पश्चिम बंगाल में सड़क और सार्वजनिक स्थलों के नामकरण को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कोलकाता के पार्क सर्कस स्थित सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम बदलकर ‘गोपाल मुखर्जी रोड’ किए जाने के बाद राज्य सरकार ने संकेत दिया है कि अन्य सड़कों और इलाकों के नामों की भी समीक्षा की जा सकती है। इस उद्देश्य से एक विशेष समिति का गठन किया गया है, जिसकी जिम्मेदारी कार्तिक महाराज को सौंपी गई है। मुगल, पठान और ब्रिटिश शासकों के नाम पर नहीं रहेंगी सड़कें: सरकार विधानसभा में इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि राज्य सरकार बंगाल की सांस्कृतिक विरासत, राष्ट्रीय गौरव और ऐतिहासिक पहचान को प्राथमिकता देते हुए नामकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोलकाता सहित राज्य में किसी मुगल, पठान या अत्याचारी ब्रिटिश शासक के नाम पर सड़कें नहीं रखी जाएंगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि भगिनी निवेदिता को छोड़कर किसी विदेशी व्यक्ति के नाम पर सड़क रखने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम जैसे राष्ट्रभक्त व्यक्तित्वों को सम्मान देने की बात भी कही। विधानसभा में विपक्ष ने उठाए सवाल मंगलवार को विधानसभा में विपक्ष के नेता रितब्रत बंद्योपाध्याय ने सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम बदलने के फैसले पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है। उनका दावा था कि इस सड़क का नाम पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री हुसैन शहीद सुहरावर्दी के नाम पर नहीं, बल्कि उनके दादा मौलाना उबैदुल्लाह सुहरावर्दी के नाम पर रखा गया था। विपक्ष के साथ-साथ कुछ इतिहासकारों ने भी सरकार के इस फैसले और उसके पीछे दिए गए तर्कों पर आपत्ति जताई है। जनता से भी मांगे जाएंगे सुझाव मुख्यमंत्री ने अपने जवाब में स्वतंत्रता सेनानी बीना दास का उल्लेख करते हुए कहा कि बंगाल के इतिहास और राष्ट्रीय स्वाभिमान को प्रमुखता देने के लिए नामकरण की समीक्षा जरूरी है। उन्होंने नागरिकों से भी सुझाव देने की अपील की और कहा कि गठित समिति सभी प्रस्तावों पर विचार करेगी। राज्यभर में हो सकता है नामों का पुनर्मूल्यांकन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में कोलकाता सहित पश्चिम बंगाल के अन्य हिस्सों में भी सड़कों, पार्कों और सार्वजनिक स्थलों के नामों के पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। ऐसे में यह मुद्दा राज्य की राजनीति और सार्वजनिक विमर्श का प्रमुख विषय बन सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 20 सांसदों के बागी रुख अपनाने और नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय के ऐलान के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। इस बीच बागी सांसदों ने साफ किया है कि उनका संघर्ष ममता बनर्जी के खिलाफ नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर विकसित हुई कार्यशैली और नेतृत्व के तौर-तरीकों के खिलाफ है। 'ममता बनर्जी के प्रति सम्मान हमेशा रहेगा' लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात के बाद बागी गुट के एक वरिष्ठ सांसद ने कहा कि ममता बनर्जी उनके राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं और उनके प्रति सम्मान हमेशा बना रहेगा। उन्होंने कहा, "ममता बनर्जी हमारी नेता रही हैं। उन्होंने कई नेताओं को राजनीति में आगे बढ़ने का अवसर दिया। उनके प्रति हमारे मन में सम्मान हमेशा रहेगा, लेकिन अब बंगाल के विकास और नई दिशा के लिए काम करने का समय है।" 'बंगाल के विकास के लिए दिल्ली के साथ मिलकर काम करना होगा' बागी सांसद ने कहा कि वर्ष 2026 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद राज्य के विकास को प्राथमिकता देना जरूरी हो गया है। उनका दावा है कि कई केंद्रीय योजनाओं का लाभ राज्य के लोगों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाया। उन्होंने कहा कि बंगाल के विकास को गति देने के लिए केंद्र और राज्य के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है और अब दिल्ली के साथ मिलकर काम करने की जरूरत है। 'लड़ाई ममता से नहीं, पार्टी के भीतर के कॉर्पोरेट कल्चर से' बागी गुट के नेताओं का कहना है कि उनका विरोध ममता बनर्जी से नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर कथित तौर पर विकसित हुए केंद्रीकृत और कॉर्पोरेट शैली के प्रबंधन से है। उनका आरोप है कि पिछले कुछ वर्षों में पार्टी के सांसदों और विधायकों की भूमिका सीमित हो गई थी और फैसलों में उनकी भागीदारी कम हो गई थी। अभिषेक बनर्जी के करीबियों पर भी उठाए सवाल बागी नेताओं ने दावा किया कि पार्टी के भीतर कुछ नेताओं और प्रभावशाली समूहों के बढ़ते प्रभाव से पुराने और वरिष्ठ नेताओं में असंतोष बढ़ रहा था। उनका कहना है कि यही असंतोष धीरे-धीरे बड़े राजनीतिक बदलाव का कारण बना। इन आरोपों पर टीएमसी की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
नई दिल्ली/कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में रविवार को उस समय बड़ा राजनीतिक भूचाल आ गया, जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी लोकसभा सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय का दावा कर दिया। यह वही पार्टी है, जिसने वर्ष 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में ‘दलबदलुओं को नकारें’ के नारे के साथ चुनाव लड़ा था। अब एक छोटे और लगभग गुमनाम राजनीतिक दल का अचानक राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आना कई सवाल खड़े कर रहा है। क्या है NCPI? नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है। निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड के मुताबिक, पार्टी का पंजीकृत कार्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के संकराईल में स्थित है और इसकी अध्यक्ष शेउली कुंडू हैं। पार्टी लंबे समय तक राजनीतिक रूप से हाशिये पर रही और उसका प्रभाव किसी भी राज्य में उल्लेखनीय नहीं रहा। TMC के बागी सांसदों के विलय के दावे के बाद अचानक यह दल राष्ट्रीय राजनीतिक चर्चाओं में आ गया है। ‘दलबदलुओं को नकारें’ था पार्टी का प्रमुख नारा NCPI ने 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के दौरान अपने प्रचार अभियान में नारा दिया था: "अपने अधिकारों की रक्षा के लिए राजनीतिक दलबदलुओं को नकारें, समाजसेवियों का समर्थन करें।" पार्टी ने खुद को राजनीतिक अवसरवाद और दल-बदल की राजनीति के खिलाफ एक विकल्प के रूप में पेश किया था। ऐसे में अब उसी पार्टी में बड़े पैमाने पर बागी सांसदों के शामिल होने का दावा राजनीतिक विडंबना के रूप में देखा जा रहा है। त्रिपुरा चुनाव में बेहद कमजोर रहा प्रदर्शन NCPI ने वर्ष 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में महज चार सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। इनमें चावमानु, अंबासा और कैलाशहर जैसी सीटें शामिल थीं।
