नई दिल्ली: लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 20 सांसदों के बागी रुख अपनाने और नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय के ऐलान के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। इस बीच बागी सांसदों ने साफ किया है कि उनका संघर्ष ममता बनर्जी के खिलाफ नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर विकसित हुई कार्यशैली और नेतृत्व के तौर-तरीकों के खिलाफ है। 'ममता बनर्जी के प्रति सम्मान हमेशा रहेगा' लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात के बाद बागी गुट के एक वरिष्ठ सांसद ने कहा कि ममता बनर्जी उनके राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं और उनके प्रति सम्मान हमेशा बना रहेगा। उन्होंने कहा, "ममता बनर्जी हमारी नेता रही हैं। उन्होंने कई नेताओं को राजनीति में आगे बढ़ने का अवसर दिया। उनके प्रति हमारे मन में सम्मान हमेशा रहेगा, लेकिन अब बंगाल के विकास और नई दिशा के लिए काम करने का समय है।" 'बंगाल के विकास के लिए दिल्ली के साथ मिलकर काम करना होगा' बागी सांसद ने कहा कि वर्ष 2026 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद राज्य के विकास को प्राथमिकता देना जरूरी हो गया है। उनका दावा है कि कई केंद्रीय योजनाओं का लाभ राज्य के लोगों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाया। उन्होंने कहा कि बंगाल के विकास को गति देने के लिए केंद्र और राज्य के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है और अब दिल्ली के साथ मिलकर काम करने की जरूरत है। 'लड़ाई ममता से नहीं, पार्टी के भीतर के कॉर्पोरेट कल्चर से' बागी गुट के नेताओं का कहना है कि उनका विरोध ममता बनर्जी से नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर कथित तौर पर विकसित हुए केंद्रीकृत और कॉर्पोरेट शैली के प्रबंधन से है। उनका आरोप है कि पिछले कुछ वर्षों में पार्टी के सांसदों और विधायकों की भूमिका सीमित हो गई थी और फैसलों में उनकी भागीदारी कम हो गई थी। अभिषेक बनर्जी के करीबियों पर भी उठाए सवाल बागी नेताओं ने दावा किया कि पार्टी के भीतर कुछ नेताओं और प्रभावशाली समूहों के बढ़ते प्रभाव से पुराने और वरिष्ठ नेताओं में असंतोष बढ़ रहा था। उनका कहना है कि यही असंतोष धीरे-धीरे बड़े राजनीतिक बदलाव का कारण बना। इन आरोपों पर टीएमसी की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा के 18 जून से शुरू होने वाले बजट सत्र से पहले तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की आंतरिक कलह और गहरा गई है। विधानसभा की सर्वदलीय और कार्य मंत्रणा समिति की बैठक में पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार एवं ममता बनर्जी के करीबी नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय को आमंत्रित नहीं किया गया, जबकि बागी गुट के नेता रीतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के तौर पर बैठक में शामिल होने का निमंत्रण भेजा गया। इस घटनाक्रम को विधानसभा के भीतर बदलते सियासी समीकरणों और बागी गुट की बढ़ती ताकत के रूप में देखा जा रहा है। रीतब्रत को मिली मान्यता, शोभनदेव रहे बाहर विधानसभा सूत्रों के अनुसार, सर्वदलीय बैठक के लिए जारी सूची में शोभनदेव चट्टोपाध्याय और बेलेघाटा से विधायक कुणाल घोष का नाम शामिल नहीं था। इसके विपरीत, हाल ही में विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र नाथ बसु द्वारा विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता प्राप्त रीतब्रत बनर्जी को बैठक के लिए आमंत्रित किया गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम संकेत देता है कि विधानसभा प्रशासन सदन के भीतर उभरी नई संख्या-स्थिति को स्वीकार करने लगा है। बागी गुट के साथ 65 विधायक तृणमूल कांग्रेस के भीतर शुरू हुई बगावत अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। कुछ दिन पहले पार्टी के 80 में से 58 विधायकों ने पार्टी नेतृत्व के फैसले को खारिज करते हुए विपक्ष के नेता पद के लिए रीतब्रत बनर्जी के दावे का समर्थन किया था। अब बागी गुट का दावा है कि उसके समर्थन में 65 विधायक हैं, जिससे विधानसभा में रीतब्रत की स्थिति और मजबूत हुई है। सर्वदलीय बैठक में शामिल हुए अन्य विपक्षी नेता सर्वदलीय बैठक में विभिन्न विपक्षी दलों के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया। इनमें शामिल थे: नौशाद सिद्दीकी हुमायूं कबीर मुस्तफिजुर रहमान संसद से विधानसभा तक टीएमसी में संकट विधानसभा में बढ़ते संकट के बीच तृणमूल कांग्रेस को संसद में भी बड़ा झटका लग चुका है। हाल ही में पार्टी के 28 में से 20 लोकसभा सांसदों ने पार्टी से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय का फैसला किया और भाजपा नीत एनडीए को समर्थन देने की घोषणा की। बजट सत्र से पहले बढ़ा सियासी तापमान बंगाल विधानसभा का बजट सत्र 18 जून से शुरू हो रहा है। उससे पहले विपक्ष के नेतृत्व को लेकर छिड़ी लड़ाई ने राज्य की राजनीति को नई दिशा दे दी है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि विधानसभा के भीतर बदलते संख्या बल और टीएमसी की आंतरिक टूट का असर आगामी सत्र की कार्यवाही और पश्चिम बंगाल की राजनीति पर किस रूप में पड़ता है।
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में मचे सियासी घमासान के बीच पार्टी के वरिष्ठ सांसद सौगत रॉय ने बागी सांसदों पर तीखा हमला बोला है। मंगलवार को उन्होंने एनसीपीआई (नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया) में विलय करने वाले 20 सांसदों को ‘गद्दारों का समूह’ करार देते हुए कहा कि असली तृणमूल कांग्रेस का नेतृत्व ममता बनर्जी कर रही हैं और बागी गुट भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के इशारे पर काम कर रहा है। ‘दो टीमें हैं- एक तृणमूल की, दूसरी गद्दारों की’ सौगत रॉय ने कहा कि वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति में दो अलग-अलग टीमें दिखाई दे रही हैं। एक टीम तृणमूल कांग्रेस की है, जिसका नेतृत्व ममता बनर्जी कर रही हैं, जबकि दूसरी ‘गद्दारों की टीम’ है, जो एनडीए के साथ खड़ी है। उन्होंने कहा, “तृणमूल कांग्रेस विपक्षी इंडिया गठबंधन का हिस्सा है। हमारी पार्टी का चुनाव चिह्न ‘जोड़ा फूल’ है, जबकि गद्दारों की टीम का नेतृत्व नरेंद्र मोदी कर रहे हैं।” एनसीपीआई में विलय के दावे पर बरसे रॉय टीएमसी के बागी गुट ने दावा किया है कि उसे लोकसभा में पार्टी के दो-तिहाई सांसदों का समर्थन प्राप्त है और उसने एनसीपीआई में विलय का फैसला किया है। इसी दावे पर प्रतिक्रिया देते हुए सौगत रॉय ने कहा कि पार्टी छोड़ने वाले सांसद जनादेश और पार्टी की विचारधारा से विश्वासघात कर रहे हैं। ‘एजेंसियों के दुरुपयोग के बावजूद टीएमसी को मिला 41 फीसदी वोट’ वरिष्ठ टीएमसी नेता ने कहा कि हालिया पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा द्वारा केंद्रीय एजेंसियों के कथित दुरुपयोग और राजनीतिक दबाव के बावजूद तृणमूल कांग्रेस को करीब 41 प्रतिशत वोट मिले। उन्होंने कहा, “भाजपा ने सभी एजेंसियों का इस्तेमाल किया, लेकिन इसके बावजूद जनता ने तृणमूल कांग्रेस पर भरोसा जताया और हमें लगभग 41 फीसदी मत मिले।” क्या है एनसीपीआई? नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) एक अपेक्षाकृत नया राजनीतिक दल है, जिसे वर्ष 2023 में निर्वाचन आयोग में पंजीकृत किया गया था। टीएमसी के बागी सांसदों द्वारा इसी पार्टी में विलय की घोषणा के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है।
