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आगरा-अलीगढ़ ग्रीनफील्ड हाईवे को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी

UP: आगरा-अलीगढ़ ग्रीनफील्ड हाईवे को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी, सितंबर से शुरू होगा 37 किमी हिस्से का काम

ranjan kumar tiwari अगस्त 17, 2026 0
आगरा-अलीगढ़ ग्रीनफील्ड हाईवे परियोजना का निर्माण
आगरा-अलीगढ़ ग्रीनफील्ड हाईवे के 37 किमी हिस्से को मंजूरी

लखनऊ, एजेंसियां। उत्तर प्रदेश में सड़क कनेक्टिविटी को मजबूत करने वाली आगरा-अलीगढ़ ग्रीनफील्ड हाईवे परियोजना को लेकर बड़ी खबर सामने आई है। हाईवे के दूसरे पैकेज के निर्माण के लिए सुप्रीम कोर्ट से अनुमति मिल गई है। अनुमति मिलने के बाद करीब 37 किलोमीटर लंबे हिस्से पर सितंबर से निर्माण कार्य शुरू होने की उम्मीद है।

 

65 किमी लंबा है आगरा-अलीगढ़ ग्रीनफील्ड हाईवे

 

 

आगरा-अलीगढ़ ग्रीनफील्ड हाईवे की कुल लंबाई करीब 65 किलोमीटर है और परियोजना पर लगभग 820 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। एनएचएआई ने इसे दो पैकेज में मंजूरी दी है।

 

पहले पैकेज के तहत करीब 28 किलोमीटर हिस्से पर पहले से काम चल रहा है। वहीं दूसरा पैकेज करीब 37 किलोमीटर लंबा है, जो ताज ट्रैपेजियम जोन (TTZ) में आता है। इसी वजह से इस हिस्से के निर्माण के लिए सुप्रीम कोर्ट की अनुमति जरूरी थी।

 

सितंबर से शुरू होगा दूसरे पैकेज का काम

 

 

सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी मिलने के बाद दूसरे पैकेज पर निर्माण कार्य आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है। उम्मीद है कि सितंबर 2026 से 37 किलोमीटर हिस्से पर काम शुरू हो जाएगा।

 

इस हाईवे के बनने से आगरा और अलीगढ़ के बीच आवागमन आसान होगा। साथ ही स्थानीय लोगों को आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेसवे, यमुना एक्सप्रेसवे और पूर्वांचल एक्सप्रेसवे तक पहुंचने में भी सुविधा मिलेगी।

 

अलीगढ़-चंदौसी-मुरादाबाद हाईवे भी होगा फोरलेन

 

 

इसके साथ ही अलीगढ़-चंदौसी-मुरादाबाद हाईवे को भी फोरलेन करने की तैयारी चल रही है। फिलहाल यह सड़क दो लेन की है। करीब 107 किलोमीटर लंबी परियोजना पर लगभग 4,000 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।

 

इस परियोजना के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार की जा रही है। फोरलेन बनने के बाद अलीगढ़ से चंदौसी और मुरादाबाद के बीच यातायात व्यवस्था बेहतर होने की उम्मीद है।

 

मुरादाबाद-हल्द्वानी ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे पर भी अध्ययन

 

 

सड़क कनेक्टिविटी बढ़ाने की दिशा में मुरादाबाद-हल्द्वानी ग्रीनफील्ड फोरलेन एक्सप्रेसवे पर भी काम आगे बढ़ रहा है। सूत्रों के मुताबिक, इस प्रस्तावित परियोजना की व्यवहार्यता (फिजिबिलिटी) का अध्ययन कराया जा रहा है।

 

इन परियोजनाओं के पूरा होने से उत्तर प्रदेश के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों के बीच कनेक्टिविटी मजबूत होने के साथ-साथ क्षेत्रीय व्यापार और आवागमन को भी गति मिलने की उम्मीद है।

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Ranjan Kumar Tiwari Ranjan123

