ढाका, एजेंसियां। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने भारत से पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण की प्रक्रिया तेज करने की उम्मीद जताई है। प्रधानमंत्री ने 10 अगस्त को बांग्लादेश में भारत के नए उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी से मुलाकात के दौरान यह मुद्दा उठाया। बैठक में दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को बेहतर बनाने और लंबित मुद्दों को बातचीत के जरिए सुलझाने पर भी चर्चा हुई। शेख हसीना के प्रत्यर्पण पर बांग्लादेश का दबाव तारिक रहमान ने भारतीय उच्चायुक्त के सामने शेख हसीना के प्रत्यर्पण का मुद्दा प्रमुखता से रखा। बांग्लादेश सरकार लंबे समय से भारत से शेख हसीना को वापस भेजने की मांग कर रही है। ढाका का कहना है कि भारत से प्रत्यर्पण अनुरोध पर जल्द सकारात्मक कार्रवाई की उम्मीद है। बांग्लादेश में शेख हसीना के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले चल रहे हैं और उन्हें एक मामले में दोषी ठहराया जा चुका है। हसीना अगस्त 2024 में बांग्लादेश से निकलने के बाद भारत में रह रही हैं। भारत-बांग्लादेश संबंधों को सुधारने की कोशिश बैठक के दौरान तारिक रहमान ने भारत के साथ संबंधों को फिर से बेहतर बनाने के लिए अनुकूल माहौल तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया। दोनों देशों के बीच व्यापार, सीमा, ऊर्जा, सुरक्षा और क्षेत्रीय सहयोग जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। बांग्लादेशी प्रधानमंत्री ने यह भी संकेत दिया कि दोनों देशों के बीच किसी भी ऐसे कदम से बचना चाहिए जिससे द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान पहुंचे। भारत की ओर से भी बातचीत और रचनात्मक तरीके से संबंधों को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया है। हसीना के बयानों से भी बढ़ा तनाव शेख हसीना के भारत में रहते हुए हाल में दिए गए सार्वजनिक बयानों को लेकर बांग्लादेश सरकार ने नाराजगी जताई है। ढाका का कहना है कि भारत की जमीन से हसीना की राजनीतिक गतिविधियां दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित कर सकती हैं। भारत ने दूसरी ओर कहा है कि शेख हसीना के प्रत्यर्पण अनुरोध की समीक्षा कानूनी प्रक्रियाओं के तहत की जा रही है। नई दिल्ली ने साथ ही बांग्लादेश के साथ रचनात्मक और सकारात्मक संबंध बनाए रखने की प्रतिबद्धता भी दोहराई है। आगे की बातचीत पर टिकी नजर तारिक रहमान और भारतीय उच्चायुक्त की बैठक ऐसे समय हुई है जब दोनों देश रिश्तों में आई खटास को कम करने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि शेख हसीना का प्रत्यर्पण दोनों देशों के बीच सबसे संवेदनशील मुद्दों में बना हुआ है। अब नजर इस बात पर है कि भारत बांग्लादेश की नई मांग पर क्या रुख अपनाता है और क्या दोनों देश प्रत्यर्पण समेत अन्य लंबित मुद्दों पर कूटनीतिक बातचीत के जरिए कोई रास्ता निकाल पाते हैं।
जलपाईगुड़ी, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले में बांग्लादेशी बदमाशों द्वारा कथित तौर पर अगवा किए गए भारतीय किसान दीपांकर गोप की 48 घंटे बाद भी घर वापसी नहीं हो सकी है। किसान के परिजन और स्थानीय ग्रामीण लगातार सीमा पर इंतजार कर रहे हैं। मामले को लेकर ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ती जा रही है और उन्होंने केंद्र सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। शनिवार को हुआ था किसान का अपहरण बताया गया कि शनिवार को राजगंज ब्लॉक के कुकुर जन इलाके में चाय किसान दीपांकर गोप का कथित तौर पर बांग्लादेशी बदमाशों ने अपहरण कर लिया। इससे पहले सीमा क्षेत्र में चाय की तस्करी के प्रयास को BSF ने नाकाम किया था और इस मामले में एक बांग्लादेशी नागरिक को गिरफ्तार किया गया था। आरोप है कि इसी कार्रवाई के बाद बदले की भावना से किसान को अगवा किया गया। सीमा पर इंतजार करते रहे परिजन दीपांकर के परिवार की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है। रविवार शाम ग्रामीणों ने चौलहाटी BSF शिविर के सामने प्रदर्शन भी किया। प्रदर्शन के दौरान स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के अधिकारियों को भी लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा। पति की रिहाई की उम्मीद में पहुंची पत्नी दीपांकर की पत्नी महामाया गोप अपने ससुर और दो बेटों के साथ सीमा द्वार संख्या 28 पर पति की वापसी की उम्मीद में पहुंचीं। उन्हें उम्मीद थी कि भारत-बांग्लादेश सीमा पर अधिकारियों की बैठक के बाद उनके पति को रिहा कर दिया जाएगा। हालांकि, बैठक के बाद जब अधिकारी बिना दीपांकर के लौटे तो परिवार को निराशा हाथ लगी। बताया गया कि दीपांकर की रिहाई के लिए कथित तौर पर फिरौती की मांग की जा रही है। यह जानकारी मिलने के बाद उनकी पत्नी के बेहोश होने की बात सामने आई है। रिहाई के बदले रखी गई कथित शर्त परिजनों के अनुसार, अपहरणकर्ताओं ने दीपांकर को वापस भेजने के बदले सीमा क्षेत्र से गिरफ्तार किए गए एक बांग्लादेशी नागरिक को वापस भेजने की कथित शर्त रखी है। इस मुद्दे पर BSF और बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड (BGB) के अधिकारियों के बीच कई दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं निकल पाया है। गृह मंत्री से हस्तक्षेप की मांग दीपांकर के पिता और ग्रामीणों ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि सरकार को कूटनीतिक और सुरक्षा स्तर पर तत्काल कार्रवाई कर किसान की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करनी चाहिए। BSF से गश्त बढ़ाने की मांग घटना के बाद स्थानीय लोगों में सीमा सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी नाराजगी है। ग्रामीणों ने सीमा क्षेत्र में BSF की गश्त फिर से बढ़ाने की मांग की है। उनका आरोप है कि गश्त कम होने से सीमा पार से होने वाली गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है। फिलहाल दीपांकर गोप की सुरक्षित वापसी को लेकर परिवार और ग्रामीणों की निगाहें भारत-बांग्लादेश सीमा पर चल रही बातचीत पर टिकी हैं।
बांग्लादेश में राष्ट्रपति चुनाव 20 अगस्त को, शहाबुद्दीन के इस्तीफे के बाद चुनाव आयोग ने तय की तारीख ढाका, एजेंसियां। बांग्लादेश में नए राष्ट्रपति के चुनाव की तारीख तय हो गई है। निर्वाचन आयोग ने घोषणा की है कि देश में 20 अगस्त 2026 को राष्ट्रपति चुनाव कराया जाएगा। यह चुनाव मौजूदा राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन के स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा देने के बाद कराया जा रहा है। 