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में जारी अंदरूनी संकट और बगावत के बीच पार्टी सांसद महुआ मोइत्रा ने वरिष्ठ नेता सुदीप बंद्योपाध्याय पर तीखा हमला बोला है। महुआ ने आरोप लगाया कि सुदीप बंद्योपाध्याय ने बीमारी का बहाना बनाकर पार्टी नेतृत्व को गुमराह किया और बाद में दिल्ली जाकर केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से मुलाकात की। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए महुआ मोइत्रा ने सुदीप बंद्योपाध्याय के पुराने राजनीतिक विवादों का जिक्र करते हुए उन पर विश्वासघात का आरोप लगाया। 'बीमारी का बहाना, दिल्ली में मुलाकात' महुआ मोइत्रा ने लिखा, "दादा सुदीप बंद्योपाध्याय, आपको 2017 में रोज वैली घोटाले में गिरफ्तार किया गया था। तब भी आपने बीमारी का सहारा लिया था। इस बार भी बीमारी का बहाना बनाकर दिल्ली जाकर गद्दारी की। तापस रॉय और कुणाल घोष आपके बारे में सही थे, गलती हमारी थी।" उन्होंने दावा किया कि सुदीप बंद्योपाध्याय ने पार्टी नेताओं को बताया था कि पेट संबंधी समस्या के कारण उन्हें कोलकाता के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया है। लेकिन बाद में उन्हें टीवी चैनलों पर दिल्ली में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर देखा गया। महुआ ने अपने पोस्ट में कटाक्ष करते हुए लिखा, "उनका मुखौटा और उनकी विग दोनों उतर गए। दादा, अब कम से कम अपना एक्स हैंडल बदलकर 'सुदीप बीजेपी बी टीम' कर लीजिए। हमारे नाम का इस्तेमाल मत कीजिए।" कुणाल घोष ने भी साधा निशाना टीएमसी नेता कुणाल घोष ने भी सुदीप बंद्योपाध्याय की आलोचना करते हुए कहा कि उनका राजनीतिक इतिहास दल बदलने से जुड़ा रहा है। उन्होंने कहा, "ममता दीदी ने इन लोगों को पद, सम्मान और पहचान दी, लेकिन बदले में उन्हें यही मिला। सुदीप बंद्योपाध्याय की राजनीति हमेशा ममता बनर्जी को गुमराह करने की रही है। मैंने पहले भी इस बारे में चेतावनी दी थी, जिसके कारण मुझे पार्टी से निलंबित तक होना पड़ा।" ममता को 'चीफ एडवाइजर' बनाने के बयान से बढ़ा विवाद विवाद तब और गहरा गया जब सुदीप बंद्योपाध्याय ने एक बांग्ला न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा कि टीएमसी के अधिकांश सांसद और विधायक चाहते हैं कि पार्टी का संगठन बचा रहे और ममता बनर्जी को 'मुख्य सलाहकार' (Chief Advisor) की भूमिका में रखा जाए। उन्होंने कहा कि बागी नेताओं ने उनसे आग्रह किया कि ममता बनर्जी को सम्मानपूर्वक मार्गदर्शक की भूमिका दी जाए, जिससे वह भावुक हो गए और बागी गुट के साथ जाने का फैसला किया। उनके इस बयान पर टीएमसी नेता कल्याण बनर्जी ने भी नाराजगी जताई और कहा कि ममता बनर्जी ने ही सुदीप बंद्योपाध्याय को राजनीति में स्थापित किया, संकट के समय उनका साथ दिया और आज वही उन्हें 'सलाहकार' बनाने की बात कर रहे हैं। बागी सांसदों के दावे से बढ़ी सियासी हलचल टीएमसी में मतभेदों की खबरों के बीच यह दावा भी किया जा रहा है कि लोकसभा में पार्टी के 20 सांसदों ने अलग समूह बना लिया है और वे खुद को 'वास्तविक टीएमसी' का प्रतिनिधि बता रहे हैं। बागी सांसद काकोली घोष दस्तिदार ने दावा किया है कि 20 सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय कर लिया है और यह नया समूह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को समर्थन देगा। इन दावों और आरोपों पर सुदीप बंद्योपाध्याय की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं, टीएमसी के भीतर जारी सियासी उठापटक ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है।
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर जारी सियासी संकट अब संसद के गलियारों तक पहुंच गया है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि सदन में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) को केवल एक संयुक्त और एकल राजनीतिक दल के रूप में ही मान्यता दी जाए। अभिषेक बनर्जी का यह कदम ऐसे समय सामने आया है, जब पार्टी के भीतर बागी सांसदों के अलग गुट बनाने और स्वतंत्र पहचान की मांग के दावों से राजनीतिक हलचल तेज है। बागी गुट को मान्यता नहीं देने की मांग सूत्रों के मुताबिक, अपने पत्र में अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष से अनुरोध किया है कि सदन के भीतर किसी भी ऐसे समूह, धड़े या गुट को आधिकारिक मान्यता, दर्जा या सुविधाएं न दी जाएं, जो स्वयं को ‘असली टीएमसी’ बताने का दावा कर रहा हो। पत्र में कहा गया है कि लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व केवल पार्टी द्वारा अधिकृत नेता और आधिकारिक व्हिप के माध्यम से ही माना जाना चाहिए और पार्टी को एक एकीकृत संसदीय दल के रूप में देखा जाना चाहिए। संसद तक पहुंचा टीएमसी का अंदरूनी संकट पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के बाद टीएमसी के भीतर नेतृत्व और संगठन को लेकर असंतोष की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। बागी नेताओं के अलग संसदीय गुट बनाने की अटकलों के बीच अभिषेक बनर्जी का यह पत्र पार्टी नेतृत्व की ओर से एक महत्वपूर्ण रणनीतिक कदम माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि कोई बागी गुट संसद में अलग पहचान की मांग करता है, तो उसके संवैधानिक और संसदीय पहलुओं पर अंतिम फैसला लोकसभा अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र में होगा। स्पीकर के फैसले पर सबकी नजर अभिषेक बनर्जी के पत्र के बाद दिल्ली और कोलकाता के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के कार्यालय की ओर से अभी तक इस पत्र पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। आने वाले दिनों में स्पीकर का रुख यह तय कर सकता है कि संसद में तृणमूल कांग्रेस एकजुट संसदीय दल के रूप में बनी रहती है या किसी संभावित बागी गुट को अलग पहचान मिलती है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की करारी हार के बाद पार्टी के भीतर मचा सियासी घमासान अब नए मोड़ पर पहुंच गया है। पार्टी के वरिष्ठ सांसद और लंबे समय तक लोकसभा में टीएमसी संसदीय दल के नेता रहे सुदीप बंद्योपाध्याय के बागी खेमे में शामिल होने के दावों ने बंगाल की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। रिपोर्टों के मुताबिक, सुदीप बंद्योपाध्याय ने ममता बनर्जी को सक्रिय राजनीति से अलग कर उन्हें केवल ‘मुख्य सलाहकार’ (Chief Advisor) की भूमिका में रखने के प्रस्ताव का समर्थन किया है। इस घटनाक्रम को टीएमसी के अंदर चल रही नेतृत्व की लड़ाई में बड़ा झटका माना जा रहा है। ‘दीदी का सम्मान, लेकिन संगठन में बदलाव जरूरी’ एक बांग्ला समाचार चैनल को दिए इंटरव्यू में सुदीप बंद्योपाध्याय ने कथित तौर पर कहा कि पार्टी के कई सांसद और विधायक चाहते हैं कि संगठन का अस्तित्व बचाने के लिए नए नेतृत्व और नई कार्यशैली की जरूरत है। उन्होंने कहा कि बागी नेताओं ने उनसे संपर्क कर बताया कि वे ममता बनर्जी का सम्मान करते हैं और उन्हें पार्टी की ‘मुख्य सलाहकार’ बनाकर मार्गदर्शक की भूमिका में रखना चाहते हैं। सुदीप के मुताबिक, इस प्रस्ताव ने उन्हें प्रभावित किया और उन्होंने बागी खेमे के साथ जाने का फैसला किया। बागी गुट का दावा- 22 सांसद हुए साथ बागी गुट का दावा है कि दो और लोकसभा सांसद उनके साथ आ गए हैं, जिसके बाद विद्रोही सांसदों की संख्या बढ़कर 22 हो गई है। सूत्रों के अनुसार, यह गुट संसद में एक अलग संसदीय ब्लॉक के रूप में मान्यता हासिल करने की कोशिश में जुटा है। बताया जा रहा है कि बागी नेता जल्द ही लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर स्वतंत्र संसदीय समूह के तौर पर मान्यता की मांग कर सकते हैं। कल्याण बनर्जी का पलटवार सुदीप बंद्योपाध्याय के कथित फैसले पर टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी ने सुदीप बंद्योपाध्याय के राजनीतिक जीवन में हमेशा उनका साथ दिया और संकट के समय उनके लिए ढाल बनकर खड़ी रहीं। कल्याण बनर्जी ने आरोप लगाया कि जिन नेताओं को ममता बनर्जी ने आगे बढ़ाया, वही आज उन्हें केवल ‘सलाहकार’ बनाने की बात कर रहे हैं। उन्होंने इसे ‘राजनीतिक गद्दारी’ और ‘दीदी की पीठ में छुरा घोंपने’ जैसा बताया। टीएमसी में बढ़ सकती है अंदरूनी खींचतान राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि बागी गुट के दावे सही साबित होते हैं, तो यह तृणमूल कांग्रेस के लिए अब तक का सबसे बड़ा आंतरिक संकट साबित हो सकता है। इससे पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और नेतृत्व को लेकर नई बहस छिड़ सकती है। इन दावों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है और पार्टी नेतृत्व की ओर से विस्तृत प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में उस समय हलचल मच गई, जब लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 सांसदों के पार्टी से अलग होकर त्रिपुरा की नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी (NCP) में विलय करने के दावे सामने आए। रिपोर्टों के मुताबिक, इस गुट का नेतृत्व वरिष्ठ सांसद डॉ. काकोली घोष दस्तीदार और सुदीप