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TMC Moves SC Ahead of Bengal Counting

WB Polls 2026: हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची TMC, क्या रुक सकती है मतगणना?

surbhi मई 2, 2026 0
Supreme Court amid legal battle over West Bengal election counting
TMC Supreme Court West Bengal Polls 2026

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों से ठीक पहले सियासी घमासान अब अदालत तक पहुंच गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए भारत का सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। इस मामले पर शनिवार को विशेष सुनवाई होनी है, जिससे 4 मई को होने वाली मतगणना से पहले सस्पेंस और बढ़ गया है।

क्या है पूरा विवाद?

विवाद की जड़ चुनाव प्रक्रिया और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े हाईकोर्ट के निर्देश हैं। अदालत ने हाल ही में मतगणना केंद्रों की सुरक्षा, केंद्रीय कर्मचारियों की तैनाती और कुछ याचिकाओं (जैसे पुनर्मतदान) पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां की थीं।

इससे पहले भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) ने निर्देश दिया था कि हर काउंटिंग सेंटर पर कम से कम एक केंद्रीय कर्मचारी की मौजूदगी सुनिश्चित की जाएगी।
TMC ने इस फैसले का विरोध किया और इसे पक्षपातपूर्ण बताते हुए हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी।

TMC की दलील क्या है?

TMC का कहना है कि चुनाव के अंतिम चरण में इस तरह के निर्देशों से मतगणना प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

  • पार्टी का आरोप है कि इससे निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो सकते हैं
  • न्यायिक हस्तक्षेप से प्रशासनिक प्रक्रिया जटिल हो सकती है
  • इससे चुनाव परिणामों की विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है

इन्हीं तर्कों के आधार पर पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई क्यों अहम?

शनिवार को होने वाली सुनवाई कई मायनों में बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

  • अगर सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाता है, तो TMC को बड़ी राहत मिलेगी
  • अगर रोक नहीं लगती, तो हाईकोर्ट के निर्देशों के तहत ही मतगणना होगी
  • यह मामला चुनाव के दौरान अदालत की भूमिका को लेकर एक नई नजीर भी पेश कर सकता है

क्या रुक सकती है मतगणना?

फिलहाल उपलब्ध जानकारी के अनुसार मतगणना (4 मई) पर रोक लगने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है।
आमतौर पर अदालतें चुनाव प्रक्रिया में अंतिम चरण में दखल देने से बचती हैं, जब तक कि कोई गंभीर संवैधानिक या कानूनी समस्या न हो।

इसलिए ज्यादा संभावना यही है कि:

  • मतगणना तय समय पर होगी
  • सुप्रीम कोर्ट केवल प्रक्रिया या निर्देशों में बदलाव कर सकता है

विपक्ष का क्या कहना है?

अन्य राजनीतिक दल, खासकर बीजेपी, TMC के इस कदम को हार के डर से उठाया गया कदम बता रहे हैं। उनका कहना है कि चुनाव परिणाम से पहले कानूनी विवाद खड़ा करना राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

सुरक्षा और हिंसा पर पहले से सख्ती

गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने पहले ही चुनाव बाद हिंसा को लेकर कड़े निर्देश दिए हैं। राज्य में सुरक्षा के लिए केंद्रीय बलों की भारी तैनाती और निगरानी व्यवस्था लागू की गई है, ताकि मतगणना शांतिपूर्ण तरीके से हो सके।

 

