लखनऊ, एजेंसियां। उत्तर प्रदेश में सड़क कनेक्टिविटी को मजबूत करने वाली आगरा-अलीगढ़ ग्रीनफील्ड हाईवे परियोजना को लेकर बड़ी खबर सामने आई है। हाईवे के दूसरे पैकेज के निर्माण के लिए सुप्रीम कोर्ट से अनुमति मिल गई है। अनुमति मिलने के बाद करीब 37 किलोमीटर लंबे हिस्से पर सितंबर से निर्माण कार्य शुरू होने की उम्मीद है। 65 किमी लंबा है आगरा-अलीगढ़ ग्रीनफील्ड हाईवे आगरा-अलीगढ़ ग्रीनफील्ड हाईवे की कुल लंबाई करीब 65 किलोमीटर है और परियोजना पर लगभग 820 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। एनएचएआई ने इसे दो पैकेज में मंजूरी दी है। पहले पैकेज के तहत करीब 28 किलोमीटर हिस्से पर पहले से काम चल रहा है। वहीं दूसरा पैकेज करीब 37 किलोमीटर लंबा है, जो ताज ट्रैपेजियम जोन (TTZ) में आता है। इसी वजह से इस हिस्से के निर्माण के लिए सुप्रीम कोर्ट की अनुमति जरूरी थी। सितंबर से शुरू होगा दूसरे पैकेज का काम सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी मिलने के बाद दूसरे पैकेज पर निर्माण कार्य आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है। उम्मीद है कि सितंबर 2026 से 37 किलोमीटर हिस्से पर काम शुरू हो जाएगा। इस हाईवे के बनने से आगरा और अलीगढ़ के बीच आवागमन आसान होगा। साथ ही स्थानीय लोगों को आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेसवे, यमुना एक्सप्रेसवे और पूर्वांचल एक्सप्रेसवे तक पहुंचने में भी सुविधा मिलेगी। अलीगढ़-चंदौसी-मुरादाबाद हाईवे भी होगा फोरलेन इसके साथ ही अलीगढ़-चंदौसी-मुरादाबाद हाईवे को भी फोरलेन करने की तैयारी चल रही है। फिलहाल यह सड़क दो लेन की है। करीब 107 किलोमीटर लंबी परियोजना पर लगभग 4,000 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। इस परियोजना के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार की जा रही है। फोरलेन बनने के बाद अलीगढ़ से चंदौसी और मुरादाबाद के बीच यातायात व्यवस्था बेहतर होने की उम्मीद है। मुरादाबाद-हल्द्वानी ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे पर भी अध्ययन सड़क कनेक्टिविटी बढ़ाने की दिशा में मुरादाबाद-हल्द्वानी ग्रीनफील्ड फोरलेन एक्सप्रेसवे पर भी काम आगे बढ़ रहा है। सूत्रों के मुताबिक, इस प्रस्तावित परियोजना की व्यवहार्यता (फिजिबिलिटी) का अध्ययन कराया जा रहा है। इन परियोजनाओं के पूरा होने से उत्तर प्रदेश के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों के बीच कनेक्टिविटी मजबूत होने के साथ-साथ क्षेत्रीय व्यापार और आवागमन को भी गति मिलने की उम्मीद है।
पटना। बिहार के दानापुर रेलवे स्टेशन को आधुनिक सुविधाओं से लैस करने की तैयारी शुरू हो गई है। स्टेशन के विस्तार के लिए मास्टर प्लान तैयार किया जा रहा है। इसके तहत प्लेटफॉर्म की चौड़ाई बढ़ाने के साथ नया सर्कुलेटिंग एरिया और बड़ा पार्किंग जोन विकसित करने की योजना है। वहीं, खगौल आरओबी से दानापुर स्टेशन गोलंबर तक जाने वाली पुरानी सड़क को बंद कर उसकी जमीन स्टेशन विस्तार में इस्तेमाल किए जाने का प्रस्ताव है। पुरानी सड़क की जमीन से होगा स्टेशन का विस्तार दानापुर स्टेशन के विस्तार के लिए खगौल आरओबी से स्टेशन गोलंबर तक जाने वाली सड़क की जमीन का इस्तेमाल करने की योजना बनाई गई है। प्रस्ताव के तहत इस मार्ग को बंद कर