अभिषेक बनर्जी की विदेश यात्रा याचिका पर हाईकोर्ट का रुख, आंखों के इलाज के लिए विदेश जाने की अनुमति नहीं कोलकाता, एजेंसियां। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी को आंखों के इलाज के लिए विदेश जाने की अनुमति देने से कलकत्ता हाईकोर्ट ने इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि फिलहाल विदेश जाने की अनुमति देने के बजाय पहले कोलकाता के एसएसकेएम अस्पताल में उनकी आंखों की स्थिति का विशेषज्ञों से मूल्यांकन कराया जाए। विदेश जाकर इलाज की मांगी थी अनुमति अभिषेक बनर्जी ने अदालत से विदेश जाकर आंखों का विशेष उपचार कराने की अनुमति मांगी थी। यह मांग उस मामले में लगाई गई अंतरिम सुरक्षा की शर्तों में संशोधन के लिए की गई थी, जिसमें उनके खिलाफ चुनाव प्रचार के दौरान कथित आपत्तिजनक बयानों को लेकर जांच चल रही है। हाईकोर्ट ने पहले भी उन्हें जांच में सहयोग करने का निर्देश दिया था और अदालत की अनुमति के बिना विदेश यात्रा पर रोक लगाई थी। हाईकोर्ट ने पहले भारत में इलाज कराने को कहा 20 जुलाई को न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य की एकल पीठ ने विदेश यात्रा की अनुमति देने से इनकार करते हुए अभिषेक बनर्जी को पहले एसएसकेएम मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, कोलकाता के विशेषज्ञों से परामर्श लेने को कहा था। अदालत ने कहा था कि कोलकाता में भी आंखों के इलाज के लिए विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जल्द सुनवाई का दिया निर्देश हाईकोर्ट के इस रुख के बाद अभिषेक बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। 3 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट से उनकी विदेश यात्रा की लंबित याचिका पर जल्द सुनवाई कर फैसला लेने का अनुरोध किया। शीर्ष अदालत ने मामले को एक सप्ताह के भीतर देखने को कहा था। अब हाईकोर्ट के ताजा रुख के बाद अभिषेक बनर्जी के लिए विदेश जाकर आंखों का इलाज कराने का रास्ता फिलहाल साफ नहीं हुआ है। मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया और चिकित्सा संबंधी रिपोर्ट महत्वपूर्ण होगी।
तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी के आमतला स्थित निर्वाचन क्षेत्र कार्यालय पर चल रही ध्वस्तीकरण कार्रवाई पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने जुलाई के अंत तक परिसर में किसी भी तरह की तोड़फोड़ या बदलाव पर रोक लगाते हुए यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया है। रविवार को हुई विशेष सुनवाई मामले की गंभीरता को देखते हुए जस्टिस राजा बसु चौधरी की एकल पीठ ने रविवार को विशेष अदालत लगाकर सुनवाई की। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि विवादित इमारत से जुड़े सभी जरूरी दस्तावेज अगली सुनवाई में पेश किए जाएं। 'लीप्स एंड बाउंड्स' कंपनी ने दी थी चुनौती ध्वस्तीकरण कार्रवाई को 'लीप्स एंड बाउंड्स' कंपनी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। सुनवाई के दौरान बताया गया कि विवादित भवन इसी कंपनी के स्वामित्व में है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) के पूर्व दावों के अनुसार, अभिषेक बनर्जी इस कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) रहे हैं। नियमित पीठ करेगी विस्तृत सुनवाई हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि फिलहाल जुलाई के अंत तक यथास्थिति बनी रहेगी। इसके बाद मामले की विस्तृत सुनवाई नियमित पीठ के समक्ष होगी, जहां दोनों पक्षों की दलीलों पर विस्तार से विचार किया जाएगा। प्रशासन ने क्यों शुरू की थी कार्रवाई? दक्षिण 24 परगना जिला प्रशासन ने शनिवार को भारी पुलिस बल की मौजूदगी में इमारत को तोड़ने की कार्रवाई शुरू की थी। प्रशासन का दावा है कि भवन बिना स्वीकृत नक्शे के बनाया गया था और निर्माण में भवन नियमों का उल्लंघन हुआ था, इसलिए कार्रवाई की गई। अभिषेक बनर्जी ने आरोपों को बताया गलत अभिषेक बनर्जी ने प्रशासन के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यह उनका आधिकारिक निर्वाचन क्षेत्र कार्यालय है। उनका दावा है कि भवन वैध रूप से खरीदी गई जमीन पर बनाया गया है और निर्माण के लिए सभी आवश्यक प्रशासनिक मंजूरियां ली गई थीं। अब अगली सुनवाई पर टिकी नजर हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद फिलहाल ध्वस्तीकरण की कार्रवाई रुक गई है। अब इस राजनीतिक और कानूनी विवाद पर अंतिम तस्वीर जुलाई के अंत में होने वाली अगली सुनवाई के बाद ही साफ हो सकेगी।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (LoP) की नियुक्ति को लेकर जारी राजनीतिक और कानूनी विवाद बुधवार को कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंच गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के वरिष्ठ विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय की ओर से दायर अपील पर आज हाईकोर्ट की खंडपीठ सुनवाई करेगी। याचिका में विधानसभा अध्यक्ष द्वारा बागी गुट के विधायक रीतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष नियुक्त किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई है। रीतब्रत बनर्जी की ओर से संविधान का हवाला मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान रीतब्रत बनर्जी की ओर से पेश अधिवक्ता ने न्यायमूर्ति