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India Grants Cabinet Rank to Bangladesh Envoy Dinesh Trivedi

बांग्लादेश में भारत के उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी को मिला कैबिनेट मंत्री का दर्जा, जानिए मोदी सरकार के फैसले के पीछे की रणनीति

Deepshikha जुलाई 1, 2026 0
India's newly appointed High Commissioner to Bangladesh Dinesh Trivedi during an official event after being granted Cabinet Minister rank by the Indian government.
India Grants Cabinet Rank to Bangladesh High Commissioner Dinesh Trivedi

नई दिल्ली: केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने बांग्लादेश में भारत के नए उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी को केंद्रीय कैबिनेट मंत्री के समकक्ष दर्जा देने का फैसला किया है। विदेश नीति के लिहाज से इस कदम को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला प्रधानमंत्री मोदी की 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति को मजबूत करने के साथ-साथ ढाका को एक स्पष्ट कूटनीतिक संदेश भी देता है।

दिनेश त्रिवेदी को 27 अप्रैल को बांग्लादेश में भारत का उच्चायुक्त नियुक्त किया गया था। मोदी सरकार के 12 वर्षों के कार्यकाल में यह पहली बार है, जब किसी वरिष्ठ राजनीतिक नेता को विदेश में भारत का राजदूत बनाकर भेजा गया है और उसे कैबिनेट मंत्री के समकक्ष दर्जा दिया गया है।

क्या होगा कैबिनेट रैंक का फायदा?

बांग्लादेश में भारत की पूर्व उच्चायुक्त वीना सीकरी ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में बताया कि कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिलने से दिनेश त्रिवेदी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक सीधे पहुंच मिलेगी।

उनके अनुसार, सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत विदेश सचिव या विदेश मंत्री के माध्यम से संवाद करने के बजाय त्रिवेदी सीधे प्रधानमंत्री से महत्वपूर्ण मामलों पर संपर्क कर सकेंगे। इससे दोनों देशों के बीच संवेदनशील मुद्दों पर तेजी से निर्णय लेने में मदद मिलेगी।

ढाका के लिए क्या है संदेश?

वीना सीकरी के मुताबिक, यह फैसला बांग्लादेश को यह स्पष्ट संदेश देता है कि दिनेश त्रिवेदी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भरोसेमंद राजनीतिक प्रतिनिधि हैं।

ऐसे में बांग्लादेश की सरकार भी उनके साथ सामान्य राजनयिक की बजाय उच्च राजनीतिक स्तर पर संवाद करेगी। माना जा रहा है कि त्रिवेदी की सीधी पहुंच बांग्लादेश के प्रधानमंत्री और वरिष्ठ मंत्रियों तक होगी।

प्रोटोकॉल और सुरक्षा में भी मिलेगा विशेष दर्जा

कैबिनेट रैंक मिलने के बाद दिनेश त्रिवेदी को बांग्लादेश में विशेष कूटनीतिक प्रोटोकॉल मिलेगा। हवाई अड्डे पर आगमन, आधिकारिक कार्यक्रमों और देश के भीतर यात्रा के दौरान उन्हें वही सम्मान और सुरक्षा उपलब्ध कराई जाएगी, जो बांग्लादेश अपने कैबिनेट मंत्रियों को देता है।

'नेबरहुड फर्स्ट' नीति को मिलेगी मजबूती

विशेषज्ञों का मानना है कि यह नियुक्ति प्रधानमंत्री मोदी की 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति के तहत पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को प्राथमिकता देने की रणनीति का हिस्सा है।

अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के सत्ता से हटने के बाद भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में तनाव देखने को मिला था। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौरान कई भारत समर्थक परियोजनाओं और नीतिगत फैसलों में बदलाव किए गए, जिससे दोनों देशों के संबंध प्रभावित हुए।

नई सरकार के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश

अब बांग्लादेश में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली नई सरकार के गठन के बाद भारत व्यापार, निवेश और विकास परियोजनाओं को फिर से गति देना चाहता है।