बंद्योपाध्याय कर रहे हैं। दावों के अनुसार, बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को एक पत्र सौंपकर नए राजनीतिक गठन की जानकारी दी है। हालांकि, इस संबंध में अभी तक लोकसभा सचिवालय, चुनाव आयोग या तृणमूल कांग्रेस की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। दलबदल कानून से बचने की रणनीति? रिपोर्टों में कहा गया है कि सांसदों ने अलग संसदीय गुट बनाने के बजाय किसी अन्य क्षेत्रीय दल में विलय का रास्ता चुना है, ताकि दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के प्रावधानों से बचा जा सके। भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) के तहत किसी दल के कम-से-कम दो-तिहाई निर्वाचित सदस्य किसी अन्य पार्टी में विलय का निर्णय लेते हैं, तो कुछ परिस्थितियों में अयोग्यता से राहत मिल सकती है। इस पर अंतिम निर्णय संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं के बाद ही संभव होता है। क्या टीएमसी के नाम और चुनाव चिह्न पर भी हो सकता है विवाद? कुछ रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि नया गुट भविष्य में तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न पर दावा कर सकता है। यदि ऐसा होता है, तो मामला चुनाव आयोग और न्यायालय के समक्ष जा सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि इन दावों में सच्चाई पाई जाती है, तो यह पश्चिम बंगाल की राजनीति और राष्ट्रीय विपक्षी खेमे के लिए बड़ा घटनाक्रम साबित हो सकता है। टीएमसी की प्रतिक्रिया का इंतजार तृणमूल कांग्रेस की ओर से इस पूरे घटनाक्रम पर आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है। पार्टी नेतृत्व की प्रतिक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं की स्थिति स्पष्ट होने के बाद ही यह तय हो सकेगा कि यह महज राजनीतिक दावा है या भारतीय राजनीति में किसी बड़े पुनर्गठन की शुरुआत।
कोलकाता: तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में जारी अंदरूनी घमासान के बीच जादवपुर की फायरब्रांड सांसद सायोनी घोष का नया अवतार चर्चा का विषय बन गया है। कभी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तरह सफेद सूती साड़ी, बड़ी बिंदी और सादगी भरे अंदाज में नजर आने वाली सायोनी अब जींस-टीशर्ट, कैजुअल कुर्तियों, मॉडर्न हेयरस्टाइल और स्नीकर्स में दिखाई दे रही हैं। दिल्ली से लेकर कोलकाता तक राजनीतिक गलियारों में उनके इस बदलाव को लेकर कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल फैशन में बदलाव नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक संदेश का संकेत हो सकता है। साड़ी से स्नीकर्स तक, क्यों बदला सायोनी का अंदाज? हाल के दिनों में सायोनी घोष कई सार्वजनिक कार्यक्रमों और राजनीतिक दौरों के दौरान अपने नए लुक में नजर आई हैं। उन्होंने पारंपरिक सफेद साड़ी और हवाई चप्पलों की जगह आधुनिक परिधान और स्नीकर्स को अपनाया है। उनका यह बदलाव ऐसे समय सामने आया है, जब टीएमसी के भीतर नेतृत्व, रणनीति और संगठनात्मक दिशा को लेकर बहस तेज है। ऐसे में उनके नए मेकओवर को राजनीतिक संकेतों के रूप में भी देखा जा रहा है। कभी कहा था- 'दीदी की सादगी मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा बन गई' नवंबर 2025 में एक टीवी इंटरव्यू के दौरान सायोनी घोष ने ममता बनर्जी की सादगी से अपनी प्रेरणा का जिक्र किया था। उन्होंने कहा था कि जिस पार्टी और नेता के साथ वे काम करती हैं, उनके मूल्यों और जीवनशैली का असर स्वाभाविक रूप से उनके व्यक्तित्व पर पड़ता है। उन्होंने यह भी कहा था कि वे अपनी नेता की तरह आम लोगों, 'मां-माटी-मानुष' और जमीनी राजनीति के करीब रहना चाहती हैं। अभिनय की दुनिया से राजनीति तक का सफर टॉलीवुड की लोकप्रिय अभिनेत्री रहीं सायोनी घोष ने राजनीति में आने के बाद अपनी ग्लैमरस छवि को काफी हद तक पीछे छोड़ दिया था। उन्होंने खुद कई मौकों पर कहा कि अभिनय के दौरान भी वह व्यक्तिगत जीवन में सादगी पसंद करती थीं और राजनीति में आने के बाद ममता बनर्जी के व्यक्तित्व ने उन पर गहरा प्रभाव डाला। क्या टीएमसी की अंदरूनी खींचतान से जुड़ा है मेकओवर? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि टीएमसी में जारी कथित 'ओल्ड गार्ड बनाम न्यू गार्ड' की खींचतान, पार्टी के अंदर नेतृत्व को लेकर चल रही बहस और हालिया विवादों के बीच सायोनी घोष अपनी एक स्वतंत्र राजनीतिक पहचान स्थापित करने की कोशिश कर रही हैं। विश्लेषकों के मुताबिक, यह बदलाव उनकी 'इंडिपेंडेंट ब्रांडिंग' की रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है, जिससे वे खुद को केवल किसी नेता की छवि तक सीमित न रखकर एक अलग राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में पेश कर सकें। सियासी संदेश या व्यक्तिगत पसंद? सायोनी घोष की ओर से उनके नए लुक को लेकर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन उनका बदला हुआ अंदाज राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि क्या यह सिर्फ व्यक्तिगत पसंद का मामला है या फिर बंगाल की राजनीति में बदलते समीकरणों के बीच एक नया राजनीतिक संदेश देने की कोशिश। फिलहाल, टीएमसी के अंदरूनी संकट के दौर में सायोनी घोष का यह नया अवतार बंगाल की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे चुका है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर जारी कथित असंतोष और संगठनात्मक चुनौतियों ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया का भी ध्यान अपनी ओर खींचा है। विभिन्न वैश्विक प्रकाशनों में प्रकाशित विश्लेषणों में पार्टी की मौजूदा स्थिति, नेतृत्व शैली और भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं पर चर्चा की गई है। वैश्विक मीडिया में टीएमसी संकट पर चर्चा अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों में प्रकाशित रिपोर्टों और विश्लेषणों में टीएमसी के भीतर उभर रहे मतभेदों को पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखा गया है। कई लेखों में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लंबे राजनीतिक सफर और राज्य की राजनीति में उनकी भूमिका का उल्लेख करते हुए वर्तमान परिस्थितियों का आकलन किया गया है। विश्लेषकों ने ममता बनर्जी को एक संघर्षशील और जनाधार वाली नेता बताया है, जिन्होंने लंबे राजनीतिक संघर्ष के बाद राज्य में अपनी मजबूत पहचान बनाई। कुछ रिपोर्टों में पार्टी के भीतर नेतृत्व और संगठनात्मक फैसलों को लेकर उठ रहे सवालों का भी जिक्र किया गया है। संगठनात्मक चुनौतियों पर केंद्रित रहे विश्लेषण विदेशी मीडिया में प्रकाशित कुछ लेखों में दावा किया गया है कि पार्टी के भीतर बढ़ते मतभेदों और नेतृत्व को लेकर असंतोष ने संगठन के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं। रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि वरिष्ठ नेताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय बनाए रखना टीएमसी के लिए बड़ी परीक्षा बन सकता है। कुछ विश्लेषणों में चुनावी रणनीतियों और संगठनात्मक ढांचे में हुए बदलावों का भी उल्लेख किया गया है, जिन्हें पार्टी की वर्तमान स्थिति से जोड़कर देखा जा रहा है। राजनीतिक भविष्य को लेकर अलग-अलग राय अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विश्लेषकों की राय इस मुद्दे पर बंटी हुई दिखाई देती है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि टीएमसी अभी भी पश्चिम बंगाल की एक प्रमुख राजनीतिक ताकत बनी हुई है और पार्टी नेतृत्व के पास हालात संभालने का पर्याप्त अनुभव है। वहीं, कुछ अन्य विश्लेषकों का कहना है कि यदि संगठन के भीतर मतभेद बढ़ते हैं, तो इसका असर आगामी राजनीतिक समीकरणों पर पड़ सकता है। नेतृत्व और संगठन दोनों के लिए अहम दौर राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियां टीएमसी नेतृत्व के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा साबित हो सकती हैं। पार्टी को एकजुट बनाए रखना और कार्यकर्ताओं का विश्वास कायम रखना आने वाले समय में सबसे बड़ी चुनौती होगी। टीएमसी की ओर से अब तक पार्टी के भीतर किसी बड़े संकट की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। पार्टी नेतृत्व लगातार संगठन की एकता और मजबूती पर जोर देता रहा है। बंगाल की राजनीति पर बनी रहेगी नजर पश्चिम बंगाल की राजनीति में टीएमसी की भूमिका को देखते हुए राजनीतिक पर्यवेक्षक आने वाले दिनों के घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। पार्टी के भीतर की स्थिति और नेतृत्व के फैसले न केवल राज्य बल्कि राष्ट्रीय राजनीति पर भी असर डाल सकते हैं।