शम्पा सरकार और न्यायमूर्ति अजय कुमार गुप्ता की खंडपीठ के सामने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि रीतब्रत बनर्जी की नेता प्रतिपक्ष के रूप में नियुक्ति संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून)के प्रावधानों के अनुरूप की गई है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सुनवाई बुधवार तक जारी रखने का निर्णय लिया। एकल पीठ ने अंतरिम राहत देने से किया था इनकार इससे पहले 18 जून को कलकत्ता हाईकोर्ट की एकल पीठ ने विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया था। अदालत ने मुख्य मामले की अगली सुनवाई के लिए 28 जुलाई की तारीख तय की थी। शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने खंडपीठ का किया रुख एकल पीठ के फैसले के बाद टीएमसी विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने खंडपीठ में अपील दायर की। उन्होंने अपनी याचिका में दावा किया कि नेता प्रतिपक्ष पद के लिए उनके नाम की अनदेखी की गई और रीतब्रत बनर्जी की नियुक्ति कानून के अनुरूप नहीं है। उन्होंने इस नियुक्ति को पूरी तरह गैर-कानूनी बताते हुए निरस्त करने की मांग की है। आज की सुनवाई पर टिकी राजनीतिक नजरें बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति को लेकर चल रहे इस विवाद पर अब सभी की नजरें कलकत्ता हाईकोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत के फैसले का असर राज्य की राजनीतिक स्थिति और विधानसभा के भीतर विपक्ष की भूमिका पर पड़ सकता है।
कोलकाता: तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सांसद महुआ मोइत्रा ने अपने खिलाफ दर्ज कथित नफरती भाषण के मामले में गिरफ्तारी की आशंका जताते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट का रुख किया है। उन्होंने अदालत से जांच के दौरान किसी भी दंडात्मक कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगाने और पुलिस पूछताछ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से कराने की अनुमति देने की मांग की है। मामले पर हाईकोर्ट 15 जुलाई को सुनवाई करेगा। गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक की मांग महुआ मोइत्रा ने अपनी याचिका में कहा है कि जांच के दौरान पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर सकती है। इसलिए उन्होंने अदालत से अनुरोध किया है कि अंतिम निर्णय तक उनके खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई न की जाए। इसके साथ ही उन्होंने व्यक्तिगत रूप से थाने में उपस्थित होने से छूट देने और वर्चुअल माध्यम से पूछताछ की अनुमति देने की भी मांग की है। हाईकोर्ट ने सुनवाई की तारीख तय की मामले का उल्लेख किए जाने पर न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य ने कहा कि याचिका पर 15 जुलाई को सुनवाई की जाएगी। अदालत ने महुआ मोइत्रा के वकील को सभी प्रतिवादियों को नोटिस भेजने का निर्देश भी दिया है। क्या है पूरा मामला? महुआ मोइत्रा के वकील ने अदालत को बताया कि हाल ही में नदिया जिले की एक निचली अदालत में पेशी के दौरान कुछ लोगों ने चेहरा ढककर उन पर अंडे फेंके और विरोध प्रदर्शन किया था। इस घटना के बाद महुआ मोइत्रा ने सोशल मीडिया पर कथित रूप से टिप्पणी की थी कि "जो लोग अपना चेहरा ढकते हैं, उन्हें बुर्का पहन लेना चाहिए।" इसी बयान को लेकर उनके खिलाफ नफरती भाषण का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज की गई है। पुलिस नोटिस पर जताई आपत्ति याचिका में कहा गया है कि पुलिस लगातार उन्हें थाने में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के लिए नोटिस भेज रही है। महुआ मोइत्रा की ओर से आशंका जताई गई है कि यदि वह थाने जाती हैं तो उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है या उनके साथ दोबारा हमला हो सकता है। इसी आधार पर उन्होंने अदालत से व्यक्तिगत उपस्थिति के बजाय ऑनलाइन पूछताछ की अनुमति देने की मांग की है। 15 जुलाई की सुनवाई पर टिकी नजर अब इस मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट 15 जुलाई को सुनवाई करेगा। अदालत यह तय करेगी कि महुआ मोइत्रा को गिरफ्तारी से अंतरिम राहत दी जाए या नहीं और क्या उन्हें वर्चुअल माध्यम से पूछताछ की अनुमति मिल सकती है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दुनिया में प्रतिस्पर्धा लगातार तेज होती जा रही है। इसी बीच OpenAI ने अपने नए फ्लैगशिप AI मॉडल GPT-5.6 Sol को पेश किया है। कंपनी का दावा है कि यह मॉडल स्वतंत्र Design Arena बेंचमार्क में Anthropic के Claude Fable 5 से आगे निकल गया है। इसके साथ ही OpenAI ने कहा कि GPT-5.6 Sol को कोडिंग, तर्क क्षमता (Reasoning), सुरक्षा और कई अन्य AI कार्यों में भी पहले के मुकाबले बेहतर बनाया गया है। Design Arena रैंकिंग में हासिल किया पहला स्थान OpenAI के अध्यक्ष ग्रेग ब्रॉकमैन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इस उपलब्धि की जानकारी साझा करते हुए इसे कंपनी के लिए एक बड़ा पड़ाव बताया। Design Arena द्वारा जारी फ्रंट-एंड डिज़ाइन लीडरबोर्ड के अनुसार, GPT-5.6 Sol ने 1353 Elo स्कोर के साथ पहला स्थान हासिल किया। वहीं, GLM 5.2 1351 अंकों के साथ दूसरे और Claude Fable 5 1345 अंकों के साथ तीसरे स्थान पर रहा। यह रैंकिंग AI मॉडल्स की वेब डिज़ाइन और फ्रंट-एंड