हाल के दिनों में तारिक रहमान की चीन यात्रा और वहां जारी संयुक्त बयान ने नई दिल्ली की रणनीतिक चिंताओं को बढ़ाया है। ऐसे में दिनेश त्रिवेदी की नियुक्ति और उन्हें दिया गया विशेष दर्जा भारत की सक्रिय कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

पहले भी राजनीतिक नेताओं को मिल चुका है यह सम्मान

मोदी सरकार में यह पहली बार हुआ है, लेकिन पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों के दौरान भी कई वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं को राजदूत बनाकर भेजा गया था। इनमें विजयलक्ष्मी पंडित, टी.एन. कौल, डॉ. कर्ण सिंह और डी.पी. धर जैसे नाम शामिल हैं, जिन्हें अपने-अपने कार्यकाल में कैबिनेट मंत्री के समकक्ष दर्जा दिया गया था।


 

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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बेंगलुरु में हिंदी साइनबोर्ड पर विवाद, कन्नड़ समर्थक संगठन ने हटाया बोर्ड

बेंगलुरु, एजेंसियां। कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में एक बार फिर भाषा विवाद ने तूल पकड़ लिया है। बुधवार को कन्नड़ समर्थक संगठन कर्नाटक रक्षण वेदिके (KRV) के कार्यकर्ताओं ने जलाहल्ली स्थित BEL सर्कल के पास लगे एक हिंदी साइनबोर्ड का विरोध करते हुए उसे हटा दिया। प्रदर्शन के दौरान कार्यकर्ताओं ने साइनबोर्ड के हिंदी अक्षरों को क्षतिग्रस्त किया और आरोप लगाया कि बोर्ड बिना अनुमति लगाया गया था तथा यह राज्य में हिंदी थोपने की कोशिश का हिस्सा है।   हिंदी थोपने का लगाया आरोप प्रदर्शन कर रहे संगठन का कहना है कि कर्नाटक की आधिकारिक भाषा कन्नड़ है और सार्वजनिक स्थानों पर बिना अनुमति हिंदी साइनबोर्ड लगाना उचित नहीं है। संगठन ने सोशल मीडिया पर भी अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह राज्य में किसी भी रूप में हिंदी थोपने के प्रयासों का विरोध करता रहेगा। संगठन ने दावा किया कि ऐसे साइनबोर्ड कर्नाटक की भाषाई पहचान के खिलाफ हैं।   भाषा विवाद फिर चर्चा में इस घटना के बाद कर्नाटक में हिंदी और कन्नड़ भाषा को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। संगठन के नेताओं का कहना है कि कन्नड़ भाषियों ने राज्य के औद्योगिक और सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, इसलिए स्थानीय भाषा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्रों में भाषा संबंधी नियमों का पालन करने की भी मांग की।   राजभाषा और राज्यभाषा में अंतर गौरतलब है कि भारतीय संविधान के अनुसार हिंदी, देवनागरी लिपि में संघ सरकार की राजभाषा है। वहीं संविधान किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं देता। दूसरी ओर, कर्नाटक सरकार के प्रशासनिक कार्यों की प्रमुख भाषा कन्नड़ है। ऐसे में भाषा से जुड़े मुद्दे समय-समय पर राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बनते रहे हैं।   प्रशासन की नजर घटना पर घटना के बाद यह मामला चर्चा का विषय बन गया है। फिलहाल संबंधित अधिकारियों की ओर से इस मामले में विस्तृत बयान सामने नहीं आया है। वहीं भाषा को लेकर बढ़ते विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि सार्वजनिक संस्थानों में विभिन्न भाषाओं के उपयोग को लेकर स्पष्ट और संतुलित नीति अपनाने की आवश्यकता है, ताकि भाषाई अस्मिता और संवैधानिक व्यवस्था दोनों का सम्मान बना रहे।

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बांग्लादेश में भारत के उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी को मिला कैबिनेट मंत्री का दर्जा, जानिए मोदी सरकार के फैसले के पीछे की रणनीति