यहां प्लेटफॉर्म, पार्किंग और सर्कुलेटिंग एरिया का विस्तार किया जाएगा। रेलवे और संबंधित विभागों के बीच जमीन हस्तांतरण को लेकर जल्द प्रक्रिया आगे बढ़ने की उम्मीद है। पटना-बिहटा आने-जाने वालों को मिलेगा वैकल्पिक रास्ता पुरानी सड़क बंद होने के बाद पटना और बिहटा के बीच आने-जाने वाले वाहनों के लिए वैकल्पिक मार्ग तैयार किया जाएगा। वाहनों को बिहटा एलिवेटेड रोड के नीचे बने नए रास्ते से गुजारा जाएगा। अधिकारियों का मानना है कि इससे यातायात को व्यवस्थित करने और पटना-बिहटा रूट पर जाम कम करने में मदद मिल सकती है। इससे रोजाना सफर करने वाले लाखों वाहन चालकों को राहत मिलने की उम्मीद है। प्लेटफॉर्म ए और ए-1 की चौड़ाई होगी दोगुनी से ज्यादा स्टेशन विस्तार के तहत प्लेटफॉर्म ए और ए-1 को मौजूदा आकार की तुलना में दोगुने से भी अधिक चौड़ा करने की योजना है। इससे यात्रियों को अधिक जगह मिलेगी और ट्रेन के आने-जाने के दौरान भीड़ को नियंत्रित करना आसान होगा। पटना जंक्शन से भी बड़ा हो सकता है पार्किंग एरिया दानापुर स्टेशन के बाहर नया सर्कुलेटिंग एरिया और पार्किंग जोन विकसित करने की तैयारी है। प्रस्तावित पार्किंग क्षेत्र पटना जंक्शन के मौजूदा सर्कुलेटिंग एरिया और पार्किंग से भी बड़ा होने की बात कही जा रही है। यहां दोपहिया और चारपहिया वाहनों के लिए पार्किंग की सुविधा उपलब्ध कराने की योजना है। इससे स्टेशन आने वाले यात्रियों को वाहन खड़ा करने में आसानी होगी। रेलवे जल्द भेजेगा एनएचएआई को प्रस्ताव स्टेशन विस्तार के लिए सड़क की जमीन जरूरी होने के कारण रेलवे की ओर से जल्द ही भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) को लिखित प्रस्ताव भेजे जाने की तैयारी है। इसके बाद जमीन हस्तांतरण और वैकल्पिक मार्ग को लेकर रेलवे और एनएचएआई के अधिकारियों के बीच बैठक होगी। स्टेशन विस्तार और यातायात व्यवस्था में बदलाव की यह योजना पूरी होने के बाद दानापुर रेलवे स्टेशन पर यात्रियों को बेहतर सुविधाएं मिलने के साथ-साथ पटना-बिहटा मार्ग पर यातायात व्यवस्था में भी सुधार की उम्मीद है।
जयपुर, एजेंसियां। राजस्थान में राष्ट्रीय राजमार्ग-25 (NH-25) पर रंबल स्ट्रिप को लेकर उठे विवाद के बाद भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने संबंधित प्रोजेक्ट डायरेक्टर को निलंबित कर दिया है। यह कार्रवाई उस समय हुई जब सड़क की स्थिति को लेकर सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो और तस्वीरों ने NHAI के शुरुआती दावे पर सवाल खड़े कर दिए। प्रथ्वीपुरा गांव के पास रंबल स्ट्रिप को लेकर विवाद मामला राजस्थान के प्रथ्वीपुरा गांव के पास NH-25 पर बने एक मीडियन ओपनिंग से जुड़ा है। सड़क पर बने रंबल स्ट्रिप की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए। इसके बाद सड़क सुरक्षा और निर्माण की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठने लगे। शुरुआत में NHAI ने सोशल मीडिया पर सामने आई रिपोर्टों को गलत बताते हुए कहा था कि वायरल तस्वीरें संबंधित स्थान की वास्तविक स्थिति को नहीं दिखाती हैं। बाद में सामने आए जमीनी विजुअल्स ने इस दावे पर सवाल खड़े कर दिए। गलत रिपोर्टिंग के बाद NHAI ने लिया एक्शन विवाद बढ़ने के बाद NHAI ने मामले की दोबारा समीक्षा की। प्राधिकरण ने माना कि संबंधित मामले में गलत