सुप्रीम कोर्ट

मुस्लिमों में बहुविवाह पर रोक की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी करता सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिमों में बहुविवाह पर रोक की मांग वाली याचिका पर केंद्र से मांगा जवाब

केंद्र सरकार को जारी किया नोटिस, याचिकाकर्ता ने बहुविवाह प्रथा को समानता और महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ बताया   नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम समुदाय में बहुविवाह की प्रथा पर रोक लगाने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। अदालत ने केंद्र से इस मुद्दे पर विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई निर्धारित तिथि पर होगी।   याचिका में क्या कहा गया है?   याचिका में कहा गया है कि एक से अधिक विवाह की अनुमति महिलाओं के समानता, गरिमा और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करती है। याचिकाकर्ता ने अदालत से आग्रह किया है कि इस प्रथा की संवैधानिक वैधता की समीक्षा की जाए और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक निर्देश जारी किए जाएं।   केंद्र सरकार से मांगा गया जवाब   सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार से अपना पक्ष रखने को कहा है। केंद्र को नोटिस जारी होने के बाद अब सरकार अदालत में यह बताएगी कि इस विषय पर उसका क्या रुख है और क्या किसी कानूनी बदलाव की आवश्यकता है।   अभी कोई फैसला नहीं   फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने बहुविवाह पर कोई रोक नहीं लगाई है और न ही इसकी वैधता पर कोई अंतिम टिप्पणी की है। अदालत ने केवल याचिका स्वीकार करते हुए केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। अंतिम निर्णय विस्तृत सुनवाई के बाद ही दिया जाएगा।  

ranjan kumar tiwari जुलाई 31, 2026 0
हल्द्वानी हिंसा मामले में मुख्य आरोपी अब्दुल मलिक की जमानत बरकरार रखते हुए सुप्रीम कोर्ट का फैसला
हल्द्वानी हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, अब्दुल मलिक की जमानत बरकरार

उत्तराखंड सरकार की याचिका खारिज, हिंसा मामले में मुख्य आरोपी को मिली राहत   नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने हल्द्वानी हिंसा के मुख्य आरोपी अब्दुल मलिक को मिली जमानत के खिलाफ उत्तराखंड सरकार की याचिका खारिज कर दी है। शीर्ष अदालत ने नैनीताल हाईकोर्ट के जमानत आदेश में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए कहा कि इस स्तर पर जमानत रद्द करने का कोई पर्याप्त आधार नहीं है।   सरकार ने जमानत रद्द करने की मांग की थी   उत्तराखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि अब्दुल मलिक हल्द्वानी हिंसा का प्रमुख आरोपी है और उसकी रिहाई से जांच व कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत को बरकरार रखा।   क्या है मामला?   फरवरी 2024 में हल्द्वानी के बनभूलपुरा क्षेत्र में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान हिंसा भड़क गई थी। इस घटना में पुलिसकर्मियों समेत कई लोग घायल हुए थे, जबकि सार्वजनिक और सरकारी संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचा था। मामले में अब्दुल मलिक सहित कई लोगों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया था।   जांच और मुकदमे की प्रक्रिया जारी   सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद मामले की जांच और ट्रायल जारी रहेगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत का मतलब आरोपों से बरी होना नहीं है और मुकदमे के दौरान सभी साक्ष्यों के आधार पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।  

ranjan kumar tiwari जुलाई 31, 2026 0
Supreme Court Judgement
कोयला घोटाला मामलों में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, हाई कोर्ट की सुनवाई व्यवस्था में किया बदलाव

अदालत ने कहा- लंबित मामलों की सुनवाई तय प्रक्रिया के तहत होगी, न्यायिक व्यवस्था में स्पष्टता लाने पर जोर   नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने कोयला घोटाला (Coal Scam) से जुड़े मामलों की सुनवाई को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने हाई कोर्ट में लंबित इन मामलों की सुनवाई और अधिकार क्षेत्र से जुड़ी व्यवस्था में बदलाव किया है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का असर देशभर में चल रहे कई कोयला घोटाला मामलों की आगे की सुनवाई पर पड़ सकता है।   हाई कोर्ट में लंबित मामलों पर नई व्यवस्था   सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कोयला घोटाले से जुड़े मामलों में सुनवाई तय कानूनी प्रक्रिया और अधिकार क्षेत्र के आधार पर की जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि मामलों को लंबित रखने के बजाय प्रभावी तरीके से आगे बढ़ाने की जरूरत है, ताकि न्यायिक प्रक्रिया में देरी कम हो।   सीबीआई जांच और अदालतों की भूमिका पर चर्चा   कोयला घोटाला मामलों में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की जांच, विशेष अदालतों की भूमिका और हाई कोर्ट की निगरानी को लेकर लंबे समय से कानूनी बहस चल रही थी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से इन मामलों में आगे की न्यायिक प्रक्रिया को दिशा मिलने की उम्मीद है।   कई बड़े मामलों से जुड़ा है कोयला घोटाला   कोयला ब्लॉक आवंटन से जुड़े मामलों में पूर्व अधिकारियों, कंपनियों और कई प्रभावशाली लोगों के खिलाफ जांच और मुकदमे चल चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट पहले भी कोयला आवंटन प्रक्रिया में अनियमितताओं को लेकर सख्त रुख अपना चुका है।   न्यायिक प्रक्रिया तेज करने की कोशिश   विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला लंबित मामलों के निपटारे और अदालतों के बीच अधिकारों की स्पष्टता के लिहाज से महत्वपूर्ण है। अब संबंधित अदालतों में मामलों की सुनवाई इसी नई व्यवस्था के अनुसार आगे बढ़ेगी।

abhishek singh जुलाई 30, 2026 0
Supreme Court
EWS कोटे पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, ₹8 लाख सालाना आय सीमा को बताया पहली नजर में उचित

आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) आरक्षण मामले में कोर्ट ने कहा- मानदंड की समीक्षा संभव, अंतिम फैसला बाद में   नई दिल्ली, एजेंसियां। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने ₹8 लाख सालाना पारिवारिक आय सीमा को पहली नजर में उचित बताया है। यह टिप्पणी 10% EWS आरक्षण से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की गई। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह अभी अंतिम फैसला नहीं है और मामले की विस्तृत सुनवाई आगे जारी रहेगी।   EWS आरक्षण के लिए आय सीमा पर उठे सवाल   सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं की ओर से EWS कोटे के लिए तय आय सीमा और इसके आधार को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि आर्थिक स्थिति तय करने के मानदंडों की समीक्षा जरूरी है, जबकि सरकार का पक्ष है कि यह सीमा जरूरतमंद आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से तय की गई है।   2019 में लागू हुआ था 10% EWS आरक्षण   केंद्र सरकार ने 103वें संविधान संशोधन (2019) के जरिए आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 10% आरक्षण का प्रावधान किया था। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2022 में बहुमत के फैसले से इस संशोधन की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था।   अंतिम फैसला आना बाकी   सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी केवल प्रारंभिक राय है। अदालत आगे यह तय करेगी कि EWS आरक्षण के लिए तय आय सीमा और अन्य मानदंड संविधान के अनुरूप हैं या नहीं। इस मामले के फैसले का असर भविष्य में EWS आरक्षण की पात्रता तय करने की प्रक्रिया पर पड़ सकता है।

abhishek singh जुलाई 30, 2026 0
कोयला घोटाला मामले में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सुप्रीम कोर्ट से राहत और कानूनी कार्यवाही बंद
कोयला घोटाला केस में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, अदालत ने बंद की कार्यवाही

करीब 11 साल पुराने मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के समन आदेश को किया रद्द   नई दिल्ली, एजेंसियां। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से जुड़े कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने उनके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को समाप्त कर दिया है और निचली अदालत द्वारा जारी किए गए समन आदेश को रद्द कर दिया।   हिंदाल्को कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में आया फैसला   यह मामला हिंदाल्को कोयला ब्लॉक आवंटन से जुड़ा था। आरोप था कि कोयला ब्लॉक आवंटन प्रक्रिया में अनियमितताएं हुई थीं। सीबीआई ने जांच के बाद क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी, जिसे लेकर कानूनी विवाद चल रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को खारिज कर संज्ञान लेने का पर्याप्त आधार नहीं था।   मनमोहन सिंह को मिली क्लीन चिट   सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद डॉ. मनमोहन सिंह के खिलाफ इस मामले में कोई आपराधिक कार्यवाही नहीं चलेगी। यह मामला उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल (2004-2014) के दौरान हुए कोयला ब्लॉक आवंटन से जुड़ा था और लंबे समय से कानूनी प्रक्रिया में था।   करीब दो साल बाद आया अंतिम फैसला   डॉ. मनमोहन सिंह का निधन दिसंबर 2024 में 92 वर्ष की उम्र में हुआ था। उनके निधन के बाद भी यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित था। अब अदालत के फैसले से इस लंबे कानूनी विवाद का अंत हो गया है।  

ranjan kumar tiwari जुलाई 30, 2026 0
ग्रीन क्लीयरेंस मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी और सुनवाई
ग्रीन क्लीयरेंस मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, परियोजनाओं को बाद में पर्यावरण मंजूरी देने की नीति पर रोक

कोर्ट ने कहा- पर्यावरण नियमों का उल्लंघन करने के बाद मंजूरी देना गलत परंपरा को बढ़ावा देगा   नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंजूरी से जुड़े मामले में सख्त रुख अपनाते हुए उन नीतियों पर रोक लगा दी है, जिनके तहत परियोजनाओं को नियमों का उल्लंघन करने के बाद बाद में ग्रीन क्लीयरेंस देने का रास्ता खुलता था। अदालत ने कहा कि पर्यावरण कानूनों का पालन परियोजना शुरू करने से पहले होना चाहिए, बाद में मंजूरी देकर उल्लंघन को नियमित नहीं किया जा सकता।   'पहले उल्लंघन, फिर मंजूरी' की व्यवस्था पर सवाल   सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी परियोजना को बिना जरूरी पर्यावरण मंजूरी के शुरू कर दिया जाता है और बाद में उसे मंजूरी दे दी जाती है, तो इससे पर्यावरण संरक्षण कानूनों का उद्देश्य कमजोर होता है। अदालत ने माना कि ऐसी व्यवस्था से नियमों का पालन करने वाले लोगों के साथ अन्याय होता है।   पर्यावरण संरक्षण को बताया सर्वोच्च प्राथमिकता   कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि विकास परियोजनाएं जरूरी हैं, लेकिन उन्हें पर्यावरणीय मानकों और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए ही आगे बढ़ाया जाना चाहिए। पर्यावरण मंजूरी केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि संभावित पर्यावरणीय नुकसान का आकलन करने का महत्वपूर्ण माध्यम है।   सरकार की नीति पर पड़ेगा असर   सुप्रीम कोर्ट के इस रुख का असर उद्योग, खनन, निर्माण और बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर पड़ सकता है। अब कंपनियों को परियोजना शुरू करने से पहले पर्यावरण मंजूरी लेने की प्रक्रिया का सख्ती से पालन करना होगा।   विशेषज्ञों ने फैसले को महत्वपूर्ण बताया   पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला पर्यावरण कानूनों की गंभीरता को मजबूत करता है और कंपनियों को नियमों के पालन के लिए अधिक जिम्मेदार बनाएगा। वहीं उद्योग जगत का मानना है कि मंजूरी प्रक्रिया को तेज और पारदर्शी बनाने की जरूरत है ताकि विकास कार्यों में अनावश्यक देरी न हो।  

ranjan kumar tiwari जुलाई 30, 2026 0
West Bengal Government 's  Big Decision
NEET प्रदर्शन मामले में पश्चिम बंगाल सरकार का बड़ा फैसला, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई नहीं होगी

