Air India Flight AI171 Crash को लेकर एक नया और भावुक दावा सामने आया है। हादसे में अपने परिवार के तीन सदस्यों को खोने वाले गुजरात के खेड़ा निवासी Roman Vohra ने दावा किया है कि उन्होंने मोर्चरी में पायलट Captain Sumeet Sabharwal का शव “बैठी हुई अवस्था” में देखा था और उनके हाथ अब भी विमान के कंट्रोल पर थे। हादसे में गई थी 260 लोगों की जान Air India की फ्लाइट AI-171 12 जून को Sardar Vallabhbhai Patel International Airport से उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद मेघानीनगर इलाके में दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी। विमान लंदन जा रहा था। इस भीषण हादसे में विमान में सवार 241 लोगों और जमीन पर मौजूद 19 लोगों की मौत हो गई थी। केवल एक यात्री जीवित बचा था। विमान का संचालन कैप्टन सुमीत सभरवाल और सह-पायलट Clive Kunder कर रहे थे। “मोर्चरी में देखा पायलट का शव” रोमन वोहरा ने बताया कि वह 13 जून को अपने भाई, भतीजी और बुआ के शव की पहचान के लिए अहमदाबाद सिविल अस्पताल की मोर्चरी पहुंचे थे। उन्होंने कहा कि मेडिकल क्षेत्र से जुड़े होने के कारण उन्हें अंदर जाने की अनुमति मिली थी। उनके अनुसार, कैप्टन सुमीत सभरवाल का शव बाकी शवों से अलग रखा गया था और शरीर कठोर अवस्था में बैठने की मुद्रा में था, मानो वह अभी भी विमान की सीट पर बैठे हों। “पायलट के हाथ कंट्रोल योक पर थे” रोमन वोहरा ने दावा किया कि पायलट के हाथ विमान के कंट्रोल योक पर थे और पैर भी बैठे हुए व्यक्ति की मुद्रा में मुड़े हुए थे। उन्होंने कहा कि यूनिफॉर्म और शरीर की बनावट से उन्होंने पायलट की पहचान की। उनके मुताबिक, शव का आगे का हिस्सा और चेहरा ज्यादा नहीं जला था, जबकि पीठ की ओर अधिक जलने के निशान थे। डीएनए मैच के बाद मिला शव रोमन वोहरा ने बताया कि हादसे के बाद कई दिनों तक परिवार के लोग अस्पताल के बाहर इंतजार करते रहे। बाद में डीएनए मिलान के बाद उनके परिजनों के शव सौंपे गए। उन्होंने कहा कि मेडिकल फील्ड से जुड़े होने के कारण वह शरीर की संरचना और अन्य संकेतों के आधार पर पहचान कर सके कि वह शव कैप्टन सभरवाल का ही था। अमेरिकी लॉ फर्म ने उठाए सवाल अमेरिका की लॉ फर्म Chiunuma Law, जो हादसे में मारे गए 115 लोगों के परिवारों का प्रतिनिधित्व करने का दावा कर रही है, ने मामले की स्वतंत्र जांच की मांग की है। फर्म के केस मैनेजर Ayush Rajpal ने कहा कि यदि पायलट आखिरी समय तक विमान को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे थे, तो केवल अटकलों के आधार पर उन्हें दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि हादसे के हर तकनीकी, इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल और मानवीय पहलू की स्वतंत्र विशेषज्ञों द्वारा जांच होनी चाहिए। प्रारंभिक जांच रिपोर्ट में क्या सामने आया था? Aircraft Accident Investigation Bureau (AAIB) ने जुलाई में जारी अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में कहा था कि उड़ान भरने के कुछ सेकंड बाद विमान के इंजन के फ्यूल कंट्रोल स्विच बंद हो गए थे। रिपोर्ट के अनुसार, कॉकपिट वॉइस रिकॉर्डिंग में एक पायलट दूसरे से पूछता सुनाई देता है कि उसने फ्यूल सप्लाई क्यों बंद की, जबकि दूसरा जवाब देता है कि उसने ऐसा नहीं किया। AAIB के मुताबिक, फ्यूल सप्लाई बंद होने के बाद इंजन की शक्ति तेजी से कम होने लगी थी। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पिछले साल नवंबर में Supreme Court of India ने भी इस मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि हादसे के लिए किसी ने भी मुख्य पायलट को जिम्मेदार नहीं ठहराया है। अदालत ने कैप्टन सुमीत सभरवाल के 91 वर्षीय पिता से कहा था कि वह किसी तरह का भावनात्मक बोझ अपने ऊपर न लें।
Western Railway ने Bandra Terminus के पास अवैध अतिक्रमण हटाने के लिए बड़ा अभियान शुरू किया है। Bombay High Court के निर्देशों के बाद शुरू किए गए इस अभियान के पहले दिन करीब 18 प्रतिशत अवैध झोपड़ियों को हटाया गया। रेलवे अधिकारियों के अनुसार यह कार्रवाई बुधवार को भी जारी रहेगी। 23 मई तक चलेगा अभियान पश्चिम रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी Vineet Abhishek ने बताया कि यह पांच दिवसीय अभियान 23 मई तक चलेगा। अभियान का उद्देश्य लगभग 5,300 वर्ग मीटर रेलवे भूमि को खाली कराना और यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। रेलवे के अनुसार बांद्रा टर्मिनस के पुनर्विकास के तहत यहां एलिवेटेड रोड, बहुमंजिला इमारतें, आधुनिक प्लेटफॉर्म और रखरखाव सुविधाओं से युक्त एकीकृत परिसर विकसित करने की योजना है। रेलवे भूमि पर बनी थीं 500 झोपड़ियां अधिकारियों के मुताबिक गरीब नगर इलाके में रेलवे की जमीन पर करीब 500 अवैध झोपड़ियां बनी हुई थीं। अभियान के पहले दिन इनमें से लगभग 15 से 18 प्रतिशत झोपड़ियों को खाली कराया गया। रेलवे ने कहा कि कार्रवाई के दौरान कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए नागरिक प्रशासन, पुलिस और रेलवे सुरक्षा एजेंसियों की संयुक्त टीम तैनात की गई है। 2017 से चल रही थी कानूनी प्रक्रिया पश्चिम रेलवे के बयान के अनुसार इस मामले में सार्वजनिक परिसर अधिनियम के तहत कार्रवाई 2017 से पहले शुरू की गई थी और 27 नवंबर 2017 को बेदखली के आदेश पारित किए गए थे। रेलवे ने बताया कि इस मामले में लगभग नौ वर्षों तक न्यायिक प्रक्रिया चली, जिसमें Bombay High Court और Supreme Court of India में सुनवाई भी शामिल रही। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से मिली अनुमति रेलवे अधिकारियों के अनुसार, बॉम्बे हाई कोर्ट ने 29 अप्रैल 2026 को दिए गए अपने आदेश में चिन्हित पात्र संरचनाओं को संरक्षण देते हुए अवैध अतिक्रमण हटाने की अनुमति दी थी। बाद में इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में भी बरकरार रखा गया। रेलवे का कहना है कि यह कार्रवाई पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया के तहत और मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए की जा रही है।
