ढाका, एजेंसियां। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के प्रस्तावित नई दिल्ली दौरे को लेकर भारत और बांग्लादेश के बीच कूटनीतिक बातचीत जारी है। हालांकि, अभी उनकी भारत यात्रा की अंतिम तारीख तय नहीं हुई है। बांग्लादेश सरकार के अनुसार, यात्रा का कार्यक्रम प्रधानमंत्री की उपलब्धता और दोनों देशों के बीच चल रही द्विपक्षीय बातचीत की प्रगति पर निर्भर करेगा। भारत ने द्विपक्षीय दौरे के लिए दिया निमंत्रण भारत ने तारिक रहमान को द्विपक्षीय यात्रा के लिए आमंत्रित किया है। इसके अलावा उन्हें सितंबर में नई दिल्ली में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन के आउटरीच सत्र में BIMSTEC के अध्यक्ष के तौर पर शामिल होने का निमंत्रण भी मिला है। भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इसकी पुष्टि की है। द्विपक्षीय रिश्तों को बेहतर बनाने पर जोर भारत में बांग्लादेश के उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी और प्रधानमंत्री तारिक रहमान के बीच हाल में हुई मुलाकात में दोनों देशों के आपसी हितों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई। तारिक रहमान ने भारत के साथ रिश्तों को बेहतर बनाने के लिए अनुकूल माहौल तैयार करने की जरूरत पर जोर दिया है। शेख हसीना का मुद्दा बना अहम दोनों देशों के रिश्तों में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का भारत में रहना और उनके प्रत्यर्पण की बांग्लादेश की मांग सबसे संवेदनशील मुद्दों में शामिल है। ढाका लगातार इस मामले में भारत से सकारात्मक प्रतिक्रिया की उम्मीद जता रहा है। हालिया बातचीत में भारत की ओर से हसीना को भारत की जमीन से राजनीतिक गतिविधियां करने की अनुमति दिए जाने को लेकर भी बांग्लादेश ने आपत्ति जताई है। अभी यात्रा को लेकर अंतिम फैसला बाकी बांग्लादेश की विदेश राज्य मंत्री शमा ओबैद इस्लाम ने कहा है कि भारत यात्रा को लेकर सरकार सकारात्मक है, लेकिन अभी कुछ भी अंतिम नहीं हुआ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि दौरे की तारीख दोनों देशों के बीच चर्चा और प्रधानमंत्री के कार्यक्रम को ध्यान में रखकर तय होगी।
ढाका, एजेंसियां। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने भारत से पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण की प्रक्रिया तेज करने की उम्मीद जताई है। प्रधानमंत्री ने 10 अगस्त को बांग्लादेश में भारत के नए उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी से मुलाकात के दौरान यह मुद्दा उठाया। बैठक में दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को बेहतर बनाने और लंबित मुद्दों को बातचीत के जरिए सुलझाने पर भी चर्चा हुई। शेख हसीना के प्रत्यर्पण पर बांग्लादेश का दबाव तारिक रहमान ने भारतीय उच्चायुक्त के सामने शेख हसीना के प्रत्यर्पण का मुद्दा प्रमुखता से रखा। बांग्लादेश सरकार लंबे समय से भारत से शेख हसीना को वापस भेजने की मांग कर रही है। ढाका का कहना है कि भारत से प्रत्यर्पण अनुरोध पर जल्द सकारात्मक कार्रवाई की उम्मीद है। बांग्लादेश में शेख हसीना के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले चल रहे हैं और उन्हें एक मामले में दोषी ठहराया जा चुका है। हसीना अगस्त 2024 में बांग्लादेश से निकलने के बाद भारत में रह रही हैं। भारत-बांग्लादेश संबंधों को सुधारने की कोशिश बैठक के दौरान तारिक रहमान ने भारत के साथ संबंधों को फिर से बेहतर बनाने के लिए अनुकूल माहौल तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया। दोनों देशों के बीच व्यापार, सीमा, ऊर्जा, सुरक्षा और क्षेत्रीय सहयोग जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। बांग्लादेशी प्रधानमंत्री ने यह भी संकेत दिया कि दोनों देशों के बीच किसी भी ऐसे कदम से बचना चाहिए जिससे द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान पहुंचे। भारत की ओर से भी बातचीत और रचनात्मक तरीके से संबंधों को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया है। हसीना के बयानों से भी बढ़ा तनाव शेख हसीना के भारत में रहते हुए हाल में दिए गए सार्वजनिक बयानों को लेकर बांग्लादेश सरकार ने नाराजगी जताई है। ढाका का कहना है कि भारत की जमीन से हसीना की राजनीतिक गतिविधियां दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित कर सकती हैं। भारत ने दूसरी ओर कहा है कि शेख हसीना के प्रत्यर्पण अनुरोध की समीक्षा कानूनी प्रक्रियाओं के तहत की जा रही है। नई दिल्ली ने साथ ही बांग्लादेश के साथ रचनात्मक और सकारात्मक संबंध बनाए रखने की प्रतिबद्धता भी दोहराई है। आगे की बातचीत पर टिकी नजर तारिक रहमान और भारतीय उच्चायुक्त की बैठक ऐसे समय हुई है जब दोनों देश रिश्तों में आई खटास को कम करने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि शेख हसीना का प्रत्यर्पण दोनों देशों के बीच सबसे संवेदनशील मुद्दों में बना हुआ है। अब नजर इस बात पर है कि भारत बांग्लादेश की नई मांग पर क्या रुख अपनाता है और क्या दोनों देश प्रत्यर्पण समेत अन्य लंबित मुद्दों पर कूटनीतिक बातचीत के जरिए कोई रास्ता निकाल पाते हैं।
नई दिल्ली: भारत और बांग्लादेश के रिश्ते एक बार फिर संवेदनशील दौर से गुजर रहे हैं। निर्वासित पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पहली वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस और इसी साल दिसंबर में बांग्लादेश लौटने के उनके ऐलान ने दोनों देशों के बीच नई कूटनीतिक हलचल पैदा कर दी है। ऐसे समय में जब भारत और बांग्लादेश संबंधों को सामान्य बनाने की कोशिशें जारी हैं, हसीना के बयान ने राजनीतिक और राजनयिक समीकरणों को और जटिल बना दिया है। करीब दो वर्ष पहले बांग्लादेश में राजनीतिक संकट के दौरान शेख हसीना का ढाका से दिल्ली आना दोनों देशों के संबंधों का बड़ा घटनाक्रम था। अब दो साल बाद एक बार फिर उनका नाम भारत-बांग्लादेश संबंधों के केंद्र में है। उनकी वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर पहले ही बांग्लादेश सरकार ने चिंता जताई थी और आशंका व्यक्त की थी कि इससे दोनों देशों के बीच चल रही बातचीत प्रभावित हो सकती है। हालांकि भारत सरकार ने इस कार्यक्रम से स्पष्ट दूरी बनाए रखी। दिसंबर में वापसी के ऐलान से बढ़ी