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चमोली टनल हादसे के बाद मलबे और पानी के बीच रेस्क्यू अभियान
Chamoli tunnel accident: दो श्रमिक अब भी लापता, आठ की मौत; मलबे और पानी के बीच रेस्क्यू अभियान जारी

चमोली। उत्तराखंड के चमोली जिले में टीएचडीसी की पीपलकोटी-विष्णुगाड जल विद्युत परियोजना की टनल में हुए भूस्खलन के बाद राहत और बचाव अभियान लगातार जारी है। हादसे में अब तक आठ श्रमिकों की मौत हो चुकी है, जबकि दो श्रमिक अभी भी लापता हैं। 12 श्रमिकों को सुरक्षित बाहर निकाला जा चुका है।   मलबे और पानी के कारण रेस्क्यू में मुश्किल     पीपलकोटी की टेल रेस टनल में बृहस्पतिवार को भूस्खलन के बाद 22 श्रमिक फंस गए थे। रेस्क्यू अभियान के दौरान अब तक आठ शव बरामद किए जा चुके हैं। शनिवार को मिले आठवें शव की पहचान छत्तीसगढ़ निवासी देवनाथ के रूप में हुई।   टनल के अंदर पानी और मलबा भरा होने के साथ मशीनरी और निर्माण सामग्री भी मौजूद है। पानी निकालने के लिए पंप लगाए गए हैं। रेस्क्यू टीमें मलबे वाले हिस्से तक पहुंच चुकी हैं, लेकिन लापता दोनों श्रमिकों का अभी पता नहीं चल पाया है।   कई एजेंसियां रेस्क्यू में जुटीं     लापता श्रमिकों की तलाश में एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, आईटीबीपी, पुलिस और जिला प्रशासन की टीमें जुटी हैं। टनल से मशीनरी हटाकर खोज अभियान को तेज करने का प्रयास किया जा रहा है।   सोमवार को गढ़वाल मंडल आयुक्त आनंद स्वरूप की अध्यक्षता में गोपेश्वर में समीक्षा बैठक हुई। इसमें रेस्क्यू अभियान की प्रगति, संसाधनों और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय की समीक्षा की गई। अधिकारियों के मुताबिक, टनल से तीन मशीनें हटाई जा चुकी हैं। एक एक्सकेवेटर और एक डंपर को हटाने का काम जारी है। आयुक्त ने शेष मशीनरी हटाकर लापता श्रमिकों की तलाश में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं।   टीएचडीसी कार्यालय के बाहर यूकेडी का प्रदर्शन     हादसे में मृत श्रमिकों के परिजनों को उचित मुआवजा देने की मांग को लेकर यूकेडी कार्यकर्ताओं ने टीएचडीसी के पीपलकोटी कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान कार्यकर्ताओं की सुरक्षा कर्मियों से बहस भी हुई।   यूकेडी नेताओं ने हादसे के लिए कंपनी की कथित लापरवाही को जिम्मेदार ठहराते हुए उचित मुआवजे की मांग की। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि कंपनी के अधिकारी बाहर आकर मृतकों के परिजनों से बातचीत करें और मुआवजे का स्पष्ट आश्वासन दें।   रेस्क्यू अभियान में समन्वय पर जोर     प्रशासन ने सभी संबंधित एजेंसियों को बेहतर समन्वय के साथ अभियान चलाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही आरबीएनएल के साथ समन्वय कर टीएचडीसी से जुड़े रेस्क्यू कार्यों में उपलब्ध संसाधनों का प्रभावी इस्तेमाल करने को कहा गया है। फिलहाल बचाव दल की प्राथमिकता टनल में फंसे दोनों लापता श्रमिकों का पता लगाना है।  

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असम बाढ़ के बाद प्रभावित गांवों और विस्थापित परिवारों की स्थिति
Assam Flood: 103 मौतें, 7 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित; पानी उतरने के बाद भी सामने है बड़ी चुनौती

