नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट में NEET-UG 2026 से जुड़े मामलों पर सुनवाई के दौरान परीक्षा व्यवस्था, कथित अनियमितताओं और नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली में सुधार से जुड़े मुद्दे सामने आए। याचिकाकर्ताओं की ओर से परीक्षा प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने और भविष्य में पेपर लीक जैसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की गई। परीक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग सुनवाई के दौरान NEET-UG जैसी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा आयोजित करने वाली व्यवस्था को मजबूत बनाने पर जोर दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने परीक्षा केंद्रों की निगरानी, प्रश्नपत्रों की सुरक्षा और परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने की जरूरत बताई। NTA की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल मामले में NTA की भूमिका और परीक्षा प्रबंधन को लेकर भी सवाल उठाए गए। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि देशभर में एक साथ आयोजित होने वाली इतनी बड़ी परीक्षा में प्रश्नपत्र की सुरक्षा से लेकर परीक्षा केंद्रों की निगरानी तक पूरी व्यवस्था को और मजबूत किया जाना चाहिए। पेपर लीक रोकने के लिए सख्त व्यवस्था की मांग NEET-UG में कथित पेपर लीक और दूसरी अनियमितताओं को रोकने के लिए प्रश्नपत्र की छपाई, परिवहन, भंडारण और परीक्षा केंद्र तक पहुंचाने की प्रक्रिया को सुरक्षित बनाने की मांग की गई। परीक्षा में किसी भी तरह की गड़बड़ी का सीधा असर लाखों विद्यार्थियों के भविष्य पर पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट के अंतिम आदेश का इंतजार फिलहाल सुनवाई के दौरान उठाए गए मुद्दों को अंतिम फैसला या NTA में तत्काल बदलाव का आदेश नहीं माना जाना चाहिए। मामले में सुप्रीम कोर्ट की आगे की कार्यवाही और आदेश के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि परीक्षा व्यवस्था में कौन-कौन से बदलाव लागू होंगे।
नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के शिवसेना विवाद से जुड़ी सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि विधायकों की अयोग्यता पर फैसला लेने की पहली संवैधानिक जिम्मेदारी विधानसभा के स्पीकर की है। अदालत ने कहा कि वह खुद स्पीकर की भूमिका ग्रहण करके किसी विधायक को अयोग्य घोषित नहीं कर सकती। हालांकि, स्पीकर के फैसले की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है। शिंदे गुट के विधायकों की अयोग्यता का मामला यह मामला उद्धव ठाकरे गुट की ओर से दायर याचिका से जुड़ा है, जिसमें एकनाथ शिंदे गुट में शामिल हुए विधायकों को अयोग्य घोषित करने की मांग की गई थी। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह सवाल आया कि अगर स्पीकर का फैसला कानूनी रूप से गलत पाया जाता है तो क्या सुप्रीम कोर्ट खुद विधायकों को अयोग्य घोषित कर सकता है। कोर्ट ने कहा- स्पीकर की भूमिका नहीं ले सकते जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि क्या अदालत खुद स्पीकर की भूमिका निभाकर शिंदे गुट के विधायकों को अयोग्य घोषित कर सकती है। अदालत ने संकेत दिया कि वह स्पीकर के आदेश को रद्द कर मामले को दोबारा निर्णय के लिए स्पीकर के पास भेज सकती है, लेकिन खुद अयोग्यता का फैसला लेना अलग विषय है। दसवीं अनुसूची के तहत स्पीकर को अधिकार संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल के आधार पर विधायकों की अयोग्यता से जुड़े मामलों पर फैसला लेने का अधिकार विधानसभा के स्पीकर को दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसलों में भी कहा गया है कि सामान्य परिस्थितियों में स्पीकर ही इन याचिकाओं पर फैसला करने वाले उपयुक्त संवैधानिक प्राधिकारी हैं। स्पीकर का फैसला न्यायिक समीक्षा के दायरे में हालांकि स्पीकर को अयोग्यता पर फैसला लेने का अधिकार है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनका निर्णय अदालत की समीक्षा से बाहर है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि स्पीकर के फैसले को उचित मामलों में न्यायिक समीक्षा के तहत चुनौती दी जा सकती है। महाराष्ट्र की राजनीति पर भी पड़ेगा असर सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी महाराष्ट्र के शिवसेना बनाम शिवसेना विवाद के लिहाज से महत्वपूर्ण है। इस मामले में विधायकों की अयोग्यता और स्पीकर के अधिकार को लेकर लंबे समय से कानूनी लड़ाई चल रही है। अदालत का रुख भविष्य में ऐसे दल-बदल मामलों में न्यायपालिका और विधानसभा अध्यक्ष की संवैधानिक भूमिकाओं की सीमा तय करने में अहम हो सकता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ आज, 20 अगस्त 2026, औद्योगिक विवाद कानून के तहत ‘इंडस्ट्री’ की कानूनी परिभाषा से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाने वाली है। मामला करीब 48 साल पुराने ‘बेंगलुरु वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम ए. राजप्पा’ फैसले की समीक्षा से जुड़ा है। इस पुराने फैसले ने ‘इंडस्ट्री’ की परिभाषा को काफी व्यापक बनाया था। 1978 के फैसले की हो रही समीक्षा साल 1978 में सात जजों की पीठ ने कहा था कि नियोक्ता और कर्मचारियों के सहयोग से वस्तुओं या सेवाओं के उत्पादन या वितरण की व्यवस्थित गतिविधि ‘इंडस्ट्री’ के दायरे में आ सकती है, भले ही उसका उद्देश्य मुनाफा कमाना न हो। इस व्याख्या का असर अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों, धर्मार्थ संगठनों और कुछ सरकारी गतिविधियों तक पड़ा था। नौ जजों की पीठ के सामने अहम सवाल मुख्य सवाल यह है कि 1978 में तय किया गया ‘ट्रिपल टेस्ट’ आज भी ‘इंडस्ट्री’ की सही कानूनी व्याख्या है या नहीं। पीठ यह भी देख रही है कि बाद में बने कानूनों, खासकर Industrial Relations Code, 2020, का इस व्याख्या पर क्या प्रभाव पड़ा है। सरकारी विभाग और कल्याणकारी योजनाएं भी दायरे में? अदालत के सामने यह सवाल भी है कि सरकार के विभागों की सामाजिक कल्याण योजनाओं और सेवाओं को औद्योगिक गतिविधि माना जा सकता है या नहीं। इसका फैसला सरकारी कर्मचारियों के साथ-साथ अस्पतालों, विश्वविद्यालयों और अन्य संस्थानों के कर्मचारियों के अधिकारों पर असर डाल सकता है। 