राजनीति

20 Rebel TMC MPs Claim Merger With NCPI

‘दलबदलुओं को नकारें’ का नारा देने वाली पार्टी में शामिल हुए TMC के 20 बागी सांसद, जानिए क्या है NCPI और क्यों अचानक चर्चा में आ गई?

Deepshikha जून 16, 2026 0
Rebel TMC MPs announce merger with NCPI, triggering political turmoil in West Bengal and national attention.
TMC Rebel MPs Merge With NCPI Amid Bengal Political Crisis

 

नई दिल्ली/कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में रविवार को उस समय बड़ा राजनीतिक भूचाल आ गया, जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी लोकसभा सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय का दावा कर दिया। यह वही पार्टी है, जिसने वर्ष 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में दलबदलुओं को नकारें के नारे के साथ चुनाव लड़ा था। अब एक छोटे और लगभग गुमनाम राजनीतिक दल का अचानक राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आना कई सवाल खड़े कर रहा है।

क्या है NCPI?

नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है। निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड के मुताबिक, पार्टी का पंजीकृत कार्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के संकराईल में स्थित है और इसकी अध्यक्ष शेउली कुंडू हैं।

पार्टी लंबे समय तक राजनीतिक रूप से हाशिये पर रही और उसका प्रभाव किसी भी राज्य में उल्लेखनीय नहीं रहा। TMC के बागी सांसदों के विलय के दावे के बाद अचानक यह दल राष्ट्रीय राजनीतिक चर्चाओं में आ गया है।

‘दलबदलुओं को नकारें’ था पार्टी का प्रमुख नारा

NCPI ने 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के दौरान अपने प्रचार अभियान में नारा दिया था:

"अपने अधिकारों की रक्षा के लिए राजनीतिक दलबदलुओं को नकारें, समाजसेवियों का समर्थन करें।"

पार्टी ने खुद को राजनीतिक अवसरवाद और दल-बदल की राजनीति के खिलाफ एक विकल्प के रूप में पेश किया था। ऐसे में अब उसी पार्टी में बड़े पैमाने पर बागी सांसदों के शामिल होने का दावा राजनीतिक विडंबना के रूप में देखा जा रहा है।

त्रिपुरा चुनाव में बेहद कमजोर रहा प्रदर्शन

NCPI ने वर्ष 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में महज चार सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। इनमें चावमानु, अंबासा और कैलाशहर जैसी सीटें शामिल थीं।

 

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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Farmers drive tractors during the Kisan Adhikar Rally from Ahmedabad to Gandhinagar demanding MSP and land rights.
गुजरात में किसानों के मुद्दे पर कांग्रेस का बीजेपी पर हमला, ‘किसान अधिकार ट्रैक्टर रैली’ से गरमाई सियासत