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर जारी उथल-पुथल के बीच पार्टी सांसद महुआ मोइत्रा ने बागी नेताओं पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने पार्टी छोड़कर जाने वाले नेताओं को संगठन के लिए नुकसान नहीं, बल्कि एक तरह की "सफाई प्रक्रिया" करार दिया। साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री और टीएमसी प्रमुख Mamata Banerjee के प्रति अपनी निष्ठा दोहराते हुए कहा कि वह अंतिम समय तक उनके साथ खड़ी रहेंगी। बागी नेताओं पर साधा निशाना कृष्णानगर से लोकसभा सांसद Mahua Moitra ने कहा कि जो नेता कठिन समय में पार्टी का साथ छोड़ रहे हैं, वे कभी भी संगठन और उसकी विचारधारा के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध नहीं थे। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों के जाने से पार्टी कमजोर नहीं होती, बल्कि संगठन और अधिक मजबूत तथा स्पष्ट दिशा में आगे बढ़ता है। महुआ ने दावा किया कि टीएमसी से अवसरवादी तत्वों के बाहर जाने को संकट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। ममता बनर्जी के प्रति जताई अटूट निष्ठा महुआ मोइत्रा ने कहा कि राजनीतिक जीवन के कठिन दौर में पार्टी नेतृत्व ने हमेशा उन पर भरोसा जताया। उन्होंने कहा कि इसी विश्वास के कारण वह टीएमसी नेतृत्व के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनका राजनीतिक भविष्य तृणमूल कांग्रेस के साथ जुड़ा हुआ है और वह किसी अन्य राजनीतिक दल का हिस्सा बनने की कल्पना भी नहीं करतीं। अभिषेक बनर्जी के समर्थन में आईं सामने टीएमसी सांसद ने पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव Abhishek Banerjee का भी बचाव किया। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दबाव या जांच एजेंसियों की कार्रवाई से पार्टी नेतृत्व को कमजोर नहीं किया जा सकता। महुआ ने दावा किया कि तृणमूल कांग्रेस राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका मजबूती से निभाती रहेगी और नेतृत्व किसी भी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है। कांग्रेस में विलय की चर्चाओं को बताया निराधार हाल के दिनों में ममता बनर्जी और कांग्रेस नेतृत्व के बीच हुई बैठकों के बाद टीएमसी और कांग्रेस के संभावित राजनीतिक समीकरणों को लेकर कई चर्चाएं सामने आई थीं। महुआ मोइत्रा के बयान को इन चर्चाओं के जवाब के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने संकेत दिया कि पार्टी की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बरकरार रहेगी और तृणमूल कांग्रेस अपने संगठनात्मक ढांचे और क्षेत्रीय आधार के साथ आगे बढ़ती रहेगी। टीएमसी में जारी है राजनीतिक खींचतान पश्चिम बंगाल में टीएमसी के भीतर बढ़ती गुटबाजी और नेताओं के अलग-अलग रुख ने राज्य की राजनीति को नई दिशा दे दी है। एक ओर बागी गुट लगातार अपने समर्थन का दावा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर महुआ मोइत्रा जैसे वरिष्ठ नेता खुलकर ममता बनर्जी के नेतृत्व के समर्थन में सामने आ रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में टीएमसी के भीतर शक्ति संतुलन और नेतृत्व को लेकर संघर्ष और तेज हो सकता है, जिसका असर पश्चिम बंगाल की राजनीति पर भी देखने को मिलेगा।
कोलकाता: तृणमूल कांग्रेस (TMC) में कथित अंदरूनी असंतोष और कुछ सांसदों के रुख को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इसी बीच कृष्णानगर से सांसद महुआ मोइत्रा ने पार्टी के कुछ नेताओं और सांसदों पर तीखा हमला बोलते हुए उनकी निष्ठा पर सवाल उठाए हैं। लोकसभा में टीएमसी के कुछ सांसदों द्वारा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के प्रति समर्थन जताने संबंधी चर्चाओं और राजनीतिक अटकलों के बीच महुआ मोइत्रा खुलकर पार्टी नेतृत्व के पक्ष में सामने आई हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ सांसद जनता के जनादेश के विपरीत राजनीतिक रुख अपना रहे हैं। यूसुफ पठान पर सीधे सवाल महुआ मोइत्रा ने पूर्व भारतीय क्रिकेटर और बहरमपुर से टीएमसी सांसद यूसुफ पठान का नाम लेते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर सवाल उठाए। उन्होंने लिखा कि यदि राजनीतिक दबाव या किसी केंद्रीय नेता के बुलावे पर सांसद अपना रुख बदलते हैं, तो यह मतदाताओं के विश्वास के साथ न्याय नहीं होगा। उन्होंने कहा कि यूसुफ पठान को जनता ने भारी समर्थन देकर संसद भेजा है और उन्हें अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों के भरोसे का सम्मान करना चाहिए। बागी सांसदों को दी खुली चुनौती महुआ मोइत्रा ने कथित रूप से पार्टी लाइन से अलग रुख अपनाने वाले सांसदों को चुनौती देते हुए कहा कि यदि वे वास्तव में अपने नए राजनीतिक निर्णय को लेकर आश्वस्त हैं, तो उन्हें सांसद पद से इस्तीफा देकर दोबारा चुनाव मैदान में उतरना चाहिए। उन्होंने कहा कि सांसदों को यह साबित करना चाहिए कि उन्हें व्यक्तिगत लोकप्रियता के आधार पर समर्थन प्राप्त है या फिर वे केवल पार्टी और ममता बनर्जी की राजनीतिक छवि के कारण चुनाव जीतकर आए थे। NDA समर्थन को लेकर बढ़ी सियासी हलचल राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि लोकसभा में टीएमसी के कुछ सांसदों ने NDA के प्रति नरम रुख अपनाया है। इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसके बावजूद पार्टी के भीतर बढ़ते मतभेदों को लेकर चर्चाएं तेज हैं। महुआ मोइत्रा ने आरोप लगाया कि जनता ने टीएमसी उम्मीदवारों को भाजपा या NDA के समर्थन के लिए नहीं चुना था और जनादेश का सम्मान किया जाना चाहिए। चीफ व्हिप पद को लेकर भी विवाद इस राजनीतिक विवाद के बीच लोकसभा में टीएमसी के मुख्य सचेतक (Chief Whip) पद को लेकर भी नया विवाद सामने आया है। काकोली घोष दस्तीदार ने खुद को पार्टी का चीफ व्हिप बताते हुए लोकसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपा है। दूसरी ओर टीएमसी नेता कीर्ति आजाद का दावा है कि पार्टी नेतृत्व पहले ही काकोली घोष दस्तीदार को इस पद से हटाकर कल्याण बनर्जी को नई जिम्मेदारी सौंप चुका है। पार्टी के भीतर चल रही इस खींचतान ने टीएमसी की आंतरिक स्थिति को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में पार्टी नेतृत्व की ओर से उठाए जाने वाले कदमों पर सभी की नजर बनी हुई है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में तृणमूल कांग्रेस (TMC) को मिले झटके और पार्टी के भीतर बढ़ती असंतोष की चर्चाओं के बीच मुख्यमंत्री एवं पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी ने बड़ा संगठनात्मक फेरबदल किया है। पार्टी के नए ढांचे में कई वरिष्ठ नेताओं की भूमिका बढ़ाई गई है, जबकि संगठन के संचालन और रणनीतिक फैसलों को लेकर नई व्यवस्था बनाई गई है। वरिष्ठ नेताओं को मिली अहम भूमिका पार्टी सूत्रों के अनुसार, राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय और वरिष्ठ नेता सौगत रॉय को संगठनात्मक और राजनीतिक समन्वय से जुड़े महत्वपूर्ण दायित्व दिए गए हैं। वहीं सांसद महुआ मोइत्रा को राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की राजनीतिक और मीडिया रणनीति में अधिक सक्रिय भूमिका सौंपी गई है। अभिषेक बनर्जी की भूमिका पर चर्चा नए संगठनात्मक बदलावों के बाद पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी की भूमिका को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है। तृणमूल कांग्रेस