20 अगस्त को होगा चुनाव बांग्लादेश निर्वाचन आयोग के अनुसार राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव 20 अगस्त को होगा। देश में राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता द्वारा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संसद के सदस्यों द्वारा किया जाता है। राष्ट्रपति का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है। चुनाव आयोग ने राष्ट्रपति पद के लिए निर्वाचन प्रक्रिया शुरू करने की दिशा में कार्यक्रम जारी किया है। अब राजनीतिक दलों और संसद सदस्यों की गतिविधियां इस चुनाव को लेकर तेज होने की संभावना है। स्वास्थ्य कारणों से शहाबुद्दीन ने दिया इस्तीफा मोहम्मद शहाबुद्दीन ने पिछले महीने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दिया था। वह पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के करीबी माने जाते थे। उनके इस्तीफे के बाद राष्ट्रपति पद खाली हो गया और अब संवैधानिक प्रक्रिया के तहत नए राष्ट्रपति का चुनाव कराया जा रहा है। BNP में उम्मीदवार चयन की तैयारी बांग्लादेश की सत्तारूढ़ BNP ने राष्ट्रपति चुनाव के लिए अपने उम्मीदवार के चयन की प्रक्रिया शुरू कर दी है। पार्टी ने प्रधानमंत्री तारिक रहमान को राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का नाम तय करने का अधिकार दिया है। इससे चुनाव से पहले राजनीतिक गतिविधियां तेज होने की संभावना है। नए राष्ट्रपति का चुनाव बांग्लादेश की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। संसद सदस्य करेंगे राष्ट्रपति का चुनाव बांग्लादेश में राष्ट्रपति का पद मुख्य रूप से संवैधानिक और औपचारिक भूमिका वाला है। राष्ट्रपति का चुनाव संसद सदस्य करते हैं, इसलिए 20 अगस्त का चुनाव आम जनता का प्रत्यक्ष मतदान वाला चुनाव नहीं होगा। राष्ट्रपति चुनाव ऐसे समय में हो रहा है जब बांग्लादेश में 2026 के आम चुनाव के बाद नई सरकार सत्ता में है। ऐसे में नए राष्ट्रपति के चुनाव को देश की नई राजनीतिक व्यवस्था के अगले महत्वपूर्ण चरण के रूप में देखा जा रहा है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के बेटे और उनके पूर्व सलाहकार सजीव वाजेद जॉय ने बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति को लेकर गंभीर चिंता जताई है। 5 अगस्त 2026 को एक मीडिया बातचीत के दौरान जॉय ने दावा किया कि बांग्लादेश भारत की पूर्वी सीमा पर “दूसरा पाकिस्तान” बन गया है। उन्होंने बांग्लादेश में कट्टरपंथी समूहों की बढ़ती सक्रियता और सुरक्षा स्थिति को भारत के लिए चिंता का विषय बताया। कट्टरपंथी संगठनों को लेकर जताई चिंता जॉय ने बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों को लेकर चिंता जाहिर की। उनके मुताबिक, देश में ऐसे समूहों को पहले की तुलना में ज्यादा जगह मिल रही है। उन्होंने दावा किया कि कुछ प्रतिबंधित या दोषी ठहराए गए आतंकवादियों की रिहाई और कट्टरपंथी गतिविधियों के लिए बढ़ती गुंजाइश क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से गंभीर मुद्दा है। उन्होंने इन घटनाक्रमों को केवल बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं बताया, बल्कि भारत और व्यापक क्षेत्र की सुरक्षा से भी जोड़कर देखा। भारत के लिए खतरे की चेतावनी सजीव वाजेद जॉय ने कहा कि बांग्लादेश में हो रहे बदलाव भारत के लिए भी चिंता का विषय होने चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से भारत की पूर्वी सीमा पर बदलते सुरक्षा माहौल का जिक्र किया। जॉय के मुताबिक, बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता और कट्टरपंथी ताकतों का प्रभाव बढ़ना भारत के साथ-साथ पूरे क्षेत्र की सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, ये जॉय के राजनीतिक आरोप और आकलन हैं, स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य नहीं। शेख हसीना की वापसी के बयान के बीच आया बयान जॉय का यह बयान उनकी मां शेख हसीना की 5 अगस्त को नई दिल्ली से हुई वर्चुअल मीडिया बातचीत के दौरान दिए गए बयानों के बीच सामने आया। हसीना ने इस दौरान दिसंबर में बांग्लादेश लौटने का संकल्प जताया और अपनी पार्टी अवामी लीग पर लगे प्रतिबंध को हटाने की मांग की। हसीना के संबोधन पर बांग्लादेश सरकार ने कड़ा विरोध जताया है। ऐसे में जॉय की टिप्पणी ने बांग्लादेश की मौजूदा राजनीतिक स्थिति और भारत-बांग्लादेश संबंधों को लेकर बहस को और तेज कर दिया है। भारत-बांग्लादेश संबंधों पर बढ़ी नजर शेख हसीना के भारत में रहने और उनके परिवार की ओर से बांग्लादेश की मौजूदा सरकार पर लगातार सवाल उठाए जाने के बीच दोनों देशों के संबंध संवेदनशील दौर से गुजर रहे हैं। जॉय की “दूसरा पाकिस्तान” वाली टिप्पणी भी इसी व्यापक राजनीतिक विवाद का हिस्सा है। फिलहाल जॉय के आरोपों पर बांग्लादेश सरकार की ओर से प्रतिक्रिया और भारत की आधिकारिक स्थिति पर नजर बनी हुई है। आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच कूटनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना है।
मगुरा, एजेंसियां। बांग्लादेश के पूर्व क्रिकेट कप्तान और पूर्व सांसद शाकिब अल हसन के पुश्तैनी घर को बुधवार रात पेट्रोल बम से निशाना बनाया गया। घटना मगुरा शहर के केशबमोर इलाके में करीब रात 8:45 बजे हुई। रिपोर्टों के अनुसार, अज्ञात हमलावरों ने घर पर पेट्रोल बम फेंका और आग लगाने की कोशिश की। घटना के बाद इलाके में तनाव का माहौल है। शेख हसीना की प्रेस कॉन्फ्रेंस के कुछ घंटे बाद हमला यह हमला ऐसे समय हुआ जब शाकिब अल हसन ने दिल्ली से शेख हसीना की वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लिया था। शाकिब की इस राजनीतिक कार्यक्रम में मौजूदगी के कुछ घंटे बाद उनके पुश्तैनी घर को निशाना बनाए जाने से घटना को राजनीतिक घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, हमले के पीछे की वास्तविक वजह की आधिकारिक पुष्टि अभी जांच के बाद ही हो सकेगी। शाकिब बांग्लादेश की अवामी लीग से जुड़े रहे हैं और पूर्व में सांसद भी रह चुके हैं। बांग्लादेश में मौजूदा राजनीतिक तनाव के बीच उनके राजनीतिक संबंधों को लेकर विवाद पहले भी सामने आते रहे हैं। अज्ञात हमलावरों ने फेंका पेट्रोल बम स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, हमलावरों ने रात में शाकिब के पुश्तैनी घर को निशाना बनाकर पेट्रोल बम फेंका। इसके बाद घर में आग लगाने की कोशिश की गई। घटना का वीडियो भी सामने आया है, जिसके बाद यह मामला सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा में आ गया है। फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों में किसी के घायल होने या बड़े पैमाने पर नुकसान की पुष्टि नहीं हुई है। पुलिस ने घटना की जांच शुरू कर दी है और हमलावरों की पहचान का प्रयास किया जा रहा है। बांग्लादेश में राजनीतिक तनाव के बीच बढ़ी चिंता शाकिब के घर पर हमला बांग्लादेश में जारी राजनीतिक तनाव के बीच हुआ है। शेख हसीना की राजनीतिक गतिविधियों और उनके समर्थकों से जुड़े घटनाक्रमों को लेकर देश में पहले भी तनाव की स्थिति बनी रही है। ऐसे में शाकिब के घर पर हमला सुरक्षा व्यवस्था और राजनीतिक माहौल को लेकर नई चिंता पैदा कर रहा है। अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि हमले के पीछे कौन लोग थे। पुलिस जांच के बाद ही हमलावरों और घटना के वास्तविक मकसद को लेकर स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है।