राजनीतिक हलचल प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान शेख हसीना ने दिसंबर में बांग्लादेश लौटने की घोषणा की। यह बयान ऐसे समय आया है जब बांग्लादेश सरकार लगातार उनके प्रत्यर्पण की मांग उठा रही है। ऐसे में यह घोषणा केवल राजनीतिक संदेश नहीं बल्कि दोनों देशों के बीच चल रहे संवेदनशील कूटनीतिक संवाद को भी प्रभावित कर सकती है। बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति भी बनी चुनौती पिछले वर्ष दिसंबर में बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने एकतरफा सुनवाई के बाद शेख हसीना को मौत की सजा सुनाई थी। अब देश में निर्वाचित सरकार होने के बावजूद राजनीतिक तनाव कम होता नजर नहीं आ रहा। हसीना की प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल हुए पूर्व क्रिकेट कप्तान शाकिब अल हसन के घर पर हमले और प्रधानमंत्री तारिक रहमान के करीबी सहयोगियों द्वारा हसीना को तत्काल लौटने की चुनौती ने वहां के राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया है। भारत के लिए क्यों बढ़ी कूटनीतिक चुनौती? विशेषज्ञों के अनुसार यह पूरा घटनाक्रम भारत की विदेश नीति की बड़ी परीक्षा बन सकता है। अंतरिम सरकार के दौरान दोनों देशों के रिश्तों में आई दूरी को कम करने के प्रयास जारी हैं, लेकिन हालात अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हैं। भारत और बांग्लादेश के बीच कई महत्वपूर्ण मुद्दे लंबित हैं, जिनमें— गंगा जल संधि का नवीनीकरण सीमा पर बाड़ लगाने का विवाद अवैध घुसपैठ की समस्या सीमा सुरक्षा से जुड़े मुद्दे इन सभी विषयों पर आने वाले महीनों में अहम बातचीत होनी है। इसी बीच बांग्लादेश में चीन के बढ़ते प्रभाव और पूर्व अंतरिम सरकार के दौरान अपनाई गई प्रो-चीन नीतियों को लेकर भारत की चिंता भी लगातार बनी हुई है। BRICS सम्मेलन बन सकता है बड़ा अवसर अगले महीने नई दिल्ली में होने वाला 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन दोनों देशों के रिश्तों के लिए महत्वपूर्ण अवसर माना जा रहा है। बिम्सटेक (BIMSTEC) के मौजूदा अध्यक्ष होने के नाते बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को भी आउटरीच सत्र के लिए आमंत्रित किया गया है। यदि इस सम्मेलन के दौरान दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच सकारात्मक बातचीत होती है, तो मौजूदा तनाव कम करने और द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा देने की संभावना बन सकती है। हालांकि इसके लिए दोनों देशों को फिलहाल उत्पन्न संवेदनशील परिस्थितियों को सावधानी से संभालना होगा।
Sheikh Hasina Program: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम को ऑनलाइन संबोधित करने को लेकर भारत ने अपना रुख साफ कर दिया है। विदेश मंत्रालय (MEA) ने स्पष्ट किया कि इस कार्यक्रम का भारत सरकार से कोई संबंध नहीं है और यह पूरी तरह एक निजी आयोजन है। विदेश मंत्रालय ने क्या कहा? मंगलवार (4 अगस्त) को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि शेख हसीना जिस कार्यक्रम को संबोधित करने जा रही हैं, उसका आयोजन FCC South Asia नामक एक निजी मीडिया संस्था कर रही है। उन्होंने कहा, "यह भारत सरकार का कार्यक्रम नहीं है। इसका आयोजन एक निजी संस्था कर रही है और सरकार की इसमें कोई भूमिका नहीं है।" बांग्लादेश ने भारत से क्या अपील की थी? भारत की यह प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है जब बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने भारत से अनुरोध किया था कि शेख हसीना और अवामी लीग के नेताओं को भारतीय भूमि से राजनीतिक भाषण देने की अनुमति न दी जाए। अंतरिम सरकार का कहना था कि ऐसे कार्यक्रमों से बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ सकती है और दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों पर भी असर पड़ सकता है। दो साल बाद सार्वजनिक संबोधन शेख हसीना अगस्त 2024 में छात्र आंदोलन के बाद सत्ता से हटने के बाद से भारत में रह रही हैं। अब वह करीब दो साल बाद पहली बार सार्वजनिक रूप से लोगों को संबोधित करेंगी। वह 5 अगस्त 2026 को नई दिल्ली के सर मार्क टली ऑडिटोरियम में आयोजित FCC South Asia के कार्यक्रम में ऑनलाइन शामिल होकर अपना संबोधन देंगी। क्यों अहम है यह कार्यक्रम? शेख हसीना के इस संबोधन पर बांग्लादेश और भारत दोनों की नजरें टिकी हैं। हालांकि भारत ने साफ कर दिया है कि यह निजी कार्यक्रम है और इसे किसी भी तरह से भारत सरकार का आधिकारिक समर्थन या मंजूरी नहीं माना जाना चाहिए।
कोलकाता: भारत और बांग्लादेश के बीच हाल के दिनों में सीमा सुरक्षा और अवैध घुसपैठ को लेकर बढ़े तनाव के बावजूद दोनों देशों के बीच वर्षों पुरानी 'मैंगो डिप्लोमेसी' की परंपरा जारी है। बांग्लादेश सरकार ने सद्भावना के प्रतीक के रूप में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी को प्रीमियम किस्म के आमों की खेप भेजी है। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस पहल की पुष्टि करते हुए बताया कि यह उपहार दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करने की परंपरा का हिस्सा है। 500 किलो आम की खेप पहुंची कोलकाता बांग्लादेश की ओर से 500 किलोग्राम प्रीमियम आम कोलकाता स्थित बांग्लादेश के उप-उच्चायोग भेजे गए। यह खेप जेसोर के बेनापोल सीमा मार्ग के जरिए भारत पहुंची। इस खेप में लोकप्रिय किस्मों हिमसागर, हरिभांगा और आम्रपाली शामिल हैं। बताया गया कि: 100 किलोग्राम आम मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के लिए भेजे गए हैं। शेष 400 किलोग्राम आम वरिष्ठ अधिकारियों, राजनयिकों और अन्य गणमान्य व्यक्तियों को सद्भावना उपहार के रूप में वितरित किए जाएंगे। शेख हसीना के दौर से चली आ रही है परंपरा भारत और बांग्लादेश के बीच आम और हिलसा मछली का आदान-प्रदान लंबे समय से सांस्कृतिक कूटनीति का हिस्सा रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना अपने कार्यकाल के दौरान हर वर्ष भारत के प्रधानमंत्री और पश्चिम बंगाल के नेतृत्व को आम भेजती थीं। हालांकि 2024 के राजनीतिक घटनाक्रम के दौरान इस परंपरा में कुछ समय के लिए विराम आया था। अब वर्तमान प्रशासन ने इस परंपरा को फिर से जारी रखा है। सीमा विवाद के बीच बढ़ी चर्चा इस बार आमों की यह खेप ऐसे समय आई है जब भारत-बांग्लादेश सीमा पर अवैध घुसपैठ, सीमा प्रबंधन और सुरक्षा को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव की स्थिति बनी हुई है। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने हाल के महीनों में अवैध प्रवासियों के खिलाफ 'डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट' अभियान चलाने की बात कही है। उनके इस रुख को लेकर बांग्लादेश के कुछ राजनीतिक नेताओं ने आपत्ति भी जताई थी। सीमा पर बढ़ा था तनाव हाल के दिनों में सीमा पार अवैध घुसपैठ और कथित डिपोर्टेशन अभियान को लेकर सीमा सुरक्षा बल (BSF) और बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) के बीच भी तनाव और गतिरोध की खबरें सामने आई थीं। ऐसे माहौल में बांग्लादेश की ओर से आम भेजने की इस पहल को दोनों देशों के बीच संवाद और सद्भाव बनाए रखने की एक प्रतीकात्मक कूटनीतिक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। सांस्कृतिक रिश्तों को बनाए रखने की पहल विशेषज्ञों का मानना है कि राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी मतभेदों के बावजूद सांस्कृतिक और मानवीय पहल दोनों देशों के रिश्तों में सकारात्मक संदेश देने का काम करती हैं। 'मैंगो डिप्लोमेसी' भी इसी परंपरा का हिस्सा मानी जाती है, जिसके जरिए कूटनीतिक संवाद के साथ-साथ आपसी सद्भाव को बनाए रखने का प्रयास किया जाता है।
नई दिल्ली: केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने बांग्लादेश में भारत के नए उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी को केंद्रीय कैबिनेट मंत्री के समकक्ष दर्जा देने का फैसला किया है। विदेश नीति के लिहाज से इस कदम को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला प्रधानमंत्री मोदी की 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति को मजबूत करने के साथ-साथ ढाका को एक स्पष्ट कूटनीतिक संदेश भी देता है। दिनेश त्रिवेदी को 27 अप्रैल को बांग्लादेश में भारत का उच्चायुक्त नियुक्त किया गया था। मोदी सरकार के 12 वर्षों के कार्यकाल में यह पहली बार है, जब किसी वरिष्ठ राजनीतिक नेता को विदेश में भारत का राजदूत बनाकर भेजा गया है और उसे कैबिनेट मंत्री के समकक्ष दर्जा दिया गया है। क्या होगा कैबिनेट रैंक का फायदा? बांग्लादेश में भारत की पूर्व उच्चायुक्त वीना सीकरी ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में बताया कि कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिलने से दिनेश त्रिवेदी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक सीधे पहुंच मिलेगी। उनके अनुसार, सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत विदेश सचिव या विदेश मंत्री के माध्यम से संवाद करने के बजाय त्रिवेदी सीधे प्रधानमंत्री से महत्वपूर्ण मामलों पर संपर्क कर सकेंगे। इससे दोनों देशों के बीच संवेदनशील मुद्दों पर तेजी से निर्णय लेने में मदद मिलेगी। ढाका के लिए क्या है संदेश? वीना सीकरी के मुताबिक, यह फैसला बांग्लादेश को यह स्पष्ट संदेश देता है कि दिनेश त्रिवेदी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भरोसेमंद राजनीतिक प्रतिनिधि हैं। ऐसे में बांग्लादेश की सरकार भी उनके साथ सामान्य राजनयिक की बजाय उच्च राजनीतिक स्तर पर संवाद करेगी। माना जा रहा है कि त्रिवेदी की सीधी पहुंच बांग्लादेश के प्रधानमंत्री और वरिष्ठ मंत्रियों तक होगी। प्रोटोकॉल और सुरक्षा में भी मिलेगा विशेष दर्जा कैबिनेट रैंक मिलने के बाद दिनेश त्रिवेदी को बांग्लादेश में विशेष कूटनीतिक प्रोटोकॉल मिलेगा। हवाई अड्डे पर आगमन, आधिकारिक कार्यक्रमों और देश के भीतर यात्रा के दौरान उन्हें वही सम्मान और सुरक्षा उपलब्ध कराई जाएगी, जो बांग्लादेश अपने कैबिनेट मंत्रियों को देता है। 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति को मिलेगी मजबूती विशेषज्ञों का मानना है कि यह नियुक्ति प्रधानमंत्री मोदी की 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति के तहत पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को प्राथमिकता देने की रणनीति का हिस्सा है। अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के सत्ता से हटने के बाद भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में तनाव देखने को मिला था। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौरान कई भारत समर्थक परियोजनाओं और नीतिगत फैसलों में बदलाव किए गए, जिससे दोनों देशों के संबंध प्रभावित हुए। नई सरकार के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश अब बांग्लादेश में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली नई सरकार के गठन के बाद भारत व्यापार, निवेश और विकास परियोजनाओं को फिर से गति देना चाहता है। हाल के दिनों में तारिक रहमान की चीन यात्रा और वहां जारी संयुक्त बयान ने नई दिल्ली की रणनीतिक चिंताओं को बढ़ाया है। ऐसे में दिनेश त्रिवेदी की नियुक्ति और उन्हें दिया गया विशेष दर्जा भारत की सक्रिय कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पहले भी राजनीतिक नेताओं को मिल चुका है यह सम्मान मोदी सरकार में यह पहली बार हुआ है, लेकिन पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों के दौरान भी कई वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं को राजदूत बनाकर भेजा गया था। इनमें विजयलक्ष्मी पंडित, टी.एन. कौल, डॉ. कर्ण सिंह और डी.पी. धर जैसे नाम शामिल हैं, जिन्हें अपने-अपने कार्यकाल में कैबिनेट मंत्री के समकक्ष दर्जा दिया गया था।