देशभर में बढ़ते डॉग बाइट मामलों को लेकर Supreme Court of India ने बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने संबंधी अपने पहले के आदेश में बदलाव करने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने डॉग लवर्स और विभिन्न NGO की याचिकाओं को खारिज करते हुए साफ कहा कि 7 नवंबर 2025 के अंतरिम आदेश में कोई संशोधन नहीं किया जाएगा। जस्टिस Vikram Nath, Sandeep Mehta और N. V. Anjaria की बेंच ने 29 जनवरी को सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। “कुत्तों के काटने की घटनाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकते” फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देशभर में बच्चों और आम लोगों पर आवारा कुत्तों के हमलों की घटनाएं बेहद गंभीर हैं और इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा, “ABC फ्रेमवर्क 2001 में शुरू किया गया था, लेकिन आवारा कुत्तों की बढ़ती आबादी के अनुसार संसाधनों को बढ़ाने और व्यवस्थित योजना बनाने में गंभीर कमी रही है। नसबंदी और टीकाकरण अभियान बिना समुचित योजना के चलाए गए।” स्कूल, अस्पताल और हाईवे से हटाने के निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने पहले दिए गए अंतरिम आदेश में राज्यों और National Highways Authority of India (NHAI) को हाईवे, अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, रेलवे स्टेशन और अन्य सार्वजनिक संस्थानों के आसपास से आवारा कुत्तों को हटाने के निर्देश दिए थे। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जो कुत्ते आक्रामक नहीं हैं और रेबीज से संक्रमित नहीं हैं, उन्हें नसबंदी और टीकाकरण के बाद उसी इलाके में छोड़ा जा सकता है, जहां से उन्हें पकड़ा गया था। कुत्ता काटे तो जिम्मेदारी किसकी? पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि यदि किसी आवारा कुत्ते के हमले में किसी व्यक्ति की चोट या मौत होती है, तो संबंधित नगर निकाय के साथ-साथ नियमित रूप से कुत्तों को खाना खिलाने वालों की जिम्मेदारी भी तय की जा सकती है। कोर्ट ने कहा, “ऐसा नहीं हो सकता कि कोई व्यक्ति रोज कुत्तों को खाना खिलाए, लेकिन उनके काटने पर उसकी कोई जिम्मेदारी न हो।” असम के आंकड़ों पर कोर्ट ने जताई चिंता सुनवाई के दौरान कोर्ट ने असम में डॉग बाइट के मामलों पर चिंता जताई। अदालत के अनुसार, वर्ष 2024 में राज्य में 1.66 लाख डॉग बाइट के मामले दर्ज हुए, जबकि 2025 में केवल जनवरी महीने में ही 20,900 घटनाएं सामने आईं। कोर्ट ने इन आंकड़ों को “बेहद भयावह” बताते हुए राज्यों को स्पष्ट और ठोस कार्ययोजना पेश करने की चेतावनी दी। कैसे शुरू हुआ मामला? यह मामला 28 जुलाई 2025 को शुरू हुआ था, जब सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में बढ़ते डॉग बाइट मामलों और मौतों पर स्वतः संज्ञान लिया था। उस दौरान सोशल मीडिया पर कई वीडियो वायरल हुए थे, जिनमें आवारा कुत्ते बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं पर हमला करते दिखाई दे रहे थे। इसके बाद 11 अगस्त 2025 को कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में आठ सप्ताह के भीतर सभी आवारा कुत्तों को पकड़कर शेल्टर होम भेजने का आदेश दिया था। हालांकि इस आदेश के खिलाफ डॉग लवर्स और पशु अधिकार संगठनों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए थे। बाद में 22 अगस्त 2025 को कोर्ट ने अपने आदेश में आंशिक बदलाव किया था।
चुनाव बाद हिंसा से जुड़ी याचिका पर खुद करेंगी पैरवी पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख Mamata Banerjee गुरुवार को वकील की पोशाक पहनकर Calcutta High Court पहुंचीं। बताया जा रहा है कि वह विधानसभा चुनाव के बाद हुई हिंसा से जुड़े एक जनहित याचिका (PIL) मामले में खुद अदालत के सामने दलीलें पेश करेंगी। सूत्रों के मुताबिक यह मामला मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पाल की बेंच में सूचीबद्ध है, जहां ममता बनर्जी कार्यवाही और जांच से जुड़े कई पहलुओं पर सवाल उठा सकती हैं। अदालत परिसर में उन्हें वकीलों के पारंपरिक काले चोगे में देखा गया, जिसके बाद यह मामला राजनीतिक और कानूनी हलकों में चर्चा का विषय बन गया। पहले भी सुप्रीम कोर्ट में पेश कर चुकी हैं दलील यह पहला मौका नहीं है जब ममता बनर्जी अदालत में वकील की भूमिका में नजर आई हों। इससे पहले वह एसआईआर मुद्दे को लेकर Supreme Court of India में भी बतौर अधिवक्ता अपना पक्ष रख चुकी हैं। जानकारी के अनुसार, यह याचिका टीएमसी नेता और वरिष्ठ वकील Kalyan Banerjee के बेटे शीर्षान्या बंदोपाध्याय की ओर से दाखिल की गई थी। ममता बनर्जी ने वर्ष 1982 में जोगेश चंद्र कॉलेज ऑफ लॉ से कानून की पढ़ाई पूरी की थी। बंगाल चुनाव के बाद बढ़ा राजनीतिक तनाव गौरतलब है कि हाल ही में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी को बड़ी हार का सामना करना पड़ा। चुनाव में बीजेपी ने 207 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि टीएमसी 80 सीटों तक सिमट गई। इसके बाद राज्य की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया। ममता बनर्जी लगातार आरोप लगाती रही हैं कि बीजेपी ने चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी कर करीब 100 सीटें “छीन” लीं। वहीं, बीजेपी नेता Suvendu Adhikari ने 9 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी।