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में जारी सियासी संकट के बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला बागी सांसदों और ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले टीएमसी गुट, दोनों पक्षों को सुनने के बाद ही कोई फैसला लेंगे। सूत्रों के अनुसार, टीएमसी से अलग हुए 20 सांसदों ने खुद को अलग समूह के रूप में मान्यता देने और नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय का दावा करते हुए लोकसभा में अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की है। बागी सांसदों ने किया एनसीपीआई में विलय का दावा बागी गुट की नेता काकोली घोष दस्तीदार ने बताया कि लोकसभा अध्यक्ष को सौंपे गए ज्ञापन पर 20 सांसदों के हस्ताक्षर हैं। उन्होंने दावा किया कि सांसदों ने एनसीपीआई में विलय का फैसला किया है और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को समर्थन देने का निर्णय लिया है। टीएमसी का आरोप- केवल दो घंटे पहले दी गई मुलाकात की सूचना ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी ने आरोप लगाया कि पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात की सूचना केवल दो घंटे पहले दी गई। टीएमसी सूत्रों के मुताबिक, सोमवार दोपहर करीब दो बजे लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय की ओर से ई-मेल भेजकर शाम चार बजे मुलाकात के लिए कहा गया था। उस समय अभिषेक बनर्जी कोलकाता स्थित ईडी कार्यालय में पूछताछ में सहयोग कर रहे थे। कीर्ति आजाद ने स्पीकर कार्यालय को दी जानकारी सूत्रों के अनुसार, टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद ने लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय को सूचित किया कि अभिषेक बनर्जी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच में शामिल हैं और निर्धारित समय पर उपस्थित नहीं हो पाएंगे। बाद में आजाद ने स्वयं स्पीकर से मुलाकात कर स्थिति से अवगत कराया। कानूनी राय ले सकते हैं लोकसभा अध्यक्ष संसद से जुड़े सूत्रों का कहना है कि लोकसभा अध्यक्ष इस पूरे मामले पर केंद्रीय विधि मंत्रालय और संवैधानिक विशेषज्ञों की राय ले सकते हैं। इस मुद्दे पर कोई भी निर्णय संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले लिया जा सकता है, जो आमतौर पर जुलाई के तीसरे सप्ताह में शुरू होता है। संविधान विशेषज्ञों ने उठाए सवाल लोकसभा के पूर्व महासचिव और संविधान विशेषज्ञ पीडीटी आचारी का कहना है कि संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुसार किसी राजनीतिक दल का विलय केवल राजनीतिक संगठन स्तर पर हो सकता है। सांसद या विधायक अपने स्तर पर किसी दूसरी पार्टी में विलय नहीं कर सकते। वहीं, निर्वाचन आयोग के एक पूर्व अधिकारी ने टीएमसी के बागी सांसदों द्वारा एनसीपीआई में विलय की योजना को "असामान्य और कानूनी रूप से जटिल" बताया है। उनका कहना है कि ऐसी स्थिति का स्पष्ट उल्लेख न तो दलबदल विरोधी कानून में है और न ही जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में मिलता है। क्या है एनसीपीआई? नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) ने जनवरी 2023 में खुद को एक राजनीतिक दल के रूप में पंजीकृत कराया था। निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार, इसका मुख्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के संकराईल में स्थित है और राष्ट्रीय राजनीति में इसकी मौजूदगी अब तक सीमित रही है। क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला? अगर बागी सांसदों को अलग समूह के रूप में मान्यता मिलती है, तो यह पश्चिम बंगाल की राजनीति और लोकसभा में टीएमसी की स्थिति पर बड़ा असर डाल सकता है। वहीं, स्पीकर का फैसला दलबदल विरोधी कानून की व्याख्या और संसदीय परंपराओं के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा भूचाल आ गया है। Mamata Banerjee के नेतृत्व वाली All India Trinamool Congress (टीएमसी) के 20 बागी सांसदों ने पार्टी से अलग होकर Nationalist Citizens Party of India (एनसीपीआई) में विलय का ऐलान कर दिया है। इतना ही नहीं, बागी गुट अब तृणमूल कांग्रेस के चुनाव चिह्न 'जोड़ाफूल' (दो फूल) पर भी दावा करने की तैयारी में है। तृणमूल के बागी सांसद Arup Chakraborty ने सोमवार को दावा किया कि उन्होंने पार्टी नहीं छोड़ी है, बल्कि पार्टी को "सुधारने" की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा, "एक नया खेल शुरू हो गया है… खेला होबे।" 'हम ही असली तृणमूल हैं' अरूप चक्रवर्ती ने कहा कि बागी सांसद ही असली तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनके पास पार्टी के 20 सांसदों का समर्थन है। उन्होंने कहा, "हमने तृणमूल नहीं छोड़ी है। हम तृणमूल में ही हैं और पार्टी को ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं। पार्टी को नुकसान क्यों पहुंचा, इस पर कोई चर्चा नहीं हो रही है। हमारे पास 20 सांसद हैं, इसलिए हम चुनाव चिह्न के लिए कानूनी लड़ाई लड़ेंगे।" उन्होंने यह भी दावा किया कि इस राजनीतिक बदलाव से पश्चिम बंगाल में विकास और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। ममता बनर्जी पर साधा निशाना अरूप चक्रवर्ती ने कहा कि ममता बनर्जी डरी हुई हैं और पार्टी की बैठक तक बुलाने की स्थिति में नहीं हैं। उन्होंने आरोप लगाया, "ममता बनर्जी चुनाव से पहले अपने क्षेत्र में एक बैठक भी नहीं कर सकीं। पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक चर्चा समाप्त हो चुकी है।" 20 सांसदों ने एनसीपीआई में विलय का किया ऐलान रविवार को बागी सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल ने Om Birla से मुलाकात कर सदन में अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की। सांसदों ने घोषणा की कि वे एनसीपीआई में विलय कर चुके हैं और एक अलग संसदीय समूह के रूप में मान्यता चाहते हैं। एनसीपीआई एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है, जिसने वर्ष 2023 में त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में हिस्सा लिया था। टीएमसी ने बताया गैरकानूनी कदम तृणमूल कांग्रेस ने बागी सांसदों के कदम को संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत अवैध बताया है। Sagarika Ghose ने कहा कि केवल सांसदों के समूह का अलग होना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा, "दलबदल विरोधी कानून के तहत पहले संसद के बाहर मौजूद पूरी राजनीतिक पार्टी का विलय या विभाजन होना चाहिए। केवल सांसदों का समूह अलग होकर किसी अन्य पार्टी में शामिल नहीं हो सकता।" 