सरकार ने शेख हसीना के भारत से दिए जाने वाले बयान से बनाई दूरी, कहा- कार्यक्रम से भारत सरकार का कोई संबंध नहीं नई दिल्ली, एजेंसियां। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के भारत से होने वाले वर्चुअल संबोधन को लेकर भारत सरकार ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि नई दिल्ली में आयोजित होने वाला यह कार्यक्रम निजी प्रकृति का है और भारत सरकार का इससे कोई संबंध नहीं है। विदेश मंत्रालय ने साफ किया रुख विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि शेख हसीना जिस कार्यक्रम में संबोधित करने वाली हैं, वह भारत सरकार द्वारा आयोजित या प्रायोजित कार्यक्रम नहीं है। मंत्रालय ने इस आयोजन से खुद को स्पष्ट रूप से अलग कर लिया है। यह स्पष्टीकरण ऐसे समय आया है जब शेख हसीना के भारत से दिए जाने वाले संबोधन को लेकर बांग्लादेश में राजनीतिक हलचल बढ़ गई है। बांग्लादेश ने मीडिया को दी चेतावनी शेख हसीना के प्रस्तावित वर्चुअल संबोधन को लेकर बांग्लादेश सरकार ने भी सख्त रुख अपनाया है। वहां के अधिकारियों ने मीडिया संस्थानों को शेख हसीना के बयान को प्रकाशित या प्रसारित नहीं करने की चेतावनी दी है। बांग्लादेश की ओर से आशंका जताई गई है कि उनका संबोधन देश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को प्रभावित कर सकता है। भारत-बांग्लादेश संबंधों के बीच बढ़ी संवेदनशीलता शेख हसीना पिछले वर्ष बांग्लादेश में राजनीतिक उथल-पुथल के बाद भारत आई थीं। इसके बाद से उनका भारत में रहना दोनों देशों के बीच संवेदनशील कूटनीतिक मुद्दा बना हुआ है। भारत सरकार ने इस पूरे मामले में यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि शेख हसीना का निजी कार्यक्रम भारत सरकार की आधिकारिक गतिविधि नहीं है। ऐसे में इस आयोजन को भारत सरकार की आधिकारिक राजनीतिक पहल के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
नई दिल्ली, एजेंसियां। बांग्लादेश ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के दिल्ली से प्रस्तावित वर्चुअल संबोधन को लेकर भारत से आधिकारिक तौर पर स्पष्टीकरण मांगा है। ढाका ने चिंता जताई है कि भारत की धरती से शेख हसीना की राजनीतिक गतिविधियां दोनों देशों के बीच संबंधों को प्रभावित कर सकती हैं। 5 अगस्त को होना है वर्चुअल संबोधन रिपोर्ट के मुताबिक, शेख हसीना 5 अगस्त को दिल्ली से एक वर्चुअल कार्यक्रम को संबोधित करने वाली हैं। यह कार्यक्रम Foreign Correspondents’ Club of South Asia (FCCSA) की ओर से आयोजित किया जा रहा है और बांग्लादेश में उनके शासन के पतन के बाद हुए छात्र आंदोलन की दूसरी वर्षगांठ से जुड़ा है। शेख हसीना अगस्त 2024 में बांग्लादेश छोड़ने के बाद से भारत में रह रही हैं। उनके प्रस्तावित संबोधन को लेकर ढाका की ओर से नई दिल्ली से स्थिति स्पष्ट करने की मांग की गई है। बांग्लादेश ने राजनयिक संबंधों पर जताई चिंता बांग्लादेश के विदेश मामलों के राज्य मंत्री शमा ओबैद इस्लाम ने कहा है कि भारत की जमीन से किसी ऐसे व्यक्ति की राजनीतिक गतिविधियां, जिसे बांग्लादेश भगोड़ा मानता है, दोनों देशों के बीच संबंधों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। ढाका ने इस मुद्दे को राजनयिक स्तर पर उठाने की बात भी कही है। बांग्लादेश लंबे समय से शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग करता रहा है। ऐसे में दिल्ली से उनके सार्वजनिक संबोधन की योजना ने दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। शेख हसीना के खिलाफ बांग्लादेश में गंभीर मामले बांग्लादेश में शेख हसीना के खिलाफ कई मामले दर्ज हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में उन्हें 2024 के हिंसक दमन से जुड़े अपराधों के मामले में मौत की सजा सुनाई गई थी। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक, उस दौरान हुई हिंसा में 1,400 तक लोगों की मौत हुई थी। ढाका लगातार शेख हसीना को वापस बांग्लादेश भेजने की मांग कर रहा है। वहीं, भारत में उनके प्रस्तावित वर्चुअल संबोधन पर अभी तक भारतीय सरकार या कार्यक्रम आयोजकों की ओर से कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। भारत-बांग्लादेश संबंधों पर बढ़ सकती है गर्माहट शेख हसीना का मुद्दा भारत और बांग्लादेश के बीच संबंधों में संवेदनशील विषय बना हुआ है। ढाका की ताजा आपत्ति के बाद अब नई दिल्ली के रुख पर नजर है। यदि भारत की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया आती है, तो इससे दोनों देशों के बीच शेख हसीना की राजनीतिक गतिविधियों और उनके प्रत्यर्पण को लेकर स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।
कोलकाता, एजेंसियां। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह आज से पश्चिम बंगाल के तीन दिवसीय दौरे पर रहेंगे। इस दौरे के दौरान उनका मुख्य फोकस सीमा सुरक्षा, कानून व्यवस्था, प्रशासनिक स्थिति और विकास योजनाओं की समीक्षा पर रहेगा। BSF जवानों से करेंगे मुलाकात अमित शाह अपने दौरे के दौरान पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों का दौरा करेंगे। वह सीमा सुरक्षा बल (BSF) के अधिकारियों और जवानों से मुलाकात कर सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करेंगे। खासतौर पर बांग्लादेश सीमा से जुड़े सुरक्षा मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। कानून व्यवस्था और नए आपराधिक कानूनों पर समीक्षा गृह मंत्री राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति और केंद्र द्वारा लागू किए गए नए आपराधिक कानूनों के क्रियान्वयन की भी समीक्षा करेंगे। इसके अलावा राज्य प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारियों के साथ बैठक कर जरूरी दिशा-निर्देश दे सकते हैं। विकास परियोजनाओं का भी लेंगे जायजा अमित शाह के कार्यक्रम में कई विकास परियोजनाओं से जुड़े कार्यक्रम भी शामिल हैं। वह BSF से संबंधित परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास भी कर सकते हैं। राजनीतिक नजरिए से भी अहम दौरा अमित शाह का यह बंगाल दौरा राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राज्य में संगठनात्मक गतिविधियों, आगामी राजनीतिक रणनीति और पार्टी कार्यकर्ताओं से संवाद को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं।
बंगाल की खाड़ी में रोहिंग्या शरणार्थियों से जुड़ा एक बड़ा समुद्री हादसा सामने आया है। म्यांमार से बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों की ओर जा रही दो नावों के खराब मौसम में लापता होने के बाद करीब 500 लोगों के डूबने की आशंका जताई जा रही है। अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन (IOM) और संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (UNHCR) के संयुक्त बयान के अनुसार, जून के अंतिम सप्ताह में दोनों नावें म्यांमार से रवाना हुई थीं। इनमें कुल 500 से अधिक लोग सवार थे, जिनका अब तक कोई पता नहीं चल सका है। खराब मौसम बना हादसे की वजह संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों के मुताबिक, एक नाव पर लगभग 250 लोग सवार थे, जिससे समुद्र में अचानक संपर्क टूट गया। वहीं दूसरी नाव, जिसमें करीब 280 लोग सवार थे, 8 जुलाई को म्यांमार के अयायारवाड़ी तट के पास तेज लहरों और खराब मौसम के बीच डूब गई। अधिकारियों का कहना है कि फिलहाल सभी यात्रियों की स्थिति स्पष्ट नहीं है और राहत व जांच की प्रक्रिया जारी है। 12 लाख से अधिक रोहिंग्या रह रहे हैं शिविरों में संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, वर्तमान में करीब 12 लाख रोहिंग्या शरणार्थी बांग्लादेश के राहत शिविरों में रह रहे हैं। सीमित संसाधनों और कठिन जीवन परिस्थितियों के कारण कई लोग बेहतर भविष्य की उम्मीद में समुद्री रास्तों से दूसरे देशों की ओर जाने का जोखिम उठाते हैं। खतरनाक समुद्री सफर बना मजबूरी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों का कहना है कि सुरक्षित और स्थायी समाधान नहीं मिलने के कारण रोहिंग्या शरणार्थी लगातार समुद्र के खतरनाक मार्गों का सहारा ले रहे हैं। खराब मौसम और मानव तस्करी के नेटवर्क के चलते ऐसे सफर अक्सर जानलेवा साबित होते हैं। जांच जारी, आधिकारिक पुष्टि का इंतजार आईओएम और यूएनएचसीआर ने इस संभावित समुद्री त्रासदी पर गहरी चिंता जताते हुए मामले की जांच शुरू कर दी है। हालांकि, अब तक मृतकों की आधिकारिक संख्या की पुष्टि नहीं की गई है। गौरतलब है कि पिछले वर्ष भी ऐसे ही समुद्री हादसों में 900 से अधिक रोहिंग्या शरणार्थियों की मौत हो गई थी या वे लापता हो गए थे।