ढाका/नई दिल्ली: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने स्पष्ट कहा है कि वह हर हाल में इसी साल अपने देश लौटेंगी, चाहे उन्हें मौत की सजा का सामना ही क्यों न करना पड़े। करीब दो वर्षों से भारत में रह रहीं हसीना ने कहा कि राजनीतिक दबाव और कानूनी कार्रवाई उनके फैसले को नहीं बदल सकती। उन्होंने अपने खिलाफ दिए गए फैसले को राजनीतिक प्रतिशोध करार देते हुए लोकतंत्र की बहाली के लिए संघर्ष जारी रखने की बात कही। 'मौत की सजा से नहीं डरती' एक इंटरव्यू में शेख हसीना ने कहा कि उन्हें मौत की सजा का कोई भय नहीं है। उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ चल रही कानूनी कार्रवाई राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित है और इसका उद्देश्य उनकी पार्टी अवामी लीग को कमजोर करना है। उनके अनुसार, पार्टी जनता की ताकत पर खड़ी है और उसे खत्म नहीं किया जा सकता। हसीना ने कहा कि उनका जीवन हमेशा बांग्लादेश की जनता और लोकतंत्र के लिए समर्पित रहा है तथा वह हर परिस्थिति में अपने देश लौटने का प्रयास करेंगी। 'अवामी लीग को खत्म करने की साजिश' पूर्व प्रधानमंत्री ने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार उनके नेतृत्व और अवामी लीग को राजनीतिक रूप से खत्म करना चाहती है। उन्होंने कहा कि यह पहली बार नहीं है जब उनकी पार्टी पर दबाव बनाया गया हो, लेकिन हर बार जनता ने उनका साथ दिया है। उनका दावा है कि उनके खिलाफ सुनाया गया फैसला न्यायिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक एजेंडा का हिस्सा है। परिवार की त्रासदी का किया जिक्र शेख हसीना ने कहा कि उन्होंने अपने जीवन में कई कठिन दौर देखे हैं। उन्होंने 1975 में अपने पिता और बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की हत्या का जिक्र करते हुए कहा कि उस हमले में उनके परिवार के अधिकांश सदस्य मारे गए थे। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि उन पर पहले भी जानलेवा हमले हुए, जिनमें वह बच निकलीं। उनके मुताबिक, इन घटनाओं ने उन्हें और अधिक मजबूत बनाया है। मौजूदा सरकार पर लगाए गंभीर आरोप हसीना ने दावा किया कि बांग्लादेश में लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर हुई हैं और कानून का शासन प्रभावित हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी नेताओं और अवामी लीग के कार्यकर्ताओं को राजनीतिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिति पर नकारात्मक असर पड़ा है तथा अल्पसंख्यक समुदायों पर हमलों की घटनाएं बढ़ी हैं। अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर जताई चिंता पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा कि किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय पर हमला पूरे देश की लोकतांत्रिक भावना पर हमला है। उन्होंने कहा कि सभी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना किसी भी सरकार की जिम्मेदारी होती है और इस दिशा में गंभीर प्रयास होने चाहिए। 'दिल आज भी बांग्लादेश में ही है' शेख हसीना ने कहा कि निर्वासन में रहने के बावजूद उनका मन हमेशा बांग्लादेश में ही रहता है। उन्होंने कहा कि देश में अपने नेताओं, कार्यकर्ताओं और आम लोगों की मुश्किलों की खबरें सुनना उनके लिए बेहद पीड़ादायक है। उन्होंने कहा कि वह लगातार अपने सहयोगियों के संपर्क में हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बांग्लादेश में लोकतंत्र एवं मानवाधिकारों के मुद्दे उठाने का प्रयास कर रही हैं। 'जनता के दम पर फिर खड़ी होगी अवामी लीग' अपने संदेश के अंत में हसीना ने भरोसा जताया कि बांग्लादेश की जनता एक बार फिर लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करेगी। उन्होंने कहा कि अवामी लीग जनता के समर्थन से दोबारा मजबूती के साथ उभरेगी और वह अपने अंतिम दिन तक इस संघर्ष का हिस्सा बनी रहेंगी।
ढाका/नई दिल्ली: भारत ने बांग्लादेशी नागरिकों के लिए पर्यटक वीजा सेवा दोबारा शुरू करने का ऐलान किया है। भारतीय उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी ने गुरुवार को ढाका स्थित भारतीय वीजा आवेदन केंद्र में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बताया कि 28 जून से बांग्लादेशी नागरिक फिर से भारत आने के लिए टूरिस्ट वीजा के लिए आवेदन कर सकेंगे। यह फैसला दोनों पड़ोसी देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। पिछले लगभग दो वर्षों से बांग्लादेशी नागरिकों के लिए पर्यटक वीजा सेवा बंद थी। राष्ट्रपति शहाबुद्दीन से मुलाकात के बाद हुई घोषणा इस घोषणा से पहले भारतीय उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी ने बांग्लादेश के राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन से शिष्टाचार मुलाकात की। मुलाकात के बाद उन्होंने प्रेस वार्ता में कहा कि भारत और बांग्लादेश के बीच लोगों के आपसी संपर्क को बढ़ावा देने के लिए वीजा सेवाओं को फिर से शुरू किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि रविवार, 28 जून से पर्यटक वीजा के लिए आवेदन स्वीकार किए जाएंगे। शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बंद हुई थी सेवा 5 अगस्त 2024 को तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के पतन और उसके बाद दोनों देशों के संबंधों में आए तनाव के चलते भारत ने बांग्लादेशी नागरिकों के लिए पर्यटक वीजा जारी करना बंद कर दिया था। इस दौरान मेडिकल और बिजनेस वीजा जारी किए जाते रहे। अब करीब दो साल बाद पर्यटक वीजा सेवा भी बहाल कर दी गई है। इन चार केंद्रों से जारी होंगे पर्यटक वीजा दिनेश त्रिवेदी ने बताया कि बांग्लादेश में स्थित ढाका, राजशाही, चटगांव और खुलना के भारतीय वीजा आवेदन केंद्रों से पर्यटक वीजा जारी किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि बेनापोल सीमा के रास्ते यात्रा करने वाले यात्रियों की सुविधा और दोनों देशों के बीच आवाजाही को आसान बनाने के उद्देश्य से यह निर्णय लिया गया है। अप्रैल में बने थे भारत के नए उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी को अप्रैल में बांग्लादेश में भारत का नया उच्चायुक्त नियुक्त किया गया था। वह इस पद पर नियुक्त होने वाले पहले भारतीय राजनेता हैं। उनसे पहले वरिष्ठ राजनयिक प्रणय वर्मा इस पद पर कार्यरत थे। भारत-बांग्लादेश संबंधों में सुधार की दिशा में अहम कदम विशेषज्ञों का मानना है कि पर्यटक वीजा सेवा की बहाली से दोनों देशों के बीच पर्यटन, व्यापार, चिकित्सा यात्रा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा मिलेगा। इसे भारत और बांग्लादेश के रिश्तों को सामान्य बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
