 'खेला होबे'

  कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा भूचाल आ गया है। Mamata Banerjee के नेतृत्व वाली All India Trinamool Congress (टीएमसी) के 20 बागी सांसदों ने पार्टी से अलग होकर Nationalist Citizens Party of India (एनसीपीआई) में विलय का ऐलान कर दिया है। इतना ही नहीं, बागी गुट अब तृणमूल कांग्रेस के चुनाव चिह्न 'जोड़ाफूल' (दो फूल) पर भी दावा करने की तैयारी में है। तृणमूल के बागी सांसद Arup Chakraborty ने सोमवार को दावा किया कि उन्होंने पार्टी नहीं छोड़ी है, बल्कि पार्टी को "सुधारने" की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा, "एक नया खेल शुरू हो गया है… खेला होबे।" 'हम ही असली तृणमूल हैं' अरूप चक्रवर्ती ने कहा कि बागी सांसद ही असली तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनके पास पार्टी के 20 सांसदों का समर्थन है। उन्होंने कहा, "हमने तृणमूल नहीं छोड़ी है। हम तृणमूल में ही हैं और पार्टी को ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं। पार्टी को नुकसान क्यों पहुंचा, इस पर कोई चर्चा नहीं हो रही है। हमारे पास 20 सांसद हैं, इसलिए हम चुनाव चिह्न के लिए कानूनी लड़ाई लड़ेंगे।" उन्होंने यह भी दावा किया कि इस राजनीतिक बदलाव से पश्चिम बंगाल में विकास और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। ममता बनर्जी पर साधा निशाना अरूप चक्रवर्ती ने कहा कि ममता बनर्जी डरी हुई हैं और पार्टी की बैठक तक बुलाने की स्थिति में नहीं हैं। उन्होंने आरोप लगाया, "ममता बनर्जी चुनाव से पहले अपने क्षेत्र में एक बैठक भी नहीं कर सकीं। पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक चर्चा समाप्त हो चुकी है।" 20 सांसदों ने एनसीपीआई में विलय का किया ऐलान रविवार को बागी सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल ने Om Birla से मुलाकात कर सदन में अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की। सांसदों ने घोषणा की कि वे एनसीपीआई में विलय कर चुके हैं और एक अलग संसदीय समूह के रूप में मान्यता चाहते हैं। एनसीपीआई एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है, जिसने वर्ष 2023 में त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में हिस्सा लिया था। टीएमसी ने बताया गैरकानूनी कदम तृणमूल कांग्रेस ने बागी सांसदों के कदम को संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत अवैध बताया है। Sagarika Ghose ने कहा कि केवल सांसदों के समूह का अलग होना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा, "दलबदल विरोधी कानून के तहत पहले संसद के बाहर मौजूद पूरी राजनीतिक पार्टी का विलय या विभाजन होना चाहिए। केवल सांसदों का समूह अलग होकर किसी अन्य पार्टी में शामिल नहीं हो सकता।" 'असली तृणमूल वही है जिसकी अध्यक्ष ममता हैं' तृणमूल के वरिष्ठ नेता Sougata Roy ने कहा कि असली तृणमूल कांग्रेस वही है, जिसकी अध्यक्ष ममता बनर्जी हैं और जिसका चुनाव चिह्न 'जोड़ाफूल' है। उन्होंने आरोप लगाया कि बागी सांसदों ने मतदाताओं के साथ विश्वासघात किया है। सौगत रॉय ने कहा, "तृणमूल के टिकट पर जीतकर सांसद बने लोगों ने एक अज्ञात पार्टी में शामिल होकर एनडीए का समर्थन करने का फैसला किया है। यह जनता के जनादेश के साथ धोखा है।" सुदीप बंद्योपाध्याय भी बागी गुट में शामिल छह बार के सांसद Sudip Bandyopadhyay भी बागी गुट में शामिल हो गए हैं। उन्होंने दावा किया कि बागी समूह ही असली तृणमूल कांग्रेस है और वह चुनाव चिह्न तथा पार्टी की मान्यता के लिए कानूनी लड़ाई लड़ेगा। विधानसभा से संसद तक छिड़ी नियंत्रण की जंग तृणमूल पर नियंत्रण की लड़ाई केवल संसद तक सीमित नहीं है। हाल ही में पश्चिम बंगाल विधानसभा में भी पार्टी के 80 में से 64 विधायकों ने अलग समूह के रूप में मान्यता हासिल करने का दावा किया है। इससे संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में बंगाल की राजनीति में बड़ा पुनर्संयोजन देखने को मिल सकता है। क्या ममता बनर्जी से छिन सकता है तृणमूल का चुनाव चिह्न? राजनीतिक और कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, किसी राजनीतिक दल का चुनाव चिह्न तभी दूसरे गुट को मिल सकता है जब पार्टी में वास्तविक विभाजन, संगठनात्मक समर्थन और निर्वाचन आयोग के समक्ष पर्याप्त कानूनी आधार साबित हो। इसलिए बागी सांसदों के दावे के बावजूद अंतिम फैसला Election Commission of India और न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा। फिलहाल इतना तय है कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर शुरू हुआ यह नया 'खेला' पश्चिम बंगाल की राजनीति को आने वाले महीनों में पूरी तरह बदल सकता है।  

