West Bengal में सत्ता परिवर्तन के बीच बड़ा संवैधानिक कदम उठाया गया है. राज्यपाल Ravi Narayan ने गुरुवार को पश्चिम बंगाल विधानसभा को भंग करने का आदेश जारी कर दिया. इसके साथ ही निवर्तमान मुख्यमंत्री Mamata Banerjee समेत पूरी मंत्री परिषद को भी बर्खास्त कर दिया गया है. राजभवन की ओर से जारी आदेश के मुताबिक, राज्यपाल ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 174(2)(b) के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए यह फैसला लिया. मुख्य सचिव दुष्मंत नारियाला ने भी इस संबंध में आधिकारिक बयान जारी किया. दो दिन तक राज्यपाल संभालेंगे कार्यभार सूत्रों के अनुसार, नई सरकार के शपथ ग्रहण तक अगले दो दिनों के लिए राज्य का प्रशासनिक कार्यभार राज्यपाल के अधीन रहेगा. इस फैसले के साथ ही पश्चिम बंगाल की 17वीं विधानसभा का कार्यकाल औपचारिक रूप से समाप्त हो गया है. अब नवनिर्वाचित विधायकों के साथ 18वीं विधानसभा के गठन का रास्ता साफ हो गया है. ममता बनर्जी ने जताई नाराजगी सरकार भंग होने से पहले ममता बनर्जी ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि उनकी पार्टी चुनाव “हारी नहीं”, बल्कि “100 सीटें छीनी गई हैं.” राजनीतिक हलकों में इसे चुनावी नतीजों और सत्ता परिवर्तन पर उनकी नाराजगी के रूप में देखा जा रहा है. सूत्रों के मुताबिक, ममता बनर्जी इस्तीफे को लेकर भी सहज नहीं थीं और पार्टी के भीतर इस मुद्दे पर लगातार चर्चा चल रही थी. ब्रिगेड परेड ग्राउंड में होगा शपथ ग्रहण नई सरकार का शपथ ग्रहण समारोह शनिवार को Brigade Parade Ground में आयोजित किया जाएगा. कार्यक्रम को भव्य बनाने की तैयारी चल रही है. शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री Narendra Modi और केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah के शामिल होने की संभावना है. इसके अलावा भाजपा शासित कई राज्यों के मुख्यमंत्री भी मौजूद रह सकते हैं. सुरक्षा के कड़े इंतजाम कार्यक्रम को लेकर सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट मोड पर हैं. शपथ ग्रहण समारोह की सुरक्षा की जिम्मेदारी एसपीजी और Kolkata Police के पास होगी, जबकि ब्रिगेड मैदान के बाहर केंद्रीय बल तैनात रहेंगे. राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद अब सबकी नजर नई सरकार के गठन और उसके शुरुआती फैसलों पर टिकी हुई है.
