नई दिल्ली, एजेंसियां। हार्ट अटैक अक्सर अचानक नहीं आता, बल्कि इसके कई शुरुआती संकेत घंटों, दिनों या कई बार हफ्तों पहले ही शरीर में दिखाई देने लगते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इन लक्षणों को सामान्य थकान, गैस या तनाव समझकर नजरअंदाज करना गंभीर साबित हो सकता है। समय रहते पहचान और इलाज से जान बचाई जा सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, हार्ट अटैक से पहले सीने के बीच में दबाव, जकड़न, भारीपन या जलन महसूस हो सकती है। यह दर्द कुछ मिनट तक रहकर कम हो सकता है और फिर दोबारा लौट सकता है। ऐसे लक्षण दिखाई देने पर तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेने की जरूरत है।
अगर पर्याप्त आराम के बाद भी लगातार थकान महसूस हो, सीढ़ियां चढ़ने या हल्का काम करने पर सांस फूलने लगे, तो यह दिल तक रक्त और ऑक्सीजन की पर्याप्त आपूर्ति न होने का संकेत हो सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक महिलाओं में असामान्य थकान का लक्षण अधिक देखा जाता है।
हार्ट अटैक से पहले दर्द केवल सीने तक सीमित नहीं रहता। कंधे, बांह, पीठ, गर्दन, जबड़े, दांत या पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द या बेचैनी भी महसूस हो सकती है। कई लोग इसे मांसपेशियों के दर्द या गैस की समस्या समझकर अनदेखा कर देते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, अचानक ठंडा पसीना आना, चक्कर महसूस होना, मतली, बेहोशी या बिना किसी स्पष्ट कारण के बेचैनी होना भी हार्ट अटैक के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। विशेष रूप से हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और हाई कोलेस्ट्रॉल से पीड़ित लोगों को ऐसे लक्षणों पर अधिक सतर्क रहने की सलाह दी जाती है।
यदि सीने में जकड़न, सांस लेने में परेशानी, हाथ या जबड़े में दर्द, अत्यधिक पसीना या अन्य गंभीर लक्षण पांच मिनट से अधिक समय तक बने रहें, तो बिना देरी किए तुरंत अस्पताल जाएं या आपातकालीन चिकित्सा सहायता लें। समय पर इलाज से हार्ट अटैक के गंभीर परिणामों से बचा जा सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। हार्ट अटैक अक्सर अचानक नहीं आता, बल्कि इसके कई शुरुआती संकेत घंटों, दिनों या कई बार हफ्तों पहले ही शरीर में दिखाई देने लगते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इन लक्षणों को सामान्य थकान, गैस या तनाव समझकर नजरअंदाज करना गंभीर साबित हो सकता है। समय रहते पहचान और इलाज से जान बचाई जा सकती है। सीने में दर्द और जकड़न को न करें नजरअंदाज विशेषज्ञों के अनुसार, हार्ट अटैक से पहले सीने के बीच में दबाव, जकड़न, भारीपन या जलन महसूस हो सकती है। यह दर्द कुछ मिनट तक रहकर कम हो सकता है और फिर दोबारा लौट सकता है। ऐसे लक्षण दिखाई देने पर तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेने की जरूरत है। बिना वजह थकान और सांस फूलना भी हो सकते हैं संकेत अगर पर्याप्त आराम के बाद भी लगातार थकान महसूस हो, सीढ़ियां चढ़ने या हल्का काम करने पर सांस फूलने लगे, तो यह दिल तक रक्त और ऑक्सीजन की पर्याप्त आपूर्ति न होने का संकेत हो सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक महिलाओं में असामान्य थकान का लक्षण अधिक देखा जाता है। शरीर के अन्य हिस्सों में भी हो सकता है दर्द हार्ट अटैक से पहले दर्द केवल सीने तक सीमित नहीं रहता। कंधे, बांह, पीठ, गर्दन, जबड़े, दांत या पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द या बेचैनी भी महसूस हो सकती है। कई लोग इसे मांसपेशियों के दर्द या गैस की समस्या समझकर अनदेखा कर देते हैं। पसीना, चक्कर और मतली भी हैं चेतावनी विशेषज्ञों के अनुसार, अचानक ठंडा पसीना आना, चक्कर महसूस होना, मतली, बेहोशी या बिना किसी स्पष्ट कारण के बेचैनी होना भी हार्ट