19 मार्च को सुरक्षित रखा था फैसला नौ जजों की संविधान पीठ ने इस मामले में तीन दिनों तक दलीलें सुनने के बाद 19 मार्च 2026 को फैसला सुरक्षित रखा था। अब 20 अगस्त को फैसला सुनाया जाना निर्धारित है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने दारा सिंह उर्फ रविंद्र कुमार पाल की समयपूर्व रिहाई यानी सजा में छूट की याचिका पर ओडिशा सरकार की देरी पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने 19 अगस्त 2026 को राज्य सरकार को अंतिम मौका देते हुए कहा कि ओडिशा की Sentence Review Board दो सप्ताह के भीतर इस मामले में फैसला करे। अगर बोर्ड ने निर्णय नहीं लिया, तो सुप्रीम कोर्ट खुद मामले पर विचार कर सकता है। अदालत ने देरी पर जताई नाराजगी जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने ओडिशा सरकार से साफ कहा कि मामले में अब और देरी स्वीकार नहीं की जाएगी। सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य से कहा कि वह निर्णय ले, अन्यथा अदालत खुद आगे कार्रवाई करेगी। दारा सिंह किस मामले में उम्रकैद काट रहा है? दारा सिंह को 1999 में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो नाबालिग बेटों की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था। ट्रायल कोर्ट ने 2003 में उसे मौत की सजा सुनाई थी, जिसे बाद में ओडिशा हाईकोर्ट ने उम्रकैद में बदल दिया। सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा था। 24 साल से अधिक समय जेल में रहने का दिया हवाला दारा सिंह ने अपनी याचिका में कहा है कि वह 24 साल से अधिक समय जेल में रह चुका है और राज्य की मौजूदा नीतियों के तहत उसकी समयपूर्व रिहाई पर विचार किया जाना चाहिए। उसने अपने मामले की तुलना राजीव गांधी हत्या मामले के दोषियों को मिली रिहाई से भी की है। अभी रिहाई का आदेश नहीं हुआ महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने दारा सिंह को रिहा करने का आदेश नहीं दिया है। अदालत ने केवल सक्षम राज्य प्राधिकरण को उसकी रिहाई/सजा में छूट की याचिका पर तय समय में निर्णय लेने का निर्देश दिया है। अंतिम फैसला ओडिशा की संबंधित प्रक्रिया के तहत होना है।
पटना/सीवान: बिहार के सीवान में छात्र आंदोलन के दौरान हुई पुलिस फायरिंग का मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। राज्य सरकार ने अदालत में दाखिल हलफनामे में माना है कि प्रदर्शन के दौरान एक पुलिसकर्मी ने AK-47 से चार राउंड फायर किए थे। हालांकि सरकार का कहना है कि सभी गोलियां हवा में चलाई गई थीं और इस फायरिंग में किसी प्रदर्शनकारी के घायल होने की जानकारी नहीं है। सरकार ने यह भी बताया कि AK-47 से गोली चलाने वाले पुलिसकर्मी को निलंबित कर दिया गया है और उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी गई है। भीड़ में फंस गया था पुलिसकर्मी, तभी हुई फायरिंग राज्य सरकार के मुताबिक, 25 जुलाई को सीवान में छात्र आंदोलन के दौरान स्थिति बिगड़ गई थी। इसी दौरान एक पुलिसकर्मी प्रदर्शनकारियों की भीड़ के बीच फंस गया। सरकार का दावा है कि भीड़ से खुद को निकालने और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिसकर्मी ने AK-47 से चार राउंड हवा में फायर किए। सरकार के अनुसार, इन गोलियों से किसी प्रदर्शनकारी के घायल होने की पुष्टि नहीं हुई है। तीन प्रदर्शनकारियों के घायल होने पर सरकार ने क्या कहा? सीवान में प्रदर्शन के दौरान तीन लोगों के घायल होने की बात सामने आई थी। इस पर बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि इन लोगों को AK-47 से चली गोलियों से चोट नहीं लगी थी। सरकार के अनुसार, हाथी चौक के पास भीड़ को नियंत्रित करने के दौरान एक सहायक उपनिरीक्षक ने 9 एमएम पिस्टल से दो राउंड फायर किए थे। इसी दौरान तीन प्रदर्शनकारियों को मामूली चोटें आईं। इस तरह सरकार ने AK-47 से हुई फायरिंग और प्रदर्शनकारियों के घायल होने की दोनों घटनाओं को अलग-अलग बताया है। प्रदर्शन में AK-47 के इस्तेमाल पर उठे सवाल राज्य सरकार ने अपने जवाब में यह भी स्पष्ट किया कि AK-47 प्लाटून स्तर का हथियार है और सामान्य कानून-व्यवस्था की स्थिति, जैसे प्रदर्शन या आंदोलन को नियंत्रित करने के लिए इसका इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। सरकार के मुताबिक, इस संबंध में बिहार के डीजीपी की ओर से भी निर्देश जारी किए गए हैं। फायरिंग करने वाले पुलिसकर्मी को निलंबित करने के साथ उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी गई है। गोली किस हथियार से चली, जांच में जुटी एजेंसियां फायरिंग की घटना को लेकर जांच अभी जारी है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि गोली किस हथियार से चली, फायरिंग कितनी दूरी से हुई और गोली चलाने का कोण क्या था। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि घटनास्थल पर वास्तव में क्या हुआ था और फायरिंग की परिस्थितियां क्या थीं। कई जिलों में हिंसक हुआ था छात्र आंदोलन बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपने जवाब में बताया कि छात्र आंदोलन के दौरान पटना, जहानाबाद, छपरा, भागलपुर, सीतामढ़ी, औरंगाबाद, कटिहार, किशनगंज और सीवान समेत कई जिलों में प्रदर्शन हिंसक हुए थे। सरकार के मुताबिक, छपरा में शुरुआत में प्रदर्शन शांतिपूर्ण था, लेकिन बाद में भीड़ उग्र हो गई। इस दौरान पत्थरबाजी और तोड़फोड़ की घटनाएं हुईं। इसमें दो बीडीओ, तीन पुलिस इंस्पेक्टर, दो सब-इंस्पेक्टर और 11 सिपाहियों के घायल होने की जानकारी दी गई है। सरकार ने यह भी दावा किया कि एक बीडीओ की आंख को गंभीर नुकसान पहुंचा, जबकि दूसरे अधिकारी को भी चोट लगी। बिना आपराधिक रिकॉर्ड वाले छात्रों पर कार्रवाई नहीं सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने छात्रों पर कार्रवाई को लेकर भी अपना पक्ष रखा। सरकार के अनुसार, जिन प्रदर्शनकारी छात्रों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, उनके खिलाफ दंडात्मक पुलिस कार्रवाई नहीं की जा रही है। वहीं, आंदोलन के दौरान हिरासत में लिए गए 18 साल से कम उम्र के ऐसे बच्चों, जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था, उन्हें साधारण बॉन्ड भरने के बाद रिहा कर दिया गया। सीवान में AK-47 से चार राउंड फायरिंग की सरकार की स्वीकारोक्ति के बाद मामला और गंभीर हो गया है। फिलहाल सरकार का दावा है कि फायरिंग हवा में की गई थी और प्रदर्शनकारियों को AK-47 की गोली नहीं लगी। अंतिम तस्वीर जांच पूरी होने के बाद ही साफ होगी।