श्रीनगर, एजेंसियां। जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले में शुक्रवार सुबह भूकंप के झटके महसूस किए गए, जिससे इलाके में कुछ देर के लिए दहशत का माहौल बन गया। राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र (NCS) के अनुसार, भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 3.5 दर्ज की गई। हालांकि राहत की बात यह रही कि इस घटना में किसी प्रकार के जानमाल के नुकसान की सूचना नहीं मिली है। भूकंप सुबह करीब 9 बजकर 57 मिनट पर आया। जैसे ही धरती हिली, लोग डर के कारण अपने घरों और दुकानों से बाहर निकल आए। कई इलाकों में लोग खुले स्थानों पर जमा हो गए। प्रशासन और स्थानीय अधिकारियों ने लोगों से घबराने की बजाय सतर्क रहने और शांति बनाए रखने की अपील की है। 10 किलोमीटर नीचे था भूकंप का केंद्र राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र के मुताबिक, भूकंप का केंद्र धरती की सतह से लगभग 10 किलोमीटर नीचे स्थित था। इसका केंद्र 33.289 डिग्री उत्तरी अक्षांश और 76.739 डिग्री पूर्वी देशांतर पर दर्ज किया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि किश्तवाड़ और आसपास के पहाड़ी क्षेत्र भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील माने जाते हैं, इसलिए यहां लगातार निगरानी जरूरी है। पहले भी महसूस हो चुके हैं झटके बीते कुछ महीनों में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख क्षेत्र में कई बार हल्के भूकंप के झटके महसूस किए जा चुके हैं। इससे पहले फरवरी में लेह में 3.2 तीव्रता का भूकंप आया था। वहीं मार्च में पुंछ और अप्रैल में श्रीनगर तथा आसपास के इलाकों में भी धरती हिली थी। भूकंप विज्ञान केंद्र ने कहा है कि हिमालयी क्षेत्र भूगर्भीय गतिविधियों के कारण संवेदनशील बना हुआ है। ऐसे में लोगों को आपदा से बचाव के उपायों के प्रति जागरूक रहने की जरूरत है। प्रशासन ने फिलहाल स्थिति सामान्य बताई है, लेकिन एहतियात के तौर पर निगरानी जारी रखी जा रही है।
Tamil Nadu में सरकार गठन को लेकर जारी राजनीतिक गतिरोध के बीच Tamilaga Vettri Kazhagam (TVK) को लेकर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगर Dravida Munnetra Kazhagam (DMK) या All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam (AIADMK) सरकार बनाने की दिशा में आगे बढ़ती है, तो TVK अपने सभी 107 विधायकों से सामूहिक इस्तीफा दिलाने पर विचार कर सकती है. TVK के भीतर बढ़ रही नाराजगी सूत्रों के अनुसार, यह संकेत पार्टी के अंदर बढ़ती नाराजगी और राजनीतिक बेचैनी को दर्शाता है. TVK नेताओं का मानना है कि चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद उन्हें सत्ता से दूर रखने की कोशिश की जा रही है. हालांकि अभी तक पार्टी प्रमुख Vijay की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन पार्टी के भीतर इस मुद्दे पर गंभीर चर्चा चल रही है. सरकार गठन पर क्यों फंसा मामला? 23 अप्रैल को हुए विधानसभा चुनाव में: TVK को 108 सीटें मिलीं DMK ने 59 सीटें जीतीं AIADMK के खाते में 47 सीटें आईं चूंकि विजय दो सीटों से जीते हैं, इसलिए नियम के तहत उन्हें एक सीट छोड़नी होगी. इसके बाद TVK की प्रभावी संख्या 107 रह जाएगी. Indian National Congress के 5 विधायकों के समर्थन के बाद भी TVK का आंकड़ा 112 तक ही पहुंचता है, जबकि 234 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए 118 सीटों की जरूरत है. DMK-AIADMK बैकचैनल बातचीत की चर्चा राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि DMK और AIADMK के बीच बैकचैनल बातचीत चल रही है, ताकि TVK को सत्ता से दूर रखा जा सके. हालांकि दोनों दलों ने किसी औपचारिक गठबंधन की घोषणा नहीं की है. TVK नेताओं का दावा है कि जनता ने बदलाव के पक्ष में वोट दिया है और सबसे बड़ी पार्टी को नजरअंदाज करना जनादेश का अपमान होगा. इस्तीफे की रणनीति से क्या होगा? अगर TVK के विधायक सामूहिक इस्तीफा देते हैं, तो: राज्य में संवैधानिक संकट पैदा हो सकता है कई सीटों पर उपचुनाव की नौबत आ सकती है सरकार गठन की प्रक्रिया और जटिल हो जाएगी राजनीतिक अस्थिरता बढ़ सकती है विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम दबाव की राजनीति का हिस्सा भी हो सकता है, ताकि अन्य दल TVK के साथ बातचीत के लिए मजबूर हों. तमिलनाडु में अब सबकी नजर राज्यपाल की अगली चाल और राजनीतिक दलों के बीच जारी बातचीत पर टिकी हुई है.