'असली तृणमूल वही है जिसकी अध्यक्ष ममता हैं' तृणमूल के वरिष्ठ नेता Sougata Roy ने कहा कि असली तृणमूल कांग्रेस वही है, जिसकी अध्यक्ष ममता बनर्जी हैं और जिसका चुनाव चिह्न 'जोड़ाफूल' है। उन्होंने आरोप लगाया कि बागी सांसदों ने मतदाताओं के साथ विश्वासघात किया है। सौगत रॉय ने कहा, "तृणमूल के टिकट पर जीतकर सांसद बने लोगों ने एक अज्ञात पार्टी में शामिल होकर एनडीए का समर्थन करने का फैसला किया है। यह जनता के जनादेश के साथ धोखा है।" सुदीप बंद्योपाध्याय भी बागी गुट में शामिल छह बार के सांसद Sudip Bandyopadhyay भी बागी गुट में शामिल हो गए हैं। उन्होंने दावा किया कि बागी समूह ही असली तृणमूल कांग्रेस है और वह चुनाव चिह्न तथा पार्टी की मान्यता के लिए कानूनी लड़ाई लड़ेगा। विधानसभा से संसद तक छिड़ी नियंत्रण की जंग तृणमूल पर नियंत्रण की लड़ाई केवल संसद तक सीमित नहीं है। हाल ही में पश्चिम बंगाल विधानसभा में भी पार्टी के 80 में से 64 विधायकों ने अलग समूह के रूप में मान्यता हासिल करने का दावा किया है। इससे संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में बंगाल की राजनीति में बड़ा पुनर्संयोजन देखने को मिल सकता है। क्या ममता बनर्जी से छिन सकता है तृणमूल का चुनाव चिह्न? राजनीतिक और कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, किसी राजनीतिक दल का चुनाव चिह्न तभी दूसरे गुट को मिल सकता है जब पार्टी में वास्तविक विभाजन, संगठनात्मक समर्थन और निर्वाचन आयोग के समक्ष पर्याप्त कानूनी आधार साबित हो। इसलिए बागी सांसदों के दावे के बावजूद अंतिम फैसला Election Commission of India और न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा। फिलहाल इतना तय है कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर शुरू हुआ यह नया 'खेला' पश्चिम बंगाल की राजनीति को आने वाले महीनों में पूरी तरह बदल सकता है।
हावड़ा: पश्चिम बंगाल की राजनीति में आए बड़े घटनाक्रम के बीच तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 22 बागी सांसदों के नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में शामिल होने के दावे के बाद हावड़ा जिले के संकराईल स्थित पार्टी कार्यालय की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। किसी भी अप्रिय घटना और संभावित राजनीतिक तनाव को देखते हुए कार्यालय के बाहर केंद्रीय बलों की तैनाती की गई है। हावड़ा के हाटगाछा-बाणीपुर इलाके में स्थित एनसीपीआई कार्यालय के बाहर सोमवार से सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई। स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। अचानक चर्चा में आया छोटा राजनीतिक दल एनसीपीआई अब तक एक अपेक्षाकृत छोटी और गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी के रूप में जानी जाती रही है। लेकिन तृणमूल कांग्रेस के 22 बागी सांसदों के इसमें शामिल होने के दावे के बाद यह पार्टी अचानक पश्चिम बंगाल की राजनीति के केंद्र में आ गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि बागी सांसदों का दावा औपचारिक रूप से आगे बढ़ता है, तो इससे पश्चिम बंगाल की सियासत में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। पहले एनजीओ का कार्यालय था वर्तमान पार्टी ऑफिस जानकारी के अनुसार, जिस भवन को वर्तमान में एनसीपीआई का पार्टी कार्यालय बनाया गया है, वहां पहले एक गैर-सरकारी संगठन (NGO) का कार्यालय संचालित होता था। बाद में इसे पार्टी के कार्यालय के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा। अचानक बढ़ी राजनीतिक गतिविधियों और मीडिया की नजरों के बाद इस कार्यालय की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया गया है। 2022 से मौजूद है पार्टी कार्यालय एनसीपीआई नेता शिउली कुंडू की बड़ी बेटी दीपनिता कुंडू ने बताया कि पार्टी का कार्यालय वर्ष 2022 से संकराईल में संचालित हो रहा है। उन्होंने कहा, "हमारा पार्टी कार्यालय 2022 से यहां है। वर्ष 2023 में मैंने एनसीपीआई की उम्मीदवार के रूप में संकराईल के जोरहाट ग्राम पंचायत चुनाव में हिस्सा लिया था, लेकिन चुनाव हार गई थी।" दीपनिता ने कहा कि पार्टी लंबे समय से संगठन विस्तार का प्रयास कर रही थी, लेकिन किसी ने कल्पना नहीं की थी कि एक दिन यह राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक चर्चा का विषय बन जाएगी। पंचायत चुनाव में उतारे थे उम्मीदवार त्रिपुरा में पंजीकृत एनसीपीआई ने वर्ष 2023 में पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव में भी अपने उम्मीदवार मैदान में उतारे थे। पार्टी को उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली। पार्टी का संगठन सीमित क्षेत्रों तक ही सिमटा रहा और उसका राजनीतिक प्रभाव बेहद कम माना जाता था। त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भी नहीं मिली सफलता एनसीपीआई ने वर्ष 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में चार सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। इनमें चावमानु, अंबासा और कैलाशहर जैसी सीटें शामिल थीं। लेकिन पार्टी का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। अधिकांश सीटों पर उसके उम्मीदवारों को नोटा (NOTA) के बराबर या उससे भी कम वोट मिले। उस समय पार्टी को एक छोटे क्षेत्रीय दल के रूप में देखा जाता था। अब सबसे ज्यादा सांसदों वाली पार्टी बनने का दावा राजनीतिक घटनाक्रम ने तब नया मोड़ ले लिया, जब तृणमूल कांग्रेस के 22 बागी सांसदों ने एनसीपीआई में शामिल होने का दावा किया। यदि यह दावा संवैधानिक और संसदीय प्रक्रियाओं में स्वीकार होता है, तो एक ऐसी पार्टी, जिसका चुनावी प्रदर्शन अब तक बेहद सीमित रहा है, अचानक लोकसभा में महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज करा सकती है। इसी संभावना को देखते हुए संकराईल स्थित पार्टी कार्यालय के बाहर सुरक्षा बढ़ा दी गई है और प्रशासन किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह सतर्क है। राजनीतिक महत्व तृणमूल कांग्रेस के भीतर बढ़ती असंतुष्टि, बागी सांसदों के अलग गुट के दावे और एनसीपीआई जैसे छोटे दल का अचानक राष्ट्रीय राजनीति में उभरना पश्चिम बंगाल की राजनीति के लिए एक बड़ा घटनाक्रम माना जा रहा है। आने वाले दिनों में लोकसभा में मान्यता, अलग बैठने की व्यवस्था और संभावित राजनीतिक पुनर्संरचना को लेकर स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।
नई दिल्ली/कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में रविवार को उस समय बड़ा राजनीतिक भूचाल आ गया, जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी लोकसभा सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय का दावा कर दिया। यह वही पार्टी है, जिसने वर्ष 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में ‘दलबदलुओं को नकारें’ के नारे के साथ चुनाव लड़ा था। अब एक छोटे और लगभग गुमनाम राजनीतिक दल का अचानक राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आना कई सवाल खड़े कर रहा है। क्या है NCPI? नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है। निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड के मुताबिक, पार्टी का पंजीकृत कार्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के संकराईल में स्थित है और इसकी अध्यक्ष शेउली कुंडू हैं। पार्टी लंबे समय तक राजनीतिक रूप से हाशिये पर रही और उसका प्रभाव किसी भी राज्य में उल्लेखनीय नहीं रहा। TMC के बागी सांसदों के विलय के दावे के बाद अचानक यह दल राष्ट्रीय राजनीतिक चर्चाओं में आ गया है। ‘दलबदलुओं को नकारें’ था पार्टी का प्रमुख नारा NCPI ने 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के दौरान अपने प्रचार अभियान में नारा दिया था: "अपने अधिकारों की रक्षा के लिए राजनीतिक दलबदलुओं को नकारें, समाजसेवियों का समर्थन करें।" पार्टी ने खुद को राजनीतिक अवसरवाद और दल-बदल की राजनीति के खिलाफ एक विकल्प के रूप में पेश किया था। ऐसे में अब उसी पार्टी में बड़े पैमाने पर बागी सांसदों के शामिल होने का दावा राजनीतिक विडंबना के रूप में देखा जा रहा है। त्रिपुरा चुनाव में बेहद कमजोर रहा प्रदर्शन NCPI ने वर्ष 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में महज चार सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। इनमें चावमानु, अंबासा और कैलाशहर जैसी सीटें शामिल थीं।