डेवलपमेंट क्षमता के आधार पर तैयार की जाती है। क्या है GPT-5.6 फैमिली? OpenAI ने GPT-5.6 सीरीज़ के तहत तीन नए मॉडल लॉन्च किए हैं- GPT-5.6 Sol – जटिल कोडिंग, उन्नत रीजनिंग और AI एजेंट आधारित कार्यों के लिए। GPT-5.6 Terra – रोजमर्रा के कार्यों और संतुलित प्रदर्शन के लिए। GPT-5.6 Luna – कम लागत और तेज़ स्पीड वाले AI कार्यों के लिए। फिलहाल इन मॉडलों को सीमित संख्या में चुनिंदा डेवलपर्स और एंटरप्राइज पार्टनर्स के लिए उपलब्ध कराया गया है। आने वाले हफ्तों में इन्हें व्यापक स्तर पर उपलब्ध कराया जाएगा। नए फीचर्स से लैस है GPT-5.6 Sol OpenAI के अनुसार, GPT-5.6 Sol में कई नए फीचर्स शामिल किए गए हैं। इनमें प्रमुख हैं- Maximum Reasoning Mode, जो जटिल समस्याओं को बेहतर तरीके से हल करने में सक्षम है। Ultra Mode, जिसमें सब-एजेंट्स की मदद से कई चरणों वाले कार्य पूरे किए जा सकते हैं। वैज्ञानिक शोध, विशेषकर बायोलॉजी और साइबर सिक्योरिटी से जुड़े कार्यों में बेहतर प्रदर्शन। कम टोकन इस्तेमाल करते हुए अधिक प्रभावी परिणाम देने की क्षमता। सुरक्षा पर भी दिया गया खास ध्यान OpenAI का कहना है कि GPT-5.6 में सुरक्षा को पहले से अधिक मजबूत बनाया गया है। कंपनी के मुताबिक, मॉडल को साइबर दुरुपयोग, संवेदनशील जैविक जानकारी के गलत इस्तेमाल और सुरक्षा उपायों को दरकिनार करने जैसी संभावित चुनौतियों से बचाने के लिए व्यापक परीक्षण किए गए हैं। OpenAI ने बताया कि मॉडल की सुरक्षा जांच के लिए लाखों GPU घंटों तक ऑटोमेटेड रेड-टीमिंग और विशेषज्ञों द्वारा परीक्षण किए गए। कब मिलेगा GPT-5.6? फिलहाल GPT-5.6 API और Codex के जरिए चुनिंदा पार्टनर्स के लिए उपलब्ध है। OpenAI ने संकेत दिया है कि आने वाले कुछ सप्ताह में इसे ChatGPT प्लेटफॉर्म पर भी चरणबद्ध तरीके से जारी किया जाएगा। कितनी होगी कीमत? OpenAI ने GPT-5.6 मॉडल्स की API कीमतें भी घोषित की हैं- GPT-5.6 Sol – 5 डॉलर प्रति मिलियन इनपुट टोकन और 30 डॉलर प्रति मिलियन आउटपुट टोकन GPT-5.6 Terra – 2.5 डॉलर प्रति मिलियन इनपुट और 15 डॉलर प्रति मिलियन आउटपुट टोकन GPT-5.6 Luna – 1 डॉलर प्रति मिलियन इनपुट और 6 डॉलर प्रति मिलियन आउटपुट टोकन AI प्रतिस्पर्धा में बढ़ी टक्कर GPT-5.6 Sol के लॉन्च के साथ OpenAI और Anthropic के बीच प्रतिस्पर्धा और तेज होने की उम्मीद है। बेहतर डिज़ाइन क्षमता, उन्नत कोडिंग, मजबूत रीजनिंग और सुरक्षा फीचर्स के साथ OpenAI अपने नए मॉडल को डेवलपर्स और एंटरप्राइज ग्राहकों के लिए अधिक सक्षम विकल्प के रूप में पेश कर रहा है।
West Bengal Gunda Act News: पश्चिम बंगाल सरकार के नए ‘पश्चिम बंगाल जन सुरक्षा एवं असामाजिक गतिविधियों पर नियंत्रण अधिनियम, 2026’ (गुंडा रोधी कानून) के लागू होते ही इसे कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस मामले में तत्काल सुनवाई से इनकार करते हुए कहा कि याचिका पर नियमित प्रक्रिया के तहत सुनवाई होगी। कानून लागू होते ही दायर हुई जनहित याचिका सोमवार से लागू हुए इस कानून के खिलाफ मानवाधिकार कार्यकर्ता मिलन मालाकार ने कलकत्ता हाईकोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दाखिल की है। याचिका में कानून को असंवैधानिक बताते हुए इसके क्रियान्वयन पर तत्काल रोक लगाने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि कानून के कई प्रावधान नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं और इसका दुरुपयोग होने की आशंका है। हाईकोर्ट ने तत्काल सुनवाई से किया इनकार कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तपब्रत चक्रवर्ती और न्यायमूर्ति पार्थसारथी चटर्जी की खंडपीठ के समक्ष याचिकाकर्ता के वकील सब्यसाची चटर्जी ने मामले की तत्काल सुनवाई की मांग की। हालांकि, अदालत ने इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया और कहा कि मामले की सुनवाई सामान्य न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार तय की जाएगी। कानून के किन प्रावधानों पर उठ रहे हैं सवाल? याचिका में कानून की कई धाराओं को संविधान के विरुद्ध बताया गया है। प्रमुख आपत्तियां इस प्रकार हैं: बिना मुकदमे के 12 महीने तक हिरासत कानून के तहत जिलाधिकारी और पुलिस आयुक्त को यह अधिकार दिया गया है कि वे किसी व्यक्ति को भविष्य में असामाजिक गतिविधियों की आशंका के आधार पर बिना मुकदमा चलाए अधिकतम एक वर्ष तक निवारक हिरासत में रख सकते हैं। वकील की सहायता पर प्रतिबंध कानून की धारा 10(4) के अनुसार, हिरासत में लिए गए व्यक्ति को सलाहकार बोर्ड के समक्ष सामान्य रूप से अपने वकील के माध्यम से पक्ष रखने की अनुमति नहीं होगी, जब तक कि बोर्ड विशेष अनुमति न दे। ‘गुंडा’ की परिभाषा पर विवाद याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि कानून में ‘गुंडा’ और ‘असामाजिक गतिविधियों’ की परिभाषा अत्यधिक व्यापक और अस्पष्ट है। इससे राजनीतिक विरोध, शांतिपूर्ण प्रदर्शन या असहमति व्यक्त करने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई की आशंका है। राज्य सरकार का क्या कहना है? राज्य सरकार का कहना है कि यह कानून राजनीतिक हिंसा, रंगदारी, संगठित अपराध और असामाजिक गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण के उद्देश्य से लाया गया है। सरकार के अनुसार, राज्य में कानून-व्यवस्था को मजबूत करने और