Sabarimala Temple में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मामले में Supreme Court of India की नौ सदस्यीय संविधान पीठ में सोमवार को अहम सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान मासिक धर्म, धार्मिक आस्था और सामाजिक सुधार जैसे मुद्दों पर तीखी बहस देखने को मिली। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि मासिक धर्म को “वर्जना” या “कलंक” मानना इस बात पर निर्भर करता है कि कोई व्यक्ति उसे किस नजरिए से देखता है। जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणी बनी चर्चा का केंद्र मामले में एक हस्तक्षेपकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील Vijay Hansaria ने दलील दी कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक का आधार उनकी मासिक धर्म वाली उम्र है। उन्होंने कहा कि समाज में अक्सर मासिक धर्म को कलंक और वर्जना की तरह देखा जाता है। इस पर संविधान पीठ में शामिल जस्टिस B. V. Nagarathna ने टिप्पणी करते हुए कहा: “यह वर्जना तब है अगर आप इसे उसी नजरिए से देखते हैं। सवाल यह है कि एक भक्त इसे किस नजरिए से देखता है, न कि कोई गैर-भक्त।” उनकी यह टिप्पणी सुनवाई के दौरान चर्चा का प्रमुख विषय बन गई। कोर्ट बोला- सामाजिक सुधार के नाम पर धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं केरल सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Jaideep Gupta ने दलील दी कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म के मूल पहलुओं को समाप्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म में पवित्र स्थलों पर पूजा का अधिकार एक महत्वपूर्ण धार्मिक पहलू है और यदि उस व्यवस्था को बदला जाता है, तो यह श्रद्धालुओं के अधिकारों का उल्लंघन होगा। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25(1) के तहत मिलने वाली धार्मिक स्वतंत्रता को सामाजिक सुधार के नाम पर खत्म नहीं किया जा सकता। “अगर जनता चाहती है तो सामाजिक सुधार संभव” सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश Surya Kant ने कहा कि यदि देश के लोग अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से किसी सामाजिक सुधार की मांग करते हैं, तो अदालत उस पर विचार कर सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यदि लोगों की इच्छा और सहमति के खिलाफ कुछ थोपा जाता है, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है। नौ जजों की संविधान पीठ कर रही सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ धार्मिक स्वतंत्रता और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े कई मामलों की सुनवाई कर रही है। इस पीठ में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रशांत बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची भी शामिल हैं। दाऊदी बोहरा समेत कई धार्मिक मामलों पर भी सुनवाई संविधान पीठ सिर्फ सबरीमाला मामले ही नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी सुनवाई कर रही है। इनमें Dawoodi Bohra community से जुड़े मामलों समेत विभिन्न धार्मिक परंपराओं और अधिकारों के मुद्दे शामिल हैं।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों से ठीक पहले सियासी घमासान अब अदालत तक पहुंच गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए भारत का सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। इस मामले पर शनिवार को विशेष सुनवाई होनी है, जिससे 4 मई को होने वाली मतगणना से पहले सस्पेंस और बढ़ गया है। क्या है पूरा विवाद? विवाद की जड़ चुनाव प्रक्रिया और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े हाईकोर्ट के निर्देश हैं। अदालत ने हाल ही में मतगणना केंद्रों की सुरक्षा, केंद्रीय कर्मचारियों की तैनाती और कुछ याचिकाओं (जैसे पुनर्मतदान) पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां की थीं। इससे पहले भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) ने निर्देश दिया था कि हर काउंटिंग सेंटर पर कम से कम एक केंद्रीय कर्मचारी की मौजूदगी सुनिश्चित की जाएगी। TMC ने इस फैसले का विरोध किया और इसे पक्षपातपूर्ण बताते हुए हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। TMC की दलील क्या है? TMC का कहना है कि चुनाव के अंतिम चरण में इस तरह के निर्देशों से मतगणना प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। पार्टी का आरोप है कि इससे निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो सकते हैं न्यायिक हस्तक्षेप से प्रशासनिक प्रक्रिया जटिल हो सकती है इससे चुनाव परिणामों की विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है इन्हीं तर्कों के आधार पर पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई क्यों अहम? शनिवार को होने वाली सुनवाई कई मायनों में बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अगर सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाता है, तो TMC को बड़ी राहत मिलेगी अगर रोक नहीं लगती, तो हाईकोर्ट के निर्देशों के तहत ही मतगणना होगी यह मामला चुनाव के दौरान अदालत की भूमिका को लेकर एक नई नजीर भी पेश कर सकता है क्या रुक सकती है मतगणना? फिलहाल उपलब्ध जानकारी के