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में जारी अंदरूनी संकट और बगावत के बीच पार्टी सांसद महुआ मोइत्रा ने वरिष्ठ नेता सुदीप बंद्योपाध्याय पर तीखा हमला बोला है। महुआ ने आरोप लगाया कि सुदीप बंद्योपाध्याय ने बीमारी का बहाना बनाकर पार्टी नेतृत्व को गुमराह किया और बाद में दिल्ली जाकर केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से मुलाकात की। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए महुआ मोइत्रा ने सुदीप बंद्योपाध्याय के पुराने राजनीतिक विवादों का जिक्र करते हुए उन पर विश्वासघात का आरोप लगाया। 'बीमारी का बहाना, दिल्ली में मुलाकात' महुआ मोइत्रा ने लिखा, "दादा सुदीप बंद्योपाध्याय, आपको 2017 में रोज वैली घोटाले में गिरफ्तार किया गया था। तब भी आपने बीमारी का सहारा लिया था। इस बार भी बीमारी का बहाना बनाकर दिल्ली जाकर गद्दारी की। तापस रॉय और कुणाल घोष आपके बारे में सही थे, गलती हमारी थी।" उन्होंने दावा किया कि सुदीप बंद्योपाध्याय ने पार्टी नेताओं को बताया था कि पेट संबंधी समस्या के कारण उन्हें कोलकाता के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया है। लेकिन बाद में उन्हें टीवी चैनलों पर दिल्ली में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर देखा गया। महुआ ने अपने पोस्ट में कटाक्ष करते हुए लिखा, "उनका मुखौटा और उनकी विग दोनों उतर गए। दादा, अब कम से कम अपना एक्स हैंडल बदलकर 'सुदीप बीजेपी बी टीम' कर लीजिए। हमारे नाम का इस्तेमाल मत कीजिए।" कुणाल घोष ने भी साधा निशाना टीएमसी नेता कुणाल घोष ने भी सुदीप बंद्योपाध्याय की आलोचना करते हुए कहा कि उनका राजनीतिक इतिहास दल बदलने से जुड़ा रहा है। उन्होंने कहा, "ममता दीदी ने इन लोगों को पद, सम्मान और पहचान दी, लेकिन बदले में उन्हें यही मिला। सुदीप बंद्योपाध्याय की राजनीति हमेशा ममता बनर्जी को गुमराह करने की रही है। मैंने पहले भी इस बारे में चेतावनी दी थी, जिसके कारण मुझे पार्टी से निलंबित तक होना पड़ा।" ममता को 'चीफ एडवाइजर' बनाने के बयान से बढ़ा विवाद विवाद तब और गहरा गया जब सुदीप बंद्योपाध्याय ने एक बांग्ला न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा कि टीएमसी के अधिकांश सांसद और विधायक चाहते हैं कि पार्टी का संगठन बचा रहे और ममता बनर्जी को 'मुख्य सलाहकार' (Chief Advisor) की भूमिका में रखा जाए। उन्होंने कहा कि बागी नेताओं ने उनसे आग्रह किया कि ममता बनर्जी को सम्मानपूर्वक मार्गदर्शक की भूमिका दी जाए, जिससे वह भावुक हो गए और बागी गुट के साथ जाने का फैसला किया। उनके इस बयान पर टीएमसी नेता कल्याण बनर्जी ने भी नाराजगी जताई और कहा कि ममता बनर्जी ने ही सुदीप बंद्योपाध्याय को राजनीति में स्थापित किया, संकट के समय उनका साथ दिया और आज वही उन्हें 'सलाहकार' बनाने की बात कर रहे हैं। बागी सांसदों के दावे से बढ़ी सियासी हलचल टीएमसी में मतभेदों की खबरों के बीच यह दावा भी किया जा रहा है कि लोकसभा में पार्टी के 20 सांसदों ने अलग समूह बना लिया है और वे खुद को 'वास्तविक टीएमसी' का प्रतिनिधि बता रहे हैं। बागी सांसद काकोली घोष दस्तिदार ने दावा किया है कि 20 सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय कर लिया है और यह नया समूह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को समर्थन देगा। इन दावों और आरोपों पर सुदीप बंद्योपाध्याय की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं, टीएमसी के भीतर जारी सियासी उठापटक ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है।
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर जारी सियासी संकट अब संसद के गलियारों तक पहुंच गया है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि सदन में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) को केवल एक संयुक्त और एकल राजनीतिक दल के रूप में ही मान्यता दी जाए। अभिषेक बनर्जी का यह कदम ऐसे समय सामने आया है, जब पार्टी के भीतर बागी सांसदों के अलग गुट बनाने और स्वतंत्र पहचान की मांग के दावों से राजनीतिक हलचल तेज है। बागी गुट को मान्यता नहीं देने की मांग सूत्रों के मुताबिक, अपने पत्र में अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष से अनुरोध किया है कि सदन के भीतर किसी भी ऐसे समूह, धड़े या गुट को आधिकारिक मान्यता, दर्जा या सुविधाएं न दी जाएं, जो स्वयं को ‘असली टीएमसी’ बताने का दावा कर रहा हो। पत्र में कहा गया है कि लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व केवल पार्टी द्वारा अधिकृत नेता और आधिकारिक व्हिप के माध्यम से ही माना जाना चाहिए और पार्टी को एक एकीकृत संसदीय दल के रूप में देखा जाना चाहिए। संसद तक पहुंचा टीएमसी का अंदरूनी संकट पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के बाद टीएमसी के भीतर नेतृत्व और संगठन को लेकर असंतोष की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। बागी नेताओं के अलग संसदीय गुट बनाने की अटकलों के बीच अभिषेक बनर्जी का यह पत्र पार्टी नेतृत्व की ओर से एक महत्वपूर्ण रणनीतिक कदम माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि कोई बागी गुट संसद में अलग पहचान की मांग करता है, तो उसके संवैधानिक और संसदीय पहलुओं पर अंतिम फैसला लोकसभा अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र में होगा। स्पीकर के फैसले पर सबकी नजर अभिषेक बनर्जी के पत्र के बाद दिल्ली और कोलकाता के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के कार्यालय की ओर से अभी तक इस पत्र पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। आने वाले दिनों में स्पीकर का रुख यह तय कर सकता है कि संसद में तृणमूल कांग्रेस एकजुट संसदीय दल के रूप में बनी रहती है या किसी संभावित बागी गुट को अलग पहचान मिलती है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की करारी हार के बाद पार्टी के भीतर मचा सियासी घमासान अब नए मोड़ पर पहुंच गया है। पार्टी के वरिष्ठ सांसद और लंबे समय तक लोकसभा में टीएमसी संसदीय दल के नेता रहे सुदीप बंद्योपाध्याय के बागी खेमे में शामिल होने के दावों ने बंगाल की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। रिपोर्टों के मुताबिक, सुदीप बंद्योपाध्याय ने ममता बनर्जी को सक्रिय राजनीति से अलग कर उन्हें केवल ‘मुख्य सलाहकार’ (Chief Advisor) की भूमिका में रखने के प्रस्ताव का समर्थन किया है। इस घटनाक्रम को टीएमसी के अंदर चल रही नेतृत्व की लड़ाई में बड़ा झटका माना जा रहा है। ‘दीदी का सम्मान, लेकिन संगठन में बदलाव जरूरी’ एक बांग्ला समाचार चैनल को दिए इंटरव्यू में सुदीप बंद्योपाध्याय ने कथित तौर पर कहा कि पार्टी के कई सांसद और विधायक चाहते हैं कि संगठन का अस्तित्व बचाने के