की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की गई है, लेकिन पार्टी के अंदर लिए गए नए फैसलों को नेतृत्व की जिम्मेदारियों के पुनर्वितरण के रूप में देखा जा रहा है। दिल्ली और बंगाल दोनों पर फोकस पार्टी ने राष्ट्रीय राजनीति और संसदीय रणनीति पर अधिक ध्यान देने के लिए राज्यसभा सांसद डेरेक ओ'ब्रायन को फिर से प्रमुख जिम्मेदारी दी है। उन्हें दिल्ली में पार्टी की राजनीतिक रणनीति और संवाद को मजबूत करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। कई जिलों में संगठनात्मक बदलाव सूत्रों के मुताबिक, उत्तर 24 परगना, नदिया और मालदा समेत कई महत्वपूर्ण जिलों में संगठनात्मक स्तर पर बदलाव किए गए हैं। विधानसभा चुनाव में अपेक्षा के अनुरूप प्रदर्शन नहीं होने के बाद पार्टी नेतृत्व ने जिला इकाइयों में नई नियुक्तियों का फैसला किया है। बागी सुरों के बीच संगठन को मजबूत करने की कोशिश हाल के दिनों में पार्टी के कुछ नेताओं और जनप्रतिनिधियों की नाराजगी की खबरें सामने आई थीं। ऐसे में ममता बनर्जी का यह कदम संगठन को एकजुट रखने और कार्यकर्ताओं में नया संदेश देने की कोशिश माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस अपने संगठन को नए सिरे से खड़ा करने की रणनीति पर काम कर रही है और वरिष्ठ नेताओं को आगे लाकर संतुलन बनाने की कोशिश की जा रही है। संसदीय अनुशासन पर भी जोर पार्टी ने संसदीय गतिविधियों को अधिक प्रभावी बनाने के लिए सांसदों के समन्वय और अनुशासन पर भी विशेष ध्यान देने का फैसला किया है। इसके तहत संसदीय दल के भीतर जिम्मेदारियों का पुनर्वितरण किया गया है। तृणमूल कांग्रेस के इस संगठनात्मक पुनर्गठन को पार्टी के लिए आने वाले राजनीतिक दौर की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इन बदलावों का पार्टी की आंतरिक राजनीति और विपक्षी राजनीति में उसकी भूमिका पर क्या असर पड़ता है।
पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य स्थापना दिवस को लेकर बड़ा फैसला लिया है। बुधवार को राज्य सचिवालय में आयोजित कैबिनेट बैठक में यह तय किया गया कि अब हर वर्ष 20 जून को आधिकारिक रूप से ‘पश्चिम बंगाल दिवस’ मनाया जाएगा। सरकार का कहना है कि यह निर्णय राज्य के ऐतिहासिक और राजनीतिक विकास से जुड़े महत्वपूर्ण घटनाक्रमों को ध्यान में रखकर लिया गया है। मंत्री ने बताई फैसले की पृष्ठभूमि कैबिनेट बैठक के बाद मंत्री दिलीप घोष ने बताया कि 20 जून की तारीख बंगाल के इतिहास में विशेष महत्व रखती है। उनके अनुसार, वर्ष 1947 में इसी दिन तत्कालीन संयुक्त बंगाल विधानसभा में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर मतदान हुआ था, जिसने बाद में पश्चिम बंगाल के गठन की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि सरकार इस ऐतिहासिक घटना को औपचारिक मान्यता देना चाहती है। पूर्व व्यवस्था से अलग नया दृष्टिकोण इस निर्णय के साथ राज्य सरकार ने उस परंपरा से अलग रास्ता अपनाया है, जिसमें बंगाली नववर्ष ‘पोइला बोइशाख’ के अवसर पर पश्चिम बंगाल दिवस मनाया जाता था। नई सरकार का मानना है कि राज्य के गठन से जुड़े ऐतिहासिक घटनाक्रमों को आधार बनाकर स्थापना दिवस मनाना अधिक उपयुक्त होगा। राज्यभर में होंगे विशेष कार्यक्रम सरकार ने 20 जून के आयोजन को व्यापक रूप देने की योजना बनाई है। इसके लिए संस्कृति और गृह विभाग को आवश्यक तैयारियां करने के निर्देश दिए गए हैं। राज्य सचिवालय से लेकर जिला, ब्लॉक और स्थानीय प्रशासनिक इकाइयों तक विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इनमें सांस्कृतिक आयोजन, व्याख्यान, प्रदर्शनी और इतिहास से जुड़े विशेष कार्यक्रम शामिल होंगे। ऐतिहासिक विरासत को प्रमुखता देने की कोशिश सरकार का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य नई पीढ़ी को पश्चिम बंगाल के गठन और उससे जुड़े ऐतिहासिक घटनाक्रमों की जानकारी देना है। इसके तहत राज्य के विभिन्न हिस्सों में इतिहास, संस्कृति और सामाजिक विकास से संबंधित कार्यक्रम आयोजित कर जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा। राजनीतिक चर्चा का नया विषय बना फैसला राज्य स्थापना दिवस की नई तिथि तय किए जाने के बाद राजनीतिक हलकों में भी चर्चा तेज हो गई है। विभिन्न राजनीतिक दल इस फैसले को अपने-अपने नजरिए से देख रहे हैं। सरकार का कहना है कि यह निर्णय ऐतिहासिक तथ्यों और राज्य की विरासत को सम्मान देने की भावना से लिया गया है। 20 जून को पहली बार होगा सरकारी स्तर पर आयोजन सरकार ने स्पष्ट किया है कि वर्ष 2026 से 20 जून को पूरे पश्चिम बंगाल में आधिकारिक कार्यक्रमों के माध्यम से राज्य स्थापना दिवस मनाया जाएगा। प्रशासनिक स्तर पर तैयारियां शुरू कर दी गई हैं और सभी विभागों को कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार करने के निर्देश जारी किए गए हैं।
पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ सनातन धर्म को लेकर कथित विवादित टिप्पणी करने के मामले में FIR दर्ज की गई है। यह कार्रवाई एक अधिवक्ता की शिकायत के आधार पर की गई है। पुलिस के अनुसार, सिलीगुड़ी साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में अधिवक्ता रिंकी चटर्जी सिंह की शिकायत पर मामला दर्ज किया गया। शिकायत में ममता बनर्जी पर धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगाया गया है। क्या है पूरा मामला? शिकायतकर्ता रिंकी चटर्जी सिंह के मुताबिक, मामला वर्ष 2025 में कोलकाता के रेड रोड पर आयोजित ईद कार्यक्रम से जुड़ा है। आरोप है कि उस कार्यक्रम में ममता बनर्जी ने सार्वजनिक मंच से हिंदू धर्म और सनातन पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। शिकायत में यह भी कहा गया है कि तृणमूल कांग्रेस के कुछ अन्य नेताओं ने भी समय-समय पर हिंदू देवी-देवताओं और सनातन धर्म को लेकर विवादित बयान दिए। रिंकी चटर्जी सिंह ने आरोप लगाया कि उन्होंने पहले भी इस मामले में शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की थी, लेकिन शुरुआत में पुलिस ने FIR दर्ज नहीं की। शिकायतकर्ता ने पुलिस पर भी लगाए आरोप अधिवक्ता रिंकी चटर्जी सिंह का कहना है कि शिकायत दर्ज कराने के दौरान उन्हें कथित तौर पर अपमानित किया गया और उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया गया। बाद में शिकायत की समीक्षा के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया। फिलहाल मामले की जांच जारी है। चुनावी हार के बाद टीएमसी में बढ़ी बेचैनी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष और राजनीतिक हलचल लगातार बढ़ती दिखाई दे रही है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कई नेता पार्टी से दूरी बनाने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि बड़ी संख्या में पार्षदों और स्थानीय नेताओं ने भी इस्तीफा दिया है, हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। विपक्ष ने साधा निशाना ममता बनर्जी के खिलाफ FIR दर्ज होने के बाद विपक्षी दलों ने टीएमसी पर हमला तेज कर दिया है। विपक्ष का आरोप है कि तुष्टिकरण की राजनीति के चलते हिंदू भावनाओं का अपमान किया गया। वहीं टीएमसी की ओर से अभी तक इस मामले पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। राजनीतिक माहौल गरमाया बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद राज्य का राजनीतिक माहौल लगातार गर्म बना हुआ है। एक तरफ टीएमसी के भीतर असंतोष की खबरें सामने आ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ पुराने बयानों और विवादों को लेकर कानूनी कार्रवाई भी तेज होती दिखाई दे रही है। सभी की नजर इस मामले में आगे होने वाली कानूनी प्रक्रिया और टीएमसी नेतृत्व की प्रतिक्रिया पर टिकी हुई है।
पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद शुरू हुई 3D नीति का असर अब सीमा क्षेत्रों में साफ दिखाई देने लगा है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की “Detect, Delete and Deport” यानी “पता लगाओ, हटाओ और निर्वासित करो” नीति के बाद अवैध रूप से रह रहे संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों में दहशत का माहौल बताया जा रहा है। उत्तर 24 परगना जिले के बशीरहाट स्थित हकीमपुर बॉर्डर पर पिछले दो दिनों में बड़ी संख्या में लोग सीमा पार कर बांग्लादेश लौटने की कोशिश करते दिखाई दिए। इनमें पुरुषों के साथ महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं। सामान और परिवार के साथ बॉर्डर पर जुटे लोग हकीमपुर सीमा चौकी पर पहुंचे कई लोग अपने साथ घरेलू सामान, बिस्तर, बर्तन और बड़े-बड़े बोरे लेकर पहुंचे हैं। बताया जा रहा है कि इनमें से अधिकतर लोग कोलकाता, दमदम, न्यूटाउन और डानकुनी जैसे इलाकों में वर्षों से दिहाड़ी मजदूर या घरेलू सहायक के तौर पर काम कर रहे थे। सीमा पर मौजूद लोगों का कहना है कि प्रशासन की सख्ती और निरुद्ध केंद्रों की शुरुआत के बाद उनके बीच डर का माहौल बन गया है। एक व्यक्ति ने कहा, “अगर सरकार हमें यहां रहने नहीं देगी और डिटेंशन सेंटर में भेज देगी, तो हमारे पास वापस लौटने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता।” मालदा में शुरू हुआ पहला निरुद्ध केंद्र राज्य सरकार की कार्रवाई के तहत मालदा में पहला निरुद्ध केंद्र शुरू किया गया है। यहां फिलहाल 9 संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों को रखा गया है। प्रशासन के अनुसार, इन्हें कानूनी प्रक्रिया पूरी होने तक केंद्र में रखा जाएगा, जिसके बाद निर्वासन की कार्रवाई की जाएगी। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, अन्य जिलों में भी ऐसे केंद्र सक्रिय करने की तैयारी चल रही है। बीएसएफ भी बढ़ी भीड़ से सतर्क सीमा सुरक्षा बल (BSF) के अधिकारियों ने पुष्टि की है कि पिछले दो दिनों में सीमा पार लौटने की कोशिश करने वालों की संख्या अचानक बढ़ी है। अधिकारियों के अनुसार, दस्तावेजों की जांच की जा रही है और बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड (BGB) के साथ समन्वय बनाकर आगे की प्रक्रिया तय की जा रही है। बीएसएफ के अधिकारियों का कहना है कि कई लोग खुद ही सीमा चौकी पर पहुंचकर वापस भेजे जाने की मांग कर रहे हैं। जाली दस्तावेज पकड़े जाने का डर सूत्रों के मुताबिक, कई लोगों को यह आशंका है कि यदि घर-घर जांच अभियान चलाया गया तो उनके आधार कार्ड और अन्य पहचान दस्तावेजों की जांच हो सकती है। इसी डर के चलते कई परिवार जल्द से जल्द सीमा पार लौटने की कोशिश कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि प्रशासन अवैध पहचान पत्रों और फर्जी दस्तावेजों की भी जांच कर रहा है। हकीमपुर बॉर्डर पर शरणार्थी शिविर जैसे हालात हकीमपुर सीमा चौकी पर मौजूद तस्वीरों में लोग प्लास्टिक की चादरों के नीचे खुले आसमान में बैठे नजर आ रहे हैं। उनके पास वर्षों की जमा पूंजी और घरेलू सामान से भरे बैग और गठरियां दिखाई दे रही हैं। सीमा क्षेत्र में अचानक बढ़ी भीड़ के कारण प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट मोड पर हैं। पहले भी दिखा था ऐसा माहौल पिछले वर्ष मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के दौरान भी सीमा क्षेत्रों में ऐसी हलचल देखी गई थी। इस बार नई सरकार की सख्ती और 3D अभियान के कारण स्थिति अधिक गंभीर मानी जा रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राज्य सरकार की नई नीति ने स्पष्ट संकेत दिया है कि अवैध प्रवास के मामलों में अब सख्त कार्रवाई की जाएगी।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में तृणमूल कांग्रेस की बड़ी हार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। काकोली घोष दस्तीदार के इस्तीफे के बाद अब राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय के बयान ने पार्टी नेतृत्व की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। टीएमसी के वरिष्ठ नेता और अनुभवी सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने पार्टी की कार्यशैली, भ्रष्टाचार और राजनीतिक हालात पर सवाल उठाते हुए ऐसे संकेत दिए हैं, जिन्हें पार्टी के भीतर खुला विद्रोह माना जा रहा है। उनके बयानों के बाद बंगाल की राजनीति में नई हलचल शुरू हो गई है। “असहनीय अराजकता का अंत हुआ” : सुखेंदु शेखर रॉय सुखेंदु शेखर रॉय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में पश्चिम बंगाल की राजनीतिक स्थिति की तुलना रोमन साम्राज्य के पतन से की। उन्होंने लिखा कि वर्ष 44 ईसा पूर्व में जूलियस सीजर की हत्या सीनेट में हुई थी, लेकिन बंगाल में जनता ने “असहनीय अराजकता” का अंत कर दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रॉय का यह बयान सीधे तौर पर टीएमसी शासन और पार्टी के भीतर बढ़ते भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। “भ्रष्ट लोगों को बढ़ावा मिला, बुद्धिजीवियों को किनारे किया गया” एक अन्य पोस्ट में रॉय ने कहा कि जब भ्रष्ट लोग व्यवस्था पर हावी हो जाते हैं और बुद्धिमानों को निर्णय प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाता है, तब किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का पतन तय हो जाता है। उन्होंने स्वतंत्र विचारों और आंतरिक लोकतंत्र की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि किसी भी राजनीतिक दल को आलोचना और अलग राय को दबाने के बजाय सुनना चाहिए। आरजी कर कांड को लेकर भी जताई नाराजगी सूत्रों के अनुसार, सुखेंदु शेखर रॉय इस बात से बेहद नाराज हैं कि आरजी कर मेडिकल कॉलेज मामले में जनता के गुस्से को पार्टी सही तरीके से समझ नहीं पाई। रॉय का मानना है कि महिला डॉक्टर के साथ हुई दरिंदगी के बाद सड़कों पर जो भारी जनआक्रोश दिखा, उसे पार्टी नेतृत्व ने गंभीरता से नहीं लिया। उन्होंने कथित तौर पर कहा कि जब जनता स्वतःस्फूर्त तरीके से विरोध कर रही थी, तब पार्टी के कुछ नेता उसे राजनीतिक साजिश बताने में लगे थे। उनके अनुसार, यही disconnect आगे चलकर चुनावी हार की बड़ी वजह बना। “पार्टी में भ्रष्टाचार संस्थागत रूप ले चुका” सुखेंदु शेखर रॉय ने निजी बातचीत में यह भी स्वीकार किया कि पार्टी के भीतर भ्रष्टाचार अब “संस्थागत रूप” ले चुका है। उनका मानना है कि इससे पार्टी की जमीनी पकड़ कमजोर हुई और कार्यकर्ताओं के बीच निराशा बढ़ी। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि रॉय का इशारा पार्टी के उन प्रभावशाली नेताओं की तरफ है, जिन पर लंबे समय से भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के आरोप लगते रहे हैं। क्यों महत्वपूर्ण माने जाते हैं सुखेंदु शेखर रॉय? सुखेंदु शेखर रॉय पश्चिम बंगाल की राजनीति का बड़ा और अनुभवी चेहरा माने जाते हैं। कांग्रेस पृष्ठभूमि से आने वाले रॉय पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के करीबी रहे हैं और संवैधानिक मामलों के जानकार माने जाते हैं। संसद में वे लंबे समय तक टीएमसी के सबसे मुखर नेताओं में शामिल रहे हैं। ऐसे में उनका खुलकर असंतोष जताना पार्टी नेतृत्व के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। टीएमसी में “पुराने बनाम नये” की लड़ाई तेज राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी हार के बाद टीएमसी में “पुराने बनाम नये नेतृत्व” की लड़ाई खुलकर सामने आने लगी है। पार्टी के पुराने नेता कथित तौर पर आई-पैक और नई रणनीतिक टीम की कार्यशैली से नाराज बताए जा रहे हैं। काकोली घोष दस्तीदार और अब सुखेंदु शेखर रॉय के बयानों ने यह संकेत दे दिया है कि आने वाले दिनों में टीएमसी के भीतर और बड़े राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिल सकते हैं। क्या ममता बनर्जी करेंगी संगठन में बड़ा बदलाव? टीएमसी की हार के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ममता बनर्जी पार्टी संगठन में बड़े स्तर पर बदलाव करेंगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि पार्टी नेतृत्व ने जल्द संगठनात्मक सुधार नहीं किए, तो असंतोष और बढ़ सकता है। सुखेंदु शेखर रॉय के बागी तेवरों ने यह साफ कर दिया है कि बंगाल की राजनीति में सत्ता परिवर्तन के बाद अब तृणमूल कांग्रेस के भीतर भी बड़ा संघर्ष शुरू हो चुका है।