रिपोर्टिंग हुई थी। इसके बाद संबंधित प्रोजेक्ट डायरेक्टर को निलंबित कर दिया गया। NHAI ने यह भी कहा कि सड़क के इस हिस्से को निर्धारित रोड सेफ्टी मानकों के अनुरूप बनाने के लिए जरूरी सुधारात्मक कदम उठाए जा रहे हैं। सड़क सुरक्षा मानकों के अनुरूप होंगे सुधार NHAI के मुताबिक, विवादित स्थान पर आवश्यक सुधार किए जाएंगे ताकि सड़क का हिस्सा निर्धारित सुरक्षा मानकों के अनुरूप हो सके। प्राधिकरण ने राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क पर सड़क सुरक्षा और गुणवत्ता को प्राथमिकता देने की बात कही है。 इस मामले ने राष्ट्रीय राजमार्गों पर निर्माण कार्य की निगरानी, अधिकारियों की रिपोर्टिंग और सड़क सुरक्षा मानकों के पालन को लेकर भी चर्चा तेज कर दी है। NHAI की कार्रवाई के बाद अब संबंधित सड़क हिस्से में किए जाने वाले सुधार पर नजर रहेगी।
जम्मू-कश्मीर। जम्मू-कश्मीर में बारिश के बाद सड़क सुरक्षा की चुनौती लगातार बनी हुई है। सोमवार को उधमपुर जिले के देवल इलाके में ताजा भूस्खलन के कारण करीब 250 किलोमीटर लंबे जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर यातायात बाधित हो गया। दोनों ओर से रोकी गई वाहनों की आवाजाही प्रशासन ने यात्रियों की सुरक्षा को देखते हुए हाईवे पर दोनों तरफ से वाहनों की आवाजाही रोक दी है। सड़क पर गिरे मलबे को हटाने के लिए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) की टीमें मशीनरी के साथ मौके पर जुटी हुई हैं। यात्रियों को सतर्क रहने की अपील अधिकारियों ने लोगों से अपील की है कि जब तक हाईवे को पूरी तरह सुरक्षित घोषित नहीं किया जाता, तब तक यात्रा करने से बचें। बारिश के कारण आगे भी भूस्खलन और पत्थर गिरने का खतरा बना हुआ है। अमरनाथ यात्रियों के काफिले को मिली अनुमति प्रभावित मार्ग पर एक तरफ का रास्ता बहाल कर अमरनाथ यात्रा के लिए बालटाल जा रहे 3,823 श्रद्धालुओं के काफिले को सुरक्षा व्यवस्था के बीच आगे बढ़ने की अनुमति दी गई। बारिश के कारण पहले भी बंद हुआ था हाईवे इससे पहले भी भारी बारिश के चलते जम्मू-श्रीनगर हाईवे पर कई जगह भूस्खलन और पत्थर गिरने की घटनाएं सामने आई थीं, जिसके कारण तीन दिनों तक यातायात बंद रहा था। रविवार को मार्ग बहाल हुआ था, लेकिन दोबारा मलबा गिरने से आवाजाही रोकनी पड़ी। डोडा पुल सुरक्षा जांच के लिए बंद वहीं, डोडा जिले में पुल डोडा को भी एहतियातन बंद कर दिया गया है। पुल पर दरारें दिखाई देने की सूचना के बाद प्रशासन ने वाहनों की आवाजाही रोक दी। फिलहाल यातायात को वैकल्पिक गणपत पुल से डायवर्ट किया जा रहा है। विशेषज्ञ टीम करेगी पुल की जांच पीडब्ल्यूडी अधिकारियों के अनुसार, शुरुआती जांच में पुल की दरारें संरचनात्मक समस्या नहीं पाई गई हैं। माना जा रहा है कि ये निर्माण के दौरान शटरिंग जॉइंट पर कंक्रीट ओवरलैप के निशान हो सकते हैं। विशेषज्ञ टीम की रिपोर्ट के बाद ही पुल को दोबारा खोला जाएगा।
नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजमार्ग के आसपास रहने वाले वाहन चालकों के लिए बड़ी राहत की खबर है। अब टोल प्लाजा पर लंबी कतारों में लगने या कागजी दस्तावेज जमा करने की जरूरत नहीं होगी। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने राजमार्गयात्रा ऐप में नया स्थानीय टोल पास फीचर शुरू किया है। इसकी मदद से पात्र लोग घर बैठे अपने मोबाइल फोन से ही स्थानीय टोल पास बनवा सकेंगे। इस नई डिजिटल सुविधा में फास्टैग, डिजिलॉकर, वाहन पोर्टल और भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) के माध्यम से स्वतः सत्यापन किया जाएगा, जिससे पूरी प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक आसान, तेज और पूरी तरह डिजिटल हो जाएगी। कौन बनवा सकता है स्थानीय टोल पास? यह सुविधा उन वाहन मालिकों के लिए है, जिनका घर संबंधित टोल प्लाजा से 20 किलोमीटर के दायरे में स्थित है। स्थानीय टोल पास बनने के बाद वाहन चालक एक महीने तक उसी टोल प्लाजा से असीमित बार आवागमन कर सकेंगे। फिलहाल इस सुविधा की शुरुआत दिल्ली के अर्बन एक्सटेंशन रोड-2 स्थित मुंडका-बक्करवाला टोल प्लाजा से की गई है। आने वाले समय में इसे देशभर के अन्य टोल प्लाजा पर भी लागू किया जाएगा। अब नहीं होगी कागजी कार्रवाई पहले स्थानीय टोल पास बनवाने के लिए लोगों को टोल प्लाजा पर जाकर आवेदन करना पड़ता था और कई दस्तावेज जमा करने होते थे। अब नई व्यवस्था में आपकी अनुमति मिलने के बाद ऐप स्वयं आवश्यक जानकारियों का सत्यापन करेगा। डिजिलॉकर के माध्यम से पते का सत्यापन होगा। वाहन पोर्टल से वाहन का विवरण प्राप्त किया जाएगा। फास्टैग की वैधता स्वतः जांची जाएगी। भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) यह पुष्टि करेगी कि आपका घर संबंधित टोल प्लाजा से 20 किलोमीटर की सीमा के भीतर है या नहीं। इससे पूरी प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल और कागजरहित हो जाएगी। राजमार्गयात्रा ऐप से स्थानीय टोल पास कैसे बनाएं? यदि आप इस सुविधा के पात्र हैं, तो नीचे दिए गए चरणों का पालन करें। चरण 1 गूगल प्ले स्टोर या एप्पल ऐप स्टोर से राजमार्गयात्रा ऐप डाउनलोड करें। चरण 2 मोबाइल नंबर और ओटीपी की सहायता से लॉग इन करें। चरण 3 मुख्य पृष्ठ पर स्थानीय पास विकल्प चुनें। चरण 4 अपने वाहन का पंजीकरण नंबर दर्ज करें। चरण 5 ऐप वाहन पोर्टल के माध्यम से आपके वाहन का विवरण और फास्टैग की स्थिति स्वतः सत्यापित करेगा। चरण 6 डिजिलॉकर के माध्यम से अपने पते का स्वतः सत्यापन पूरा करें। चरण 7 भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) यह जांच करेगी कि आपका घर संबंधित टोल प्लाजा से 20 किलोमीटर के दायरे में है या नहीं। चरण 8 पात्रता की पुष्टि होने के बाद यूपीआई, डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड या नेट बैंकिंग के माध्यम से निर्धारित मासिक शुल्क का भुगतान करें। चरण 9 भुगतान सफल होते ही आपका डिजिटल स्थानीय टोल पास जारी हो जाएगा और वह सीधे आपके फास्टैग से जुड़ जाएगा। राजमार्गयात्रा ऐप में आया 'मार्गमित्र' कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहायक एनएचएआई ने राजमार्गयात्रा ऐप में 'मार्गमित्र' नाम का नया कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित सहायक भी जोड़ा है। यह सुविधा 22 भारतीय भाषाओं का समर्थन करती है और यात्रियों को कई सेवाओं में तत्काल सहायता प्रदान करती है। मार्गमित्र के माध्यम से आप— फास्टैग रिचार्ज फास्टैग केवाईसी धनवापसी (रिफंड) की स्थिति स्थानीय टोल पास से जुड़ी जानकारी राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़े सवालों के जवाब एक ही मंच पर प्राप्त कर सकते हैं। इस नई सुविधा के प्रमुख लाभ टोल प्लाजा पर लंबी कतारों में खड़े होने की आवश्यकता नहीं। पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन और कागजरहित। डिजिलॉकर, वाहन पोर्टल और फास्टैग के माध्यम से स्वतः सत्यापन। घर बैठे कुछ ही मिनटों में पास जारी। एक महीने तक पात्र टोल प्लाजा पर असीमित आवागमन। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सहायक से तुरंत सहायता।