Deepshikha जून 16, 2026 0
Security personnel deployed outside NCPI office in Howrah after 22 rebel TMC MPs claimed to join the little-known political party.
TMC के 22 बागी सांसदों के एनसीपीआई में शामिल होने के बाद संकराईल स्थित पार्टी कार्यालय की सुरक्षा बढ़ी, केंद्रीय बल तैनात

  हावड़ा: पश्चिम बंगाल की राजनीति में आए बड़े घटनाक्रम के बीच तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 22 बागी सांसदों के नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में शामिल होने के दावे के बाद हावड़ा जिले के संकराईल स्थित पार्टी कार्यालय की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। किसी भी अप्रिय घटना और संभावित राजनीतिक तनाव को देखते हुए कार्यालय के बाहर केंद्रीय बलों की तैनाती की गई है। हावड़ा के हाटगाछा-बाणीपुर इलाके में स्थित एनसीपीआई कार्यालय के बाहर सोमवार से सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई। स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। अचानक चर्चा में आया छोटा राजनीतिक दल एनसीपीआई अब तक एक अपेक्षाकृत छोटी और गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी के रूप में जानी जाती रही है। लेकिन तृणमूल कांग्रेस के 22 बागी सांसदों के इसमें शामिल होने के दावे के बाद यह पार्टी अचानक पश्चिम बंगाल की राजनीति के केंद्र में आ गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि बागी सांसदों का दावा औपचारिक रूप से आगे बढ़ता है, तो इससे पश्चिम बंगाल की सियासत में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। पहले एनजीओ का कार्यालय था वर्तमान पार्टी ऑफिस जानकारी के अनुसार, जिस भवन को वर्तमान में एनसीपीआई का पार्टी कार्यालय बनाया गया है, वहां पहले एक गैर-सरकारी संगठन (NGO) का कार्यालय संचालित होता था। बाद में इसे पार्टी के कार्यालय के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा। अचानक बढ़ी राजनीतिक गतिविधियों और मीडिया की नजरों के बाद इस कार्यालय की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया गया है। 2022 से मौजूद है पार्टी कार्यालय एनसीपीआई नेता शिउली कुंडू की बड़ी बेटी दीपनिता कुंडू ने बताया कि पार्टी का कार्यालय वर्ष 2022 से संकराईल में संचालित हो रहा है। उन्होंने कहा, "हमारा पार्टी कार्यालय 2022 से यहां है। वर्ष 2023 में मैंने एनसीपीआई की उम्मीदवार के रूप में संकराईल के जोरहाट ग्राम पंचायत चुनाव में हिस्सा लिया था, लेकिन चुनाव हार गई थी।" दीपनिता ने कहा कि पार्टी लंबे समय से संगठन विस्तार का प्रयास कर रही थी, लेकिन किसी ने कल्पना नहीं की थी कि एक दिन यह राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक चर्चा का विषय बन जाएगी। पंचायत चुनाव में उतारे थे उम्मीदवार त्रिपुरा में पंजीकृत एनसीपीआई ने वर्ष 2023 में पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव में भी अपने उम्मीदवार मैदान में उतारे थे। पार्टी को उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली। पार्टी का संगठन सीमित क्षेत्रों तक ही सिमटा रहा और उसका राजनीतिक प्रभाव बेहद कम माना जाता था। त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भी नहीं मिली सफलता एनसीपीआई ने वर्ष 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में चार सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। इनमें चावमानु, अंबासा और कैलाशहर जैसी सीटें शामिल थीं। लेकिन पार्टी का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। अधिकांश सीटों पर उसके उम्मीदवारों को नोटा (NOTA) के बराबर या उससे भी कम वोट मिले। उस समय पार्टी को एक छोटे क्षेत्रीय दल के रूप में देखा जाता था। अब सबसे ज्यादा सांसदों वाली पार्टी बनने का दावा राजनीतिक घटनाक्रम ने तब नया मोड़ ले लिया, जब तृणमूल कांग्रेस के 22 बागी सांसदों ने एनसीपीआई में शामिल होने का दावा किया। यदि यह दावा संवैधानिक और संसदीय प्रक्रियाओं में स्वीकार होता है, तो एक ऐसी पार्टी, जिसका चुनावी प्रदर्शन अब तक बेहद सीमित रहा है, अचानक लोकसभा में महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज करा सकती है। इसी संभावना को देखते हुए संकराईल स्थित पार्टी कार्यालय के बाहर सुरक्षा बढ़ा दी गई है और प्रशासन किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह सतर्क है। राजनीतिक महत्व तृणमूल कांग्रेस के भीतर बढ़ती असंतुष्टि, बागी सांसदों के अलग गुट के दावे और एनसीपीआई जैसे छोटे दल का अचानक राष्ट्रीय राजनीति में उभरना पश्चिम बंगाल की राजनीति के लिए एक बड़ा घटनाक्रम माना जा रहा है। आने वाले दिनों में लोकसभा में मान्यता, अलग बैठने की व्यवस्था और संभावित राजनीतिक पुनर्संरचना को लेकर स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।  