मुंबई, एजेंसियां। क्रिस्टोफर नोलन की बहुप्रतीक्षित फिल्म 'द ओडिसी' 17 जुलाई को सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है और रिलीज के साथ ही इसे दर्शकों और समीक्षकों से शानदार प्रतिक्रिया मिल रही है। अब इस फिल्म की तारीफ करने वालों की सूची में हॉलीवुड सुपरस्टार टॉम क्रूज का नाम भी जुड़ गया है। अपनी दमदार एक्शन फिल्मों और खतरनाक स्टंट्स के लिए मशहूर अभिनेता ने फिल्म देखने के बाद सोशल मीडिया पर इसकी खुलकर सराहना की। टॉम क्रूज ने आईमैक्स 70mm थिएटर के बाहर फिल्म की टिकट हाथ में लिए अपनी तस्वीर साझा करते हुए लिखा, "वाह! क्रिस, एमा और आपकी शानदार कास्ट व क्रू को बहुत-बहुत धन्यवाद। मूवी थिएटर में एक शानदार रात के लिए शुक्रिया। मैं इसे दोबारा देखने का बेसब्री से इंतजार कर रहा हूं।" उनके इस पोस्ट ने सोशल मीडिया पर फिल्म को लेकर उत्साह और बढ़ा दिया। एक यूजर ने लिखा क्रूज की इस प्रतिक्रिया पर फैंस ने भी दिलचस्प कमेंट किए। एक यूजर ने लिखा, "अगर कोई फिल्म देखकर तुरंत दोबारा थिएटर जाने का मन करे, तो वही सबसे बड़ा रिव्यू होता है।" वहीं दूसरे ने मजाकिया अंदाज में कहा, "जब सचमुच चट्टानों से कूदने वाला इंसान किसी फिल्म की सिफारिश करे, तो बिना सोचे टिकट बुक कर लेनी चाहिए।" कई लोगों ने इसे नोलन की फिल्म के लिए सबसे बड़ी रिकमेंडेशन बताया। लिखित और निर्देशित 'द ओडिसी' क्रिस्टोफर नोलन द्वारा लिखित और निर्देशित 'द ओडिसी' होमर की प्रसिद्ध ग्रीक महाकाव्य कविता पर आधारित एक एपिक फैंटेसी-एक्शन फिल्म है। फिल्म में मैट डेमन ओडिसियस, टॉम हॉलैंड टेलीमैकस, ऐनी हैथवे पेनेलोप और रॉबर्ट पैटिनसन एंटिनस की भूमिका में नजर आए हैं। कहानी ट्रोजन युद्ध के बाद ओडिसियस की दस वर्षों तक चली संघर्षपूर्ण घर वापसी की यात्रा और उनके पारिवारिक व भावनात्मक रिश्तों को दिखाती है। 'ओपेनहाइमर' के बाद नोलन की यह पहली फिल्म है, जिसे भारत में बिना किसी कट के 'A' सर्टिफिकेट के साथ रिलीज किया गया है।
नई दिल्ली/ढाका: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने घोषणा की है कि वह इस वर्ष दिसंबर के आसपास अपने देश लौटने की योजना बना रही हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें पता है कि वापसी पर उनकी गिरफ्तारी हो सकती है या उनकी जान को खतरा हो सकता है, लेकिन इसके बावजूद वह स्वदेश लौटेंगी और अदालत के सामने आत्मसमर्पण करेंगी। 'गिरफ्तार करें या मार दें, मुझे अपने देश लौटना है' समाचार एजेंसी रॉयटर्स को दिए एक इंटरव्यू में शेख हसीना ने कहा कि अगस्त 2024 में छात्र आंदोलन के बाद उन्हें बांग्लादेश छोड़कर भारत आना पड़ा था। उन्होंने कहा, "वे मुझे गिरफ्तार कर सकते हैं, वे मुझे मार भी सकते हैं। फिर भी मुझे अपने देश लौटना ही होगा।" हसीना ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी प्रस्तावित वापसी को लेकर बांग्लादेश की अंतरिम सरकार से कोई बातचीत नहीं हुई है। कोर्ट में करेंगी आत्मसमर्पण पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा कि बांग्लादेश लौटने के बाद वह अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करेंगी और कानूनी प्रक्रिया का सामना करेंगी। अवामी लीग नेताओं पर कार्रवाई का आरोप शेख हसीना ने आरोप लगाया कि उनकी पार्टी अवामी लीग के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर लगातार कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने कहा कि यदि उनकी मृत्यु भी होती है तो वह अपने देश की धरती पर ही हो, जहां उनके माता-पिता दफन हैं। मानवता के खिलाफ अपराध मामले में मौत की सजा शेख हसीना का यह बयान ऐसे समय आया है जब बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण ने उन्हें मानवता के खिलाफ अपराध के मामले में दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई है। यह मामला 2024 के छात्र आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और प्रदर्शनकारियों की मौत से जुड़ा है। न्यायाधिकरण का आरोप है कि तत्कालीन सरकार प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और हिंसा रोकने में विफल रही। पूर्व गृह मंत्री को भी मौत की सजा इसी मामले में बांग्लादेश के पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमान खान कमाल को भी मौत की सजा सुनाई गई है। वहीं, पूर्व पुलिस महानिरीक्षक चौधरी अब्दुल्ला अल-मामून को पांच वर्ष की जेल की सजा दी गई है। न्यायाधिकरण ने सरकार को शेख हसीना और असदुज्जमान खान कमाल की संपत्तियां जब्त करने का भी निर्देश दिया है। राजनीतिक संकट के बीच वापसी की तैयारी शेख हसीना की संभावित वापसी ऐसे समय में सामने आई है जब बांग्लादेश में राजनीतिक हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं। यदि वह दिसंबर में लौटती हैं, तो उन्हें अदालत में पेश होकर कानूनी प्रक्रिया का सामना करना होगा। वहीं, उनकी वापसी देश की राजनीति पर भी बड़ा असर डाल सकती है।
नई दिल्ली/ढाका, एजेंसियां। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने दिसंबर 2026 में अपने देश लौटकर अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि गिरफ्तारी या जान का खतरा होने के बावजूद वह स्वेच्छा से बांग्लादेश लौटेंगी। एक अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी को दिए साक्षात्कार में हसीना ने कहा कि यदि उनकी मृत्यु भी होती है, तो वह अपने देश की मिट्टी पर ही हो, जहां उनके माता-पिता दफन हैं। 78 वर्षीय शेख हसीना अगस्त 2024 में छात्र आंदोलन के बाद सत्ता से हटने के पश्चात भारत आ गई थीं। अब उन्होंने कहा है कि वह अवामी लीग के अन्य निर्वासित नेताओं के साथ बांग्लादेश लौटने की योजना बना रही हैं। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी वापसी को लेकर ढाका की वर्तमान सरकार से कोई औपचारिक बातचीत नहीं हुई है। समर्थकों की स्थिति पर जताई चिंता शेख हसीना ने कहा कि उनकी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है। उनका मानना है कि कठिन परिस्थितियों का सामना करने के बजाय देश लौटकर कानूनी प्रक्रिया का सामना करना बेहतर होगा। उन्होंने कहा कि यदि उन्हें गिरफ्तार किया जाता है या उनकी हत्या भी हो जाती है, तब भी वह अपने फैसले से पीछे नहीं हटेंगी। मौत की सजा के बाद आया बड़ा बयान हसीना का यह बयान उस समय आया है जब बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने 2024 के छात्र आंदोलन के दौरान कथित मानवता के खिलाफ अपराधों के मामले में उन्हें दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड सुनाया है। ट्रिब्यूनल ने आरोप लगाया कि आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों की मौत के लिए वह जिम्मेदार थीं या हिंसा रोकने में विफल रहीं। इसी मामले में पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमां खान कमाल को भी मृत्युदंड तथा पूर्व पुलिस महानिरीक्षक चौधरी अब्दुल्ला अल-मामून को पांच वर्ष की सजा सुनाई गई है। साथ ही अदालत ने शेख हसीना और कमाल की संपत्तियां जब्त करने के निर्देश भी दिए हैं। ऐसे संवेदनशील माहौल में शेख हसीना की संभावित वापसी बांग्लादेश की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम मानी जा रही है।