नई दिल्ली: केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने बांग्लादेश में भारत के नए उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी को केंद्रीय कैबिनेट मंत्री के समकक्ष दर्जा देने का फैसला किया है। विदेश नीति के लिहाज से इस कदम को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला प्रधानमंत्री मोदी की 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति को मजबूत करने के साथ-साथ ढाका को एक स्पष्ट कूटनीतिक संदेश भी देता है। दिनेश त्रिवेदी को 27 अप्रैल को बांग्लादेश में भारत का उच्चायुक्त नियुक्त किया गया था। मोदी सरकार के 12 वर्षों के कार्यकाल में यह पहली बार है, जब किसी वरिष्ठ राजनीतिक नेता को विदेश में भारत का राजदूत बनाकर भेजा गया है और उसे कैबिनेट मंत्री के समकक्ष दर्जा दिया गया है। क्या होगा कैबिनेट रैंक का फायदा? बांग्लादेश में भारत की पूर्व उच्चायुक्त वीना सीकरी ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में बताया कि कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिलने से दिनेश त्रिवेदी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक सीधे पहुंच मिलेगी। उनके अनुसार, सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत विदेश सचिव या विदेश मंत्री के माध्यम से संवाद करने के बजाय त्रिवेदी सीधे प्रधानमंत्री से महत्वपूर्ण मामलों पर संपर्क कर सकेंगे। इससे दोनों देशों के बीच संवेदनशील मुद्दों पर तेजी से निर्णय लेने में मदद मिलेगी। ढाका के लिए क्या है संदेश? वीना सीकरी के मुताबिक, यह फैसला बांग्लादेश को यह स्पष्ट संदेश देता है कि दिनेश त्रिवेदी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भरोसेमंद राजनीतिक प्रतिनिधि हैं। ऐसे में बांग्लादेश की सरकार भी उनके साथ सामान्य राजनयिक की बजाय उच्च राजनीतिक स्तर पर संवाद करेगी। माना जा रहा है कि त्रिवेदी की सीधी पहुंच बांग्लादेश के प्रधानमंत्री और वरिष्ठ मंत्रियों तक होगी। प्रोटोकॉल और सुरक्षा में भी मिलेगा विशेष दर्जा कैबिनेट रैंक मिलने के बाद दिनेश त्रिवेदी को बांग्लादेश में विशेष कूटनीतिक प्रोटोकॉल मिलेगा। हवाई अड्डे पर आगमन, आधिकारिक कार्यक्रमों और देश के भीतर यात्रा के दौरान उन्हें वही सम्मान और सुरक्षा उपलब्ध कराई जाएगी, जो बांग्लादेश अपने कैबिनेट मंत्रियों को देता है। 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति को मिलेगी मजबूती विशेषज्ञों का मानना है कि यह नियुक्ति प्रधानमंत्री मोदी की 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति के तहत पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को प्राथमिकता देने की रणनीति का हिस्सा है। अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के सत्ता से हटने के बाद भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में तनाव देखने को मिला था। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौरान कई भारत समर्थक परियोजनाओं और नीतिगत फैसलों में बदलाव किए गए, जिससे दोनों देशों के संबंध प्रभावित हुए। नई सरकार के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश अब बांग्लादेश में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली नई सरकार के गठन के बाद भारत व्यापार, निवेश और विकास परियोजनाओं को फिर से गति देना चाहता है। हाल के दिनों में तारिक रहमान की चीन यात्रा और वहां जारी संयुक्त बयान ने नई दिल्ली की रणनीतिक चिंताओं को बढ़ाया है। ऐसे में दिनेश त्रिवेदी की नियुक्ति और उन्हें दिया गया विशेष दर्जा भारत की सक्रिय कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पहले भी राजनीतिक नेताओं को मिल चुका है यह सम्मान मोदी सरकार में यह पहली बार हुआ है, लेकिन पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों के दौरान भी कई वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं को राजदूत बनाकर भेजा गया था। इनमें विजयलक्ष्मी पंडित, टी.एन. कौल, डॉ. कर्ण सिंह और डी.पी. धर जैसे नाम शामिल हैं, जिन्हें अपने-अपने कार्यकाल में कैबिनेट मंत्री के समकक्ष दर्जा दिया गया था।  

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