नई दिल्ली: तहलका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल से जुड़े 2013 के बलात्कार मामले में कानूनी लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा बेंच द्वारा तेजपाल को 10 साल की कठोर सजा सुनाए जाने के बाद गोवा सरकार ने सजा बढ़ाने की मांग करते हुए सर्वोच्च अदालत का रुख किया है। सरकार ने अपनी याचिका में मामले की गंभीरता का हवाला देते हुए तेजपाल को उम्रकैद की सजा देने की मांग की है। खास बात यह है कि गोवा सरकार ने हाई कोर्ट के उस निष्कर्ष को चुनौती नहीं दी है, जिसमें तेजपाल को दोषी ठहराया गया था। सरकार की अपील मुख्य रूप से सजा की अवधि से संबंधित है। सरकार ने कहा- समय बीतना सजा कम करने का आधार नहीं गोवा सरकार का तर्क है कि केवल इस वजह से आरोपी को कम सजा का लाभ नहीं दिया जा सकता कि घटना को कई वर्ष बीत चुके हैं। हाई कोर्ट ने 6 अगस्त 2026 को मामले में तेजपाल को दोषी ठहराते हुए 10 साल की कठोर कैद सुनाई थी। कोर्ट ने माना था कि मामले में निर्धारित न्यूनतम सजा लागू होती है। हालांकि, अभियोजन पक्ष ने अधिकतम सजा के रूप में उम्रकैद की मांग की थी। अब गोवा सरकार का कहना है कि अपराध की प्रकृति और गंभीरता को देखते हुए सजा बढ़ाई जानी चाहिए। हाई कोर्ट ने 2021 के बरी करने के फैसले को पलटा था यह मामला नवंबर 2013 का है। तब तरुण तेजपाल तहलका के संपादक थे। एक जूनियर महिला सहयोगी ने उन पर गोवा के एक होटल की लिफ्ट में यौन उत्पीड़न और बलात्कार का आरोप लगाया था। मामले की सुनवाई के बाद 2021 में गोवा की सेशन कोर्ट ने तेजपाल को बरी कर दिया था। इसके बाद गोवा सरकार ने इस फैसले को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद 6 अगस्त 2026 को बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा बेंच ने निचली अदालत के फैसले को पलट दिया और तेजपाल को बलात्कार, यौन उत्पीड़न तथा संबंधित अपराधों में दोषी ठहराया। हाई कोर्ट ने 10 साल की सजा सुनाई दोषसिद्धि के बाद हाई कोर्ट ने तेजपाल को 10 साल की कठोर कैद की सजा दी। अदालत ने घटना को पुराना होने और इस अवधि में आरोपी के किसी अन्य आपराधिक कृत्य की जानकारी सामने नहीं आने जैसे पहलुओं पर भी विचार किया। हालांकि, अभियोजन पक्ष का कहना था कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए अधिकतम सजा दी जानी चाहिए। हाई कोर्ट के फैसले के बाद अब यही मुद्दा सुप्रीम कोर्ट के सामने है। सुप्रीम कोर्ट में क्या चाहती है गोवा सरकार? गोवा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि तेजपाल की सजा को बढ़ाकर उम्रकैद किया जाए। यानी सरकार इस स्तर पर उनकी दोषसिद्धि को चुनौती नहीं दे रही है, बल्कि यह कह रही है कि हाई कोर्ट द्वारा तय की गई 10 साल की सजा अपराध की गंभीरता के अनुपात में पर्याप्त नहीं है। अब सुप्रीम कोर्ट में यह तय होना है कि क्या मौजूदा सजा में बढ़ोतरी की आवश्यकता है और यदि हां, तो सजा कितनी होनी चाहिए। मामले में आगे क्या होगा? गोवा सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई इस मामले की अगली महत्वपूर्ण कानूनी कड़ी होगी। अदालत सरकार की दलीलों, हाई कोर्ट के फैसले और मामले से जुड़े सभी कानूनी पहलुओं पर विचार करेगी।
कोलकाता, एजेंसियां। कोलकाता में I-PAC कार्यालय पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अहम संकेत दिए। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एवी अंजारिया की पीठ ने मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपने की संभावना जताई है। मामले की अगली सुनवाई 2 सितंबर को होगी। ममता बनर्जी पर ED के काम में बाधा डालने का आरोप ED का आरोप है कि I-PAC कार्यालय में छापेमारी के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने जांच में बाधा डाली थी। एजेंसी का यह भी दावा है कि कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज उनके साथ ले जाए गए थे। इसी मामले में ED ने सुप्रीम कोर्ट का रुख कर जांच की मांग की है। राज्य पुलिस से जांच पर उठे सवाल सुनवाई के दौरान ममता बनर्जी की ओर से पेश वकील मेनका गुरुस्वामी ने दलील दी कि राज्य में सरकार बदल चुकी है, इसलिए अब राज्य पुलिस मामले की जांच कर सकती है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच CBI को सौंपने की संभावना पर संकेत दिया। CBI जांच को लेकर कोर्ट ने क्या कहा? सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिकाकर्ता की CBI जांच की मांग को स्वीकार करने की दिशा में संकेत दिए। हालांकि, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मामले के व्यापक कानूनी पहलुओं पर भी फैसला देने का आग्रह किया। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एवी राजू ने यह सवाल भी उठाया कि क्या CBI किसी मौजूदा मुख्यमंत्री द्वारा कथित अपराध की जांच कर सकती है। वहीं, ममता बनर्जी की ओर से कहा गया कि अब तक की सुनवाई मुख्य रूप से ED की याचिका की स्वीकार्यता तक सीमित रही है और मामले के गुण-दोष पर अभी बहस नहीं हुई है। 2 सितंबर को होगी अगली सुनवाई सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मामले की अंतिम दिशा पर फैसला नहीं सुनाया है। अब 2 सितंबर 2026 को होने वाली अगली सुनवाई में मामले की जांच और उससे जुड़े कानूनी सवालों पर आगे सुनवाई होगी।
इस्लामाबाद, एजेंसियां। पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को चिकित्सा जांच और इलाज के लिए इस्लामाबाद के शिफा इंटरनेशनल अस्पताल में स्थानांतरित करने का आदेश दिया है। अदालत ने उनके स्वास्थ्य को लेकर उठ रही चिंताओं के बीच विशेषज्ञ डॉक्टरों और इमरान खान के निजी चिकित्सक को शामिल कर मेडिकल बोर्ड बनाने का भी निर्देश दिया है। 