कॉक्स बाजार: बांग्लादेश के कॉक्स बाजार जिले में स्थित रोहिंग्या शरणार्थी शिविर में लगातार हो रही भारी बारिश के बीच बड़ा हादसा हो गया। उखिया उपजिले के शरणार्थी कैंप में पहाड़ी ढलान खिसकने से हुए भूस्खलन (लैंडस्लाइड) में आठ बच्चों की मौत हो गई, जबकि कई अन्य लोगों के मलबे में दबे होने की आशंका जताई जा रही है। राहत एवं बचाव कार्य युद्धस्तर पर जारी है। भारी बारिश बनी हादसे की वजह लगातार हो रही बारिश के कारण पहाड़ी इलाकों की मिट्टी कमजोर हो गई, जिसके चलते रोहिंग्या कैंप के पास पहाड़ी ढह गई। भूस्खलन की चपेट में कई अस्थायी झोपड़ियां आ गईं, जिससे कैंप में अफरा-तफरी मच गई। लोग अपने परिजनों की तलाश में घटनास्थल पर जुट गए। मलबे से लोगों को निकालने के लिए रेस्क्यू अभियान रिफ्यूजी रिलीफ एंड रिपैट्रिएशन कमिश्नर (RRRC) मिजाननुर रहमान ने बताया कि हादसे के तुरंत बाद स्थानीय लोगों और राहत टीमों की मदद से बचाव अभियान शुरू किया गया। मलबे में फंसे लोगों को बाहर निकालने का प्रयास जारी है। हादसे में घायल हुए पांच बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां उनका इलाज चल रहा है। अधिकारियों का कहना है कि मृतकों की संख्या बढ़ सकती है क्योंकि अभी भी कई लोगों के लापता होने की सूचना है। प्रशासन ने जारी की चेतावनी पुलिस और प्रशासन ने बताया कि लगातार बारिश के कारण रोहिंग्या शरणार्थी शिविरों में भूस्खलन का खतरा बढ़ गया है। बड़ी संख्या में शरणार्थी पहाड़ी ढलानों पर बनी अस्थायी झोपड़ियों में रह रहे हैं, जिससे उनकी सुरक्षा को गंभीर खतरा बना हुआ है। प्रशासन ने संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाले लोगों से सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की है और निगरानी बढ़ा दी गई है। राहत एजेंसियां सक्रिय हादसे के बाद सरकारी एजेंसियों, संयुक्त राष्ट्र की सहयोगी संस्थाओं और अन्य राहत संगठनों ने प्रभावित इलाके में राहत कार्य तेज कर दिया है। प्रभावित परिवारों को भोजन, दवाइयां, तिरपाल और अन्य जरूरी सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है। अधिकारियों के मुताबिक, मौसम सामान्य होने तक राहत एवं बचाव अभियान जारी रहेगा और जोखिम वाले इलाकों से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का काम तेज किया जाएगा.
आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी इस वर्ष 10 जुलाई 2026, शुक्रवार को मनाई जाएगी। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से पूजा करने और योगिनी एकादशी व्रत कथा का श्रद्धा के साथ पाठ करने से पापों का क्षय होता है तथा जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है। मान्यता है कि इस एकादशी की महिमा का वर्णन स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को किया था। योगिनी एकादशी का धार्मिक महत्व सनातन परंपरा में योगिनी एकादशी को अत्यंत पुण्यदायी व्रत माना गया है। श्रद्धालु इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, उपवास, भजन-कीर्तन और व्रत कथा का पाठ करते हैं। मान्यता है कि यह व्रत अनजाने में हुए पापों के प्रायश्चित का अवसर प्रदान करता है और व्यक्ति को मानसिक शांति, आध्यात्मिक उन्नति तथा सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। योगिनी एकादशी व्रत कथा हेम माली की भूल बनी संकट का कारण पौराणिक कथा के अनुसार, अलकापुरी के राजा कुबेर भगवान शिव के परम भक्त थे। उनकी दैनिक पूजा के लिए हेम माली नामक सेवक मानसरोवर से ताजे फूल लाया करता था। हेम अपनी पत्नी विशालाक्षी से अत्यधिक प्रेम करता था। एक दिन वह फूल लेकर लौट तो आया, लेकिन पूजा स्थल पहुंचने के बजाय अपनी पत्नी के साथ समय बिताने में इतना मग्न हो गया कि भगवान शिव की पूजा के लिए समय पर फूल नहीं पहुंचा सका। कुबेर के श्राप से बदल गई किस्मत जब पूजा का समय बीतने लगा और फूल नहीं पहुंचे, तो कुबेर ने कारण का पता लगाया। उन्हें जब हेम माली की लापरवाही का पता चला तो वे क्रोधित हो गए और उसे श्राप दे दिया कि वह स्वर्ग से पृथ्वी पर गिर जाएगा, कुष्ठ रोग से पीड़ित होगा और पत्नी के वियोग का दुख सहेगा। श्राप के प्रभाव से हेम माली तत्काल स्वर्ग से पृथ्वी पर आ गिरा। उसका शरीर रोगग्रस्त हो गया और वह अपनी पत्नी से भी अलग हो गया। वह लंबे समय तक जंगलों में दुख और कष्ट भरा जीवन बिताने लगा। महर्षि मार्कण्डेय ने बताया मुक्ति का मार्ग भटकते-भटकते एक दिन हेम माली महर्षि मार्कण्डेय के आश्रम पहुंचा और अपनी पूरी व्यथा सुनाई। महर्षि ने उसे सलाह दी कि वह आषाढ़ कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करे और भगवान विष्णु की आराधना करे। उन्होंने बताया कि इस व्रत के प्रभाव से उसके सभी पाप नष्ट हो जाएंगे और उसे श्राप से मुक्ति मिल जाएगी। व्रत के प्रभाव से मिला नया जीवन हेम माली ने महर्षि के निर्देशानुसार पूरी श्रद्धा और नियमपूर्वक योगिनी एकादशी का व्रत किया। उसने भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की और रात्रि जागरण भी किया। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत के पुण्य प्रभाव से उसका कुष्ठ रोग समाप्त हो गया। उसे अपना दिव्य स्वरूप वापस प्राप्त हुआ और वह पुनः स्वर्ग लौटकर अपनी पत्नी विशालाक्षी के साथ सुखपूर्वक जीवन बिताने लगा। क्या संदेश देती है यह कथा? योगिनी एकादशी की कथा यह संदेश देती है कि जीवन में कर्तव्य, अनुशासन और ईश्वर भक्ति का विशेष महत्व है। यदि व्यक्ति अपनी भूल स्वीकार कर सच्चे मन से भगवान विष्णु की आराधना करे, तो उसे अपने कर्मों का प्रायशित करने और जीवन में नई शुरुआत करने का अवसर मिल सकता है। धार्मिक सूचना: यह लेख पौराणिक मान्यताओं और धार्मिक ग्रंथों में वर्णित कथाओं पर आधारित है। आस्था और विश्वास व्यक्तिगत विषय हैं।
नई दिल्ली, एजेंसियां। एशिया के सबसे प्रतिष्ठित क्रिकेट टूर्नामेंट पुरुष एशिया कप 2027 को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं। एशियन क्रिकेट काउंसिल (ACC) ने टूर्नामेंट के लिए 18 जून से 4 जुलाई 2027 की विंडो प्रस्तावित की है। हालांकि, मेजबान देश को लेकर अभी अंतिम आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन बांग्लादेश सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है। ODI फॉर्मेट में खेला जाएगा टूर्नामेंट एशिया कप 2027 को 50 ओवर (ODI) फॉर्मेट में आयोजित करने का प्रस्ताव है। इसी साल होने वाले ICC वनडे विश्व कप 2027 से पहले यह टूर्नामेंट एशियाई टीमों के लिए महत्वपूर्ण तैयारी का मंच बनेगा। बांग्लादेश ने सुझाए तीन प्रमुख वेन्यू मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (BCB) ने टूर्नामेंट के लिए तीन प्रमुख स्टेडियमों का प्रस्ताव दिया है— मीरपुर का शेर-ए-बांग्ला नेशनल स्टेडियम सिलहट इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम चटगांव का जहूर अहमद चौधरी स्टेडियम ACC ने इन वेन्यू से जुड़ी विस्तृत जानकारी मांगी है, जिसके बाद अंतिम फैसला लिया जाएगा। भारत-पाकिस्तान मुकाबले पर भी रहेंगी नजरें यदि टूर्नामेंट तय कार्यक्रम के अनुसार आयोजित होता है, तो क्रिकेट प्रशंसकों को एक बार फिर भारत और पाकिस्तान के बीच हाई-वोल्टेज मुकाबला देखने को मिल सकता है। हालांकि, दोनों देशों के राजनीतिक संबंधों को देखते हुए टूर्नामेंट के आयोजन और टीमों की भागीदारी पर अंतिम निर्णय ACC और संबंधित क्रिकेट बोर्डों की सहमति के बाद ही होगा। अभी आधिकारिक घोषणा बाकी फिलहाल ACC ने केवल प्रस्तावित तारीखों और तैयारियों पर काम शुरू किया है। मेजबान देश और अंतिम कार्यक्रम की आधिकारिक घोषणा अभी बाकी है। क्रिकेट प्रशंसकों की नजर अब ACC के अगले फैसले पर टिकी हुई है।