ढाका: भारत के नए उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी ने बांग्लादेश में अपनी नई जिम्मेदारी संभालने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। शुक्रवार सुबह वह बेनापोल भूमि बंदरगाह के रास्ते बांग्लादेश पहुंचे, जहां भारतीय उप उच्चायुक्त पवन बधे ने उनका स्वागत किया। त्रिवेदी मौजूदा उच्चायुक्त प्रणय वर्मा का स्थान लेंगे और ऐसे समय में कार्यभार संभाल रहे हैं जब भारत और बांग्लादेश के संबंध कई महत्वपूर्ण कूटनीतिक और रणनीतिक मुद्दों के दौर से गुजर रहे हैं। भारत सरकार ने 27 अप्रैल को दिनेश त्रिवेदी को बांग्लादेश में अगला उच्चायुक्त नियुक्त करने की घोषणा की थी। इसके बाद 5 जून को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें औपचारिक रूप से प्रत्यय पत्र (Letters of Credence) सौंपे, जिससे उनकी नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी हुई। द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाने पर रहेगा जोर भारत और बांग्लादेश के बीच व्यापार, सुरक्षा, सीमा प्रबंधन, कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय सहयोग जैसे कई मुद्दे लंबे समय से द्विपक्षीय एजेंडे का हिस्सा रहे हैं। हाल के वर्षों में दोनों देशों के संबंधों में कुछ चुनौतियां भी सामने आईं, जिनमें सीमा सुरक्षा, अवैध घुसपैठ और क्षेत्रीय राजनीतिक घटनाक्रम प्रमुख रहे हैं। कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, नई नियुक्ति का प्रमुख उद्देश्य दोनों देशों के बीच सहयोग को और मजबूत करना तथा लंबित मुद्दों पर संवाद को आगे बढ़ाना होगा। राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव का मिलेगा लाभ दिनेश त्रिवेदी भारतीय राजनीति का एक जाना-पहचाना नाम हैं। वह पूर्व केंद्रीय रेल मंत्री और पूर्व सांसद रह चुके हैं। राजनीतिक अनुभव के साथ-साथ बांग्ला भाषा और क्षेत्रीय सामाजिक-सांस्कृतिक समझ को भी उनकी नियुक्ति में एक महत्वपूर्ण कारक माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि उनका अनुभव दोनों देशों के बीच जन-स्तर और संस्थागत स्तर पर संबंधों को मजबूत बनाने में मददगार साबित हो सकता है। ढाका रवाना होने से पहले पहुंचे नेताजी भवन बांग्लादेश रवाना होने से पहले दिनेश त्रिवेदी ने कोलकाता स्थित नेताजी भवन का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि भारत और बांग्लादेश के संबंध केवल भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि साझा इतिहास, लोकतांत्रिक मूल्यों और लोगों के बीच गहरे जुड़ाव पर आधारित हैं। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के लोगों के बीच मजबूत संबंध भविष्य में सहयोग के नए अवसर पैदा कर सकते हैं। साथ ही उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के विचारों को अपने सार्वजनिक जीवन की प्रेरणा बताया। सुरक्षा और रक्षा सहयोग पर भी रहेगा ध्यान नई जिम्मेदारी संभालने से पहले दिनेश त्रिवेदी ने भारतीय सेना प्रमुख उपेंद्र द्विवेदी से भी मुलाकात की थी। इस दौरान भारत-बांग्लादेश रक्षा सहयोग, सीमा सुरक्षा और सैन्य समन्वय जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई थी। दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ा है और इसे भविष्य में और मजबूत करने की दिशा में प्रयास जारी हैं। रणनीतिक महत्व की नियुक्ति विश्लेषकों के अनुसार, ढाका में दिनेश त्रिवेदी की नियुक्ति केवल एक नियमित राजनयिक बदलाव नहीं, बल्कि क्षेत्रीय कूटनीति के लिहाज से एक महत्वपूर्ण कदम है। भारत और बांग्लादेश दक्षिण एशिया में आर्थिक, सामरिक और भू-राजनीतिक दृष्टि से एक-दूसरे के महत्वपूर्ण साझेदार हैं। ऐसे में आने वाले समय में व्यापार, ऊर्जा, संपर्क परियोजनाओं, सीमा प्रबंधन और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के सहयोग को नई गति देने में दिनेश त्रिवेदी की भूमिका अहम मानी जा रही है।
भारत और बांग्लादेश के बीच सीमा सुरक्षा और समन्वय से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर सोमवार से नई दिल्ली में उच्चस्तरीय वार्ता शुरू हो रही है। Border Security Force (बीएसएफ) और Border Guard Bangladesh (बीजीबी) के महानिदेशकों की 57वीं द्विवार्षिक बैठक 8 से 11 जून तक आयोजित की जाएगी। इस बैठक में सीमा प्रबंधन, सुरक्षा सहयोग और अवैध घुसपैठियों की वापसी जैसे संवेदनशील विषयों पर चर्चा होने की संभावना है। नई दिल्ली में जुटेंगे दोनों देशों के सीमा सुरक्षा प्रमुख चार दिवसीय सम्मेलन में बांग्लादेशी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व बीजीबी प्रमुख Mohammad Ashrafuzzaman Siddiqui करेंगे, जबकि भारतीय पक्ष की अगुवाई बीएसएफ महानिदेशक Praveen Kumar करेंगे। दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारी सीमा से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विचार-विमर्श करेंगे। अवैध प्रवासियों की वापसी रहेगा प्रमुख एजेंडा बैठक का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा भारत में रह रहे अवैध बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान और उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया को लेकर माना जा रहा है। बांग्लादेश ने इस विषय पर अपनी आपत्तियां जताई हैं और इसे वार्ता में प्रमुखता से उठाने की बात कही है। बांग्लादेश के गृह मामलों के सलाहकार Salahuddin Ahmed ने कहा है कि सीमा की मौजूदा स्थिति, द्विपक्षीय सहयोग और अवैध प्रवासियों की वापसी का मुद्दा बैठक में प्रमुख रूप से उठाया जाएगा। वहीं भारत का कहना है कि केवल सत्यापित अवैध घुसपैठियों को स्थापित कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए बांग्लादेश भेजा जाता है। सीमा अपराध और तस्करी पर भी होगी बातचीत सम्मेलन में सीमा पार अपराध, मानव तस्करी, मादक पदार्थों की तस्करी, अवैध घुसपैठ और सीमा पर होने वाली अन्य आपराधिक गतिविधियों को रोकने के उपायों पर भी चर्चा की जाएगी। दोनों पक्ष सीमा क्षेत्रों में बेहतर समन्वय और विश्वास बढ़ाने के उपायों पर भी विचार कर सकते हैं। 