लिए नए नेतृत्व और नई कार्यशैली की जरूरत है। उन्होंने कहा कि बागी नेताओं ने उनसे संपर्क कर बताया कि वे ममता बनर्जी का सम्मान करते हैं और उन्हें पार्टी की ‘मुख्य सलाहकार’ बनाकर मार्गदर्शक की भूमिका में रखना चाहते हैं। सुदीप के मुताबिक, इस प्रस्ताव ने उन्हें प्रभावित किया और उन्होंने बागी खेमे के साथ जाने का फैसला किया। बागी गुट का दावा- 22 सांसद हुए साथ बागी गुट का दावा है कि दो और लोकसभा सांसद उनके साथ आ गए हैं, जिसके बाद विद्रोही सांसदों की संख्या बढ़कर 22 हो गई है। सूत्रों के अनुसार, यह गुट संसद में एक अलग संसदीय ब्लॉक के रूप में मान्यता हासिल करने की कोशिश में जुटा है। बताया जा रहा है कि बागी नेता जल्द ही लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर स्वतंत्र संसदीय समूह के तौर पर मान्यता की मांग कर सकते हैं। कल्याण बनर्जी का पलटवार सुदीप बंद्योपाध्याय के कथित फैसले पर टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी ने सुदीप बंद्योपाध्याय के राजनीतिक जीवन में हमेशा उनका साथ दिया और संकट के समय उनके लिए ढाल बनकर खड़ी रहीं। कल्याण बनर्जी ने आरोप लगाया कि जिन नेताओं को ममता बनर्जी ने आगे बढ़ाया, वही आज उन्हें केवल ‘सलाहकार’ बनाने की बात कर रहे हैं। उन्होंने इसे ‘राजनीतिक गद्दारी’ और ‘दीदी की पीठ में छुरा घोंपने’ जैसा बताया। टीएमसी में बढ़ सकती है अंदरूनी खींचतान राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि बागी गुट के दावे सही साबित होते हैं, तो यह तृणमूल कांग्रेस के लिए अब तक का सबसे बड़ा आंतरिक संकट साबित हो सकता है। इससे पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और नेतृत्व को लेकर नई बहस छिड़ सकती है। इन दावों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है और पार्टी नेतृत्व की ओर से विस्तृत प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है।
कोलकाता/उत्तर बंगाल: पश्चिम बंगाल की राजनीति में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) को उत्तर बंगाल में बड़ा झटका लगा है। पार्टी के राज्यसभा सांसद Prakash Chik Baraik ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उनका इस्तीफा ऐसे समय आया है जब पार्टी पहले से ही संगठनात्मक स्तर पर अंदरूनी असंतोष और राजनीतिक दबाव का सामना कर रही है। राज्यसभा सांसद के इस्तीफे से बढ़ी राजनीतिक हलचल प्रकाश चिक बड़ाईक ने अपना इस्तीफा राज्यसभा के सभापति को सौंप दिया है। उनके इस कदम के बाद उत्तर बंगाल के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है, खासकर चाय बागान क्षेत्रों और आदिवासी बहुल इलाकों में, जहां उन्हें टीएमसी का मजबूत चेहरा माना जाता था। उत्तर बंगाल में संगठन पर असर की आशंका बड़ाईक अलीपुरद्वार और जलपाईगुड़ी जैसे क्षेत्रों में पार्टी के संगठन को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। उनके इस्तीफे को उत्तर बंगाल में टीएमसी के लिए संगठनात्मक नुकसान के रूप में देखा जा रहा है, जिससे क्षेत्रीय राजनीति पर असर पड़ सकता है। पार्टी नेतृत्व और रणनीति पर सवाल सूत्रों के अनुसार, पार्टी के भीतर लंबे समय से चल रही असंतोष की स्थिति और संगठनात्मक फैसलों को लेकर मतभेद इस इस्तीफे के पीछे प्रमुख कारण माने जा रहे हैं। पार्टी के रणनीतिक ढांचे और नेतृत्व शैली को लेकर भी कई स्तरों पर असंतोष की चर्चा है। अंदरूनी विवाद और बढ़ता राजनीतिक तनाव टीएमसी पहले से ही कई मोर्चों पर राजनीतिक दबाव का सामना कर रही है। लोकसभा और विधानसभा स्तर पर कुछ नेताओं के अलग रुख अपनाने की खबरों के बीच यह इस्तीफा पार्टी के लिए एक और झटका माना जा रहा है। आगे की रणनीति पर नजर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस इस्तीफे के बाद उत्तर बंगाल में पार्टी को अपने संगठन को फिर से मजबूत करने की चुनौती होगी। फिलहाल टीएमसी की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर जारी कथित असंतोष और संगठनात्मक चुनौतियों ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया का भी ध्यान अपनी ओर खींचा है। विभिन्न वैश्विक प्रकाशनों में प्रकाशित विश्लेषणों में पार्टी की मौजूदा स्थिति, नेतृत्व शैली और भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं पर चर्चा की गई है। वैश्विक मीडिया में टीएमसी संकट पर चर्चा अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों में प्रकाशित रिपोर्टों और विश्लेषणों में टीएमसी के भीतर उभर रहे मतभेदों को पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखा गया है। कई लेखों में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लंबे राजनीतिक सफर और राज्य की राजनीति में उनकी भूमिका का उल्लेख करते हुए वर्तमान परिस्थितियों का आकलन किया गया है। विश्लेषकों ने ममता बनर्जी को एक संघर्षशील और जनाधार वाली नेता बताया है, जिन्होंने लंबे राजनीतिक संघर्ष के बाद राज्य में अपनी मजबूत पहचान बनाई। कुछ रिपोर्टों में पार्टी के भीतर नेतृत्व और संगठनात्मक फैसलों को लेकर उठ रहे सवालों का भी जिक्र किया गया है। संगठनात्मक चुनौतियों पर केंद्रित रहे विश्लेषण विदेशी मीडिया में प्रकाशित कुछ लेखों में दावा किया गया है कि पार्टी के भीतर बढ़ते मतभेदों और नेतृत्व को लेकर असंतोष ने संगठन के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं। रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि वरिष्ठ नेताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय बनाए रखना टीएमसी के लिए बड़ी परीक्षा बन सकता है। कुछ विश्लेषणों में चुनावी रणनीतियों और संगठनात्मक ढांचे में हुए बदलावों का भी उल्लेख किया गया है, जिन्हें पार्टी की वर्तमान स्थिति से जोड़कर देखा जा रहा है। राजनीतिक भविष्य को लेकर अलग-अलग राय अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विश्लेषकों की राय इस मुद्दे पर बंटी हुई दिखाई देती है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि टीएमसी अभी भी पश्चिम बंगाल की एक प्रमुख राजनीतिक ताकत बनी हुई है और पार्टी नेतृत्व के पास हालात संभालने का पर्याप्त अनुभव है। वहीं, कुछ अन्य विश्लेषकों का कहना है कि यदि संगठन के भीतर मतभेद बढ़ते हैं, तो इसका असर आगामी राजनीतिक समीकरणों पर पड़ सकता है। नेतृत्व और संगठन दोनों के लिए अहम दौर राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियां टीएमसी नेतृत्व के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा साबित हो सकती हैं। पार्टी को एकजुट बनाए रखना और कार्यकर्ताओं का विश्वास कायम रखना आने वाले समय में सबसे बड़ी चुनौती होगी। टीएमसी की ओर से अब तक पार्टी के भीतर किसी बड़े संकट की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। पार्टी नेतृत्व लगातार संगठन की एकता और मजबूती पर जोर देता रहा है। बंगाल की राजनीति पर बनी रहेगी नजर पश्चिम बंगाल की राजनीति में टीएमसी की भूमिका को देखते हुए राजनीतिक पर्यवेक्षक आने वाले दिनों के घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। पार्टी के भीतर की स्थिति और नेतृत्व के फैसले न केवल राज्य बल्कि राष्ट्रीय राजनीति पर भी असर डाल सकते हैं।