संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव अब बेहद निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बातचीत और संभावित समझौते की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने चेतावनी दी है कि कूटनीति का रास्ता बहुत जल्द बंद हो सकता है। इसी बीच अमेरिकी नौसेना द्वारा ईरानी झंडे वाले एक तेल टैंकर की जांच किए जाने से हालात और संवेदनशील हो गए हैं। दुनिया की नजर अब इस बात पर टिकी है कि आने वाले दिनों में शांति समझौता होगा या फिर मध्य पूर्व में नया सैन्य टकराव शुरू होगा। ट्रंप बोले- “फैसला बेहद करीब” वॉशिंगटन के पास जॉइंट बेस एंड्रयूज में पत्रकारों से बातचीत करते हुए ट्रंप ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत “अंतिम चरण” में है। उन्होंने कहा, “मामला बिल्कुल आखिरी मोड़ पर है। अगर हमें सही जवाब नहीं मिले तो हालात बहुत तेजी से बदलेंगे। हम पूरी तरह तैयार हैं।” ट्रंप ने यह भी कहा कि समझौता “बहुत जल्दी” या “कुछ दिनों में” हो सकता है, लेकिन इसके लिए तेहरान को “100 प्रतिशत सही जवाब” देना होगा। ईरान ने कहा- अमेरिकी प्रस्ताव की जांच जारी इस्माइल बघाई ने कहा कि ईरान को अमेरिका की ओर से नए प्रस्ताव मिले हैं और तेहरान उनके सभी पहलुओं की समीक्षा कर रहा है। उन्होंने दोहराया कि ईरान चाहता है कि उसके फ्रीज किए गए विदेशी फंड जारी किए जाएं और ईरानी बंदरगाहों पर लगी अमेरिकी नाकेबंदी हटाई जाए। इससे पहले ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने अमेरिका पर युद्ध फिर शुरू करने की तैयारी का आरोप लगाया था। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि हमला हुआ तो ईरान “कड़ा जवाब” देगा। ईरानी जहाज पर चढ़ी अमेरिकी सेना यूएस सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के मुताबिक, बुधवार को ओमान की खाड़ी में अमेरिकी सैनिकों ने हेलीकॉप्टर के जरिए ईरानी झंडे वाले एक तेल टैंकर पर चढ़कर जांच की। अमेरिका को शक था कि जहाज प्रतिबंधों का उल्लंघन कर रहा है। तलाशी के बाद जहाज को छोड़ दिया गया, लेकिन उसका रास्ता बदलने का आदेश दिया गया। CENTCOM ने दावा किया कि नाकेबंदी शुरू होने के बाद अमेरिकी सेना अब तक 91 व्यावसायिक जहाजों का मार्ग बदलवा चुकी है। होर्मुज जलडमरूमध्य बना सबसे बड़ा विवाद होर्मुज जलडमरूमध्य इस पूरे संकट का सबसे संवेदनशील केंद्र बना हुआ है। दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल और बड़ी मात्रा में तरलीकृत प्राकृतिक गैस इसी समुद्री रास्ते से गुजरती है। ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने दावा किया कि उसने पिछले 24 घंटों में 26 जहाजों को सुरक्षा देते हुए होर्मुज से गुजरने दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह मार्ग लंबे समय तक प्रभावित रहा तो दुनिया भर में तेल, गैस, खाद और खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हो सकती है। अमेरिका पर भी बढ़ रहा आर्थिक दबाव अमेरिका में बढ़ती तेल और गैस कीमतों की वजह से ट्रंप प्रशासन पर घरेलू राजनीतिक दबाव भी बढ़ रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि यही कारण है कि वॉशिंगटन एक तरफ सैन्य दबाव बनाए रखना चाहता है, लेकिन दूसरी तरफ समझौते की संभावना भी खुली रखना चाहता है। फिलहाल दुनिया की नजर आने वाले कुछ दिनों पर टिकी है, क्योंकि यही तय करेगा कि मध्य पूर्व में शांति कायम होगी या नया संघर्ष शुरू होगा।
वैश्विक ऊर्जा बाजारों में एक बार फिर भारी उथल-पुथल देखने को मिल रही है। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है और ब्रेंट क्रूड ऑयल $120 प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। इस अचानक बढ़ोतरी ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में चिंता बढ़ा दी है और इसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं से लेकर वैश्विक अर्थव्यवस्था तक पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। इस उछाल की मुख्य वजह अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump का कड़ा रुख बताया जा रहा है, जिन्होंने स्पष्ट किया है कि ईरान पर लगाए गए प्रतिबंध और समुद्री नाकाबंदी फिलहाल जारी रहेगी। ईरान पर सख्ती और बढ़ता तनाव डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में कहा