Deepshikha जून 16, 2026 0
Rebel TMC MPs announce merger with NCPI, triggering political turmoil in West Bengal and national attention.
‘दलबदलुओं को नकारें’ का नारा देने वाली पार्टी में शामिल हुए TMC के 20 बागी सांसद, जानिए क्या है NCPI और क्यों अचानक चर्चा में आ गई?

  नई दिल्ली/कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में रविवार को उस समय बड़ा राजनीतिक भूचाल आ गया, जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी लोकसभा सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय का दावा कर दिया। यह वही पार्टी है, जिसने वर्ष 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में ‘दलबदलुओं को नकारें’ के नारे के साथ चुनाव लड़ा था। अब एक छोटे और लगभग गुमनाम राजनीतिक दल का अचानक राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आना कई सवाल खड़े कर रहा है। क्या है NCPI? नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है। निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड के मुताबिक, पार्टी का पंजीकृत कार्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के संकराईल में स्थित है और इसकी अध्यक्ष शेउली कुंडू हैं। पार्टी लंबे समय तक राजनीतिक रूप से हाशिये पर रही और उसका प्रभाव किसी भी राज्य में उल्लेखनीय नहीं रहा। TMC के बागी सांसदों के विलय के दावे के बाद अचानक यह दल राष्ट्रीय राजनीतिक चर्चाओं में आ गया है। ‘दलबदलुओं को नकारें’ था पार्टी का प्रमुख नारा NCPI ने 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के दौरान अपने प्रचार अभियान में नारा दिया था: "अपने अधिकारों की रक्षा के लिए राजनीतिक दलबदलुओं को नकारें, समाजसेवियों का समर्थन करें।" पार्टी ने खुद को राजनीतिक अवसरवाद और दल-बदल की राजनीति के खिलाफ एक विकल्प के रूप में पेश किया था। ऐसे में अब उसी पार्टी में बड़े पैमाने पर बागी सांसदों के शामिल होने का दावा राजनीतिक विडंबना के रूप में देखा जा रहा है। त्रिपुरा चुनाव में बेहद कमजोर रहा प्रदर्शन NCPI ने वर्ष 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में महज चार सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। इनमें चावमानु, अंबासा और कैलाशहर जैसी सीटें शामिल थीं।  