अपराध पर सख्ती से रोक लगाने के लिए इस तरह के कानून की आवश्यकता थी। विपक्ष और मानवाधिकार संगठनों का विरोध विपक्षी दलों और कई मानवाधिकार संगठनों ने इस कानून का विरोध किया है। उनका आरोप है कि इससे प्रशासन और पुलिस को अत्यधिक अधिकार मिल जाएंगे, जिनका दुरुपयोग हो सकता है। कानूनी विशेषज्ञों की राय कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि नए कानून के कई प्रावधान राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) जैसी निवारक हिरासत की व्यवस्था से मिलते-जुलते हैं। उनका मानना है कि यदि इन शक्तियों के उपयोग पर पर्याप्त निगरानी नहीं रही, तो नागरिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों पर प्रभाव पड़ सकता है। अब इस मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट नियमित सुनवाई के दौरान कानून की संवैधानिक वैधता और याचिकाकर्ताओं की आपत्तियों पर विचार करेगा।
उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रही महिलाओं के लिए अच्छी खबर है। UP Anganwadi Bharti 2026 के तहत राज्य के छह नए जिलों में 1110 आंगनवाड़ी कार्यकर्ता पदों पर भर्ती के लिए आवेदन प्रक्रिया शुरू हो गई है। इच्छुक और पात्र महिला अभ्यर्थी अपने जिले के अनुसार निर्धारित अंतिम तिथि तक ऑनलाइन आवेदन कर सकती हैं। यह भर्ती आगरा, मथुरा, संभल, औरैया, श्रावस्ती और चंदौली जिलों में की जाएगी। आवेदन केवल ऑनलाइन माध्यम से स्वीकार किए जाएंगे। किन जिलों में कितने पद? यूपी सरकार द्वारा जारी भर्ती अधिसूचना के अनुसार विभिन्न जिलों में रिक्त पद इस प्रकार हैं- जिला रिक्त पद आवेदन की अंतिम तिथि आगरा 322 25 जुलाई 2026 मथुरा 236 24 जुलाई 2026 औरैया 181 28 जुलाई 2026 संभल 177 28 जुलाई 2026 चंदौली 126 25 जुलाई 2026 श्रावस्ती 68 27 जुलाई 2026 कुल 1110 - कौन कर सकता है आवेदन? भर्ती में आवेदन करने के लिए उम्मीदवार को निम्नलिखित पात्रता पूरी करनी होगी- केवल महिला अभ्यर्थी आवेदन कर सकती हैं। किसी मान्यता प्राप्त बोर्ड से 12वीं पास होना आवश्यक है। ग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट उम्मीदवार भी आवेदन के पात्र हैं। अभ्यर्थी की आयु 18 से 35 वर्ष के बीच होनी चाहिए। आयु की गणना 1 जुलाई 2026 के आधार पर की जाएगी। ग्रामीण क्षेत्र की उम्मीदवार संबंधित ग्राम सभा और शहरी क्षेत्र की उम्मीदवार संबंधित वार्ड की निवासी होनी चाहिए। कैसे होगा चयन? इस भर्ती में किसी प्रकार की लिखित परीक्षा नहीं होगी। उम्मीदवारों का चयन शैक्षणिक योग्यता के आधार पर तैयार की जाने वाली मेरिट लिस्ट से किया जाएगा। मेरिट 12वीं, समकक्ष योग्यता, स्नातक या स्नातकोत्तर में प्राप्त अंकों के आधार पर बनेगी। 10वीं के अंक मेरिट में शामिल नहीं किए जाएंगे। CGPA या ग्रेडिंग सिस्टम से प्राप्त अंकों को निर्धारित नियमों के अनुसार प्रतिशत में बदला जाएगा। आवेदन कैसे करें? उम्मीदवार नीचे दिए गए आसान चरणों का पालन करके आवेदन कर सकते हैं- आधिकारिक वेबसाइट upanganwadibharti.in पर जाएं। अपने जिले की भर्ती अधिसूचना चुनें। Apply Online/New Registration पर क्लिक करें। आधार नंबर और मोबाइल नंबर से पंजीकरण करें। आवेदन फॉर्म में सभी आवश्यक जानकारी भरें। फोटो, हस्ताक्षर और जरूरी दस्तावेज अपलोड करें। सभी विवरण जांचकर फॉर्म सबमिट करें। भविष्य के लिए आवेदन पत्र का प्रिंट या PDF सुरक्षित रखें। समय रहते करें आवेदन हर जिले के लिए आवेदन की अंतिम तिथि अलग-अलग तय की गई है। ऐसे में उम्मीदवारों को सलाह दी जाती है कि अंतिम तिथि का इंतजार न करें और सभी आवश्यक दस्तावेज तैयार रखकर समय पर आवेदन प्रक्रिया पूरी करें।
कोलकाता, एजेंसियां। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को कलकत्ता हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। पार्टी के तीन बैंक खातों में जमा करीब 440 करोड़ रुपये फ्रीज किए जाने के मामले में अदालत ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए सीमित वित्तीय लेन-देन की अनुमति दे दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि टीएमसी अपने दैनिक संगठनात्मक कार्य, प्रशासनिक खर्च और अदालतों में चल रहे मामलों से जुड़े कानूनी खर्चों के लिए इन खातों से राशि निकाल सकती है। हालांकि, खातों का संचालन पूरी तरह पार्टी के नियंत्रण में नहीं होगा। स्पेशल ऑफिसर रखेंगे हर लेन-देन पर नजर जस्टिस सौगत भट्टाचार्य की एकल पीठ ने वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए पूर्व न्यायाधीश सुब्रत तालुकदार को स्पेशल ऑफिसर नियुक्त किया है। वे 30 सितंबर 2026 तक खातों के संचालन और धन निकासी की निगरानी करेंगे। अदालत के निर्देशानुसार, पार्टी के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता द्वारा जारी प्रत्येक चेक पर स्पेशल ऑफिसर के काउंटर सिग्नेचर के बाद ही बैंक भुगतान करेगा। केवल आवश्यक खर्चों की अनुमति हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि खातों से केवल नियमित संगठनात्मक खर्च, कर्मचारियों के वेतन और कानूनी मामलों से जुड़े भुगतान ही किए जा सकेंगे। किसी भी बड़े, असामान्य या पूंजीगत खर्च पर फिलहाल रोक रहेगी। अदालत का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जांच पूरी होने तक धन का उपयोग केवल आवश्यक कार्यों के लिए ही हो। पुलिस कार्रवाई पर अदालत ने जताई नाराजगी सुनवाई के दौरान अदालत ने शिकायत दर्ज होने के महज 24 घंटे के भीतर बैंक खाते फ्रीज किए जाने पर सवाल उठाए। कोर्ट ने टिप्पणी की कि सामान्य मामलों में पुलिस की कार्रवाई धीमी रहती है, लेकिन इस प्रकरण में असाधारण तेजी दिखाई गई, जिसके पर्याप्त कारण रिकॉर्ड पर नजर नहीं आते। गुटबाजी पर फैसला नहीं, अगली सुनवाई सितंबर में टीएमसी के भीतर नेतृत्व विवाद को लेकर उठे सवालों पर अदालत ने कहा कि यह आदेश केवल अंतरिम राहत के लिए है और इससे किसी भी गुट के वैध होने का फैसला नहीं माना जाएगा। पार्टी के वास्तविक नेतृत्व का मुद्दा अभी निर्वाचन आयोग के समक्ष विचाराधीन है। इस मामले की अगली सुनवाई 21 सितंबर 2026 को होगी, जिसमें आगे की स्थिति पर निर्णय लिया जाएगा।