कि जब तक ईरान अमेरिका की शर्तों पर परमाणु समझौते को स्वीकार नहीं करता, तब तक Strait of Hormuz पर नौसैनिक दबाव और नाकाबंदी जारी रहेगी। यह क्षेत्र वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद अहम माना जाता है। ट्रंप ने यह भी दावा किया कि यह रणनीति सैन्य कार्रवाई की तुलना में अधिक प्रभावी है, क्योंकि इससे ईरान की अर्थव्यवस्था पर सीधा दबाव बनता है। साथ ही उन्होंने संकेत दिया कि अगर कूटनीतिक समाधान नहीं निकलता है तो आगे सैन्य विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज क्यों है दुनिया के लिए अहम? स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज दुनिया के सबसे संवेदनशील तेल परिवहन मार्गों में से एक है। खाड़ी देशों से निकलने वाला बड़ा हिस्सा कच्चा तेल इसी रास्ते से होकर वैश्विक बाजारों तक पहुंचता है। जब इस मार्ग में बाधा आती है, तो सप्लाई चेन प्रभावित होती है और तेल की उपलब्धता घट जाती है। परिणामस्वरूप कीमतों में तेज उछाल देखने को मिलता है, जिसका असर सीधे भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर भी पड़ता है। वैश्विक अर्थव्यवस्था पर खतरे के बादल इस स्थिति को लेकर आर्थिक विशेषज्ञों ने गंभीर चेतावनी दी है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री Jeffrey Sachs ने कहा है कि अगर यह तनाव लंबे समय तक जारी रहता है तो वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी की ओर बढ़ सकती है। उन्होंने कहा कि बाजार फिलहाल यह उम्मीद लगाए बैठा है कि स्थिति जल्द सामान्य हो जाएगी, लेकिन यदि सप्लाई बाधित रही तो कीमतों में और तेजी आ सकती है। आम जनता पर सीधा असर तेल कीमतों में इस बढ़ोतरी का असर सीधे पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पड़ सकता है। इससे परिवहन, खाद्य वस्तुएं और अन्य जरूरी सेवाएं भी महंगी हो सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हालात नहीं सुधरे तो महंगाई एक बार फिर आम लोगों की जेब पर भारी पड़ सकती है।
ट्रंप प्रशासन ने कसी शिकंजा, ईरान की तेल आय पर बड़ा वार अमेरिका ने ईरान के तेल कारोबार पर एक और बड़ा कदम उठाते हुए चीन की प्रमुख रिफाइनरी और करीब 40 शिपिंग कंपनियों पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए हैं। यह कार्रवाई ईरान के तेल निर्यात को रोकने और उसकी आय के प्रमुख स्रोत को कमजोर करने की रणनीति का हिस्सा है। चीन की बड़ी रिफाइनरी निशाने पर अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने चीन के डालियान स्थित हेंगली पेट्रोकेमिकल रिफाइनरी पर प्रतिबंध लगाया है। यह चीन की सबसे बड़ी स्वतंत्र रिफाइनरियों में से एक है, जिसकी प्रतिदिन लगभग चार लाख बैरल तेल प्रसंस्करण क्षमता है। अमेरिका का आरोप है कि यह रिफाइनरी 2023 से लगातार ईरानी कच्चा तेल खरीद रही थी। 40 शिपिंग कंपनियां और टैंकर भी प्रतिबंधित हेंगली के अलावा, ईरानी तेल के परिवहन में शामिल लगभग 40 शिपिंग कंपनियों और टैंकरों को भी अमेरिकी प्रतिबंधों की सूची में शामिल किया गया है। इस कदम से ईरान के लिए वैश्विक बाजार तक तेल पहुंचाना और मुश्किल हो जाएगा। ईरान की कमाई रोकना अमेरिका का लक्ष्य अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने कहा कि वॉशिंगटन ईरान के तेल नेटवर्क को पूरी तरह बाधित करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि अमेरिका उन जहाजों, बिचौलियों और खरीदारों पर लगातार कार्रवाई करेगा, जिनके जरिए ईरान तेल बेचता है। चीन-ईरान व्यापार पर बढ़ेगा दबाव इन प्रतिबंधों से चीन और ईरान के बीच ऊर्जा व्यापार पर सीधा असर पड़ सकता है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब वैश्विक ऊर्जा बाजार पहले से ही तनाव में है। होर्मुज संकट के बीच बढ़ी चिंता फारस की खाड़ी में जारी तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य पर संकट के बीच इस कदम ने वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में और उतार-चढ़ाव आ सकता है। दुनिया भर के खरीदारों को चेतावनी अमेरिका ने साफ कर दिया है कि जो देश या कंपनियां ईरानी तेल खरीदेंगी, उनके खिलाफ भी द्वितीयक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। यह संदेश खास तौर पर चीन, हांगकांग, यूएई और ओमान जैसे देशों के लिए है।