गुवाहाटी, एजेंसियां। असम में इस साल बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। 19 जुलाई से शुरू हुए बाढ़ के दौर में अब तक 103 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 433 गांव जलमग्न हुए हैं। सात लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए हैं और करीब 49 हजार लोग अब भी 125 राहत शिविरों और वितरण केंद्रों में रहने को मजबूर हैं।   शिवसागर और चराइदेव में सबसे ज्यादा असर     19 जुलाई को नगालैंड के मोन जिले की पहाड़ियों में हुई भारी बारिश के बाद दिखौ नदी का जलस्तर अचानक बढ़ गया। इसके बाद शिवसागर, चराइदेव और गोलाघाट समेत कई इलाकों में बाढ़ का पानी घुस गया। ऊपरी असम के कई हिस्सों में हालात बेहद गंभीर रहे।   पानी का स्तर अब कम होने लगा है, लेकिन बाढ़ से हुई तबाही के निशान अभी भी साफ दिखाई दे रहे हैं।   घरों में जमा कीचड़, सामान हुआ बर्बाद     बाढ़ का पानी उतरने के बाद प्रभावित परिवारों के सामने नई मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। कई घरों में कीचड़ और गाद जमा है। कपड़े, बर्तन, अनाज और बच्चों की किताबें खराब हो चुकी हैं। कई जगह मकानों की दीवारें भी क्षतिग्रस्त हुई हैं।   मवेशियों के बह जाने से ग्रामीण परिवारों के सामने आजीविका का संकट भी खड़ा हो गया है।   25 मल्लाहों ने बचाई करीब 1,500 लोगों की जान     बाढ़ के शुरुआती दौर में जब कई जगह राहत दल नहीं पहुंच सके, तब स्थानीय मल्लाहों ने मोर्चा संभाला। करीब 25 मल्लाहों ने नावों की मदद से तेज बहाव के बीच लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया। उनके प्रयास से लगभग 1,500 लोगों की जान बचाई गई।   अब राहत के साथ-साथ प्रभावित गांवों में पुनर्वास का काम बड़ी चुनौती बन गया है।   10,884 हेक्टेयर से ज्यादा फसल बर्बाद     बाढ़ से खेती को भी भारी नुकसान हुआ है। 10,884 हेक्टेयर से अधिक फसल क्षेत्र प्रभावित होने की जानकारी है। किसानों के सामने फसल बर्बाद होने के बाद दोबारा खेती शुरू करने और परिवार की आजीविका चलाने की चुनौती है।   बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हुई है। कई विद्यार्थियों की किताबें और जरूरी शैक्षणिक सामग्री बाढ़ के पानी में खराब हो गई है।   पुनर्वास पर खर्च होंगे 1,000 करोड़ से ज्यादा     मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा के मुताबिक, बाढ़ से हुई क्षति की भरपाई और प्रभावित परिवारों के पुनर्वास में 1,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च होने का अनुमान है। यानी पानी उतरने के बाद भी राज्य सरकार के सामने राहत और पुनर्निर्माण का बड़ा अभियान होगा।   पश्चिम बंगाल की ओर से भी असम के बाढ़ प्रभावित लोगों की मदद के लिए 10 करोड़ रुपये देने की घोषणा की गई है।   अब परिवारों को दोबारा बसाना सबसे बड़ी चुनौती     असम में बाढ़ का पानी कम होने के साथ तत्काल संकट भले कम हुआ हो, लेकिन प्रभावित परिवारों की मुश्किलें अभी खत्म नहीं हुई हैं। टूटे घरों की मरम्मत, फसल और मवेशियों के नुकसान की भरपाई, रोजगार की बहाली और बच्चों की पढ़ाई दोबारा शुरू कराना सरकार के सामने बड़ी चुनौतियां हैं।  

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BJP MLA M. Bhojarajan speaks in Tamil Nadu Assembly as the party’s lone voice against Chief Minister Vijay
तमिलनाडु विधानसभा में CM विजय के खिलाफ अकेली आवाज बने BJP विधायक एम. भोजराजन, जानिए कौन हैं ये 79 वर्षीय नेता