Mamata Banerjee और Abhishek Banerjee ने सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे डिजिटल आंदोलन ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) को समर्थन देकर सियासी हलचल बढ़ा दी है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में करारी हार के बाद All India Trinamool Congress अब युवाओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की नई रणनीति पर काम करती दिख रही है। डेरेक ओब्रायन ने की पुष्टि टीएमसी के राज्यसभा सांसद Derek O'Brien ने सोमवार को कहा कि पार्टी नेतृत्व युवाओं के इस डिजिटल आंदोलन के साथ खड़ा है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, बंगाल चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी युवाओं और सोशल मीडिया की नई राजनीति को गंभीरता से लेने लगी हैं। क्या है ‘कॉकरोच जनता पार्टी’? ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ कोई पारंपरिक राजनीतिक दल नहीं है, बल्कि एक डिजिटल व्यंग्य आंदोलन है, जिसने सोशल मीडिया पर तेजी से लोकप्रियता हासिल की है। इसकी शुरुआत बोस्टन यूनिवर्सिटी के छात्र Abhijeet Dipke ने की थी। यह आंदोलन कथित तौर पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश Surya Kant की एक टिप्पणी के बाद चर्चा में आया, जिसमें ‘कॉकरोच’ शब्द को लेकर विवाद खड़ा हुआ था। बाद में युवाओं ने इसे बेरोजगारी, परीक्षा घोटालों और सिस्टम के खिलाफ प्रतीकात्मक विरोध में बदल दिया। NEET पेपर लीक के बाद बढ़ी लोकप्रियता CJP ने हाल ही में NEET-UG 2026 पेपर लीक मुद्दे को जोर-शोर से उठाया, जिसके बाद यह मेडिकल छात्रों और युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हो गया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर इसके फॉलोअर्स तेजी से बढ़े हैं। बताया जा रहा है कि टीएमसी इस डिजिटल पहुंच का फायदा उठाकर केंद्र सरकार को बेरोजगारी और पेपर लीक जैसे मुद्दों पर घेरना चाहती है। सरकार पर अकाउंट ब्लॉक करने का आरोप CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने दावा किया है कि उनके आंदोलन को दबाने की कोशिश की जा रही है। उनके अनुसार, संगठन के आधिकारिक एक्स और इंस्टाग्राम अकाउंट को हैक या ब्लॉक किया गया। वहीं केंद्रीय मंत्री Kiren Rijiju ने बिना नाम लिये इस तरह के आंदोलनों को “विदेशी एजेंडा” और “जॉर्ज सोरोस गैंग” से प्रेरित बताया। हालांकि CJP की ओर से दावा किया गया कि उनके 94 प्रतिशत फॉलोअर्स भारतीय हैं। डिजिटल राजनीति की ओर बढ़ रही TMC राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि टीएमसी अब पारंपरिक राजनीति के साथ-साथ मीम कल्चर, डिजिटल कैंपेन और सोशल मीडिया आधारित आंदोलनों को भी अपनी रणनीति का हिस्सा बना रही है। बीजेपी जहां इसे विपक्ष की नई साजिश बता रही है, वहीं युवाओं के बीच ममता बनर्जी का यह “प्रो-यूथ” रुख चर्चा का विषय बन गया है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। 2026 विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद Mamata Banerjee अब विपक्षी INDIA गठबंधन को फिर से सक्रिय करने की कोशिश में जुट गई हैं। खबर है कि तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ने विपक्षी दलों की एक अहम बैठक बुलाने की पहल की है, जिससे राष्ट्रीय राजनीति में नई हलचल शुरू हो गई है। भवानीपुर में हार ने बढ़ाई मुश्किल करीब 15 साल तक West Bengal की सत्ता पर काबिज रहीं ममता बनर्जी इस बार न सिर्फ सरकार गंवा बैठीं, बल्कि अपने पारंपरिक गढ़ भवानीपुर सीट से भी चुनाव हार गईं। उन्हें बीजेपी नेता Suvendu Adhikari ने मात दी। 2021 में 215 सीटें जीतने वाली टीएमसी 2026 में महज 80 सीटों तक सिमट गई। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि इस हार के बाद ममता अब राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए विपक्षी दलों से रिश्ते सुधारना चाहती हैं। कांग्रेस ने क्या कहा? पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस के महासचिव Ashutosh Chatterjee ने कहा कि INDIA गठबंधन को लेकर कोई भी अंतिम फैसला All India Congress Committee यानी AICC लेगी। उन्होंने साफ कहा कि प्रदेश स्तर पर निर्णय कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष शुभंकर सरकार की राय से होगा। हालांकि उन्होंने ममता बनर्जी पर तीखा हमला भी बोला। चटर्जी ने आरोप लगाया कि टीएमसी शासन के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं की हत्या हुई, उन्हें झूठे मामलों में फंसाया गया और पंचायत चुनावों में हिंसा हुई। उन्होंने कहा कि विपक्षी एकता की बात करने से पहले ममता बनर्जी को इन सवालों का जवाब देना होगा। INDIA गठबंधन में बढ़ी उलझन ममता बनर्जी की बैठक की अपील के बावजूद गठबंधन के भीतर तालमेल की कमी साफ दिखाई दे रही है। कांग्रेस और Samajwadi Party दोनों ने फिलहाल इस बैठक की जानकारी से इनकार किया है। सूत्रों के मुताबिक, अगर ममता सीधे Akhilesh Yadav से बात करती हैं, तभी जून में बैठक संभव हो सकती है। उधर, चुनाव के दौरान Rahul Gandhi ने ममता पर तीखे हमले किए थे, लेकिन हार के बाद उन्होंने चुनाव नतीजों को बीजेपी और चुनाव आयोग की “वोट चोरी” से जोड़ते हुए ममता के प्रति नरम रुख दिखाया। DMK की नाराजगी ने बढ़ाई टेंशन INDIA गठबंधन के सामने सिर्फ बंगाल की चुनौती नहीं है। दक्षिण भारत से भी गठबंधन के लिए परेशान करने वाली खबर आई है। तमिलनाडु में Dravida Munnetra Kazhagam यानी DMK कांग्रेस से नाराज बताई जा रही है। वजह यह है कि कांग्रेस ने अभिनेता विजय की पार्टी Tamilaga Vettri Kazhagam को समर्थन दिया है। इसके बाद DMK ने संसद में कांग्रेस से अलग बैठने की मांग तक कर दी है। अब सवाल उठ रहा है कि क्या DMK आगे भी INDIA गठबंधन का हिस्सा बनी रहेगी? बीजेपी का डर या विपक्षी मजबूरी? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्षी दलों के बीच भले ही मतभेद बढ़ रहे हों, लेकिन बीजेपी के खिलाफ एकजुट रहने की मजबूरी उन्हें साथ बनाए हुए है। ममता बनर्जी भी इसी रणनीति पर आगे बढ़ती दिख रही हैं। बंगाल में सत्ता गंवाने के बाद अब उनके लिए संसद और राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत उपस्थिति बनाए रखना बड़ी चुनौती बन गया है। ऐसे में कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का समर्थन उनके लिए बेहद अहम माना जा रहा है।
Who is Suvendu Adhikari: पश्चिम बंगाल की राजनीति में शनिवार का दिन ऐतिहासिक बनने जा रहा है. भाजपा विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद शुभेंदु अधिकारी राज्य के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने जा रहे हैं. इसके साथ ही बंगाल में पहली बार भाजपा की सरकार बनने जा रही है. कभी ममता बनर्जी के सबसे करीबी माने जाने वाले शुभेंदु अधिकारी आज उनके सबसे बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बन चुके हैं. नंदीग्राम से शुरू हुआ ‘जायंट किलर’ का सफर शुभेंदु अधिकारी को बंगाल की राजनीति में ‘जायंट किलर’ कहा जाता है. इसकी सबसे बड़ी वजह ममता बनर्जी के खिलाफ उनकी दो बड़ी चुनावी जीत हैं. 2021: नंदीग्राम में ममता को दी मात साल 2021 के विधानसभा चुनाव में शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम सीट पर ममता बनर्जी को हराकर पूरे देश को चौंका दिया था. यह चुनाव बंगाल की राजनीति का सबसे चर्चित मुकाबला बना था. 2026: भवानीपुर में फिर हराया इसके बाद 2026 के चुनाव में शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को भवानीपुर सीट पर भी हराकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया. भवानीपुर को ममता का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता था, लेकिन शुभेंदु ने वहां भी जीत दर्ज कर टीएमसी के अभेद्य किले को ढहा दिया. छात्र राजनीति से शुरू हुआ राजनीतिक सफर 15 दिसंबर 1970 को पूर्व मेदिनीपुर जिले के कारकुली गांव में जन्मे शुभेंदु अधिकारी राजनीतिक परिवार से आते हैं. उनके पिता शिशिर अधिकारी बंगाल की राजनीति के बड़े नेताओं में गिने जाते हैं. शुभेंदु ने अपनी शुरुआती पढ़ाई कोंटाई में की और बाद में रवींद्र भारती विश्वविद्यालय से इतिहास में एमए किया. उन्होंने छात्र राजनीति के जरिए अपना राजनीतिक करियर शुरू किया. शुरुआती दौर में वे कांग्रेस छात्र संगठन से जुड़े रहे. 