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों से पहले राज्य की राजनीति अपने चरम पर है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ममता बनर्जी चौथी बार सत्ता में वापसी कर पाएंगी या इस बार बदलाव की हवा ‘नबान्न’ तक पहुंच जाएगी। करीब 15 वर्षों से सत्ता में काबिज तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सामने इस बार बहुस्तरीय चुनौतियां खड़ी हैं, जो चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती हैं। 1. भ्रष्टाचार के आरोप: छवि पर गहरा असर इस चुनाव में टीएमसी सरकार के खिलाफ सबसे बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार रहा है। शिक्षक भर्ती घोटाला राशन घोटाला कोयला तस्करी मामला इन मामलों में पार्टी के कई बड़े नेताओं की गिरफ्तारी और प्रवर्तन निदेशालय (ED) व केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की लगातार कार्रवाई ने सरकार की साख को चोट पहुंचाई है। विपक्ष ने इसे “सिस्टमेटिक करप्शन” बताकर जनता के बीच मजबूत नैरेटिव बनाया है। ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में यह मुद्दा चर्चा का केंद्र बना हुआ है। 2. महिला सुरक्षा और संदेशखाली जैसे विवाद महिला वोट बैंक टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत रहा है, लेकिन हालिया घटनाओं ने इस आधार को कमजोर करने की कोशिश की है। संदेशखाली विवाद आरजी कर मेडिकल कॉलेज से जुड़े आरोप इन घटनाओं ने कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाकर टीएमसी पर तीखा हमला बोला है। 3. एंटी-इन्कम्बेंसी: 15 साल की सत्ता का असर लगातार तीन कार्यकाल तक सत्ता में रहने के बाद एंटी-इन्कम्बेंसी का असर साफ दिखाई दे रहा है। जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की दबंगई के आरोप ‘सिंडिकेट राज’ की शिकायतें स्थानीय प्रशासन पर भ्रष्टाचार के आरोप हालांकि, राज्य सरकार की योजनाएं–जैसे महिला और गरीब वर्ग के लिए आर्थिक सहायता–अब भी लोकप्रिय हैं, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर असंतोष चुनावी समीकरण बदल सकता है। 4. भाजपा का उभार और बदला राजनीतिक संतुलन पश्चिम बंगाल की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी (BJP) का तेजी से उभार टीएमसी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। 2011 में मामूली मौजूदगी 2021 में 77 सीटों के साथ मुख्य विपक्ष बूथ स्तर तक मजबूत संगठन उत्तर बंगाल, जंगलमहल और सीमावर्ती क्षेत्रों में भाजपा की पकड़ मजबूत हुई है। धार्मिक ध्रुवीकरण और हिंदुत्व की राजनीति ने पारंपरिक वोट बैंक को प्रभावित किया है, जिससे मुकाबला और कड़ा हो गया है। 5. युवाओं की नाराजगी और रोजगार संकट भर्ती घोटालों और सीमित रोजगार अवसरों ने युवाओं में निराशा पैदा की है। सरकारी नौकरियों में पारदर्शिता पर सवाल निजी क्षेत्र में सीमित अवसर औद्योगिक विकास की धीमी रफ्तार हालांकि ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाएं गरीब और महिला मतदाताओं को जोड़ने में सफल रही हैं, लेकिन शिक्षित युवा वर्ग बदलाव की तलाश में नजर आ रहा है। ममता बनर्जी का ‘फाइटर’ फैक्टर इन तमाम चुनौतियों के बावजूद ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत उनकी व्यक्तिगत छवि और जमीनी पकड़ है। संघर्षशील नेता की पहचान सीधे जनता से संवाद कल्याणकारी योजनाओं का व्यापक असर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी आखिरी समय में चुनावी बाजी पलटने की क्षमता रखती हैं। 4 मई का फैसला तय करेगा भविष्य अब नजरें 4 मई पर टिकी हैं, जब चुनावी नतीजे सामने आएंगे। क्या ‘दीदी’ एक बार फिर सत्ता बचा लेंगी? या बंगाल में सत्ता परिवर्तन का नया अध्याय शुरू होगा?