अटैक के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। विशेष रूप से हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और हाई कोलेस्ट्रॉल से पीड़ित लोगों को ऐसे लक्षणों पर अधिक सतर्क रहने की सलाह दी जाती है। कब लें तुरंत डॉक्टर की मदद? यदि सीने में जकड़न, सांस लेने में परेशानी, हाथ या जबड़े में दर्द, अत्यधिक पसीना या अन्य गंभीर लक्षण पांच मिनट से अधिक समय तक बने रहें, तो बिना देरी किए तुरंत अस्पताल जाएं या आपातकालीन चिकित्सा सहायता लें। समय पर इलाज से हार्ट अटैक के गंभीर परिणामों से बचा जा सकता है।
नई दिल्ली: शरीर के किसी हिस्से में अचानक गांठ महसूस हो जाए तो चिंता होना स्वाभाविक है। कई लोग गांठ को तुरंत कैंसर से जोड़ लेते हैं, जबकि दूसरी तरफ कुछ लोग इसे मामूली समझकर लंबे समय तक नजरअंदाज कर देते हैं। सच यह है कि शरीर में बनने वाली हर गांठ कैंसर नहीं होती। गांठ के पीछे सिस्ट, लिपोमा, संक्रमण, सूजी हुई लिम्फ नोड्स और कई अन्य कारण हो सकते हैं। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि हर गांठ को बिना जांच के छोड़ दिया जाए। अगर कोई गांठ लगातार बनी हुई है, उसका आकार बढ़ रहा है, वह कठोर है और हिलती नहीं है या उसके ऊपर की त्वचा में असामान्य बदलाव नजर आ रहा है, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है। एनएचएस के अनुसार, दो सप्ताह से ज्यादा बनी रहने वाली या बढ़ती हुई गांठ को चिकित्सकीय सलाह के लिए दिखाना चाहिए। गांठ बनने के कई कारण हो सकते हैं शरीर में गांठ या सूजन कई वजहों से बन सकती है। उदाहरण के लिए, त्वचा के नीचे फैट जमा होने से लिपोमा हो सकता है, जो अक्सर नरम और आसानी से हिलने वाला होता है। त्वचा के नीचे सिस्ट भी गांठ की तरह महसूस हो सकती है। वहीं संक्रमण के दौरान गर्दन, बगल या जांघ के जोड़ के आसपास लिम्फ नोड्स सूज सकती हैं। इसलिए केवल गांठ महसूस होने के आधार पर कैंसर का निष्कर्ष निकालना सही नहीं है। गांठ की जगह, आकार, बनावट, कितने समय से मौजूद है और समय के साथ उसमें क्या बदलाव हुए हैं—इन सभी बातों को देखकर डॉक्टर तय करते हैं कि आगे जांच की जरूरत है या नहीं। कौन-सी गांठ ज्यादा चिंता की वजह हो सकती है? हर गांठ का व्यवहार एक जैसा नहीं होता। कुछ गांठें धीरे-धीरे बढ़ती हैं और लंबे समय तक बिना किसी परेशानी के बनी रह सकती हैं। दूसरी ओर, कुछ गांठों में ऐसे बदलाव दिखाई दे सकते हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। खास तौर पर इन संकेतों पर ध्यान दें: गांठ का आकार लगातार बढ़ रहा हो। गांठ बहुत कठोर महसूस हो। दबाने पर गांठ अपनी जगह से न हिले। गांठ दो सप्ताह से ज्यादा समय तक बनी रहे। गांठ में लगातार बदलाव दिखाई दे। गांठ के आसपास दर्द, लालिमा या गर्माहट हो। गांठ के ऊपर की त्वचा में असामान्य बदलाव हो। इनमें से कोई लक्षण होने का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति को कैंसर ही है। लेकिन इन स्थितियों में चिकित्सकीय जांच जरूरी हो सकती है। त्वचा का रंग या रूप बदलना क्यों महत्वपूर्ण है? किसी गांठ के ऊपर या आसपास की त्वचा का रंग, बनावट या रूप बदलना ध्यान देने योग्य संकेत हो सकता है। त्वचा लाल होना, घाव बनना, पपड़ी पड़ना, खून आना या किसी उभार का रंग अथवा आकार बदलना कई अलग-अलग कारणों से हो सकता है। एनएचएस के अनुसार, त्वचा पर ऐसा उभार जो बढ़ रहा हो या जिसका रंग अथवा बनावट बदल रही हो, उसे डॉक्टर को दिखाना चाहिए। लंबे समय तक ठीक न होने वाला घाव या ऐसा क्षेत्र जिसमें दर्द, खुजली, रक्तस्राव या पपड़ी बनने जैसी समस्या बनी रहे, उसकी भी चिकित्सकीय जांच जरूरी है। गांठ के साथ वजन कम हो रहा है तो भी ध्यान दें अगर बिना किसी स्पष्ट कारण के वजन लगातार कम हो रहा है, लंबे समय से बुखार बना हुआ है या रात में बहुत ज्यादा पसीना आता है, तो