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा बनी चुनौती भारत और Bangladesh के बीच लगभग 4,096 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है। इसमें से करीब 860 किलोमीटर हिस्से में अभी भी बाड़ नहीं लगी है, जिसके कारण सुरक्षा एजेंसियों के सामने निगरानी और अवैध आवाजाही रोकने की चुनौती बनी रहती है। पांच दशक पुराना संवाद तंत्र भारत और बांग्लादेश के बीच महानिदेशक स्तर की सीमा वार्ताओं की शुरुआत 1975 में हुई थी। वर्ष 1975 से 1992 तक यह बैठक हर साल आयोजित की जाती थी, जबकि 1993 से इसे द्विवार्षिक स्वरूप दिया गया। सीमा से जुड़े मुद्दों के समाधान और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने में यह तंत्र दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान अपनी पहली विदेश यात्रा को लेकर चर्चा में हैं। फरवरी 2026 में सत्ता संभालने के बाद वह पहली बार किसी विदेशी दौरे पर जा रहे हैं, लेकिन उनकी पहली मंजिल न तो भारत है और न ही चीन। इसके बजाय उन्होंने पहले मलेशिया जाने का फैसला किया है। इसके बाद वह चीन का दौरा करेंगे। ढाका ने बदली रणनीति, चीन से पहले तय किया कुआलालंपुर का कार्यक्रम मई 2026 में बांग्लादेशी मीडिया में खबरें आई थीं कि तारिक रहमान सीधे चीन जा सकते हैं। बाद में सरकार ने 21-22 जून को मलेशिया और उसके बाद 23 जून से चीन यात्रा का कार्यक्रम तय किया। विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को ध्यान में रखकर लिया गया है। भारत और चीन के बीच संतुलन साधने की कोशिश में नई सरकार बांग्लादेश सरकार नहीं चाहती कि उसकी पहली विदेश यात्रा को किसी एक शक्ति केंद्र के प्रति झुकाव के रूप में देखा जाए। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, बीएनपी सरकार की 'बांग्लादेश फर्स्ट' नीति इसी संतुलन को दर्शाती है। कुआलालंपुर क्यों बना पहली पसंद? मलेशिया एक मुस्लिम बहुल देश होने के साथ-साथ बांग्लादेश का महत्वपूर्ण आर्थिक और सामाजिक साझेदार भी है। वहां बड़ी संख्या में बांग्लादेशी नागरिक काम और पढ़ाई कर रहे हैं। इसलिए पहली यात्रा के लिए मलेशिया अपेक्षाकृत सुरक्षित और कम विवादास्पद विकल्प माना गया। नई दिल्ली ने पहले ही बढ़ाया था रिश्तों का हाथ फरवरी 2026 में शपथ ग्रहण के दौरान भारत की ओर से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला शामिल हुए थे। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संदेश और भारत आने का निमंत्रण भी सौंपा था। इसे दोनों देशों के संबंधों को नया आयाम देने की कोशिश माना गया था। मलेशिया दौरे में प्रवासी श्रमिकों और निवेश पर रहेगा फोकस कुआलालंपुर यात्रा के दौरान प्रवासी बांग्लादेशी कामगारों के हित, शिक्षा सहयोग, व्यापार, निवेश और रोजगार के अवसरों पर चर्चा होने की संभावना है। मलेशिया में लाखों बांग्लादेशी नागरिक कार्यरत हैं। बीजिंग यात्रा पर टिकी क्षेत्रीय कूटनीति की नजरें मलेशिया के बाद होने वाला चीन दौरा ज्यादा रणनीतिक माना जा रहा है। चीन बांग्लादेश का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदारों में से एक है और दोनों देशों के बीच कई बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट लंबित हैं। तीस्ता परियोजना पर भारत की चिंता बढ़ा सकता है चीन-बांग्लादेश संवाद रिपोर्टों के अनुसार, चीन यात्रा के दौरान तीस्ता नदी प्रबंधन परियोजना पर चर्चा हो सकती है। यह परियोजना भारत के लिए भी संवेदनशील मानी जाती है क्योंकि इसका संबंध भारत-बांग्लादेश जल बंटवारे और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। ढाका की नई विदेश नीति का पहला बड़ा परीक्षण तारिक रहमान की पहली विदेश यात्रा को केवल एक राजनयिक कार्यक्रम नहीं बल्कि बांग्लादेश की नई विदेश नीति की दिशा तय करने वाले कदम के रूप में देखा जा रहा है। मलेशिया और चीन के दौरे से यह स्पष्ट होगा कि ढाका आने वाले वर्षों में क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों के बीच किस तरह संतुलन बनाकर चलना चाहता है।
भारत सरकार ने देश में अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई तेज करने के संकेत दिए हैं। विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को कहा कि कानून के अनुसार सभी अवैध विदेशी नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी और राष्ट्रीयता की पुष्टि होने के बाद बांग्लादेशी नागरिकों को उनके देश वापस भेजा जाएगा। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मीडिया ब्रीफिंग के दौरान बताया कि भारत ने 2,680 से अधिक संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों से जुड़े मामलों की सूची ढाका को सौंपी है। इन मामलों में संबंधित व्यक्तियों की नागरिकता की पुष्टि की जानी है। नागरिकता की पुष्टि के बाद होगी कार्रवाई विदेश मंत्रालय के अनुसार, कई मामलों में सत्यापन प्रक्रिया पिछले पांच वर्षों से लंबित है। भारत को उम्मीद है कि बांग्लादेश सरकार जल्द इन मामलों पर जवाब देगी ताकि निर्वासन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सके। रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत और बांग्लादेश के बीच मौजूद द्विपक्षीय समझौतों के तहत अवैध रूप से रह रहे लोगों को वापस भेजने की कार्रवाई की जाएगी। नस्लवाद पर भारत का सख्त रुख अमेरिका में भारतीयों के खिलाफ कथित नस्लीय भेदभाव से जुड़े वायरल वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए विदेश मंत्रालय ने कहा कि किसी भी प्रकार का नस्लवाद स्वीकार्य नहीं है। जायसवाल ने कहा कि भारत नस्लवाद के हर रूप की निंदा करता है और विदेशों में भारतीय नागरिकों के साथ होने वाले भेदभाव को गंभीरता से लेता है। उन्होंने कहा कि भारतीयों के अधिकारों और सम्मान की रक्षा भारत की प्राथमिकता है। आसियान देशों के साथ व्यापार वार्ता जारी विदेश मंत्रालय ने बताया कि आसियान देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लेकर बातचीत जारी है। फिलहाल इस संबंध में कोई नई जानकारी साझा नहीं की गई है। सरकार का कहना है कि क्षेत्रीय व्यापार सहयोग को मजबूत करने के लिए वार्ता लगातार जारी है। म्यांमार राष्ट्रपति की होगी पहली आधिकारिक भारत यात्रा विदेश मंत्रालय ने जानकारी दी कि म्यांमार के राष्ट्रपति जल्द भारत की आधिकारिक यात्रा पर आएंगे। यह उनकी पहली आधिकारिक भारत यात्रा होगी। भारत ने म्यांमार को अपनी ‘नेबरहुड फर्स्ट’, ‘एक्ट ईस्ट’ और ‘महासागर’ नीति का महत्वपूर्ण साझेदार बताया है। माना जा रहा है कि इस यात्रा से दोनों देशों के संबंध और मजबूत होंगे। फारस की खाड़ी में अब भी मौजूद हैं 11 भारतीय जहाज विदेश मंत्रालय के अनुसार, फारस की खाड़ी क्षेत्र में अभी भी 11 भारतीय ध्वज वाले