48 घंटे के भीतर अस्पताल ले जाने का आदेश तीन सदस्यीय पीठ ने अधिकारियों को इमरान खान को अदियाला जेल से शिफा इंटरनेशनल अस्पताल ले जाने का निर्देश दिया है। वहां उनकी व्यापक चिकित्सा जांच की जाएगी और विशेषज्ञ डॉक्टर उनकी स्थिति का आकलन करेंगे। रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने उन्हें अस्पताल में इलाज के लिए 16 सितंबर तक रखने का निर्देश दिया है। निजी डॉक्टर और विशेषज्ञों वाला मेडिकल बोर्ड सुप्रीम कोर्ट ने इमरान खान की जांच के लिए एक मेडिकल बोर्ड गठित करने को कहा है। इसमें विशेषज्ञ डॉक्टरों के साथ उनके निजी चिकित्सक डॉ. फैसल सुल्तान को भी शामिल किया जाएगा। इमरान खान के परिवार और कानूनी टीम की ओर से लंबे समय से बेहतर चिकित्सा सुविधा और निजी डॉक्टरों से जांच की मांग की जा रही थी। परिवार से साप्ताहिक मुलाकात और फोन की अनुमति अदालत ने इमरान खान के परिवार को भी राहत दी है। आदेश के मुताबिक, उन्हें परिवार के सदस्यों से साप्ताहिक मुलाकात की अनुमति दी जाएगी। साथ ही उनके बेटों से फोन पर बातचीत की व्यवस्था करने का निर्देश भी दिया गया है। लंबे समय से सुरक्षा कारणों का हवाला देकर परिवार की मुलाकातों पर प्रतिबंध लगा हुआ था। सरकार ने आदेश पर पुनर्विचार के संकेत दिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पाकिस्तान सरकार के रुख में असमंजस दिखाई दे रहा है। सरकार के एक मंत्री ने आदेश का पालन करने की बात कही, जबकि कानून मंत्री ने सरकारी अस्पताल में इलाज कराने की प्राथमिकता का संकेत देते हुए आदेश में बदलाव की मांग की संभावना जताई है। ऐसे में इमरान खान को अस्पताल स्थानांतरित करने का मामला पाकिस्तान की राजनीति में भी नया मुद्दा बन गया है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। बिहार में छात्र प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों से इनकार किया है। सरकार ने कहा कि सीवान में एक पुलिसकर्मी द्वारा AK-47 से की गई फायरिंग में किसी प्रदर्शनकारी को गोली नहीं लगी थी। संबंधित कांस्टेबल को निलंबित कर उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की गई है। AK-47 से फायरिंग पर सरकार का जवाब बिहार सरकार ने अपने हलफनामे में बताया कि सीवान में प्रदर्शन के दौरान एक कांस्टेबल भीड़ के बीच फंस गया था। स्थिति से निकलने के लिए उसने AK-47 से हवा में चार राउंड फायरिंग की। सरकार का दावा है कि इस फायरिंग में किसी प्रदर्शनकारी को चोट नहीं लगी। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि AK-47 को सामान्य कानून-व्यवस्था की स्थिति में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। घटना के बाद संबंधित जवान को निलंबित किया गया और विभागीय जांच शुरू की गई है। 9 एमएम पिस्टल से फायरिंग में तीन घायल हलफनामे के मुताबिक, सीवान के हाथी चौक के पास एक ASI ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए अपनी 9 एमएम पिस्टल से दो राउंड फायर किए। इस घटना में तीन प्रदर्शनकारियों को मामूली चोटें आईं। सरकार ने कहा कि ये तीनों प्रदर्शनकारी AK-47 से हुई फायरिंग में घायल नहीं हुए थे। मामले में बैलिस्टिक जांच जारी है, जिससे फायरिंग में इस्तेमाल हथियार और अन्य परिस्थितियों की पुष्टि की जा रही है। 69 FIR और करीब 500 गिरफ्तारियां बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 22 से 25 जुलाई 2026 के बीच राज्य में 69 FIR दर्ज की गईं और करीब 500 लोगों को गिरफ्तार किया गया। वहीं, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद बिना आपराधिक इतिहास वाले 222 छात्र प्रदर्शनकारियों को जमानत पर रिहा किया गया। इसके अलावा 75 किशोरों को किशोर न्याय बोर्ड के माध्यम से छोड़ा गया। सरकार ने कहा कि बिना आपराधिक रिकॉर्ड वाले नाबालिग प्रदर्शनकारियों के खिलाफ फिलहाल कठोर कार्रवाई नहीं की जा रही है। 157 पुलिसकर्मी और 7 सरकारी कर्मचारी घायल राज्य सरकार के अनुसार, बिहार के अलग-अलग हिस्सों में हुए प्रदर्शनों के दौरान 157 पुलिसकर्मी और 7 सरकारी कर्मचारी घायल हुए। कई स्थानों पर प्रदर्शन हिंसक होने के बाद पुलिस ने वाटर कैनन और आंसू गैस का इस्तेमाल किया। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया कि प्रदर्शन से जुड़े वीडियो फुटेज और अन्य रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही प्रदर्शनकारियों, खासकर छात्रों की निजी जानकारी और डिजिटल डेटा को सार्वजनिक नहीं करने के निर्देश दिए गए हैं।
नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने चुनावों में काले धन के इस्तेमाल को लोकतंत्र, कानून के शासन और निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया के लिए गंभीर खतरा बताया है। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने चुनाव के दौरान जब्त होने वाली नकदी और संपत्ति से जुड़े मामलों में जांच और सुनवाई को समयबद्ध तरीके से पूरा करने के लिए कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। 24 घंटे में देनी होगी जब्ती की जानकारी सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि चुनाव के दौरान नकदी या अन्य संपत्ति जब्त करने वाली एजेंसी को 24 घंटे के भीतर इसकी जानकारी संबंधित जिला मजिस्ट्रेट, अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट या सक्षम अदालत को देनी होगी। साथ ही, लिखित रूप से यह भी बताना होगा कि जब्त रकम या संपत्ति का संदिग्ध चुनावी अपराध से प्रथम दृष्टया क्या संबंध है। अदालत ने कहा कि मतदाता की पसंद किसी धन या अन्य प्रलोभन से प्रभावित नहीं होनी चाहिए। यदि पैसे या किसी लाभ के जरिए मतदाता के फैसले को प्रभावित किया जाता है तो चुनाव में उसकी स्वतंत्र पसंद प्रभावित होती है और इससे लोकतंत्र की मूल भावना कमजोर होती है। एक साल में जांच पूरी करने पर जोर शीर्ष अदालत ने जांच एजेंसियों को निर्देश दिया कि चुनावी काले धन से जुड़े मामलों में FIR दर्ज होने के एक साल के भीतर जांच पूरी करने का हर संभव प्रयास किया जाए। यदि किसी मामले में देरी होती है तो उसके कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे और इसकी जानकारी चुनाव आयोग को देनी होगी। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि संबंधित पुलिस अधिकारियों की मंजूरी के बाद नोडल अधिकारी के माध्यम से चुनाव आयोग को मामलों की तिमाही स्थिति रिपोर्ट भेजी जाए। 