  अहमदाबाद: गुजरात में किसानों के मुद्दों को लेकर सियासत तेज हो गई है। अहमदाबाद से गांधीनगर तक निकाली गई ‘किसान अधिकार ट्रैक्टर रैली’ के बीच कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार पर किसानों की जमीन हड़पने और उनकी आवाज दबाने का आरोप लगाया है। Amit Chavda ने भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि गुजरात में किसानों के साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा है, जैसा अंग्रेजी शासन के दौरान होता था। ‘अंग्रेजों जैसी नीतियों पर चल रही है बीजेपी’ अमित चावड़ा ने कहा, “गुजरात में अंग्रेजों जैसा राज चल रहा है। भाजपा सरकार अंग्रेजों की नीतियों पर चलकर किसानों की जमीनें छीनने का काम कर रही है। पुलिस और प्रशासन का इस्तेमाल करके किसानों की आवाज दबाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन कांग्रेस ऐसा नहीं होने देगी।” उन्होंने दावा किया कि किसानों को अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से गांधीनगर मार्च करने से रोका जा रहा है। किसान संघर्ष समिति की ट्रैक्टर रैली किसान संघर्ष समिति के संयुक्त नेतृत्व में सोमवार को अहमदाबाद से गांधीनगर तक ‘किसान अधिकार ट्रैक्टर रैली’ निकाली गई। सैकड़ों ट्रैक्टरों के साथ बड़ी संख्या में किसान इस रैली में शामिल हुए और ‘जय जवान, जय किसान’ के नारे लगाए। किसानों का कहना है कि सरकार उनकी समस्याओं पर ध्यान नहीं दे रही है, जिसके कारण उन्हें सड़क पर उतरकर आंदोलन करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। किसानों की प्रमुख मांगें प्रदर्शनकारी किसानों ने सरकार के सामने कई मांगें रखीं, जिनमें शामिल हैं— न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी। भूमि अधिग्रहण पर रोक। बिजली ट्रांसमिशन लाइनों से प्रभावित किसानों को वर्तमान जंत्री दर का 200 प्रतिशत तक मुआवजा। कृषि ऋण माफी। बिजली मीटर और बिलिंग व्यवस्था में सुधार। किसानों के हित में कृषि नीतियों में बदलाव। आंदोलन तेज करने की चेतावनी किसान नेताओं ने कहा कि यदि सरकार उनकी मांगों पर जल्द कोई ठोस निर्णय नहीं लेती है, तो आंदोलन को और व्यापक बनाया जाएगा। उनका कहना है कि यह केवल मुआवजे या एमएसपी का मुद्दा नहीं, बल्कि किसानों के अस्तित्व और अधिकारों की लड़ाई है। कांग्रेस ने दिया किसानों को समर्थन किसान कांग्रेस और किसान संघर्ष समिति ने रैली को समर्थन देते हुए कहा कि किसानों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रहेगा। कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार किसानों की समस्याओं को सुनने के बजाय प्रशासनिक दबाव बनाकर आंदोलन को कमजोर करने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस के आरोपों और ट्रैक्टर रैली को लेकर भाजपा सरकार की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसानों के मुद्दों को लेकर शुरू हुई यह सियासी जंग आने वाले समय में गुजरात की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकती है, खासकर तब जब भूमि अधिग्रहण, मुआवजा और एमएसपी जैसे प्रश्न सीधे ग्रामीण और कृषि समुदाय को प्रभावित करते हैं।  

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TMC के 22 बागी सांसदों के एनसीपीआई में शामिल होने के बाद संकराईल स्थित पार्टी कार्यालय की सुरक्षा बढ़ी, केंद्रीय बल तैनात