कोलकाता, एजेंसियां। NEET (UG) पेपर लीक विवाद को लेकर चल रहे छात्र प्रदर्शनों के बीच पश्चिम बंगाल सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। राज्य सरकार ने कहा है कि शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करने वाले छात्रों के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई नहीं की जाएगी। हालांकि, हिंसा या आपराधिक गतिविधियों में शामिल लोगों पर कानूनी कार्रवाई जारी रह सकती है।   सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद लिया गया फैसला   पश्चिम बंगाल सरकार का यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद आया है। अदालत ने NEET प्रदर्शन से जुड़े मामलों में छात्रों के अधिकारों और शांतिपूर्ण प्रदर्शन की स्वतंत्रता को ध्यान में रखते हुए राज्यों को संयम बरतने का निर्देश दिया था।   छात्रों को मिली बड़ी राहत   सरकार के इस निर्णय से उन छात्रों को राहत मिलने की उम्मीद है जो NEET परीक्षा में कथित गड़बड़ी और पेपर लीक के विरोध में सड़कों पर उतरे थे। राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि केवल प्रदर्शन करने के आधार पर छात्रों पर कार्रवाई नहीं की जाएगी।   हिंसा करने वालों पर जारी रहेगी कार्रवाई   सरकार ने यह भी साफ किया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन और कानून तोड़ने वाली गतिविधियों में अंतर किया जाएगा। जिन लोगों पर हिंसा, तोड़फोड़ या अन्य आपराधिक मामलों के आरोप हैं, उनके खिलाफ जांच और कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   NEET पेपर लीक बना राष्ट्रीय मुद्दा   NEET पेपर लीक विवाद के बाद देश के कई राज्यों में छात्र संगठनों ने प्रदर्शन किए हैं। छात्र परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, दोषियों पर कार्रवाई और भविष्य की परीक्षाओं को सुरक्षित बनाने की मांग कर रहे हैं।

abhishek singh जुलाई 29, 2026 0
दलबदल विरोधी कानून की प्रक्रिया और समयसीमा पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने दलबदल विरोधी कानून की प्रक्रिया पर उठाए सवाल, कहा- सांसदों के मामलों में फैसले की समयसीमा तय होना जरूरी

नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के तहत सांसदों और विधायकों के खिलाफ होने वाली कार्रवाई की प्रक्रिया को लेकर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में निर्णय लेने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी और समयबद्ध बनाने की जरूरत है, ताकि कानून का उद्देश्य पूरा हो सके।   दलबदल विरोधी कानून पर अदालत की टिप्पणी   सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि दलबदल विरोधी कानून का मकसद निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा बार-बार पार्टी बदलने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना और लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्थिरता बनाए रखना है। लेकिन अगर ऐसे मामलों में फैसला आने में बहुत अधिक समय लगता है तो कानून का प्रभाव कमजोर हो जाता है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि सांसदों और विधायकों की सदस्यता से जुड़े मामलों में जल्द फैसला होना जरूरी है।   स्पीकर की भूमिका पर भी चर्चा   दलबदल विरोधी कानून के तहत किसी सांसद या विधायक की सदस्यता रद्द करने का फैसला आमतौर पर लोकसभा अध्यक्ष या विधानसभा अध्यक्ष करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया की निष्पक्षता और समयसीमा को लेकर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि कई बार दलबदल से जुड़े मामले लंबे समय तक लंबित रहते हैं, जिससे राजनीतिक स्थिति में असमंजस बना रहता है।   क्या है दलबदल विरोधी कानून?   भारत में दलबदल विरोधी कानून वर्ष 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए लागू किया गया था। इसे संविधान की 10वीं अनुसूची में शामिल किया गया। इसका उद्देश्य निर्वाचित प्रतिनिधियों को पार्टी बदलकर सरकारों को अस्थिर करने से रोकना था। इस कानून के तहत यदि कोई सांसद या विधायक अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है या पार्टी व्हिप के खिलाफ मतदान करता है, तो उसकी सदस्यता खत्म की जा सकती है।   राजनीतिक दलों के लिए भी महत्वपूर्ण मुद्दा   दलबदल विरोधी कानून लंबे समय से राजनीतिक बहस का विषय रहा है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि कानून ने राजनीतिक स्थिरता बढ़ाई है, जबकि कुछ का कहना है कि इससे निर्वाचित प्रतिनिधियों की स्वतंत्र राय रखने की क्षमता प्रभावित होती है।   आगे क्या होगा?   सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद दलबदल मामलों की सुनवाई और निर्णय प्रक्रिया में सुधार को लेकर चर्चा तेज हो गई है। अदालत ने संकेत दिया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए इस कानून के क्रियान्वयन में पारदर्शिता और तेजी जरूरी है।  

ranjan kumar tiwari जुलाई 28, 2026 0
CJI Suryakant
छात्र प्रदर्शन मामले में CJI सूर्यकांत ने मीडिया रिपोर्टों को बताया गलत, सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल दखल से किया इनकार

नई दिल्ली, एजेंसियां। जंतर-मंतर पर CJP प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने कुछ मीडिया रिपोर्टों को गलत बताया। उन्होंने कहा कि अदालत के रुख और टिप्पणियों को सही संदर्भ में पेश किया जाना चाहिए।   वीडियो देखने और स्वत: संज्ञान लेने की मांग पर कोर्ट का रुख   सुनवाई के दौरान एक वकील ने प्रदर्शन के दौरान कथित पुलिस कार्रवाई के वीडियो दिखाते हुए सुप्रीम कोर्ट से स्वत: संज्ञान लेने की मांग की थी। इस पर CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने तत्काल हस्तक्षेप से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि केवल वीडियो के आधार पर तुरंत कार्रवाई करना उचित नहीं होगा।   "समय बर्बाद न करें" टिप्पणी पर विवाद   कुछ रिपोर्टों में CJI की टिप्पणी को अलग तरीके से पेश किए जाने पर विवाद हुआ। रिपोर्टों के अनुसार, CJI सूर्यकांत ने कहा कि अदालत के पास हर वायरल वीडियो देखने का समय नहीं है और न्यायिक प्रक्रिया के तहत उचित तरीके से मामला लाया जाना चाहिए।   छात्र प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई का मामला   CJP प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर आरोप लगाए गए थे। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि उनके साथ सख्ती हुई, जबकि प्रशासन का पक्ष कानून-व्यवस्था बनाए रखने से जुड़ा है। इसी मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी।   CJI ने मीडिया रिपोर्टिंग में सावधानी की बात कही   CJI सूर्यकांत ने इससे पहले भी कहा है कि न्यायिक टिप्पणियों को संदर्भ से हटाकर पेश करने से गलत धारणा बन सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया पर न्यायाधीशों के नाम से चलने वाली गलत सूचनाओं से भी सावधान रहने की अपील की है।

abhishek singh जुलाई 24, 2026 0
Supreme Court
सुप्रीम कोर्ट में बढ़ेंगे जजों के पद, लंबित मामलों का बोझ कम करने की तैयारी