Deepshikha जून 16, 2026 0
NCPI Party
TMC के 20 बागी सांसदों का NCPI में विलय

कोलकाता, एजेंसियां। तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों का विलय NCPI में हो गया है।  विलय के बाद नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) चर्चा में है। रिकॉर्ड के अनुसार, 3 साल पहले 2023 में बंगाल के उत्तिया कुंडू और शेउली कुंडू नाम के कपल ने पार्टी की नींव रखी थी। NCPI के डॉक्यूमेंट्स में उत्तिया कुंडू पार्टी के अध्यक्ष हैं। पत्नी शेउली का नाम कोषाध्यक्ष के रूप में दर्ज है। NCPI अध्यक्ष उत्तिया ने 13 मई को फेसबुक पर बंगाल CM शुभेंदु अधिकारी के साथ अपनी फोटो शेयर करते हुए उन्हें मुख्यमंत्री बनने पर बधाई दी थी। पति-पत्नी की है पार्टी हावड़ा में NCPI का ऑफिस है, जहां सोमवार को सुरक्षाबलों की तैनाती दिखी। ऑफिस के गेट पर उत्तिया ने खुद को बंगाली न्यूजपेपर का एडिटर और टीचर बताया है। उनकी पत्नी शेउली के नाम के नीचे कलकत्ता हाईकोर्ट की वकील लिखा है। NCPI बंगाल में रजिस्टर्ड, त्रिपुरा से चुनावी शुरुआत की NCPI का रजिस्टर्ड पता पश्चिम बंगाल के हावड़ा के बानीपुर इलाके में है। पार्टी ने 2023 में त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में चार उम्मीदवार उतारे थे। लेकिन, उसके उम्मीदवार या तो NOTA से पीछे रहे या फिर उससे थोड़ा ज्यादा वोट हासिल कर पाए। पार्टी को कुल मिलाकर लगभग 1,198 वोट मिले थे। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार पार्टी को ₹1.13 लाख का चंदा मिला था। NCPI के चुनावी पोस्टरों में नारा था- अपने अधिकारों को बचाने के लिए दलबदलुओं को नकारें। त्रिपुरा चुनाव के बाद गायब हो गई थी पार्टी न्यूज एजेंसी PTI के अनुसार, NCPI ने 2023 में त्रिपुरा के चावामानु से बरजेडा त्रिपुरा को उम्मीदवार बनाया था। बरजेडा को 536 वोट मिले थे। TMC के बागी सांसदों के साथ विलय की बात सुनकर वे हैरान रह गए। उन्होंने बताया कि वे दिहाड़ी मजदूर हैं। चुनाव के बाद उनका पार्टी से संपर्क खत्म हो गया था। NDTV की रिपोर्ट के अनुसार, त्रिपुरा के कैलाशहर से NCPI उम्मीदवार रहे जहांगीर अली ने बताया कि 2023 चुनाव के दौरान शेउली कुंडू कोलकाता से आई थीं और उम्मीदवारों से संपर्क किया था। चुनाव खत्म होने के बाद पार्टी ने गतिविधियां बंद कर दीं और संपर्क भी टूट गया। बागी TMC सांसद बोले- NDA के साथ काम करेंगे TMC के 28 में से 20 लोकसभा सांसदों ने त्रिपुरा की नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी (NCPI) में विलय की घोषणा की। बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मिलकर सदन में अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की। मान्यता के लिए स्पीकर को पत्र सौंपा लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात के बाद बागी सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने कहा कि TMC के दो-तिहाई लोकसभा सांसदों ने अलग गुट के रूप में मान्यता देने के लिए पत्र सौंपा है। उन्होंने कहा- हम PM मोदी के नेतृत्व में NDA के साथ काम करेंगे। बिरला से TMC के बागी सांसदों की मुलाकात की जो फोटो सामने आई है, उसमें 17 TMC सांसद दिख रहे हैं। स्पीकर से मुलाकात से पहले सांसदों ने बंगाल भाजपा प्रभारी और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के साथ बैठक की थी।

abhishek singh जून 16, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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US-Saudi Strike: इराक में अमेरिका-सऊदी की संयुक्त कार्रवाई, 4 IRGC जवानों की मौत का दावा; पश्चिम एशिया में बढ़ा तनाव

kalpana जुलाई 30, 2026 0