अमेरिका ने फिर बढ़ाई रूस से तेल खरीद की अनुमति वैश्विक ऊर्जा संकट और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने एक अहम और चर्चित फैसला लिया है। ट्रंप प्रशासन ने रूस से प्रतिबंधित कच्चे तेल की खरीद पर दी गई अस्थायी छूट को एक बार फिर बढ़ा दिया है। इस निर्णय के तहत कई देश, जिनमें भारत भी शामिल है, सीमित समय के लिए रूस से तेल और पेट्रोलियम उत्पाद खरीद सकेंगे। यह छूट अब 16 मई तक प्रभावी रहेगी और इसे ऊर्जा बाजार में स्थिरता लाने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है। किन शर्तों के साथ मिली छूट अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के अनुसार, यह अनुमति केवल उन्हीं तेल शिपमेंट्स पर लागू होगी जो शुक्रवार तक जहाजों में लोड किए जा चुके हैं। इसके अलावा, इस छूट से ईरान, क्यूबा और उत्तर कोरिया से जुड़े किसी भी प्रकार के व्यापार को पूरी तरह बाहर रखा गया है। इसका मतलब यह है कि अमेरिका रूस से तेल व्यापार पर पूरी तरह रोक लगाने के बजाय उसे सीमित और नियंत्रित तरीके से जारी रखना चाहता है। ऊर्जा बाजार में स्थिरता लाने की कोशिश यह फैसला ऐसे समय आया है जब ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव और मध्य पूर्व में युद्ध जैसे हालात के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार अस्थिर हो गया है। हाल के दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखा गया है, जिससे कई देशों की अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका इस कदम के जरिए वैश्विक तेल आपूर्ति को अचानक झटके से बचाना चाहता है, ताकि कीमतें बहुत अधिक न बढ़ें। एशियाई देशों की मांग का असर रिपोर्ट्स के अनुसार, एशिया के कई देशों ने अमेरिका पर दबाव बनाया था कि उन्हें वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों तक पहुंच दी जाए। भारत जैसे बड़े आयातक देशों ने रूस से सस्ती तेल आपूर्ति को जारी रखने की मांग की थी, ताकि घरेलू ऊर्जा कीमतों पर नियंत्रण रखा जा सके। इसी दबाव और वैश्विक आपूर्ति संकट को देखते हुए अमेरिका ने यह अस्थायी राहत दी है। पहले के रुख से बदलाव दिलचस्प बात यह है कि सिर्फ दो दिन पहले अमेरिकी ट्रेजरी सचिव ने संकेत दिया था कि यह छूट आगे नहीं बढ़ाई जाएगी। लेकिन अचानक लिए गए इस फैसले ने अमेरिकी नीति में बदलाव को दर्शाया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। तेल कीमतों में भारी गिरावट इसी बीच, ईरान द्वारा हॉर्मुज जलडमरूमध्य को आंशिक रूप से खोलने के बाद वैश्विक तेल बाजार में लगभग 9 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिरता अस्थायी हो सकती है, क्योंकि क्षेत्र में तनाव अभी भी बना हुआ है। राजनीतिक विवाद भी तेज अमेरिकी संसद के कई सदस्यों ने इस फैसले की आलोचना की है। उनका कहना है कि इससे रूस को आर्थिक रूप से फायदा मिलेगा, जबकि वह यूक्रेन युद्ध में शामिल है। दूसरी ओर, यूरोपीय संघ ने भी प्रतिबंधों में ढील देने का विरोध जताया है। ईरान युद्ध, हॉर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति और रूस-यूक्रेन संघर्ष के बीच अमेरिका का यह कदम वैश्विक ऊर्जा नीति को नई दिशा दे सकता है। हालांकि यह फैसला अस्थायी राहत देता है, लेकिन इसके राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव आने वाले समय में और अधिक स्पष्ट हो सकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के बावजूद भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तत्काल बढ़ोतरी की संभावना नहीं है। केंद्र सरकार ने स्पष्ट संकेत दिया है कि मौजूदा हालात में उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ डालने की कोई योजना नहीं है। मध्य पूर्व में जारी तनाव, खासकर United States, Israel और Iran के बीच बढ़ते संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है। इसी के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में Brent Crude Oil की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखी गई है। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल सोमवार को ब्रेंट क्रूड की कीमत 99.75 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 119.5 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जो अगस्त 2022 के बाद पहली बार 100 डॉलर के पार गई। हालांकि शाम तक कीमतें कुछ नरम पड़ीं और यह लगभग 102 डॉलर प्रति बैरल के आसपास ट्रेड कर रही थीं। युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक ब्रेंट क्रूड की कीमतों में करीब 40 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की जा चुकी है, जिससे वैश्विक बाजार में चिंता का माहौल बना हुआ है। महंगाई पर फिलहाल बड़ा असर नहीं लोकसभा में इस मुद्दे पर बोलते हुए वित्त मंत्री Nirmala Sitharaman ने कहा कि फिलहाल कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का भारत की महंगाई दर पर बड़ा प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है। उन्होंने बताया कि Reserve Bank of India की अक्टूबर 2025 की मौद्रिक नीति रिपोर्ट के अनुसार यदि कच्चे तेल की कीमतें आधार स्तर से 10 प्रतिशत बढ़ती हैं और उसका पूरा असर घरेलू बाजार में आता है, तो महंगाई दर में केवल लगभग 30 बेसिस पॉइंट यानी करीब 0.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि मध्यम अवधि में महंगाई पर असर कई कारकों पर निर्भर करेगा, जिनमें रुपये की विनिमय दर, वैश्विक मांग-आपूर्ति की स्थिति, मौद्रिक नीति और समग्र आर्थिक परिस्थितियां शामिल हैं। सरकारी तेल कंपनियों की मजबूत स्थिति सरकारी अधिकारियों और उद्योग विशेषज्ञों के मुताबिक भारत की प्रमुख सार्वजनिक क्षेत्र की तेल रिफाइनरी कंपनियां-Indian Oil Corporation, Hindustan Petroleum Corporation Limited और Bharat Petroleum Corporation Limited-वित्तीय रूप से मजबूत स्थिति में हैं। वित्त वर्ष 2026 के पहले नौ महीनों में इन तीनों कंपनियों का संयुक्त शुद्ध लाभ 192 प्रतिशत बढ़कर 57,810 करोड़ रुपये हो गया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 19,768 करोड़ रुपये था। मजबूत वित्तीय स्थिति के कारण ये कंपनियां फिलहाल खुदरा स्तर पर कीमतों को स्थिर रखने में सक्षम हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पश्चिम एशिया में युद्ध और नहीं बढ़ता तथा ऊर्जा ढांचे पर बड़े हमले नहीं होते, तो ब्रेंट क्रूड की कीमतें 130 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं। इसके बावजूद फिलहाल पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना कम बताई जा रही है। भारत में पेट्रोल-डीजल की मौजूदा कीमतें जून 2022 में जब ब्रेंट क्रूड 120 डॉलर से ऊपर पहुंच गया था, तब दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 96.72 रुपये प्रति लीटर और डीजल 89.62 रुपये प्रति लीटर थी। इसके बाद मार्च 2024 में कीमतों में 2 रुपये की कटौती की गई, जिससे पेट्रोल 94.72 रुपये और डीजल 87.62 रुपये प्रति लीटर पर आ गया। 30 अक्टूबर 2024 को मार्केटिंग कॉस्ट एडजस्टमेंट के कारण केवल 5 पैसे की बढ़ोतरी हुई और वर्तमान में दिल्ली में पेट्रोल की कीमत लगभग 94.77 रुपये और डीजल 87.67 रुपये प्रति लीटर है। टैक्स नीति से मिलती है राहत विशेषज्ञों के अनुसार सरकार अंतरराष्ट्रीय कीमतों के उतार-चढ़ाव से उपभोक्ताओं को बचाने के लिए समय-समय पर उत्पाद शुल्क में बदलाव करती रहती है। 8 अप्रैल 2025 को सरकार ने स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी (SAED) में 2 रुपये की बढ़ोतरी की थी, जिससे सालाना लगभग 34,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व मिलने का अनुमान है। वर्तमान में पेट्रोल पर SAED 13 रुपये और डीजल पर 10 रुपये प्रति लीटर है। इससे पहले नवंबर 2021 और मई 2022 में सरकार ने एक्साइज ड्यूटी में कटौती कर पेट्रोल की कीमत में 13 रुपये और डीजल में 16 रुपये प्रति लीटर की राहत दी थी। वैश्विक ऊर्जा बाजार पर युद्ध का असर ऊर्जा विशेषज्ञ Jim Burkhard (S&P Global Energy) का कहना है कि यदि मध्य पूर्व में संघर्ष बढ़ता है और Strait of Hormuz के जरिए होने वाली तेल आपूर्ति प्रभावित होती है, तो यह इतिहास का सबसे बड़ा तेल आपूर्ति संकट बन सकता है। हाल के दिनों में सऊदी अरब और कतर के ऊर्जा ढांचे पर हुए हमलों से भी बाजार में अस्थिरता बढ़ी है। फिलहाल सरकार का फोकस यह सुनिश्चित करने पर है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार की अस्थिरता का सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर न पड़े और देश में ईंधन की कीमतें स्थिर बनी रहें।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।