10 लाख से अधिक नकदी मिलने पर आयकर विभाग को सूचना सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव के दौरान निगरानी व्यवस्था को भी मजबूत करने का निर्देश दिया है। स्टैटिक सर्विलांस टीम (SST) को यदि 10 लाख रुपये से अधिक नकदी मिलती है तो इसकी जानकारी आयकर अधिकारियों को देनी होगी। अदालत ने चुनाव से जुड़े आपराधिक मामलों की जल्द सुनवाई के लिए हाईकोर्ट को जरूरत के अनुसार विशेष या नामित अदालतें तय करने को भी कहा है। अदालत ने 2024 के लोकसभा चुनाव और 2019 से 2025 के बीच हुए विधानसभा चुनावों से जुड़े बड़ी संख्या में लंबित मामलों का भी संज्ञान लिया। सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अदालतों को इन मामलों का जल्द से जल्द तार्किक निष्कर्ष निकालने के लिए हरसंभव प्रयास करने का निर्देश दिया है। चुनाव आयोग और संबंधित सरकारों को 18 नवंबर 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने को कहा गया है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। राजनीति के अपराधीकरण से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश की गई ताजा रिपोर्ट में सामने आया है कि लोकसभा के 543 सदस्यों में से 251 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। वहीं, राज्यसभा के 233 सदस्यों में से 75 के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज बताए गए हैं। इस तरह मौजूदा लोकसभा के करीब 46 प्रतिशत सांसद आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं। 170 लोकसभा सांसदों पर गंभीर आपराधिक मामले सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता और न्यायमित्र विजय हंसारिया की ओर से दाखिल हलफनामे में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के आंकड़ों का हवाला दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, लोकसभा के 251 सांसदों में से 170 सांसदों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इन अपराधों में दोष सिद्ध होने पर पांच साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है। राज्यसभा के 75 सांसदों में से 40 के खिलाफ भी गंभीर आपराधिक मामले बताए गए हैं। हालांकि, किसी व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज होना अपने आप में उसे दोषी साबित नहीं करता है और अंतिम निर्णय अदालत की प्रक्रिया के बाद ही होता है। सांसदों और विधायकों के 4,192 मामले लंबित रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा और पूर्व सांसदों तथा विधायकों के खिलाफ देशभर में कुल 4,192 आपराधिक मामले लंबित हैं। न्यायमित्र ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की निगरानी के बावजूद वर्ष 2018 से सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित मामलों की संख्या में अपेक्षित कमी नहीं आई है। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में सांसदों और विधायकों से जुड़े 1,243 मामलों का निपटारा हुआ, जबकि इसी अवधि में 1,050 नए मामले दर्ज हुए। इससे लंबित मामलों के तेजी से निपटारे की चुनौती बनी हुई है। केरल और झारखंड समेत कई राज्यों में स्थिति गंभीर राज्यवार आंकड़ों में केरल सबसे ऊपर नजर आता है। रिपोर्ट के अनुसार, वहां 20 में से 19 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। तेलंगाना में 17 में से 14, ओडिशा में 21 में से 16 और झारखंड में 14 में से 10 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले बताए गए हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 28 राज्यों में से 14 मुख्यमंत्रियों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं। इनमें तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी के खिलाफ सबसे अधिक 89 मामले बताए गए हैं। इसके बाद पश्चिम बंगाल के सुवेंदु अधिकारी के खिलाफ 29 और कर्नाटक के डी.के. शिवकुमार के खिलाफ 19 मामले दर्ज बताए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट में यह रिपोर्ट सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों के जल्द निपटारे से जुड़ी जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान पेश की गई है। रिपोर्ट के आंकड़ों ने देश में राजनीति के अपराधीकरण और जनप्रतिनिधियों के खिलाफ लंबित मामलों के शीघ्र निपटारे को लेकर एक बार फिर बहस तेज कर दी है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी से जुड़ी कथित आय से अधिक संपत्ति के मामले में CBI और ED को इलाहाबाद हाई कोर्ट में जांच रिपोर्ट दाखिल करने से रोक दिया है। साथ ही शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में चल रही इस मामले की कार्यवाही को अगली सुनवाई तक स्थगित करने का निर्देश दिया है। यह आदेश 17 अगस्त को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने राहुल गांधी की याचिका पर सुनाया। हाई कोर्ट के आदेश को राहुल गांधी ने दी थी चुनौती यह मामला कर्नाटक के भाजपा कार्यकर्ता एस. विग्नेश शिशिर की याचिका से जुड़ा है। याचिका में राहुल गांधी पर ज्ञात आय के स्रोतों से अधिक संपत्ति रखने के आरोप लगाए गए थे और CBI तथा ED से जांच की मांग की गई थी। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पहले केंद्रीय जांच एजेंसियों को इन आरोपों की जांच और प्रगति से संबंधित जानकारी देने के निर्देश दिए थे। राहुल गांधी ने हाई कोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। CBI-ED को रिपोर्ट दाखिल करने से रोका सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान CBI और ED को हाई कोर्ट के निर्देश के तहत कोई रिपोर्ट दाखिल नहीं करने को कहा। अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट को भी मामले में आगे की कार्यवाही फिलहाल टालने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ में CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे। अदालत ने मामले में याचिकाकर्ता, CBI और ED को नोटिस भी जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसियों से पूछा सवाल सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसियों की भूमिका पर भी सवाल उठाया। अदालत ने पूछा कि यदि आरोप इतने गंभीर हैं तो संबंधित एजेंसी ने खुद से कार्रवाई क्यों नहीं शुरू की और क्या उसे जांच के लिए अदालत के निर्देश की जरूरत थी। मामले में अगली सुनवाई तक इलाहाबाद हाई कोर्ट की कार्यवाही स्थगित रहेगी। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से राहुल गांधी को फिलहाल अंतरिम राहत मिली है, हालांकि यह आदेश आरोपों को सही या गलत ठहराने वाला अंतिम फैसला नहीं है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध बाल यौन शोषण सामग्री (CSEAM) को लेकर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है और मामले में ऑनलाइन मध्यस्थों को भी पक्षकार बनाने का निर्देश दिया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि कुछ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ऐसी सामग्री की मौजूदगी के बावजूद POCSO कानून के तहत अनिवार्य रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा रहे हैं। POCSO के तहत रिपोर्टिंग को लेकर सवाल मामला Just Rights for Children Alliance (JRCA) की याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री उपलब्ध होने के बावजूद संबंधित मामलों की रिपोर्टिंग कानून के मुताबिक नहीं की जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और कानून एवं न्याय मंत्रालय से जवाब मांगा है। 