बीजिंग/ढाका: चीन अब पाकिस्तान के बाद दक्षिण एशिया में अपनी रणनीतिक मौजूदगी और मजबूत करने की दिशा में एक और बड़ा कदम बढ़ा रहा है। चीन ने म्यांमार और बांग्लादेश के जरिए नए आर्थिक गलियारे (Economic Corridor) के निर्माण की योजना पर काम तेज कर दिया है। इस प्रस्तावित परियोजना का उद्देश्य सड़क, रेल और बंदरगाहों के नेटवर्क के माध्यम से चीन को सीधे बंगाल की खाड़ी से जोड़ना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह परियोजना आगे बढ़ती है तो इसका असर केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका क्षेत्रीय सामरिक संतुलन पर भी प्रभाव पड़ सकता है। क्या है चीन का नया इकोनॉमिक कॉरिडोर? रिपोर्टों के अनुसार, प्रस्तावित कॉरिडोर के तहत चीन के कुनमिंग शहर को म्यांमार के रास्ते बांग्लादेश के मोंगला बंदरगाह समेत अन्य प्रमुख समुद्री बंदरगाहों से जोड़ा जाएगा। इस परियोजना के जरिए चीन माल ढुलाई के लिए वैकल्पिक मार्ग विकसित करना चाहता है, साथ ही बंगाल की खाड़ी तक अपनी पहुंच को भी मजबूत करना चाहता है। बांग्लादेश-चीन वार्ता में हुई चर्चा हाल ही में चीन की यात्रा पर गए बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने इस परियोजना पर चीनी नेतृत्व के साथ विस्तृत चर्चा की। इसके बाद बांग्लादेश में चीन के राजदूत याओ वेन ने बताया कि दोनों देश आर्थिक सहयोग के साथ-साथ कूटनीतिक और रक्षा मामलों में '2+2 संवाद' की व्यवस्था विकसित करने पर भी सहमत हुए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में इस आर्थिक गलियारे में अन्य इच्छुक देशों की भागीदारी के लिए भी चीन खुला रुख अपनाएगा। CPEC की तर्ज पर नया प्रोजेक्ट विश्लेषकों के अनुसार, यह परियोजना काफी हद तक चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) की तर्ज पर तैयार की जा रही है। जिस तरह CPEC के माध्यम से चीन को पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के जरिए अरब सागर तक सीधी पहुंच मिली, उसी प्रकार नया कॉरिडोर चीन को बंगाल की खाड़ी तक एक वैकल्पिक संपर्क मार्ग उपलब्ध करा सकता है। भारत की रणनीतिक चिंता क्यों बढ़ी? भारत के लिए इस परियोजना का महत्व केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामरिक भी माना जा रहा है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, सड़क, रेल और बंदरगाह जैसी आधारभूत संरचनाओं का उपयोग सामान्य परिस्थितियों में व्यापार और परिवहन के लिए होता है, लेकिन किसी सैन्य या आपात स्थिति में इन्हीं मार्गों का इस्तेमाल सैनिकों, सैन्य उपकरणों और रसद की तेज आवाजाही के लिए भी किया जा सकता है। इसी कारण भारत इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती बुनियादी ढांचा परियोजनाओं और समुद्री पहुंच पर करीबी नजर बनाए हुए है। क्षेत्रीय समीकरणों पर रहेगी नजर चीन की यह पहल ऐसे समय सामने आई है जब दक्षिण एशिया और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। यदि यह परियोजना आगे बढ़ती है, तो इसका प्रभाव क्षेत्रीय व्यापार, कनेक्टिविटी और सुरक्षा समीकरणों पर पड़ सकता है। हालांकि, परियोजना के सभी पहलुओं और संभावित प्रभावों को लेकर अभी आगे की कूटनीतिक और तकनीकी प्रक्रियाएं बाकी हैं।
ढाका: तीस्ता नदी परियोजना को लेकर भारत की चिंताओं के बीच चीन ने पहली बार अपना आधिकारिक रुख स्पष्ट किया है। बांग्लादेश में चीन के राजदूत याओ वेन ने कहा कि चीन इस परियोजना में केवल बांग्लादेश के अनुरोध पर सहयोग कर रहा है और इसके पीछे उसका कोई अन्य रणनीतिक उद्देश्य नहीं है। ढाका स्थित चीनी दूतावास में आयोजित प्रेस वार्ता में याओ वेन ने कहा कि तीस्ता परियोजना पूरी तरह बांग्लादेश के विकास और वहां के लोगों की जरूरतों से जुड़ी है। उन्होंने कहा कि चीन इस परियोजना को सफल बनाने के लिए हरसंभव तकनीकी और आर्थिक सहयोग देने को तैयार है। तारिक रहमान की चीन यात्रा में रही तीस्ता परियोजना की चर्चा चीन के राजदूत का यह बयान बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की हालिया चीन यात्रा के बाद सामने आया है। इस दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच कई अहम परियोजनाओं पर चर्चा हुई, जिनमें तीस्ता नदी प्रबंधन परियोजना प्रमुख रही। याओ वेन ने कहा कि तीस्ता नदी के आसपास रहने वाले लाखों लोगों की आजीविका इस परियोजना से जुड़ी हुई है। ऐसे में चीन बांग्लादेश की जरूरतों के अनुरूप इस परियोजना में अधिकतम सहयोग देगा। यूनुस सरकार के समय हुए समझौते पर भी दी सफाई प्रेस वार्ता के दौरान जब पिछली अंतरिम सरकार के कार्यकाल में एक चीनी कंपनी और बांग्लादेशी संस्था के बीच हुए समझौता ज्ञापन (MoU) के बारे में सवाल पूछा गया तो याओ वेन ने कहा कि वह समझौता केवल एक कंपनी और सरकारी संस्था के बीच था। उन्होंने बताया कि अब परियोजना सरकार-स्तर पर आगे बढ़ रही है और चीन पहले विस्तृत सर्वेक्षण कराएगा, जिसके बाद आगे की प्रक्रिया तय होगी। भारत की चिंताओं पर क्या कहा? जब पत्रकारों ने पूछा कि भारत इस परियोजना को लेकर चिंता जता रहा है और यदि ऊपरी हिस्से से पर्याप्त पानी नहीं छोड़ा गया तो परियोजना पर क्या असर पड़ेगा, तो याओ वेन ने कहा कि यह चीन का विषय नहीं है। उन्होंने कहा, "चीन केवल बांग्लादेश की अपेक्षाओं के अनुरूप इस परियोजना में सहयोग कर रहा है। इसके अलावा हमारा कोई अन्य उद्देश्य या चिंता नहीं है।" बांग्लादेश-म्यांमार-चीन कॉरिडोर पर भी रखी बात याओ वेन ने बांग्लादेश-म्यांमार-चीन आर्थिक कॉरिडोर (BMCC) का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यह कोई नई अवधारणा नहीं है। करीब 15 वर्ष पहले चीन ने बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार (BCIM) आर्थिक कॉरिडोर का प्रस्ताव रखा था, लेकिन यह योजना अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सकी। भारत के लिए भी खुला रखा प्रस्ताव चीन के राजदूत ने कहा कि यदि भारत भविष्य में इस आर्थिक कॉरिडोर से जुड़ना चाहता है तो चीन उसका स्वागत करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसमें शामिल होना या नहीं होना पूरी तरह भारत का निर्णय होगा। उन्होंने कहा कि फिलहाल चीन बांग्लादेश और म्यांमार के साथ क्षेत्रीय संपर्क और आर्थिक सहयोग बढ़ाने की दिशा में प्रतिबद्धता के साथ काम कर रहा है। भारत की क्यों बढ़ी है चिंता? तीस्ता नदी पूर्वी हिमालय से निकलकर सिक्किम और पश्चिम बंगाल से होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है। नदी के जल बंटवारे और प्रबंधन का मुद्दा लंबे समय से भारत और बांग्लादेश के बीच चर्चा का विषय रहा है। भारत की चिंता इस बात को लेकर भी है कि प्रस्तावित परियोजना सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के निकट स्थित है, जिसे देश के पूर्वोत्तर राज्यों से संपर्क बनाए रखने के लिहाज से बेहद रणनीतिक क्षेत्र माना जाता है। ऐसे में इस परियोजना को क्षेत्रीय और सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कोलकाता: भारत और बांग्लादेश के बीच हाल के दिनों में सीमा सुरक्षा और अवैध घुसपैठ को लेकर बढ़े तनाव के बावजूद दोनों देशों के बीच वर्षों पुरानी 'मैंगो डिप्लोमेसी' की परंपरा जारी है। बांग्लादेश सरकार ने सद्भावना के प्रतीक के रूप में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी को प्रीमियम किस्म के आमों की खेप भेजी है। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस पहल की पुष्टि करते हुए बताया कि यह उपहार दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करने की परंपरा का हिस्सा है। 500 किलो आम की खेप पहुंची कोलकाता बांग्लादेश की ओर से 500 किलोग्राम प्रीमियम आम कोलकाता स्थित बांग्लादेश के उप-उच्चायोग भेजे गए। यह खेप जेसोर के बेनापोल सीमा मार्ग के जरिए भारत पहुंची। इस खेप में लोकप्रिय किस्मों हिमसागर, हरिभांगा और आम्रपाली शामिल हैं। बताया गया कि: 100 किलोग्राम आम मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के लिए भेजे गए हैं। शेष 400 किलोग्राम आम वरिष्ठ अधिकारियों, राजनयिकों और अन्य गणमान्य व्यक्तियों को सद्भावना उपहार के रूप में वितरित किए जाएंगे। शेख हसीना के दौर से चली आ रही है परंपरा भारत और बांग्लादेश के बीच आम और हिलसा मछली का आदान-प्रदान लंबे समय से सांस्कृतिक कूटनीति का हिस्सा रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना अपने कार्यकाल के दौरान हर वर्ष भारत के प्रधानमंत्री और पश्चिम बंगाल के नेतृत्व को आम भेजती थीं। हालांकि 2024 के राजनीतिक घटनाक्रम के दौरान इस परंपरा में कुछ समय के लिए विराम आया था। अब वर्तमान प्रशासन ने इस परंपरा को फिर से जारी रखा है। सीमा विवाद के बीच बढ़ी चर्चा इस बार आमों की यह खेप ऐसे समय आई है जब भारत-बांग्लादेश सीमा पर अवैध घुसपैठ, सीमा प्रबंधन और सुरक्षा को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव की स्थिति बनी हुई है। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने हाल के महीनों में अवैध प्रवासियों के खिलाफ 'डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट' अभियान चलाने की बात कही है। उनके इस रुख को लेकर बांग्लादेश के कुछ राजनीतिक नेताओं ने आपत्ति भी जताई थी। सीमा पर बढ़ा था तनाव हाल के दिनों में सीमा पार अवैध घुसपैठ और कथित डिपोर्टेशन अभियान को लेकर सीमा सुरक्षा बल (BSF) और बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) के बीच भी तनाव और गतिरोध की खबरें सामने आई थीं। ऐसे माहौल में बांग्लादेश की ओर से आम भेजने की इस पहल को दोनों देशों के बीच संवाद और सद्भाव बनाए रखने की एक प्रतीकात्मक कूटनीतिक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। सांस्कृतिक रिश्तों को बनाए रखने की पहल विशेषज्ञों का मानना है कि राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी मतभेदों के बावजूद सांस्कृतिक और मानवीय पहल दोनों देशों के रिश्तों में सकारात्मक संदेश देने का काम करती हैं। 'मैंगो डिप्लोमेसी' भी इसी परंपरा का हिस्सा मानी जाती है, जिसके जरिए कूटनीतिक संवाद के साथ-साथ आपसी सद्भाव को बनाए रखने का प्रयास किया जाता है।
नई दिल्ली: केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने बांग्लादेश में भारत के नए उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी को केंद्रीय कैबिनेट मंत्री के समकक्ष दर्जा देने का फैसला किया है। विदेश नीति के लिहाज से इस कदम को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला प्रधानमंत्री मोदी की 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति को मजबूत करने के साथ-साथ ढाका को एक स्पष्ट कूटनीतिक संदेश भी देता है। दिनेश त्रिवेदी को 27 अप्रैल को बांग्लादेश में भारत का उच्चायुक्त नियुक्त किया गया था। मोदी सरकार के 12 वर्षों के कार्यकाल में यह पहली बार है, जब किसी वरिष्ठ राजनीतिक नेता को विदेश में भारत का राजदूत बनाकर भेजा गया है और उसे कैबिनेट मंत्री के समकक्ष दर्जा दिया गया है। क्या होगा कैबिनेट रैंक का फायदा? बांग्लादेश में भारत की पूर्व उच्चायुक्त वीना सीकरी ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में बताया कि कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिलने से दिनेश त्रिवेदी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक सीधे पहुंच मिलेगी। उनके अनुसार, सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत विदेश सचिव या विदेश मंत्री के माध्यम से संवाद करने के बजाय त्रिवेदी सीधे प्रधानमंत्री से महत्वपूर्ण मामलों पर संपर्क कर सकेंगे। इससे दोनों देशों के बीच संवेदनशील मुद्दों पर तेजी से निर्णय लेने में मदद मिलेगी। ढाका के लिए क्या है संदेश? वीना सीकरी के मुताबिक, यह फैसला बांग्लादेश को यह स्पष्ट संदेश देता है कि दिनेश त्रिवेदी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भरोसेमंद राजनीतिक प्रतिनिधि हैं। ऐसे में बांग्लादेश की सरकार भी उनके साथ सामान्य राजनयिक की बजाय उच्च राजनीतिक स्तर पर संवाद करेगी। माना जा रहा है कि त्रिवेदी की सीधी पहुंच बांग्लादेश के प्रधानमंत्री और वरिष्ठ मंत्रियों तक होगी। प्रोटोकॉल और सुरक्षा में भी मिलेगा विशेष दर्जा कैबिनेट रैंक मिलने के बाद दिनेश त्रिवेदी को बांग्लादेश में विशेष कूटनीतिक प्रोटोकॉल मिलेगा। हवाई अड्डे पर आगमन, आधिकारिक कार्यक्रमों और देश के भीतर यात्रा के दौरान उन्हें वही सम्मान और सुरक्षा उपलब्ध कराई जाएगी, जो बांग्लादेश अपने कैबिनेट मंत्रियों को देता है। 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति को मिलेगी मजबूती विशेषज्ञों का मानना है कि यह नियुक्ति प्रधानमंत्री मोदी की 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति के तहत पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को प्राथमिकता देने की रणनीति का हिस्सा है। अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के सत्ता से हटने के बाद भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में तनाव देखने को मिला था। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौरान कई भारत समर्थक परियोजनाओं और नीतिगत फैसलों में बदलाव किए गए, जिससे दोनों देशों के संबंध प्रभावित हुए। नई सरकार के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश अब बांग्लादेश में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली नई सरकार के गठन के बाद भारत व्यापार, निवेश और विकास परियोजनाओं को फिर से गति देना चाहता है। हाल के दिनों में तारिक रहमान की चीन यात्रा और वहां जारी संयुक्त बयान ने नई दिल्ली की रणनीतिक चिंताओं को बढ़ाया है। ऐसे में दिनेश त्रिवेदी की नियुक्ति और उन्हें दिया गया विशेष दर्जा भारत की सक्रिय कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पहले भी राजनीतिक नेताओं को मिल चुका है यह सम्मान मोदी सरकार में यह पहली बार हुआ है, लेकिन पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों के दौरान भी कई वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं को राजदूत बनाकर भेजा गया था। इनमें विजयलक्ष्मी पंडित, टी.एन. कौल, डॉ. कर्ण सिंह और डी.पी. धर जैसे नाम शामिल हैं, जिन्हें अपने-अपने कार्यकाल में कैबिनेट मंत्री के समकक्ष दर्जा दिया गया था।