नई दिल्ली, एजेंसियां। देश की सर्वोच्च अदालत में बढ़ते मामलों के दबाव को देखते हुए केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की तैयारी कर रही है। सरकार का उद्देश्य अदालत में लंबित मामलों को कम करना और न्याय प्रक्रिया को तेज करना है।   फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश (CJI) समेत कुल 34 न्यायाधीशों के पद स्वीकृत हैं। सरकार अब इसमें 4 नए न्यायाधीशों के पद बढ़ाने पर विचार कर रही है, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में जजों की कुल संख्या बढ़कर 38 हो सकती है।   लंबित मामलों का बढ़ता दबाव   सुप्रीम कोर्ट में हर साल बड़ी संख्या में नए मामले दाखिल होते हैं। संवैधानिक मामलों, आपराधिक अपील, नागरिक विवाद और अन्य महत्वपूर्ण याचिकाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसके कारण कई मामलों की सुनवाई में लंबा समय लग जाता है। न्यायपालिका लंबे समय से कहती रही है कि लंबित मामलों को कम करने के लिए न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना जरूरी है।   न्याय प्रक्रिया तेज करने की कोशिश   जजों की संख्या बढ़ने से ज्यादा बेंच गठित की जा सकेंगी और मामलों की सुनवाई तेजी से हो पाएगी। इससे खासतौर पर पुराने लंबित मामलों को निपटाने में मदद मिलने की उम्मीद है। इसके साथ ही सरकार ई-कोर्ट परियोजना, डिजिटल सुनवाई और अदालतों में तकनीकी सुविधाओं के विस्तार पर भी जोर दे रही है।   न्यायिक सुधारों की दिशा में कदम   केंद्र सरकार का मानना है कि मजबूत न्याय व्यवस्था के लिए पर्याप्त संख्या में न्यायाधीश, बेहतर बुनियादी सुविधाएं और आधुनिक तकनीक जरूरी हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ जजों की संख्या बढ़ाने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी, बल्कि अदालतों में स्टाफ, संसाधन और प्रक्रिया में सुधार भी जरूरी है।   सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव न्याय व्यवस्था को अधिक प्रभावी और तेज बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

abhishek singh जुलाई 23, 2026 0
Satluj Movie Screening
'सतलुज' पर बढ़ा विवाद, OTT से हटने के बाद पंजाब के गांव-गांव में हो रही स्क्रीनिंग

चंडीगढ़, एजेंसियां। मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और 1990 के दशक में पंजाब में कथित फर्जी एनकाउंटरों पर आधारित फिल्म 'सतलुज' ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद अब पंजाब के कई गांवों में बड़े पर्दे पर दिखाई जा रही है। गुरुद्वारों और सार्वजनिक स्थानों पर आयोजित स्क्रीनिंग में बड़ी संख्या में स्थानीय लोग और पीड़ित परिवार शामिल हो रहे हैं। कई दर्शकों का कहना है कि फिल्म ने उन्हें उस दौर की घटनाओं और पीड़ितों के संघर्ष को समझने का अवसर दिया, जबकि कुछ परिवारों का दावा है कि वास्तविक घटनाएं फिल्म में दिखाए गए दृश्यों से भी अधिक भयावह थीं।   पीड़ित परिवारों ने सुनाई अपनी आपबीती फिरोजपुर और तरनतारन के कई परिवारों ने आरोप लगाया कि 1990 के दशक में उनके परिजनों की कथित फर्जी पुलिस मुठभेड़ों में मौत हुई थी। कुछ लोगों ने दावा किया कि उनके परिवार के सदस्यों को हिरासत में प्रताड़ित किया गया, लेकिन आज तक न तो शव मिले और न ही मौत से जुड़े आधिकारिक दस्तावेज। कई पीड़ितों ने कहा कि फिल्म देखने के बाद नई पीढ़ी को उस दौर की घटनाओं का अंदाजा हुआ।   गांव-गांव में हो रही स्क्रीनिंग सामाजिक संगठनों और स्थानीय समूहों का कहना है कि अब तक पंजाब के सैकड़ों गांवों में फिल्म की स्क्रीनिंग कराई जा चुकी है। आयोजकों का दावा है कि इसका उद्देश्य युवाओं को पंजाब के इतिहास और जसवंत सिंह खालड़ा के संघर्ष से परिचित कराना है। उनका कहना है कि इस अभियान का किसी राजनीतिक दल या फिल्म निर्माताओं से सीधा संबंध नहीं है।   कानूनी विवाद भी तेज फिल्म की सार्वजनिक स्क्रीनिंग को लेकर विवाद भी बढ़ गया है। सुप्रीम कोर्ट के एक अधिवक्ता ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दायर कर फिल्म की स्क्रीनिंग और सार्वजनिक प्रसारण पर रोक लगाने की मांग की है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि फिल्म को आवश्यक प्रक्रिया का पालन किए बिना प्रदर्शित किया जा रहा है और इसकी सामग्री पर भी सवाल उठाए गए हैं। फिलहाल इस मामले में अदालत का अंतिम निर्णय आना बाकी है।

abhishek singh जुलाई 21, 2026 0
Anand Mohan
आनंद मोहन की समय-पूर्व रिहाई को चुनौती देने वाली याचिका पर फैसला सुरक्षित, सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी नजर