2024 के फैसले का भी दिया गया हवाला मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2024 के महत्वपूर्ण फैसले का हवाला दिया गया है। उस फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया था कि POCSO की धारा 19 के तहत अपराध की जानकारी या आशंका होने पर रिपोर्टिंग का दायित्व है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि केवल किसी विदेशी संस्था को रिपोर्ट करना POCSO के तहत निर्धारित भारतीय अधिकारियों को रिपोर्ट करने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी पर फोकस याचिका में सोशल मीडिया कंपनियों की कंटेंट मॉडरेशन और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को रिपोर्टिंग व्यवस्था पर सवाल उठाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट अब यह देख रहा है कि ऑनलाइन मध्यस्थ POCSO और अन्य संबंधित कानूनों के तहत अपनी जिम्मेदारियों का पालन किस तरह कर रहे हैं। बच्चों की सुरक्षा को लेकर सख्त रुख सुप्रीम कोर्ट पहले ही बाल यौन शोषण सामग्री को लेकर कड़ा रुख अपना चुका है और ऐसे कंटेंट के भंडारण, प्रसारण तथा प्रसार से संबंधित POCSO प्रावधानों की व्याख्या कर चुका है। अदालत ने ऐसे मामलों में रिपोर्टिंग और बच्चों की सुरक्षा को महत्वपूर्ण कानूनी दायित्व माना है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने अडानी पावर को बड़ी राहत देते हुए कर्नाटक की बिजली वितरण कंपनियों की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें कंपनी द्वारा दाखिल करीब ₹1,005 करोड़ के बिजली बिलों की वसूली पर रोक लगाने की मांग की गई थी। अदालत के इस फैसले से कर्नाटक की डिस्कॉम कंपनियों को बड़ा झटका लगा है। ₹1,005 करोड़ के बिल को लेकर था विवाद कर्नाटक की बिजली वितरण कंपनियों ने सुप्रीम कोर्ट में दावा किया था कि अडानी पावर ने सरकारी पोर्टल पर करीब ₹1,005 करोड़ के गलत बिल अपलोड किए हैं। डिस्कॉम कंपनियां इन बिलों के भुगतान पर रोक चाहती थीं। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका को स्वीकार नहीं किया। अडानी पावर को क्या फायदा होगा? फैसले के बाद अडानी पावर के लिए इन बिजली खरीद लेनदेन से जुड़े दावों को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हुआ है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि कंपनी को तुरंत ₹1,005 करोड़ की पूरी रकम मिल गई है; बिलों की वैधता और भुगतान से जुड़े आगे के कानूनी/नियामकीय पहलू अलग-अलग स्तर पर रह सकते हैं। शेयर बाजार की नजर भी फैसले पर अडानी पावर के लिए यह फैसला ऐसे समय आया है जब अडानी समूह की कंपनियां निवेशकों के फोकस में हैं। बाजार में इस तरह के कानूनी फैसलों को कंपनी की देनदारियों, संभावित प्राप्तियों और भविष्य के नकदी प्रवाह के संदर्भ में देखा जाता है।
सीवान हिंसा मामले में बिहार पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कई अहम जानकारियां दी हैं। पुलिस के मुताबिक 25 जुलाई को प्रदर्शन के दौरान पथराव में सीवान एसपी समेत 20 पुलिसकर्मी घायल हुए थे। हालात बिगड़ने पर भीड़ में फंसे DIU के एक कॉन्स्टेबल ने अपनी AK-47 से हवा में चार राउंड फायर किए। पुलिस का दावा है कि इस फायरिंग से कोई घायल नहीं हुआ। 25 जुलाई को प्रदर्शन के दौरान बिगड़े थे हालात पुलिस के अनुसार, 25 जुलाई को AISA और RYA से जुड़े प्रदर्शनकारी सीवान के गांधी मैदान में जुटे थे। इसके बाद प्रदर्शनकारी JP चौक की ओर बढ़े। दोपहर करीब 12:30 बजे पुलिस का दावा है कि प्रदर्शनकारियों की ओर से पथराव शुरू हुआ। इसके बाद मैरवा रोड और गोपालगंज रोड की ओर से आए कुछ अन्य लोगों के भी पत्थरबाजी में शामिल होने की बात कही गई। स्थिति बिगड़ने पर पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए वाटर कैनन और आंसू गैस का इस्तेमाल किया। अतिरिक्त पुलिस बल भी मौके पर बुलाया गया। 20 पुलिसकर्मी घायल, पुलिस वाहनों को भी नुकसान बिहार पुलिस के हलफनामे के मुताबिक, पथराव में सीवान के एसपी समेत कुल 20 पुलिसकर्मी घायल हुए। इनमें दो एसडीपीओ, दो इंस्पेक्टर, दो सब-इंस्पेक्टर और 13 कॉन्स्टेबल शामिल बताए गए हैं। हिंसा के दौरान पुलिस की दो गाड़ियों और कई ट्रैफिक ट्रॉलियों को भी नुकसान पहुंचने की जानकारी दी गई है। भीड़ में फंसे जवान ने AK-47 से की फायरिंग पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि अतिरिक्त बल बुलाए जाने के दौरान DIU में तैनात एक कॉन्स्टेबल JP चौक के पास भीड़ के बीच फंस गया। पुलिस के अनुसार, इसी दौरान उसने अपनी AK-47 से हवा में चार राउंड फायर किए। पुलिस का दावा है कि इन चार गोलियों से किसी व्यक्ति को चोट नहीं लगी। वहीं, हाथी चौक पर एक अन्य ASI ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए अपनी 9mm पिस्तौल से दो राउंड फायर किए। तीन प्रदर्शनकारियों को लगी थी गोली पुलिस के मुताबिक हिंसा के दौरान तीन प्रदर्शनकारियों को गोली लगने से मामूली चोटें आई थीं। उन्हें पहले सीवान सदर अस्पताल ले जाया गया और बाद में बेहतर इलाज के लिए पटना के मेदांता अस्पताल भेजा गया। पुलिस का कहना है कि तीनों को उपचार के बाद अस्पताल से छुट्टी मिल गई। हालांकि, पुलिस ने स्पष्ट किया है कि इन तीनों की चोटें उस AK-47 फायरिंग से नहीं हुईं, जो JP चौक के पास भीड़ में फंसे कॉन्स्टेबल ने की थी। 82 लोगों पर केस, 17 गिरफ्तार बिहार पुलिस के अनुसार, हिंसा के सिलसिले में छह FIR दर्ज की गई हैं और कुल 82 लोगों को आरोपी बनाया गया है। इनमें से 17 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। मामले की जांच अभी जारी है। AK-47 फायरिंग की बैलिस्टिक जांच फायरिंग की परिस्थितियों को स्पष्ट करने के लिए बैलिस्टिक जांच कराई जा रही है। इसमें इस्तेमाल हथियार, गोली चलने की दूरी, फायरिंग का कोण और अन्य तकनीकी पहलुओं की जांच शामिल है। AK-47 से फायरिंग करने वाले कॉन्स्टेबल को कथित गलत आचरण के आरोप में निलंबित कर दिया गया है और उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई भी शुरू की गई है। पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि AK-47 प्लाटून स्तर का हथियार है और सामान्य कानून-व्यवस्था की स्थिति में इसके इस्तेमाल से बचना चाहिए। DGP ने जारी किए निर्देश बिहार पुलिस के मुताबिक, पुलिस महानिदेशक ने 1 अगस्त को कानून-व्यवस्था की स्थिति में AK-47 के इस्तेमाल को लेकर विस्तृत निर्देश जारी किए हैं। पुलिस ने कहा कि ऐसे हथियारों के इस्तेमाल को लेकर पहले भी दिशानिर्देश मौजूद रहे हैं।