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कोलकाता : पश्चिम बंगाल में मतगणना से पहले सियासी घमासान तेज हो गया है। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के ईवीएम में कथित गड़बड़ी के आरोपों पर भारतीय जनता पार्टी ने तीखा जवाब दिया है। बीजेपी का पलटवार बीजेपी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कहा कि एग्जिट पोल के बाद साफ दिख रहा है कि बंगाल में पहली बार बीजेपी सरकार बन सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि टीएमसी संभावित हार से घबराकर पहले से ही बहाने बना रही है और ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है। वहीं, बीजेपी नेता राम कृपाल यादव ने भी ईवीएम छेड़छाड़ के आरोपों को खारिज किया। उन्होंने कहा कि राज्य की जनता ने टीएमसी को नकार दिया है और चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष हुए हैं। उन्होंने भारत निर्वाचन आयोग की तारीफ करते हुए कहा कि उसने पूरी ईमानदारी से चुनाव प्रक्रिया को अंजाम दिया है। ममता बनर्जी ने क्या कहा? इससे पहले ममता बनर्जी ने दक्षिण कोलकाता के सखावत मेमोरियल स्कूल स्थित भवानीपुर स्ट्रॉन्ग रूम का दौरा किया था। वह करीब चार घंटे तक वहां रहीं और रात 12 बजे के बाद बाहर निकलीं। उन्होंने कहा कि मतगणना के दौरान किसी भी तरह की गड़बड़ी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। “जनता के वोट पूरी तरह सुरक्षित रहने चाहिए,” उन्होंने कहा। पारदर्शिता की मांग ममता बनर्जी ने सुझाव दिया कि मतगणना केंद्रों पर पारदर्शिता बढ़ाने के लिए मीडिया के लिए सीसीटीवी व्यवस्था की जानी चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि शुरुआत में केंद्रीय सुरक्षाबलों ने उन्हें अंदर जाने से रोका, हालांकि बाद में उन्हें प्रवेश की अनुमति दे दी गई। 4 मई से पहले बढ़ा सियासी तनाव 4 मई को होने वाली मतगणना से पहले आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। एक ओर टीएमसी चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठा रही है, वहीं बीजेपी इन आरोपों को बेबुनियाद बता रही है। अब सभी की नजरें नतीजों पर टिकी हैं, जो तय करेंगे कि पश्चिम बंगाल में सत्ता किसके हाथ में जाएगी।  

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Bengal Election 2026: बंगाल में दूसरे चरण में रिकॉर्ड मतदान, 5 बजे तक 89.99% वोटिं

कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दूसरे और अंतिम चरण में मंगलवार को जबरदस्त मतदान देखने को मिला। राज्य की 142 सीटों पर सुबह से ही मतदान प्रक्रिया शुरू हुई, जिसमें 1,448 उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में कैद हो गई। शाम 5 बजे तक चुनाव आयोग के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार करीब 89.99 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया, जो बेहद अधिक माना जा रहा है।चुनाव प्रक्रिया को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने के लिए 2,300 से अधिक अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गई थी। हालांकि, कुछ इलाकों से टीएमसी और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच झड़प और तनाव की घटनाएं भी सामने आईं, जिससे कुछ समय के लिए मतदान प्रभावित हुआ।   अंतिम घंटे में भी जारी रहा मतदान निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया है कि अंतिम मतदान प्रतिशत में थोड़ा बदलाव संभव है, क्योंकि कई बूथों पर शाम 5 बजे के बाद भी कतार में खड़े मतदाताओं ने अपने वोट डाले। प्रशासन ने सभी जगहों पर शांतिपूर्ण मतदान का दावा किया है, जबकि संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात रहे।   ममता बनर्जी का बड़ा दावा, दो-तिहाई बहुमत से सरकार बनाने का भरोसा मतदान के बीच मुख्यमंत्री और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी ने बड़ा राजनीतिक बयान दिया। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से दावा किया कि भाजपा राज्य में हार की कगार पर है और तृणमूल कांग्रेस दो-तिहाई बहुमत के साथ फिर से सरकार बनाएगी। उनके इस बयान के बाद राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई है।

Anjali Kumari अप्रैल 29, 2026 0
West Bengal Elections 2026

पश्चिम बंगाल चुनाव 2026: दूसरे चरण में सुबह 9 बजे तक 18.39% मतदान

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