Tamil Nadu Government Formation: तमिलनाडु में नई सरकार के गठन को लेकर सियासी हलचल लगातार तेज होती जा रही है. TVK प्रमुख विजय के मुख्यमंत्री पद की शपथ को लेकर बना सस्पेंस अभी खत्म नहीं हुआ है. राज्यपाल विश्वनाथ आर्लेकर द्वारा बहुमत साबित करने के लिए 118 विधायकों के समर्थन पत्र मांगे जाने के बाद विजय का प्रस्तावित शपथग्रहण फिलहाल टल गया है. TVK ने सौंपा 112 विधायकों का समर्थन पत्र सूत्रों के मुताबिक, TVK ने कांग्रेस के 5 विधायकों के समर्थन सहित कुल 112 विधायकों का समर्थन पत्र राज्यपाल को सौंप दिया है. हालांकि सरकार बनाने के लिए 118 विधायकों का समर्थन जरूरी है, इसलिए अभी भी TVK बहुमत के आंकड़े से पीछे है. विजय दो विधानसभा सीटों से चुनाव जीते हैं, जिसके कारण पार्टी की प्रभावी संख्या 107 मानी जा रही है. बताया जा रहा है कि TVK फिलहाल VCK, PMK और वामपंथी दलों के साथ समर्थन को लेकर बातचीत कर रही है. राज्यपाल के रुख से बढ़ा राजनीतिक तनाव राज्यपाल विश्वनाथ आर्लेकर के अतिरिक्त समर्थन पत्र मांगने के बाद राजनीतिक विवाद भी शुरू हो गया है. कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि सबसे बड़ी पार्टी के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करना राज्यपाल की संवैधानिक जिम्मेदारी है और विजय को अनावश्यक रूप से बहुमत साबित करने के लिए दबाव में डाला जा रहा है. सूत्रों के अनुसार, TVK ने अब इस पूरे मामले में कानूनी विशेषज्ञों से सलाह लेने का फैसला किया है. विजय की प्रोटोकॉल सुरक्षा वापस सरकार गठन में देरी के बीच राज्य सरकार ने विजय को दी गयी प्रोटोकॉल कॉन्वॉय सुरक्षा वापस ले ली है. हालांकि उनकी बेसिक पायलट सुरक्षा अभी जारी रहेगी. इस फैसले के बाद राजनीतिक चर्चाएं और तेज हो गयी हैं. AIADMK में टूट का खतरा, विधायक पहुंचे रिसॉर्ट इसी बीच AIADMK के भीतर भी हलचल तेज हो गयी है. पार्टी ने अपने कई विधायकों को पुडुचेरी के एक रिसॉर्ट में शिफ्ट कर दिया है. सूत्रों का कहना है कि ये विधायक सीवी षणमुगम गुट से जुड़े हैं. अब तक 28 विधायक रिसॉर्ट पहुंच चुके हैं, जबकि कुल 32 विधायकों के वहां पहुंचने की संभावना जतायी जा रही है. पार्टी को आशंका है कि सरकार गठन के दौरान विधायकों में टूट-फूट हो सकती है. 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी TVK हालिया विधानसभा चुनाव में विजय की पार्टी TVK ने 108 सीटें जीतकर तमिलनाडु की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर सबको चौंका दिया. हालांकि पार्टी बहुमत के आंकड़े से पीछे रह गयी. चुनाव परिणाम आने के बाद TVK विधायकों ने विजय को विधायक दल का नेता चुना था, जिसके बाद उन्होंने सरकार बनाने का दावा पेश किया. कांग्रेस पहले ही TVK को सशर्त समर्थन दे चुकी है, जबकि अन्य छोटे दलों और वामपंथी पार्टियों के भीतर अभी चर्चा जारी है. DMK की बैठक पर भी नजर आज DMK विधायक दल की बैठक भी होने जा रही है, जिसमें नेता प्रतिपक्ष के चयन और आगे की रणनीति पर चर्चा होगी. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले कुछ दिन तमिलनाडु की राजनीति के लिए बेहद अहम साबित हो सकते हैं.