अनुसार मतगणना (4 मई) पर रोक लगने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है। आमतौर पर अदालतें चुनाव प्रक्रिया में अंतिम चरण में दखल देने से बचती हैं, जब तक कि कोई गंभीर संवैधानिक या कानूनी समस्या न हो। इसलिए ज्यादा संभावना यही है कि: मतगणना तय समय पर होगी सुप्रीम कोर्ट केवल प्रक्रिया या निर्देशों में बदलाव कर सकता है विपक्ष का क्या कहना है? अन्य राजनीतिक दल, खासकर बीजेपी, TMC के इस कदम को हार के डर से उठाया गया कदम बता रहे हैं। उनका कहना है कि चुनाव परिणाम से पहले कानूनी विवाद खड़ा करना राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है। सुरक्षा और हिंसा पर पहले से सख्ती गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने पहले ही चुनाव बाद हिंसा को लेकर कड़े निर्देश दिए हैं। राज्य में सुरक्षा के लिए केंद्रीय बलों की भारी तैनाती और निगरानी व्यवस्था लागू की गई है, ताकि मतगणना शांतिपूर्ण तरीके से हो सके।
निष्पक्ष चुनाव पर उठे सवाल पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल के बीच पुलिस ऑब्जर्वर के रूप में तैनात आईपीएस अधिकारी अजय पाल शर्मा को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। उन पर निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने के आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है। याचिकाकर्ता ने उन्हें पद से हटाने की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट में याचिका, चुनाव आयोग पर कार्रवाई का दबाव यह जनहित याचिका आदित्य दास नामक याचिकाकर्ता की ओर से दाखिल की गई है। इसमें चुनाव आयोग से अपील की गई है कि अजय पाल शर्मा को उनके पद से हटाया जाए। याचिका में आरोप लगाया गया है कि उन्होंने अपनी भूमिका के अनुरूप निष्पक्षता नहीं बरती और मतदाताओं पर प्रभाव डालने या उन्हें डराने-धमकाने जैसा व्यवहार किया। वायरल वीडियो से शुरू हुआ विवाद इस पूरे मामले की शुरुआत उस वायरल वीडियो से हुई, जिसमें अजय पाल शर्मा को फाल्टा क्षेत्र से तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के उम्मीदवार जहांगीर खान को कथित तौर पर चेतावनी देते हुए देखा गया। वीडियो सामने आने के बाद राजनीतिक हलकों में बहस तेज हो गई और उनके आचरण पर सवाल उठने लगे। निष्पक्ष चुनाव को लेकर उठी मांग याचिका में दावा किया गया है कि पश्चिम बंगाल में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए यह जरूरी है कि ऐसे अधिकारियों को हटाया जाए, जिन पर पक्षपात के आरोप लग रहे हैं। हालांकि, इससे पहले कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हुई है। कौन हैं IPS अजय पाल शर्मा? अजय पाल शर्मा 2011 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं। उन्हें कड़े और सख्त पुलिसिंग के लिए जाना जाता है और उनकी छवि अक्सर ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ और ‘यूपी के सिंघम’ के रूप में देखी जाती है। वर्तमान में उन्हें पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले में पुलिस ऑब्जर्वर के रूप में तैनात किया गया है। राजनीतिक बयानबाजी भी तेज इस मामले पर राजनीतिक प्रतिक्रिया भी तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आरोप लगाया है कि कुछ अधिकारियों की नियुक्ति राजनीतिक प्रभाव से जुड़ी हो सकती है। वहीं टीएमसी की ओर से भी इस पूरे घटनाक्रम पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
कोलकाता/नई दिल्ली: Supreme Court of India ने पश्चिम बंगाल के एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) मामले में बड़ा और अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए कहा है कि ट्रिब्यूनल से मंजूरी मिलने के बाद मतदाता इस बार भी वोट डाल सकेंगे, भले ही फैसला मतदान से ठीक पहले क्यों न आया हो।क्या है पूरा मामला? West Bengal में एसआईआर प्रक्रिया के दौरान: करीब 90 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए गए लंबित सूची में 50 लाख नाम शामिल इनमें से 27 लाख नाम हटाए जा चुके हैं बड़ी संख्या में लोगों ने ट्रिब्यूनल में अपील की है पहले नियम यह था कि अगर किसी का नाम बाद में सूची में जुड़ भी जाए, तो वह फ्रीज हो चुकी वोटर लिस्ट के कारण वोट नहीं डाल सकता था। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? Supreme Court of India ने स्पष्ट किया: अगर ट्रिब्यूनल चुनाव से 2 दिन पहले भी फैसला देता है, तो भी वोट देने का अधिकार मिलेगा जरूरत पड़ने पर पूरक (Supplementary) वोटर लिस्ट जारी की जाएगी चुनाव आयोग को इस फैसले को लागू करना होगा यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत दिया गया, जो कोर्ट को “पूर्ण न्याय” के लिए विशेष अधिकार देता है।चुनाव पर क्या होगा असर? पहला चरण: 23 अप्रैल दूसरा चरण: 29 अप्रैल यानी 21 और 27 अप्रैल तक जिन मामलों का निपटारा होगा, उन मतदाताओं को वोट देने का मौका मिलेगा। राजनीतिक प्रतिक्रियाएं Mamata Banerjee सरकार ने इस फैसले का स्वागत किया TMC सांसद काकली घोष दस्तीदार ने इसे लोकतंत्र की जीत बताया CPM नेता विकास रंजन भट्टाचार्य ने कहा कि यह आम लोगों की कानूनी लड़ाई की जीत है क्यों है यह फैसला अहम? यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि: इससे लाखों लोगों का मताधिकार सुरक्षित हुआ चुनाव प्रक्रिया में न्याय और समानता सुनिश्चित करने की कोशिश हुई कोर्ट ने दिखाया कि जरूरत पड़ने पर वह कानूनी तकनीकी अड़चनों को दरकिनार कर सकता है सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय पश्चिम बंगाल चुनाव में बड़ा बदलाव ला सकता है। इससे उन लोगों को भी वोट देने का मौका मिलेगा, जो अब तक सिस्टम की वजह से बाहर हो रहे थे। इसे लोकतंत्र को मजबूत करने वाला एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