बीजिंग/नई दिल्ली: भारत की सुरक्षा चिंताओं के बीच चीन ने तीस्ता नदी परियोजना पर अपना रुख स्पष्ट किया है। चीन ने कहा है कि बांग्लादेश के साथ उसका सहयोग किसी तीसरे देश, विशेष रूप से भारत, को निशाना बनाकर नहीं किया जा रहा है। साथ ही उसने जोर देकर कहा कि दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंध किसी भी बाहरी प्रभाव से मुक्त होने चाहिए। तीस्ता परियोजना को चीन का खुला समर्थन बीजिंग में आयोजित नियमित प्रेस वार्ता के दौरान चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने कहा कि चीन बांग्लादेश की 'तीस्ता नदी व्यापक उपचार एवं पुनर्वास परियोजना' का समर्थन करने के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने कहा कि यह परियोजना आम लोगों की आजीविका से जुड़ी एक महत्वपूर्ण पहल है और बांग्लादेश सरकार इसे प्राथमिकता दे रही है। चीन इस परियोजना के जरिए दोनों देशों के बीच विकास सहयोग को और मजबूत करना चाहता है। आर्थिक और जल संसाधन क्षेत्रों में बढ़ेगा सहयोग गुओ जियाकुन ने कहा कि चीन और बांग्लादेश अपनी विकास रणनीतियों में बेहतर तालमेल स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने बताया कि दोनों देश अर्थव्यवस्था, व्यापार, जल संरक्षण और जनकल्याण जैसे क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार करने के इच्छुक हैं। भारत की आपत्तियों पर पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, "चीन-बांग्लादेश सहयोग किसी तीसरे पक्ष को लक्षित नहीं करता और इसे किसी भी बाहरी प्रभाव से मुक्त रखा जाना चाहिए।" भारत पहले ही जता चुका है आपत्ति भारत ने तीस्ता नदी से जुड़ी परियोजनाओं में चीन की संभावित भागीदारी पर पहले ही चिंता जताई है। नई दिल्ली का मानना है कि यह परियोजना भारत-बांग्लादेश सीमा के अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र के निकट स्थित है, इसलिए इसमें चीन की मौजूदगी सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकती है। क्यों अहम है तीस्ता नदी? तीस्ता नदी का उद्गम पूर्वी हिमालय में होता है। यह सिक्किम और पश्चिम बंगाल से होकर बांग्लादेश में प्रवेश करती है, जहां यह सिंचाई, कृषि और लाखों लोगों की आजीविका का प्रमुख स्रोत है। 'चिकन नेक' के कारण बढ़ी भारत की चिंता भारत की सबसे बड़ी चिंता यह है कि तीस्ता नदी परियोजना सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के बेहद करीब स्थित है। यह संकरा भूभाग भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्से से जोड़ने वाला एकमात्र स्थलीय संपर्क मार्ग है और सामरिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस क्षेत्र में चीन की वित्तीय, तकनीकी या बुनियादी ढांचा संबंधी मौजूदगी बढ़ती है, तो इसका असर भारत की सुरक्षा और क्षेत्रीय रणनीतिक संतुलन पर पड़ सकता है। इसी कारण भारत पूरे घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए है।
ढाका/नई दिल्ली: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने स्पष्ट कहा है कि वह हर हाल में इसी साल अपने देश लौटेंगी, चाहे उन्हें मौत की सजा का सामना ही क्यों न करना पड़े। करीब दो वर्षों से भारत में रह रहीं हसीना ने कहा कि राजनीतिक दबाव और कानूनी कार्रवाई उनके फैसले को नहीं बदल सकती। उन्होंने अपने खिलाफ दिए गए फैसले को राजनीतिक प्रतिशोध करार देते हुए लोकतंत्र की बहाली के लिए संघर्ष जारी रखने की बात कही। 'मौत की सजा से नहीं डरती' एक इंटरव्यू में शेख हसीना ने कहा कि उन्हें मौत की सजा का कोई भय नहीं है। उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ चल रही कानूनी कार्रवाई राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित है और इसका उद्देश्य उनकी पार्टी अवामी लीग को कमजोर करना है। उनके अनुसार, पार्टी जनता की ताकत पर खड़ी है और उसे खत्म नहीं किया जा सकता। हसीना ने कहा कि उनका जीवन हमेशा बांग्लादेश की जनता और लोकतंत्र के लिए समर्पित रहा है तथा वह हर परिस्थिति में अपने देश लौटने का प्रयास करेंगी। 'अवामी लीग को खत्म करने की साजिश' पूर्व प्रधानमंत्री ने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार उनके नेतृत्व और अवामी लीग को राजनीतिक रूप से खत्म करना चाहती है। उन्होंने कहा कि यह पहली बार नहीं है जब उनकी पार्टी पर दबाव बनाया गया हो, लेकिन हर बार जनता ने उनका साथ दिया है। उनका दावा है कि उनके खिलाफ सुनाया गया फैसला न्यायिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक एजेंडा का हिस्सा है। परिवार की त्रासदी का किया जिक्र शेख हसीना ने कहा कि उन्होंने अपने जीवन में कई कठिन दौर देखे हैं। उन्होंने 1975 में अपने पिता और बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की हत्या का जिक्र करते हुए कहा कि उस हमले में उनके परिवार के अधिकांश सदस्य मारे गए थे। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि उन पर पहले भी जानलेवा हमले हुए, जिनमें वह बच निकलीं। उनके मुताबिक, इन घटनाओं ने उन्हें और अधिक मजबूत बनाया है। मौजूदा सरकार पर लगाए गंभीर आरोप हसीना ने दावा किया कि बांग्लादेश में लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर हुई हैं और कानून का शासन प्रभावित हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी नेताओं और अवामी लीग के कार्यकर्ताओं को राजनीतिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिति पर नकारात्मक असर पड़ा है तथा अल्पसंख्यक समुदायों पर हमलों की घटनाएं बढ़ी हैं। अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर जताई चिंता पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा कि किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय पर हमला पूरे देश की लोकतांत्रिक भावना पर हमला है। उन्होंने कहा कि सभी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना किसी भी सरकार की जिम्मेदारी होती है और इस दिशा में गंभीर प्रयास होने चाहिए। 'दिल आज भी बांग्लादेश में ही है' शेख हसीना ने कहा कि निर्वासन में रहने के बावजूद उनका मन हमेशा बांग्लादेश में ही रहता है। उन्होंने कहा कि देश में अपने नेताओं, कार्यकर्ताओं और आम लोगों की मुश्किलों की खबरें सुनना उनके लिए बेहद पीड़ादायक है। उन्होंने कहा कि वह लगातार अपने सहयोगियों के संपर्क में हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बांग्लादेश में लोकतंत्र एवं मानवाधिकारों के मुद्दे उठाने का प्रयास कर रही हैं। 'जनता के दम पर फिर खड़ी होगी अवामी लीग' अपने संदेश के अंत में हसीना ने भरोसा जताया कि बांग्लादेश की जनता एक बार फिर लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करेगी। उन्होंने कहा कि अवामी लीग जनता के समर्थन से दोबारा मजबूती के साथ उभरेगी और वह अपने अंतिम दिन तक इस संघर्ष का हिस्सा बनी रहेंगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।