पटना: Bihar की राजनीति में मंगलवार का दिन बेहद अहम माना जा रहा है। लंबे समय से मुख्यमंत्री रहे Nitish Kumar आज अपने पद से इस्तीफा देंगे। इसके बाद एनडीए गठबंधन नए मुख्यमंत्री के नाम पर अंतिम फैसला करेगा। सुबह से ही मुख्यमंत्री आवास पर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। Sanjay Jha, Lalan Singh और Vijay Kumar Chaudhary मुख्यमंत्री से मिलने पहुंचे। वहीं उपमुख्यमंत्री Samrat Choudhary भी सीएम हाउस पहुंचे। इसके बाद नीतीश कुमार और सम्राट चौधरी एक ही गाड़ी से बाहर निकलते देखे गए, जिससे राजनीतिक अटकलें और तेज हो गई हैं। दिनभर का पूरा कार्यक्रम: सुबह 11 बजे: नीतीश कुमार की अध्यक्षता में कैबिनेट की अंतिम बैठक दोपहर 2 बजे: एक अणे मार्ग स्थित आवास पर JDU विधायक दल की बैठक दोपहर 3 बजे: राजभवन जाकर राज्यपाल को इस्तीफा सौंपेंगे शाम 4 बजे: एनडीए विधायक दल की बैठक में नए मुख्यमंत्री के नाम पर फैसला बुधवार सुबह 11 बजे: नए मुख्यमंत्री का शपथ ग्रहण कैबिनेट की आखिरी बैठक सुबह 11 बजे होने वाली कैबिनेट बैठक मौजूदा सरकार के कार्यकाल की अंतिम औपचारिक बैठक रही। इसके बाद एनडीए के सभी घटक दल–JDU, BJP, HAM, RLJP और RLM–अपने-अपने विधायकों के साथ अलग-अलग बैठक करेंगे। 145 दिन का कार्यकाल Nitish Kumar ने 20 नवंबर 2025 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी 14 अप्रैल 2026 को इस्तीफा देने पर कार्यकाल 145 दिन का रहेगा यह उनका दूसरा सबसे छोटा कार्यकाल होगा इससे पहले 2000 में मात्र 7 दिन में इस्तीफा देना पड़ा था NDA बैठक में तय होगा नया चेहरा शाम 4 बजे होने वाली एनडीए की संयुक्त बैठक में नए मुख्यमंत्री के नाम पर अंतिम मुहर लगाई जाएगी। इस बैठक में भाजपा की ओर से Shivraj Singh Chouhan पर्यवेक्षक के रूप में मौजूद रहेंगे और उनकी निगरानी में फैसला लिया जाएगा। आगे क्या नए मुख्यमंत्री का शपथ ग्रहण बुधवार सुबह 11 बजे राजभवन में होगा। इसके साथ ही बिहार में नई सरकार का औपचारिक गठन पूरा हो जाएगा। राजनीतिक मायने मुख्यमंत्री आवास पर लगातार बैठकों ने सियासी हलचल बढ़ा दी है नीतीश और सम्राट का एक साथ दिखना कई संकेत दे रहा है अब सबकी नजरें एनडीए बैठक पर टिकी हैं, जहां बिहार के अगले मुख्यमंत्री का नाम तय होगा बिहार की राजनीति के लिए आज का दिन निर्णायक माना जा रहा है, क्योंकि इसी दिन यह स्पष्ट हो जाएगा कि राज्य की कमान अगले दौर में किसके हाथ में होगी।
अमेरिका और ईरान के बीच लंबे तनाव और हालिया संघर्षविराम के बाद अब अमेरिकी राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर विपक्षी दबाव तेजी से बढ़ रहा है, जहां 85 से अधिक सांसदों ने उनके इस्तीफे की मांग कर दी है। क्यों उठी इस्तीफे की मांग? रिपोर्ट्स के अनुसार, डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों का आरोप है कि: ट्रंप ने ईरान युद्ध को लेकर बार-बार अपनी रणनीति बदली उनकी भाषा और सार्वजनिक बयानबाजी पर सवाल उठे हालिया सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर भी विवाद बढ़ा सांसदों का कहना है कि इन परिस्थितियों में राष्ट्रपति की निर्णय लेने की क्षमता पर सवाल खड़े होते हैं। 