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर जारी उथल-पुथल के बीच पार्टी सांसद महुआ मोइत्रा ने बागी नेताओं पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने पार्टी छोड़कर जाने वाले नेताओं को संगठन के लिए नुकसान नहीं, बल्कि एक तरह की "सफाई प्रक्रिया" करार दिया। साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री और टीएमसी प्रमुख Mamata Banerjee के प्रति अपनी निष्ठा दोहराते हुए कहा कि वह अंतिम समय तक उनके साथ खड़ी रहेंगी। बागी नेताओं पर साधा निशाना कृष्णानगर से लोकसभा सांसद Mahua Moitra ने कहा कि जो नेता कठिन समय में पार्टी का साथ छोड़ रहे हैं, वे कभी भी संगठन और उसकी विचारधारा के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध नहीं थे। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों के जाने से पार्टी कमजोर नहीं होती, बल्कि संगठन और अधिक मजबूत तथा स्पष्ट दिशा में आगे बढ़ता है। महुआ ने दावा किया कि टीएमसी से अवसरवादी तत्वों के बाहर जाने को संकट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। ममता बनर्जी के प्रति जताई अटूट निष्ठा महुआ मोइत्रा ने कहा कि राजनीतिक जीवन के कठिन दौर में पार्टी नेतृत्व ने हमेशा उन पर भरोसा जताया। उन्होंने कहा कि इसी विश्वास के कारण वह टीएमसी नेतृत्व के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनका राजनीतिक भविष्य तृणमूल कांग्रेस के साथ जुड़ा हुआ है और वह किसी अन्य राजनीतिक दल का हिस्सा बनने की कल्पना भी नहीं करतीं। अभिषेक बनर्जी के समर्थन में आईं सामने टीएमसी सांसद ने पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव Abhishek Banerjee का भी बचाव किया। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दबाव या जांच एजेंसियों की कार्रवाई से पार्टी नेतृत्व को कमजोर नहीं किया जा सकता। महुआ ने दावा किया कि तृणमूल कांग्रेस राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका मजबूती से निभाती रहेगी और नेतृत्व किसी भी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है। कांग्रेस में विलय की चर्चाओं को बताया निराधार हाल के दिनों में ममता बनर्जी और कांग्रेस नेतृत्व के बीच हुई बैठकों के बाद टीएमसी और कांग्रेस के संभावित राजनीतिक समीकरणों को लेकर कई चर्चाएं सामने आई थीं। महुआ मोइत्रा के बयान को इन चर्चाओं के जवाब के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने संकेत दिया कि पार्टी की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बरकरार रहेगी और तृणमूल कांग्रेस अपने संगठनात्मक ढांचे और क्षेत्रीय आधार के साथ आगे बढ़ती रहेगी। टीएमसी में जारी है राजनीतिक खींचतान पश्चिम बंगाल में टीएमसी के भीतर बढ़ती गुटबाजी और नेताओं के अलग-अलग रुख ने राज्य की राजनीति को नई दिशा दे दी है। एक ओर बागी गुट लगातार अपने समर्थन का दावा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर महुआ मोइत्रा जैसे वरिष्ठ नेता खुलकर ममता बनर्जी के नेतृत्व के समर्थन में सामने आ रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में टीएमसी के भीतर शक्ति संतुलन और नेतृत्व को लेकर संघर्ष और तेज हो सकता है, जिसका असर पश्चिम बंगाल की राजनीति पर भी देखने को मिलेगा।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में जारी उथल-पुथल के बीच तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बागी गुट ने अपनी ताकत बढ़ने का दावा किया है। बागी गुट के नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रीतब्रत बनर्जी ने कहा कि उनके समर्थन वाले विधायकों की संख्या बढ़कर 64 हो गई है। साथ ही उन्होंने टीएमसी के कांग्रेस में विलय से जुड़े सभी कयासों को सिरे से खारिज कर दिया। बागी खेमे ने बढ़ते समर्थन का किया दावा रीतब्रत बनर्जी ने कहा कि कुछ समय पहले तक उनके साथ 58 विधायक थे, लेकिन अब यह संख्या बढ़कर 64 हो चुकी है। उन्होंने दावा किया कि जल्द ही एक और विधायक उनके गुट में शामिल हो सकता है। उनके मुताबिक, बागी गुट को केवल विधायकों का ही नहीं बल्कि कई सांसदों, जिला स्तर के नेताओं और स्थानीय निकाय प्रतिनिधियों का भी समर्थन प्राप्त है। "असली तृणमूल कांग्रेस हमारे साथ" विधानसभा परिसर में पत्रकारों से बातचीत करते हुए रीतब्रत बनर्जी ने कहा कि उनका गुट ही तृणमूल कांग्रेस की वास्तविक राजनीतिक विरासत और संगठनात्मक ताकत का प्रतिनिधित्व करता है। उन्होंने कहा, "हम कांग्रेस में शामिल नहीं हो रहे हैं। हम ही असली तृणमूल कांग्रेस हैं और पार्टी के झंडे तथा विचारधारा के साथ आगे बढ़ते रहेंगे।" ममता-सोनिया मुलाकात के बाद तेज हुईं राजनीतिक चर्चाएं हाल ही में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee और कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष Sonia Gandhi के बीच दिल्ली में हुई मुलाकात के बाद टीएमसी और कांग्रेस के रिश्तों को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई थीं। इसके अलावा टीएमसी नेता Abhishek Banerjee और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के बीच हुई बैठकों ने भी दोनों दलों के संभावित राजनीतिक समीकरणों को लेकर कयासों को हवा दी थी। रीतब्रत बनर्जी ने स्पष्ट किया कि इन बैठकों का उनके गुट की राजनीतिक दिशा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। विधानसभा अध्यक्ष को सौंपा जाएगा नया समर्थन पत्र बागी गुट अब अपनी संख्या बल को आधिकारिक रूप से दर्ज कराने की तैयारी में है। सूत्रों के अनुसार, गुट जल्द ही विधानसभा अध्यक्ष को नया समर्थन पत्र सौंप सकता है, जिसमें उनके साथ खड़े विधायकों की अद्यतन संख्या दर्ज होगी। लोकसभा में NDA को समर्थन जारी रहेगा रीतब्रत बनर्जी ने कहा कि उनके समर्थक सांसद लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का समर्थन जारी रखेंगे। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय राजनीति में उनका रुख पहले की तरह कायम रहेगा और वर्तमान परिस्थितियों में किसी बदलाव की संभावना नहीं है। टीएमसी के सामने गहराता संगठनात्मक संकट राजनीतिक जानकारों का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस अपने 28 वर्षों के इतिहास के सबसे बड़े आंतरिक संकट से गुजर रही है। पार्टी के भीतर बढ़ती गुटबाजी और नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवालों ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। इस बीच, टीएमसी और कांग्रेस के बीच संभावित राजनीतिक नजदीकियों को लेकर चर्चाएं जारी हैं, लेकिन बागी गुट ने साफ कर दिया है कि वह किसी भी प्रकार के विलय या राजनीतिक समझौते का हिस्सा नहीं बनने जा रहा और खुद को ही पार्टी का वास्तविक प्रतिनिधि मानता है।