नई दिल्ली, एजेंसियां। कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी जल बंटवारे का विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। सोमवार को हुई सुनवाई में अदालत ने कर्नाटक को कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) के निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने को कहा और मामले की अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद तय की। तमिलनाडु ने लगाया पानी नहीं मिलने का आरोप तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि CWMA के निर्देशों के बावजूद उसे अपेक्षित मात्रा में कावेरी का पानी नहीं मिल रहा है। राज्य का दावा है कि कम बारिश वाले इस साल में किसानों के लिए सिंचाई का पानी उपलब्ध कराना मुश्किल हो रहा है और कर्नाटक पर पानी छोड़ने का दबाव बनाया जाना चाहिए। कर्नाटक ने बताया गंभीर जल संकट वहीं कर्नाटक ने तमिलनाडु के आरोपों से असहमति जताते हुए कावेरी बेसिन में गंभीर जल संकट का हवाला दिया। कर्नाटक की ओर से अदालत को बताया गया कि राज्य ने CWMA के निर्देशों का पालन किया है और पानी का प्रवाह 12,000 क्यूसेक से अधिक तक पहुंच चुका है। अगली सुनवाई में पेश होगी ताजा रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण से पानी छोड़े जाने की ताजा स्थिति और आंकड़ों वाली स्टेटस रिपोर्ट मांगी है। अदालत ने कर्नाटक को CWMA के निर्देशों का पालन जारी रखने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 24 अगस्त को होने की संभावना है। कावेरी जल बंटवारे का यह विवाद दोनों राज्यों के किसानों और जल जरूरतों से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर दोनों राज्यों की नजरें टिकी हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। उत्तर प्रदेश में सड़क कनेक्टिविटी को मजबूत करने वाली आगरा-अलीगढ़ ग्रीनफील्ड हाईवे परियोजना को लेकर बड़ी खबर सामने आई है। हाईवे के दूसरे पैकेज के निर्माण के लिए सुप्रीम कोर्ट से अनुमति मिल गई है। अनुमति मिलने के बाद करीब 37 किलोमीटर लंबे हिस्से पर सितंबर से निर्माण कार्य शुरू होने की उम्मीद है। 65 किमी लंबा है आगरा-अलीगढ़ ग्रीनफील्ड हाईवे आगरा-अलीगढ़ ग्रीनफील्ड हाईवे की कुल लंबाई करीब 65 किलोमीटर है और परियोजना पर लगभग 820 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। एनएचएआई ने इसे दो पैकेज में मंजूरी दी है। पहले पैकेज के तहत करीब 28 किलोमीटर हिस्से पर पहले से काम चल रहा है। वहीं दूसरा पैकेज करीब 37 किलोमीटर लंबा है, जो ताज ट्रैपेजियम जोन (TTZ) में आता है। इसी वजह से इस हिस्से के निर्माण के लिए सुप्रीम कोर्ट की अनुमति जरूरी थी। सितंबर से शुरू होगा दूसरे पैकेज का काम सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी मिलने के बाद दूसरे पैकेज पर निर्माण कार्य आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है। उम्मीद है कि सितंबर 2026 से 37 किलोमीटर हिस्से पर काम शुरू हो जाएगा। इस हाईवे के बनने से आगरा और अलीगढ़ के बीच आवागमन आसान होगा। साथ ही स्थानीय लोगों को आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेसवे, यमुना एक्सप्रेसवे और पूर्वांचल एक्सप्रेसवे तक पहुंचने में भी सुविधा मिलेगी। अलीगढ़-चंदौसी-मुरादाबाद हाईवे भी होगा फोरलेन इसके साथ ही अलीगढ़-चंदौसी-मुरादाबाद हाईवे को भी फोरलेन करने की तैयारी चल रही है। फिलहाल यह सड़क दो लेन की है। करीब 107 किलोमीटर लंबी परियोजना पर लगभग 4,000 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। इस परियोजना के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार की जा रही है। फोरलेन बनने के बाद अलीगढ़ से चंदौसी और मुरादाबाद के बीच यातायात व्यवस्था बेहतर होने की उम्मीद है। मुरादाबाद-हल्द्वानी ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे पर भी अध्ययन सड़क कनेक्टिविटी बढ़ाने की दिशा में मुरादाबाद-हल्द्वानी ग्रीनफील्ड फोरलेन एक्सप्रेसवे पर भी काम आगे बढ़ रहा है। सूत्रों के मुताबिक, इस प्रस्तावित परियोजना की व्यवहार्यता (फिजिबिलिटी) का अध्ययन कराया जा रहा है। इन परियोजनाओं के पूरा होने से उत्तर प्रदेश के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों के बीच कनेक्टिविटी मजबूत होने के साथ-साथ क्षेत्रीय व्यापार और आवागमन को भी गति मिलने की उम्मीद है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने आय से अधिक संपत्ति के आरोपों से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। उन्होंने हाई कोर्ट की कार्यवाही पर सवाल उठाते हुए मामले को इलाहाबाद हाई कोर्ट से दिल्ली हाई कोर्ट में स्थानांतरित करने की मांग भी की है। सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर 17 अगस्त 2026 को सुनवाई कर सकता है। CBI और ED की जांच से जुड़ा है मामला यह मामला कर्नाटक के भाजपा कार्यकर्ता एस. विग्नेश शिशिर की याचिका से जुड़ा है। याचिका में राहुल गांधी पर उनकी ज्ञात आय के स्रोतों से अधिक संपत्ति रखने के आरोप लगाए गए थे। मई 2026 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने CBI और ED को शिकायत में लगाए गए आरोपों की जांच/सत्यापन करने और जांच की प्रगति से अदालत को अवगत कराने को कहा था। हाई कोर्ट ने CBI की रिपोर्ट पर जताई थी असंतुष्टि 20 जुलाई को हुई सुनवाई में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने CBI की ओर से दाखिल रिपोर्ट को संतोषजनक नहीं माना था। अदालत ने CBI के वरिष्ठ अधिकारी को नई रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया था, जिसमें जांच में हुई प्रगति की विस्तृत जानकारी देने को कहा गया। ED को भी जांच के दौरान कोई अवैध गतिविधि या संबंधित सामग्री मिलने पर कानून के अनुसार कार्रवाई करने की स्वतंत्रता दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट में 17 अगस्त को सुनवाई राहुल गांधी की याचिकाएं 7 अगस्त 2026 को दाखिल की गई थीं। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और वी. मोहना शामिल हैं, 17 अगस्त को मामले की सुनवाई करेगी। राहुल गांधी ने हाई कोर्ट की कार्यवाही को दूसरी अदालत में स्थानांतरित करने की अलग याचिका भी दायर की है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि वह एसिड अटैक सर्वाइवर्स के लिए रेलवे यात्रा में किराया रियायत देने की नीति बनाने पर सैद्धांतिक रूप से सहमत है। यह सुविधा खास तौर पर उन पीड़ितों को इलाज के लिए दूसरे शहरों में स्थित बेहतर अस्पतालों तक पहुंचने में मदद करेगी। मरीज श्रेणी के तहत देने की तैयारी रेलवे की ओर से केंद्र ने बताया कि सरकार फिलहाल इस सुविधा को अलग से दिव्यांग श्रेणी में शामिल करने के बजाय मौजूदा ‘पेशेंट कैटेगरी’ के तहत देने पर विचार कर रही है। केंद्र ने दिव्यांग श्रेणी में अलग लाभ देने को लेकर कुछ व्यावहारिक चिंताएं भी सामने रखीं। सुप्रीम कोर्ट ने उदारता से विचार करने को कहा मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि एसिड अटैक सर्वाइवर्स को नियमित चिकित्सा उपचार और पुनर्वास की जरूरत होती है। अदालत ने केंद्र से इस मामले में उदार दृष्टिकोण अपनाने को कहा। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि कई पीड़ितों को अलग-अलग राज्यों में कई बार सर्जरी और उपचार के लिए यात्रा करनी पड़ती है। इसलिए उन्हें ऐसी व्यवस्था चाहिए जिससे इलाज के लिए लंबी दूरी की यात्रा का आर्थिक बोझ कम हो सके। छह सप्ताह में ड्राफ्ट नीति पेश करने का निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को प्रस्तावित नीति का ड्राफ्ट छह सप्ताह के भीतर अदालत के सामने रखने का निर्देश दिया है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि रियायत को इलाज की अवधि से जोड़कर समयबद्ध तरीके से लागू करने की व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है। यह मामला Atijeevan Society की याचिका से जुड़ा है, जिसमें एसिड अटैक सर्वाइवर्स के लिए रेलवे किराया रियायत, आरक्षण और आपातकालीन यात्रा जैसी सुविधाओं की मांग की गई है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर फ्रंट-ऑफ-पैक न्यूट्रिशन वार्निंग लेबल लागू करने में देरी को लेकर भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) और केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। कोर्ट ने FSSAI को दो सप्ताह के भीतर यह बताने को कहा है कि इस दिशा में अब तक क्या कदम उठाए गए हैं और आगे क्या कार्रवाई की जाएगी। चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की जानकारी प्रमुखता से देने की मांग मामला उन पैकेज्ड खाद्य पदार्थों से जुड़ा है जिनमें चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की मात्रा अधिक होती है। याचिकाकर्ताओं की मांग है कि ऐसे उत्पादों के पैकेट के सामने की तरफ स्पष्ट चेतावनी दी जाए, ताकि ग्राहक खरीदारी से पहले ही उसके पोषण संबंधी जोखिम को आसानी से समझ सकें। सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI की देरी पर जताई नाराजगी जस्टिस जेबी पार्डीवाला और के. विनोद चंद्रन की पीठ ने FSSAI की ओर से अब तक हुई प्रगति पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि मामला सीधे नागरिकों के स्वास्थ्य, खासकर बच्चों के स्वास्थ्य, से जुड़ा है। कोर्ट ने यह भी पूछा कि पहले दिए गए निर्देशों पर अब तक ठोस प्रगति क्यों नहीं हुई। FSSAI ने चेतावनी चिन्हों के बजाय दूसरा मॉडल सुझाया FSSAI ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष हालिया प्रस्ताव में पैकेट पर प्रति 100 ग्राम/100 मिलीलीटर पोषक तत्वों की मात्रा, सर्विंग साइज और अनुशंसित दैनिक सीमा जैसी जानकारी देने का सुझाव दिया है। हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इससे उपभोक्ताओं को खुद गणना करनी पड़ेगी, जबकि फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी का उद्देश्य जानकारी को एक नजर में समझने योग्य बनाना है। दो सप्ताह बाद फिर होगी मामले पर सुनवाई सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI को दो सप्ताह का समय देते हुए इस मुद्दे पर आगे की स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। अदालत ने संकेत दिया है कि यदि संतोषजनक कदम नहीं उठाए गए तो वह मामले में आगे आवश्यक निर्देश जारी कर सकती है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा के नए पुलिस महानिदेशक (DGP) के चयन की प्रक्रिया पर फिलहाल रोक लगा दी है। अदालत ने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) को नए DGP के लिए तीन अधिकारियों के पैनल को अंतिम रूप देने वाली बैठक को 18 अगस्त तक स्थगित करने का निर्देश दिया है। चयन प्रक्रिया को लेकर उठे सवाल यह मामला ओडिशा के नए DGP की नियुक्ति प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पी. चिदंबरम ने दलील दी कि चयन प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों के अनुरूप नहीं है। उन्होंने एक अधिकारी को हाल में पदोन्नति दिए जाने पर भी सवाल उठाया। हालांकि, ओडिशा के महाधिवक्ता ने नियमों के उल्लंघन के आरोपों से इनकार किया। एमिकस क्यूरी ने भी प्रक्रिया पर जताई आपत्ति सुप्रीम कोर्ट ने मामले में एमिकस क्यूरी राजू रामचंद्रन की राय भी ली। उन्होंने याचिकाकर्ता की दलीलों का समर्थन करते हुए कहा कि DGP चयन प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों का पालन नहीं किया गया है। इसके बाद अदालत ने UPSC को चयन प्रक्रिया आगे बढ़ाने से रोकने का निर्देश दिया। 18 अगस्त को होगी अगली सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 18 अगस्त 2026 को निर्धारित की है। मौजूदा ओडिशा DGP वाई.बी. खुरानिया 16 अगस्त को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। ऐसे में नए DGP की नियुक्ति तक राज्य में कार्यवाहक DGP की व्यवस्था किए जाने की संभावना है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने नए DGP की नियुक्ति रद्द नहीं की है, बल्कि UPSC को चयन पैनल को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया 18 अगस्त तक रोकने को कहा है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।