40 दिन के युद्ध के बाद सीजफायर अमेरिका-ईरान के बीच करीब 40 दिन तक चले तनाव के बाद संघर्षविराम हुआ। हालांकि इस दौरान: अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा वैश्विक स्तर पर तेल और सुरक्षा को लेकर चिंता बनी रही युद्ध खत्म होने के बाद भी अमेरिका के भीतर राजनीतिक माहौल शांत नहीं हुआ है। क्या है 25वां संशोधन? ट्रंप को हटाने के लिए अमेरिकी संविधान के 25वां संशोधन की चर्चा तेज हो गई है। इसकी धारा-4 के तहत: उपराष्ट्रपति और कैबिनेट के बहुमत राष्ट्रपति को “असमर्थ” घोषित कर सकते हैं इसके बाद उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति बन सकता है अंतिम निर्णय के लिए कांग्रेस में दो-तिहाई बहुमत जरूरी होता है क्या सच में जा सकती है कुर्सी? विशेषज्ञों के अनुसार: सिर्फ 85 सांसदों की मांग से राष्ट्रपति को हटाना आसान नहीं है इसके लिए उपराष्ट्रपति और कैबिनेट का समर्थन जरूरी है साथ ही कांग्रेस में भारी बहुमत चाहिए इसलिए फिलहाल ट्रंप की कुर्सी पर तत्काल खतरा नहीं माना जा रहा, लेकिन राजनीतिक दबाव जरूर बढ़ गया है। आगे क्या? आने वाले दिनों में अमेरिकी राजनीति में टकराव बढ़ सकता है अगर विपक्ष और मजबूत होता है, तो संवैधानिक प्रक्रिया तेज हो सकती है फिलहाल यह मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बना हुआ है
आम आदमी पार्टी में हालिया राजनीतिक घटनाक्रम के बीच राज्यसभा सांसद Raghav Chadha ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए पार्टी नेतृत्व को लेकर तीखा संदेश दिया है। उपनेता पद से हटाए जाने के बाद पहली बार सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी खामोशी को कमजोरी या हार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। Aam Aadmi Party के वरिष्ठ नेता राघव चड्ढा ने एक वीडियो संदेश जारी कर कहा कि उन्हें जानबूझकर खामोश करने की कोशिश की गई है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि पार्टी के भीतर उठाए गए मुद्दों और जनता से जुड़े सवालों के कारण उन्हें इस कार्रवाई का सामना करना पड़ा। “जनता की आवाज उठाना क्या अपराध है?” अपने बयान में चड्ढा ने सीधे सवाल उठाया कि क्या जनता के मुद्दों को उठाना गलत है। उन्होंने कहा कि वह लगातार आम लोगों से जुड़े विषयों को संसद और सार्वजनिक मंचों पर रखते रहे हैं, लेकिन इसके चलते उन्हें राजनीतिक नुकसान झेलना पड़ा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह अपने सिद्धांतों से पीछे हटने वाले नहीं हैं और भविष्य में भी जनता की आवाज बुलंद करते रहेंगे। राजनीतिक संकेत और संभावित असर राघव चड्ढा का यह बयान पार्टी के अंदरूनी हालात की ओर इशारा करता है। उनके शब्दों से यह साफ झलकता है कि AAP के भीतर मतभेद उभरकर सामने आ रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम आने वाले समय में पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और रणनीति पर असर डाल सकता है। आगे क्या? हालांकि, पार्टी की ओर से इस बयान पर आधिकारिक प्रतिक्रिया अभी सामने नहीं आई है, लेकिन चड्ढा का यह खुला संदेश सियासी हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि AAP नेतृत्व इस मुद्दे को कैसे संभालता है और इसका व्यापक राजनीतिक प्रभाव क्या पड़ता है।