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी राजनीतिक संकट पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि वर्तमान हालात उन राजनीतिक घटनाओं की याद दिलाते हैं, जिनका सामना कांग्रेस ने पहले किया था। अधीर रंजन ने कहा कि राजनीति में किए गए फैसलों का असर समय के साथ सामने आता है और आज वही स्थिति तृणमूल कांग्रेस के सामने दिखाई दे रही है। ‘इतिहास खुद को दोहरा रहा है’ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि बंगाल की राजनीति में इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराता नजर आ रहा है। उन्होंने दावा किया कि जिस तरह अतीत में विपक्षी दलों को कमजोर करने की कोशिशें हुई थीं, उसी प्रकार की परिस्थितियां अब तृणमूल कांग्रेस के सामने खड़ी हो गई हैं। रीतब्रत खेमे को मिला 58 विधायकों का समर्थन टीएमसी के भीतर राजनीतिक संकट उस समय और गहरा गया जब 58 विधायकों ने रीतब्रत बनर्जी के नेतृत्व का समर्थन किया। इसके बाद विधानसभा अध्यक्ष द्वारा बागी खेमे को मान्यता मिलने से पार्टी के भीतर चल रहा विवाद और अधिक चर्चा का विषय बन गया। 2016 के घटनाक्रम का किया जिक्र अधीर रंजन चौधरी ने 2016 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद की राजनीतिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी थी। उन्होंने आरोप लगाया कि बाद के वर्षों में कांग्रेस के कई नेता और विधायक पार्टी छोड़कर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए, जिससे कांग्रेस की विधानसभा में ताकत कम होती गई। ‘राजनीतिक दलबदल का दौर जारी है’ कांग्रेस नेता ने कहा कि बंगाल की राजनीति में दलबदल की संस्कृति नई नहीं है। उनके अनुसार, पहले जो दल इस प्रक्रिया से लाभ उठाते थे, आज वे स्वयं इसी तरह की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि समय के साथ राजनीतिक समीकरण बदलते रहते हैं, लेकिन दलबदल की राजनीति का सिलसिला जारी रहता है। कांग्रेस ने कार्यकर्ताओं को दिया संदेश अधीर रंजन चौधरी ने इस अवसर पर उन कार्यकर्ताओं और नेताओं का भी जिक्र किया, जिन्होंने वर्षों तक विभिन्न राजनीतिक संघर्षों का सामना किया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस संगठन अपने पुराने कार्यकर्ताओं और समर्थकों का स्वागत करने के लिए तैयार है और पार्टी को मजबूत बनाने की दिशा में काम जारी रहेगा। बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल टीएमसी में जारी घटनाक्रम और विपक्षी दलों की प्रतिक्रियाओं ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को एक बार फिर गर्मा दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में पार्टी के भीतर और बाहर होने वाले फैसले राज्य की राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में विधानसभा चुनाव 2026 के बाद सियासी हलचल लगातार तेज होती जा रही है। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर बढ़ते असंतोष और इस्तीफों के बीच मुख्यमंत्री और पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने अब कविता के जरिए अपने विरोधियों और बागी नेताओं को संदेश दिया है। ममता बनर्जी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक पर ‘गिरगिटी’ शीर्षक से एक कविता साझा की, जिसे राजनीतिक गलियारों में पार्टी के भीतर ‘रंग बदलने वाले’ नेताओं पर सीधा हमला माना जा रहा है। दूसरी ओर बीजेपी सांसद सौमित्र खान के उस दावे ने बंगाल की राजनीति का तापमान और बढ़ा दिया है, जिसमें उन्होंने कहा है कि टीएमसी के कई सांसद और विधायक बीजेपी के संपर्क में हैं। फेसबुक पर साझा की गयी ‘गिरगिटी’ कविता, पार्टी के भीतर मचा सियासी हलचल ममता बनर्जी द्वारा साझा की गई कविता को लेकर बंगाल की राजनीति में नई चर्चा शुरू हो गई है। कविता में ‘गिरगिट’ का प्रतीक इस्तेमाल करते हुए उन्होंने ऐसे लोगों पर निशाना साधा है, जो परिस्थिति के अनुसार अपना रंग और रुख बदल लेते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कविता सीधे तौर पर उन नेताओं के लिए संदेश है, जो हाल के दिनों में पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठा रहे हैं या टीएमसी छोड़ने के संकेत दे रहे हैं। ममता बनर्जी ने कविता में लिखा कि गिरगिट तो केवल अपनी आजीविका बचाने के लिए रंग बदलता है, लेकिन कुछ लोग निजी स्वार्थ और राजनीतिक फायदे के लिए पल भर में अपना चरित्र बदल लेते हैं। मुश्किल समय में पार्टी छोड़ने वालों पर ममता का तीखा हमला कविता में ममता बनर्जी ने उन नेताओं पर भी नाराजगी जतायी, जिन पर पार्टी के कठिन दौर में कार्यकर्ताओं को अकेला छोड़ने का आरोप लग रहा है। उन्होंने संकेतों में कहा कि कुछ नेताओं ने सत्ता और व्यक्तिगत सुविधाओं के लिए अपने आत्मसम्मान और राजनीतिक प्रतिबद्धता से समझौता कर लिया। कविता के अंतिम हिस्से में उन्होंने ‘समय के पहिये’ का जिक्र करते हुए चेतावनी भरे अंदाज में लिखा कि हर व्यक्ति को अपने कर्मों का परिणाम भुगतना पड़ता है और गद्दारों को एक दिन अपनी असली कीमत समझ में आ जाती है। बीजेपी सांसद सौमित्र खान का बड़ा दावा, कहा- टीएमसी के कई नेता संपर्क में ममता बनर्जी की कविता के बीच बीजेपी सांसद सौमित्र खान के बयान ने राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया है। सौमित्र खान ने दावा किया कि टीएमसी के 20 सांसद और करीब 50 विधायक पार्टी से नाराज हैं और वे बीजेपी के संपर्क में हैं। उन्होंने कहा कि अगर बीजेपी आलाकमान की ओर से संकेत मिल जाये, तो बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव हो सकता है। उन्होंने यहां तक कहा कि टीएमसी का संगठन अंदर से कमजोर हो चुका है और पार्टी में असंतोष लगातार बढ़ रहा है। टीएमसी में बढ़ते इस्तीफों और नाराजगी ने बढ़ायी नेतृत्व की चिंता हाल के दिनों में टीएमसी के भीतर कई नेताओं की नाराजगी खुलकर सामने आयी है। सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने पार्टी के सभी सांगठनिक पदों से इस्तीफा दे दिया है। इसके अलावा सुशांत घोष, अरूप चक्रवर्ती और इंद्रनील सेन जैसे नेताओं ने भी पार्टी के कामकाज और कथित ‘वीवीआईपी कल्चर’ पर सवाल उठाये हैं। बागी नेताओं का आरोप है कि राशन घोटाला, शिक्षक भर्ती विवाद और आरजी कर अस्पताल मामले जैसे मुद्दों ने जनता के बीच पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाया है। उनका कहना है कि पार्टी नेतृत्व इन मामलों से प्रभावी तरीके से निपटने में विफल रहा है। टीएमसी ने बीजेपी के दावों को बताया अफवाह और राजनीतिक माइंडगेम टीएमसी नेतृत्व ने बीजेपी सांसद सौमित्र खान के दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। पार्टी सांसद सौगत रॉय ने कहा कि बीजेपी केवल भ्रम फैलाने और राजनीतिक माइंडगेम खेलने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि टीएमसी पूरी तरह एकजुट है और पार्टी के बड़े नेताओं या विधायकों के बीजेपी में जाने की बात निराधार है। सौगत रॉय ने दावा किया कि विपक्ष जानबूझकर पार्टी के भीतर असंतोष का माहौल दिखाने की कोशिश कर रहा है, जबकि जमीनी स्तर पर टीएमसी मजबूत स्थिति में है। 