  हावड़ा: पश्चिम बंगाल की राजनीति में आए बड़े घटनाक्रम के बीच तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 22 बागी सांसदों के नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में शामिल होने के दावे के बाद हावड़ा जिले के संकराईल स्थित पार्टी कार्यालय की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। किसी भी अप्रिय घटना और संभावित राजनीतिक तनाव को देखते हुए कार्यालय के बाहर केंद्रीय बलों की तैनाती की गई है। हावड़ा के हाटगाछा-बाणीपुर इलाके में स्थित एनसीपीआई कार्यालय के बाहर सोमवार से सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई। स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। अचानक चर्चा में आया छोटा राजनीतिक दल एनसीपीआई अब तक एक अपेक्षाकृत छोटी और गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी के रूप में जानी जाती रही है। लेकिन तृणमूल कांग्रेस के 22 बागी सांसदों के इसमें शामिल होने के दावे के बाद यह पार्टी अचानक पश्चिम बंगाल की राजनीति के केंद्र में आ गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि बागी सांसदों का दावा औपचारिक रूप से आगे बढ़ता है, तो इससे पश्चिम बंगाल की सियासत में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। पहले एनजीओ का कार्यालय था वर्तमान पार्टी ऑफिस जानकारी के अनुसार, जिस भवन को वर्तमान में एनसीपीआई का पार्टी कार्यालय बनाया गया है, वहां पहले एक गैर-सरकारी संगठन (NGO) का कार्यालय संचालित होता था। बाद में इसे पार्टी के कार्यालय के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा। अचानक बढ़ी राजनीतिक गतिविधियों और मीडिया की नजरों के बाद इस कार्यालय की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया गया है। 2022 से मौजूद है पार्टी कार्यालय एनसीपीआई नेता शिउली कुंडू की बड़ी बेटी दीपनिता कुंडू ने बताया कि पार्टी का कार्यालय वर्ष 2022 से संकराईल में संचालित हो रहा है। उन्होंने कहा, "हमारा पार्टी कार्यालय 2022 से यहां है। वर्ष 2023 में मैंने एनसीपीआई की उम्मीदवार के रूप में संकराईल के जोरहाट ग्राम पंचायत चुनाव में हिस्सा लिया था, लेकिन चुनाव हार गई थी।" दीपनिता ने कहा कि पार्टी लंबे समय से संगठन विस्तार का प्रयास कर रही थी, लेकिन किसी ने कल्पना नहीं की थी कि एक दिन यह राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक चर्चा का विषय बन जाएगी। पंचायत चुनाव में उतारे थे उम्मीदवार त्रिपुरा में पंजीकृत एनसीपीआई ने वर्ष 2023 में पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव में भी अपने उम्मीदवार मैदान में उतारे थे। पार्टी को उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली। पार्टी का संगठन सीमित क्षेत्रों तक ही सिमटा रहा और उसका राजनीतिक प्रभाव बेहद कम माना जाता था। त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भी नहीं मिली सफलता एनसीपीआई ने वर्ष 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में चार सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। इनमें चावमानु, अंबासा और कैलाशहर जैसी सीटें शामिल थीं। लेकिन पार्टी का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। अधिकांश सीटों पर उसके उम्मीदवारों को नोटा (NOTA) के बराबर या उससे भी कम वोट मिले। उस समय पार्टी को एक छोटे क्षेत्रीय दल के रूप में देखा जाता था। अब सबसे ज्यादा सांसदों वाली पार्टी बनने का दावा राजनीतिक घटनाक्रम ने तब नया मोड़ ले लिया, जब तृणमूल कांग्रेस के 22 बागी सांसदों ने एनसीपीआई में शामिल होने का दावा किया। यदि यह दावा संवैधानिक और संसदीय प्रक्रियाओं में स्वीकार होता है, तो एक ऐसी पार्टी, जिसका चुनावी प्रदर्शन अब तक बेहद सीमित रहा है, अचानक लोकसभा में महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज करा सकती है। इसी संभावना को देखते हुए संकराईल स्थित पार्टी कार्यालय के बाहर सुरक्षा बढ़ा दी गई है और प्रशासन किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह सतर्क है। राजनीतिक महत्व तृणमूल कांग्रेस के भीतर बढ़ती असंतुष्टि, बागी सांसदों के अलग गुट के दावे और एनसीपीआई जैसे छोटे दल का अचानक राष्ट्रीय राजनीति में उभरना पश्चिम बंगाल की राजनीति के लिए एक बड़ा घटनाक्रम माना जा रहा है। आने वाले दिनों में लोकसभा में मान्यता, अलग बैठने की व्यवस्था और संभावित राजनीतिक पुनर्संरचना को लेकर स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।  

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बीमारी का बहाना बनाकर दिल्ली में गद्दारी! महुआ मोइत्रा का सुदीप बंद्योपाध्याय पर हमला, बोलीं- मुखौटा और विग दोनों उतर गए
बीमारी का बहाना बनाकर दिल्ली में गद्दारी! महुआ मोइत्रा का सुदीप बंद्योपाध्याय पर हमला, बोलीं- मुखौटा और विग दोनों उतर गए

  तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में जारी अंदरूनी संकट और बगावत के बीच पार्टी सांसद महुआ मोइत्रा ने वरिष्ठ नेता सुदीप बंद्योपाध्याय पर तीखा हमला बोला है। महुआ ने आरोप लगाया कि सुदीप बंद्योपाध्याय ने बीमारी का बहाना बनाकर पार्टी नेतृत्व को गुमराह किया और बाद में दिल्ली जाकर केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से मुलाकात की। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए महुआ मोइत्रा ने सुदीप बंद्योपाध्याय के पुराने राजनीतिक विवादों का जिक्र करते हुए उन पर विश्वासघात का आरोप लगाया। 'बीमारी का बहाना, दिल्ली में मुलाकात' महुआ मोइत्रा ने लिखा, "दादा सुदीप बंद्योपाध्याय, आपको 2017 में रोज वैली घोटाले में गिरफ्तार किया गया था। तब भी आपने बीमारी का सहारा लिया था। इस बार भी बीमारी का बहाना बनाकर दिल्ली जाकर गद्दारी की। तापस रॉय और कुणाल घोष आपके बारे में सही थे, गलती हमारी थी।" उन्होंने दावा किया कि सुदीप बंद्योपाध्याय ने पार्टी नेताओं को बताया था कि पेट संबंधी समस्या के कारण उन्हें कोलकाता के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया है। लेकिन बाद में उन्हें टीवी चैनलों पर दिल्ली में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर देखा गया। महुआ ने अपने पोस्ट में कटाक्ष करते हुए लिखा, "उनका मुखौटा और उनकी विग दोनों उतर गए। दादा, अब कम से कम अपना एक्स हैंडल बदलकर 'सुदीप बीजेपी बी टीम' कर लीजिए। हमारे नाम का इस्तेमाल मत कीजिए।" कुणाल घोष ने भी साधा निशाना टीएमसी नेता कुणाल घोष ने भी सुदीप बंद्योपाध्याय की आलोचना करते हुए कहा कि उनका राजनीतिक इतिहास दल बदलने से जुड़ा रहा है। उन्होंने कहा, "ममता दीदी ने इन लोगों को पद, सम्मान और पहचान दी, लेकिन बदले में उन्हें यही मिला। सुदीप बंद्योपाध्याय की राजनीति हमेशा ममता बनर्जी को गुमराह करने की रही है। मैंने पहले भी इस बारे में चेतावनी दी थी, जिसके कारण मुझे पार्टी से निलंबित तक होना पड़ा।" ममता को 'चीफ एडवाइजर' बनाने के बयान से बढ़ा विवाद विवाद तब और गहरा गया जब सुदीप बंद्योपाध्याय ने एक बांग्ला न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा कि टीएमसी के अधिकांश सांसद और विधायक चाहते हैं कि पार्टी का संगठन बचा रहे और ममता बनर्जी को 'मुख्य सलाहकार' (Chief Advisor) की भूमिका में रखा जाए। उन्होंने कहा कि बागी नेताओं ने उनसे आग्रह किया कि ममता बनर्जी को सम्मानपूर्वक मार्गदर्शक की भूमिका दी जाए, जिससे वह भावुक हो गए और बागी गुट के साथ जाने का फैसला किया। उनके इस बयान पर टीएमसी नेता कल्याण बनर्जी ने भी नाराजगी जताई और कहा कि ममता बनर्जी ने ही सुदीप बंद्योपाध्याय को राजनीति में स्थापित किया, संकट के समय उनका साथ दिया और आज वही उन्हें 'सलाहकार' बनाने की बात कर रहे हैं। बागी सांसदों के दावे से बढ़ी सियासी हलचल टीएमसी में मतभेदों की खबरों के बीच यह दावा भी किया जा रहा है कि लोकसभा में पार्टी के 20 सांसदों ने अलग समूह बना लिया है और वे खुद को 'वास्तविक टीएमसी' का प्रतिनिधि बता रहे हैं। बागी सांसद काकोली घोष दस्तिदार ने दावा किया है कि 20 सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय कर लिया है और यह नया समूह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को समर्थन देगा। इन दावों और आरोपों पर सुदीप बंद्योपाध्याय की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं, टीएमसी के भीतर जारी सियासी उठापटक ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है।  

Deepshikha जून 15, 2026 0
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