नई दिल्ली: केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामले पर सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर सुनवाई के दौरान तीखी बहस देखने को मिली। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कई अहम संवैधानिक सवाल उठाए, जिनका असर भविष्य में धार्मिक परंपराओं और मौलिक अधिकारों की व्याख्या पर पड़ सकता है। कोर्ट का बड़ा सवाल जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने पूछा: “जो लोग भगवान अयप्पा के भक्त नहीं हैं, क्या वे मंदिर की परंपराओं को चुनौती दे सकते हैं?” सवाल यह भी उठा कि: क्या ऐसे मामलों में कोर्ट को सुनवाई करनी चाहिए? 9 जजों की संविधान पीठ कर रही विचार धार्मिक परंपराओं और मौलिक अधिकारों से जुड़े 7 बड़े सवालों पर सुनवाई अहम मुद्दा: क्या कोई गैर-भक्त/गैर-सदस्य किसी धार्मिक प्रथा को कोर्ट में चुनौती दे सकता है? 2018 के फैसले पर भी चर्चा 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी उम्र की महिलाओं को सबरीमाला में प्रवेश की अनुमति दी थी यह याचिका इंडियन लॉयर्स एसोसिएशन ने दाखिल की थी कोर्ट ने अब पूछा: क्या यह संगठन वास्तव में अयप्पा भक्तों का प्रतिनिधित्व करता है? चीफ जस्टिस की अलग राय चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा: अगर मामला गंभीर संवैधानिक मुद्दे से जुड़ा हो, तो कोर्ट सुनवाई कर सकता है भले ही याचिकाकर्ता सीधे प्रभावित न हो हालांकि, उन्होंने यह भी माना: आर्टिकल 25 और 26 धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े व्यक्तिगत अधिकार हैं आमतौर पर वही व्यक्ति कोर्ट आता है, जिसका अधिकार प्रभावित हुआ हो सरकार vs याचिकाकर्ता सरकार का पक्ष (SG तुषार मेहता) PIL (जनहित याचिका) का दुरुपयोग हो रहा है कोर्ट तय नहीं कर सकता कि कौन-सी परंपरा अंधविश्वास है धार्मिक सुधार का काम विधायिका (सरकार) का है याचिकाकर्ताओं की दलील कई महिलाएं खुद कोर्ट नहीं आ पातीं ऐसे में संगठन उनकी आवाज बनते हैं जजों की अहम टिप्पणियां कोर्ट के पास अधिकार है कि धार्मिक प्रथाओं की न्यायिक समीक्षा करे अगर कोई परंपरा: स्वास्थ्य सार्वजनिक व्यवस्था नैतिकता के खिलाफ हो, तो कोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है उदाहरण: सती प्रथा जैसी कुरीतियों में कोर्ट दखल दे सकता है परंपरा बनाम अधिकार सरकार का तर्क: अयप्पा को नैष्ठिक ब्रह्मचारी माना जाता है इसलिए महिलाओं के प्रवेश पर परंपरा बनी कोर्ट का सवाल: क्या परंपरा संविधान से ऊपर हो सकती है?
सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल एडमिशन को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है, जिससे हजारों NEET अभ्यर्थियों को राहत मिलेगी। कोर्ट ने साफ किया है कि धोखाधड़ी (फ्रॉड) के कारण खाली हुई MBBS सीट अब खाली नहीं छोड़ी जाएगी, बल्कि उसे मेरिट के आधार पर अगले योग्य उम्मीदवार को दिया जाएगा। क्या था मामला? मामला NEET UG 2022 से जुड़ा है एक छात्र ने फर्जी दस्तावेजों के जरिए MBBS में एडमिशन ले लिया जांच में फ्रॉड सामने आने पर उसका एडमिशन रद्द कर दिया गया इससे एक सीट खाली हो गई, लेकिन मेरिट में अगले छात्र को समय पर सीट नहीं मिली सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा- MBBS सीट एक राष्ट्रीय संसाधन (National Resource) है इसे खाली छोड़ना गलत है फ्रॉड से खाली हुई सीट तुरंत अगले योग्य कैंडिडेट को दी जानी चाहिए कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रशासनिक देरी या लापरवाही के कारण सीट खाली रखना पूरी प्रक्रिया के खिलाफ है। NMC को झटका नेशनल मेडिकल काउंसिल (NMC) ने इस फैसले को चुनौती दी थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने NMC की अपील खारिज कर दी और छात्र के एडमिशन को बरकरार रखा छात्रों के लिए क्या बदलेगा? अब किसी भी फ्रॉड से आपका हक नहीं छीना जाएगा मेरिट लिस्ट में आगे आने वाले छात्रों को सीधा फायदा मिलेगा एडमिशन प्रक्रिया बनेगी ज्यादा फेयर और ट्रांसपेरेंट
दिल्ली के चर्चित शराब नीति मामले में आज बड़ा घटनाक्रम देखने को मिल सकता है। आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रमुख अरविंद केजरीवाल दिल्ली हाईकोर्ट में खुद अपना पक्ष रख सकते हैं। यह मामला CBI की उस याचिका से जुड़ा है, जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा केजरीवाल, मनीष सिसोदिया समेत 23 आरोपियों को दी गई राहत को चुनौती दी गई है। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को हटाने की मांग सुनवाई से पहले केजरीवाल और अन्य आरोपियों ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से मामले से अलग होने (रिक्यूज) की मांग की। उनका कहना है कि निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं, इसलिए केस को किसी दूसरी बेंच को ट्रांसफर किया जाए। हालांकि, यह मांग खारिज कर दी गई। कोर्ट ने साफ किया कि किसी जज के खुद को मामले से अलग करने का फैसला वही जज लेते हैं। क्या होता है ‘रिक्यूजल’? रिक्यूजल का मतलब होता है कि अगर किसी जज पर पक्षपात या हितों के टकराव का शक हो, तो वह खुद ही मामले की सुनवाई से अलग हो सकते हैं, ताकि न्याय प्रक्रिया निष्पक्ष बनी रहे। ट्रायल कोर्ट ने दी थी राहत 27 फरवरी को ट्रायल कोर्ट ने केजरीवाल, मनीष सिसोदिया समेत सभी 23 आरोपियों को इस मामले में राहत दी थी। कोर्ट ने CBI की जांच पर भी सवाल उठाए थे और उसकी आलोचना की थी। हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी CBI की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस शर्मा ने 9 मार्च को कहा था कि पहली नजर में (प्राइमा फेसी) ट्रायल कोर्ट की टिप्पणियां सही नहीं लगतीं और इस पर दोबारा विचार जरूरी है। साथ ही, उन्होंने CBI जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश पर भी रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला केजरीवाल पहले ही हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से जज बदलने की मांग कर चुके हैं, लेकिन यह मांग खारिज हो चुकी है। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) भी दाखिल की है। जेल में रहे केजरीवाल और सिसोदिया इस मामले में केजरीवाल को 2024 लोकसभा चुनाव के दौरान गिरफ्तार किया गया था और वे 156 दिन तक हिरासत में रहे। बाद में उन्हें सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली। वहीं, मनीष सिसोदिया इस केस में करीब 530 दिन तक जेल में रहे थे। क्या है पूरा मामला? दिल्ली सरकार ने 2021 में नई आबकारी (शराब) नीति लागू की थी, जिसका उद्देश्य राजस्व बढ़ाना और शराब व्यापार में सुधार करना था। बाद में अनियमितताओं के आरोप लगने पर इस नीति को वापस ले लिया गया। इसके बाद उपराज्यपाल विनय सक्सेना के आदेश पर CBI और ED ने जांच शुरू की। जांच एजेंसियों का आरोप है कि इस नीति के जरिए निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाया गया और भ्रष्टाचार हुआ। भावुक हुए थे केजरीवाल 27 फरवरी को ट्रायल कोर्ट से राहत मिलने के बाद केजरीवाल भावुक हो गए थे। उन्होंने कहा था, “मैंने जिंदगी में सिर्फ ईमानदारी कमाई है।” वहीं मनीष सिसोदिया ने इसे “सच की जीत” बताया था।
कोलकाता,एजेंसियां। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव 2026 से पहले मालदा जिले में SIR (Special Intensive Revision) के लिए गए अधिकारियों को बंधक बनाए जाने की घटना ने बड़ा राजनीतिक और संवैधानिक विवाद खड़ा कर दिया है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पहली बार प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि उन्हें इस घटना की जानकारी समय पर नहीं दी गई और फिलहाल राज्य की प्रशासनिक मशीनरी उनके नियंत्रण में नहीं है। चुनावी रैली में ममता बनर्जी ने क्या कहा ? मुर्शिदाबाद जिले के सागरदिघी में चुनावी रैली को संबोधित करते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि चुनाव आयोग ने चुनाव से पहले प्रशासनिक ढांचे में बड़े बदलाव किए हैं, जिसके कारण राज्य में कानून-व्यवस्था पर उनका नियंत्रण नहीं रह गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि “मेरी सारी शक्तियां छीन ली गई हैं” और वर्तमान स्थिति “सुपर राष्ट्रपति शासन” जैसी लग रही है। ममता ने यह भी दावा किया कि उन्हें मालदा की घटना के बारे में आधी रात को एक पत्रकार से पता चला। मुख्यमंत्री ने SIR प्रक्रिया को लेकर क्या कहा ? मुख्यमंत्री ने SIR प्रक्रिया को लेकर भी नाराजगी जताई और कहा कि वह समझ सकती हैं कि लोग क्यों गुस्से में हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें नहीं पता कि इस पूरे घटनाक्रम के लिए कौन जिम्मेदार है। दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट ने इस घटना को बेहद गंभीर मानते हुए सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाना केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि न्यायिक संस्थाओं के अधिकारों को चुनौती देने जैसा है। मुख्य न्यायाधीश ने इसे “सोची-समझी और उकसावे वाली कार्रवाई” बताया और कहा कि इसकी जांच CBI या NIA जैसी केंद्रीय एजेंसी से कराई जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि अगर कोई दलित व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म छोड़कर किसी अन्य धर्म-जैसे ईसाई-को अपनाता है, तो उसका अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा समाप्त हो जाएगा। जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने स्पष्ट किया कि SC कैटेगरी का लाभ केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अनुयायियों को ही मिल सकता है। क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने? कोर्ट ने अपने फैसले में कहा- धर्म परिवर्तन के बाद व्यक्ति SC कैटेगरी में नहीं रहेगा ऐसे व्यक्ति को SC से जुड़े कानूनी और आरक्षण लाभ नहीं मिलेंगे SC/ST अत्याचार निवारण कानून का लाभ भी लागू नहीं होगा कोर्ट के मुताबिक, किसी अन्य धर्म को अपनाने के साथ ही SC का दर्जा स्वतः समाप्त हो जाता है। हाई कोर्ट के फैसले पर मुहर सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के पहले दिए गए फैसले को सही ठहराया। हाई कोर्ट ने कहा था कि जो व्यक्ति ईसाई धर्म अपनाता है और उसका पालन करता है, वह SC स्टेटस बरकरार नहीं रख सकता। कानूनी आधार क्या है? भारत में SC का दर्जा संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के तहत दिया जाता है, जिसमें शुरू में केवल हिंदुओं को शामिल किया गया था। बाद में इसमें सिख (1956) और बौद्ध (1990) धर्म को भी जोड़ा गया।