नई दिल्ली, एजेंसियां। बिहार के पूर्व सांसद आनंद मोहन की समय-पूर्व रिहाई को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है। यह मामला 1994 में गोपालगंज के तत्कालीन जिलाधिकारी जी. कृष्णैया की हत्या से जुड़ा है, जिसमें आनंद मोहन को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।   बिहार सरकार के फैसले को दी गई थी चुनौती   आनंद मोहन को वर्ष 2023 में बिहार सरकार द्वारा जेल नियमों में बदलाव के बाद समय से पहले रिहा किया गया था। इस रिहाई को जी. कृष्णैया की पत्नी उमा कृष्णैया ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। याचिका में आरोप लगाया गया कि रिहाई की प्रक्रिया में नियमों का सही तरीके से पालन नहीं किया गया।   सुनवाई के दौरान कोर्ट ने उठाए कई सवाल   सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान रिमिशन (सजा में छूट) प्रक्रिया, जेल नियमों में बदलाव और रिहाई के आधार को लेकर कई सवाल उठाए गए। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि लोक सेवक की हत्या जैसे गंभीर अपराध में समय से पहले रिहाई देने के फैसले पर पुनर्विचार जरूरी है।   क्या है पूरा मामला?   1994 में गोपालगंज के तत्कालीन डीएम जी. कृष्णैया की भीड़ द्वारा हत्या कर दी गई थी। इस मामले में आनंद मोहन को दोषी ठहराया गया और उन्हें उम्रकैद की सजा मिली थी। बाद में बिहार सरकार ने जेल नियमावली में बदलाव किया, जिसके बाद अप्रैल 2023 में उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया।   अब फैसले का इंतजार   अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर है। यदि अदालत बिहार सरकार के रिहाई आदेश को बरकरार रखती है तो आनंद मोहन की रिहाई जारी रहेगी, जबकि याचिका स्वीकार होने की स्थिति में उनकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

abhishek singh जुलाई 17, 2026 0
US President Donald Trump meeting Iraqi Prime Minister Ali Al-Zaidi at the White House
अमेरिका-ईरान तनाव के बीच ट्रंप से मिले इराकी पीएम अली अल-जैदी, कूटनीतिक संतुलन पर टिकी नजर

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच इराक के प्रधानमंत्री अली अल-जैदी का अमेरिका दौरा चर्चा का विषय बन गया है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में शामिल होने के कुछ ही दिनों बाद जैदी ने वाशिंगटन पहुंचकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात की। विश्लेषकों के अनुसार, यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर है, इसलिए इसे इराक की संतुलित कूटनीति के रूप में देखा जा रहा है। ईरानी दबाव के बावजूद अमेरिका पहुंचे? मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि ईरान ने इराकी प्रधानमंत्री और उनकी टीम से अमेरिका की यात्रा टालने का आग्रह किया था। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। रिपोर्टों के अनुसार, जैदी ने अपनी पहली आधिकारिक विदेश यात्रा के लिए वाशिंगटन जाने का फैसला बरकरार रखा। कुछ अमेरिकी अधिकारियों ने इसे इराक की स्वतंत्र विदेश नीति और "इराक फर्स्ट" दृष्टिकोण का संकेत बताया है। ट्रंप ने की इराकी प्रधानमंत्री की सराहना ओवल ऑफिस में हुई मुलाकात के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अली अल-जैदी का स्वागत करते हुए उनकी प्रशंसा की। दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय संबंधों, आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई। मुलाकात के दौरान ट्रंप ने उनके सम्मान में आधिकारिक लंच का भी आयोजन किया। आर्थिक सहयोग और सुरक्षा पर रही चर्चा रिपोर्टों के अनुसार, इराकी प्रधानमंत्री ने अपनी यात्रा के दौरान ईरान से जुड़े विवादों पर सार्वजनिक टिप्पणी करने से परहेज किया। उन्होंने अमेरिका के साथ आर्थिक संबंधों को मजबूत करने और इराक से अमेरिकी सैनिकों की प्रस्तावित वापसी जैसे मुद्दों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया। दोनों देशों के बीच संतुलन बनाए रखना चुनौती इराक लंबे समय से अमेरिका और ईरान दोनों के साथ संबंध बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। ऐसे में मौजूदा हालात में बगदाद के लिए दोनों देशों के बीच संतुलन बनाए रखना बड़ी कूटनीतिक चुनौती माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका के साथ संवाद बढ़ाने का अर्थ यह नहीं है कि इराक ने ईरान से दूरी बना ली है। फिलहाल इराक दोनों देशों के साथ अपने संबंधों को संतुलित रखने की नीति पर आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है।  

kalpana जुलाई 17, 2026 0
Bhojshala
सुप्रीम कोर्ट ने भोजशाला मामले में रोक लगाने से किया इनकार, मुस्लिम पक्ष की याचिकाओं पर सुनवाई होगी

नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला-कमाल मौला परिसर मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए हाई कोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया। हालांकि अदालत ने मुस्लिम पक्ष की तीन याचिकाओं पर सुनवाई के लिए नोटिस जारी कर दिया है।   हाई कोर्ट के फैसले पर फिलहाल रोक नहीं   मुस्लिम पक्ष ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें भोजशाला परिसर को माता सरस्वती का मंदिर माना गया था और परिसर में नमाज की अनुमति समाप्त कर दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस फैसले पर रोक लगाने से इनकार करते हुए कहा कि मामले की अंतिम सुनवाई बाद में की जाएगी।   शुक्रवार की नमाज के लिए वैकल्पिक स्थान देने का निर्देश   सुप्रीम कोर्ट ने धार जिला प्रशासन को निर्देश दिया कि मुस्लिम समुदाय के लिए भोजशाला परिसर के पास ही वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराया जाए, जहां वे शुक्रवार को दोपहर 1 बजे से 3 बजे के बीच नमाज अदा कर सकें। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था अंतिम फैसले तक अंतरिम रूप से लागू रहेगी।   भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को भी दिए निर्देश   सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को निर्देश दिया कि मामले के अंतिम निर्णय तक अदालत की अनुमति के बिना परिसर में कोई संरचनात्मक बदलाव नहीं किया जाए। कोर्ट ने कहा कि यह अत्यंत संवेदनशील मामला है और सभी पक्षों को शांति बनाए रखनी चाहिए।   दो-तीन सप्ताह बाद होगी अगली सुनवाई   सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि मामले की अगली सुनवाई दो से तीन सप्ताह के भीतर की जाएगी। इस दौरान मौजूदा अंतरिम व्यवस्था जारी रहेगी और दोनों पक्षों की दलीलें विस्तार से सुनी जाएंगी।

abhishek singh जुलाई 15, 2026 0
Sonam Raghuvanshi Bail
राजा रघुवंशी हत्याकांड में सोनम की जमानत पर अब 17 जुलाई को होगी सुनवाई