बिहार में हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव ने सियासी समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं। पांच सीटों के लिए हुए इस चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने सभी सीटों पर कब्जा जमा लिया। जहां चार सीटों पर NDA की जीत पहले से तय मानी जा रही थी, वहीं पांचवीं सीट का विपक्ष के हाथ से निकलना कई सवाल खड़े कर गया। इस हार के पीछे कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के कुछ विधायकों की गैरमौजूदगी अहम कारण बनी। खासकर RJD विधायक फैसल रहमान का वोटिंग से दूर रहना पार्टी के लिए बड़ा झटका साबित हुआ। RJD विधायक की ‘चुप्पी वाली बगावत’ ने बढ़ाई परेशानी राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के तीन विधायकों ने मतदान नहीं किया, जिसकी आशंका पहले से जताई जा रही थी। लेकिन RJD के 25 में से एक विधायक फैसल रहमान का वोट न देना अप्रत्याशित रहा। पूर्वी चंपारण के ढाका सीट से विधायक रहमान मतदान के दिन अचानक गायब रहे। देर शाम तक उनका इंतजार होता रहा, लेकिन वे वोट देने नहीं पहुंचे। इस घटना ने पार्टी के भीतर अनुशासन और एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए। बीमारी का बहाना या सियासी रणनीति? फैसल रहमान ने बाद में सफाई देते हुए कहा कि उनकी मां दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती थीं, जिस कारण उन्हें अचानक जाना पड़ा। उन्होंने यह भी दावा किया कि वे पटना आए थे, लेकिन हालात बिगड़ने पर वापस लौट गए। हालांकि, उनकी इस सफाई पर विपक्षी दलों और खुद पार्टी के भीतर भी संदेह जताया जा रहा है। रहमान ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उन्हें खरीदने की किसी की हैसियत नहीं है। तेजस्वी यादव की बढ़ी मुश्किलें इस पूरे घटनाक्रम ने RJD नेता Tejashwi Yadav की स्थिति को असहज बना दिया है। पार्टी उम्मीदवार को वोट न मिलने से उनकी राजनीतिक साख पर असर पड़ा है। सामान्य परिस्थितियों में ऐसे मामले में पार्टी विधायक के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर सकती थी, लेकिन इस बार मामला इतना आसान नहीं है। क्यों नहीं कर सकते कोई सख्त कार्रवाई? दरअसल, बिहार विधानसभा में RJD की संख्या बेहद सीमित है। कुल 243 सदस्यीय सदन में पार्टी के पास ठीक 25 विधायक हैं, जो विपक्ष के नेता का पद बनाए रखने के लिए न्यूनतम जरूरी संख्या (10%) है। यदि पार्टी का एक भी विधायक कम होता है, तो Tejashwi Yadav विपक्ष के नेता का दर्जा खो सकते हैं। ऐसे में फैसल रहमान के खिलाफ कार्रवाई करना खुद पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। राजनीतिक मजबूरी में फंसे तेजस्वी फैसल रहमान की गैरमौजूदगी ने RJD को नुकसान तो पहुंचाया, लेकिन अब वे पार्टी के लिए ऐसी ‘गले की हड्डी’ बन गए हैं, जिसे न हटाया जा सकता है और न नजरअंदाज किया जा सकता है। अगर उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होती है, तो इसका सीधा असर पार्टी की विधानसभा में स्थिति पर पड़ेगा। यही वजह है कि तमाम नाराजगी के बावजूद नेतृत्व फिलहाल चुप्पी साधे हुए है।