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल के कृष्णानगर से तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सांसद महुआ मोइत्रा पर कथित तौर पर अंडे, बैंगन और कीचड़ फेंके जाने के मामले ने अब कानूनी मोड़ ले लिया है। घटना के बाद महुआ मोइत्रा ने कलकत्ता हाईकोर्ट का रुख करते हुए सुरक्षा और कानूनी संरक्षण की मांग की है। उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी शिकायत पर पुलिस ने गंभीरता से कार्रवाई नहीं की, जबकि उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर पर तेजी दिखाई जा रही है। हाईकोर्ट ने याचिका दाखिल करने की दी अनुमति शुक्रवार को न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य की अदालत में महुआ मोइत्रा की ओर से याचिका दायर करने की अनुमति मांगी गई। उनके वकील ने अदालत को बताया कि पुलिस का रवैया पक्षपातपूर्ण है और उनकी शिकायत को नजरअंदाज किया जा रहा है। दलीलें सुनने के बाद अदालत ने याचिका दाखिल करने की अनुमति दे दी। अब अगली सुनवाई में इस मामले में पुलिस की भूमिका और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अदालत का रुख स्पष्ट हो सकता है। कार्यकर्ता सभा के दौरान हुआ था विरोध प्रदर्शन यह पूरा मामला एक जुलाई को नदिया जिले के कालीगंज में आयोजित टीएमसी की कार्यकर्ता सभा से जुड़ा है। महुआ मोइत्रा कार्यक्रम में मौजूद थीं, तभी पार्टी कार्यालय के बाहर राष्ट्रीय राजमार्ग पर काले झंडे लेकर बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी जमा हो गए। आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने “गो बैक” और “हाय-हाय” के नारे लगाए और पार्टी कार्यालय की खिड़की की ओर अंडे, बैंगन और कीचड़ फेंके। इतना ही नहीं, टीएमसी कार्यकर्ताओं और महुआ को बाहर निकलने से रोकने की भी कोशिश की गई। पुलिस पर निष्क्रिय रहने का आरोप घटना के बाद महुआ मोइत्रा ने सोशल मीडिया पर कई वीडियो साझा कर दावा किया कि प्रदर्शनकारी भाजपा समर्थक थे और पुलिस पूरे घटनाक्रम के दौरान मूकदर्शक बनी रही। उन्होंने कहा कि पुलिस ने न तो भीड़ को हटाने की कोशिश की और न ही हमलावरों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की। महुआ का कहना है कि यह केवल राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षा और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर मामला है। अब इस पूरे विवाद पर हाईकोर्ट की अगली सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रहे SIR ट्रिब्यूनल को एक और झटका लगा है। सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजीत कुमार बाग ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए ट्रिब्यूनल से इस्तीफा दे दिया है। इससे पहले भी एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश इस ट्रिब्यूनल से अलग हो चुके हैं। स्वास्थ्य कारणों से दिया इस्तीफा सूत्रों के अनुसार, सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजीत कुमार बाग ने खराब स्वास्थ्य के कारण ट्रिब्यूनल में अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होने का निर्णय लिया। उनके इस्तीफे के बाद ट्रिब्यूनल की कार्यप्रणाली को लेकर एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई है। पहले भी दे चुके हैं जज इस्तीफा इससे पहले मई में T. S. Sivagnanam ने भी SIR ट्रिब्यूनल से इस्तीफा दिया था। लगातार दो वरिष्ठ न्यायाधीशों के हटने से ट्रिब्यूनल के कामकाज पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हुआ था गठन SIR ट्रिब्यूनल का गठन Supreme Court of India के निर्देश पर तत्कालीन Calcutta High Court के मुख्य न्यायाधीश Sujoy Paul द्वारा किया गया था। इस ट्रिब्यूनल का उद्देश्य मतदाता सूची से बाहर हुए लोगों के मामलों की जांच करना और उनके दस्तावेजों का सत्यापन कर उचित निर्णय देना है। 27 लाख मामलों के निपटारे की जिम्मेदारी ट्रिब्यूनल के सामने करीब 27 लाख मामलों के निपटारे की जिम्मेदारी है। इनमें उन लोगों के आवेदन शामिल हैं, जिनके नाम मतदाता सूची से हट गए हैं। दस्तावेजों की जांच की जा रही है और कई आवेदकों से फोन के माध्यम से भी संपर्क किया जा रहा है। शिक्षक भर्ती घोटाले की जांच से भी जुड़ा रहा नाम सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजीत कुमार बाग इससे पहले पश्चिम बंगाल के चर्चित शिक्षक भर्ती मामले की जांच से भी जुड़े रहे हैं। उनकी अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट के आधार पर कथित भर्ती अनियमितताओं का मामला सामने आया था, जिसके बाद जांच केंद्रीय एजेंसी को सौंप दी गई थी। ट्रिब्यूनल से उनके इस्तीफे की वजह केवल स्वास्थ्य संबंधी बताई गई है और इसे किसी अन्य विवाद से नहीं जोड़ा गया है।
पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) प्रमुख ममता बनर्जी ने भवानीपुर विधानसभा सीट के चुनाव परिणाम को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी है। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता एवं मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की जीत के खिलाफ चुनाव याचिका दायर की है। 15,105 वोटों से मिली थी हार भवानीपुर विधानसभा सीट पर भाजपा उम्मीदवार शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को 15,105 वोटों के अंतर से पराजित किया था। इस जीत के बाद शुभेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बने। हाईकोर्ट की रजिस्ट्री पहुंचीं ममता टीएमसी सूत्रों के मुताबिक, ममता बनर्जी चुनाव याचिका की औपचारिक पुष्टि (वेरिफिकेशन) के लिए मंगलवार को कलकत्ता हाईकोर्ट की रजिस्ट्री पहुंचीं। पार्टी का कहना है कि चुनाव परिणाम को लेकर कानूनी प्रक्रिया के तहत अदालत में चुनौती दी गई है। 4 मई को हुई थी मतगणना पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की मतगणना 4 मई को हुई थी। चुनाव में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला, जिसके बाद शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। अब क्या होगा आगे? चुनाव याचिका दायर होने के बाद कलकत्ता हाईकोर्ट मामले की सुनवाई करेगा। अदालत तय करेगी कि याचिका स्वीकार करने के पर्याप्त आधार हैं या नहीं। इसके बाद चुनाव परिणाम से जुड़े तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विस्तृत सुनवाई हो सकती है।
कोलकाता, एजेंसियां। कोलकाता में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर मतभेद उस समय खुलकर सामने आ गए जब पार्टी के वरिष्ठ सांसद और जाने-माने वकील कल्याण बनर्जी ने सांसद अभिषेक बनर्जी के किसी भी कानूनी मामले की पैरवी करने से इनकार कर दिया। कल्याण बनर्जी ने आरोप लगाया कि अभिषेक बनर्जी का व्यवहार अत्यधिक घमंडी है और इसी कारण उन्होंने उनसे जुड़े सभी मामलों से खुद को अलग करने का फैसला किया है। मामला उस याचिका से जुड़ा है जिसमें अभिषेक बनर्जी ने पश्चिम बंगाल पुलिस की सीआईडी द्वारा भेजे गए समन को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी है। यह समन विधायकों के हस्ताक्षर मिलान (सिग्नेचर मिसमैच) मामले से संबंधित बताया जा रहा है। साथ ही याचिका में गिरफ्तारी या किसी भी प्रकार की जबरन कार्रवाई से अंतरिम राहत की मांग की गई है। गुरुवार को इस मामले की सुनवाई के दौरान अभिषेक की ओर से वकील अयान भट्टाचार्य अदालत में पेश हुए। कल्याण बनर्जी ने मीडिया से बातचीत में कहा कल्याण बनर्जी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि उन्होंने न केवल इस मामले बल्कि भविष्य में भी अभिषेक बनर्जी के किसी कानूनी प्रकरण में शामिल न होने का निर्णय लिया है। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने स्वयं अदालत में मामले की तत्काल सुनवाई की मांग की थी, जिसके बाद सुनवाई की तारीख तय हुई। लेकिन बाद में उन्हें जानकारी मिली कि उनकी जगह किसी अन्य वकील को नियुक्त किया गया है। वरिष्ठ सांसद ने यह भी आरोप लगाया वरिष्ठ सांसद ने यह भी आरोप लगाया कि हालिया विधानसभा चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारणों में अभिषेक बनर्जी की भूमिका रही है, फिर भी उनके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया। कल्याण बनर्जी ने कहा कि वह मुख्यमंत्री और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी से इस मुद्दे पर स्पष्ट निर्णय लेने का आग्रह करेंगे। उन्होंने कहा कि चार दशक से अधिक समय से कानूनी पेशे में रहने के बाद वह किसी भी प्रकार के अपमानजनक या अहंकारी व्यवहार को स्वीकार नहीं करेंगे। इस बयान के बाद टीएमसी के भीतर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है और पार्टी नेतृत्व की प्रतिक्रिया पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में जारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की अंदरूनी खींचतान अब अदालत तक पहुंच गई है। पार्टी ने कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिका दायर कर विधानसभा अध्यक्ष के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें बागी नेता रीतब्रत बनर्जी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दी गई थी। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति कृष्णा राव की अदालत में होगी। कोर्ट ने इस याचिका को प्राथमिकता के आधार पर सूचीबद्ध करते हुए 11 जून को विस्तृत सुनवाई की तारीख तय की है। विधानसभा अध्यक्ष के फैसले पर कानूनी आपत्ति टीएमसी की ओर से दायर याचिका में विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय को चुनौती दी गई है। पार्टी का तर्क है कि नेता प्रतिपक्ष की मान्यता से जुड़ा फैसला पार्टी की आधिकारिक स्थिति और संगठनात्मक निर्णयों के अनुरूप नहीं है। याचिका में विधानसभा अध्यक्ष को मुख्य प्रतिवादी बनाया गया है। पार्टी का कहना है कि अध्यक्ष के फैसले के कारण विधानसभा के भीतर संवैधानिक और राजनीतिक विवाद पैदा हुआ है। बागी गुट के समर्थन से बढ़ा विवाद विवाद की जड़ टीएमसी विधायकों के भीतर उभरा मतभेद है। विधानसभा चुनाव 2026 के बाद विपक्ष की भूमिका में पहुंची टीएमसी के 80 विधायकों में से बड़ी संख्या ने कथित तौर पर रीतब्रत बनर्जी के समर्थन में रुख अपनाया। इसी समर्थन के आधार पर विधानसभा अध्यक्ष ने रीतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता प्रदान की थी। पार्टी नेतृत्व इस फैसले को चुनौती दे रहा है और आधिकारिक उम्मीदवार के पक्ष में अपनी दलील रख रहा है। नेता प्रतिपक्ष पद को लेकर बढ़ी राजनीतिक लड़ाई टीएमसी नेतृत्व का दावा है कि पार्टी के संगठनात्मक निर्णयों की अनदेखी कर नेता प्रतिपक्ष के चयन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। वहीं बागी गुट का तर्क है कि उन्हें पर्याप्त विधायकों का समर्थन प्राप्त है और इसी आधार पर उन्हें मान्यता मिली है। इस विवाद ने विधानसभा के भीतर विपक्ष की भूमिका और टीएमसी के आंतरिक नेतृत्व को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। विधानसभा में बदला राजनीतिक समीकरण 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने स्पष्ट बहुमत हासिल कर सरकार बनाई, जबकि टीएमसी मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी। चुनाव परिणामों के बाद पार्टी के भीतर उभरे मतभेदों ने उसके सामने नई राजनीतिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। अब सभी की निगाहें 11 जून को होने वाली हाईकोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत का फैसला न केवल नेता प्रतिपक्ष के पद की वैधता तय करेगा, बल्कि राज्य की विपक्षी राजनीति और टीएमसी के आंतरिक शक्ति संतुलन पर भी असर डाल सकता है।
West Bengal सरकार ने राज्य की OBC आरक्षण व्यवस्था में बड़ा बदलाव करते हुए आरक्षण को 17% से घटाकर 7% कर दिया है। नई सूची के अनुसार अब केवल 66 जातियां ही OBC आरक्षण के दायरे में रहेंगी। इसके साथ ही धर्म आधारित वर्गीकरण की व्यवस्था भी समाप्त कर दी गई है। राज्य सरकार का कहना है कि यह फैसला Calcutta High Court के 2024 के आदेश के आधार पर लिया गया है। हाईकोर्ट ने 2010 से 2012 के बीच OBC सूची में 77 अतिरिक्त जातियों को शामिल करने की प्रक्रिया को अवैध और असंवैधानिक बताया था। हालांकि, 2010 से पहले OBC सूची में शामिल जातियों का दर्जा बरकरार रहेगा। साथ ही, पहले से OBC कोटे के तहत नौकरी पा चुके लोगों की नियुक्तियों पर भी इस फैसले का कोई असर नहीं पड़ेगा। ममता सरकार की OBC-A और OBC-B व्यवस्था खत्म Mamata Banerjee सरकार ने पहले OBC आरक्षण को दो वर्गों में बांटा था। OBC-A को 10% और OBC-B को 7% आरक्षण दिया जा रहा था। इसी दौरान कई नई जातियों को भी सूची में शामिल किया गया था। इसी व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट ने 2024 में फैसला सुनाया था। कोर्ट के आदेश के बाद 2010 के बाद जारी करीब 12 लाख OBC प्रमाणपत्र रद्द हो गए थे। नई सूची में किन जातियों को मिला स्थान नई OBC सूची में कपाली, कुर्मी, सुध्राधार, कर्मकार, सूत्रधार, स्वर्णकार, नाई, तांती, धनुक, कसाई, खंडायत, तुरहा, देवांग और गोआला जैसी जातियां शामिल हैं। वहीं पहाड़िया, हज्जाम और चौधुली जैसे तीन मुस्लिम समुदायों को भी सूची में रखा गया है। राज्य मंत्री Agnimitra Paul ने कैबिनेट बैठक के बाद कहा कि सरकार OBC ढांचे की नई समीक्षा करेगी। इसके लिए जांच समिति बनाई जाएगी और जरूरत पड़ने पर कानूनी प्रक्रिया के तहत कुछ समूहों को दोबारा सूची में शामिल किया जा सकता है। बंगाल कैबिनेट के 7 बड़े फैसले सरकारी नौकरियों में उम्र सीमा 5 साल बढ़ी राज्य कैबिनेट ने सरकारी नौकरियों के लिए अधिकतम आयु सीमा 5 साल बढ़ाने का फैसला किया है। अब ग्रुप-A पदों के लिए उम्र सीमा 41 साल, ग्रुप-B के लिए 44 साल और ग्रुप C-D के लिए 45 साल होगी। यह नियम 11 मई से लागू होगा। भ्रष्टाचार जांच के लिए रिटायर्ड जज की कमेटी सरकार ने संस्थागत भ्रष्टाचार की जांच के लिए Justice Bishwajit Basu की अध्यक्षता में जांच पैनल बनाने को मंजूरी दी है। यह कमेटी सरकारी योजनाओं, निर्माण कार्यों और सेवा वितरण में कथित घोटालों की जांच करेगी। महिलाओं और बच्चियों पर अत्याचार की जांच महिलाओं, बच्चियों, SC-ST और अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े मामलों की जांच के लिए Justice Samapti Chatterjee की अध्यक्षता में दूसरी कमेटी बनाई जाएगी। शिकायत दर्ज कराने के लिए पोर्टल, ईमेल और व्हाट्सऐप सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। धार्मिक आधार पर मिलने वाला मानदेय बंद राज्य सरकार ने 1 जून से इमाम, मुअज्जिन और पुजारियों को दिए जाने वाले सरकारी मानदेय को बंद करने का फैसला लिया है। अभी तक इमामों को 3000 रुपए और मुअज्जिन तथा पुजारियों को 2000 रुपए मासिक सहायता दी जाती थी। महिलाओं को हर महीने 3000 रुपए कैबिनेट ने ‘अन्नपूर्णा योजना’ को मंजूरी दी है। इसके तहत महिलाओं को हर महीने 3000 रुपए की आर्थिक सहायता दी जाएगी। योजना का लाभ सीधे बैंक खातों में भेजा जाएगा। महिलाओं के लिए सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा 1 जून से महिलाओं को सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा मिलेगी। हालांकि सरकार ने फिलहाल बसों की संख्या बढ़ाने की कोई घोषणा नहीं की है। 7वें वेतन आयोग को मंजूरी राज्य सरकार ने कर्मचारियों के वेतन संशोधन के लिए 7वें राज्य वेतन आयोग के गठन को मंजूरी दे दी है। इसका लाभ सरकारी कर्मचारियों के साथ नगर निकायों और सरकारी शिक्षण संस्थानों के कर्मचारियों को भी मिलेगा।