जहाज मौजूद हैं। वहीं 14 भारतीय जहाज सुरक्षित रूप से वापस लौट चुके हैं। अमेरिका-ईरान तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में पैदा हुई अनिश्चितता के कारण हाल के महीनों में समुद्री यातायात प्रभावित हुआ था। भारत स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। इजराइल के साथ संबंधों पर भी दिया बयान इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के हालिया बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत और इजराइल के संबंध मजबूत, मित्रवत और सौहार्दपूर्ण हैं। हाल ही में नेतन्याहू ने भारत को एक बड़ी वैश्विक शक्ति बताते हुए कहा था कि भारतीय जनता के बीच इजराइल के प्रति सकारात्मक भावना देखने को मिलती है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि दोनों देशों के बीच सहयोग कई क्षेत्रों में लगातार मजबूत हो रहा है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत और ममता बनर्जी की हार पर पड़ोसी देश बांग्लादेश से भी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं. खासकर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के नेताओं ने चुनाव परिणामों को लेकर हैरानी जताई है और भारत-बांग्लादेश संबंधों को लेकर नई उम्मीदें व्यक्त की हैं. बांग्लादेश की राजधानी ढाका में BNP के सूचना सचिव अजीजुल बरी हेलाल ने कहा कि पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) की हार चौंकाने वाली है. उन्होंने भाजपा और शुभेंदु अधिकारी को जीत की बधाई भी दी. “टीएमसी की हार से स्तब्ध हूं” : अजीजुल बरी हेलाल BNP नेता अजीजुल बरी हेलाल ने कहा, “पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद टीएमसी की करारी हार देखकर मैं स्तब्ध हूं. मैं विजेता शुभेंदु अधिकारी और भाजपा को बधाई देता हूं.” उन्होंने उम्मीद जताई कि शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में पश्चिम Bengal और बांग्लादेश के बीच संबंध सौहार्दपूर्ण बने रहेंगे और दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ेगा. तीस्ता जल समझौते को लेकर बढ़ीं उम्मीदें बांग्लादेश में सबसे ज्यादा चर्चा तीस्ता नदी जल बंटवारे को लेकर हो रही है. BNP नेताओं का मानना है कि ममता बनर्जी पहले इस समझौते का विरोध करती रही हैं, जिसकी वजह से भारत और बांग्लादेश के बीच यह मुद्दा वर्षों से अटका हुआ है. अजीजुल बरी हेलाल ने कहा, “पहले हमने देखा कि ममता बनर्जी ही तीस्ता बांध और जल समझौते में सबसे बड़ी बाधा थीं. अब भाजपा सरकार बनने के बाद उम्मीद है कि बांग्लादेश सरकार और मोदी सरकार मिलकर इस समझौते को आगे बढ़ा सकती हैं.” उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच बेहतर संबंध दक्षिण एशिया की स्थिरता और विकास के लिए जरूरी हैं. भारत-बांग्लादेश संबंधों पर नजर बांग्लादेश के राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन का असर भारत-बांग्लादेश संबंधों पर भी पड़ सकता है. खासकर सीमा, व्यापार और जल बंटवारे जैसे मुद्दों पर नई राजनीतिक परिस्थितियां अहम भूमिका निभा सकती हैं. BNP नेता ने कहा कि वैचारिक मतभेदों के बावजूद भारत और बांग्लादेश के बीच मजबूत और शांतिपूर्ण संबंध दोनों देशों के हित में हैं. उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में सहयोग और संवाद और मजबूत होगा.
West Bengal में राजनीतिक बदलाव के बाद अब अवैध घुसपैठ का मुद्दा फिर सुर्खियों में आ गया है. नई सरकार के शपथ ग्रहण से पहले ही भारत सरकार ने संकेत दे दिए हैं कि अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान कर उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया तेज की जाएगी. इस मुद्दे पर विदेश मंत्रालय ने भी अपना रुख साफ कर दिया है. विदेश मंत्रालय ने क्या कहा? विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Randhir Jaiswal ने कहा कि भारत में रह रहे अवैध बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान की जा रही है और सभी कानूनी प्रक्रियाओं के बाद उन्हें वापस भेजा जाएगा. उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया को सफल बनाने के लिए Bangladesh का सहयोग जरूरी है. उन्होंने यह भी बताया कि बांग्लादेश की ओर से 2,860 से अधिक नागरिकता सत्यापन आवेदन अब भी लंबित हैं. इनमें कई मामले पांच साल से ज्यादा समय से अटके हुए हैं. भारत ने उम्मीद जताई है कि ढाका जल्द इन आवेदनों का निपटारा करेगा ताकि निर्वासन प्रक्रिया सुचारू रूप से पूरी हो सके. भाजपा के चुनावी वादे के बाद बढ़ी चर्चा चुनाव प्रचार के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने कई रैलियों में कहा था कि अगर भाजपा सत्ता में आती है तो “घुसपैठियों को चुन-चुनकर बाहर किया जाएगा.” अब भाजपा सरकार बनने के बाद इस मुद्दे पर कार्रवाई की संभावना को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है. बांग्लादेश ने जताई चिंता इस बीच बांग्लादेश के विदेश मंत्री Khalilur Rahman ने आशंका जताई थी कि भारत बड़ी संख्या में लोगों को बांग्लादेश भेज सकता है. उन्होंने कहा कि यदि ऐसा होता है तो ढाका भी इस पर सख्त कदम उठाएगा. हालांकि उन्होंने उम्मीद जताई कि दोनों देश बातचीत के जरिए समाधान निकालेंगे. तीस्ता जल संधि पर भी बढ़ी उम्मीद भाजपा की जीत के बाद एक और बड़ा मुद्दा चर्चा में आ गया है – Teesta Water Treaty. बांग्लादेश की सत्तारूढ़ पार्टी बीएनपी के नेताओं का मानना है कि पहले राज्य सरकार के विरोध के कारण यह समझौता आगे नहीं बढ़ पा रहा था. अब नई राजनीतिक परिस्थितियों में इस पर प्रगति की उम्मीद जताई जा रही है. बीएनपी के सूचना सचिव Azizul Bari Helal ने कहा कि नई सरकार केंद्र के साथ बेहतर तालमेल में काम कर सकती है, जिससे भारत और बांग्लादेश के बीच लंबित मुद्दों पर बातचीत आगे बढ़ सकती है. क्या होगा आगे? विशेषज्ञों के मुताबिक आने वाले दिनों में: अवैध प्रवासियों की पहचान अभियान तेज हो सकता है सीमा प्रबंधन और नागरिकता सत्यापन पर फोकस बढ़ेगा भारत-बांग्लादेश संबंधों में नए कूटनीतिक समीकरण बन सकते हैं तीस्ता जल समझौते जैसे लंबित मुद्दों पर बातचीत आगे बढ़ सकती है नई सरकार के गठन के साथ अब सबकी नजर इस बात पर है कि केंद्र और राज्य मिलकर इस संवेदनशील मुद्दे पर किस तरह आगे बढ़ते हैं.
पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की जीत का असर अब सीमाओं के पार बांग्लादेश की राजनीति में भी दिखने लगा है। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने इस नतीजे का स्वागत करते हुए उम्मीद जताई है कि भारत-बांग्लादेश के बीच लंबे समय से अटका तीस्ता जल बंटवारा समझौता अब आगे बढ़ सकता है। ममता सरकार पर आरोप, नई सरकार से बढ़ी उम्मीद BNP ने ममता बनर्जी की अगुवाई वाली पिछली सरकार को इस समझौते में देरी के लिए जिम्मेदार ठहराया है। पार्टी का कहना है कि राज्य स्तर पर असहमति के कारण यह अहम द्विपक्षीय समझौता वर्षों से लंबित है। अब नई सरकार के आने के बाद माहौल बदलने और समाधान निकलने की उम्मीद जताई जा रही है। तारेक रहमान की पार्टी को नई उम्मीद तारेक रहमान की पार्टी BNP ने कहा कि यह राजनीतिक बदलाव उनके लिए सकारात्मक संकेत है। पार्टी नेताओं का मानना है कि अब केंद्र और राज्य सरकार के बीच बेहतर तालमेल से तीस्ता मुद्दे पर प्रगति संभव हो सकती है। बीजेपी नेतृत्व की सराहना BNP नेताओं ने सुवेंदु अधिकारी समेत BJP नेतृत्व की जीत की सराहना की है। पार्टी के सूचना सचिव अज़ीजुल बारी हेलाल ने कहा कि नए नेतृत्व के साथ भारत और बांग्लादेश के रिश्ते और मजबूत हो सकते हैं। तीस्ता समझौता क्यों अहम? तीस्ता नदी दोनों देशों के बीच जल बंटवारे का एक बेहद संवेदनशील मुद्दा है। 2011 में प्रस्तावित समझौते के तहत बांग्लादेश को 37.5% और भारत को 42.5% पानी देने की योजना थी, लेकिन इसे लागू नहीं किया जा सका। पश्चिम बंगाल सरकार के विरोध के कारण यह समझौता अटका रहा। रणनीतिक मायने और संभावनाएं विशेषज्ञों के मुताबिक, नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार और बंगाल की नई सरकार के बीच बेहतर तालमेल से इस समझौते को आगे बढ़ाने की संभावना बढ़ सकती है। भारत और बांग्लादेश के बीच कुल 54 साझा नदियां हैं, लेकिन अब तक सिर्फ गंगा और कुशियारा नदी पर ही समझौते हो पाए हैं। आसान नहीं होगी राह हालांकि जानकार मानते हैं कि यह प्रक्रिया इतनी आसान नहीं होगी। जल बंटवारा, कृषि जरूरतें और स्थानीय हित जैसे मुद्दों को ध्यान में रखते हुए व्यापक सहमति बनानी होगी। केंद्र और राज्य के बीच समन्वय इस समझौते की दिशा तय करेगा। सत्ता परिवर्तन बंगाल में सत्ता परिवर्तन को बांग्लादेश एक सकारात्मक अवसर के रूप में देख रहा है। अब यह देखना अहम होगा कि क्या यह राजनीतिक बदलाव वाकई तीस्ता समझौते को आगे बढ़ा पाता है और भारत-बांग्लादेश संबंधों को नई गति दे पाता है।
भारत और Bangladesh के बीच संबंधों को नई दिशा देने की उम्मीदों के बीच बांग्लादेश के विदेश मंत्री Khalilur Rahman का भारत दौरा कई अहम संदेश छोड़ गया। जहां एक ओर ऊर्जा, व्यापार और वीजा जैसे मुद्दों पर सकारात्मक बातचीत हुई, वहीं दौरे के अंत में प्रत्यर्पण की मांग ने कूटनीतिक समीकरणों को जटिल बना दिया। प्रत्यर्पण की मांग ने बढ़ाया तनाव बांग्लादेश ने एक बार फिर पूर्व प्रधानमंत्री Sheikh Hasina और पूर्व गृह मंत्री Asaduzzaman Khan Kamal के प्रत्यर्पण की मांग दोहराई। बांग्लादेश सरकार का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण द्वारा सजा सुनाए जाने के बाद उन्हें देश वापस लाना जरूरी है। यह मांग केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक स्पष्ट राजनीतिक और कूटनीतिक संदेश भी मानी जा रही है। भारत के लिए कठिन संतुलन भारत के सामने यह मुद्दा बेहद संवेदनशील बन गया है। एक ओर पड़ोसी देश के साथ रिश्तों को मजबूत बनाए रखने की जरूरत है, तो दूसरी ओर भारत में रह रही पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का पालन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इस दौरान विदेश मंत्री S. Jaishankar और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार Ajit Doval के साथ हुई बैठकों में इस विषय पर चर्चा ने साफ कर दिया कि यह सिर्फ औपचारिक दौरा नहीं, बल्कि रणनीतिक बातचीत का हिस्सा था। अन्य मुद्दों पर भी बनी सहमति दोनों देशों के बीच वार्ता केवल प्रत्यर्पण तक सीमित नहीं रही। ऊर्जा सहयोग बढ़ाने पर चर्चा डीजल और उर्वरक आपूर्ति पर सकारात्मक संकेत मेडिकल और बिजनेस वीजा को आसान बनाने पर सहमति व्यापारिक संबंध मजबूत करने की दिशा में कदम इन पहलुओं से यह भी स्पष्ट हुआ कि दोनों देश रिश्तों को मजबूत बनाए रखना चाहते हैं, भले ही कुछ मुद्दों पर मतभेद क्यों न हों। नई सरकार का ‘Bangladesh First’ रुख बांग्लादेश की नई सरकार, जिसका नेतृत्व Tarique Rahman कर रहे हैं, ‘Bangladesh First’ नीति पर जोर दे रही है। इसी नीति के तहत प्रत्यर्पण का मुद्दा प्राथमिकता में रखा गया है। रिश्तों के लिए अग्निपरीक्षा यह पूरा घटनाक्रम संकेत देता है कि भारत-बांग्लादेश संबंध एक नए मोड़ पर हैं। जहां सहयोग और साझेदारी की संभावनाएं हैं, वहीं संवेदनशील मुद्दे दोनों देशों के बीच संतुलन की परीक्षा ले सकते हैं। आने वाले समय में भारत का रुख तय करेगा कि यह मामला रिश्तों को मजबूत करेगा या तनाव बढ़ाएगा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।