नई दिल्ली, एजेंसियां। चर्चित राजा रघुवंशी हत्याकांड की मुख्य आरोपी सोनम रघुवंशी की जमानत को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को सुनवाई नहीं हो सकी। अब इस मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई को होगी। सुनवाई के दौरान मेघालय सरकार सोनम की जमानत रद्द करने की अपनी मांग दोहराएगी और गिरफ्तारी के समय उपलब्ध कराए गए तथ्यों से संबंधित दस्तावेज अदालत के समक्ष पेश करेगी। वहीं, सोनम की ओर से उनके वकील भी अपना पक्ष रखेंगे।   गिरफ्तारी प्रक्रिया पर उठे थे सवाल सोनम रघुवंशी को निचली अदालत ने इस आधार पर जमानत दी थी कि गिरफ्तारी के समय उन्हें कानून के अनुसार गिरफ्तारी के आधार स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं कराए गए थे। बाद में मेघालय हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। इसी आदेश को चुनौती देते हुए मेघालय सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची है और जमानत रद्द करने की मांग की है।   टाइपिंग त्रुटि को लेकर बना विवाद राज्य सरकार का कहना है कि गिरफ्तारी के आधार आरोपी को बताए गए थे और विवाद केवल दस्तावेज में हुई एक टाइपिंग त्रुटि का है। सरकार के अनुसार, दस्तावेज में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 103(1) के स्थान पर गलती से धारा 403(1) दर्ज हो गई थी, जबकि बीएनएस में ऐसी कोई धारा मौजूद नहीं है। मेघालय सरकार का दावा है कि इस तकनीकी त्रुटि के बावजूद सोनम के खिलाफ हत्या में संलिप्तता के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं।   17 जुलाई की सुनवाई पर टिकी नजरें इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने मेघालय सरकार की उस मांग को तत्काल स्वीकार नहीं किया था, जिसमें सोनम की जमानत पर तुरंत रोक लगाने का आग्रह किया गया था। हालांकि अदालत ने यह भी टिप्पणी की थी कि प्रथम दृष्टया ऐसा नहीं लगता कि गिरफ्तारी के आधार पूरी तरह बताए ही नहीं गए थे। अब 17 जुलाई को होने वाली सुनवाई में अदालत दोनों पक्षों की दलीलें और संबंधित दस्तावेजों पर विचार करेगी। इस सुनवाई पर मामले की आगे की दिशा काफी हद तक निर्भर मानी जा रही है।

abhishek singh जुलाई 15, 2026 0
Samay Raina
सुप्रीम कोर्ट की समय रैना को कड़ी फटकार, आदेश उल्लंघन पर 10 लाख का जुर्माना

नई दिल्ली, एजेंसियां। कॉमेडियन समय रैना और कंटेंट क्रिएटर रणवीर अल्लाहबादिया से जुड़े मामले में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने अपने पूर्व आदेश का पालन नहीं करने पर समय रैना को फटकार लगाते हुए उन पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। साथ ही चेतावनी दी कि यदि निर्धारित समय में जुर्माने की राशि जमा नहीं की गई तो उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। अदालत ने सुनवाई के दौरान दोनों के आचरण पर गंभीर सवाल उठाए और कहा कि सार्वजनिक मंचों पर प्रभाव रखने वाले लोगों को अपनी जिम्मेदारियों का भी एहसास होना चाहिए।   सुनवाई के दौरान सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि खुद को ‘यूथ आइकॉन’ कहने वाले लोगों से समाज बेहतर उदाहरण की उम्मीद करता है। अदालत ने कहा कि समय रैना ने न्यायालय को गुमराह किया और दिए गए आश्वासनों के बावजूद आदेशों का पालन नहीं किया। कोर्ट ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड पर दर्ज वादों और बाद के व्यवहार में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है, जिसे गंभीरता से लिया गया है।   क्या है मामला ? यह मामला पिछले वर्ष अगस्त में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें ‘इंडियाज गॉट लेटेंट’ कार्यक्रम के दौरान विकलांगता और दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियों से पीड़ित लोगों पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणियों को लेकर समय रैना और अन्य कॉमेडियनों को बिना शर्त सार्वजनिक माफी मांगने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने तब कहा था कि इस तरह की सामग्री सूचना प्रौद्योगिकी कानून के तहत दंडनीय हो सकती है और संबंधित लोगों को अपने डिजिटल मंचों पर माफी मांगनी चाहिए।   मंगलवार की सुनवाई में अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायालय के आदेशों की अवहेलना किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। अब इस मामले में समय रैना को जुर्माने की राशि जमा करनी होगी, जबकि आगे की सुनवाई में अदालत उनके आदेशों के अनुपालन और अन्य कानूनी पहलुओं पर विचार करेगी।

abhishek singh जुलाई 14, 2026 0
Ram Mandir Offering Theft
राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, CBI जांच की मांग पर CJI सूर्यकांत की बेंच करेगी सुनवाई