1995 में वे पहली बार पार्षद बने और धीरे-धीरे बंगाल की राजनीति में अपनी पहचान मजबूत करते गए. आरएसएस से मिला संगठन और अनुशासन का प्रशिक्षण कम लोग जानते हैं कि शुभेंदु अधिकारी ने युवावस्था में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की शाखाओं में भी प्रशिक्षण लिया था. माना जाता है कि इसी दौरान उनके भीतर संगठन क्षमता और अनुशासन की मजबूत नींव पड़ी, जिसने आगे चलकर उनकी राजनीतिक शैली को आकार दिया. नंदीग्राम आंदोलन ने बना दिया बड़ा चेहरा 2007 का नंदीग्राम आंदोलन शुभेंदु अधिकारी के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ. भूमि अधिग्रहण के खिलाफ हुए इस आंदोलन में उन्होंने अहम भूमिका निभाई और देखते ही देखते वे बंगाल की राजनीति के बड़े नेता बन गए. इसी आंदोलन ने उन्हें जमीनी नेता की पहचान दिलाई. क्यों टूटा ममता बनर्जी से रिश्ता? एक समय ऐसा था जब शुभेंदु अधिकारी को ममता बनर्जी का राजनीतिक उत्तराधिकारी माना जाता था. वे टीएमसी सरकार में परिवहन और पर्यावरण मंत्री भी रहे. लेकिन समय के साथ दोनों के रिश्तों में दूरी बढ़ने लगी. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी में अभिषेक बनर्जी की बढ़ती भूमिका और परिवारवाद की राजनीति से शुभेंदु नाराज थे. आखिरकार 2020 में उन्होंने टीएमसी छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया. भाजपा में आने के बाद वे बंगाल में पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरे. विपक्ष के नेता के रूप में लगातार रहे आक्रामक भाजपा में शामिल होने के बाद शुभेंदु अधिकारी ने विपक्ष के नेता के रूप में ममता सरकार को लगातार घेरा. एसएससी भर्ती घोटाला, संदेशखाली विवाद और आरजी कर अस्पताल मामले जैसे मुद्दों पर उन्होंने सड़क से लेकर विधानसभा तक आंदोलन किया. कई बार विधानसभा में हंगामे के कारण उन्हें निलंबन का भी सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने खुद को बंगाल में भाजपा के सबसे आक्रामक नेता के रूप में स्थापित किया. बंगाल की राजनीति में नए दौर की शुरुआत भाजपा नेतृत्व लंबे समय से बंगाल में ऐसे चेहरे की तलाश में था, जिसकी जड़ें बंगाल की मिट्टी से जुड़ी हों और जो राज्य की संस्कृति को समझता हो. शुभेंदु अधिकारी इस कसौटी पर पूरी तरह फिट बैठे. अब मुख्यमंत्री बनने के साथ ही उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती बंगाल में भाजपा सरकार को स्थिर और मजबूत बनाना होगी. शुभेंदु की ताजपोशी को सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है.
पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की जीत का असर अब सीमाओं के पार बांग्लादेश की राजनीति में भी दिखने लगा है। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने इस नतीजे का स्वागत करते हुए उम्मीद जताई है कि भारत-बांग्लादेश के बीच लंबे समय से अटका तीस्ता जल बंटवारा समझौता अब आगे बढ़ सकता है। ममता सरकार पर आरोप, नई सरकार से बढ़ी उम्मीद BNP ने ममता बनर्जी की अगुवाई वाली पिछली सरकार को इस समझौते में देरी के लिए जिम्मेदार ठहराया है। पार्टी का कहना है कि राज्य स्तर पर असहमति के कारण यह अहम द्विपक्षीय समझौता वर्षों से लंबित है। अब नई सरकार के आने के बाद माहौल बदलने और समाधान निकलने की उम्मीद जताई जा रही है। तारेक रहमान की पार्टी को नई उम्मीद तारेक रहमान की पार्टी BNP ने कहा कि यह राजनीतिक बदलाव उनके लिए सकारात्मक संकेत है। पार्टी नेताओं का मानना है कि अब केंद्र और राज्य सरकार के बीच बेहतर तालमेल से तीस्ता मुद्दे पर प्रगति संभव हो सकती है। बीजेपी नेतृत्व की सराहना BNP नेताओं ने सुवेंदु अधिकारी समेत BJP नेतृत्व की जीत की सराहना की है। पार्टी के सूचना सचिव अज़ीजुल बारी हेलाल ने कहा कि नए नेतृत्व के साथ भारत और बांग्लादेश के रिश्ते और मजबूत हो सकते हैं। तीस्ता समझौता क्यों अहम? तीस्ता नदी दोनों देशों के बीच जल बंटवारे का एक बेहद संवेदनशील मुद्दा है। 2011 में प्रस्तावित समझौते के तहत बांग्लादेश को 37.5% और भारत को 42.5% पानी देने की योजना थी, लेकिन इसे लागू नहीं किया जा सका। पश्चिम बंगाल सरकार के विरोध के कारण यह समझौता अटका रहा। रणनीतिक मायने और संभावनाएं विशेषज्ञों के मुताबिक, नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार और बंगाल की नई सरकार के बीच बेहतर तालमेल से इस समझौते को आगे बढ़ाने की संभावना बढ़ सकती है। भारत और बांग्लादेश के बीच कुल 54 साझा नदियां हैं, लेकिन अब तक सिर्फ गंगा और कुशियारा नदी पर ही समझौते हो पाए हैं। आसान नहीं होगी राह हालांकि जानकार मानते हैं कि यह प्रक्रिया इतनी आसान नहीं होगी। जल बंटवारा, कृषि जरूरतें और स्थानीय हित जैसे मुद्दों को ध्यान में रखते हुए व्यापक सहमति बनानी होगी। केंद्र और राज्य के बीच समन्वय इस समझौते की दिशा तय करेगा। सत्ता परिवर्तन बंगाल में सत्ता परिवर्तन को बांग्लादेश एक सकारात्मक अवसर के रूप में देख रहा है। अब यह देखना अहम होगा कि क्या यह राजनीतिक बदलाव वाकई तीस्ता समझौते को आगे बढ़ा पाता है और भारत-बांग्लादेश संबंधों को नई गति दे पाता है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल में चुनावी हार के बाद भी ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने से इनकार करने पर सियासी और संवैधानिक बहस तेज हो गई है। इस बीच सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील महेश जेठमलानी ने इस स्थिति में संभावित कानूनी रास्तों को लेकर अपनी राय रखी है। क्या बोले महेश जेठमलानी? महेश जेठमलानी ने कहा कि यदि मुख्यमंत्री इस्तीफा देने से इनकार करती हैं और पद पर बनी रहने की कोशिश करती हैं, तो राज्यपाल हस्तक्षेप कर सकते हैं। उनके मुताबिक, ऐसी स्थिति में राज्यपाल आवश्यक कदम उठाते हुए सरकार को हटाने की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि जरूरत पड़ने पर प्रशासनिक बल का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। ममता बनर्जी का साफ इनकार ममता बनर्जी ने कोलकाता में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान स्पष्ट कहा कि वह इस्तीफा नहीं देंगी। उनका दावा है कि “नैतिक रूप से जीत हमारी हुई है” और चुनाव में धांधली हुई है। उन्होंने कहा कि वह राजभवन जाकर इस्तीफा नहीं सौंपेंगी और आगे की रणनीति पार्टी के साथ मिलकर तय करेंगी। साथ ही ममता ने भारतीय चुनाव आयोग पर भी गंभीर आरोप लगाए और कहा कि उनका मुकाबला BJP से नहीं बल्कि चुनाव आयोग से था। संवैधानिक स्थिति क्या कहती है? राजनीतिक और कानूनी जानकारों के अनुसार, अगर कोई सरकार बहुमत खो देती है या विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो जाता है, तो राज्यपाल के पास हस्तक्षेप का अधिकार होता है। भारतीय चुनाव आयोग द्वारा नई विधानसभा के गठन की अधिसूचना जारी होने के बाद मौजूदा सरकार का जनादेश खत्म माना जाता है। पश्चिम बंगाल विधानसभा का कार्यकाल 7 मई 2026 को समाप्त हो रहा है। ऐसे में अगर मुख्यमंत्री इस्तीफा नहीं देती हैं, तो राज्यपाल संवैधानिक प्रावधानों के तहत सरकार को बर्खास्त कर सकते हैं और नई सरकार के गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकते हैं। बढ़ सकता है टकराव ममता बनर्जी के इस रुख से राज्य में सियासी टकराव और बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं। एक ओर विपक्ष सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया तेज करना चाहता है, वहीं दूसरी ओर TMC नेतृत्व चुनाव परिणामों को लेकर सवाल उठा रहा है। अब नजर इस बात पर है कि राज्यपाल इस स्थिति में क्या कदम उठाते हैं और क्या मामला अदालत तक पहुंचता है। फिलहाल, बंगाल की राजनीति एक संवेदनशील मोड़ पर खड़ी नजर आ रही है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।