देशभर में बढ़ते डॉग बाइट मामलों को लेकर Supreme Court of India ने बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने संबंधी अपने पहले के आदेश में बदलाव करने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने डॉग लवर्स और विभिन्न NGO की याचिकाओं को खारिज करते हुए साफ कहा कि 7 नवंबर 2025 के अंतरिम आदेश में कोई संशोधन नहीं किया जाएगा। जस्टिस Vikram Nath, Sandeep Mehta और N. V. Anjaria की बेंच ने 29 जनवरी को सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। “कुत्तों के काटने की घटनाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकते” फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देशभर में बच्चों और आम लोगों पर आवारा कुत्तों के हमलों की घटनाएं बेहद गंभीर हैं और इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा, “ABC फ्रेमवर्क 2001 में शुरू किया गया था, लेकिन आवारा कुत्तों की बढ़ती आबादी के अनुसार संसाधनों को बढ़ाने और व्यवस्थित योजना बनाने में गंभीर कमी रही है। नसबंदी और टीकाकरण अभियान बिना समुचित योजना के चलाए गए।” स्कूल, अस्पताल और हाईवे से हटाने के निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने पहले दिए गए अंतरिम आदेश में राज्यों और National Highways Authority of India (NHAI) को हाईवे, अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, रेलवे स्टेशन और अन्य सार्वजनिक संस्थानों के आसपास से आवारा कुत्तों को हटाने के निर्देश दिए थे। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जो कुत्ते आक्रामक नहीं हैं और रेबीज से संक्रमित नहीं हैं, उन्हें नसबंदी और टीकाकरण के बाद उसी इलाके में छोड़ा जा सकता है, जहां से उन्हें पकड़ा गया था। कुत्ता काटे तो जिम्मेदारी किसकी? पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि यदि किसी आवारा कुत्ते के हमले में किसी व्यक्ति की चोट या मौत होती है, तो संबंधित नगर निकाय के साथ-साथ नियमित रूप से कुत्तों को खाना खिलाने वालों की जिम्मेदारी भी तय की जा सकती है। कोर्ट ने कहा, “ऐसा नहीं हो सकता कि कोई व्यक्ति रोज कुत्तों को खाना खिलाए, लेकिन उनके काटने पर उसकी कोई जिम्मेदारी न हो।” असम के आंकड़ों पर कोर्ट ने जताई चिंता सुनवाई के दौरान कोर्ट ने असम में डॉग बाइट के मामलों पर चिंता जताई। अदालत के अनुसार, वर्ष 2024 में राज्य में 1.66 लाख डॉग बाइट के मामले दर्ज हुए, जबकि 2025 में केवल जनवरी महीने में ही 20,900 घटनाएं सामने आईं। कोर्ट ने इन आंकड़ों को “बेहद भयावह” बताते हुए राज्यों को स्पष्ट और ठोस कार्ययोजना पेश करने की चेतावनी दी। कैसे शुरू हुआ मामला? यह मामला 28 जुलाई 2025 को शुरू हुआ था, जब सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में बढ़ते डॉग बाइट मामलों और मौतों पर स्वतः संज्ञान लिया