नई दिल्ली, एजेंसियां। अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे और दान राशि से जुड़े कथित अनियमितताओं का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। मामले में दायर याचिकाओं में केंद्रीय जांच ब्यूरो से स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराने की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश  सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ करेगी।   CBI जांच और FIR दर्ज करने की मांग   याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए चढ़ावे और दान से जुड़ी कथित गड़बड़ियों की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए। याचिका में CBI के नेतृत्व में जांच कराने और मामले में प्राथमिकी दर्ज करने की मांग भी की गई है।   मंदिर दान की पारदर्शिता पर उठे सवाल   याचिका में आरोप लगाया गया है कि मंदिर से जुड़े दान और चढ़ावे की व्यवस्था में कथित वित्तीय अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच जरूरी है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जांच ऐसी एजेंसी से कराई जानी चाहिए जिसके पास बड़े वित्तीय मामलों की जांच का अनुभव हो।   सुप्रीम कोर्ट में जल्द होगी सुनवाई   मामले की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने इसे सूचीबद्ध किया है। रिपोर्टों के अनुसार, 13 जुलाई को CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ इस मामले पर सुनवाई कर सकती है।   अयोध्या पुलिस भी कर रही जांच   इस मामले में अयोध्या पुलिस की ओर से भी जांच जारी है। रिपोर्टों के मुताबिक, जांच के दौरान कुछ संदिग्धों से पूछताछ की गई है और कथित रूप से चढ़ावे में शामिल आभूषणों से जुड़े मामलों की भी पड़ताल की जा रही है।   मामले पर देशभर की नजर   राम मंदिर से जुड़ा यह मामला धार्मिक और सामाजिक रूप से संवेदनशील माना जा रहा है। अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर है कि अदालत इस मामले में CBI जांच या किसी अन्य जांच व्यवस्था को लेकर क्या दिशा-निर्देश देती है।

abhishek singh जुलाई 10, 2026 0
Baba Baidyanath Dham
बाबाधाम का होगा भव्य कायाकल्प, अयोध्या मॉडल पर 30 एकड़ में बनेगा आधुनिक कॉरिडोर

देवघर। झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम को विश्वस्तरीय धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। अयोध्या की तर्ज पर मंदिर परिसर के आसपास लगभग 30 एकड़ क्षेत्र में भव्य कॉरिडोर विकसित करने की योजना तैयार की जा रही है। इस परियोजना का उद्देश्य श्रद्धालुओं को आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराना, यातायात व्यवस्था को सुव्यवस्थित बनाना और मंदिर की ऐतिहासिक एवं धार्मिक विरासत का संरक्षण करना है।   सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद एनआईटी पटना को बाबा बैद्यनाथ धाम के समग्र विकास की रूपरेखा तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। प्रस्तावित योजना के पहले चरण में 30 एकड़ क्षेत्र में कॉरिडोर विकसित किया जाएगा। इसके बाद दूसरे चरण में करीब 40.24 एकड़ क्षेत्र में रणनीतिक विकास कार्य होंगे, जबकि तीसरे चरण में 83.70 एकड़ क्षेत्र में फैले ऐतिहासिक जल स्रोतों के संरक्षण और पुनर्जीवन पर काम किया जाएगा।    शिवगंगा, मानसरोवर, सतार पोखरिया और जलसार योजना के तहत शिवगंगा, मानसरोवर, सतार पोखरिया और जलसार जैसे धार्मिक महत्व वाले जल निकायों का संरक्षण किया जाएगा। साथ ही, बाबाधाम को देवघर के चार प्रमुख प्रवेश मार्गों से जोड़ने के लिए अलग-अलग तीर्थयात्री पहुंच मार्ग भी विकसित किए जाएंगे, जिससे श्रद्धालुओं की आवाजाही अधिक सुगम हो सके।   मास्टर प्लान में मंदिर के चारों ओर 750 मीटर क्षेत्र को 'कोर हेरिटेज जोन' बनाने का प्रस्ताव है। इस क्षेत्र में पैदल यात्रियों को प्राथमिकता दी जाएगी और निजी वाहनों के प्रवेश पर प्रतिबंध रहेगा। केवल आपातकालीन सेवाओं, मंदिर प्रशासन और अधिकृत इलेक्ट्रिक वाहनों को ही अनुमति मिलेगी। इसके बाहर 750 से 1000 मीटर तक 'मैनेजमेंट जोन' विकसित किया जाएगा, जहां मल्टीलेवल पार्किंग, तीर्थयात्री सुविधा केंद्र, सार्वजनिक परिवहन इंटरचेंज और विश्राम स्थल बनाए जाएंगे।   इमरजेंसी एक्सेस कॉरिडोर भी बनाया जाएगा इसके अलावा 20 मीटर चौड़ा इमरजेंसी एक्सेस कॉरिडोर भी बनाया जाएगा, ताकि किसी भी आपात स्थिति में राहत एवं बचाव कार्य तेजी से किया जा सके। हालांकि इस महत्वाकांक्षी परियोजना को लागू करने से पहले राज्य सरकार, देवघर जिला प्रशासन, नगर निगम, बाबा बैद्यनाथ मंदिर ट्रस्ट और अन्य संबंधित एजेंसियों की मंजूरी आवश्यक होगी। योजना पूरी होने के बाद बाबाधाम न केवल श्रद्धालुओं के लिए अधिक सुविधाजनक बनेगा, बल्कि देश के प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थलों में भी अपनी अलग पहचान स्थापित करेगा।

abhishek singh जुलाई 8, 2026 0
Sonam Raghuvanshi
राजा रघुवंशी हत्याकांड: सुप्रीम कोर्ट से सोनम रघुवंशी को बड़ी राहत, जमानत पर रोक से इनकार