चेन्नई: तमिलनाडु की राजनीति में इन दिनों एक अलग तरह का समीकरण देखने को मिल रहा है। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली टीवीके सरकार को विधानसभा में मुख्य विपक्षी दलों के साथ-साथ एक ऐसी आवाज से भी चुनौती मिल रही है, जो संख्या में भले ही अकेली है, लेकिन कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार के प्रस्तावों का खुलकर विरोध कर रही है। यह नेता हैं बीजेपी के इकलौते विधायक एम. भोजराजन। 234 सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी का इस समय केवल एक विधायक है। ऐसे में सदन में पार्टी की पूरी आवाज और विरोध का दारोमदार भोजराजन पर है। DMK और AIADMK के समर्थन के बीच अकेले विरोध तमिलनाडु विधानसभा में दशकों से डीएमके और एआईएडीएमके के बीच मुख्य राजनीतिक मुकाबला रहा है। लेकिन मौजूदा विधानसभा में कई मुद्दों पर तस्वीर अलग दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री विजय की टीवीके सरकार के कुछ महत्वपूर्ण प्रस्तावों का डीएमके और एआईएडीएमके ने समर्थन किया, लेकिन एम. भोजराजन ने उनका विरोध किया। इस वजह से वह सदन में सरकार के खिलाफ अकेली आवाज के तौर पर चर्चा में आ गए हैं। किन मुद्दों पर सरकार का विरोध कर रहे हैं भोजराजन? भोजराजन ने कई महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर अपना विरोध दर्ज कराया है। इनमें NEET को खत्म करने की मांग, विदेशी चंदे से जुड़े कानून में 2026 के संशोधन को वापस लेने का प्रस्ताव और परिसीमन प्रक्रिया का विरोध प्रमुख हैं। इन मुद्दों पर बीजेपी का पक्ष विधानसभा में रखने की जिम्मेदारी फिलहाल उन्हीं के कंधों पर है। विधानसभा में किस दल के कितने विधायक? तमिलनाडु की 17वीं विधानसभा में टीवीके के 108 विधायक हैं। वहीं डीएमके के 59 और एआईएडीएमके के 47 विधायक बताए गए हैं। इसके मुकाबले बीजेपी के पास सिर्फ एक विधायक है। पिछली विधानसभा में बीजेपी के चार विधायक थे, लेकिन मौजूदा विधानसभा में पार्टी की संख्या घटकर एक रह गई है। इसलिए भोजराजन की भूमिका पार्टी के लिए और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। 79 साल की उम्र में सबसे उम्रदराज विधायक एम. भोजराजन का राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन काफी लंबा रहा है। वर्ष 1946 में जन्मे भोजराजन मौजूदा विधानसभा के सबसे उम्रदराज सदस्यों में हैं। नीलगिरी क्षेत्र से आने वाले भोजराजन का चाय कारोबार से पुराना संबंध रहा है। वह किसान और कारोबारी होने के साथ-साथ वकील भी रह चुके हैं। नीलगिरी में चाय बागानों और चाय से जुड़े कारोबार के कारण भी उनकी पहचान बनी है। पढ़ाई भी रही है खास भोजराजन का शैक्षणिक सफर भी काफी विविध रहा है। उन्होंने ऊटी के गवर्नमेंट आर्ट्स कॉलेज से पढ़ाई की। इसके बाद मद्रास लॉ कॉलेज से कानून की शिक्षा ली। इतना ही नहीं, उन्होंने मद्रास मेडिकल कॉलेज से क्रिमिनोलॉजी यानी अपराध विज्ञान में डिप्लोमा भी किया। खेती, कारोबार और कानून से जुड़े अनुभवों ने उनके सार्वजनिक जीवन को अलग पहचान दी है। अकेले विधायक की बढ़ी जिम्मेदारी बीजेपी के लिए तमिलनाडु विधानसभा में सिर्फ एक विधायक होना निश्चित तौर पर बड़ी चुनौती है। ऐसे में भोजराजन की भूमिका केवल एक विधायक तक सीमित नहीं रह जाती। वह सदन में पार्टी के मुद्दों, आपत्तियों और राजनीतिक रुख को सामने रखने वाले प्रमुख चेहरे बन गए हैं।  

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