पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की जीत का असर अब सीमाओं के पार बांग्लादेश की राजनीति में भी दिखने लगा है। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने इस नतीजे का स्वागत करते हुए उम्मीद जताई है कि भारत-बांग्लादेश के बीच लंबे समय से अटका तीस्ता जल बंटवारा समझौता अब आगे बढ़ सकता है।
ममता सरकार पर आरोप, नई सरकार से बढ़ी उम्मीद
BNP ने ममता बनर्जी की अगुवाई वाली पिछली सरकार को इस समझौते में देरी के लिए जिम्मेदार ठहराया है। पार्टी का कहना है कि राज्य स्तर पर असहमति के कारण यह अहम द्विपक्षीय समझौता वर्षों से लंबित है। अब नई सरकार के आने के बाद माहौल बदलने और समाधान निकलने की उम्मीद जताई जा रही है।
तारेक रहमान की पार्टी को नई उम्मीद
तारेक रहमान की पार्टी BNP ने कहा कि यह राजनीतिक बदलाव उनके लिए सकारात्मक संकेत है। पार्टी नेताओं का मानना है कि अब केंद्र और राज्य सरकार के बीच बेहतर तालमेल से तीस्ता मुद्दे पर प्रगति संभव हो सकती है।
बीजेपी नेतृत्व की सराहना
BNP नेताओं ने सुवेंदु अधिकारी समेत BJP नेतृत्व की जीत की सराहना की है। पार्टी के सूचना सचिव अज़ीजुल बारी हेलाल ने कहा कि नए नेतृत्व के साथ भारत और बांग्लादेश के रिश्ते और मजबूत हो सकते हैं।
तीस्ता समझौता क्यों अहम?
तीस्ता नदी दोनों देशों के बीच जल बंटवारे का एक बेहद संवेदनशील मुद्दा है। 2011 में प्रस्तावित समझौते के तहत बांग्लादेश को 37.5% और भारत को 42.5% पानी देने की योजना थी, लेकिन इसे लागू नहीं किया जा सका। पश्चिम बंगाल सरकार के विरोध के कारण यह समझौता अटका रहा।
रणनीतिक मायने और संभावनाएं
विशेषज्ञों के मुताबिक, नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार और बंगाल की नई सरकार के बीच बेहतर तालमेल से इस समझौते को आगे बढ़ाने की संभावना बढ़ सकती है। भारत और बांग्लादेश के बीच कुल 54 साझा नदियां हैं, लेकिन अब तक सिर्फ गंगा और कुशियारा नदी पर ही समझौते हो पाए हैं।
आसान नहीं होगी राह
हालांकि जानकार मानते हैं कि यह प्रक्रिया इतनी आसान नहीं होगी। जल बंटवारा, कृषि जरूरतें और स्थानीय हित जैसे मुद्दों को ध्यान में रखते हुए व्यापक सहमति बनानी होगी। केंद्र और राज्य के बीच समन्वय इस समझौते की दिशा तय करेगा।
सत्ता परिवर्तन
बंगाल में सत्ता परिवर्तन को बांग्लादेश एक सकारात्मक अवसर के रूप में देख रहा है। अब यह देखना अहम होगा कि क्या यह राजनीतिक बदलाव वाकई तीस्ता समझौते को आगे बढ़ा पाता है और भारत-बांग्लादेश संबंधों को नई गति दे पाता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
मुंबई, एजेंसियां। महाराष्ट्र की राजनीति में शनिवार को उस समय नई चर्चा शुरू हो गई, जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे मुंबई से नागपुर जाने वाली एक ही फ्लाइट में सफर करते नजर आए। दोनों नेताओं ने एक-दूसरे का अभिवादन किया, जिसके बाद राजनीतिक गलियारों में कई तरह की अटकलें लगने लगीं। एक फ्लाइट, कई राजनीतिक चर्चाएं फडणवीस और उद्धव ठाकरे का एक ही विमान में सफर करना इसलिए चर्चा का विषय बन गया क्योंकि दोनों लंबे समय से राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रहे हैं। विमान में मुलाकात के दौरान दोनों नेताओं ने सामान्य शिष्टाचार निभाया, लेकिन इस तस्वीर ने राजनीतिक चर्चाओं को हवा दे दी है। बीजेपी ने अटकलों को किया खारिज बीजेपी ने इस घटना को महज संयोग बताते हुए कहा कि दोनों नेता राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं, दुश्मन