इन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ये लक्षण कई अलग-अलग बीमारियों में हो सकते हैं और अपने आप में कैंसर की पुष्टि नहीं करते। लेकिन यदि इनके साथ कोई लगातार बनी रहने वाली गांठ भी मौजूद है, तो डॉक्टर से सलाह लेना ज्यादा जरूरी हो जाता है। गर्दन, बगल या जांघ के जोड़ में सूजन को कब दिखाएं? संक्रमण के दौरान लिम्फ नोड्स यानी लसीका ग्रंथियां सूज सकती हैं और अक्सर संक्रमण ठीक होने के साथ इनकी सूजन कम हो जाती है। लेकिन अगर गर्दन, बगल या जांघ के जोड़ के आसपास सूजन लगातार बनी रहती है, बढ़ती जाती है या गांठ कठोर और स्थिर महसूस होती है, तो डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। सांस लेने या निगलने में दिक्कत हो तो तुरंत ध्यान दें अगर गांठ ऐसी जगह है जहां वह आसपास के अंगों पर दबाव डाल रही है और इसके कारण निगलने या सांस लेने में परेशानी होने लगी है, तो इसे सामान्य मानकर इंतजार नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में जल्द चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी है। डॉक्टर जांच में क्या कर सकते हैं? गांठ की जांच के दौरान डॉक्टर उसके आकार, स्थान, बनावट और आसपास के हिस्से को देखते हैं। जरूरत पड़ने पर अल्ट्रासाउंड जैसे परीक्षण कराए जा सकते हैं और कुछ मामलों में आगे की जांच के लिए विशेषज्ञ के पास भेजा जा सकता है। गांठ की वास्तविक वजह जानने के लिए कभी-कभी बायोप्सी जैसी जांच की भी जरूरत पड़ सकती है। इसलिए इंटरनेट पर लक्षण पढ़कर खुद से गांठ को कैंसर मान लेना भी सही नहीं है और उसे पूरी तरह नजरअंदाज करना भी ठीक नहीं है। सबसे जरूरी बात: डरें नहीं, लेकिन जांच जरूर कराएं शरीर में गांठ होना कैंसर की पुष्टि नहीं करता। राष्ट्रीय कैंसर संस्थान के अनुसार, कैंसर से जुड़े कई लक्षण वास्तव में अन्य बीमारियों, चोट या सौम्य स्थितियों के कारण भी हो सकते हैं। लेकिन अगर कोई लक्षण कुछ हफ्तों तक बना रहता है या बिगड़ता जाता है, तो डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है ताकि सही कारण का पता लगाया जा सके। इसलिए अगर शरीर में नई गांठ महसूस हुई है, वह बढ़ रही है, कठोर है, हिलती नहीं है, दो सप्ताह से ज्यादा बनी हुई है या उसके साथ त्वचा में बदलाव, लगातार बुखार, रात में पसीना या बिना वजह वजन कम होने जैसे लक्षण हैं, तो स्वयं निदान करने के बजाय डॉक्टर से जांच कराएं।
नई दिल्ली: ग्लूकोमा आंखों की ऐसी गंभीर बीमारी है, जिसमें ऑप्टिक नर्व को धीरे-धीरे नुकसान पहुंच सकता है। इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती दौर में अक्सर इसके स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। कई लोगों को बीमारी का पता तब चलता है, जब उनकी दृष्टि प्रभावित होना शुरू हो चुकी होती है। ग्लूकोमा से होने वाला ऑप्टिक नर्व का नुकसान आमतौर पर स्थायी होता है, इसलिए समय पर जांच और लगातार उपचार बेहद महत्वपूर्ण है। ग्लूकोमा को पूरी तरह ठीक करने का कोई आसान इलाज नहीं है, लेकिन उचित उपचार से इसकी प्रगति को नियंत्रित किया जा सकता है। डॉक्टर मरीज की स्थिति के अनुसार आई ड्रॉप्स, लेजर या सर्जरी जैसी उपचार पद्धतियां अपना सकते हैं। इसके साथ नियमित फॉलो-अप और रोजमर्रा की कुछ आदतों पर ध्यान देना भी जरूरी है। ग्लूकोमा में जीवनशैली और नियमित देखभाल क्यों जरूरी? ग्लूकोमा के मरीजों में केवल आंखों के दबाव पर नजर रखना ही पर्याप्त नहीं होता। डायबिटीज, ब्लड प्रेशर और स्लीप एपनिया जैसी स्थितियां भी आंखों और ऑप्टिक नर्व के स्वास्थ्य से जुड़ी हो सकती हैं। इसलिए आंखों के इलाज के साथ-साथ पूरे स्वास्थ्य को नियंत्रित रखना महत्वपूर्ण है। 