चुनाव बाद हिंसा से जुड़ी याचिका पर खुद करेंगी पैरवी पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख Mamata Banerjee गुरुवार को वकील की पोशाक पहनकर Calcutta High Court पहुंचीं। बताया जा रहा है कि वह विधानसभा चुनाव के बाद हुई हिंसा से जुड़े एक जनहित याचिका (PIL) मामले में खुद अदालत के सामने दलीलें पेश करेंगी। सूत्रों के मुताबिक यह मामला मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पाल की बेंच में सूचीबद्ध है, जहां ममता बनर्जी कार्यवाही और जांच से जुड़े कई पहलुओं पर सवाल उठा सकती हैं। अदालत परिसर में उन्हें वकीलों के पारंपरिक काले चोगे में देखा गया, जिसके बाद यह मामला राजनीतिक और कानूनी हलकों में चर्चा का विषय बन गया। पहले भी सुप्रीम कोर्ट में पेश कर चुकी हैं दलील यह पहला मौका नहीं है जब ममता बनर्जी अदालत में वकील की भूमिका में नजर आई हों। इससे पहले वह एसआईआर मुद्दे को लेकर Supreme Court of India में भी बतौर अधिवक्ता अपना पक्ष रख चुकी हैं। जानकारी के अनुसार, यह याचिका टीएमसी नेता और वरिष्ठ वकील Kalyan Banerjee के बेटे शीर्षान्या बंदोपाध्याय की ओर से दाखिल की गई थी। ममता बनर्जी ने वर्ष 1982 में जोगेश चंद्र कॉलेज ऑफ लॉ से कानून की पढ़ाई पूरी की थी। बंगाल चुनाव के बाद बढ़ा राजनीतिक तनाव गौरतलब है कि हाल ही में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी को बड़ी हार का सामना करना पड़ा। चुनाव में बीजेपी ने 207 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि टीएमसी 80 सीटों तक सिमट गई। इसके बाद राज्य की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया। ममता बनर्जी लगातार आरोप लगाती रही हैं कि बीजेपी ने चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी कर करीब 100 सीटें “छीन” लीं। वहीं, बीजेपी नेता Suvendu Adhikari ने 9 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों से ठीक पहले सियासी घमासान अब अदालत तक पहुंच गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए भारत का सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। इस मामले पर शनिवार को विशेष सुनवाई होनी है, जिससे 4 मई को होने वाली मतगणना से पहले सस्पेंस और बढ़ गया है। क्या है पूरा विवाद? विवाद की जड़ चुनाव प्रक्रिया और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े हाईकोर्ट के निर्देश हैं। अदालत ने हाल ही में मतगणना केंद्रों की सुरक्षा, केंद्रीय कर्मचारियों की तैनाती और कुछ याचिकाओं (जैसे पुनर्मतदान) पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां की थीं। इससे पहले भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) ने निर्देश दिया था कि हर काउंटिंग सेंटर पर कम से कम एक केंद्रीय कर्मचारी की मौजूदगी सुनिश्चित की जाएगी। TMC ने इस फैसले का विरोध किया और इसे पक्षपातपूर्ण बताते हुए हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। TMC की दलील क्या है? TMC का कहना है कि चुनाव के अंतिम चरण में इस तरह के निर्देशों से मतगणना प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। पार्टी का आरोप है कि इससे निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो सकते हैं न्यायिक हस्तक्षेप से प्रशासनिक प्रक्रिया जटिल हो सकती है इससे चुनाव परिणामों की विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है इन्हीं तर्कों के आधार पर पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई क्यों अहम? शनिवार को होने वाली सुनवाई कई मायनों में बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अगर सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाता है, तो TMC को बड़ी राहत मिलेगी अगर रोक नहीं लगती, तो हाईकोर्ट के निर्देशों के तहत ही मतगणना होगी यह मामला चुनाव के दौरान अदालत की भूमिका को लेकर एक नई नजीर भी पेश कर सकता है क्या रुक सकती है मतगणना? फिलहाल उपलब्ध जानकारी के अनुसार मतगणना (4 मई) पर रोक लगने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है। आमतौर पर अदालतें चुनाव प्रक्रिया में अंतिम चरण में दखल देने से बचती हैं, जब तक कि कोई गंभीर संवैधानिक या कानूनी समस्या न हो। इसलिए ज्यादा संभावना यही है कि: मतगणना तय समय पर होगी सुप्रीम कोर्ट केवल प्रक्रिया या निर्देशों में बदलाव कर सकता है विपक्ष का क्या कहना है? अन्य राजनीतिक दल, खासकर बीजेपी, TMC के इस कदम को हार के डर से उठाया गया कदम बता रहे हैं। उनका कहना है कि चुनाव परिणाम से पहले कानूनी विवाद खड़ा करना राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है। सुरक्षा और हिंसा पर पहले से सख्ती गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने पहले ही चुनाव बाद हिंसा को लेकर कड़े निर्देश दिए हैं। राज्य में सुरक्षा के लिए केंद्रीय बलों की भारी तैनाती और निगरानी व्यवस्था लागू की गई है, ताकि मतगणना शांतिपूर्ण तरीके से हो सके।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।