नई दिल्ली, एजेंसियां। चर्चित राजा रघुवंशी हनीमून मर्डर केस की मुख्य आरोपी सोनम रघुवंशी को फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से राहत मिल गई है। शीर्ष अदालत ने उनकी जमानत पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने मेघालय सरकार की उस याचिका पर नोटिस जारी किया है, जिसमें हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत को चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में हाईकोर्ट के फैसले को लेकर कुछ सवाल जरूर हैं, लेकिन चूंकि सोनम पहले ही जेल से रिहा हो चुकी हैं, इसलिए इस स्तर पर उनकी जमानत पर रोक लगाना उचित नहीं होगा।   सरकार ने बताया हाईकोर्ट का फैसला चौंकाने वाला सुनवाई के दौरान मेघालय सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हाईकोर्ट के फैसले को "बेहद चौंकाने वाला" बताया। उन्होंने अदालत को बताया कि यह एक सुनियोजित हत्या का मामला है, जिसमें हनीमून पर गए राजा रघुवंशी की हत्या कर शव को गहरी खाई में फेंक दिया गया था। सरकार के मुताबिक, इस मामले में 94 गवाह हैं और मुकदमे की सुनवाई जारी है।   टाइपिंग की गलती बनी जमानत का आधार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी दस्तावेज में भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1) की जगह गलती से धारा 403(1) लिखे जाने को आधार बनाकर जमानत दी। मेघालय सरकार का तर्क है कि यह केवल टाइपिंग की त्रुटि थी और आरोपी को गिरफ्तारी के समय हत्या के आरोपों की पूरी जानकारी दी गई थी। इसलिए इतनी गंभीर वारदात में सिर्फ तकनीकी गलती के आधार पर जमानत देना उचित नहीं है।   सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरश ने पूछा कि यदि पहले की जमानत याचिकाओं में गिरफ्तारी के आधार का मुद्दा नहीं उठाया गया था, तो बाद में यही आधार कैसे बन गया। वहीं, सोनम के वकील ने कहा कि उन्हें गिरफ्तारी के आधार सही तरीके से नहीं बताए गए थे और वह सख्त शर्तों के तहत शिलांग में रह रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फिलहाल जमानत बरकरार रहेगी, लेकिन मामले की विस्तृत सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के आदेश की वैधता पर विचार किया जाएगा।

abhishek singh जुलाई 3, 2026 0
Asaram Bapu
आसाराम को सुप्रीम कोर्ट से नहीं मिली राहत, कोर्ट ने  कहा- जान को खतरा हुआ तभी करेंगे विचार

नई दिल्ली, एजेंसियां। नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम को सुप्रीम कोर्ट से फिलहाल कोई राहत नहीं मिली है। शीर्ष अदालत ने उनकी जमानत याचिका पर तत्काल राहत देने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि केवल गंभीर स्वास्थ्य स्थिति या जीवन को वास्तविक खतरा होने की स्थिति में ही जमानत पर विचार किया जाएगा। अदालत ने इस मामले में राजस्थान सरकार को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।   उम्र और बीमारी को नहीं माना पर्याप्त आधार न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि केवल अधिक उम्र या बीमारी जमानत का आधार नहीं बन सकती। आसाराम की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि उनकी उम्र 80 वर्ष से अधिक है और वे कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं। इस पर अदालत ने कहा कि यदि भविष्य में स्वास्थ्य की स्थिति इतनी गंभीर हो जाए कि उनके जीवन को खतरा हो, तभी राहत पर विचार किया जाएगा।   चिकित्सा सुविधा सुनिश्चित करने का निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल सजा पर रोक लगाने से भी इनकार कर दिया। साथ ही जेल प्रशासन को निर्देश दिया कि आसाराम को आवश्यक और उचित चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार का पक्ष सुनने के बाद ही मामले में आगे कोई फैसला लिया जाएगा।   हाईकोर्ट पहले ही बरकरार रख चुका है सजा इससे पहले राजस्थान हाईकोर्ट ने 27 मई को आसाराम की उम्रकैद की सजा और दोषसिद्धि को बरकरार रखा था। हालांकि, अदालत ने उन्हें सामूहिक दुष्कर्म और कुछ अन्य धाराओं से राहत दी थी, लेकिन नाबालिग से दुष्कर्म, यौन उत्पीड़न, पॉक्सो कानून की संबंधित धाराओं, गलत तरीके से बंधक बनाने, आपराधिक धमकी और अन्य आरोपों में दोषसिद्धि कायम रखी थी।   2013 का है मामला यह मामला वर्ष 2013 का है, जब आसाराम पर अपने आश्रम में पढ़ने वाली एक नाबालिग छात्रा के साथ दुष्कर्म का आरोप लगा था। ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2018 में उन्हें दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, लेकिन फिलहाल शीर्ष अदालत ने भी तत्काल जमानत देने से इनकार कर दिया है।

abhishek singh जून 30, 2026 0
Supreme Court Home Buyers
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: फ्लैट का कब्जा लेने के बाद भी होमबायर्स मांग सकेंगे मुआवजा

नई दिल्ली, एजेंसियां। घर खरीदने वालों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी बिल्डर ने तय समय पर फ्लैट का कब्जा नहीं दिया और खरीदार ने बाद में मजबूरी में कब्जा ले भी लिया, तब भी वह देरी के लिए मुआवजे की मांग कर सकता है। केवल कब्जा स्वीकार कर लेने से होमबायर का मुआवजे का अधिकार खत्म नहीं होगा।   क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?   सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि बिल्डर समय पर फ्लैट नहीं देता, तो यह 'सेवा में कमी' (Deficiency in Service) माना जाएगा। ऐसे मामलों में खरीदार उपभोक्ता आयोग (Consumer Commission) का दरवाजा खटखटा सकता है और उचित मुआवजा मांग सकता है, भले ही उसने बाद में फ्लैट का कब्जा ले लिया हो।   बिल्डरों को नहीं मिलेगा राहत का फायदा   अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कई बार खरीदार किराए और ईएमआई के दोहरे बोझ के कारण मजबूरी में फ्लैट का कब्जा ले लेते हैं। ऐसे में बिल्डर यह तर्क नहीं दे सकता कि कब्जा मिलने के बाद खरीदार को मुआवजा नहीं मिलेगा।   लाखों होमबायर्स को मिलेगा फायदा   इस फैसले से देशभर के उन लाखों लोगों को राहत मिलने की उम्मीद है, जिनके फ्लैट तय समय से महीनों या वर्षों की देरी से मिले। अब वे देरी के कारण हुए आर्थिक नुकसान और मानसिक परेशानी के लिए मुआवजे की मांग कर सकेंगे।   उपभोक्ता अधिकार हुए और मजबूत   कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला रियल एस्टेट सेक्टर में बिल्डरों की जवाबदेही बढ़ाएगा और खरीदारों के अधिकारों को मजबूत करेगा। इससे भविष्य में बिल्डरों पर समय पर परियोजनाएं पूरी करने का दबाव भी बढ़ेगा।

abhishek singh जून 27, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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