नहीं। पार्टी नेताओं ने किसी भी तरह की राजनीतिक बातचीत या नए समीकरण बनने की अटकलों को खारिज किया है। नागपुर दौरे पर उद्धव ठाकरे उद्धव ठाकरे नागपुर दौरे पर पार्टी कार्यकर्ताओं से मुलाकात करने पहुंचे हैं। उन्होंने जल्द ही नागपुर में एक बड़ी जनसभा आयोजित करने का भी ऐलान किया है, जिसे आगामी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पहले से गरम है महाराष्ट्र की राजनीति हाल के दिनों में शिवसेना (यूबीटी) के कई नेताओं और सांसदों के दल बदलने की खबरों के बीच महाराष्ट्र की राजनीति पहले से ही गरम है। ऐसे माहौल में फडणवीस और उद्धव ठाकरे की यह मुलाकात राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गई है।
दिनांक - 27 जून 2026 दिन - शनिवार विक्रम संवत 2083 शक संवत -1948 अयन - दक्षिणायन ऋतु - वर्षा ॠतु मास - ज्येष्ठ पक्ष - शुक्ल तिथि - त्रयोदशी रात्रि 12:43 तक तत्पश्चात चतुर्दशी नक्षत्र - अनुराधा रात्रि 10:11 तक तत्पश्चात ज्येष्ठा योग - साध्य दोपहर 12:32 तक तत्पश्चात शुभ राहुकाल - सुबह 09:21 से सुबह 11:01 तक सूर्योदय - 05:10 सूर्यास्त - 06:23 दिशाशूल - पूर्व दिशा मे व्रत पर्व विवरण- शनिप्रदोष व्रत विशेष- त्रयोदशी को बैंगन खाने से पुत्र का नाश होता है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)*
नई दिल्ली, एजेंसियां। विदेश यात्रा की योजना बना रहे लोगों के लिए 1 जुलाई 2026 से पासपोर्ट बनवाना महंगा हो जाएगा। केंद्र सरकार ने पासपोर्ट की फीस में बढ़ोतरी का फैसला किया है। विदेश मंत्रालय ने ‘पासपोर्ट नियम, 1980’ में संशोधन करते हुए नई शुल्क दरों की अधिसूचना जारी कर दी है। करीब 14 वर्षों बाद पासपोर्ट शुल्क में बदलाव किया गया है। इससे पहले वर्ष 2012 में फीस संशोधित की गई थी। सामान्य और तत्काल पासपोर्ट की नई फीस नई व्यवस्था के तहत 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के आवेदकों के लिए 36 पेज वाले सामान्य पासपोर्ट की फीस 1,500 रुपये से बढ़ाकर 2,500 रुपये कर दी गई है, जबकि तत्काल सेवा के लिए अब 5,000 रुपये चुकाने होंगे। वहीं, 60 पेज वाले सामान्य पासपोर्ट की फीस 3,500 रुपये और तत्काल पासपोर्ट की फीस 6,000 रुपये निर्धारित की गई है। खोया या क्षतिग्रस्त पासपोर्ट बनवाना होगा और महंगा पासपोर्ट खोने या क्षतिग्रस्त होने की स्थिति में रिप्लेसमेंट पासपोर्ट के लिए भी शुल्क बढ़ा दिया गया है। 36 पेज वाले सामान्य रिप्लेसमेंट पासपोर्ट के लिए 5,000 रुपये और तत्काल सेवा के लिए 7,500 रुपये देने होंगे। वहीं, 60 पेज वाले रिप्लेसमेंट पासपोर्ट के लिए सामान्य श्रेणी में 6,000 रुपये तथा तत्काल सेवा में 8,500 रुपये शुल्क तय किया गया है। नाबालिगों और अन्य सेवाओं की फीस भी बढ़ी 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए 36 पेज वाले नए पासपोर्ट की फीस 1,750 रुपये होगी, जबकि तत्काल सेवा के लिए 4,250 रुपये देने होंगे। पुलिस क्लियरेंस सर्टिफिकेट (PCC), सरेंडर सर्टिफिकेट और ग्लोबल एंट्री प्रोग्राम वेरिफिकेशन जैसी सेवाओं की फीस भी बढ़ाकर 750 रुपये कर दी गई है। वैधता और छूट में कोई बदलाव नहीं फीस बढ़ने के बावजूद पासपोर्ट की वैधता पहले की तरह ही रहेगी। वयस्कों का पासपोर्ट 10 वर्ष और नाबालिगों का पासपोर्ट 5 वर्ष या 18 वर्ष की आयु पूरी होने तक मान्य रहेगा। वहीं, 8 वर्ष तक के बच्चों और 60 वर्ष से अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों को मिलने वाली 10 प्रतिशत शुल्क छूट भी पहले की तरह जारी रहेगी।