पटना: बिहार में हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव के नतीजों के बाद सियासत गरमा गई है। राजद उम्मीदवार अमरेंद्र धारी सिंह की हार के बाद अब कांग्रेस के भीतर ही मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। वोटिंग से गैरहाजिर रहे तीन कांग्रेस विधायकों में से एक मनोज विश्वास ने मीडिया के सामने आकर बड़ा बयान दिया है। वोटिंग से दूरी पर कांग्रेस विधायक का बड़ा खुलासा 16 मार्च को हुई वोटिंग में कांग्रेस के तीन विधायक-मनिहारी से मनोहर सिंह, फारबिसगंज से मनोज विश्वास और वाल्मीकिनगर से सुरेंद्र कुशवाहा-ने मतदान नहीं किया था। अब मनोज विश्वास ने साफ कहा कि उम्मीदवार चयन में पार्टी के प्रदेश नेतृत्व की अनदेखी की गई, जिसके चलते यह स्थिति बनी। “नेतृत्व का सम्मान नहीं, तो वोट क्यों दें?” विधायक मनोज विश्वास ने आरोप लगाया कि उम्मीदवार चयन में न तो प्रदेश अध्यक्ष की भूमिका रही और न ही स्थानीय नेताओं को विश्वास में लिया गया। उनका कहना था कि जब पार्टी के नेताओं को ही महत्व नहीं दिया गया, तो विधायकों को वोट देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अंतिम समय में उम्मीदवार बदलने पर नाराजगी उन्होंने दावा किया कि पहले किसी अन्य नाम पर चर्चा चल रही थी, लेकिन अंतिम समय में अचानक अमरेंद्र धारी सिंह को उम्मीदवार बना दिया गया, जिनका राजनीतिक अनुभव सीमित है। इस फैसले से कई विधायकों में असंतोष पैदा हुआ। प्रदेश अध्यक्ष पर ही उठाए सवाल अपने बयान में मनोज विश्वास ने सीधे तौर पर राजेश राम को निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि चुनाव के दौरान पार्टी के शीर्ष नेताओं को पूरी तरह शामिल नहीं किया गया, जिससे कार्यकर्ताओं और विधायकों में भ्रम की स्थिति बनी रही। “हमें स्वतंत्र निर्णय लेने को कहा गया” विधायक ने यह भी कहा कि पार्टी नेतृत्व की ओर से स्पष्ट निर्देश नहीं मिला, बल्कि विधायकों को अपने विवेक से निर्णय लेने को कहा गया। ऐसे में उन्होंने मतदान से दूरी बनाई। राजद की हार के बाद बढ़ा राजनीतिक दबाव इस पूरे घटनाक्रम के बाद विपक्षी गठबंधन में दरार की चर्चाएं तेज हो गई हैं। तेजस्वी यादव की रणनीति पर भी सवाल उठ रहे हैं कि आखिर उम्मीदवार चयन और सहयोगी दलों के साथ समन्वय में कहां चूक हुई। दल के प्रति निष्ठा पर भी दी सफाई हालांकि, मनोज विश्वास ने यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने पार्टी के साथ कोई गलत नहीं किया है और आगे भी कांग्रेस के साथ मजबूती से खड़े रहेंगे। उन्होंने कहा कि पार्टी हमेशा वंचित, अल्पसंख्यक और कमजोर वर्गों की आवाज उठाती रही है, लेकिन उम्मीदवार चयन में इन मूल्यों को नजरअंदाज किया गया। सियासी असर दूर तक संभव बिहार की राजनीति में यह बयान किसी ‘सियासी विस्फोट’ से कम नहीं माना जा रहा है। आने वाले दिनों में इसका असर गठबंधन की रणनीति और आंतरिक समीकरणों पर साफ दिखाई दे सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।