2026 चुनाव के बाद बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल विधानसभा चुनाव 2026 के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में जिस तरह से बयानबाजी, इस्तीफे और दल-बदल की चर्चाएं तेज हुई हैं, उसने राज्य की सियासत को नया मोड़ दे दिया है। एक तरफ ममता बनर्जी कविता और राजनीतिक संदेशों के जरिए पार्टी को एकजुट रखने की कोशिश कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर बीजेपी लगातार टीएमसी में टूट का दावा कर रही है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि बंगाल की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में तृणमूल कांग्रेस की बड़ी हार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। काकोली घोष दस्तीदार के इस्तीफे के बाद अब राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय के बयान ने पार्टी नेतृत्व की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। टीएमसी के वरिष्ठ नेता और अनुभवी सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने पार्टी की कार्यशैली, भ्रष्टाचार और राजनीतिक हालात पर सवाल उठाते हुए ऐसे संकेत दिए हैं, जिन्हें पार्टी के भीतर खुला विद्रोह माना जा रहा है। उनके बयानों के बाद बंगाल की राजनीति में नई हलचल शुरू हो गई है। “असहनीय अराजकता का अंत हुआ” : सुखेंदु शेखर रॉय सुखेंदु शेखर रॉय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में पश्चिम बंगाल की राजनीतिक स्थिति की तुलना रोमन साम्राज्य के पतन से की। उन्होंने लिखा कि वर्ष 44 ईसा पूर्व में जूलियस सीजर की हत्या सीनेट में हुई थी, लेकिन बंगाल में जनता ने “असहनीय अराजकता” का अंत कर दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रॉय का यह बयान सीधे तौर पर टीएमसी शासन और पार्टी के भीतर बढ़ते भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। “भ्रष्ट लोगों को बढ़ावा मिला, बुद्धिजीवियों को किनारे किया गया” एक अन्य पोस्ट में रॉय ने कहा कि जब भ्रष्ट लोग व्यवस्था पर हावी हो जाते हैं और बुद्धिमानों को निर्णय प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाता है, तब किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का पतन तय हो जाता है। उन्होंने स्वतंत्र विचारों और आंतरिक लोकतंत्र की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि किसी भी राजनीतिक दल को आलोचना और अलग राय को दबाने के बजाय सुनना चाहिए। आरजी कर कांड को लेकर भी जताई नाराजगी सूत्रों के अनुसार, सुखेंदु शेखर रॉय इस बात से बेहद नाराज हैं कि आरजी कर मेडिकल कॉलेज मामले में जनता के गुस्से को पार्टी सही तरीके से समझ नहीं पाई। रॉय का मानना है कि महिला डॉक्टर के साथ हुई दरिंदगी के बाद सड़कों पर जो भारी जनआक्रोश दिखा, उसे पार्टी नेतृत्व ने गंभीरता से नहीं लिया। उन्होंने कथित तौर पर कहा कि जब जनता स्वतःस्फूर्त तरीके से विरोध कर रही थी, तब पार्टी के कुछ नेता उसे राजनीतिक साजिश बताने में लगे थे। उनके अनुसार, यही disconnect आगे चलकर चुनावी हार की बड़ी वजह बना। “पार्टी में भ्रष्टाचार संस्थागत रूप ले चुका” सुखेंदु शेखर रॉय ने निजी बातचीत में यह भी स्वीकार किया कि पार्टी के भीतर भ्रष्टाचार अब “संस्थागत रूप” ले चुका है। उनका मानना है कि इससे पार्टी की जमीनी पकड़ कमजोर हुई और कार्यकर्ताओं के बीच निराशा बढ़ी। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि रॉय का इशारा पार्टी के उन प्रभावशाली नेताओं की तरफ है, जिन पर लंबे समय से भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के आरोप लगते रहे हैं। क्यों महत्वपूर्ण माने जाते हैं सुखेंदु शेखर रॉय? सुखेंदु शेखर रॉय पश्चिम बंगाल की राजनीति का बड़ा और अनुभवी चेहरा माने जाते हैं। कांग्रेस पृष्ठभूमि से आने वाले रॉय पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के करीबी रहे हैं और संवैधानिक मामलों के जानकार माने जाते हैं। संसद में वे लंबे समय तक टीएमसी के सबसे मुखर नेताओं में शामिल रहे हैं। ऐसे में उनका खुलकर असंतोष जताना पार्टी नेतृत्व के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। टीएमसी में “पुराने बनाम नये” की लड़ाई तेज राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी हार के बाद टीएमसी में “पुराने बनाम नये नेतृत्व” की लड़ाई खुलकर सामने आने लगी है। पार्टी के पुराने नेता कथित तौर पर आई-पैक और नई रणनीतिक टीम की कार्यशैली से नाराज बताए जा रहे हैं। काकोली घोष दस्तीदार और अब सुखेंदु शेखर रॉय के बयानों ने यह संकेत दे दिया है कि आने वाले दिनों में टीएमसी के भीतर और बड़े राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिल सकते हैं। क्या ममता बनर्जी करेंगी संगठन में बड़ा बदलाव? टीएमसी की हार के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ममता बनर्जी पार्टी संगठन में बड़े स्तर पर बदलाव करेंगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि पार्टी नेतृत्व ने जल्द संगठनात्मक सुधार नहीं किए, तो असंतोष और बढ़ सकता है। सुखेंदु शेखर रॉय के बागी तेवरों ने यह साफ कर दिया है कि बंगाल की राजनीति में सत्ता परिवर्तन के बाद अब तृणमूल कांग्रेस के भीतर भी बड़ा संघर्ष शुरू हो चुका है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने राज्य की राजनीति को गहराई से बदल दिया है। ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) के लिए यह हार सिर्फ सत्ता खोने तक सीमित नहीं है, बल्कि 15 साल में खड़े किए गए पूरे राजनीतिक ढांचे पर सवाल खड़े कर रही है। सिस्टम पर पड़ा झटका TMC लंबे समय से ‘कल्याणकारी राजनीति’ और मजबूत संगठनात्मक मॉडल के दम पर राज्य की राजनीति में अजेय मानी जाती थी। लेकिन इस बार भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने न सिर्फ चुनावी जीत हासिल की, बल्कि उस मॉडल को भी चुनौती दी, जिस पर पार्टी टिकी थी। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि बिना सत्ता के सहारे क्या TMC खुद को एकजुट रख पाएगी। बदल गया वोट बैंक का समीकरण आंकड़ों के अनुसार, राज्य की राजनीतिक जमीन में बड़ा बदलाव आया है। BJP का वोट शेयर 2021 के 38% से बढ़कर करीब 44.8% तक पहुंच गया, जबकि TMC का आधार 48% से घटकर 41.7% पर आ गया। खासकर अर्ध-शहरी इलाकों में पार्टी को भारी नुकसान हुआ, जिसने चुनावी नतीजों को निर्णायक रूप से प्रभावित किया। मतदाता सूची और सीटों पर असर करीब 177 सीटों पर मतदाता सूची से हटाए गए नामों की संख्या पिछली बार के जीत के अंतर से ज्यादा बताई जा रही है। इन सीटों पर BJP ने मजबूत प्रदर्शन किया, जिसने TMC की स्थिति को और कमजोर किया। संगठन की कमजोरी उजागर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि TMC की सबसे बड़ी ताकत—केंद्रीकृत नेतृत्व—अब उसकी कमजोरी बन गई है। पार्टी पूरी तरह ममता बनर्जी के चेहरे पर निर्भर रही है। ऐसे में शीर्ष नेतृत्व के कमजोर पड़ते ही संगठन के पास खुद को संभालने का मजबूत विकल्प नहीं बचा। भ्रष्टाचार के आरोपों का असर शिक्षक भर्ती घोटाले समेत कई भ्रष्टाचार के आरोपों ने सत्ता विरोधी माहौल को और मजबूत किया। इसका सीधा फायदा BJP को मिला। साथ ही, TMC का अन्य राज्यों में विस्तार न कर पाना भी उसके लिए बड़ी रणनीतिक कमी साबित हुआ। अभिषेक बनर्जी के सामने चुनौती अभिषेक बनर्जी के लिए अब पार्टी को संभालना बड़ी जिम्मेदारी होगी। सत्ता से बाहर होने के बाद आंतरिक कलह और नेताओं के संभावित दल-बदल को रोकना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है। इसके साथ ही, राष्ट्रीय राजनीति में TMC की भूमिका भी कमजोर पड़ सकती है। वापसी की राह आसान नहीं ममता बनर्जी ने पहले नंदीग्राम और सिंगूर जैसे आंदोलनों के जरिए मजबूत वापसी की थी, लेकिन अब हालात अलग हैं। 71 साल की उम्र में एक मजबूत BJP के सामने फिर से शुरुआत करना आसान नहीं माना जा रहा। क्या खत्म हो रहा एक राजनीतिक युग? यह नतीजे उस राजनीतिक दौर के अंत का संकेत भी माने जा रहे हैं, जिसकी शुरुआत 34 साल पुराने वामपंथी शासन को हटाकर हुई थी। अब TMC के सामने सबसे बड़ी चुनौती सत्ता में वापसी से ज्यादा, खुद को नए सिरे से स्थापित करने की है। वहीं BJP के लिए भी यह परीक्षा होगी कि वह इस संवेदनशील और राजनीतिक रूप से ध्रुवीकृत राज्य में शासन को कैसे संभालती है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।