था। उस दौरान सोशल मीडिया पर कई वीडियो वायरल हुए थे, जिनमें आवारा कुत्ते बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं पर हमला करते दिखाई दे रहे थे। इसके बाद 11 अगस्त 2025 को कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में आठ सप्ताह के भीतर सभी आवारा कुत्तों को पकड़कर शेल्टर होम भेजने का आदेश दिया था। हालांकि इस आदेश के खिलाफ डॉग लवर्स और पशु अधिकार संगठनों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए थे। बाद में 22 अगस्त 2025 को कोर्ट ने अपने आदेश में आंशिक बदलाव किया था।
देश में टोल कलेक्शन सिस्टम को और आधुनिक बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री Nitin Gadkari ने दिल्ली में पहले बैरियर-लेस टोल प्लाजा का उद्घाटन किया है। यह नया सिस्टम Urban Extension Road-II कॉरिडोर के मुंडका-बक्करवाला इलाके में शुरू किया गया है। गुजरात के बाद अब दिल्ली देश का दूसरा ऐसा राज्य बन गया है, जहां यह हाईटेक टोलिंग तकनीक लागू हुई है। क्या है Barrier-Less Toll System? इस नई तकनीक में टोल प्लाजा पर पारंपरिक बैरियर नहीं होते। यानी अब गाड़ियों को रुककर टोल देने की जरूरत नहीं पड़ेगी। पूरा सिस्टम Multi-Lane Free Flow (MLFF) टेक्नोलॉजी पर आधारित है। इसमें सड़क के ऊपर बड़े गैंट्री स्ट्रक्चर लगाए जाते हैं, जिनमें हाई-टेक कैमरे और सेंसर लगे होते हैं। जैसे ही कोई वाहन इन कैमरों के नीचे से गुजरता है, सिस्टम ऑटोमैटिक तरीके से वाहन की पहचान कर लेता है और टोल राशि सीधे FASTag अकाउंट से कट जाती है। कैसे पहचानता है सिस्टम? इस सिस्टम में ANPR यानी Automatic Number Plate Recognition कैमरे लगाए गए हैं। ये कैमरे चलते वाहन की नंबर प्लेट तुरंत स्कैन कर लेते हैं। साथ ही सेंसर यह भी पहचानते हैं कि वाहन किस कैटेगरी का है — जैसे कार, बस या ट्रक। इसके बाद: वाहन की यूनिक ट्रैकिंग आईडी बनती है एक्सल और साइज के आधार पर टोल तय होता है FASTag अकाउंट से डिजिटल पेमेंट कट जाता है पूरी प्रक्रिया कुछ सेकंड में हो जाती है और वाहन बिना रुके आगे बढ़ जाता है। Barrier-Less Toll System के फायदे लंबी लाइनों से राहत अब टोल प्लाजा पर जाम और इंतजार की समस्या काफी कम हो सकती है। सफर होगा तेज वाहनों को स्पीड कम नहीं करनी पड़ेगी, जिससे ट्रैफिक फ्लो स्मूद रहेगा। फ्यूल की बचत बार-बार रुकने और चलने की जरूरत खत्म होने से ईंधन की खपत कम होगी। प्रदूषण में कमी कम ट्रैफिक जाम का मतलब कम कार्बन उत्सर्जन भी है। किन बातों का रखना होगा ध्यान? इस नए सिस्टम का फायदा लेने के लिए आपका FASTag एक्टिव होना जरूरी है। साथ ही उसमें पर्याप्त बैलेंस भी होना चाहिए। अगर FASTag से टोल कटने में दिक्कत आती है, तो National Highways Authority of India यानी NHAI वाहन मालिक को ई-नोटिस भेजेगा। 72 घंटे का नियम 72 घंटे के भीतर भुगतान करने पर सिर्फ सामान्य टोल देना होगा समय सीमा के बाद पेमेंट करने पर दोगुना टोल चार्ज देना पड़ सकता है भारत में टोल सिस्टम का भविष्य? विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में देशभर के कई हाईवे पर इसी तरह का बैरियर-लेस टोल सिस्टम लागू किया जा सकता है। इससे हाईवे यात्रा पहले से ज्यादा तेज, आसान और डिजिटल हो जाएगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।