देश की सशस्त्र सेनाओं में लैंगिक समानता की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए Supreme Court of India ने महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) अधिकारियों को स्थायी कमीशन (Permanent Commission) देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने इस दौरान सशस्त्र बलों के रवैये पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि महिलाओं के साथ लंबे समय से “प्रणालीगत भेदभाव” किया गया है। मुख्य न्यायाधीश Surya Kant की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट कहा कि पुरुष अधिकारियों के लिए स्थायी कमीशन को विशेषाधिकार बनाए रखना अब स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट ने इस फैसले में Article 142 of the Constitution of India के तहत अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए न्याय सुनिश्चित किया। 250 अधिकारियों की सीमा को बताया मनमाना सुप्रीम कोर्ट ने हर साल अधिकतम 250 महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने की सीमा को “मनमाना” और असंवैधानिक बताया। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की सीमा महिलाओं के अवसरों को सीमित करती है और समानता के सिद्धांत के खिलाफ है। मूल्यांकन प्रक्रिया में गंभीर खामियां कोर्ट ने पाया कि Indian Army और Indian Navy में महिला अधिकारियों के मूल्यांकन में गंभीर खामियां थीं। उनकी Annual Confidential Reports (ACRs) को “लापरवाही” से तैयार किया गया और यह मानकर आकलन किया गया कि उन्हें कभी स्थायी कमीशन नहीं मिलेगा। इससे उनकी योग्यता का सही आकलन नहीं हो पाया। पेंशन और सेवा लाभ का भी मिलेगा फायदा अदालत ने निर्देश दिया कि जिन महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन का अधिकार है, उन्हें 20 साल की सेवा पूरी मानी जाएगी। इसके साथ ही उन्हें पेंशन और अन्य सभी सेवानिवृत्ति लाभ भी दिए जाएंगे। यह लाभ उन अधिकारियों को भी मिलेगा, जिन्हें पहले चयन बोर्ड में अयोग्य घोषित कर दिया गया था। अलग-अलग बलों के लिए अलग निर्देश नौसेना: मेडिकल फिटनेस के आधार पर योग्य महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन मिलेगा। वायुसेना: कोर्ट ने माना कि कई अधिकारियों को निष्पक्ष अवसर नहीं मिला, लेकिन ऑपरेशनल कारणों से दोबारा नियुक्ति संभव नहीं है। सेना: मूल्यांकन प्रणाली में सुधार और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। पारदर्शिता की कमी पर भी सवाल कोर्ट ने रक्षा मंत्रालय और नौसेना द्वारा चयन प्रक्रिया और अंक सार्वजनिक न करने पर भी चिंता जताई। कोर्ट के अनुसार, इस पारदर्शिता की कमी से न केवल महिला बल्कि पुरुष अधिकारियों को भी नुकसान हुआ। व्यापक सुधार के आदेश सुप्रीम कोर्ट ने सभी सशस्त्र बलों को निर्देश दिया है कि वे अपनी मूल्यांकन प्रक्रिया की व्यापक समीक्षा करें, ताकि भविष्य में किसी भी महिला अधिकारी के साथ भेदभाव न हो।
नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने यूट्यूबर एल्विश यादव को बड़ी राहत देते हुए 2023 के चर्चित स्नेक वेनम मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा दर्ज FIR को खारिज कर दिया है। क्या था मामला? नवंबर 2023 में नोएडा में कथित रेव पार्टी के दौरान सांपों और उनके जहर के इस्तेमाल के आरोप में एल्विश यादव के खिलाफ केस दर्ज किया गया था। इस मामले में उन्हें 17 मार्च 2024 को गिरफ्तार भी किया गया था। आरोप था कि पार्टियों में सांपों के जहर का इस्तेमाल मनोरंजन और नशे के लिए किया जा रहा था, जो वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत गंभीर अपराध है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा था कि लोकप्रिय लोग अगर बेजुबान जीवों का गलत तरीके से इस्तेमाल करते हैं, तो इससे समाज में गलत संदेश जाता है। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया था कि क्या किसी को जानवरों के साथ इस तरह व्यवहार करने की अनुमति दी जा सकती है। बचाव पक्ष की दलील एल्विश यादव की ओर से वरिष्ठ वकील मुक्ता गुप्ता ने दलील दी कि वह एक वीडियो शूट के लिए गायक फाजिलपुरिया के निमंत्रण पर वहां गए थे। उन्होंने कहा कि: रेव पार्टी के कोई ठोस सबूत नहीं हैं मादक पदार्थ के इस्तेमाल का प्रमाण नहीं मिला बरामद सांप विषैले नहीं थे एल्विश मौके पर मौजूद भी नहीं थे राज्य पक्ष का दावा वहीं, राज्य सरकार ने दावा किया कि मौके से नौ सांप, जिनमें पांच कोबरा थे, बरामद किए गए थे और सांप के जहर के इस्तेमाल के संकेत मिले थे। कोर्ट का फैसला दोनों पक्षों की दलीलें और सबूतों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने FIR को रद्द कर दिया। इस फैसले से एल्विश यादव को बड़ी राहत मिली है। हालांकि, इस मामले ने वन्यजीव संरक्षण, कानून के पालन और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स की जिम्मेदारी जैसे अहम मुद्दों पर बहस को फिर से तेज कर दिया है।
पश्चिम बंगाल में विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया से जुड़े मामले में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सख्त रुख देखने को मिला। सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश Justice Surya Kant याचिकाकर्ताओं पर काफी नाराज़ दिखाई दिए और न्यायिक अधिकारियों पर सवाल उठाने को लेकर कड़ी चेतावनी दी। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले से जुड़ी कई याचिकाओं पर सुनवाई हो रही है, जिनमें पश्चिम बंगाल में चल रही विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया की वैधता और पारदर्शिता पर सवाल उठाए गए हैं। ‘न्यायिक अधिकारियों पर सवाल बर्दाश्त नहीं’ सुनवाई के दौरान Justice Surya Kant ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने न्यायिक अधिकारियों पर सवाल उठाकर “हद पार कर दी है”। उन्होंने सख्त लहजे में कहा कि इस तरह की याचिकाएं न्यायिक व्यवस्था पर अविश्वास का संदेश देती हैं और अदालत इसे किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं करेगी। मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा, “याचिकाकर्ता ऐसी अर्जी दाखिल करने की हिम्मत कैसे कर सकते हैं? न्यायिक अधिकारियों पर सवाल उठाना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।” उन्होंने यह भी कहा कि अदालत इस तरह की टिप्पणियों को गंभीरता से लेती है और इस संबंध में कड़ी चेतावनी जारी की जा रही है। ‘सिस्टम पर भरोसे की कमी का गलत संदेश’ सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया के तहत लगभग 52 लाख लोगों के मामलों की जांच की जा रही है, जिनमें से करीब 10 लाख मामलों का काम पूरा हो चुका है। इस पर Justice Surya Kant ने कहा कि समय से पहले याचिका दायर करना यह संकेत देता है कि याचिकाकर्ताओं को व्यवस्था पर भरोसा नहीं है। उन्होंने कहा कि प्रक्रिया को पूरा होने का समय दिया जाना चाहिए। वैध मतदाता शामिल होंगे, अवैध नाम हटेंगे अदालत ने स्पष्ट किया कि जिन लोगों का मतदान का अधिकार वैध है, उन्हें मतदाता सूची में शामिल किया जाएगा, जबकि अवैध रूप से जोड़े गए नामों को हटाया जाएगा। सीजेआई ने कहा, “जो लोग वास्तविक और वैध मतदाता हैं, उन्हें शामिल किया जाएगा और जो घुसपैठिए हैं, उन्हें बाहर किया जाएगा।” सुप्रीम कोर्ट के निर्देश सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने Election Commission of India और राज्य सरकार को प्रक्रिया सुचारू रूप से चलाने के लिए कई निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि: पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी और व्यवस्थित तरीके से पूरा किया जाए। पोर्टल से जुड़ी तकनीकी दिक्कतों को तुरंत दूर किया जाए। अधिकारियों के लिए आवश्यक लॉग-इन आईडी और तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। न्यायिक अधिकारियों को काम करने के लिए सभी जरूरी संसाधन उपलब्ध कराए जाएं। अपील की सुनवाई कौन करेगा अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में शामिल करने का दावा खारिज हो जाता है, तो उसके खिलाफ किसी प्रशासनिक निकाय के पास अपील नहीं होगी। ऐसे मामलों में संबंधित हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दो पूर्व या वर्तमान हाईकोर्ट जजों की एक विशेष पीठ गठित कर सकते हैं, जो इन अपीलों की सुनवाई करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि इस अपीलीय व्यवस्था से जुड़ी जानकारी आधिकारिक अधिसूचना जारी कर सार्वजनिक की जाए। इस पूरे घटनाक्रम के बाद बंगाल की SIR प्रक्रिया से जुड़ा मामला एक बार फिर न्यायिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है।
सरकार या MACT में से किसी एक से ही आय नुकसान का मुआवजा मिलेगा Supreme Court of India ने सड़क दुर्घटना से जुड़े मामलों में एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी की सड़क हादसे में मौत होती है, तो उसके आश्रित परिवार के सदस्य आय के नुकसान के लिए मुआवजा या तो सरकार से ले सकते हैं या फिर Motor Accidents Claims Tribunal (MACT) से-दोनों जगह से एक साथ नहीं। न्यायमूर्ति Sanjay Karol और न्यायमूर्ति Augustine George Masih की पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत ने Reliance General Insurance की ओर से दायर अपील को स्वीकार करते हुए Punjab and Haryana High Court के आदेश को रद्द कर दिया। 2009 के सड़क हादसे से जुड़ा है मामला यह मामला 2 नवंबर 2009 को हुई एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा है। उस दिन रविंदर कुमार की मोटरसाइकिल, जिस पर होम देवी और कनिका सवार थीं, एक जीप से टकरा गई। इस हादसे में सरकारी कर्मचारी होम देवी की मौत हो गई, जबकि बाकी दो लोग घायल हो गए। MACT ने दिया था 8.8 लाख रुपये का मुआवजा दुर्घटना के बाद पीड़ित परिवार ने MACT में मुआवजे के लिए दावा किया था। ट्रिब्यूनल ने परिवार के आश्रितों को 8 लाख 80 हजार रुपये देने का आदेश दिया। हालांकि परिवार ने इस राशि को कम बताते हुए हाई कोर्ट में चुनौती दी और मुआवजा बढ़ाने की मांग की। हाई कोर्ट ने बढ़ाकर 29 लाख रुपये किया मुआवजा हाई कोर्ट ने मुआवजे की राशि बढ़ाकर 29 लाख 9 हजार 240 रुपये कर दी। शुरुआत में अदालत ने कहा कि हरियाणा सरकार की योजना-Haryana Compassionate Assistance to Dependents of Deceased Government Employees Rules 2006-के तहत परिवार को मिली राशि को कुल मुआवजे से घटाया जाएगा। लेकिन बाद में एक अन्य आदेश में हाई कोर्ट ने कहा कि सरकार से मिली सहायता राशि को मुआवजे से घटाने की जरूरत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का आदेश किया रद्द हाई कोर्ट के इस फैसले को चुनौती देते हुए बीमा कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसले-Reliance General Insurance vs Shashi Sharma-का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि मुआवजे की गणना करते समय समान प्रकार के लाभों को ध्यान में रखा जाएगा ताकि एक ही आर्थिक नुकसान के लिए दो बार भुगतान न हो। फैसले से स्पष्ट हुई कानूनी स्थिति सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह निर्णय संतुलन बनाए रखने के लिए जरूरी है। इससे पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा तो मिलेगा, लेकिन एक ही नुकसान के लिए दो बार भुगतान नहीं किया जाएगा। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई सहायता अलग प्रकृति की है और मुआवजे से सीधे जुड़ी नहीं है, तो उसे घटाने की आवश्यकता नहीं होगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।