1. आई ड्रॉप्स समय पर लेना न भूलें ग्लूकोमा के इलाज में डॉक्टर द्वारा दी गई आई ड्रॉप्स का नियमित इस्तेमाल बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है। दवा बार-बार छोड़ना या डॉक्टर की सलाह के बिना उसे बंद कर देना आंखों के दबाव को नियंत्रित करने में समस्या पैदा कर सकता है। ग्लूकोमा की दवाएं बीमारी को आगे बढ़ने से रोकने और दृष्टि को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से दी जाती हैं। इसलिए मरीज को डॉक्टर की बताई खुराक और समय का पालन करना चाहिए। अगर किसी दवा से परेशानी हो रही है या डोज छूट गई है, तो खुद से उपचार बदलने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है। 2. डायबिटीज और ब्लड प्रेशर को हल्के में न लें डायबिटीज और ब्लड प्रेशर जैसी स्वास्थ्य स्थितियों का ग्लूकोमा से संबंध देखा गया है। खासकर डायबिटीज आंखों की कई बीमारियों का जोखिम बढ़ा सकती है और ग्लूकोमा के मरीजों के लिए नियमित स्वास्थ्य निगरानी जरूरी हो जाती है। वहीं, ब्लड प्रेशर का बहुत अधिक या बहुत कम होना भी आंखों की रक्त आपूर्ति और ऑप्टिक नर्व के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। इसलिए डॉक्टर की सलाह के अनुसार ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखना महत्वपूर्ण है। 3. आंखों की नियमित जांच को टालें नहीं ग्लूकोमा को अक्सर 'साइलेंट' बीमारी कहा जाता है क्योंकि शुरुआती अवस्था में मरीज को अपनी दृष्टि में कोई बड़ा बदलाव महसूस नहीं हो सकता। इसी वजह से नियमित आंखों की जांच बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। आई प्रेशर की जांच, ऑप्टिक नर्व का मूल्यांकन और विजुअल फील्ड टेस्ट जैसे परीक्षण डॉक्टर को बीमारी की स्थिति और उसके संभावित बढ़ने का पता लगाने में मदद कर सकते हैं। ग्लूकोमा के मरीजों को अपने नेत्र रोग विशेषज्ञ द्वारा बताए गए अंतराल पर फॉलो-अप जरूर कराना चाहिए। 4. खर्राटे और स्लीप एपनिया को सामान्य न समझें अगर किसी व्यक्ति को तेज खर्राटे आते हैं, रात में बार-बार नींद खुलती है या सोते समय सांस रुकने जैसी समस्या होती है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऑब्स्ट्रक्टिव स्लीप एपनिया और ग्लूकोमा के बीच संबंध पर शोध उपलब्ध है, हालांकि दोनों के बीच संबंध को पूरी तरह समझने के लिए अभी भी अध्ययन जारी हैं। ग्लूकोमा के मरीजों को नींद से जुड़ी ऐसी समस्या होने पर डॉक्टर को इसकी जानकारी देनी चाहिए। स्लीप एपनिया का उचित उपचार समग्र स्वास्थ्य के साथ आंखों की देखभाल के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हो सकता है। 5. धूम्रपान से दूरी बनाना बेहतर धूम्रपान आंखों समेत शरीर के कई अंगों के स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल सकता है। ग्लूकोमा और धूम्रपान के सीधे संबंध को लेकर शोध में सभी निष्कर्ष एक जैसे नहीं हैं, लेकिन धूम्रपान छोड़ना आंखों और संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद माना जाता है। इसलिए ग्लूकोमा के मरीजों को धूम्रपान से बचने की कोशिश करनी चाहिए और जरूरत पड़ने पर इसे छोड़ने के लिए डॉक्टर या विशेषज्ञ की मदद लेनी चाहिए। ग्लूकोमा में सबसे जरूरी है नियमित इलाज ग्लूकोमा में जो ऑप्टिक नर्व क्षति हो चुकी है, उसे आमतौर पर वापस ठीक नहीं किया जा सकता। लेकिन समय पर पहचान, नियमित जांच और सही उपचार से आगे होने वाले नुकसान को कम करने में मदद मिल सकती है। इसलिए मरीजों को डॉक्टर की बताई दवाएं नियमित रूप से लेनी चाहिए, आंखों की जांच नहीं टालनी चाहिए और डायबिटीज, ब्लड प्रेशर तथा नींद से जुड़ी समस्याओं को भी नियंत्रित रखना चाहिए। किसी भी दवा को अपनी मर्जी से शुरू या बंद करने के बजाय नेत्र रोग विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी है। जरूरी सूचना: यह जानकारी सामान्य जागरूकता के लिए है। ग्लूकोमा के मरीज अपनी दवाओं, आई ड्रॉप्स, जांच या जीवनशैली में बदलाव से पहले अपने नेत्र रोग विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।